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शनिवार, 2 मई 2026

49-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-49

(सदमा - उपन्यास)

पेंटल जब नानी के घर पहुंचा तो सब लॉन में बैठ कर बाते कर रहे थे। कि आज सुबह अचानक ये क्या हो गया? इस बात की चिंता नेहालता को सबसे अधिक थी। क्योंकि वह मम्मी के स्वभाव को बचपन से जानती थी, परंतु सुबह का व्यवहार एक दम से अलग था। लगता था ये उनकी मम्मी थी ही नहीं, वह ऐसा कर ही नहीं सकती। परंतु नानी उन्हें समझा रही थी, की अब बात को दिल से न लगाओ तुम्हारी मां ने ये बाते सब गुस्से में कह दी है। देखना होटल जाते-जाते उन्हें अपनी बात पर पछतावा होने लगेगा। अभी सूर्य अस्त नहीं हुआ था अंबर मैं अभी भी दूर पहाड़ी की चोटियों पर प्रकाश अटका हुआ चमक रहा था। साथ ही बादलों ने भी आपने अंदर अनेक रंगों से सौंदर्य भरना शुरू कर लिया था। कैसा है इस प्रकृति का चमत्कार ये, आप ने जब संध्या के परिवर्तन वातावरण को न निहार हो तो आप उस सौंदर्य की कल्पना नहीं कर सकते जो वहां बिखरा फैला होता है। जब तक की आपके ह्रदय ने उसे पिया और आंखों ने निहारा न हो। वो पल-पल बदलते चित्र कितने विचित्र और मनोहारी लगते है। बीच-बीच में पक्षियों के झूंड अपने-अपने नीड़ की और लोट रहे थे। कभी-कभी किसी मोर की कर्कश आवाज पूरे वातावरण को कंपा जाती थी। मानो कहीं से दर्द आ कर उन घास पत्तों की फुलंगियों पर करहा गया हो। संध्या का समय पूरी प्रकृति के लिए एक शुष्कता, सुषुप्ति समेटे आता सा दिखता है। एक प्रकार का ये संधि काल है या उसे विश्राम काल भी कह सकते है। जो दिन भी के उत्पात के बाद एक खाली पन या जिसे एक नन्हीं सी मौत भी कहा जा सकता है।

पेंटल ने दूर से ही सब को अंगन में बैठे हुए देख लिया था। परंतु उसकी और किसी का ध्यान नहीं गया था। जब पेंटल पेड़ो के बीच से निकल कर एक दम मैदान में सामने आ गया तब हरिप्रसाद की नजर उस पर पड़ी और वह भौंकता हुआ पेंटल की और दौड़ा। तब जाकर सब का ध्यान उस और गया। उधर मुड कर जब सब ने देखा तो पेंटल जी आ रहे है। पेंटल को देख कर सब को बहुत खुशी हुई क्योंकि पूरा दिन आज बहुत भारी गुजरा था।

शायद पेंटल के आने से उसमें कुछ राहत महसूस हो। हरि प्रसाद जाकर पेंटल की छाती पर दोनों पैर रख कर खड़ा हो गया और फिर उसका मुख चाट लिया। यही तरीका था उसके प्यार करने का। सब ने खड़े होकर पेंटल का स्वागत किया की अरे आप एक दम से कहां से आ गए। तब पेंटल ने कहा की मैं सोनी के घर चला गया था। वहां बात करते और चाय पीते देर हो गई। नहीं तो और भी जल्दी आ जाता।

खेर आप सब ठीक से तो है। परंतु उधर से किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। तब तक पेंटल के लिए अंदर से एक कुर्सी नेहालता और ले आई। तब पेंटल ने कहां की भाभी आप क्यों परेशान होती है मैं ले आता हूं। इस भाभीशब्द ने सब को चौंका दिया। सुबह जिस तरह का वातावरण था उससे अब एक भी शब्द सारी खुशियों बिखेर देने वाला लग रहा था। तब सब का मुख देख कर पेंटल ने कहां की गलती से जरूर निकल गया परंतु ये एक दम से सच है। और उसने अपने दोस्त को सीने से लगा लिया। सोम प्रकाश अपने दोस्त के गल लग कर फफक पड़ा मानो सालों की जमी बर्फ पिघल जाना चाहती है। और इस तरह से दोनों दोस्त कितने दीनों में एक खुशी को महसूस कर रहे थे। सालों से तो इस घर में केवल दूख दर्द और उदासी ही पसरी पड़ी थी। आज अगर कुछ देर के लिए खुश आ खड़ी हुई तो सब की आंखें नम हो गयी थी।

बेटा तुम्हें देख कर मन बहुत सीतल हो गया। यहां तो न जाने कैसे-कैसे विचार मन में आ रहे थे, की कल एक खुशी का सपना सजो रहे थे। पता नहीं आगे क्या हो परंतु तुम्हारे आने से मन बहुत प्रसन्न हुआ। नानी की ये सब बातें किसी ने सूने या न सूने परंतु वातावरण का मौन भंग किया हरिप्रसाद ने भौंक कर की ....भू ...भू... .भू..। कि तुम क्यों परेशान होते हो मैं सब ठीक कर दूंगा।

कुछ देर सब ने बैठ कर बाते कर ही रहे थे तब तक आसमान पर अँधेरा छाने लगा था। बादल भी अपना सफेद दूधिया रंग बदल कर अब उसमें मटमैला श्यामल रंग भर रहे थे। दूर पेड़ भी एक दम से सीधे शांत खड़े अलसाये से दिखाई दे रहे थे। आप दिन में जब वृक्ष जागा हुआ होता है, तब उसे देखेंगे और रात को तब सो जाता है तब वही हवा उस पर कैसा व्यवहार करती है। ये देखने जैसा होता है, दिन में वह कैसे नाचता है, झूमता है तो उसके नाचने का अंदाज अलग होता है। रात को जब वही हवा चलती है तो वह सोया हुआ मदमस्त झूमता सा महसूस होता है। उस समय उस वृक्ष में एक प्रकार की तंद्रा समाई होगी। दिन की झूमने में एक प्रकार अल्हाद एक नृत्य उत्सव होता है। धीरे-धीरे अंधकार अपना छद्म रूप पूरी प्रकृति पर फैला रहा था। परंतु दूर अंबर में चाँद भी आज अपनी आभा नहीं बिखरे रहा था। क्योंकि आज शायद शुक्ल पक्ष की अष्टमी थी। इसलिए चंद्रमा के उदय होने में काफी देरी थी। परंतु तारे अपनी चमक से प्रकृति में एक साहास भर रहे थे। दूर क्षितिज पर शुक्र तारा भी अपने पूर्ण यौवन पर चमकने लगा था।

चलों बेटा बाकी बाते बाद में करते है। अब कुछ खाना खा लेते है। पेंटल ने कहां की मैं तो सुबह से ही भूखा हूं। नानी आज क्या बनाया है, खाने में। तब नानी ने कहां की दाल तो है ही साथ में नेहालता ने भिंडी की सब्जी भी बनाई है। क्या वह ठीक रहेगी तुम्हारे भूखे पेट के लिए। तब हरि प्रसाद अचानक भौंक उठा की उससे क्या पूछते हो ये तो बुद्धू है, मैं बतलाता हूं आप को मुझ से पूछ लेना चाहिए। तब नेहा लता ने हरि प्रसाद को कहा की हाँ महाराज तुम्हें कैसे भूल सकते है। तुम तो सबसे पहले नम्बर लगते हो। और हंसते हुए सब रसोई की और चल दिये।

खाना खा कर नानी और नहा लता वर्तन ले कर किचन में चली गई तब रह गये दोनों दोस्त। एक साल बाद पेंटल अपने दोस्त से बात कर रहा था। पहले तो सोम प्रकाश कुछ बोलता ही नहीं था। उस घटना के बाद एक पत्थर की तरह से बुत बन गया था। तब पेंटल ने कहा की सोम आज तुझ से बात कर के मुझे कितनी खुशी हो रही है। उसे बतला नहीं सकता। ये कान कब से तरस रहे थे तुम्हारे होंठों सी निकली वाणी को सुनने के लिए की तुम उनसे कुछ तो बोलो। वह हरकत करें। उन से कुछ ध्वनि, कुछ शब्द निकले। परंतु चलो जो भी हो कम से कम आज वह दिन आ गया। एक बात मैं केवल तुम्हारे मुख से सुनना चाहता हूं। क्या तुम नेहा लता से प्रेम करते हो? तुम्हारी आंखों से तो यही लगता है। तब सोम प्रकाश की आंखों से केवल चार बूंद आंसू की कुछ बूंदे मात्र गिरी। और उसने पेंटल का हाथ पकड़ लिया। और कहने लगा सच कह रहा हूं तू मेरा जिगरी दोस्त है तुझ से मेरी कोई बात नहीं छुपी है। जिस दिन मैंने नेहालता को पहले ही दिन देखा था पता नहीं मेरे अचेतन में क्या हो गया था। जिसे तब मैं नहीं ही समझा था। और सच कहो तो समझ आज भी नहीं रहा हूं। केवल उस में बह जाना चाहता हूं। और सच मुझे बहुत आनंद आ रहा है।

परंतु एक बात थी जिस तरह से नेहा लता मुझे छोड़ कर चली गई थी तो अचानक ने जाने मेरे अंदर सब बूझ सा गया था। जीवन में एक अंधकार सा छा गया था। अभी तो उस मन का दीपक जला भी नहीं था की आंधियों ने उसे बूझा दिया तब मैं निरुत्तर सा केवल मुक उसे देखता भर रह गया था। और सच कहूं तो मेरे बस में कुछ भी नहीं था, अगर मैं कुछ करना भी चाहता तो क्या कुछ कर सकता था। नहीं ! न मुझे उस समय किसी बात का कुछ पता था और न ही आजा है। की मुझे क्या करना है, और क्या मेरे साथ हो रहा है। और न ही ये सब मेरे बस की बात थी। और ये सब क्या घट रहा है, क्यों हो रहा है मैं एक लाचार और बेबस केवल इसे निहार सकता था। किसी को पुकार भी नहीं सकता था। मानो मेरे शब्द ही किसी ने मुझे से छिन लिये। मैं किस को पुकारूं की कोई आकर मेरी मदद करें। न ही मुझे कोई मार्ग दिखाई या सूझ रहा था की अब क्या करूं। न ही मुझे कुछ सूझ रहा था और नहीं ही कुछ समझ ही आ रहा था। की किस मार्ग पर चलूं। चारों और केवल अँधेरा ही अंधेरा छाया हुआ था।

तब पेंटल ने कहां की जो काम तुम ने उस समय किया था। तब तो मैं उस काम के लिए तुझे पागल ही समझता था। परंतु जितना साहस तुने दिखलाया था उस के एक ग्राम की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था। कहां से वो सब तुझ में आया ये एक रहस्य है। क्या तुम अपने अंदर झांक कर तब देखते हो तो तुम ये समझ सकते हो वो सब जो तुमने किया वो सब तुम क्या कर सकते हो? शायद तुम भी कंधे उचका कर चुप रह जाओ। तुम्हारे और नेहालता के तार कही पीछे से जूड़े है। इतना खिंचाव कोई एक जन्म का नहीं हो सकता। शायद ये हालत नेहालता जी का भी है। परंतु तुम घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा। नेहा लता के पिता तो एक दम से शांत है। परंतु उसकी मम्मी भी होटल तक जाते-जाते काफी नरम पड़ गई थी। इतनी देर में नेहालता और नानी काफी लेकर आ गई। तब अचानक उनकी बात चीत में शांति छा गई। उन के चेहरे देख कर नेहालता ने कहा की कोई गुप्त बात चल रही थी। दोनों दोस्तों की कहो तो हम अंदर बैठ कर काफी पी ले। तब सोम प्रकाश ने कहा की नहीं आप से क्या छूपाना। पुरानी बाते याद आ गई थी।

काफी पीते हुए पेंटल ने कहा की नानी कल नेहालता के माता पिता आ रहे है। हम सब को महात्मा जी के पास जाना है। वही पर सब बात चीत हो तो अच्छा होगा। वहां पर कोई गलती की गुंजाइश नहीं रहेगी। इसलिए सुबह चाय पी कर हम तीनों तो पैदल ही घूमते हुए चले जायेगें। और आप दोनों नेहा लता के माता पिता के साथ कार में आ जाना। क्योंकि हम दोनों दोस्त काफी दिनों से साथ रहे थी नहीं। इसलिए एक तो साथ हो जायेगा। दूसरा और ये पागल हरी प्रसाद तो जायेगा ही इसलिए कार में सब नहीं आ सकते। तब यहीं उचित रहेगा की आप नानी के साथ आराम से आ जाना। सोनी जी ने कह दिया है की आठ बजे ड्राइवर गाड़ी लेकर होटल चला जायेगा। और वह सीधा यहीं आपको लेने के लिए आयेगा। आप तब तक तैयार रहना। हम तो सुबह की चाय पीकर जल्दी ही नकल जायेगें।

अगर हम जल्दी भी पहुंच गए तो नदी के किनारे बैठ कर आप लोगों का इंतजार करेंगे। क्योंकि महात्मा जी की बातों का आपके माता पिता के पास कोई तोड़ भी नहीं होगा। और शायद वह उस का जवाब भी नहीं देना चाहेंगे। क्योंकि कुछ बाते ऐसी होती है हम जितने ऊंचे से वह झरती है उसी उंचाई से उन्हें समझा जा सकता है। हम और आप के शब्दों में वह वज़न नहीं हो सकता। महात्मा जी को कोई लोभ लालच तो है नहीं इसलिए उनकी बात पत्थर की लकीर बन जायेगी। और देखना वो सब इस के लिए राज़ी हो जायेगे। अब हमें खुशी का इंतजार करना चाहिए क्योंकि जीवन की जो अंधेरी काली परछाई थी वह अब समाप्त होने की तैयारी कर रही हो। सोम प्रकाश भी लगभग ठीक हो गया है। ये सारी मेहनत नेहा लता की कृपा से हमें प्राप्त हुई है।

और दिन भर का जो मन में तनाव और भारी पन था वह पल में फूल की तरह से हल्का हो गया। इस से सब को अब रात को नींद भी अच्छी आयेगी। क्यों जो भारी चिंता मन पर छाई हुई थी उसे वह पेंटल ने आकर दूर कर दिया था। ये सब प्रकृति का ही एक खेल चल रहा है। हम तो एक माध्यम है। जब हम अपने को छोड़ देते है तो वही सब सही ही होता है और सच वही जो होना है वहीं होना चाहिए। परंतु हमारा देखने का अंदाज बदल जाता है। बस यही भेद होता है। वरना तो घटना तो पहले और बाद में यही सब घटनी थी। और एक चेन की नींद इतने दिनों बाद सारे परिवार ने ली।

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