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शनिवार, 1 अगस्त 2026

38- नयन तुम्‍हारे सबसे प्यारे — (कविता) - ओशो की मधुशाला

38- नयन तुम्‍हारे सबसे प्यारे (कविता)

नयन तुम्हारे जग से न्यारे, तुम तो प्रीतम सबसे प्यारे।

आस बनी है धड़कन मेरी, क्‍या कभी मिलेंगे हमें किनारे।

 

याद तुम्हारी जब-जब आई दामन में खुशियाँ भर लाई।

मैं बैठी थी घाट किनारे, डूब गई तो सम्हल न पाई!

तेरी याद में जग को छोड़ा, प्रेम-प्रीत बन गई रुसवाई।

पकड़-पकड़ कर अब हम हारे, छूट गये सब जो थे प्यारे!

आस बनी है धड़कन मेरी, क्‍या कभी मिलेंगे हमें किनारे।


 

नयन तुम्हारे जग से न्यारे, तुम तो प्रीतम सबसे प्यारे।

आस बनी है धड़कन मेरी, क्‍या कभी मिलेंगे हमें किनारे।

 

रटते-रटते फिर ढल गई रैना, नहीं भौर अब तू जा री बैना।

पल-पल कटता एक युग जैसा, नहीं मुझे इक पल ही चैना।

लोग पुकार जग दुतकारे, मौन शब्द अब किस को कहना।

काली रातें अब देह चिरती, फिर डूबो को अब कौन उबारे…..

आस बनी है धड़कन मेरी, क्‍या कभी मिलेंगे हमें किनारे।

 

नयन तुम्हारे जग से न्यारे, तुम तो प्रीतम सबसे प्यारे।

आस बनी है धड़कन मेरी, क्‍या कभी मिलेंगे हमें किनारे।

 (ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसधरा 


 

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