जीवन करता नित-नूतन खेल।
हे धूप-छांव का अदभुत मेल।।
स्वर्ण चमक सी ये मुस्कान।
सुरमय कालिमा गाती गान।
जीवन की इस दीप शिखा से
नित-नित घटता जाता तेल...
धूप-छांव का अदभुत मेल...
इन दबी-घुटी आहों का नाद।
हर श्वास-श्वास पर बैठी आस।
विनिश्चय बिंदु तक बढ़ता दुख
प्रीतम-पीड़ा का ये लम्बा खेल।
धूप-छांव का अदभुत मेल.....
समीर-मधुर सा ये कोकिल गान।
प्रकृति के समरस को लेता जान।
मृदुल राग का वो विरल श्रृंगार,
फिर बनता टूटे छंदो का मेल।
धूप-छांव का अदभुत खेल।।
(ओशाे की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें