ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी
उन्मादी।
हो पास खड़े जब दोनों, पी लूं न
आधी-आधी।
नयनों में तू जब बसता, जग लागे
हंसता-हंसता।
जब ह्रदय में तू आता, जीवन उत्सव
बन जाता।
मन-मंदिर का ये चौका, क्यों लागे
रीता-रीता।
कोई दूर पपीहा गाता, वो मेरी कथा
सुनाता।
शबनम की ये चंद बुंदे, मेरे आंसू
ले जाता।
मधुर याद में खोई, सपनों में आन
जगाता।
जीवन में उगते पात, मेरी तोड़
रहे बेहोशी।
ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी उन्मादी।।.....
रातों की काली शाही, है दीपक का
विरह बताती।
जलते दीपक पर आकर, परवाना ही जल
जाता।
नयनों की भाषा कोई, कहां शब्दों
में कहां पाता।
जिन छवियों को मैं पकडू, तू
धूमिल करता जाता।
इत बैठी हूं साज सजाये, कोई आकर
राग बजाता।
शब्द खड़े होंठों पर, कोई गीत
विरह का गा जा।
वो रात विरह का दीपक, बस आस बना
है हमारी।
ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी
उन्मादी।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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