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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

48-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-45

(सदमा - उपन्यास)

 ज का दिन सब के लिए बहुत भारी गुजरा था। अचानक वो मोड़ आपके जीवन में आ जाये जिसके बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते है। तब मनुष्य मन क्या प्रकिृया करेगा। यहीं थी वह मन की प्रतिक्रिया जो श्रीमति मल्होत्रा जी की थी। वह अचानक अपना आपा खो बैठी। झल्ला  गई, क्रोध करने लगी, उछलने लगी, तांडव शुरू हो गया। वह व्यक्ति उस बात को स्वीकार न करने के लिये, उस बात को न मानने के लिए भरसक प्रयत्न करेगा। वहीं कल नेहालता ओर श्रीमति मल्होत्रा जी के बीच हुआ था। जिसे पेंटल आराम से बैठ कर देख रहे थे। वैसे भी उस का इस सब बीच में बोलने का न ही कोई औचित्य था और न ही अधिकार।

होटल जाते-जाते तक श्रीमति मल्होत्रा जी का गुस्सा कम ही नहीं एक दम से उतर गया था। उसे अपने बोले शब्दों पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था। परंतु बेटी ने जो किया वह बहुत सौम्य था। उस का अपना जीवन है, फिर भी उसने मां को कोई अनुचित शब्द नहीं बोले। वह अपनी मां के स्वभाव को जानती थी। की वह जबान की कड़वी है, परंतु दिल से एक दम मुलायम। ये बात मल्होत्रा जी भी जानते थे, इसलिए वह चिंगारी को बूझने का इंतजार कर रहे थे। अगर वह बेटी का साथ देंगे तो उसकी पत्नी फिर क्रोधित हो जायेगी। सो जब वह होटल पहुंचे तो सब अपने-अपने कमरे में चले गए किसी ने किसी से कोई बात नहीं की। पेंटल जी अपने कमरे में एक दम से मौन मुद्रा में चले गए एक चिंगारी को लिए हुए, जिसके नीचे एक तूफान भभक रहा है।

कुछ घंटा विश्राम के बाद जब चाय का समय हुआ तो श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा ने पेंटल के कमरे की घंटी बजाई वह लेटे हुए थे। उठ कर दरवाजा खोला और यह देख कर अचरज कर रहे थे की श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा दरवाजे पर खड़ी थी। और पूछ रही थी की पेंटल जी आप हमारे कमरे में चाय पीना चाहेंगे। पेंटल जी को अचरज तो हुआ परंतु खुशी भी बहुत हुई। मनुष्य स्वभाव भी कितना विचित्र है। हम इतनी आसानी से किसी के स्वभाव के बारे में निर्णय नहीं ले सकते। तब पेंटल जी ने कहा की जरूर अभी दो मिनट में आता हूं और वह अपने कपड़े बदल कर तुरंत पास वाले कमरे में जिस में श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी ठहरे थे उनके पास चले गए।

चाय आ गई श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा ने चाय बनाते हुए पेंटल से पूछा की कितने चम्मच चीनी चाहिए तब पेंटल ने कहां की दो चम्मच। सब चाय की चुस्की ले रहे थे परंतु सब के पास कहने को बहुत कुछ था। परंतु ये समझ नहीं आ रहा था की कौन और कहां से शुरू करें। मौन का अंतराल श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा ने ही तोड़ा की बेटा पेंटल मुझे लगता है मैं नेहा लता से कुछ अधिक ही कठोर शब्दों का उपयोग कर बैठी। मुझे खुद विषमय हो रहा था, की मैं क्या बोल रही हूं। परंतु मैं क्या करूं मैं इस के लिए एक दम तैयार नहीं थी। इस लिए तुम मुझे माफ कर दो। तब पेंटल ने कहां की में आपके चेहरे को देख रहा था। उस की दो पर्त थी एक पर क्रोध था परंतु दुसरे पर सनह झर रहा था।

तब पेंटल जी ने कहां की कोई बात नहीं आंटी जी आप इस बात को दिल पर मत लेना। नेहा लता आपकी बेटी है। आप का गुस्सा जायज था। परंतु आप पल भर में ही समझ गई की मैं गलत हूं। और महानता तो देखो आपकी बेटी की। जिस ने आपको कोई गलत जवाब नहीं दिया। जबकि वह एक दम से ठीक है। अंकल जी मैं आप को अपने ह्रदय की बात आज मोका मिला तो कह रहा हूं। जो और जिस स्थिति में मैंने नेहालता को देखा था, वह केवल मैं ही अब जानता हूं। और आज वह जो भी है, उस का कारण मेरा दोस्त सोम प्रकाश है। जब उसने मुझे कहां की मैं इस लड़की को इस चुंगल से निकालना चाहता हूं। तो मुझे लगा की ये असंभव है। ऐसा होना लगभग ना मुमकिन था। परंतु परमात्मा ने उन दोनों का साथ दिया। तब हम और आप तो नाहक परेशान हो रहे है। उनकी चाहत सच्ची है। वो एक दूसरे के लिए बने है। किसी जन्म का कुछ लेन देन था जो दोनों का जन्म अलग-अलग परिस्थिति में जन्म ले लिया। फिर प्रकृति भी उन्हें मिला रही है। मुझे तो सोचने मात्र से ही डर आज भी लग रहा है। मैं ये कदम कभी नहीं उठा सकता था, जो मेरे दोस्त ने उठाया था। न वह एक दूसरे को जानते थे। और सबसे खराब बात ये थी की नेहालता की मानसिक हालत ऐसी नहीं थी, जो उसे इतनी दूर सफर पर साथ ले जाया जा सके। जिसे वह दो चार दिन पहले मात्र ही जान पहचान हुई हो। परंतु इस अवस्था में मनुष्य अपने स्वरूप अपने स्वभाव पर लोट आता है। ये उसके लिए मार्ग है और प्रकृति उसका मार्ग दर्शन करती है।

जीवन जन्म नहीं है, ये तो जीवन के लिए एक अवसर है। हम गलत समझ लेते है कि जन्म ही जीवन है। परंतु इसके पीछे तो एक झीना सा पर्दा जो कर्म के सिद्धांत की तरह से खड़ा होता है। परंतु उसकी मंद व मधुर नाद हम नहीं सून सकते। जन्म के बाद ही जीवन की शुरूआत होती है। हमें खूद ही जीवन को निर्मित करना होता है। देखा आपने देखने में नेहा लता ने आपके घर में जन्म लिया परंतु जीवन कुछ और था जो महीन सी पतली लकीर की तरह से एक समय का इंतजार कर रहा था। और इसे हम एक अवसर भी कह सकते है। वह दुर्घटना एक अवसर लेकर आई। जिसे हम दुर्घटना कह रहे है असल में उसे अवसर कहना चाहिए घटना नही।

परंतु हम तो इसे केवल घट जाने पर ही जान सकते है। परंतु इसकी आहट हमारे जीवन में बहुत पहले से ही दिखाई देने लग जाती है। मैं तो बस इतना कह रहा हूं की आप बहुत भाग्य शाली है जो ऐसी देवी तुल्य बेटी को अपने गर्भ में रखा जिसके संग साथ आपका घर आँगन चहका, किलकारियां मारी। और आपकी गोद में खेली। परंतु अंकल आप ये समझ ले की छोटा मुख और बड़ी बात की ये दोनों एक दूसरे के लिए ही बने है। हम इस के बीच में खिलवाड़ न करें तो ही ठीक है।

श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा ने बीच में मोका देख कर बोलना शुरू किया की बेटा आपकी बात समझ में ही नहीं आ रही परंतु उसे अब मैं ह्रदय भी उसे स्वीकार कर रही हूं। परंतु एक बात का डर मन से नहीं निकल रहा की नेहालता को हमने इतने लाड़ प्यार से पाला है। हर साधन सुविधा दी है। तब यहां रह कर सब बाद में उसके लिए जीवन को नर्क नहीं बना देगा। ये उसके मन का ही एक खेल भी हो सकता है। जिसे हम प्रेम कह रही है। वह दया या संतावना भी तो हो सकती है । तब अगर सोम प्रकाश ठीक हो जाये तो वह दया या संतावना तो खत्म हो जायेगी। फिर वह त्याग तपस्या तो एक स्वप्न बन कर दूर खड़ी रह जायेगे। तब अगर उसे पछतावा करना पड़ा तो ये पूरे जीवन उसके लिए नर्क जैसा हो सकता है।

जी हां, आंटी आप भी सही सोच रही है। परंतु पहली बात तो एक और हम देख रहे है कि नेहालता यहां करीब एक साल से आपके बिना या किसी सुविधा के जी रही है। आप तो हजारों मिल दूर थे। तब क्या कभी आप से उसने यहां की कोई शिकायत की। नहीं? और दूसरी बात की अगर ऐसा सब होता तो नेहा लता तो ठीक ही हो गई थी। तब न तो सोम प्रकाश को ये सब झेलना पड़ता और न ही नेहा लता को इतनी दूर आना होता। किसी ने उसके साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं की थी। वह अपने भाव से या अपने अंतस की आवाज के साथ आई है। और तीसरी बात जो बहुत ही जरूरी है। जो की महात्मा जी ने इन दोनों के विषय में कही है। वह भी हमें सुननी चहिए। तो आप या हम इस सब का विरोध कर के कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। आप सोचो मैंने तो नेहा लता को यहां लाने के लिए अपने दोस्त का कितना विरोध किया था। उससे लड़ा भी परंतु होनी को नहीं टाल सका था। जो आज अनहोनी बन कर घटती सी दिख रही है। और आज मैं अपने आप को गलत मानता हूं। और अंदर से एक खुशी भी है, कि मैं गलत हूं। क्योंकि मानव कितना सोच विचार कर सकता है। प्रकृति के सामने तूछ्य सा परंतु मन तो अपने को ज्ञानी ही समझता है।

तब बीच में श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की बेटा पेंटल जी आप सही कह रहे है। अपने जो देखा है, आपने जो जाना है वो हम नहीं जानते हम तो अपनी बेटी को भी खो चूके थे। ये आज जो भी है आप दोनों की वजह से ही इस हालत में आंखों के सामने सही सलामत है। जो भी हुआ वह सही या गलत हम अपनी सुविधा की वजह से देखते है। या तोलते है। परंतु आप सही कह रहे है, एक मां-बाप के मन की शंका का निर्वाण महात्मा जी के पास जा कर लेते है।

बातों का अंत इतना मधुर होगी ये किसी ने कल्पना नहीं की थी। सुबह की कटुता तो ने जाने कितनी दूर बह गई थी नदी के धारा में अब यहीं निर्णय लिया गया की कल सुबह महात्मा जी के पास सब मिल कर चलते है। उसके बाद जो भी होगा अच्छा होगा। तब आप का अब आगे का क्या प्रोग्राम है। पेंटल ने झेंपते हुए कहां की एक तो ये बात मैं नेहा लता और नानी जी से कर के आता हूं की हम कल सुबह आ रहे है। सब मिल कर महात्मा जी के पास चलेंगे। और दूसरा कुछ देर के लिए में सोनी जी और उनके पति से भी मिल कर उन्हें धन्यवाद देता हुआ आता हूं। अगर देर हो जाये तो आप मेरा इंतजार मत करना। क्योंकि हो सकता है कि मैं वही पर खाना खा कर सौ जाऊं। तब आप के लिए सुबह गाड़ी आ जायेगी आप उस में बैठ कर आ जाना। मैं आपको वही मिलूंगा।

और पेंटल जी बहार जाने के कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में चले गए। और पाँच मिनट में ही तैयार हो कर होटल से बहार निकल पड़े श्याम होने में अभी काफी देर थी। सो उसने बहार आकर एक आटो को चलने के लिए कहा। वह सबसे पहले सोनी जी से मिलना चाह रहे थे। उस सुंदर से नोनिहाल को देखता चाहते थे। जिसे सोनी ने जन्म दिया हे। और वहां पहुंचे ही माली ने उन्हें तुरंत पहचान लिया और अंदर लेकर गये। अंदर सोफे पर बैठ कर वह इधर-उधर देख ही रहे थे की इतनी देर में श्री देवधर करकरे जी हंसते हुए उनकी और बढ़े की अरे आप तो हमें भूल ही गए। क्या हम लोगों से कोई गलती हो गई जो आप होटल में रूके हो यहां इतना बड़ा घर था और आप....।

पेंटल जी ने नीची गर्दन करते हुए कहां की मैं आपके स्नेह को जानता हूं परंतु नेहा लता के माता-पिता आप से परिचित नहीं थी। इसलिए वो आने को तैयार नहीं हुए। परंतु होटल में भी कोई दिक्कत नहीं हे। सुबह हम जरा नेहा लता के घर पर चले गए थे। सो वहां का वातावरण कुछ भारी सा हो गया था। नेहा लता की मम्मी बहुत क्रोधित हो गई थी। की उसकी लड़की इतनी दूर कैसे रह सकती है। परंतु श्याम को चाय के समय सब ठीक हो गया। वो दोनों दिल के बहुत ही भले लोग है।

तब श्री देवधर जी ने कहां की वह तो मैं देख ही रहा हूं नहीं तो दूसरे के फटे में कौन पैर डालता है। आप सोचो जरा पेंटल जी आपके दोस्त के साथ एक अंजान लड़की को कितना खतरा सहना पड़ सकता था। ओर ऐसा नहीं है की अब वह सह नहीं रही एक बीमार के साथ रहना क्या होता है। जब तक की आप उसके साथ नहीं रहे तो उसकी अच्छाई बुराई को नहीं चिंहित कर सकते। सो वह जरा भी नहीं घबराई वह बहुत साहसी और हिम्मत वाली लड़की है। इतनी देर में सोनी बच्चे को गोद में लिए आ कर पास ही खड़ी हुई। पेंटल जी ने उठ कर लड़के को अपनी गोद में ले लिया। मानो एक दम से कोई चमत्कार सा घटा, उसका पूरा शरीर निर्भर सा हो गया। और उसकी गोद में सोते हुआ बच्चे पर अचानक मुस्कुराट फैल गई जैसे वह उस का इंतजार ही कर रहा था। अचानक पेंटल की आंखों से चार आंसू गिरे वह एक खुशी के आंसू है। और वह एक शब्द भी नहीं बोल पड़े। और बच्चे को लेकर अपने सोफे पर बैठ गए।

पास ही सोनी बैठ कर ये सब देख रही थी। उसे जरा भी ऐसा होगा  विश्वास नहीं था। की जब पहली बार बच्चा पेंटल की गोद में देगी तो उनका हाव-भाव कैसा होगा। तब अपने आप को सम्हालते हुए पेंटल जी ने कहा की सच ही बहुत सुंदर और भाग्य शाली है आपका पुत्र। आप दोनों के वंश का जरूर एक दिन नाम रोशन करेगा। इसलिए सोनी जी आप ने इनका क्या नाम रखने की सोची। तब अचानक श्री देवधर जी बोल उठे की नाम तो रख ले हम महात्मा जी के पास भी ले कर गए थे। वह भी यही कह रहे थे। और जन्म के अनुसार इनका नाम रा रे रू..... से निकला है।.....अब आपकी गोद में बच्चा है। और आपके कदम इस घर में पड़े तभी इनका आगमन हुआ है।

, रू, रो , री आदि नाम वालों की राशि तुलाराशि है। और तुला राशि का राशि स्वामी शुक्र है। और अगर तुला राशि के अनुसार इनके आराध्य भगवान की बात करें तो ये श्री दुर्गा माता है। तुला राशि का भाग्यशाली रंग सफ़ेद है। और अगर आपको आपकी राशि तुला के अनुसार भाग्यशाली अंक की जानकारी चाहिए तो मैं बता दूं की ये 2 और 7 भाग्य शील अंक कहलाते है तुला राशि में।

देवधर जी ने कहां-तब आप ही कोई नाम सुझा दीजिए अब आप की गोद में बच्चा है। हमारे यहां एक परम्परा है कि जो भी व्यक्ति बच्चे का नाम अपनी गोद में ले कर रख देता है उसी कुछ अच्छाइयां-बुराइयां उस में प्रवेश कर जाती है। हमारे घर में कोई भी ऐसा व्यक्ति बड़ा-बूढ़ा नहीं है। जो इसका नाम करण कर दे तो आप ही इसका नाम रख दीजिए.....तब पाँच मिनट के लिए पेंटल जी ने सोचा और फिर उसने रोशनहम इसका नाम रोशन रखेंगे। और इस नाम के लिए सब ने हां भर दी। तब इतनी देर में चाय आ गई और सोनी ने बच्चा अपनी गोद में ले कर कहां की अब आप लोग चाय पीजिए। खाना खाकर जायेगें ना पेंटल जी। सोनी ने कहां।

पेंटल ने कहा की खाने में कोई परेशानी नहीं है। परंतु मुझे सोम प्रकाश जी के घर पर जाना बहुत जरूरी है। क्योंकि जो बात-चीत आज सुबह हुई थी उसके कारण नानी-और नेहालता कुछ परेशान जरूर होगी। की आगे न जाने क्या होनेवाला हे। फिर सुबह हम महात्मा जी के पास भी जाने वाले है। सो होटल में चाय के समय जो बात उनकी मम्मी-पापा के साथ हुई वह बात भी उन्हें बतलानी है। ताकि उन्हें कुछ तो राहत मिले। नहीं तो वो लोग रात भर परेशान होंगे।

तब तो अब आप गाड़ी ले जा सकते है। श्री देवधर करकरे जी ने कहां।

पेंटल ने कहां की अब तो गाड़ी की जरूरत नहीं है। क्योंकि में बीच से ही निकल कर चला जाता हूं। लेकिन आप सुबह जरूर गाड़ी होटल भेज दीजिए आठ बजे तक। तब वह नेहालता के माता पिता को लेकर नानी के घर तक आ जायेगा। हम सब एक साथ महात्मा के पास सुबह ही चले जाते है। परंतु वहां न जाने कितनी देर हो जाये। इसलिए मैं रात भर वही अपने दोस्त के साथ बिताना चाहता हूं। इसलिए होटल में एक फोन कर लेता हूं। तब सोनी ने कहां की हमारी और से भी नमस्ते कहना नेहा लता के माता पिता को और जाने से पहले सब लोग एक दिन साथ बैठ कर खाना खाये तो कैसा होगा। तब यह बात रही की कल तो महात्मा जी के पास जाते है। और परसों सब रात का खाना आपके घर ही खायेंगे।

पेंटल ने श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी को कह दिया आपके पास सुबह आठ बजे तक गाड़ी आ जायेगी। आप चाय नाश्ता कर के तैयार रहना। मैं श्री और श्रीमति देवधर करकरे जी के यहां से बोल रहा हूं। वह आपको नमस्ते कह रहे है। और पेंटल उठ कर पीछे वाले गेट से नानी के घर की और पैदल ही चल दिये। करकरे जी ने कहां की कुछ देर तो और रूक जाते। तब पेंटल जी ने कहां की चाय पानी तो हो गया। अब जरा वहां पहुंचने की जल्दी है, नहीं तो कुछ ही देर में रात घिर आयेगी। दोनों दूर तक उसे जाता हुआ देखते रहे। जब तक उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गया। दूर पेड़ों के झुरमुट में चलता आदमी कैसा परछाई सा लगता है। मानो कोई मनुष्य देह न होकर वह भी एक परछाई है। आंखें भी क्या सब सही देख पाती है। नहीं वह भी तो एक भ्रम में ही जीती है। सब विचार ही तो उसके प्रतिरोपण है। वह एक कल्पना से चित्र को निर्मित करती है। फिर उसे आकार देती है। इसलिए आपने देखा नहीं की प्रत्येक जीव का देखना का तरीका एक दम से अलग ही होता है। इसलिए सब प्राणीयों की आंखों का आकार प्रकार भिन्न रूप से प्रकृति ने बनाया है। परंतु मानव के पास आँख के अलावा उसका मन भी है जो कल्पना कर के स्थिति को अपने अनुरूप से ढाल लेता है।

दूर पेड़ों के बीच से चलता हुए पेंटल की परछाई छोटी होती जा रही थी। सूर्य का प्रकाश भी अब तक बहुत कम हो एक झरपटे में बदल गया था। श्याम का रेशमी उजाला भी कितना सुहाना होता है। अंबर में अभी तारे अपना प्रकाश फैला नहीं पाये है। चाँद का आज कहीं नामों निशान नहीं था। आज की रात के प्रहरी बेचारे तारे ही रहने वाले थे। वह कितना पथ को प्रकाशित कर सकते है ये तो पथिक ही बात सकते है। परंतु अभी दूर बुर्जियों और ऊंचे सफेदे के पेड़ों फूलगिंयों पर सूर्य की किरणें लटकी पड़ी सी लग रही थी। पेड़-पौधे भी छद्म अंधकार में अपने रूप रंग बदल रहे थे। इस बदलाव के बीच मनुष्य भी एक परछाई की तरह से ही देख रहा था। इसलिए वह एक प्रकार से मिटती हुई ही दिखाई दे रही थी। परंतु जब तक वह धुंधली सी परछाई भी दिखती रही सोनी उसे एक टक देखती ही रही। और फिर एक गहरी श्वास ली और अंदर चल दी। की चलो अब बच्चे को ठंड लग जायेगी। हवा में कुछ अधिक ही ठंडक हो गई थी।

और इतनी देर तक बहार यूं हवा में बच्चे को लेकर खड़ा रहना ठीक नहीं था। फिर एक गहरी श्वास सोनी ने ली और दोनों पति पत्नी अंदर मकान में चले गए। परंतु आज दोनों के मन में एक नई उमंग थी। एक नया जोश एक नया पन न जाने कैसे अपने आप ही अंकुरित हो रहा था। तब अचानक देवधर करकरे ने सोनी की और देख कर कहां मुझे लगता है की नेहालता के माता पिता भी सोम प्रकाश से शादी के लिए तैयार हो जायेगें। आपकी क्या राय है। तब अचानक पीछे मुड़ कर सोनी ने एक बार पति की और देखा और फिर कहां ये तो होना ही है। ये सब प्रकृति का खेल है। इसे कोई नहीं रोक सकता। आप देख नहीं रहे की एक साल पहले जो था आज वो नहीं है। क्या बदला। सोम प्रकाश जिस दिन नेहा लता को यहां लेकर आया था उस समय तो मुझे कुछ अशुभ ही दिखाई दे रहा था। परंतु आज एक दम से साफ दिखाई दे रहा है।

तब देवधर करकरे ने कहा आपकी बात सच हो। मेरा मन भी यही कहता है। परंतु पैसा और रुतबा कही बीच में आकर खड़ा न हो जाये। अब मेरी भी उम्र हो रही है। इसलिए मुझे लगता है अगर नेहालता की और सोम प्रकाश की शादी हो जाये तो मैं नेहालता को अपने स्कूल का प्रिंसिपल बना कर मुक्त हो जाऊं वह अंग्रेजी की अच्छी जानकार है। तब दोनों पति पत्नी बड़े ही आराम से यहां रह सकते है। छूटियों में कुछ दिन के लिए माता पिता के पास जा सकती है। या वो अपनी बेटी नेहा लता से मिलने के लिए यहां कभी भी आ जा सकते है। देखों महात्मा जी की बात का क्या प्रभाव पड़ता है दोनो के मन पर। परंतु हम तो चाहते है कि अब इन हंस के जोड़ों को दोबारा जुदा न होना पड़े। इस तरह ने जाने कितने जन्म तक एक दूसरे से बिछड़ने के बाद इनका मिलन हुआ है। इस जन्म में अब ये प्रकृति ने मिला दिये तो पूर्ण तृप्ति दाई हो जाना चाहिए। कम से कम प्रकृति की आहट को समझ कर हमें चुप उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। दोनों की भलाई तो इसी में है। आप कर्ता न बने होने देख और मात्र दृष्टा बन जाये।


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