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शुक्रवार, 22 मई 2020

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-07


सभी स्वप्न समाप्त हो जाने चाहिए-(प्रवचन-सातवां) ओशो

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)--ओशो
(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 
सूत्र:
शांति और अशांति भ्रांति के परिणाम है;
बुद्धत्व के साथ कोई पसंदगी और नापसंदगी नहीं होती।
सभी द्वैत अज्ञानपूर्ण निष्कर्ष से आते हैं।
वे ऐसे हैं जैसे कि सपने या आकाश- कुसुम;
उन्हें पकड़ने की चेष्टा करना मूढ़ता है।
लाभ और हानि, उचित और अनुचित,
अंत में ऐसे विचार तत्काल समाप्त कर देने चाहिए।

अगर आंख कभी नहीं सोती,
तो स्वभावत सारे स्वप्न समाप्त हो जाएंगे।
अगर मन कोई भेद नहीं करता,
दस हजार चीजें जैसी वे है? एक ही तत्व की हैं।
इस एक तत्व के रहस्य को समझ लेना
सारे बंधनों से मुक्त हो जाना है।
जब सभी वस्तुएं समान रूप से देख ली जाती हैं
तो समयातीत आत्मतत्व तक पहुंचना हो जाता है
इस कारणरहित संबंधरहित अवस्था में
कोई तुलनाएं या समानताएं संभव नहीं हैं।


मन की केवल एक सामर्थ्य है और वह है सपने देखना। और यह सपने देखने का क्रम तब भी चलता रहता है, जब तुम जाग रहे होते हो। वही कारण है कि सोसान या जीसस विश्वास नहीं करेंगे कि तुम कभी जागे हुए हो क्योंकि सपने की एक विशेषता है कि यह नींद में ही घटित हो सकता है।
पहले ये दो बातें समझ लेनी चाहिए मन सारे सपनों का स्रोत है लेकिन सपना केवल नींद में ही आ सकता है। और अगर तुम दिन के चौबीस घंटे सपने देख रहे हो, तो एक बात बिलकुल निश्चित है कि तुम गहरी नींद में हो। किसी भी क्षण आंख बंद करो और सपना वहां है र वह अंतर्धारा की तरह लगातार चलता रहता है। उस समय भी, जब तुम किसी कार्य में व्यस्त हो सभी बाहर के प्रयोजनों के हिसाब से तुम जागे हुए मालूम पड़ते हो लेकिन भीतर गहरे में सपनों की एक धारा लगातार बहती ही रहती है।
किसी भी क्षण, आंखें बंद करो और यह वहां है। तुम्हारे काम- धंधे से उसमें कोई बाधा नहीं आती। तुम बाजार में चलते हो कार चलाते हो तुम फैक्ट्री में ऑफिस में काम करते हो- यह चलता रहता है। तुम सो जाते हो, तब तुम्हें यह अधिक अनुभव होता है, क्योंकि अब तुम कुछ कर नहीं रहे, सारा ध्यान मन की ओर चला जाता है।
वह ठीक सितारों की भांति है। तुम दिन के समय आकाश में सितारों को देख नहीं सकते। वे वहीं हैं, क्योंकि वे कहां जा सकते हैं? लेकिन सूर्य के प्रकाश के कारण तुम उन्हें देख नहीं पाते। अगर तुम किसी गहरे कुएं में दो सौ फुट नीचे चले जाओ वहां से तुम दिन के समय भी आकाश में सितारे देख सकते हो। वे वहां हैं लेकिन अत्यधिक प्रकाश के कारण तुम देख नहीं पाते। उन्हें प्रकट होने के लिए अंधकार की जरूरत है।
यही सपनों के साथ होता है सपने वहां दिन के समय में भी होते हैं अंधकार की आवश्यकता है ताकि तुम उन्हें देख सको। यह वैसे ही है जैसे तुम सिनेमा देखने जाओ. अगर दरवाजे खुले हों भले ही पिक्चर चल रही हो लेकिन तुम देख नहीं पाते। दरवाजे बंद कर दो कमरे में अंधेरा कर दो और तब तुम देख पाते हो।
सपने तुम्हारा सातत्य है और जब तक यह सातत्य न टूट जाए तुम जान नहीं सकते कि सत्य क्या है। प्रश्न यह नहीं है कि सत्य बहुत दूर है या निकट, प्रश्न यह है कि मन सपने में है या नहीं।
इसलिए बुनियादी समस्या यह नहीं है कि सत्य को कैसे खोजें तुम सपने देखने वाले मन के साथ खोज नहीं कर सकते; क्योंकि जो कुछ भी तुम्हारे सामने आएगा तुम्हारे सपने उस पर आरोपित हो जाएंगे। तुम्हारे सपने उस पर प्रक्षेपित होंगे तुम उसकी व्याख्या करोगे। तुम उसे वैसा नहीं देख पाओगे, जैसा कि वह है। तुम उसे अपने सपनों के अनुसार देखोगे तुम उसे झुठला दोगे। सत्य वहां है क्योंकि केवल सत्य ही हो सकता है। असत्य हो नहीं सकता।
तो इससे पहले कि हम सूत्र में प्रवेश करें एक और बात शंकराचार्य ने सत्य को तीन कोटियों में विभाजित किया है और उन कोटियों को समझना अच्छा है। एक कोटि सत्य की कोटि है. वह जो है। वास्तव में और कुछ संभव नहीं है; केवल सत्य है, और केवल सत्य ही हो सकता है।
दूसरी कोटि उसकी है जो असत्य है जो हो नहीं सकता। उसके होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि असत्य कैसे हो सकता है? होने के लिए सत्य की आवश्यकता है। इसलिए असत्य की सत्ता ही नहीं है। सत्य की सत्ता है। फिर शंकराचार्य तीसरी कोटी पाते हैं उसे वह स्वप्न कहते हैं आभास भ्रम माया जो दिखाई तो पड़ता है लेकिन है नहीं।
इसलिए तीन कोटियां हैं। सत्य, जो है। अगर तुम्हारी आंखें स्वच्छ हैं बादलों से आच्छादित नहीं हैं अगर मन सपने नहीं देख रहा, तब केवल एक ही कोटि है सत्य। लेकिन अगर तुम्हारा मन सपने देख रहा है तब दो अन्य श्रेणियां सत्ता में आ जाती हैं। स्वप्न है एक विशेष अर्थ में क्योंकि तुम सपना देखते हो और एक दूसरे विशेष अर्थ में यह नहीं है क्योंकि यह किसी सत्य के समान नहीं है। रात तुम सपना देखते हो कि तुम सम्राट हो गए हो; सुबह तुम पाते हो कि तुम बस वही भिखारी हो। स्वप्न मिथ्या था, लेकिन स्वप्न था, इसलिए इसमें सत्य की गुणवत्ता है क्योंकि यह घटित हुआ। और उन घड़ियों में जब यह घट रहा था तुम्हें उसकी वास्तविकता पर पूरा विश्वास था नहीं तो वह उसी क्षण रुक गया होता।
अगर तुम्हें पता चल जाए कि मैं स्वप्न देख रहा हूं और यह मिथ्या है, तो स्वप्न भंग हो जाता है तुम जाग ही चुके हो। स्वप्न कुछ घंटों तक चलता रहा; उसमें सत्य की एक गुणवत्ता थी, कि उसका अस्तित्व था। लेकिन यह सत्य नहीं है क्योंकि सुबह तुमने पाया कि यह नहीं था। यह केवल एक खयाल, हवा में एक लहर आकाश में एक फूल-सत्य जैसा लगता था, लेकिन असत्य था।
सत्य की सत्ता है असत्य की सत्ता नहीं है और दोनों के बीच में स्वप्नों का संसार है-जिसमें दोनों के गुण हैं। और मन स्वप्नों का स्रोत है, इसलिए मन भ्रांति है। मन सारी माया का स्रोत है।
हो सकता है तुम सोचते होओ कि अगर तुम संसार को छोड़ दो और हिमालय चले जाओ तो तुम्हें सत्य उपलब्ध हो जाएगा। तुम गलत हो- क्योंकि तुम्हारा घर माया नहीं है तुम्हारी पत्नी माया नहीं है तुम्हारे बच्चे। नहीं तुम्हारा मन माया है। और यह कैसे हो सकता है कि तुम मन यहां छोड़ जाओ और स्वयं हिमालय चले जाओ? मन तुम्हारे भीतर है। अगर तुम उसे छोड़ सकते तो तुम उसे कहीं भी छोड़ सकते हो। अगर तुम उसे छोड़ नहीं सकते तो नहीं छोड़ सकते चाहे तुम हिमालय जाओ या न जाओ।
पत्नी बच्चे, घर संसार को माया, भ्रम कहा गया है लेकिन दूसरे अर्थ में-क्योंकि पत्नी का अस्तित्व है उसकी सत्ता है। वह अपने स्वयं के अधिकार से ब्रह्म है, वह सत्य है- पत्नी के रूप में नहीं बल्कि आत्मा के रूप में।
तुम्हारा मन उसकी व्याख्या पत्नी के रूप में करता है, ' वह मेरी पत्नी है।तब एक स्वप्न निर्मित होता है। वह वहां है, बिलकुल सत्य तुम यहां हो बिलकुल सत्य और दोनों के बीच एक स्वप्न घटता है। तुम उसे अपनी पत्नी कहते हो, वह तुम्हें अपना पति कहती है। अब दोनों के बीच एक स्वप्न है और सपने हमेशा दुःस्वप्न बन जाते हैं। इसलिए अंत में सभी संबंध दुःस्वप्न बन जाते हैं क्योंकि तुम भ्रम को बहुत समय तक सहन नहीं कर सकते। भ्रम थोड़े समय के लिए हो सकता है; देर-अबेर उसे मिट ही जाना है। वह शाश्वत नहीं हो सकता, वह स्थायी नहीं हो सकता।
तुम एक स्त्री से प्रेम करते हो एक सपना निर्मित हो जाता है- लेकिन तुम कब तक सपना देख सकते हो? जैसे ही हनीमून समाप्त हुआ, उससे पहले ही-सपना चला जाता है। फिर तुम क्या करोगे? फिर तुम दिखावा करोगे क्योंकि अब तुम अपने स्वयं के वादों के गुलाम हो।
तुम ढोंग करोगे कि तुम अब भी प्रेम करते हो तुम दिखावा करोगे कि तुम अब भी सुंदर हो, तुम ऐसा दिखाओगे कि तुम्हारे जैसा और कोई नहीं है लेकिन अब यह सब आडंबर है। और जब तुम झूठा दिखावा करते हो और सपना टूट जाता है और तुम अब भी सपने को पास सम्हाले हुए हो वह बोझ बन जाता है एक दुःस्वप्न बन जाता है। इसीलिए तुम इतने दुख में जीते हो।
दुख और कुछ नहीं सिर्फ टूटे सपने टूटे इंद्रधनुष टूटे भ्रम भ्रांतियां हैं। और तुमने उनमें इतनी पूंजी लगाई है कि तुम इस सत्य को नहीं देख सकते कि वे प्रारंभ से ही सपने
बजाय सत्य को देखने के तुम जिम्मेवारी दूसरों पर डाल दोगे। तुम कहोगे ' इस पत्नी ने मुझे धोखा दिया है। वह इतनी अच्छी नहीं थी जितनी वह दिखाई देती थी। उसने मुझे धोखा दिया उसने अपनी असलियत को प्रकट नहीं किया।और तुम यह कभी नहीं देखोगे कि यह बात बिलकुल नहीं है। तुम उसके इर्द-गिर्द एक सपना निर्मित कर रहे थे, और उस सपने के कारण तुम सच्चाई को देख नहीं पाए। वह भी तुम्हारे इर्द-गिर्द एक सपना बुन रही थी।
इसलिए जब कभी दो व्यक्ति प्रेम में पड़ते हैं तो वे दो नहीं चार व्यक्ति होते हैं एक प्रेमी एक प्रेमिका और उन दो के बीच एक वह प्रेमिका जो प्रेमी के मन की रचना है, और वह प्रेमी जो प्रेमिका के मन की रचना है। ये दो सपने हैं और ये दोनों तुम्हारे मन में चलते रहते हैं।
देर- अबेर जब स्वप्न टूट जाता है, तुम दो रह जाते हो चार नहीं। जब तुम दो हो तो कठिनाई होगी। फिर तुम दूसरे पर जिम्मेवारी डालना चाहोगे ' यह दूसरे के कारण है।तुम फिर असली बात से चूक गए। उसका अर्थ है तुम फिर किसी दूसरी स्त्री के इर्द-गिर्द वही सपना बुनोगे क्योंकि तुम सोचोगे ' यह स्त्री मुझे धोखा नहीं देगी, और अब मैं भी अधिक समझदार हो गया हूं।
लेकिन मन कभी समझदार नहीं होता। मन का सार ही मूर्खता है इसलिए मन कभी समझदार नहीं हो सकता। वह चालाक हो सकता है अपनी मूर्खता में चालाक लेकिन वह कभी बुद्धिमान नहीं हो सकता है। वह उसका स्वभाव नहीं है क्योंकि बुद्धिमत्ता तभी घटती है जब स्वप्न समाप्त हो जाते हैं। इसलिए अगर स्वप्न देखना मन की मूलभूत वास्तविकता है तब वह कभी समझदार नहीं हो सकता।
एक बुद्धपुरुष समझदार होता है क्योंकि अब वहां मन नहीं है। एक सोसान ही समझदार है क्योंकि अब वह अ-मन में जीता है, अब सभी स्वप्न समाप्त हो गए हैं। वह चीजों को वैसे ही देखता है जैसी वे हैं। तुम चीजों को वैसे ही कभी नहीं देखते जैसी वे हैं तुम उनमें अपनी भ्रांतियां मिला देते हो। और तुम सीधा-सीधा देखने से बहुत डरते हो क्योंकि तुम अचेतन रूप से भीतर गहरे में कहीं जानते हो कि चीजें वैसी नहीं हैं जैसे तुम उन्हें देखते हो।
लेकिन तुम सोचते हो कि अगर तुम चीजों की वास्तविकता को देखोगे तो मुश्किल हो जाएगी, वास्तविकता इतनी बोझिल होगी कि शायद तुम उसे सहन न कर सको। तुम उसे थोड़ा मीठा बनाने के लिए उसमें सपने मिला देते हो। तुम सोचते हो कि वह कड़वी है, उस पर शक्कर चढ़ा देते हो। सपनों में तुम किसी व्यक्ति पर शक्कर चढ़ा देते हो और तुम्हें लगता है कि व्यक्ति मीठा हो गया? नहीं तुम केवल स्वयं को धोखा दे रहे हो, किसी और को नहीं। इसीलिए इतना दुख है।
जो दुख घटित हुआ है यह तुम्हारे सपनों से हुआ है और व्यक्ति को इस घटना के प्रति सचेत रहना होता है। दूसरों पर जिम्मेदारी मत डालो नहीं तो तुम दूसरे सपने निर्मित कर लोगे देखो कि यह तुम ही हो जो प्रक्षेपित कर रहे हो। लेकिन देखना कठिन है।
सिनेमा हॉल में तुम परदे को देखते हो तुम पीछे कभी नहीं देखते- प्रक्षेपण यंत्र पीछे लगा है। वास्तव में फिल्म परदे पर नहीं है परदे पर केवल प्रकाश और छाया का प्रक्षेपण है। फिल्म ठीक पीछे है लेकिन तुम उसे कभी नहीं देखते और प्रोजेक्टर वहीं है। सारी बातों के पीछे तुम्हारा मन है, और मन प्रोजेक्टर है। लेकिन तुम सदा दूसरे को देखते हो क्योंकि दूसरा पर्दा है।
जब तुम प्रेम में होते हो व्यक्ति सुंदर प्रतीत होता है अतुलनीय सुंदर। जब तुम घृणा करते हो वही व्यक्ति कुरूपतम मालूम होता है। लेकिन तुम इस बात के प्रति कभी सचेत नहीं होते कि कैसे वही व्यक्ति कुरूपतम हो सकता है और वही सुंदरतम हो सकता है।
जब तुम प्रेम में होते हो वही व्यक्ति एक फूल एक गुलाब का फूल बिना कांटों के गुलाबों का उद्यान है। जब तुम उसे पसंद नहीं करते उससे घृणा करते हो, तब फूल विलीन हो जाते हैं, वहां केवल कांटे ही कांटे हैं, फिर वह एक उद्यान नहीं रह जाता- वह सबसे बदसूरत सबसे गंदा.. .तुम उसे देखना भी न चाहोगे। और तुम कभी सचेत भी नहीं होते कि तुम कर क्या रहे हो। गुलाब इतनी जल्दी एक मिनट में ही कैसे विलीन हो जाते हैं? एक मिनट के अंतराल की भी आवश्यकता नहीं है। इस क्षण तुम प्रेम में हो और दूसरे क्षण घृणा में होते हो वही आदमी वही पर्दा और सारी कहानी बदल जाती है।
जरा गौर करो और तुम देख पाओगे कि बात इस व्यक्ति की नहीं है तुम कुछ प्रक्षेपित कर रहे हो। जब तुम प्रेम प्रक्षेपित करते हो तब व्यक्ति प्रिय लगता है जब तुम घृणा प्रक्षेपित करते हो तब व्यक्ति कुरूप लगता है। व्यक्ति नहीं है, तुमने असली व्यक्ति को बिलकुल देखा ही नहीं है। तुम मन की आंखों से सत्य को देख ही नहीं सकते।
अगर तुम वास्तव में जानना चाहते हो कि सत्य क्या है तो शास्त्र सहायता नहीं करेंगे। न ही हिमालय पर जाना सहायक सिद्ध होगा। केवल एक बात सहायता कर सकती है चीजों को मनरहित होकर देखना शुरू करो। फूल को देखो और मन को कुछ भी कहने की इजाजत मत दो। जरा उसे देखो। व्याख्या करने की पुरानी आदत के कारण यह कठिन है। तुम व्याख्या करते चले जाते हो और व्याख्याएं भी अलग- अलग होती हैं। व्याख्याएं मन पर निर्भर हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने न्यायालय से तलाक की मांग की। उसने न्यायाधीश से कहा अब असंभव हो गया है। प्रतिदिन जब मैं घर लौटता हूं और पाता हूं कि मेरी पत्नी ने किसी न किसी आदमी को अलमारी में छिपा कर रखा है।
न्यायाधीश भी बहुत हैरान हुआ और उसने कहा प्रतिदिन?
नसरुद्दीन ने कहा प्रतिदिन! और वही आदमी नहीं- हर रोज नया आदमी।
नसरुद्दीन को सांत्वना देने के लिए न्यायाधीश ने कहा तब तो तुम्हें बहुत चोट पहुंचती होगी। तुम घर आते हो थके-मांदे और तुम सोचते हो कि पत्नी प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करने के लिए और प्रेम से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही होगी। और तुम घर आते हो और देखते हो प्रतिदिन एक नया आदमी अलमारी में छिपा हुआ है। यह बहुत बुरी बात है।
नसरुद्दीन ने कहा हां मैं बहुत व्यथित होता हूं-क्योंकि मेरे पास अपने कपड़े टांगने के लिए कोई जगह नहीं होती।
तुम चीजों की कैसे व्याख्या करते हो वह तुम्हारे मन पर निर्भर है।
फिर नसरुद्दीन ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और भाग गया। वह पकड़ा गया, फिर उसे कोर्ट में लाया गया। न्यायाधीश ने कहा तुम भगोड़े हो और तुम्हें दंड मिलना चाहिए। नसरुद्दीन ने कहा रुकिए! कोई निर्णय लेने से पहले आप मेरी पत्नी को अवश्य देख लें। अगर आप मेरी पत्नी को देखेंगे तो कभी नहीं कहेंगे कि मैं भगोड़ा हूं। आप केवल इतना ही कहेंगे, नसरुद्दीन, तुम कायर हो! और मुझे वह स्वीकार है। मैं भगोड़ा नहीं हूं सिर्फ कायर हूं। लेकिन पहले मेरी पत्नी को देख लें।
तुम चीजों को कैसे देखते हो यह तुम पर निर्भर करता है, वस्तुओं पर नहीं। जब तक तुम उस अवस्था तक नहीं पहुंचते जहां तुम व्याख्या करने वाले मन को गिरा दो और सीधा-सीधा देखो, तत्काल देखो कि मन तुम्हारा मध्यस्थ है। वह चीजों को विकृत रूप में तुम्हारे सामने प्रस्तुत करता है, वह चीजों को व्याख्याएं मिला कर तुम्हारे सामने लाता है। वे विशुद्ध नहीं हैं।
इसलिए सत्य तक पहुंचने का एक ही मार्ग है कैसे सीखो कि तुम्हारी दृष्टि में तत्परता हो मन की सहायता लेना कैसे छोड़ो। मन की मध्यस्थता ही समस्या है क्योंकि मन केवल सपने देख सकता है। लेकिन मन सुंदर सपने बुन सकता है और तुम बहुत उत्तेजित हो सकते हो। उत्तेजना के माध्यम से सपने वास्तविकता जैसे दिखाई देने लगते हैं।
अगर तुम बहुत उत्तेजित हो तो तुम नशे में हो फिर तुम अपने होश में नहीं हो। फिर तुम जो भी देखते हो वह सिर्फ तुम्हारा प्रक्षेपण है। और फिर उतने ही संसार हैं जितने मन हैं, क्योंकि प्रत्येक मन अपने ही संसार में रहता है। तुम दूसरों की मूढ़ता पर हंस सकते हो, लेकिन जब तक तुम अपने ऊपर हंसना शुरू नहीं करते तब तक तुम ताओ के प्रकृति के सत्य के व्यक्ति नहीं हो पाओगे। इसलिए क्या करें?
छोटी-छोटी चीजों में मन को बीच में न लाने की कोशिश करो। तुम एक फूल को देखते हो- तुम बस उसे देखो मत कहो ' सुंदर, कुरूप, ' तुम कुछ भी मत कहो। शब्दों को मत लाओ शब्दों में व्यक्त मत करो-केवल देखो। मन को असुविधा प्रतीत होगी, बेचैनी होगी। मन कुछ कहना चाहेगा, तुम मन से बस इतना कहो ' चुप हो जाओ, मुझे देखने दो। मैं मात्र देखूंगा।
शुरू-शुरू में यह कठिन होगा लेकिन उन चीजों से शुरू करो जिनमें तुम अधिक उलझे नहीं हो। अपनी पत्नी को बिना शब्दों को बीच में लाए देखना कठिन होगा। तुम उसमें बहुत उलझे हो भावात्मक रूप से बहुत जुड़े हो। क्रोध में या प्रेम में, लेकिन बहुत उलझे हो।
उन चीजों को देखो जो असंबंधित हैं- एक चट्टान, एक फूल, एक वृक्ष, सूर्योदय, उड़ान भरता हुआ पक्षी आकाश में चलता हुआ बादल। उन चीजों को बस देखो जिनसे तुम बहुत जुड़े नहीं हो जिनसे तुम निर्लिप्त रह सकते हो जिनसे तुम तटस्थ रह सकते हो। असंबंधित चीजों से आरंभ करो और केवल तभी भावपूर्ण स्थितियों की ओर बड़ों।
लोग पहले भावपूर्ण स्थितियों से शुरू करते हैं, वे असफल हो जाते हैं, क्योंकि यह लगभग असंभव है। या तो तुम अपनी पत्नी से प्रेम करते हो या घृणा करते हो, बीच की स्थिति नहीं है। अगर तुम प्रेम करते हो, तो तुम पागल हो अगर तुम घृणा करते हो, तो तुम पागल हो- दोनों स्थितियों में शब्द बीच में आएंगे। लगातार कुछ कहने के इतने अभ्यास के कारण शब्दों को न आने देना कठिन है लगभग असंभव है।
एक दिन मैं सुबह मुल्ला नसरुद्दीन के घर गया। जब मैं वहां पहुंचा, वे दोनों चाय पी रहे थे। पत्नी ने कहा. प्रियतम रात को जब तुम नींद में थे तुम मेरे बारे में बहुत ही अप्रिय बातें कह रहे थे।
नसरुद्दीन ने मेरी ओर देखा और कहा? कौन कहता है मैं नींद में था? मैं जागते हुए नहीं कह सकता हूं इसीलिए मैं सोने का बहाना कर रहा था।
नींद में भी या जागते हुए जब तक तुम भावात्मक रूप से अत्यधिक उलझे हो तो
मन को एक तरफ रख देना कठिन है। यह बीच में आएगा। इसलिए पहले हलकी स्थितियों को देखो। जब तुम्हें ऐसा एहसास हो कि ही तुम कुछ विशेष चीजों को मन को बीच में लाए बिना देख सकते हो, तब घनिष्ठ संबंधों के साथ प्रयत्न कर सकते हो।
धीरे- धीरे व्यक्ति कुशल हो जाता है। यह बिलकुल तैरने जैसा है. शुरू-शुरू में तुम डरते हो और तुम विश्वास ही नहीं कर सकते कि तुम कैसे बचोगे। और तुम इतने लंबे समय से मन के साथ काम करते आ रहे हो तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम मन के बिना एक क्षण भी जी सकते हो। लेकिन प्रयास करो।
और जितना तुम मन को एक तरफ रखते हो उतना अधिक प्रकाश तुम पर घटित होगा, क्योंकि जब सपने नहीं होते द्वार खुले होते हैं खिडकियां खुली होती हैं, और आकाश तुम तक पहुंचता है और सूर्य उदय होता है, और यह ठीक हृदय तक आता है, प्रकाश तुम तक पहुंचता है। जैसे जैसे सपने और- और कम होने लगते हैं, तुम सत्य से और-और परिपूरित होने लगते हो।
और जब तुम जागे हुए हो, अगर सपने दिखाई देना बंद हो जाते हैं, तो धीरे- धीरे जब तुम नींद में होते हो, तो भी सपने दिखने बंद हो जाते हैं क्योंकि सपना एक अटूट चक्र है। अगर यह कहीं से टूट जाता है तो धीरे- धीरे सारा घर विलीन हो जाता है। तुम एक ईंट बाहर निकालते हो और पूरे मकान की खंडहर हो जाने की शुरुआत हो चुकी होती है।
अगर दिन के समय तुम चीजों को बिना सपनों के देख सको तो रात को भी कम से कम सपने दिखाई देंगे क्योंकि तुम्हारी रात दिन के प्रतिबिंब के सिवाय और कुछ नहीं, उसी का सातत्य है। जब दिन भिन्न होता है तो रात भी भिन्न हो जाती है। जब तुम जागे हुए हो और जागने से अभिप्राय है कि जब तुम सपने नहीं देख रहे, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम आंखें खोल कर बैठे हो...।
जीसस अपने शिष्यों से निरंतर कहते हैं ' जागो!' क्या वे उनके सामने हमेशा सोए रहते थे, लगातार? क्योंकि वे प्रतिदिन कहते हैं ' जागो!' बुद्ध प्रतिदिन अपने शिष्यों को उपदेश देते हैं ' जागो!' क्यों? उनकी आंखें खुली थीं वे तुम्हारी ही तरह सतर्क थे लेकिन बुद्ध और जीसस निरंतर कहते हैं ' जागो!' उनका अभिप्राय है, ' सपने मत देखो, बस यहां होओ। कहीं और मत जाओ। स्मृतियों में अतीत में तुम सपने देखते हो; और तुम सपने देखते हो भविष्य में, कल्पना में। यहीं और अभी होओ- केवल तभी सपने नहीं होते।
वर्तमान में कोई सपना नहीं होता है। वर्तमान में कोई मन नहीं होता है। वर्तमान में तुम होते हो और सत्य होता है। और तुम्हारे और सत्य के बीच कोई अंतराल नहीं होता- क्योंकि दोनों सत्य हैं और बीच में कोई सीमा नहीं होती। तुम सत्य में पिघल जाते हो और सत्य तुम में द्रवित हो जाता है। तुम ब्रह्म हो जाते हो और ब्रह्म तुम हो जाता है। स्वप्न देखने की प्रक्रिया ने तुम्हारे चारों ओर घेरा बंदी कर रखी है बहुत अदृश्य लेकिन सूक्ष्म, शक्तिशाली...।
अब इस सूत्र में प्रवेश करने का प्रयत्न करो:

