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रविवार, 6 सितंबर 2026

56 - जीवन का खेल — (कविता) - ओशो की मधुशाला

 56 - जीवन का खेल — (कविता) - मनसा-मोहनी 

जीवन करता नित-नूतन खेल।

हे धूप-छांव का अदभुत मेल।।

 

स्वर्ण चमक सी ये मुस्कान।

सुरमय कालिमा गाती गान।

जीवन की इस दीप शिखा से

नित-नित घटता जाता तेल...

धूप-छांव का अदभुत मेल...

 

इन दबी-घुटी आहों का नाद।

हर श्वास-श्वास पर बैठी आस।

विनिश्चय बिंदु तक बढ़ता दुख

प्रीतम-पीड़ा का ये लम्बा खेल।

धूप-छांव का अदभुत मेल.....

 

समीर-मधुर सा ये कोकिल गान।

प्रकृति के समरस को लेता जान।

मृदुल राग का वो विरल श्रृंगार,

फिर बनता टूटे छंदो का मेल।

धूप-छांव का अदभुत खेल।।

(ओशाे की मधुशाला) 

मनसा-मोहनी दसघरा 


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