(सदमा - उपन्यास)
आश्रम के गेट पर पहुंच कर सब लोगों ने थोड़ा विश्राम करने का सोचा। इस काम में हरि प्रसाद तो मास्टर था वह तो सबसे पहले सबसे अच्छा स्थान ढूंढ कर विश्राम करने लग गया। इतनी देर में अंदर एक पूरूष साधक बाहर आया और उसने जब सब को विश्राम करते हुए देखा तो कहां की नानी थक गई क्या। तब नानी हंसी नहीं बेटा अभी कहां थकी हूं अभी तो और बहुत कुछ झेलना है इस शरीर से। और मेरा मन तो कर रहा है उस पहाडी की चोटी पर चली जाऊ परंतु शरीर जवाब दे देता है। और सब नानी के इस मजाक पर हंस दिये। पल भर में ही वहां का वातावरण एक दम सरल और सौम्य हो गया। तब उस साधक ने कहां की चलो अंदर ही विश्राम कर ले और मरीज को देख भी लेते है।
तब सब भारी कदमों से उठ कर अंदर जाने के लिए खड़े हुए। सोम प्रकाश ये सब देख कर कुछ भय भीत भी हो रहा था। तब नेहालता ने उसके कांपते हाथ को थामते हुए कहां की आप डर रहे है। तब सोम प्रकाश की आंखों में एक करूणा, दया का भाव था। तब नेहा लता ने उसके हाथ को पकड़ते हुए कहां की हम सब आपके साथ है। अंदर ऐसा कुछ नहीं होगा। तब सोम प्रकाश ने कहा की मुझे अंदर डर लगता है। तब नानी ने उसके दोनों कंधों को पकड़ कर कहां की बेटा क्यों डरते हो। वहां ऐसा कुछ थोड़ा ही होता है। परंतु नानी मेरा दम घुटता है वहां पर मैं वहां जाना नहीं चाहता। इतनी देर में स्वामी जी भी आ गए। तब उनकी बातें सून कर कहने लगे सोम प्रकाश आप तो बहुत ही बहादुर है। आप तो जरा भी नहीं डरते। आप तो नानी के साथ जंगल भी चले जाते थे। आपने देखा आपके साथ जब नानी जंगल में जाती थी तो वह क्यों नहीं डरती थी। क्योंकि आप साथ होते थे।
ये बाते सून कर सोम
प्रकाश कहने लगे की आप मेरा मन रख रहे है। नानी तो कभी डरती ही नहीं। वह तो बहुत
बहादुर है। मैं तो तब भी नानी के साथ जाता था तो डरता था। इस तरह से बात करते हुए
वे लोग उस जगह पहुंच गए जहां पर वैद्य शाला थी। वहां पर दवाइयों के मिश्रण की एक
अजीब सी गंध आ रही थी। इस बीच ड्राइवर और नानी पत्थर की बनी एक शीला पर बैठ कर विश्राम
करने लगे। और उनके पैरों के पास ही हरिप्रसाद भी विराजमान हो कर लम्बा लेट कर सो गया।
नेहा लता सोम प्रकाश को ले कर अंदर वैद्य शाला में चली गई। वहां लकड़ी की बड़ा सा
तख्त नुमा आसन था जिस पर कुछ पत्ते बिछा रखे थे। और वहां बिठा कर सोम प्रकाश को
लकड़ी के एक बर्तन में पीने को कुछ काढ़ा दिया जो पहले से ही तैयार किया हुआ था।
न-न करते सोम प्रकाश सारे काढ़े को पी गया तब नेहा लता ने पूछा क्या कड़वा है। तब
वह गर्दन हिला कर कहने लगा की नहीं कसैलापन सा कुछ अकबका अजीब सा इसका स्वाद है।
उस दवा के पीने के
बाद सोम प्रकाश के मस्तिष्क में गहरा कोहरा सा छाने लगा था। वह धीरे-धीरे निंद्रा के
आगोश में जाने लग गया। साथ में खड़ी नेहा लता के लिए ये सब एक दम से नया था। उसने
इससे पहले कभी भी इस तरह से इलाज होते हुए नहीं देखा था। परंतु कुछ माह पहले उसके
साथ इसी स्थान पर यही सब इलाज किया गया था। परंतु तब तो वह भोगता थी। इसलिए उसे इस
बात का जारा भी भान नहीं था। परंतु अब वह एक दर्शक है। दृश्य उसके सामने घट रहे
है। तब उसे पता लगा की बीमार की बीमारी को जब हम भोग रहे होते है तो सामने जो
हमारे संग साथ है वो भी कही हम से अधिक भोग रहा होता है। क्योंकि आप तो कुछ अचेत
भी है परंतु वह तो होश में है। बीमार व्यक्ति का मन तो कुछ अस्वास्थ्य है,
परंतु आपका चित तो एक दम होश और स्वास्थ्य है। आपके उस मन के उपर
प्रतिछवि स्पष्ट छप रही है। इसलिए अब उसे महसूस हो रहा था की उसने ही नहीं भोगा था।
अपनी बीमारी में उसके साथ जीने वाले व चलने वाले उससे भी कहीं अधिक उसे जी और भोग रहे
होते है। धीरे-धीरे सोम प्रकाश की आंखें बंद हो रही थी। उसके सर पर गर्म पानी की
पट्टी जो एक द्रव्य में डूबी हुई को बार-बार रखी जा रही थी। और तब उस महिला ने
नेहा लता को कहां की अगर आप साथ दे तो ये तेल इनके पैरों के तलवों पर लगा कर
धीरे-धीरे मालिश करो। नेहा लता इस सब के लिए बिना किसी झिझक से शामिल हो गई।
वह एक स्टूल पर बैठ
कर तेल को सोम प्रकाश के तलवों पर धीरे-धीरे मालिश करने लगी। वह तेल एक अजीब सी
गंध लिए था। जो नाक में तेजी से लग रहा था। परंतु इस सब की नेहालता ने जार भी
परवाह नहीं की और आधे घंटे तक वह सोम प्रकाश के पैरों की मालिश करती रही। इस के
बाद सोम प्रकाश के पूरे शरीर पर एक कपड़ा ढंक दिया गया। इस बीच उसे बहुत पसीना आ
रहा था। हालांकि बाहर तो अभी काफी ठंड थी अब इस अवस्था में उसे चिकित्सक ने कहां
की अब ये कम से कम तीन घंटे तक इसी तरह सोते रहेंगे। आप ताजा हवा में कुछ देर के
लिए बाहर विश्राम कर सकती है।
नेहा लता वहां से
उठ कर बहार हवा में आ गई। दवा की गंध के कारण उसका सर भी कुछ भारी-भारी हो रहा था।
वह नानी के पास आकर बैठ गई। तब नानी के पूछा बेटा सर भारी हो रहा है। और उसे पीने
के लिए पानी दिया और मूंह धोने के लिए कहां। और फिर धीरे से जगह बना कर पीछे सरक कर
बैठ गई और नेहा लता को कहां की तुम यहां पर कुछ देर के लिए आँख बंद कर के लेट जाओ अंदर
जाने से मेरा भी सर चकराने लग जाता था। इन सब दवाओं के गंध के कारण। और पाँच मिनट
में ही नेहा लता की आंखें लग गई नानी उसके बालों को धीरे-धीरे सहला रही थी। कभी
बचपन में जब नेहालता अपनी मम्मी की गोद में सर रख कर लेटती थी। वहीं सब दृश्य उसके
सामने आ खड़ा हुआ।
इस तरह से नेहालता
को सोते देख कर नानी ने ड्राइवर को कहां की तुम चाहो तो घर जा सकते हो। क्योंकि
वहां भी हो सकता है कोई काम आपके बिना अधूरा हो। अब तुम्हारी यहां कोई विशेष जरूरत
तो नहीं है। पता नहीं बेटा हमें यहां पर चार या पाँच घंटे भी लग सकते है। आप चले
जाओ तो अच्छा होगा नाहक आप हमारे साथ परेशान हो रहे हो। ड्राइवर का जाने का मन तो
नहीं कर रहा था। परंतु नानी के अधिक आग्रह करने पर वह मान गया। नानी जी मन तो नहीं
कर रहा परंतु आप कहती है तो आपका कहां भी नहीं टाल सकता। और वह नानी को प्रणाम कर
वापस कार की और चल दिया। ठीक है बेटा आराम से जाना। गाडी को धीरे से ही चलना यहां
के रास्ते बहुत खराब है।
इस तरह से नेहालता
को सोते हुए देख कर नानी को अच्छा लग रहा था। न जाने कितने दिनों बाद वह इतनी गहरी
नींद में सोई है। एक तो वह इतना पैदल चली। शायद उसे आदत भी नहीं हो। और दूसरा सोम
प्रकाश के साथ अंदर जब वह थी तो वह दवा का प्रभाव भी तो कुछ रहा होगा। नानी जानती
थी। जब वह पहले आती थी तो एक दो बार पेंटल उसके साथ था। परंतु एक बार तो अकेली भी सोम
प्रकाश को ले कर आई थी। तब वह उस कुटिया में रही तो उसे भी कुछ भारी-भारी सा लग
रहा था। चलों सोना भी मनुष्य को उतना ही जरूरी है जितना की श्वास लेना। सोने से
हमारे मन मस्तिष्क को ही नहीं हमारे शरीर को एक उर्जा मिलती है।
नानी जो खाना लेकर
आई थी। वह तो पास ही रखा था परंतु कोई खाने वाला ही नहीं था। एक बेचारा हरिप्रसाद
था। वह भी अपनी खाल में मस्त सो रहा था। नानी सोच रही थी। कुत्ता अपने जीवन का
कितना हिस्सा सोकर ही गुजार देता है। वह ये हरि प्रसाद तो जब देखो सोता ही रहता
है। इसे जरा विश्राम मिला नहीं की पल में सो जाता है। परंतु मनुष्य इस तरह से
विश्राम नहीं कर सकता। शायद ये हमारे विचारो का प्रभाव है। वह जब हम आँख बंध कर
लेते है तो सपने बन जाते है। शायद स्वप्न तो कुत्ते या दूसरे प्राणी भी देखते
होंगे। परंतु उनकी एक सीमा है। उनके पास ध्वनि है वाणी है। शब्द नहीं है। जैसे
आपने देखा की जब एक धून को हम गुनगुनाते है तो उसमें शब्द भी शामिल होते है। परंतु
यदि उसे आलाप की तरह से नमो-तमो की तरह से गया जाये तो उससे शब्द कहीं खो जाते है।
और बह बिना शब्दों की तानें एक विचित्र वातावरण निर्मित कर देती है। इसलिए आपने
देखा नहीं की कोई भी पक्षी जब गाता है। तो वह एक गान ही लगता है, उनमें एक लय होती है। बिना शब्दों के। तब वह आपके कानों को कभी चुभता
नहीं कोई भी पक्षी जब गाता है। तो उसकी तान अलग होती है परंतु भिन्नता में भी एक
सौंदर्य होता है।
नानी के मन में ये
विचार किसी रेलें की तरह से अविरल चल रहे थे। साथ न जाने उसे किस लोक में बहाए लिए
जा रहे थे। मानो वह एक स्वप्न तंद्रा में बही कहीं खो रही थी। थकावट तो उन्हें भी
हो रही थी। इस उम्र में इतनी दूर कठिन रास्तों पर चलना सब के बस की बात नहीं थी।
परंतु नानी को इन पहाड़ी रास्तों पर चलने का अभ्यास था। इसलिए वह इससे थोड़ी कम थकान
महसूस कर रही थी। परंतु उम्र भी तो आदमी को थका जाती है। नानी की थकावट उम्र की
थकावट थी। जिस पर किसी का जोर नहीं था। फिर भी वह बहुत मजबूत मन की स्त्री थी।
जीवन के जो उतार चढ़ाव नानी ने झेले थे और आज भी झेल रही है। वह हर मनुष्य के बस
की बात नहीं है। आज नाना को गुजरे भी करीब बीस साल हो गए होगे। फिर नानी ने सोम
प्रकाश को पालने पोसने में किसी बात की कमी नहीं रखी। वह जानती थी। ये मेरा बेटा
नहीं है। आज जीवन इस मोड़ पर पहुंच गया है, की आपकी
अपनी औलाद भी आपका साथ नहीं देती फिर पाले हुए का क्या विश्वास कर सकते हो। परंतु
नानी ने सोम प्रकाश को प्रेम के कारण पाला आज भी सोम प्रकाश नानी की छत्र छाया में
जीना चाहता है। नानी ने कभी नहीं कहा की मेरा क्या होगा। बहुत जिगरे की स्त्री है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें