प्रभात बेला रवि की प्रखर होती किरणें
उनका यूं अवतरण उतरना,
चूमना इस धरा के रज कणों को
उन अछूते तलों और गहराइयों को
जो छू जाती उन अंधेरे नीरस कोने को भी
जो दबे पड़े थे समय की गोद में कहीं
और संध्या बेला जब रवि
थक जाता है चलते-चलते
और फैल रही होती,
अस्ताचल की बेला
वो उदास मायूस मासूम सा
कैसी अनछुई सी दिखती वही किरणें
वो अटकी रह जाती उन ऊंचे
देवदार की किन्हीं शाखाओं पर
उन चिकने तनों पर और झूमती फुनगी पर
उसकी शाखा-प्रशाखा और पत्तों पर ही
संध्या बेला वह क्यों नहीं जाती
अब उन गहरे अनछुए तलों तक?
पर हे प्रिय—तेरी छूआन,
तेरा ये स्पर्श तो
अस्ताचल के बाद भी
प्रकाशित कर रही है जग को,
दिखा रहा है मार्ग,
हम अंधेरे में भटकते हुए को
उजागर कर रहा है
उन गूढ़ छुपे रहस्यों को
भर रहा है जीवन में
एक नई उमंग आज भी
वही एक नव यौवन कि तरह
भेद रही है उन अंधेरी घाटियों को
जिनमें अभी भी जीवन के
नये मार्ग नहीं निकले है
जहां नहीं सूझता हे
और न ही दिखाई देता है
आज भी कोई मार्ग
वहां तो छितरी पड़ी है
तिमिर की भटकन ही भटकन
तमस का छद्म आवरण ओढ़े,
वह झीना सा पारदर्शी पर्दा
जो छिपकर भी कहां छुपा पाता है उसे तुमसे
देख रहा हूं फिर मैं आज,
नित-नित पर तेरी ओजस किरणें भर रही है
नव उत्थान की एक नई उमंग,
एक सहसा, एक सरस तरंग
एक नया उत्तल नव उल्लास
थके जीवन में,
उन टूटे बिखरे हुए सहसा को भी
दिखा रही हो हमें एक नया मार्ग......
जो ले जायेगा उन अंधेरी विरल घाटियों के पार
उन ऊंची हिमालय की शैल-चोटियों पर
और हम फिर से देखे वो उन्मुक्त नव।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें