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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

37-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-37

(सदमा - उपन्यास)

 रीब एक घंटे से अधिक सोने के बाद जब नेहा लता की आँख खुली तो उसे बड़ा अचरज हुआ की वह इतनी दे से नानी की गोद में सो रही है। नानी आपके पेरो में दर्द हो गया होगा। नानी केवल हंस दी। बेटा इतनी गहरी तुम सो रही थी की मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। परंतु क्या करूं बेटा अब ये शरीर जवाब दे जाता है। और अपने पैरों को सीधा करके दबाने लगी। शायद खून का दबाव कम होने के करण पेर सून हो गया था। हम जिसे कहते थे पैर सो गया है। उस अवस्था में आपका आपना ही पैर कैसे पराया सा लगने लग जाता है। एक बोझ अपने में लिए आप अगर उस पर चुटकी भी लो तो उसके भीतर कोई दर्द नहीं होता। नेहा लता ने नानी के पैरों को प्रेम से सहलाना शुरू किया और धीरे-धीरे खून का बहाव सामान्य हो गया। इस बात से नेहा लता को बहुत अजीब सा लग रहा था। कि वह इतनी गहरी नींद कैसे सो गई की उसे पता ही नहीं चला। परंतु इस तरह से गहरे सोने के कारण उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह प्रेम पूर्ण नानी का हाथ पकड़ कर कह रही की मैंने आपको कष्ट दिया। आप मुझे जगा देती। तब नानी हंसी। बेटा घिया और बच्चे सोते में विकास करते है। इतनी देर में स्वामी जी उन की और आते हुए नजर आये। वह नेहा लता को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। परंतु उन्हें विश्वास नहीं था की वह लड़की यहां कैसे हो सकती है।

पास आने पर नेहा लता ने स्वामी को प्रणाम किया। तब स्वामी जी ने पूछा आप....। तब नेहा लता ने कहां की हां स्वामी मैं वही लड़की हूं जिसे कुछ महीनों पहले आपने ठीक किया था। और ये वही सोम प्रकाश है जो मुझे यहां आपके पास ले कर आया था। फिर भी स्वामी जी को विश्वास नहीं हो रहा था। परंतु आप यहां कैसे पहुंची।

तब नेहा लता ने कहां ये एक लम्बी कहानी है। मैं आप को बाद में को विस्तार से बतलाऊंगी। परंतु स्वामी जी आप कैसे है। स्वामी जी ने कहां की सब भगवान की कृपा है। और उन्होंने नानी को प्रणाम किया और उसके बाद उनसे पूछा कि आप तो इस उम्र भी एक दम से स्वस्थ है। सच ही यहां का हवा पानी ही ऐसा है। ये बात उन्होंने नेहा लता की और देखते हुए कहां की आप जब दस-पंद्रह दिन यहां पर रहेगी तो आप खूद ही जान पायेंगी की यहां की हवा में कितनी उर्जा है प्राण तत्व है, जीवंतता है। परंतु आप को यहां देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।

तब नेहा लता ने सोम प्रकाश के विषय में पूछा की स्वामी जी अब उनका क्या हाल है। और हम उनके ठीक होने की कितनी उम्मीद करें। तब स्वामी जी ने कहां की बेटा एक तो तुम आ गई हो। इसलिए मैं पूर्ण विश्वास से कह सकता हूं की सोम प्रकाश जरूर एक दम से ठीक हो जायेगा। परंतु दूसरी बात आप जान लो की आपके वाली बीमारी की हालत जो थी, उसकी वैसी नहीं है। दोनों बाहर से समान दिखने पर भी भिन्न है। उसके ठीक होने में जरा अधिक समय लगेगा। क्योंकि आपकी तो चोट बाहरी थी। जो शरीर पर प्रभाव अधिक डाल रही थी। उसके तो मनोभाव या अचेतन मन पर प्रभाव पड़ा है। शरीर पर पड़ा प्रभाव जो समय और दवा पा कर जल्दी सामान्य हो जाता है। उस अवस्था में मस्तिष्क का हिस्सा कम दबाव झेल रहा होता है। परंतु सोम प्रकाश को मन मस्तिष्क पर अंदरूनी दबाव के साथ-साथ बाहरी चोट भी लगी है। मन और अचेतन पर उस चोट का गहरा प्रभाव पड़ा है। वहां के स्नायु अति सूक्ष्म होते है। उन्हें रिपेयर या मरम्मत होने में समय लगता है। और इस तरह की बीमारी बहार की दवा से अधिक अचेतन के प्रभाव से अधिक ठीक होती है। इसके लिए एक विश्वास एक प्रेम अधिक कारगर साबित होता है। मैं तो पहले दिन से ही इन लोगों को कह भी रहा था, अगर वह लड़की जिस के कारण इनको ये सदमा लगा है, अगर वह आ जाये जो ये बहुत जल्दी ही सामान्य अवस्था में आ सकते है। शायद इनके दोस्त थे वो जो पहली बार इन्हें यहां लेकर आये थे। उन से भी मैंने आग्रह किया था। बेटा जिस तरह से बीमारी आती है, एक झटके में परंतु उसे तिरोहित होने में समय लगता है। प्रकृति बहुत सहज और सरल उपचार करती है। सहज ही फल पकता है, सहज ही सब विकास होता है। परंतु मनुष्य का मन कुछ इस तरह से हो गया है कि उसे जल्दी चाहिए, उसे क्रांति की आदत पड़ गई है। इसलिए आज अंग्रेजी दवाओं का लोग अधिक उपयोग कर रहे है। जो शरीर के लिए आति हानि कारक है। परंतु वह प्रकृति की गति की बजाय जल्दी से ठीक होना चाहते है। ये सब मरीज के लिए भी ठीक नहीं है। बीमारी हो या मरीज उस को मार्ग से पूर्णता से होकर गुजरना होता है। जिस पर से वह अचानक नीचे गिर गया था। परंतु आज का विज्ञान तो हर कार्य तेजी से चाहता है। इसलिए उनकी दवाएं अति होती है। मरीज को इतना उपर नीचे ले जाती है की वह एक भय से भर जाता है।

हां स्वामी जी आप एक दम से ठीक कहा रहे है। इनके उन्हीं मित्र ने मुझे बम्बई में ढूंढ कर बतलाया था। की इनके दोस्त की ये हालत है। तब मैंने अपने माता पिता से कितनी कठिनाई से आज्ञा ली और यहां आई हूं। स्वामी जी ने कहां की तुम तो महान हो ही तुम्हारे माता-पिता भी बहुत महान है। जो अपनी जवान लड़की को अंजान देश में एक अपरिचित से लोगों में भेज दिया। चलों जो भी हुआ परंतु सोम प्रकाश के लिए यह बहुत अच्छा है। आज की दवा के बाद देखना रोज जैसे ही सूर्य उदय होगा। इनके मस्तिष्क में चेतना का प्रकाश फैलना शुरू हो जायेगा। एक काढ़ा भी दे रहा हूं। रात को उस की एक पुड़िया को शीशे के बर्तन में दो गिलास पानी में भिगो देना। और सुबह दस-पंद्रह मिनट उबाल कर इन्हें खाली पेट पिला देना और उसके बाद कम से आधा घंटा सेर जरूर करना। जितना अधिक चलना होगा दवा पीने के बाद उतना ही दवा अधिक प्रभाव डालेगी। आप सुबह ये नियम बना लो की इन्हें आधा या एक घंटा तो घुमाना ही है।

नानी की और देख कर स्वामी जी ने कहां की आप चिंता ने करें आपका बेटा बहुत भाग्य शाली है। ये उसके पीड़ा के अंत का दौर है। इसके बाद जीवन में केवल आनंद ही आनंद है। आप सब जीवन में बहुत खुशहाली आने वाली है एक अंधकार अब खत्म होने के कगार पर खड़ा है। और दूर उतंग पर स्वर्णिम प्रकाश अपने पंख पसार चूका है। इसके बाद नेहा लता ने नानी की और देख कर कुछ कहना चाहा की कितने पैसे देने है। तब नानी ने स्वामी जी और देख कर कहा की उस की तुम चिंता न करो। स्वामी जी हंसने लगे। बेटा पैसे की चिंता मत करो। हम केवल मूल्य ही लेते है। क्योंकि कुछ जड़ी बूटियां हमें पहाड़ी के कठिन उतंग चोटियों से मंगवानी पड़ती है। नानी तो इस बात को जानती है। कभी-सालो पहले जब आपकी नानी जब जवान थी तो हमारे लिए कितने ही प्रकार की जड़ी बूटियां लाया करती थी। नानी जी का चेहरा एक दम से खिल उठा। और नानी गुजरे अपने उन मधुर दिनों में पल भर के लिए खो गई।