शांति और अशांति भ्रांति के परिणाम है;
बुद्धत्व के साथ कोई पसंदगी और नापसंदगी नहीं होती।

तुम क्यों पसंद करते हो और तुम क्यों नापसंद करते हो? ऐसा कैसे होता है कि कोई विशेष वस्तु तुम्हें अच्छी लगती है और कोई वस्तु तुम्हें अच्छी नहीं लगती? यह विभाजन कैसे होता है?
क्या कभी तुमने पसंदगी और नापसंदगी की प्रक्रिया में प्रवेश किया है? यह प्रवेश करने योग्य है। तुम कहते हो ' मैं इस व्यक्ति को चाहता हूं और उस व्यक्ति को नहीं चाहता हूं।क्यों? और अचानक एक दिन तुम इस व्यक्ति को पसंद नहीं करते हो और उस व्यक्ति को पसंद .करने लगते हो। क्यों? प्रक्रिया क्या है? तुम क्यों किसी व्यक्ति को पसंद करते हो?
तुम एक व्यक्ति को पसंद करते हो अगर वह तुम्हारे अहंकार को पुष्ट होने देता है! अगर वह व्यक्ति पर्दा बन जाता है और तुम्हें स्वप्न देखने में सहायता करता है, तो तुम उस व्यक्ति को पसंद करते हो। तुम उस व्यक्ति को पसंद करते हो जो तुम्हारे सपनों के साथ समायोजित हो जाता है। तुम उस व्यक्ति को पसंद नहीं करते अगर तुम्हारे सपनों के साथ उसका समायोजन ठीक नहीं बैठता अगर वह तुम्हें सपने देखने की अनुमति नहीं देता। बल्कि इसके विपरीत वह खलल डालता है। वह फिट नहीं बैठता है वह पर्दे का काम नहीं करता है। वह निष्क्रिय नहीं है वह सक्रिय हो जाता है- तुम पसंद नहीं करते। तुम निष्किय पर्दे को पसंद करते हो ताकि तुम जो भी सपना देखो दूसरा उसमें बस तुम्हारी मदद करे।
गुरजिएफ के महान शिष्य ऑस्पेस्की ने अपनी पुस्तक ' इन सर्च ऑफ दि मिरैकुलस ' अपने गुरु को इन शब्दों के साथ समर्पित की है ' उस व्यक्ति को जिसने मेरे सारे स्वप्न नष्ट कर दिए।लेकिन तुम उस व्यक्ति को पसंद नहीं करोगे जो तुम्हारे सारे सपने तोड़ दे। बल्कि ऑस्पेस्की को भी गुरजिएफ को छोड़ देना पड़ा और अंतिम वर्षों में वह फिर कभी उसे मिलने नहीं आया। वह स्वयं अपने तौर पर काम करने लगा। अंत में वह गुरजिएफ के शत्रु के रूप में मरा।
ऑस्पेस्की जैसे सजगता वाले व्यक्ति को भी जो यह अनुभव कर सका कि यह व्यक्ति सपनों को नष्ट करता है छोड़ कर जाना पड़ा। चाहे तुम्हें यह अच्छा न लगे... लेकिन जब कोई व्यक्ति वास्तव में तुम्हारे सपने नष्ट ही करता चला जाए, तो तुम्हें लगता है कि यह आदमी दुश्मन है।
एक असली सदगुरु सदा एक शत्रु की भांति प्रतीत होता है, और यही कसौटी है। झूठा गुरु हमेशा तुम्हें सपने देखने में मदद करता है वह तुम्हारे सपनों में कभी खलल नहीं डालता। बल्कि इसके विपरीत वह तुम्हें सांत्वना देता है नींद की दवा देता है। वह तुम्हें तसल्ली देता है तुम्हें शांत करता है। उसके उपदेश सुंदर लोरी के समान होंगे। वह तुम्हारे चारों ओर गीत गाएगा ताकि तुम अच्छी नींद सो सको, बस इतना ही।
लेकिन असली सदगुरु खतरनाक है। उसके निकट जाना खतरे से भरा है। तुम खुद जोखिम उठा कर जा रहे हो क्योंकि वह तुम्हें सपने नहीं देखने दे सकता और वह सपने देखने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता क्योंकि तब सारा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। वह नष्ट करेगा। और सपने तुम्हारे हृदय के बहुत निकट हैं। तुम सोचते हो, तुम्हारे सपने तुम्हारा हृदय हैं और जब स्वप्न नष्ट होते हैं तो तुम्हें लगता है कि तुम्हें ही नष्ट किया जा रहा है। यह ऐसा है जैसे कोई तुम्हारी हत्या कर रहा हो। हिंदू इस बात के प्रति सजग रहे हैं इसलिए वे कहते हैं एक असली गुरु मृत्यु के समान है।
जब तुम किसी सदगुरु के पास जाते हो तो तुम मृत्यु के पास जा रहे हो। तुम्हें मरना ही पड़ेगा, केवल इसलिए कि जब तक तुम मरते नहीं तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं हो सकता। जब तुम्हारे सपने नष्ट हो जाते हैं सत्य अस्तित्व में आता है सत्य प्रकट हो जाता है।
तुम एक व्यक्ति को पसंद करते हो, क्योंकि वह तुम्हारे अहंकार का समर्थन करता है। तुम एक लड़की को पसंद करते हो क्योंकि वह कहती है तुम पूर्ण पुरुष हो।
एक बार मैंने दो युवा प्रेमियों को बात करते सुना। वे समुद्र के निकट बैठे थे और बड़ी बड़ी लहरें उठ रही थीं और गिर रही थीं। और लड़के ने कहा: सुंदर लहरों उठती रहो, उठती रहो और- और बड़े और-और बड़े और- और बड़े आकार में। और वे और- और बड़ी से बड़ी होती गईं।
और लड़की ने कहा आश्चर्यजनक! समुद्र तुम्हारी आशा मानता है।
तुम ऐसे व्यक्ति को पसंद करोगे। और अगर कोई तुम्हारे अहंकार की सहायता करता है तो तुम बदले में उसके अहंकार की सहायता करने के लिए तैयार होते हो।
तुम किसी व्यक्ति को तभी पसंद करते हो जब सब ठीक-ठाक रहता है। यह परस्पर समझौता है। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने हिसाब से चलने लगता है, या कुछ ठीक नहीं बैठता, या वह जिद्दी हो जाता है, या वह तुम पर मालकियत करना आरंभ कर देता है, या वह तुम पर अपना अधिकार जताने लगता है, या वह तुम्हारे अहंकार को चोट पहुंचाने लगता है.
और यह होने ही वाला है क्योंकि वह व्यक्ति तुम्हें इसलिए पसंद नहीं करता कि तुम्हारा अहंकार पुष्ट होता है- वह व्यक्ति तुम्हें पसंद करता है क्योंकि उसका अपना अहंकार पुष्ट होता है। वह तुम्हें चाहता है अपने स्वयं के अहंकार के कारण और तुम उसे चाहते हो क्योंकि तुम्हारा अपना अहंकार पुष्ट होता है। तुम्हारे उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। इसलिए इस तरह की व्यवस्था हमेशा नहीं चल सकती। और तुम्हारे इरादे केवल भिन्न ही नहीं हैं वे परस्पर विरोधी हैं क्योंकि एक ही मालिक हो सकता है और दोनों ही मालिक होने का प्रयत्न कर रहे हैं।
शुरू-शुरू में वे दोनों बहुत मधुर होंगे क्योंकि दोनों एक-दूसरे की सीमाओं से अनजान होते हैं। धीरे- धीरे जब सब व्यवस्थित होने लगता है वे और अधिक कठोर, कब्जा जमाने वाले मालकियत करने वाले, एक-दूसरे के प्रति और अधिक आक्रामक हो जाएंगे। और फिर तुम नापसंद करना शुरू कर देते हो। तुम एक प्रकार से उस व्यक्ति से घृणा करने लगते हो जो तुम्हारी श्रेष्ठता को नीचे उतारने का प्रयत्न करता है। तुम उस व्यक्ति से प्रेम करते हो जो तुम्हें श्रेष्ठ समझता है।
अहंकार निरंतर हीनता की ग्रंथि से पीड़ित रहता है। इसी कारण पुरुष इस स्त्री से, उस स्त्री से, हजारों स्त्रियों से प्रेम करना चाहेगा। हो सकता है वह डॉन जुआन बन जाए, क्योंकि हर बार केवल आरंभ में, स्त्री सहायता करती है। यह तो एक चाल है, स्त्रैण कौशल है। केवल आरंभ में ही स्त्री सहायता करती है। जैसे ही उसे लगता है कि अब तुम दूर नहीं जा सकते, तुम पकड़ में आ गए, वह तुम पर मालकियत करना आरंभ कर देती है। तुम बहुत सी स्त्रियों को जीतना चाहते हो, लेकिन बस शुरू-शुरू में ही। तुम देखते हो सभी प्रेम संबंध प्रारंभ में ही सुंदर होते हैं। अंत तक सुंदर रहने वाला प्रेम संबंध खोज पाना बहुत कठिन है, विरला है। अगर तुम ऐसा खोज पाओ तब तुम जान लेते हो कि यह संबंध वास्तव में प्रेम संबंध था।
अंत ही उसे सिद्ध करेगा आरंभ नहीं क्योंकि आरंभ में सभी प्रेम संबंध सुंदर होते हैं लेकिन बस आरंभ में ही- क्योंकि दोनों कूटनीतिज्ञ हैं दोनों ही अपना खूबसूरत मोहक चेहरा एक-दूसरे को दिखा रहे है यह बस विक्रय-कला का एक हिस्सा है। लेकिन जब माल बिक जाता है तब चेहरे बदल जाते हैं तब वास्तविक रूप सामने आता है, तब आक्रामक अहंकार अपना काम करना शुरू करता है। वही वास्तविक चीज है जो अंत में आती है।
वास्तविक चीज अंत में प्रकट होती है आरंभ में कभी नहीं क्योंकि शुरू-शुरू में दोनों निकट आने और घनिष्ठ होने की चेष्टा कर रहे होते हैं। एक बार निकट आ गए, जब ऐसा लगता है कि सब ठीक है तब असली चीज फूट कर बाहर निकल आएगी।
तुम किसी व्यक्ति को क्यों पसंद करते हो? किसी वस्तु को तुम क्यों पसंद करते हो? व्यक्तियों को तो एक तरफ रखो- तुम किसी वस्तु को क्यों पसंद करते हो? वस्तुएं भी तुम्हारे अहंकार की सहायता करती हैं। अगर तुम्हारा पड़ोसी बड़ी कार खरीदता है तो तुम्हें भी बड़ी कार खरीदनी पड़ेगी क्योंकि यह प्रश्न कार का नहीं है। अधिक छोटी कार और भी आरामदेह हो सकती है आधुनिक यातायात के और भी अनुकूल हो सकती है, छोटी कार के साथ कम कष्ट होता है। बड़ी कार बड़ी मुसीबत, अधिक महंगी है, और तुम उसे खरीदने में असमर्थ हो सकते हो- लेकिन अगर पड़ोसी ने बड़ी कार खरीदी है तो तुम्हें भी बड़ी कार ही खरीदनी है। तुम यही पसंद करते हो। तुम्हें यह क्यों पसंद है? तुम्हारी सभी रुचियां तुम्हारे अहंकार से आती हैं) बड़ी कार की प्रतिष्ठा है।
ऐसा हुआ एक बार मुल्ला नसरुद्दीन के बीस ने उसे अपने ऑफिस में आने को कहा। और वह बहुत गुस्से में था। उसने उसे दरी पर बिठाया और कहा नसरुद्दीन, यह बहुत ज्यादती है! मैं समझता हूं कि कल रात ऑफिस पार्टी के बाद तुमने एक पहिए वाला ठेला लिया और उस एक पहिए वाले ठेले पर तुम नगर के मुख्य बाजार में गए। क्या तुम्हें यह खयाल नहीं आता कि ऐसे ढंगों से कंपनी की प्रतिष्ठा खो जाएगी।
नसरुद्दीन ने कहा मुझे इस बारे में एक विचार भी नहीं आया, क्योंकि आप उस ठेले में खड़े थे। हम दोनों ही नशे में धुत थे इसलिए मैंने सोचा कि इसमें प्रतिष्ठा का कोई प्रश्न ही नहीं है- बीस भी ठेले में हैं इसलिए मैं मुख्य बाजार में घूमने चला गया। सब
प्रसन्न थे और लोगों ने इसका खूब मजा लिया।
प्रतिष्ठा- तुम प्रतिष्ठा को केवल तभी भूल पाते हो, जब तुम नशे में होते हो, तब तुम वे काम करते हो जो मूढतापूर्ण हैं। लेकिन इस बात को समझना अच्छा है। तब प्रतिष्ठा अवश्य ही शराब की तरह होनी चाहिए क्योंकि जब तुम नशे में होते हो, तुम उसे भूल जाते हो। वैसे तो तुम हमेशा प्रतिष्ठा, मान-सम्मान की खोज में ही रहते हो।
तुम किसी वस्तु को पसंद करते हो क्योंकि यह प्रतिष्ठा देती है। तुम्हें मकान पसंद है क्योंकि यह तुम्हें गौरव प्रदान करता है। यह भले ही अनुकूल न हो, तुम्हें सुख-सुविधा न देता हो। आधुनिक फर्नीचर को देखो-बिलकुल भी आरामदेह नहीं है लेकिन अपने घर में पुराना फर्नीचर कौन रखना चाहेगा? आधुनिक बेहतर है पुराने से अधिक असुविधाजनक लेकिन यह आधुनिक है। यह प्रतिष्ठा देता है। जो कुछ भी प्रतिष्ठा देता है वह मादक है वह तुम्हें नशा देता है। तुम्हें लगता है तुम शक्तिशाली हो।
लेकिन यह शक्ति की ललक क्यों है? और स्मरण रहे अगर तुम शक्ति के लिए लालायित हो तो तुम सत्य तक कभी नहीं पहुंचोगे। कभी-कभी तुम शक्ति के लिए परमात्मा का द्वार भी खटखटाते हो लेकिन तब तुम गलत द्वार पर दस्तक दे रहे हो। लेकिन केवल वे जो यह भलीभांति जानते हैं कि शक्ति शक्ति की खोज विक्षिप्तता है पागलपन है वे ही उस द्वार तक पहुंच सकते हैं।
तुम अहंकार के अनुसार पसंद और नापसंद करते हो। अगर अहंकार न हो तो पसंद और नापसंद कहां होंगे? वे बस खो जाएंगे। तुम्हारे पास विभाजन करने वाला वह मन ही नहीं होगा जो हमेशा पसंद करता है और नापसंद करता है और विकल्प सामने खड़े कर देता है। जब तुम स्वयं के साथ सुख से हो... और अहंकार कभी अपने साथ विश्रांति में नहीं होता। वह तो एक सतत बेचैनी है क्योंकि अहंकार को चारों ओर देखना पड़ता है और वहां लाखों लोग हैं।
कोई और बड़ी कार खरीदता है तब क्या किया जाए? कोई जाता है, और भी सुंदर पत्नी पा लेता है, तब क्या किया जाए? कोई तुमसे अधिक स्वस्थ है तब क्या किया जाए? किसी की आंखें तुम से अधिक सुंदर हैं तब क्या किया जाए? कोई अधिक प्रतिभाशाली है अधिक होशियार है, किसी के पास अधिक धन है। और तुम्हारे चारों ओर लाखों लोग हैं और तुम्हारी सबके साथ प्रतियोगिता है। तुम पागल हो जाओगे। यह असंभव है। तुम्हारे लिए कभी वह क्षण नहीं आएगा जब तुम संतोष अनुभव कर सको? वह क्षण कैसे संभव है? यहां तक कि सम्राट भी...
मैंने सुना है एक बार ऐसा हुआ नेपोलियन दीवाल पर टंगी एक तस्वीर तक पहुंचने का प्रयत्न कर रहा था। तस्वीर ठीक तरह से नहीं टंगी थी, वह उसे ठीक करना चाहता था लेकिन वह उस तक पहुंच नहीं पा रहा था क्योंकि नेपोलियन एक छोटा आदमी था बस पांच फीट पांच इंच! उसका अंगरक्षक लगभग सात फीट लंबा था उसका हाथ तुरंत वहां तक पहुंच गया और उसने तस्वीर ठीक से टांग दी। लेकिन सिकंदर को चोट पहुंची उसे बहुत चोट पहुंची।
अंगरक्षक ने कहा. श्रीमान, आपको जब भी ऐसा कुछ करना हो मुझे बता दें। मैं आपसे ऊंचा हूं।
नेपोलियन ने कहा. ऊंचा? नहीं! लंबा, लेकिन ऊंचा? नहीं!
और जब भी नेपोलियन अपने से लंबा कोई व्यक्ति देखता- और उसे देखना ही पड़ता, क्योंकि कई सिपाही उससे लंबे थे- उसे बहुत चोट पहुंचती थी।
तुम्हारे पास सारा संसार हो सकता है, लेकिन एक भिखारी तुमसे लंबा हो सकता है और तब सारा संसार खो जाता है, तुम कुछ भी नहीं हो। तुम भले ही सम्राट हो जाओ लेकिन एक भिखारी तुमसे बेहतर गा सकता है। तुम्हारे पास सब-कुछ नहीं हो सकता। जो भी तुम्हारे पास है वह तुम्हें संतोष नहीं देता है। मन, अहंकार हमेशा असंतुष्ट रहता है। पसंद और नापसंद अहंकार के कारण है और अहंकार बहुत दुख भोगता है। जब अहंकार नहीं होता पसंद और नापसंद का प्रश्न ही नहीं उठता। तुम इस जगत में हवा के समान विचरण करते हो। तुम चुनाव नहीं करते कि मैं उत्तर दिशा की ओर जा रहा हूं तुम्हारी कोई पसंद नहीं कोई नापसंद नहीं। जहां भी प्रकृति ले जाती है, तुम विश्रांति से चले जाते हो। अगर प्रकृति का प्रवाह उत्तर की ओर है, हवा उत्तर की ओर बहती है। अगर प्रकृति बदलती है और दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है तो हवा दक्षिण की ओर बहना शुरू कर देती है। उसका अपना स्वयं का कोई चुनाव नहीं होता।
ताओ के व्यक्ति का अपना स्वयं का कोई चुनाव नहीं होता। जहां भी नदी उसे ले जाए वह उसके साथ चला जाता है। वह कभी नदी को धक्का नहीं देता, वह कभी उसके साथ संघर्ष नहीं करता। उसका कोई चुनाव नहीं होता उसकी कोई पसंद और नापसंद नहीं होती। तुम्हें ऐसा भी लग सकता है कि उसकी पसंद और नापसंद होती है, क्योंकि तुम समझ नहीं सकते। तुम्हें ऐसा लग सकता है कि यह बादल उत्तर दिशा की ओर जा रहा है? तुम व्याख्या कर सकते हो कि यह बादल उत्तर दिशा की ओर जा रहा है क्योंकि यह उसकी मर्जी है उसने उत्तर दिशा की ओर जाने का चुनाव किया है। लेकिन तुम गलत हो, बादल का कोई चुनाव नहीं है। वह कहीं जाने के लिए बाध्य नहीं है, उसकी कोई नियति नहीं है। वह बस गतिमान है क्योंकि सारी प्रकृति उसी ढंग से चल रही है। उसने इसे नहीं चुना है। चुनाव का अधिकार परम सत्ता के पास है; पसंद नापसंद करना परम सत्ता की मर्जी है, यह उसका काम बिलकुल नहीं है। वह निश्चित है। और जहां भी बादल पहुंच जाए वही मंजिल है कोई पूर्व-निर्धारित लक्ष्य नहीं है; जहां भी वह पहुंच जाए वही लक्ष्य है। फिर तुम जहां भी हो संतुष्ट हो।
लेकिन मन अपने नियमों के अनुसार व्याख्या करता चला जाएगा। अगर तुम किसी बुद्ध के पास आते हो तुम्हें लगता है उसकी अपनी रुचियां और अरुचियां है, और तुम गलत होओगे क्योंकि तुम अपने मन के अनुसार उसकी व्याख्या करोगे। कभी वह उत्तर दिशा की ओर जा रहा होगा और तुम कहोगे कि उसने चुना होगा, अन्यथा क्यों? क्यों उत्तर की ओर जा रहा है? कभी वह किसी एक व्यक्ति पर तुमसे अधिक ध्यान दे रहा होगा तुम सोचोगे कि जरूर उसने चुनाव किया होगा ' क्यों? अन्यथा वह मुझ पर भी उतना ध्यान क्यों नहीं दे रहा है?' और मैं तुमसे कहता हूं. उसने चुनाव नहीं किया है, यह बस पूर्ण ब्रह्म है जो निर्णय करता है। वह निर्णायक नहीं है वह बादल के समान है।
अगर वह किसी पर अधिक ध्यान दे रहा है उसका बस इतना ही अर्थ है कि ध्यान बादल की भांति गति करता है। हो सकता है उस व्यक्ति को अधिक आवश्यकता हो हो सकता है वह व्यक्ति अधिक खाली हो और ध्यान को अधिक आकर्षित करता हो। ऐसे ही जैसे तुम जमीन में एक गड़ा खोदते हो वह पानी को अपनी ओर आकर्षित करता है क्योंकि पानी नीचे की ओर बहता है। अगर वह व्यक्ति अधिक ध्यानपूर्ण है बुद्धपुरुष अधिक ध्यान देगा- लेकिन याद रहे वह दे नहीं रहा, उसे आकर्षित किया
गया है। यह एक साधारण प्राकृतिक घटना है। वह उसका चुनाव नहीं है या उसकी रुचि और अरुचि नहीं है।
बुद्ध ने महाकश्यप को मौन-संदेश दिया। उन्होंने एक फूल दिया, और तब किसी ने पूछा ' लेकिन महाकश्यप को ही क्यों दूसरों को क्यों नहीं?' क्योंकि वहां उससे अधिक अन्य सम्मानित शिष्य भी थे। सारिपुत्र वहां था और वह सबसे बड़े मुख्य शिष्यों में से एक था, देश भर में उसकी ख्याति थी। वह अपने आप में एक सदगुरु था। जब वह बुद्ध के पास समर्पण करने के लिए आया था उसके साथ पांच सौ शिष्य थे। उन सभी ने समर्पण कर दिया था क्योंकि उनके गुरु ने समर्पण कर दिया था। और वह एक प्रसिद्ध विद्वान था। सारिपुत्र को क्यों नहीं?
आनंद को क्यों नहीं, जो छाया की भांति चालीस वर्ष तक उनके साथ रहा, दास की भांति हर प्रकार से बुद्ध की सेवा की, और जो बुद्ध का भाई था उसी राजवंश से था? आनंद को क्यों नहीं? मोदग्गलान को क्यों नहीं जो दूसरा प्रसिद्ध विद्वान था और जिसे हजारों लोग सम्मान देते थे?
और महाकश्यप को ही क्यों जिसे कोई जानता भी न था जो अनजाना व्यक्ति था? किसी ने उसके बारे में कभी सोचा भी न था और इस घटना के सिवाय और कुछ भी किसी को ज्ञात नहीं है-कि एक सुबह बुद्ध फूल लिए हुए आए और मौन खड़े रहे फूल को देखते हुए, मौन बैठ गए फूल को देखते रहे और कुछ भी नहीं कहा। लोग विचलित और बेचैन हो गए क्योंकि वे प्रवचन सुनने आए थे। और तब महाकश्यप हंसा और बुद्ध ने उसे बुलाया और फूल दिया और सभा को कहा ' जो कुछ भी कहा जा सकता है वह सब मैंने तुम्हें दे दिया है और जो कहा नहीं जा सकता वह मैं महाकश्यप को देता हूं।
केवल यही एक प्रसंग है जो महाकश्यप के बारे में ज्ञात है। इससे पहले वह कुछ नहीं था इसके पश्चात उसके बारे में कुछ भी लिखा नहीं गया। महाकश्यप को क्यों?
यह चुनाव नहीं है, क्योंकि अगर यह चुनाव होता तो सारिपुत्र को मिल गया होता। यह पसंद करना नहीं है, क्योंकि यदि यह प्रश्न पसंद करने का सवाल होता तो आनंद को मिल गया होता। बुद्ध ने कहा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। महाकश्यप ही अकेला ऐसा व्यक्ति था जो उसे ग्रहण कर सकता था, केवल वही था जो मौन था और जिसने समझा था। ऐसा कहा जाता है कि बुद्ध ने कहा ' अगर वह न भी हंसा होता तो भी मैं वहां जाता और उसे देता क्योंकि इस भरी सभा में केवल वही रिक्त था, शून्य था। यहां बहुत से महापंडित हैं लेकिन वे अपने पांडित्य से भरे हुए हैं। आनंद यहां है लेकिन वह मेरे प्रति अत्यधिक प्रेम और आसक्ति से भरा है। यह महाकश्यप बस खाली है, एक खाली घर
वह मिट चुका है।
उसने बादल को आकर्षित किया। लेकिन शिष्यों की प्रवृत्ति को देखो उन्होंने अवश्य सोचा होगा कि जरूर कुछ बात होगी ' बुद्ध का महाकश्यप से इतना लगाव क्यों है? उन्होंने हमें वह क्यों नहीं दिया जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता? उन्होंने महाकश्यप को सर्वश्रेष्ठ क्यों बना दिया?'
लेकिन स्मरण रहे ताओ का व्यक्ति एक बुब्दरुष, बस बादलों के समान तैरता है। उसकी कोई रुचि नहीं कोई अरुचि नहीं क्योंकि उन सबका संबंध स्वप्नदर्शी मन के साथ है, स्वप्नदर्शी अहंकार के साथ है।

