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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—42 (ओशो)

ध्‍वनि-संबंधी छठवीं विधि:
          ‘’किसी ध्‍वनि का उच्‍चार ऐसे करो कि वह सुनाई दे; फिर उस उच्‍चार को मंद से मंदतर किए जाओ—जैसे-जैसे भाव मौन लयबद्धता में लीन होता जाए।‘’
     कोई भी ध्‍वनि काम देगी; लेकिन अगर तुम्‍हारी कोई प्रिय ध्‍वनि हो तो वह बेहतर होगी। क्‍योंकि तुम्‍हारी प्रिय ध्‍वनि मात्र ध्‍वनि नहीं रहती; जब तुम उसका उच्‍चार करते हो तो उसके साथ एक अप्रकट भाव भी उठता है। और फिर धीरे-धीरे वह ध्‍वनि तो विलीन हो जाएगी और भाव भर रह जाएगा।
      ध्‍वनि को भाव की तरह से जाने वाले मार्ग की तरह उपयोग करना चाहिए। ध्‍वनि मन है और भाव ह्रदय है। मन को ह्रदय से मिलने के लिए मार्ग चाहिए। ह्रदय में सीधा प्रवेश कठिन है। हम ह्रदय को इतना भुला दिए है। हम ह्रदय के बिना इतने जन्‍मों से रहते आए है कि हमें पता ही नहीं रहा कि कहां से उसमे प्रवेश करें। द्वार बंद मालूम पड़ता है।
हम ह्रदय की बात बहुत करते है। लेकिन वह बातचीत भी मन की ही है। हम कहते है कि हम ह्रदय से प्रेम करते है। लेकिन हमारा प्रेम भी मानसिक है। मस्तिष्क गत है। हमारा प्रेम भी बौद्धिक प्रेम है। ह्रदय की बात भी मस्‍तिष्‍क में घटित होती है। हमें पता ही नहीं रहा है कि ह्रदय कहां है।
      ह्रदय से मेरा अभिप्राय शारीरिक ह्रदय से नहीं है। उसे तो हम जानते है। लेकिन शरीर शास्त्री और वैद्य-डाक्‍टर कहेंगे कि उस ह्रदय में प्रेम की संभावना नहीं है; वह तो केवल पंप का काम करता है, फुफ्फुस का काम करता है। उसमे और कुछ नहीं है। और बातें बस कपोलकल्‍पना है, कविता है, स्‍वप्‍न है।
      लेकिन तंत्र जानता है कि तुम्‍हारे शारीरिक ह्रदय के पीछे ही एक गहरा केंद्र छिपा है। उस गहरे केंद्र तक मन के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। क्‍योंकि हम मन में है। हम अपने मन में है और अंतस की और कोई भी यात्रा वहीं से आरंभ हो सकती है।
      मन ध्‍वनि है। आवाज है। अगर सब ध्‍वनि बंद हो जाए तो तुम्‍हारा मन नहीं रहेगा। मौन में मन नहीं है। यही कारण है कि मौन पर इतना बल दिया जाता है। मौन अ-मन अवस्‍था है। आमतौर से हम कहते है कि मेरा मन शांत हो रहा है। यह बात ही बेतुकी है। अर्थहीन है। क्‍योंकि मन का अर्थ है मौन की अनुपस्‍थिति। तुम यह नहीं कह सकते कि मन शांत है। मन है तो शांत नहीं हो सकता और शांति है तो मन नहीं हो सकता। शांत मन नाम की कोई चीज नहीं होती। हो नहीं सकती। यह ऐसा ही है जैसे कि तुम कहो कि कोई व्‍यक्‍ति जीवित मृत है। उसका कोई अर्थ नहीं है। अगर वह मृत है तो वह जीवित नहीं हो सकता। और अगर वह जीवित है तो मृत नहीं हो सकता। सच तो यह है कि मन जब विदा होता है तो शांति आती है। या कहो  कि शांति आती है तो मन विदा हो जाता है। दोनों एक साथ नहीं हो सकते।
      मन ध्‍वनि है। अगर यह ध्‍वनि व्‍यवस्‍थित है तो तुम स्‍वस्‍थ चित हो। और अगर वह अराजक हो तो तुम विक्षिप्‍त कहलाओगे। लेकिन दोनों हालत में ध्‍वनि है। आवाज है। और हम मन के तल पर रहते है। उस तल से ह्रदय के आंतरिक तल पर कैसे उतरा जाए?
      ध्‍वनि का उपयोग करो। ध्‍वनि का उच्‍चार करो। किसी एक ध्‍वनि का उच्‍चार उपयोगी होगा। अगर मन में अनेक ध्‍वनियां है तो उन्‍हें छोड़ना कठिन होगा। और अगर एक ही ध्‍वनि हो तो उसे सरलता से छोड़ा जा सकता है। इसलिए पहले एक ध्‍वनि के लिए अनेक का त्‍याग करना होगा। एकाग्रता का यही उपयोग है।
      इसलिए अच्‍छा हो कि कोई ध्‍वनि, कोई नाम, कोई मंत्र लो, जो तुम्‍हें प्रीतिकर हो, जिससे तुम्‍हारा भाव जुड़ा हो। अगर कोई हिंदू राम शब्‍द का उपयोग करता है तो उसके साथ उसका भाव जुड़ा होगा। यह उसके लिए मात्र शब्‍द नहीं रहेगा। यह उसकी बुद्धि तक ही सीमित नहीं रहेगा; इसकी तरंगें उसके ह्रदय तक चली जाएंगी उसको भला इसका पता न हो; लेकिन यह ध्‍वनि उसके रक्‍त में समाई है। उसकी मांस मज्‍जा में सम्‍माहित है। उसके पीछे लंबी परंपरा है। गहरे संस्‍कार है; उसके पीछे जन्‍मों-जन्‍मों के संस्‍कार है। जिस ध्‍वनि के साथ तुम्‍हारा लंबा लगाव बन जाता है। वह तुममें गहरी जड़ें जमा लेती है। इसका उपयोग करो। उसका उपयोग किया जा सकता है।
      यही कारण है कि दुनिया के दो सबसे पुराने धर्म—हिंदू और यहूदी—धर्म परिवर्तन में कभी विश्‍वास नहीं करते। वे सबसे प्राचीन धर्म है, आदि धर्म है; और सारे धर्म उनकी ही शाखा प्रशाखा है। ईसाइयत  और इसलाम यहूदी परंपरा की शाखाएं है। और बौद्ध, जैन और सिक्‍ख धर्म हिंदू धर्म की शाखाएं है। और ये दोनों आदि धर्म धर्म-परिवर्तन को नहीं मानती।
      अगर तुम्‍हें किसी ध्‍वनि से प्रेम नहीं है तो अपना नाम ही उपयोग करो। लेकिन यह भी बहुत कठिन है। कारण यह है कि तुम अपने प्रति इतनी निंदा से भरे हो कि तुम्‍हें अपने प्रति कोई भाव नहीं है। कोई आदर नहीं है। दूसरे भले तुम्‍हारा आदर करते हों; लेकिन तुम खुद अपना आदर नहीं करते हो।
      तो पहले बात है कि कोई उपयोगी ध्‍वनि खोजों। उदाहरण के लिए, अपने प्रेमी या अपनी प्रेमिका का नाम भी चलेगा। अगर तुम्‍हें फूल से प्रेम है तो गुलाब शब्‍द काम दे देगा। कोई भी ध्‍वनि जो तुम्‍हें भाती है। जिसे सुनकर तुम स्‍वस्‍थ अनुभव करते हो। उसका उपयोग कर लो। और अगर तुम्‍हें ऐसा कोई शब्‍द न मिले तो परंपरागत स्रोतों से जो कुछ शब्‍द उपल्‍बध है उनका उपयोग कर सकते हो। ओम का उपयोग करो। आमीन का उपयोग करो। मरिया भी चलेगा। राम भी चलेगा। बुद्ध भी चलेगा। महावीर का नाम भी काम में लाया जा सकता है। कोई भी नाम जिसके लिए तुम्‍हें भाव हो, चलेगा। लेकिन भाव होना जरूरी है। इसीलिए गुरु का नाम सहयोगी हो सकता है। लेकिन भाव चाहिए। भाव अनिवार्य है।
      ‘’किसी ध्‍वनि का उच्‍चार ऐसे करो, कि वह सुनाई दे; फिर उस उच्‍चार को मंद से मंदतर किए जाओ—जैसे-जैसे भाव मौन लयबद्धता में लीन होता जाए।‘’
      ध्‍वनि को निरंतर घटाते जाओ। उच्‍चार को इतना धीमा करो कि तुम्‍हें भी उसे सुनने के लिए प्रयत्‍न कना पड़े। ध्‍वनि को कम  करते जाओ, और तुम्‍हें फर्क मालूम होगा। ध्‍वनि जितनी धीमी होगी, तुम उतने ही भाव से भरोंगे। और जब ध्‍वनि विलीन होती है तो भाव ही शेष रहता है। इस भाव को नाम नहीं दिया जा सकता वह प्रेम है, प्रगाढ़ प्रेम है। लेकिन यह प्रेम किसी व्‍यक्‍ति विशेष के प्रति नहीं है। यही फर्क है।
      जब तुम कोई ध्‍वनि या शब्‍द उपयोग करते हो तो उसके साथ प्रेम जुड़ा रहता है। तुम राम-राम करते हो तो इस शब्‍द के प्रति तुम्‍हारे भीतर बड़ा गहरा भाव है। लेकिन यह भाव राम के प्रति निवेदित है, राम पर सीमित है। लेकिन जब तुम राम ध्‍वनि को मंद से मंदतर करते जाते हो तो एक क्षण आयेगा। जब राम विदा हो जाएगा। ध्‍वनि विदा हो जाएगी और सिर्फ भाव शेष रहेगा। यह प्रेम का भाव है जो राम के प्रति नहीं है। यह किसी के भी प्रति नहीं है। केवल प्रेम का भाव है—मानो तुम प्रेम के सागर हो।
      प्रेम जब किसी के प्रति निवेदित नहीं होता तो वह ह्रदय का प्रेम होता है। और जब वह निवेदित प्रेम होता है तो वह मस्‍तिष्‍क का होता है। जो प्रेम किसी के प्रति है, वह मस्‍तिष्‍क से घटित होता है। और केवल प्रेम मात्र प्रेम ह्रदय को होता है। और यह केवल प्रेम अनिवेदित प्रेम ही प्रार्थना बनता है। अगर वह किसी के प्रति निवेदित है तो वह प्रार्थना नहीं बन सकता; तब तुम अभी रहा पर ही हो।
      इसीलिए मैं कहता हूं कि अगर तुम ईसाई हो तो तुम हिंदू की भांति नहीं आरंभ कर सकते; तुम्‍हें ईसाई की भांति आरंभ करना चाहिए। अगर तुम मुसलमान हो तो तुम ईसाई की तरह शुरू नहीं कर सकते। तुम्‍हें मुसलमान की तरह ही शुरू करना चाहिए। लेकिन तुम जितने गहरे जाओगे उतने ही कम मुसलमान या ईसाई या हिंदू रहोगे। सिर्फ आरंभ हिंदू मुसलमान या ईसाई की तरह से होगा।
      तुम जितना ही ह्रदय की तरफ गति करोगे—ध्‍वनि जिनी कम होगी और भाव जितना बढ़ेगा—तुम उतने ही कम हिंदू या मुसलमान रह जाओगे। और जब ध्‍वनि विलीन हो जाएगी तो तुम केवल मनुष्‍य होगे...न हिंदू। न मुसलमान। न ईसाई।
      संप्रदाय या धर्म का यही फर्क है। धर्म एक है; संप्रदाय अनेक है। संप्रदाय शुरू करने में सहयोगी है। लेकिन तुम अगर सोचते हो कि संप्रदाय अंत है, मंजिल है, तो तुम कही के नहीं रहोगे। वे आरंभ भर है। तुम्‍हें उनके पार जाना होगा; क्‍योंकि आरंभ अंत नहीं है। अंत में धर्म है; आरंभ में संप्रदाय है। संप्रदाय का उपयोग धर्म के लिए करो। सीमित का उपयोग असीम के लिए करो; क्षुद्र का उपयोग विराट के लिए करो।
      यदि तुम किसी हिंदू मंदिर में गये हो तो वहां तुमने गर्भ-गृह का नाम सुना होगा। मंदिर के अंतरस्‍थ भाग को गर्भ कहते है। शायद तुमने ध्‍यान न दिया हो कि उसे गर्भ क्‍यों कहते है। अगर तुम मंदिर की ध्‍वनि का उच्‍चार करोगे—हरेक मंदिर की अपनी ध्‍वनि है, अपना मंत्र है। अपना इष्‍ट देवता है। और इस इष्‍ट देवता से संबंधित मंत्र है। अगर उस ध्‍वनि का उच्‍चार करोगे तो पाओगे कि उससे वहां वही उष्णता पैदा होती है जो मां के गर्भ में पाई जाती है। यही कारण है कि मंदिर के गर्भ जैसा गोल और बंद, करीब-करीब बंद बनाया जाता है। उसमे एक ही छोटा सा द्वारा रहता है।
      जब ईसाई पहली बार भारत आये और उन्‍होंने हिंदू मंदिरों को देखा तो उन्‍हें लगा कि ये मंदिर तो बहुत अस्‍वास्‍थ्‍यकर कर है। उनमें खिड़की नहीं है। सिर्फ एक छोटा सा दरवाजा है। लेकिन मां के गर्भ में भी तो एक ही द्वार होता है। और उसमे भी हवा के आने-जाने की व्‍यवस्‍था नहीं रहती। यही वजह है कि मंदिर को ठीक मां के पेट जैसा बनाया जाता है। उसमे एक ही दरवाजा रखा जाता है। अगर तुम उसकी ध्‍वनि का उच्‍चार करते हो तो गर्भ सजीव हो उठता है। और इसे इसलिए भी गर्भ कहा जाता है। क्‍योंकि वहां तुम नया जन्‍म ग्रहण कर सकते हो। तुम नया मनुष्‍य बन सकते हो।
      यही कारण है कि मंदिरों में अन्‍य धर्मों के लोगों को प्रवेश नहीं मिलता। अगर कोई मुसलमान नहीं है तो उसे मक्‍का में प्रवेश नहीं मिल सकता है। और यह ठीक है। इसमे कोई भूल नहीं है। इसका कारण यह है कि मक्‍का एक विशेष विज्ञान का स्‍थान है। जो व्‍यक्‍ति मुसलमान नहीं है वह वहां ऐसी तरंग लेकिर जाएगा जो पूरे वातावरण के लिए उपद्रव हो सकती है। अगर किसी मुसलमान को हिंदू मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता है तो यह अपमानजनक नहीं है। जो सुधारक है, वह मंदिरों के विषय में कुछ नहीं जानते। धर्म एक गुह्म विज्ञान है। वे केवल उपद्रव पैदा करते है।
      हिंदू मंदिर केवल हिंदुओं के लिए है। क्‍योंकि हिंदू मंदिर एक विशेष स्‍थान है, विशेष उदेश्‍य से निर्मित हुआ है। सदियों-सदियों से वे इस प्रयत्‍न में लगे है। कि कैसे जीवंत मंदिर बनाएँ जाएं। और कोई भी व्‍यक्‍ति उसमे उपद्रव पैदा कर सकता है। और यह उपद्रव खतरनाक है। सिद्ध हो सकता है। मंदिर कोई सार्वजनिक स्‍थान नहीं है। वहाँ एक विशेष उदेश्‍य से और विशेष लोगों के लिए बनाया गया है। वह आम दर्शकों के लिए नहीं है।
      यही कारण है कि पुराने दिनों में आम दर्शकों को वहां प्रवेश नहीं मिलता था। अब सब को जाने दिया जाता है; क्‍योंकि हम नहीं जानते है कि हम क्‍या कर रहे है। दर्शकों को नहीं जाने दिया जाना चाहिए। यह कोई खेल तमाशे का स्‍थान नहीं है। यह स्‍थान विशेष तरंगों से तरंगायित है, विशेष उदेश्‍य के लिए निर्मित हुआ है।
      इसलिए एक स्‍थान का उपयोग करो—स्‍थान के रूप में मंदिर अच्‍छा है। ये विधियां मंदिर के लिए है। मंदिर अच्‍छा है; मस्‍जिद अच्‍छी है। चर्च अच्‍छा है। तुम्‍हारा अपना धर इन विधियों के लिए उपयुक्‍त नहीं है। वहां इतना कोलाहल है कि वह अराजकता का स्‍थान बन गया है। और तुम इतने बलवान नहीं हो कि अपनी ध्‍वनि से उस वातावरण को बदल सको। तो अच्‍छा है कि किसी ऐसी जगह चले जाओ। जो किसी विशेष ध्‍वनि के लिए बना हो। ऐसे स्‍थान का उपयोग करो। और अच्‍छा है कि रोज-रोज एक ही स्‍थान को काम में लाओ।
      धीरे-धीरे तुम शक्‍ति शाली हो जाओगे। और धीरे-धीरे मन से ह्रदय में उतर जाओगे। तब तुम कही भी यह प्रयोग कर सकते हो। तब सारा ब्रह्मांड तुम्‍हारा मंदिर बन जाएगा। तब समस्‍या नहीं रहेगी।
      लेकिन आरंभ में स्‍थान का चुनाव जरूरी है। और अगर समय का, निश्‍चित समय का चुनाव कर सको तो यह और अच्‍छा। क्‍योंकि तब वह मंदिर उस निश्‍चित समय पर तुम्‍हारी प्रतीक्षा करेगा। रोज ठीक उसी समय पर मंदिर तुम्‍हारा इंतजार करेगा। उस वक्‍त वह ज्‍यादा खुला होगा। उसे प्रसन्‍नता होगी कि तुम आ गए। वह सारा स्‍थान प्रसन्‍न होगा। और मैं ये बात प्रतीक के अर्थ में नहीं कह रहा हूं, यह एक सच्‍चाई है।
      यह ऐसा है कि जैसे तुम किसी निश्‍चित समय पर भोजन लेते हो और रोज ठीक उसी समय पर तुम्‍हारा शरीर भूख अनुभव करने लगता है। शरीर की अपनी अलग आंतरिक घड़ी है। शरीर अपने ठीक समय पर भूख प्‍यास अनुभव करता है। अगर तुम प्रतिदिन एक विशेष समय पर सोते हो तो तुम्‍हारा पूरा शरीर उस समय सोने के लिए तैयार हो जाता है। और अगर तुम रोज-रोज अपने खाने और सोन का समय बदलते रहते हो तुम अपने शरीर को उपद्रव में डाल रहे हो।
      अब तो वे कहते है कि ऐसे परिवर्तन से तुम्‍हारी आयु प्रभावित हो सकती है। अगर तुम रोज-रोज अपने शरीर की चर्या को, रूटीन को बदलते हो तो संभव है कि तुम्‍हारी उम्र कम हो जाए। यदि तुम अस्‍सी साल जीने वाले थे तो इस सतत परिवर्तन के कारण तुम सत्‍तर साल ही जीओगे। तुम दस साल गंवा दोगे। और अगर तुम शरीर की घड़ी के अनुसार  अपनी चर्या चलाते हो तो तुम आसानी से अस्‍सी साल की बजाएं नब्‍बे साल वर्षो तक जीवित रह सकत हो। दस वर्ष जोड़े जा सकते है।
      ठीक इसी तरह तुम्‍हारे चारों तरफ हर चीज की अपनी घड़ी है और सारा संसार जागतिक समय में गति करता है। अगर तुम प्रतिदिन निश्‍चित समय पर मंदिर में प्रवेश करते हो तो मंदिर तुम्‍हारे लिए तैयार होता है। और तुम मंदिर के लिए तैयार होते हो। ये दो तैयारियाँ आपस में मिलती है। और उसका फल हजार गुना हो जाता है।
      यह तुम अपने घर में एक छोटा सा कोना इसके लिए सुरक्षित कर ले सकते हो। लेकिन तब उस स्‍थान को किसी और काम के लिए उपयोग मत करो। क्‍योंकि हर काम की अपनी तरंगें है। अगर तुम उस स्‍थान को व्‍यवसाय के काम में लाते हो, वहां ताश खेलते हो, तो वह स्‍थान कनफ्यूज्‍ड हो जाएगा। अब तो इन कनफ्यूज्‍ड को रेकार्ड करने के यंत्र है; जाना जा सकता है कि स्‍थान कनफ्यूज्‍ड है।
      अगर तुम अपने घर में एक छोटा सा कोना इसके लिए अलग कर लो तो अच्‍छा । घर में एक छोटा सा मंदिर ही बना लो; बहुत अच्‍छा रहेगा। अगर तुम एक छोटा मंदिर बना सको तो सर्वोतम है। लेकिन फिर उसे किसी दूसरे काम में मत लाओ। उसे अपना निजी मंदिर रहने दो। और शीध्र ही परिणाम आने लगेंगे।                     
ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र, भाग2
प्रवचन29