तब अंदर जाकर नेहा लता ने दवा का एक बैग ले लिया। जिस में अनके दवा की पुडिया थी। जिस का काढ़ा बना कर सोम प्रकाश को रोज पिलाना था। और वहाँ पर जो दूसरे सहयोगी साधक थे उन से पैसे के लिए पूछा तो उन्होंने कहां की आप पचास रूपये दे दीजिए। नेहा लता ने अपने पर्स से पचास रूपये निकाल कर उन्हें दे दिया। और पूछा की अब सोम प्रकाश का क्या हाल है। वह कितनी दर और उस अवस्था में रहेंगे। तब साधक ने कहां की उन्हें तो होश काफी देर पहले ही आ गया था। अब तो वह गर्म जल के कुंड में स्नान कर रहे है। शायद अभी आधा घंटा और लग जायेगा। अभी तो सूर्य के डूबने में काफी समय है। अगर ज्यादा देर होगी तो मैं आपको आधे रास्ते तक छोड़ने चल सकता हूं। क्या आपका ड्राइवर घर चला गया। तब नेहा ने कहां की हां हमने उसे भेज दिया पता नहीं यहां पर कितनी देर लगे।

वहां एक गर्म पानी का एक कुंड भी था। जिस में लेप आदि के बाद बीमार को स्नान कराया जाता था। उस कुंड के पानी में प्राकृतिक रूप से भी अनेक जड़ी बूटियों का मिश्रण था। जो तन और मन दोनों को एक विश्राम की अवस्था में ले जाता था। दवा के पैकेट ले कर नेहालता नानी के पास आ गई। और कहने लगी नानी अगर भूख लगी है। तो एक-एक परांठा खा लेते है। अभी तो घर जाने में तीन चार घंटे लग जायेगें। फिर बेचारा हरिप्रसाद हमारे साथ नाहक उपवास कर रहा है। तब नेहा ने हरिप्रसाद को बुलाकर पूछा की क्या महाराज को भूख लगी है। और उसने नेहालता का हाथ चाट कर हां भर दी। और तब नेहा ने दो परांठे निकाल एक बड़े से पत्थर पर रख दिये। और हरिप्रसाद को कहां की आ जाओ और वह पूछ हिला-हिला कर मस्त खाने लगा। नानी ने एक आधे परांठे के छोटे-छोटे टुकड़े कर के दूर उपर की और फेंकने के लिए नेहालता को कहां की बेटा यहां तो काफी परांठे है। इतने तो हम खा नहीं सकेंगे। कुछ पक्षियों के लिए आप डाल देना।

अब सोम प्रकाश तो शायद खा नहीं पायेगा। क्योंकि उसको जो काढ़ा दिया है उसके बाद अगर वह खाना खाता है तो उसे उलटी आ सकती है। इसलिए वहां पर तीनों ने कुछ जल पान किया। हरि प्रसाद तो अपना खाना खा कर उन के सामने पैर पसार कर बैठ गया। नानी ने फिर अपने हिस्से का एक टूकड़ा उसे देने के लिए आगे किया तब उसने उठ कर उसे प्यार से अपने दांतो से पकड़ा और बैठ कर मजे से खाने लगा। तब नानी ने कहां की बेटा ये जाति ही ऐसी है। जब तक से मालिक से एक टूकड़ा मांग न ले तो इन्हें तृप्ति नहीं होती। पशु के मन में भी कैसा साधु भाव समाया होता है। मेरी मां कहानी सुनाती थी बचपन में अब वह कितनी सही और कितनी मनोवैज्ञानिक है कि, भगवान ने अन्न का दान कुत्ते को ही दिया था। परंतु वह लाचारी के कारण की मैं इसका उपयोग नहीं कर सकता उसने उसे मनुष्य को दे दिया और कहां की मुझे आप उस रोटी में से मेरे कान के बराबर एक टुकड़ा मात्र दे देना।

तब नेहालता को अच्छा लगा। हां नानी ये बात जो हमारे पूर्वज कहते थे। इनमें कहीं गहरे में विज्ञान छिपा होता था। परंतु आज कल ये बातें ने सुनने वाले बचे और न कहने बतलाने वाले ही बचे। अब देखो पूरी प्रकृति में जितना कुत्ता प्रेम पूर्ण है, क्या कोई दूसरा प्राणी है इतना। जो मनुष्य के संग साथ है। मनुष्य ने तीनों प्राणियों को किसी देवता से जाड़ दिया जैसे, कुत्ते को भैरव के साथ, गरुड़ को लक्ष्मी के साथ, गाय को भगवान कृष्ण के साथ, हाथी और चूहे को गणेश जी के साथ, ताकि मनुष्य इनके संग साथ रह कर इन पर दया भाव रखें क्योंकि प्रकृति का प्रत्येक पाणी इस पूरे ब्रह्मांड के लिए अति आवश्यक है। चाहे वह एक घास का छोटा पौधा हो या दूर आकाश गंगा। सब एक दूसरे से जुडे़ है। एक मिटेगा तो दूसरा कुछ ही पल में खत्म हो जायेगा। नानी आपने देखा जो मधुमक्खी है देखने में मनुष्य से कितना दूर है। लगता ही नहीं की उससे हमारा कोई नाता है। परंतु विज्ञान ने जाना है कि अगर पृथ्वी पर एकदम से सभी मधुमक्खियां खत्म हो जायें तो मनुष्य एक सप्ताह से अधिक जीवित नहीं रह सकता। कितना विचित्र लगता है। ये सब पढ़ कर जान कर परंतु ये सत्य है।

तब नानी ने कहां हां बेटा संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। वही से तो उसका विकास होता है। संवेदना के बिना क्या मनुष्य को मनुष्य कहां जा सकता है, कभी नहीं। आज आप देखो अपने हरिप्रसाद को ही यह मनुष्य के संग रह कर कितना संवेदन शील होता जा रहा है। परंतु अगर मनुष्य में संवेदना नहीं है, प्रेम नहीं है दया नहीं तो वह तो पशु भी नहीं कहा जा सकता।

इतनी देर में दूर से सोम प्रकाश आते हुए दिखाई दिए उसकी चाल मैं आज एक अलग ही बात थी। दूर से देखने पर अब लग रहा था वह अपने शरीर का संतुलन सही से कर रहा था। परंतु मस्तिष्क की वजह से वह हाथ पैर क्या शरीर को एक तनाव की तरह से लिए चल जाता था। जिससे उसकी बीमारी भी चलने मात्र से देखी जा सकती है। कुछ दिन पहले तक नानी या नेहा लता जब उसके साथ चल रही होती थी तो उन्हें डर ही लगा रहता था की कहीं ये गिर तो नहीं जायेगें। परंतु इस तरह से सोम प्रकाश को अपनी और आते देख कर नानी को बहुत अच्छा लग रहा था। पास आने पर साधक ने कहां की आप पहचानते है। ये कौन है। तब सोम प्रकाश ने नानी को देख कर हामी में गर्दन हिलाई और नहा लता के सर को प्रेम से छू दिया। उसकी आंखों में अपने पन का भाव था। ये सब देख कर दोनों बहुत खुश हो रही थी। की आज चार घंटे के इस इलाज ने सोम प्रकाश में काफी परिवर्तन है। तब साधक ने कहां की नानी आप अब इनके अंदर रोज ही धीरे-धीरे परिवर्तन देखेंगे। समय तो लगेगा। शायद छ: महीने या उससे भी अधिक। परंतु ये एक दम से ठीक हो जायेगें।

इतनी देर में हरिप्रसाद भी सोम प्रकाश के पास आ कर खड़ा हो गया। उस को देख कर सोम प्रकाश जमीन पर बैठ कर उसे प्रेम करने लगा वह भी उसकी आंखों को सूंध रहा था। तब नानी ने कहां की असली वैद्य जी अब आये है। देखो इसकी जांच करने का तरीका जो मुझे कभी नहीं समझ में आया यह आदमी की आंखों को सूंध कर न जाने क्या जानना चाहता है। और इस हरिप्रसाद के ज्ञान से सब हंस दिये। सोम प्रकाश ने हरि प्रसाद के सर पर हाथ फेरते हुए कहां। की तू भी हमारे साथ इतनी दूर क्यों आया। ये बात सून कर मानो हरि प्रसाद समझ गया की उसकी ही चर्चा हो रही है। इसलिए वह खुश के मारे पूछ हीला कर अपनी खुशी को बतलाता रहा। चलने से पहले सब ने स्वामी जी से हाथ जोड़ कर नमस्ते की और कहां की अब हम चलते है। तब स्वामी जी ने पास खड़े साधक से कहां की आप इन को सड़क तक छोड़ के आ जाओ। नानी ने कहां की इस बात की क्या जरूरत है नाहक बच्चा परेशान होगा। तब साधन ने कहां की नहीं नानी थोड़ा आपका संग साथ हो जायेगा और श्याम का समय है थोड़ा घूमना फिरना भी कर लूंगा।

नानी ने उस साधक को लाख मना किया परंतु वह नहीं माना और नदी का वह उबड़ खाबड़ रास्ता वह सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर पार करा कर ही वापस आ जाता हूं। आज नेहा लता काफी खुश थी। क्योंकि इतने दिनों में आज सोम प्रकाश ने उसे छू कर प्रेम प्रदर्शित किया था। उसकी छुअन में उसकी आंखों में अपने पन का एक रहस्य एक तृप्ति का भाव था।


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