कुल पेज दृश्य

रविवार, 8 नवंबर 2026

19-नया सफर—(कविता) - परिजात के फूल

19-नया सफर—(कविता) - मनसा-मोहनी 

श्‍याम के अस्त सूर्य की लालिमा में,

उड़ती गाड़ियों की धुल-दूषित रजत कण,

कुछ क्षणों के लिए ले लेते है वो

वो भिन्न-भिन्न से आकार,

शायद वो हो मेरे मन का ही वहम

एक जंजाल जो एक प्रति छवि बन

खड़ा हो जाता था मेरे ही सामने

कभी-कभी उसमें झाँकती सी लगती है,

मां की छवि मुझको,

तब मेरा बाल मन कैसे जीवित हो उठता था

तब में कुलांचें भर दौड़ पड़ता हूं,

उसे पाने के लिए, पकड़ने के लिए

परंतु जैसे ही जाता हूं उसके पास

वो तो एक कण बन कर घेर लेता है मुझे

एक गुब्‍बार का बादल सा उसका गुरूर

वो छलिया था या मृग मरीचिका बन

करता सा दिखता है एक अनसुलझी सी अट्टहास,

और तब मैं केवल अवाक-छला सा

खड़ा हो रोक लेता हूं अपनी सांस

कहीं तुम मेरी तेज सांसों से

बदल न लो अपना आकार,

चारों तरफ गहन शांति,

रास्ते के उस पतले होते

छोर तक नहीं दिखता कोई आकर,

दूर क्षितिज पर लालिमा भी

रूठ कर चली जाती है सूर्य के संग,

और मैं खड़ा हूं,

उस पगडंडी पर टिकाये नजर,

धुल का गुब्‍बार भी धीरे-धीरे

खो जाता है बन काला साया

और पड़ जाती है मंद जीवन ज्योति

खत्‍म हो जाती है इन आंखों कि रोशनी

और में चल देता हूं एक नए सफर पर,

अदृश्य पथ पर, बिना किसी कलेवे के।  

बिना आंखों कि ज्योति के

बिना किसी पूर्व नियोजित

अनजान अपरिचित गंतव्य की और .............।

(परिजात के फूल)

मनसा - मोहनी दसघरा 

 


 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें