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रविवार, 3 मई 2026

50-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-50

(सदमा - उपन्यास

सुबह सोम प्रकाश की नींद जल्दी खुल गई उसने जब घड़ी में समय देखा तो अभी तो रात के तीन ही बजे थे। वह पानी पी कर कुछ देर बाहर आँगन में घूमने के लिए निकल गया। तारों के प्रकाश से पूरा आँगन नहाया हुआ था। झींगुर का शोर भी प्रकृति के सन्नाटे को और अधिक गहरा कर रहा था। दूर पहाड़ी पर कुछ सफेद बादल इस तरह से रूक हुए थे जैसे की चलते हुए वह थक कर विश्राम कर रहे है।

आप कभी भी नहीं जान पाते हैं कि जीवन आपके लिए क्या योजना बना रहा है...हम अगर अपने को छोड़ दे समय के हाथ में तो शायद समय पाकर वह किनारा मिल जाये परंतु ऐसा होता कम है। क्योंकि इस बीच वह बहुत उतार चढ़ाओ से होकर हमें गुजरना पड़ता है। जिसमें चल कर अकसर मनुष्य टूट जाता है। अगर आज पीछे मुड़ कर देखता हूं तो क्या ...अगर नेहालता यहां रहने के लिए नहीं आती तो ये सब होता। कभी नहीं...तब कुछ और होता। वही प्रकृति का रूप है .....ये सब विचार सोम प्रकाश के मन पटल पर आ-रहे थे...और जा रहे थे। तभी एक नया विचार सोम प्रकाश के मस्तिष्क में गूंजा। कि क्या अब इस अंधकार के बाद सूर्य उदय होगा। क्या ये सब जो हुआ या होने वाला है उसके बारे में वह कल सोच या समझ सकता था।

अक्सर जब हम आशा खो देते हैं और लगता है कि यह अंत है, भगवान ऊपर से मुस्करा कर देख रहे होते हैं। और कहते हैं कि...लो तुम पहुंच गए मंजिल पर अब तुम्हारे दुखों का अंत इस को जीवन का रहस्य कहां गया है। या भाग्य जो आपकी समझ के बाहर है। की अब तो प्रकाश की कोई आशा नहीं है। जो थोड़ा बहुत प्रकाश तारों के मध्यम से पड़ रहा था वह भी अब बूझ कर काला शाह हो गया है...तब दूर उतंग पर सूर्य की लालिमा प्रखर हो उठती है। ......

 

शांत रहो वत्स...बस तुम शांत रहो देखते रहो की आप कहां से गुजर रहे हो आपके आस पास क्या घट रहा है। क्यों का जवाब अगर आप ढूंढने चले तो हार जाओगे। क्योंकि पहाड़ एक कण या पत्थर से नहीं बनता वह अनंत का जोड़ होता है। या सागर एक बूंद से नहीं बनता वह भी अनंत का जोड़ होता है। इस तरह से जीवन भी एक घटना से नहीं बनता वह अनंत घटनाओं का जोड़ होता है।

यह सिर्फ एक मोड़ है, अंत नहीं है....आप यहां पर बैठ तो सकते हो परंतु रूक नहीं सकते क्योंकि अभी जीवन सफर बहुत दूर है। आप इसे अगर मंजिल समझ लेते है तो वहीं सब भूल हो जाती है। इस सब की एक उतावली मनुष्य के मन के कारण घटती है। और वह अस्थाई निवास को स्थाई मान कर रूक जाता है। जो की उसके विश्वास का ह्रास करता है। और वह टूट कर बिखर जाता है।

ऐसे अनेक विचार सोम प्रकाश के मन में आ और जा रहे थे। उस समय वह वहां नितांत अकेला था। केवल उसके साथ था, तो वहां फैला मौन वातावरण। वह सब सोच रहा था कि जो ये उसके साथ हुआ क्यों हुआ। अगर वह उस कोठे पर नहीं जाता तो क्या होता। परंतु इस सब के सोचने मात्र से कुछ होने वाला नहीं था। क्योंकि वहां जाना भी तो उसकी चाहत नहीं थी। वह किसी अंजान शक्ति के मध्यम से वहां खिंचा चला गया था। या यूं कहो की उस धकेला गया था। जिसे के कारण को वह खुद भी नहीं जानता। और उससे वो सब कराया गया जिस की वह कभी कल्पना नहीं कर सकता था। क्या उस के अंदर इतना साहस था, की एक अंजान लड़की को इतनी दूर ले कर आ सकता था। जब की वह उसे जानती तक नहीं थी, और वह मंद बुद्धि थी। परंतु वह एक बेहोशी में या सम्मोहन की अवस्था में उससे हुआ है। परंतु अगर इसे प्रकृति की पुकार समझ लिया जाये तो भाग्य बन जाता है । या फिर आप इस का अवरोध पैदा कर के तनाव को और बढ़ा सकते है। तनाव व दूख तो पहले भी होना है। परंतु वह बहाव नदी से साथ-साथ चलना है। उस में आप चलते तो है परंतु आप उस में परिश्रम नहीं कर रहे होते। आप अपने को छोड़ भी दोगे तो तब भी आप लहरों के साथ बहते चले जायेंगे।

इतनी देर में उसे अंदर कमरे से कुछ आवाज आई और प्रकाश भी जल उठा। उसने देखा की पेंटल दरवाजे पर खड़ा उसे देख रहा है। हरी प्रसाद तो पहले ही सोम प्रकाश के साथ घूम रहा था। पेंटल ने पूछा कितनी देर से जागे हुए हो। तब सोम प्रकाश ने कहां कि बस अभी कुछ देर पहले ही आँख खुली थी। सोचा अभी तो अँधेरा है आप को कुछ देर में जगाने वाला था। चलो पहले चाय रख देते हे। पेंटल ने कहा की चाय तो मैं रखता हूं। क्या नानी और भाभी के लिए भी पानी चढ़ा दूं या उन्हें सोने दो। सोम प्रकाश ने कहां की पाँच तो बज गए। उनके लिए भी चाय रख दो। एक साथ पी कर फिर हम तो चलते है।

पेंटल ने किचन में जाकर चाय का पानी गैस पर रख दिया। इतनी देर में नानी भी बाहर आ गई। और कहने लगी की तुम चलों मैं चाय बनाती हूं। तुम कपड़े पहन कर तैयार हो जाओ। और पेंटल और सोम प्रकाश अंदर जाकर जाने की तैयारी करने लगे। तब तक नानी ने चाय बना दी। वहां से नेहालता भी किचन में आकर नानी की मदद करने लगी। सब के लिए चाय कपों डाली और हरि प्रसाद के बर्तन में उसके लिए दूध। वह बाहर खड़ा इस का इंतजार कर रहा था। और खुशी के मारे पूंछ हिला-हिला कर अपनी खुशी को जाहिर कर रहा था। वह इस बात को समझ गया था की आज जरूर कोई विशेष दिन है, जिससे की सब जल्दी ये सब कार्य कर रहे है। इसलिए वह जल्दी से अपना दूध पी कर तैयार हो गया की चलो अब चला जाये। ये सब देख कर अचरज हो रहा था की इसे कैसे पता चला की हम आज कहीं जा रहे है। तब सोम प्रकाश ने कहां की ये पागल आदमी के विचार मनोभावों भी पढ़ लेता है। पहले इसने नेहालता की मदद की थी उसके विचारो को सकारात्मक करने के लिए अब ये मेरी मदद कर रहा है। देखा आपने की पहले ये नेहा लता के पास ही रहा था। और अब जब में बीमार हूं तो ये मेरे से कैसे चिपका रहा है। ये हमारे जहर को पी रहा है। कितना प्रेम पूर्ण है ये प्राणी। लोग इस के प्रेम और त्याग को नहीं पहचान पाते। शायद ही पृथ्वी पर कम ही इंसान है जो कुत्ते के प्रेम को समझ और ग्रहण कर पा रहे है। पालने से ही सब कुछ नहीं होता।

सब ने चाय पी ली और पेंटल और सोम प्रकाश महात्मा के आश्रम की और चल दिये। हाथ में एक डंडा भी ले लिया था। और दोनों दोस्त बात करते हुए गेट के पास पहुंच कर नानी को कहां की आप आ जाना गाड़ी जैसे ही आये आप हमारी चिंता मत करना। क्योंकि हमारे साथ महान हरि प्रसाद है। और सब हंसते हुए बाहर की और चल दिये इस बीच हरिप्रसाद तो मानो पल में सड़क के दूसरे किनारे पहुंच गया। दोनों दोस्त बाते करते हुए चले जा रहे थे। रास्ता अभी सुनसान था। दूर उतंग पहाड़ियों पर अभी सूर्य उदय नहीं हुआ था परंतु उसके पद चाप रंग रूप में उभर कर सामने आ गये थे। पक्षियों ने भी रात भर का रेन बसेरा छोड़ना शुरू कर दिया था। कहीं-कहीं किसी वृक्ष पर तोता में झपट मार चल रही थी। की अभी तक सोते रहोगे महाराज सूर्य देखा कब का उग आया है। शायद कोई-कोई साथी तोता आलस्य को त्याग नहीं रहा होगा। उसके साथी तोते उसे जबरदस्ती जगा रहे होंगे। पक्षियों ने अपना मधुर कलरव गान गाना शुरू कर दिया था। हवा में अब भी ठंडक थी। उस एकांत मार्ग पर चलना दोनों दोस्तों को बहुत अच्छा लग रहा है। सालों पहले दोनों दोस्त इसी तरह से घूमने आया करते थे।

बीच में ही कुछ अंतराल आया जो जीवन में सब कुछ छिन्न-भिन्न हो गया था। परंतु समय पा कर वही समय जितना छिना कर ले गया था उससे कई गुणा दे कर जा रहा है। क्योंकि आपके हाथ में अगर राख है तो उसे पहले छोड़ना ही होगा। वरना तो फिर सोना कैसे मिलेगा। आज इसी बात की दोनों दोस्त चर्चा कर रहे थे कि। अगर हम सालो पीछे चले जाये तो लगता है कि हम कितने दुखी है। परमात्मा ने हमारे उपर न जाने ये अत्याचार क्यों किया। हमें कोई भी ऐसा मार्ग नहीं सूझता की कहां जाये। चारों और केवल एक अंधकार होता है। अगर हम उस से घबरा गये तो हम भटक गये।

परंतु एक बात तो सच है कि पेंटल तुम जो कार्य किया उस की मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी। तुम ने कैसे नेहालता को इतने बड़े शहर में खोजा अगर तुम ये काम न करते तो शायद हम आज यूं साथ ने चल रहे होते। इस बात में सच्चाई भी थी। परंतु दोस्त के लिए कोई भी कार्य कठिन या एहसान नहीं होता, ये तो आपस का प्रेम होता है। तब पेंटल कहने लगा की क्या तुम ने नेहालता पर एहसान किया है। नहीं ये तो प्रेम है चाहे आप जाने से करें या अनजाने से। मैंने उसे जान कर किया आप ने एक अंजान शक्ति के माध्य से किया। परंतु मेरी मदद भी उस अंजान शक्ति ने ही की है। अंदर से न जाने कैसे आदेश आता था और मैं चल देता था। खेर अब वो सब तो एक यादे ही बन कर रह गई है। उसे शब्दों में लिखना चाहिए। ताकि आने वाले मुसाफिर भी उस मार्ग से अनभिग न रहे। ये सब सून कर सोम प्रकाश हंस दिया। कि क्या ये सब लिखने के जैसा है। तब अगर पहले किसी ने लिख दिया होता तो क्या ये हमारे साथ नहीं घटता।

पेंटल—घटता तो जरूर परंतु उस मार्ग पर पद चिन्ह होते जिससे आने वाले को कुछ सहयोग मिल सकता है। जिससे उसे कुछ हिम्मत मिल सकती है। वह अगर थक कर कहीं रूक गया और उसे चलने में आपके वो शब्द एक गति का साहास देंगे। उसके जीवन में जो अवरोध है उसमें अविरलता आ सकती है।

कब ये मार्ग गुजर गया दोनों को न ही दूरी का और न ही समय पता चला। वह करीब छ: किलो मीटर चल कर आ गये थे। और लग रहा था की अभी तो चले थे। सामने ही नदी बह रही थी। उस पर बना वह लकड़ी का पूल आज कितना रमणीय लग रहा था। बरसात के दिनों में जब यहां पर आते थे। तब यही नदी कैसे उफान पर अपना विकराल रूप लिए होती है। अब यह पतली कामिनी सी बन कर किस नजाकत से बह रही है। अब इसमें एक लय है, एक लचक है, एक सौंदर्य है, एक कमनीयता है। तब उस समय यह आंखें में और मन एक भय उत्पन्न कर रही होती थी। आज वह अपने अंतस में एक सुकोमलता एक सौंदर्य समेटे चल रही है। अति भी किसी वस्तु को कितना खतरनाक बना सकती है। दोनों दोस्त लकड़ी का पूल पार कर एक उंची चट्टान पर बैठ गए। और साथ लाई बोतल से पानी पीने लगे। सोम प्रकाश तो पहले ही नदी की तलहटी में जाकर पानी पी रहा था। सूर्य आसमान में काफी उपर आ गया था। चारों और कैसा अजीब वातावरण भांप की तरह से फैला हुआ था। सुबह के सुरमई वातावरण से इसकी तुलना करें तो ये कितना विचित्र लगाता है। ये वातावरण मन में एक तनाव भर रहा है। बस मन में अंधकार का कुछ भय का जो समाया होता है वह प्रकाश के कारण या आँख की इंद्री के कारण कुछ कम महसूस हो रहा था। एक बार तो दोनों दोस्तों ने सोचा कि चलो महात्मा को प्रणाम करते है। परंतु लगा की हो सकता है वह अभी ध्यान में बैठे हो। उन्हें नाहक तंग नहीं करना चाहिए। क्योंकि कुछ देर में सब लोग तो आने वाले है ही इससे साथ ही चलने का निर्णय लिया गया।

और अब पास ही आकर हरि प्रसाद भी विराजमान हो गया। उनका प्रहरी बन कर। वो लोग वही बैठ कर दृष्य को निहारते हुए सब के आने का अंतजार करने लगे।

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