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मंगलवार, 14 सितंबर 2010

संतों की अपनी-अपनी कमजोरी—

धर्म गुरूओं को एक सम्‍मेलन हुआ। देश से बड़े-बड़े धर्म गुरु आये, सब ने अपने-अपने ज्ञान की गहराई ऊँचाइयों, के बखान किये, सभी श्रोता गण मंत्र मुग्‍ध हो धन्‍य हो गये। इसके बाद चारों एक कमरे में आराम करने चले गये। वहां उनकी चर्चा चली। अब सब सम्‍मेलन तो निपट गया था। वह बैठ कर आपस में चर्चा करने लगे। ऊंची बातें तो हो चुकी, नकली बातें तो हो चुकी। अब वे बैठ कर असली गप-शप कर रहे है।
      पचहत्‍तर साल का धर्म गुरु जो सबसे बुजुर्ग था। कि वहां जो गई वे बातें,सुन गये लोग। वो तो सब उपर-उपर की ही समझो, तोता रटन बन गई है बात। पर अब आप लोगो से भी क्‍या छूपाना। और मैं आशा करता हूं की आप भी अपने दिल की बात नहीं छूपाओंगे। फिर यहां तो सब अपने ही धंधे के आदमी बैठे है। अच्‍छा हो की हम बताये कि हमारी जिन्‍दगी क्‍या है। कम से कम यहां तो सच बोले भगवान के सामने जब जाना होगा तो कुछ तो सत्‍य होगा अपने जीवन में नहीं तो सब ढोंग और दिखावा। जो वहां काम नहीं आयेगा। आशा करता हूं कि आप अपने मन की बात सही-सही कहेंगें। मैं तो बस एक ही चीज से परेशान हूं—धन से। और दिन रात घन के सपने देखता हूं और धन की चर्चा करता हूं। पर मैं बोलता हूं धन के विरोध में। धन पर मेरी बड़ी पकड़ है, एक पैसा भी मेरा खो जाये तो मैं रात भर सौ नहीं सकता। या कही से पैसा मिलने भर की उम्‍मीद जग जाये तो मैं इतना उतावला हो जाता हूं कि कब सुबह हो और में जाकर धन कमाऊ,तब भी नींद नहीं आती। पैसा तो मेरे पास इतना है, कि में सो जन्‍म भी खा नहीं सकता। पर कुछ बंधन है। उसका भोग नहीं कर सकता अपने ही शिष्यों के कारण। फिर इतना पैसा होने पर भी पैसे की पकड़ इतनी क्यों है ये मेरी समझ में नहीं आती। मैं तो बस पैसे को देख कर पागल हो जाता हूं। धन मेरी कमजोरी है। इसके पार मैं नहीं हो पा रहा हूं। क्या आप में से कोई पास हो गया है,तो मुल मंत्र मुझे भी बतायेंगे।
      दूसरे ने कहां—पार तो हम भी नहीं हुआ हूं, हमारी भी मुसीबतें है। अब भला आप से क्‍या छूपाना, मैं दिन रात ब्रह्मचर्य की बात करता हूं। पर रात दिन बस औरतों के ही सपने आते हे। रात-रात समझाता हूं, प्रवचन करता हूं, ब्रह्मचर्य का व्‍याखान करता हूं, लेकिन उस दिन बोलने में कुछ मजा नहीं आता जिस दिन सत्संग में स्त्रीयां कम आती है। उस दिन में जोश कम हो जाता है। जैसे में मर ही गया, और जिस दिन स्‍त्रीयां आती है तो उस दिन तो मेरा जोश तो बस देखने लायक होता है। और जब कोई स्‍त्री मेरे से एकांत में मिलती है। तो मानों वही पर मेरा स्‍वर्ग निर्मित हो जाता है। उस समय में पूरा संत बन जाता हूं। क्‍या ब्रह्मचर्य का नाटक करता हूं, अकड़ कर सीधा बैठ जाता हूं, और जब वह पास आ मेरे पैर छूती है। तो जीवन धन्‍य हो जाता है।  उसको छूने मात्र से कितनी  तिरप ती मिलती है कह नहीं सकता। धन की पकड़ है। पर मेरी समस्या धन से भी ज्‍यादा औरत है। दिन भर लोगों को बताता हूं, औरत नर्क का द्वार है, पाप को घड़ा है। पर ये सब उपरी बातें है। अन्‍दर तो बस स्‍त्री—स्‍त्री मन बार-बार यही रटन लगाये रहता है। आप कोई सुझाव दें। मेरी समस्‍या के प्रति।
      तीसरे ने कहां—मेरी भी समस्‍या धन-स्‍त्री तो है, मुक्‍ति तो इससे नहीं मिली। पर मेरी सबसे बड़ी समस्‍या अहंकार हे। कैसे में अपना नाम रोशन करूं सपने में भी कदम फूंक-फूंक कर रखता हूं। आज कल के शिष्‍यों भी बड़े बे भरोसे के हो गये है। किसी पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता कब सारी बनी बनाई छवि पर कालिक पोत दे। सो अपने ही शिष्‍यों से क्‍या आपको नहीं बचना पड़ता।
      चोथा—आप लोगो की तो एक ही समस्‍या है। अब मेरे तो हालत देखो जेसे तुम सब मेरे दर्पण हो मानों मेरी ही समस्‍या बता रहे हो। आप लोगे, मुझ पर थोड़ी दया करें कृपा मुझे इतनी समस्‍याओं के बदले एक ही में जीना पड़े ऐसा कोई राज बताये। पैसा, औरत, ब्रह्मचर्य,अहंकार.....मत पूछो। कितना साध-साध कर कदम रखना होता है।
      पाँचवाँ—उठ कर चल दिया। सब कहने लगें ये तो ठीक नहीं, ये तो सज्‍जनता नहीं। सभा में से यूं उठ जाना। ये तो अपमान है। और तुम उठ कर यूं जा नहीं सकते। कम से कम अपनी कमजोरी का कुछ तो जिक्र करों।
      लेकिन पाँचवाँ नहीं माना, और कहने लगा, भाईयों में यहां रूक नहीं सकता। आप मेरी कमजोरी को न सुनें तो बेहतर होगा। पर वह चारो नहीं मानें, कि कुछ तो कहो, तब पांचवें ने कहां भाई अब आप लोगों ने इतना मसाला दे दिया कि मुझसे हजम नहीं हो रहा, मेरी कमजोरी ‘’निंदा’’ है। अब मैं जाता हूं, एक क्षण भी यहां नहीं रूक सकता। मुझे ये सब बातें तो एक-एक चैनल पर जा-जा कर बतानी है। काफी समय लग जायेगा, जो मैं सून लेता हूं वह मैं कहे बिना रह नहीं सकता। क्षमा करें, मेरी तो यही कमजोरी है। और अफवाह...अपवाह...बस मुझे तो इसी बात में रस आता है। वहां जो वाह-वाही मिलती है, उस का क्‍या कहना। एक-एक आदमी सांस रोककर मेरी बात सुनता हे। सभी में तो सब सो रहे होते है। वहां पर मुझे कोई खास रस नहीं आता वहां तो मैं बस नाम के लिए बोल देता हूं। असली मजा तो यहां आता है। अच्‍छा अब में चला।
      उन चारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की। तू ठहर जो जरा। भाई इस तरह से हमें धोखा दे कर तूँ चेन से नहीं बैठ सकेगा। हम यूं ही नहीं बैठने देंगे तुझे सभा में इतना तो खयाल कर।
पर उसने एक नहीं सूनी और भाग गया....
हर आदमी की अपनी-अपनी कमजोरी होती है। यहीं संतों का भाग्‍य है।
स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’