शांति और अशांति भ्रांति के परिणाम हैं;
बुद्धत्व के साथ कोई पसंदगी और नापसंदगी नहीं होती।
सभी द्वैत निष्कर्ष से आते हैं।
वे ऐसे हैं जैसे कि सपने या आकास- कुसुम;
उन्हें पकड़ने की चेष्टा करना मुड़ता है।
लाभ और हानि, उचित और अनुचित,
अंत में ऐसे विचार तत्काल समाप्त कर देने चाहिए।

इस ' तत्काल ' शब्द को स्मरण रखना जरूरी है। इसे अपने भीतर गहरे में प्रवेश करने दो, क्योंकि चीजों को दो ढंगों से किया जा सकता है धीरे- धीरे या तुरंत। अगर तुम उन्हें धीरे- धीरे करते हो तो तुम उन्हें कभी न कर पाओगे क्योंकि अगर तुम उन्हें धीरे- धीरे करते हो तो वे लटक जाएंगी।
उदाहरण के लिए तुम क्रोधित हो और तुम अपने क्रोध के बारे में चिंतित हो। यह एक पुरानी आदत हो गई है और तुम कहते हो ' बाद में धीरे- धीरे मैं इसे छोड़ दूंगा।तुम इसे बाद में धीरे- धीरे कैसे छोड़ सकते हो? क्योंकि इस बीच तुम उसका अभ्यास कर लोगे और जितना अधिक तुम अभ्यास करते हो उतना ही वह पक्का हो जाता है। तुम कहते हो वक्त चाहिए। तो तुम क्या करोगे?
ज्यादा से ज्यादा तुम उसे और परिष्कृत और सुसंस्कृत कर लोगे। हो सकता है कोई तुम्हारे क्रोध के बारे में जान न पाए तुम उसे छिपा सकते हो। लेकिन तुम समय के साथ क्या करोगे? अगर तुम समझ गए हो कि वह गलत है तब क्यों कहो कि धीरे- धीरे? तुरंत क्यों नहीं? अगर समझ में आ गया है कि कुछ गलत है क्यों समय लेना? और अगर समझ में नहीं आया, तो बिना समझे तुम इसे धीरे- धीरे कैसे करोगे? और तब तक क्रोध आता रहेगा और तुम्हें इसकी और अधिक आदत हो जाएगी।
ज्यादा से ज्यादा तुम थोड़ा संशोधित कर सकते हो, लेकिन संशोधित क्रोध अक्रोध नहीँ होगा वह फिर भी क्रोध ही रहेगा। तुम सूक्ष्म रूप से संशोधित कर सकते हो- वह वहां होगा। हो सकता है वह बिलकुल विपरीत रूप लेने लगे परंतु वह वहां होगा। हो सकता है कोई उसे पहचान न पाए लेकिन तुम्हें हमेशा पता होगा कि वह है।
नहीं समझ हमेशा तुरंत आती है। या तो तुम समझ जाते हो या नहीं समझते। अगर तुम समझे ही नहीं तो तुम कैसे कुछ छोड़ पाओगे? अगर तुम समझते हो तो धीरे- धीरे क्यों? अगर तुम समझते हो तो अभी इसी समय तत्काल छोड़ देते हो।
एक बार एक व्यक्ति फूल हाथ में लिए बुद्ध के पास आया। बुद्ध ने फूलों को देखा और कहा ' इन्हें छोड़ दो।
तब उसने फूलों को बाएं हाथ से छोड़ दिया। उसने सोचा, हो सकता है बुद्ध के लिए बाएं हाथ में फूल लाना गलत हों--क्योंकि बायां हाथ गलत माना जाता है। दायां ठीक है और बायां गलत है और तुम बाएं हाथ से नहीं देते हो। तो उसने स्वय को दोषी समझते हुए उनको छोड़ दिया।
बुद्ध हरसे और कहा छोड़ दो! तो उसे उन फूलों को दाएं हाथ से भी गिरा देना पड़ा, लेकिन तब वह उलझन में पड़ गया।
और जब दोनों हाथ खाली थे बुद्ध जोर से हंसे और कहा छोड़ दो! अब छोड़ देने के लिए कुछ भी न था। इसलिए वह इधर-उधर देखने लगा- क्या करे?
आनंद ने कहा बुद्ध का यह अभिप्राय कभी न था कि फूलों को छोड़ दो। जो फूलों को लाया है उसे छोड़ना है। फूलों को छोड़ देने से कुछ नहीं होगा। स्वयं को ही क्यों न छोड़ दो?
वह आदमी समझ गया और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। वह फिर कभी अपने महल में वापस नहीं लौटा।
प्रधानमंत्री आया और उसने कहा आप यह क्या कर रहे हैं? अगर आप त्याग करना चाहते हैं तो हमको थोड़ा समय दीजिए ताकि सब व्यवस्थित हो जाए। वापस चलिए। आपकी पत्नी, आपके बच्चे और आपका सारा राज्य और राजकार्य- हमें थोड़ा समय दीजिए। यदि आपने त्याग देने का निश्चय कर भी लिया है, तो भी इतनी जल्दी क्या है?
उस व्यक्ति ने कहा जब तुम समझ जाते हो, तब वह हमेशा तुरंत होता है। अगर तुम समझे नहीं, तो उसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिया जाता है।
केवल मूढ़ता स्थगित करती है और मुड़ता स्थगित करके बहुत बड़ी चाल चलती है। तब तुम्हें लगता है कि तुम समझ गए तो हो लेकिन उसे तत्काल कैसे कर सकते हो? तुम उसे धीरे- धीरे करोगे- यह कभी न करने की चाल है। यह चालाकी है ' मैं इसे कल करूंगा।
देखो जब तुम क्रोधित हो तो तुम तक्षण क्रोध करते हो लेकिन अगर तुम प्रेममय अनुभव करते हो तो तुम स्थगित कर देते हो। अगर तुम किसी को उपहार देना चाहते हो तो स्थगित करते हो, लेकिन अगर क्रोध करना चाहते हो तो उसी समय करते हो- क्योंकि तुम भलीभांति जानते हो कि अगर स्थगित किया तो फिर कभी नहीं किया जाता। स्थगन एक चाल है। इसलिए भीतर गहरे में तुम जानते हो कि उसे करने की कोई आवश्यकता नहीं है, और ऊपर-ऊपर से तुम यह विश्वास बनाए रख सकते हो कि मैं इसे अवश्य करूंगा। इसलिए तुम स्वयं को धोखा देते हो।
सोसान कहता है:

अंत में ऐसे विचार तत्काल समाप्त कर देने चाहिए।

समय मत दो! अगर कुछ गलत है, उसे देखो और छोड़ दो। वास्तव में इसे छोड़ने की जरूरत नहीं है। अगर तुम उसे देख पाओ, और तुम्हें लगे कि वह गलत है वह अपने आप से ही छूट जाएगा। तुम उसे ढो नहीं पाओगे।
तुम उसे ढोते हो क्योंकि तुम नहीं मानते कि यह गलत है। अगर तुम नहीं मानते तो यह कहना बेहतर है, ' मैं नहीं मानता कि यह गलत है। इसलिए मैं इसे खेऊंगा।कम से कम तुम ईमानदार तो रहोगे और ईमानदारी अच्छी है। बेईमान मत बनो।
लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, ' हां मैं जानता हूं लोभ बुरा है लेकिन धीरे- धीरे.. ' लेकिन कैसे, क्या कभी किसी ने लोभ को धीरे- धीरे छोड़ा है? तब तक उसकी जड़ें तुम में और गहरी चली जाती हैं। और यदि तुम उसे शीघ्र छोड़ नहीं सकते तो क्यों कहते हो कि लोभ बुरा है? कहो मुझे नहीं लगता कि यह गलत है मुझे यह अच्छा लगता है। जब मुझे लगेगा कि यह गलत है मैं इसे छोड़ दूंगा।कम से कम तुम ईमानदार और निष्ठावान तो हो और एक ईमानदार आदमी समझ तक पहुंच जाएगा। एक बेईमान आदमी कभी समझ तक नहीं पहुंच सकता।
तुम सभी कहते हो क्रोध बुरा है- तब इसकी क्यों ढोते हो? कौन तुम्हें इसे अपने पास रखने के लिए विवश कर रहा है? शान रूपांतरण है। अगर तुम सच में जानते हो कि क्रोध बुरा है तब तुम इसे एक पल के लिए भी पास नहीं रखोगे तुम तुरंत इसे छोड़ दोगे। यह आकस्मिक है इसे घटने में समय नहीं लगता एक क्षण भी नहीं खोता। लेकिन तुम चालाक हो तुम सोचते हो कि तुम जानते हो और तुम जानते नहीं हो। तुम यह मान लेना चाहते हो कि तुम जानते हो और तुम विश्वास कर लेना चाहते हो कि तुम धीरे- धीरे स्वयं को बदलने की चेष्टा कर रहे हो। तुम कभी नहीं बदलोगे।
रूपांतरण कभी धीरे- धीरे नहीं होता वह सदा तक्षण होता है।
एक जैन कहानी है एक आदमी दिन भर काम करने के बाद थका-मांदा घर आया। उसकी पत्नी उसे स्नान करवा रही थी- यह पुरानी कहानी है अब तो कोई पत्नी पति को स्नान नहीं करवाती। उसकी पत्नी उसे स्नान करवा रही थी और जब उसके शरीर पर पानी डाल रही थी और उसके थके अंगों को शीतल कर रही थी वह साथ-साथ बातें भी कर रही थी और उसने कहा. मेरा भाई महावीर का अनुयायी हो गया है, और वह संसार-त्याग का विचार बना रहा है।
वह आदमी हंसा और बोला सोच रहा है? फिर तो वह संसार को कभी नहीं छोड़ेगा पत्नी को चोट पहुंची क्योंकि यह उसके भाई का सवाल था। उसने कहा. आपका क्या मतलब है? और मैंने आपको महावीर या बुद्ध या किसी और के पास जाते नहीं देखा, और आप समझते हैं कि आप जानते हैं? वह महापंडित है और महावीर जो कहते हैं वह समझता है। और वह ध्यान करता है पूजा करता है और वह एक धार्मिक व्यक्ति है। और आप? आपमें मुझे कोई धार्मिकता दिखाई नहीं देती। मैंने आपको कभी ध्यान करते या प्रार्थना करते नहीं देखा है। और आप ऐसी बात कहने का साहस रखते हैं कि वह कभी
त्याग नहीं करेगा?
वह व्यक्ति खड़ा हो गया.. वह नग्न था, स्नान कर रहा था-स्नानागार से बाहर आया गली में निकल गया। पत्नी चिल्लाई क्या आप पागल हो गए हैं? आप यह क्या कर रहे हैं?

उसने कहा मैंने त्याग दिया है।
सभी स्वप्न समाप्त हो जाने चाहिए

फिर वह कभी नहीं लौटा। यह है आदमी- वह समझ गया। उसने कभी इसकी तैयारी न की थी किसी को उसके बारे में पता न था कि वह एक धार्मिक व्यक्ति था, लेकिन यह गुणवत्ता.. वह महावीर के पास गया उसने स्वयं को समर्पित किया वह एक नग्न फकीर हो गया।
पत्नी रोती-चिल्लाती हुई आई। पत्नी का भाई भी समझाने आया जल्दी नहीं है। मेरी तरफ देखो। मैं बीस वर्षों से सोच रहा हूँ। और तुम पागल हो- क्या त्याग करने का यह ढंग है?
उस आदमी ने कहा मुझे कोई परवाह नहीं है, क्या कोई और भी ढंग है? तुम बीस वर्षों से सोच रहे हो तुम बीस जन्मों तक सोचते रहोगे। जब कभी तुम त्याग करोगे इसी ढंग से करोगे क्योंकि केवल यही एक ढंग है- तुरंत।
तुम जिसे स्पष्ट देखते हो वह घट जाता है। प्रश्न स्पष्टता का है। वस्तु के स्वभाव में तत्काल एक नजर, फिर कहीं भविष्य में बदलने का प्रश्न ही नहीं रह जाता। भविष्य में कोई भी नहीं बदलता- रूपांतरण हमेशा यहां और अभी होता है। यही क्षण केवल एक क्षण है जिसमें कुछ घट सकता है। और दूसरा कोई क्षण नहीं है।

अगर आंख कभी नहीं सोती,
तो स्वभावत: सारे सपने समाप्त हो जाएंगे।
अगर मन कोई भेद नहीं करता,
दस हजार ची, जैसी वे है? एक ही तत्व की हैं।

' अगर आंख कभी नहीं सोती '... इन दो आखों को सोना पड़ता है क्योंकि वे शरीर के अंग हैं, और शरीर एक शाश्वत ऊर्जा नहीं है। वह एक मिश्रण है, यह एक मौलिक शक्ति नहीं है। बहुत से तत्व इसे जोड़ते हैं। वह एक यांत्रिक साधन है, एक जैव-यांत्रिकता है। यह लगातार ऊर्जा-पूर्ति पर निर्भर करता है भोजन, पानी, हवा। ऊर्जा बनती है, ईंधन बनता है और शरीर चलता है- वह एक यांत्रिकता है। तुम्हारी आंखें थक जाएंगी क्योंकि प्रत्येक यंत्र थक जाता है।
तुम यह जान कर हैरान होओगे कि हाल ही के कुछ वर्षों में एक बहुत बड़ी खोज हुई है कि मशीनों को भी आराम करना चाहिए। मशीनें! तुम ऐसा कभी भी न सोचते। मशीनें क्यों? उन्हें आराम की आवश्यकता नहीं। तुम एक कार को चौबीस घंटे तीस घंटे चलाते हो कार को आराम की जरूरत है। तुम उलझन में पड़ जाओगे। क्यों? कार मन नहीं है कार चेतना नहीं है। आराम क्यों? अगर सब कल-पुर्जे ठीक काम रहे हैं फिर तुम चलते चले जा सकते हो सिर्फ कार में ईंधन डलवाते जाओ।
तुम गलत हो। अब उपाय हैं यह जानने के कि कब कार थक गई है। और कार थक गई है क्योंकि प्रत्येक यंत्र-रचना थक जाने को बाध्य है। अगर तुम कार को कुछ घंटों के लिए गैरेज में छोड़ोगे ऐसे साधन हैं जो बताएंगे कि कब तुम्हारी कार फिर से चलने योग्य होगी।
प्रत्येक यांत्रिकता को विश्राम की आवश्यकता होती है। केवल तुम्हारे शरीर को ही नहीं-प्रत्येक यांत्रिकता को विश्राम की जरूरत होती है तब वह फिर से जीवंत हो जाता है। केवल चेतना को विश्राम की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह यंत्र-रचना नहीं है। उसे किसी ईंधन की जरूरत नहीं है। यह चिर स्थायी ऊर्जा है यह अनंत-ऊर्जा है यह अकारण ऊर्जा है। यह नित्य है शाश्वत है।
इसीलिए सोसान शब्द के एकवचन रूप का प्रयोग करता है ' अगर आंख कभी नहीं सोती... ' अन्यथा वह कहता, ' अगर आंखें।यह तीसरी औख है जिसके विषय में वह बात कर रहा है। जब तुम्हारा शरीर सोता है, तो तुमने देखा है? थोड़ा गौर से देखो, तुम जान पाओगे- तुम्हारे भीतर कुछ जागता रहता है। जब तुम गहरी नींद भी सो रहे होओ कुछ, तुम्हें भले ही बिलकुल स्पष्ट न हो लेकिन किसी बिंदु पर कहीं तुम्हारे भीतर साक्षी बना रहता है।
इसीलिए सुबह तुम कह पाते हो रात बहुत अच्छी नींद आई। अगर तुम वास्तव में सोए हुए हो कौन जानता है? तुम इसे कैसे जान सकते हो, क्योंकि तुम तो गहरी नींद में थे? सुबह यह बताने के लिए कि रात बहुत गहरी अच्छी और स्वप्नरहित नींद आई, कौन इसे देखता रहा? किसी दिन तुम कहते हो कि नींद ठीक से नहीं आई, सपने और सपने और सपने और मैं ठीक से सो नहीं पाया। कौन जानता है? - कोई लगातार देखता है।
यह तीसरी आंख है जो सदा खुली रहती है- पलक भी नहीं झपकती सदा खुली रहती है- अपलक। इसकी पलक ही नहीं है यह कभी बंद नहीं होती। तीसरी आंख मात्र प्रतीकात्मक है। तीसरी आंख का अर्थ है कि तुम्हारे भीतर शाश्वत दृष्टि है शाश्वत सतर्कता है शाश्वत साक्षी है जो कभी नहीं सोता। और क्योंकि वह कभी नहीं सोता इसलिए कभी स्वप्न नहीं देखता क्योंकि स्वप्न देखना निद्रा का अंग है। वह तीसरी आंख सत्य देख सकती है क्योंकि कोई निद्रा नहीं है कोई स्वप्न नहीं है।
तुम्हें अपने भीतर उस बिंदु को खोजना है और अन्वेषण करना है जो कभी नहीं सोता है। यही सारी खोज है, खोजी की सारी चेष्टा यही है। सत्य कहीं बाहर नहीं है। कुल प्रश्न यह है कि भीतर उस बिंदु को कैसे खोजें जो कभी नहीं सोता, जो कभी अचेतन नहीं होता जो सदा सतर्क है सजग है। वही तुम्हारे भीतर परमात्मा की किरण है।
और एक बार तुम सतत सजगता की उस किरण को खोज लेते हो तो उस किरण के द्वारा तुम स्रोत तक यात्रा कर सकते हो। वह स्रोत परमात्मा है। अगर तुम एक किरण को भी पकड़ पाओ तो तुम सूर्य तक पहुंच सकते हो आखिरी स्रोत तक। तुम्हें बस यात्रा करनी है- वही तुम्हारा साधन और तुम्हारा मार्ग बन जाता है।
भीतर साक्षी को पाकर तुमने मार्ग को पा लिया है। अब और-और और- और वह सजगता बनते जाओ। अपनी सारी ऊर्जा को सजगता की ओर गति करने दो। और जितना अधिक तुम सजग होते हो उतने ही सपने कम हो जाते हैं.. और-और कम होते जाते हैं। एक क्षण आता है अचानक तुम केवल साक्षी होते हो, मन मिट गया है। मन की सारी ऊर्जा तीसरी औख में विलीन हो गई है। दो आंखें तिरोहित हो गई हैं, अब तुम केवल साक्षी हो। यह स्व-साक्षी ही वह बिंदु है जहां से संसार मिट जाता है और परमात्मा प्रकट हो जाता है।

अगर आंख कभी नहीं सोती,
तो स्वभावत: सारे स्वप्न समाप्त हो जाएंगे।
अगर मन कोई भेद नहीं करता,
दस हजार चीजें, जैसी वे हैं एक ही तत्व की हैं।

और जब ' तुम ' एक हो स्मरण रहे, अभी तुम्हारे पास दो आंखें हैं, तुम्हारी दृष्टि भी दोहरी है। जीसस अपने शिष्यों से कहते हैं ' अगर तुम एक आंख हो गए हो तो सब- कुछ ठीक हो जाएगा।
शरीर में सब दो-दो हैं- दो आंखें दो कान दो हाथ, दो टांगें, दो गुर्दे- सब दो हैं, क्योंकि शरीर द्वैत है। तुम्हारे भीतर केवल एक चीज एक रूप में विद्यमान है और वह है साक्षी-आंख। वह शरीर का हिस्सा नहीं है क्योंकि शरीर में सदा दो हैं। हर चीज दो है, विभाजित। शरीर का अस्तित्व दो ध्रुवों के बीच में है।
तुम्हारे मस्तिष्क भी दो हैं तुम्हारे पास बायां और दायां अलग-अलग मस्तिष्क है और वे दोनों विभाजित हैं। अगर उनके बीच का सेतु टूट जाए और कभी-कभी ऐसा हो जाता है, तब एक व्यक्तित्व खंडित हो जाता है। कभी कोई रेलगाड़ी से गिर जाता है और
दाएं और बाएं मस्तिष्क के बीच का सेतु टूट जाता है- यह सेतु बहुत ही नाजुक है। तब वह व्यक्ति दो हो जाता है- फिर वह एक नहीं रह जाता है। फिर कभी वह ' ' और कभी ' ' हो जाता है, या कभी-कभी दोनों हो जाता है। और तुम समझ नहीं सकते कि वह क्या कर रहा है क्या हो रहा है। वह खंडित है।
दाएं हाथ से काम करने वाले व्यक्ति अपने बाएं मस्तिष्क का विकास करते हैं; बाएं हाथ से काम करने वाले व्यक्ति अपने दाएं मस्तिष्क का विकास करते हैं। इसलिए अगर बाएं हाथ से काम करने वाले को जबरदस्ती दाएं हाथ से काम करवाएंगे तो वह अनावश्यक रूप से मुसीबत में पड़ जाएगा, क्योंकि उसका बायां मस्तिष्क बिलकुल विकसित नहीं हुआ है। इसलिए वह लिखेगा... तुम कोशिश करो। आपमें से कुछ बाएं हाथ से काम करने वाले होंगे क्योंकि दस प्रतिशत लोग बाएं हाथ से काम करते हैं भले ही वे जानते हों या नहीं।
क्योंकि संसार में दाएं हाथ से काम करने वालों की प्रधानता है, क्योंकि वे निन्यानबे प्रतिशत हैं, बहुत से बच्चों को दाएं हाथ से लिखने के लिए लगातार विवश किया जाता है। वे व्यर्थ में ही कष्ट उठाते हैं, वे जीवन भर अल्पबुद्धि ही रह जाएंगे केवल इसलिए कि उन्हें मजबूर किया गया था। वे दाएं हाथ से काम करने वालों के साथ मुकाबला नहीं कर सकेंगे। उनका बायां मस्तिष्क ठीक से काम नहीं कर रहा है और अगर वे उससे काम करेंगे तो उन्हें कठिनाई होगी।
अगर तुम दाएं हाथ से काम करने वाले व्यक्ति हो तो बाएं हाथ से लिखने का प्रयत्न करो। तुम छोटे बच्चों की भांति लिखोगे। क्यों? क्योंकि वह भाग छोटे बच्चे की भांति है वह अविकसित है।
मस्तिष्क भी विभाजित है शरीर में सब विभाजित है। केवल तीसरी औख ही एक है- साक्षी। वह एक है। अगर तुम भीतर एक हो जाना चाहते हो, तो साक्षी चेतना के बिंदु को खोजो। चलते समय, देखो। खाते समय, देखो। सोते समय, यह देखते हुए कि क्या हो रहा है- नींद में प्रवेश करो।
देर- अबेर एक दिन अचानक तुम्हें बोध होगा कि शरीर सो गया है लेकिन फिर भी तुम देख रहे हो। शरीर नींद में जा रहा है, धीरे- धीरे और धीरे- धीरे तुम मृतप्राय हो रहे हो और फिर भी तुम देख रहे हो। फिर तुम देखते हो मन के सपने छूट रहे हैं समाप्त हो रहे हैं विलीन हो रहे हैं। तुम फिर भी देख रहे हो- और अचानक तुम आलोकित हो जाते हो। तुमने साक्षी को उपलब्ध कर लिया है।
साक्षी के साथ सपने समाप्त हो जाते हैं और सपनों के साथ सारे भ्रम माया। और तब तुम्हें बोध होता है कि सब एक ही सार-तत्व से संबंधित हैं। वृक्ष भिन्न हो सकते हैं- उनका आकार लेकिन उनके भीतर निराकार एक ही है। चट्टान वृक्ष से जुड़ी है वृक्ष सितारे से जुड़ा है और सितारा तुमसे जुड़ा है। सब-कुछ एक साथ जुड़ा है।
ठीक अभी तुम्हें केवल आकार दिखाई पड़ते हैं क्योंकि मन के द्वारा आकार ही देखे जा सकते हैं। अ-मन के द्वारा निराकार देखा जा सकता है। जब तुम निराकार को देखते हो तब समस्त जगत एक सागर की भांति है और सारे रूप लहरें हैं। सभी लहरों में सागर लहरा रहा है- वही एक।
ठीक अभी प्रत्येक वस्तु अनेक है। ऐसा नहीं है कि चीजें अनेक हैं, यह इसलिए है कि तुम भीतर खंडित हो। इसीलिए चीजें अनेक दिखाई पड़ती हैं। यह ऐसा है जैसे कि तुम एक दर्पण तोड़ देते हो-कई टुकड़े हो जाते हैं। तब प्रत्येक टुकड़ा प्रतिबिंबित करेगा और तुम्हें कई चेहरे दिखाई पड़ेंगे। तुम वहां पर खड़े हो- तुम एक हो लेकिन दर्पण टूटा हुआ है- तुम्हें कई चेहरे दिखाई पड़ते हैं।
मैंने एक पुरानी कहानी सुनी है:
एक सम्राट ने एक महल बनवाया। सारा महल छोटे-छोटे शीशों से बना था- लाखों शीशे थे। तुम महल में प्रवेश करते और तुम्हें अपने लाखों प्रतिबिंब दिखाई पड़ते चारों ओर अपने लाखों चेहरे दिखाई पड़ते। तुम एक हो, लेकिन दर्पण अनेक हैं।
एक बार ऐसा हुआ, एक कुत्ता महल में चला गया और बहुत संकट में पड़ गया क्योंकि उसने देखा और वह डर गया। उसने भौंकना शुरू कर दिया, और चारों तरफ सभी लाखों कुत्तों ने भौंकना शुरू कर दिया। उसने सोचा अब कोई बचाव नहीं है। और यह एक शत्रु का सवाल नहीं है-लाखों कुत्ते हैं और सभी खतरनाक! वह उन पर टूट पड़ा, उसने उनसे लड़ना शुरू कर दिया। वह दीवालों से टकराया और मर गया। यही तो तुम्हारे साथ हुआ है यही सबके साथ हो रहा है। सत्य एक है, लेकिन मन
के कई खंड हैं। सब-कुछ विभाजित हो जाता है और फिर तुम भयभीत हो जाते हो- सभी ओर शत्रु हैं। फिर तुम भौंकते हो, फिर तुम लड़ना शुरू कर देते हो तुम आक्रामक हो जाते हो तुम अपना बचाव करने की चेष्टा करने लगते हो- व्यर्थ ही क्योंकि कोई भी नहीं है जो तुम पर आक्रमण कर रहा है। तुम भ्रमित हो जाते हो। और फिर तुम अपने स्व: को अपनी ही भ्रांतियों से टकरा कर तोड़ बैठते हो और अपने प्राण गंवा देते हो।
तुम दुखों में जीते हो, तुम दुखों में मर जाते हो। भीतर एक हो जाओ और अचानक बाहर भी सब एक हो जाता है। जैसे तुम होते हो वैसा ही जगत होता है- तुम विभाजित, जगत विभाजित; तुम अविभाजित जगत अविभाजित।

... दस हजार चीजें जैसी वे है? एक ही तत्व की हैं।
इस एक तत्व के रहस्य को समझ लेना
सारे बंधनों से मुक्त हो जाना है।
जब सभी वस्तुएं समान रूप से देख ली जाती हें
तो समयातीत आत्मतत्व तक पहुंचना हो जाता है।
इस कारणरहित संबंधरहित अवस्था में
कोई तुलनाएं या समानताएं संभव नहीं हैं।

इसीलिए इस परम आलोक के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता- क्योंकि यह एक है और शब्द द्वैत के लिए हैं। तुम कुछ कह सकते हो, लेकिन तुम जो भी कहते हो वह ठीक नहीं होगा, क्योंकि वह एक भिन्न तल है एक भिन्न आयाम है।
क्रिसमस पास आ रहा था और एक बडे उद्योगपति एक बहुत ही धनी व्यक्ति ने अपने पुत्र से पूछा : तुम अपने लिए कैसा क्रिसमस उपहार अपने लिए क्या भेंट पसंद करोगे?
लड़के ने कहा एक छोटा भाई।
उद्योगपति ने कहा. लेकिन उसके लिए तो मुझे पर्याप्त समय चाहिए। अभी तो दो सप्ताह ही बचे हैं।
तब लड़के ने कहा : तो क्या हुआ? क्या आप इस काम के लिए अधिक आदमी नहीं लगा सकते?
... क्योंकि वह हमेशा यही सुनता था- अगर कोई काम करवाना है तो ज्यादा आदमियों को काम पर लगा दिया जाता।तो क्यों क्या मुश्किल है? क्या आप ज्यादा आदमी काम पर नहीं लगा सकते?' और इस बच्चे को यह बताना कठिन है कि वह जो कह रहा है वह गलत है- वह बिलकुल तर्कसंगत है।
यही स्थिति है। तुम अनेक के जगत को जानते हो। बच्चा घर के चारों ओर के फुटकर कामों की दुनिया से परिचित है प्रतिदिन यही हो रहा है। और एक धनी पिता हर समय कई लोगों को काम पर लगा देता है और जल्दी काम करवा लेता है। वह उसी भाषा को जानता है लेकिन उसे यह रहस्य ज्ञात नहीं कि कैसे एक जीवन जगत में प्रवेश होता है।काम पर अधिक लोग लगा दो!' वह तर्कसंगत है और उसे यह समझाना कठिन है, जब तक कि वह बड़ा नहीं हो जाता उसकी समझ विकसित नहीं होती।
तुम द्वैत की भाषा को इस जगत की भाषा को जानते हो। तुम्हें एक तत्व के विषय में कुछ भी बताना असंभव है। जो भी कहा जाएगा वह गलत समझा जाएगा- जब तक कि तुम विकसित नहीं हो जाते। यही सारी समस्या है।
बहुत बार लोग मेरे पास आते हैं और वे प्रश्न पूछते हैं। उनके प्रश्न तर्कसंगत होते हैं लेकिन मैं उत्तर नहीं दे पाता क्योंकि उत्तर तभी संभव है जब वे विकसित हो जाते हैं। और वे सोचते हैं, तुम पूछो और उसका उत्तर जरूर होना चाहिए, बना-बनाया। वे सोचते हैं, अगर तुम पूछ सकते हो और एक प्रश्न को स्पष्ट बोल सकते हो, इतना काफी है- अब उत्तर दीजिए।
लेकिन कुछ उत्तर हैं जो तुमको केवल तभी दिए जा सकते हैं जब तुम विकसित हो जाओ। और यही समस्या है जब तुम विकसित हो जाते हो तब उन्हें तुम्हें देने की कोई जरूरत नहीं रहती तुम बस समझ जाते हो। जब यह बच्चा बड़ा हो जाता है तो क्या हमें उसे यह बतलाने की कोई जरूरत होती है कि तुम मूर्ख थे! वह हंसेगा, और कहेगा हां मैं समझता हूं। यह आदमियों को काम पर लगाने का सवाल नहीं है। यह काम ही नहीं है।
जब तुम बड़े हो जाते हो तुम समझते हो लेकिन तुम तभी पूछते हो जब तुम बच्चों के समान होते हो। और तुम सोचते हो कि तुम्हारा प्रश्न उचित है उत्तर दिया जाना चाहिए। सत्य का कुछ भी तुमसे कहा नहीं जा सकता, और जो भी तुमसे कहा जाता है, वह लगभग-लगभग होता है। और स्मरण रहे लगभग सत्य जैसा कुछ नहीं होता है। या तो वह सत्य है या असत्य। इसलिए जो भी कहा जाता है वह निरर्थक है। जब तुम जानोगे तो हंसोगे। लेकिन और कोई उपाय नहीं है कुछ और किया नहीं जा सकता।
इसलिए सोसान या बुद्ध या किसी और के वचन तुम्हें विकास की ओर आकर्षित करने के लिए हैं। जो वे कहते हैं वह महत्वपूर्ण नहीं है। अगर तुम्हारी रुचि उसमें हो जाती है और तुम उस आयाम की ओर विकास करने लगे बढ़ने लगे जिसके विषय में तुम कुछ नहीं जानते तो बात पूरी हो जाती है।

इस एक तत्व के रहस्य को समझ लेना,
सारे बंधनों से मुक्त हो जाना है।
जब सभी वस्तुएं समान रूप से देख ली जाती हैं
तो समयातीत आत्मतत्व तक पहुंचना हो जाता है।
इस कारणरहित संबंधरहित अवस्था में
कोई तुलनाएं या समानताएं संभव नहीं हैं।


परम सत्य का कोई कारण नहीं है, क्योंकि कारण कहां से आएगा? परम सत्य पूर्ण है। परम सत्य असंबद्ध है क्योंकि वह किसके साथ संबंधित होगा? वह अकेला है।
तो क्या करें? कैसे कहें? अगर कुछ संबंधित हो, तो उसके बारे में कुछ कहा जा सकता है अगर कुछ सकारण है, तो उसके विषय में कुछ कहा जा सकता है क्योंकि कम से कम दो का प्रवेश तो हो जाता है। अगर दूसरा है तो भाषा संभव हो जाती है। अगर केवल एक है तो सारी भाषा पूरी तरह से निरर्थक हो जाती है।
उस अकारण एक के विषय में क्या करें? केवल एक बात की जा सकती है और वह है अपने भीतर उसे खोजो जो अकारण है। अपने भीतर कुछ खोजो जो एक है और तुम ठीक मार्ग पर हो।
तुम दार्शनिक सिद्धांतों की चिंता न करो इस तरह के और उस तरह के तर्कों में न पड़ो। लाखों तर्क हैं और प्रत्येक एक उलझन बन जाता है और प्रत्येक दार्शनिक सिद्धांत एक नया बंधन बन जाता है। तुम दार्शनिक सिद्धांतों मतों वादों शास्त्रों की चिंता न करो।
तुम बस एक काम करो और वह है अपने भीतर उसे खोजो जो अकारण है, और उसे खोजो जो एक तुम्हारे भीतर है- और वह वही है, क्योंकि वह एक ही अकारण एक हो सकता है।
और एक बार जब तुम्हें उस अकारण की उस एक की छोटी सी झलक भीतर मिल जाती है तुम्हें रास्ता मिल जाता है। अब मंजिल बहुत दूर नहीं है। अब तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है। अब गुरुत्वाकर्षण की भांति मंजिल तुम्हें खींच लेगी अब, चुंबक की तरह, तुम उसकी ओर आकर्षित कर लिए जाओगे। अब तुम उस क्षेत्र में प्रविष्ट हो गए हो जहां से चुंबक काम कर सकता है। तुम्हें बस एक काम करने की जरूरत है- इसमें प्रवेश कर लेना। तब केंद्र तुम्हें खींच लेगा तब किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है।
सारा प्रयास यह है कि किस तरह तुम्हारा अपने ऊर्जा-स्रोत से संपर्क स्थापित हो जाए। संपर्क खो गया है और टूट गया है। तुम बिलकुल निकट हो बिलकुल करीब होना भी दूरी है। एक छोटा सा मोड़ जरा पीछे मुड़ कर देखना और चीजें बदलनी शुरू हो जाती हैं।
जब वे घटती हैं तुम हंसोगे --' वह इतना कठिन क्यों था?' लेकिन अगर वे नहीं हो रहीं तो यह कठिन है। ये सोसान जैसे लोग क्यों कहते रहते हैं कि यह ' अभी शीघ्र तस्का ' घटित हो सकता है? अपने भीतर उस अकारण को खोजने की चेष्टा करो। तुम इसे कैसे करोगे? मेरे साथ प्रयास करो- उस एक चीज को खोजो जो तुम्हारे भीतर अपरिवर्तनशील है।
सुबह तुम उठते हो, दिन भर काम करते हो- लाखों व्यस्तताएं मुलाकातें रिश्ते हैं। हर चीज बदल जाती है कई भाव-दशाएं आती हैं और चली जाती हैं; कभी तुम क्रोधित होते हो कभी तुम प्रसन्नता अनुभव करते हो, कभी तुम उदास हो जाते हो और कभी बहुत ही आनंदित होते हो कभी नकारात्मक और कभी सकारात्मक।
सब-कुछ बदलता है- मौसम की भांति प्रत्येक चीज बदल जाती है। दिन में तुम जागते हो, रात को तुम्हें सोना ही पड़ता है। दिन में तुम सोचते हो, रात को सपने देखते हो। प्रवाह की भांति सभी कुछ निरंतर गतिशील है। उसे खोजो जो इस सारे प्रवाह में वैसा ही बना रहता है, वह है साक्षी।
रात को तुम सपनों के साक्षी हो, सपने बदलते हैं लेकिन साक्षी, साक्षी वैसा ही रहता है। दिन में तुम अपनी भाव-दशाओं- उदासी, क्रोध, प्रसन्नता के साक्षी हो। भाव- दशाएं बदलती हैं लेकिन साक्षी वैसा ही बना रहता है। स्वस्थ हो, तुम स्वास्थ्य के साक्षी होते हो, बीमार हो, तुम बीमारी के साक्षी होते हो। धनी हो, तुम संपत्ति के साक्षी होते हो, निर्धन हो, तुम निर्धनता के साक्षी होते हो। एक चीज सतत वही बनी रहती है और वह है साक्षी। और सब-कुछ सकारण है। यह साक्षी अकारण है।
कोई कुछ कहता है, तुम्हारी प्रशंसा करता है, तुम प्रसन्न होते हो- यह सकारण है। एक मित्र तुम्हें मिलने आता है, तुम आनंदित होते हो- यह सकारण है। कोई कुछ कहता है, तुम्हारा अपमान करता है, तुम अप्रसन्न होते हो- यह सकारण है। मौसम अच्छा नहीं है, तुम उदास और निराश हो- उसका कारण है। धूप खिली है, तुम अच्छा, जीवंत, सक्रिय महसूस करते हो- इसका कारण है। यदि दिन में तुमने भोजन नहीं किया, तो रात को तुम सपना देखते हो कि तुम स्वादिष्ट भोजन खा रहे हो- यह सकारण है।
जो चीजें तुम पर घटती हैं, उन्हें देखो। क्या उनका कारण है? अगर वे सकारण हैं तो उनके संबंध में अधिक चिंता न करो, वे भ्रांतियों के जगत से संबंधित हैं। तुम उसकी खोज में हो जो अकारण है। साक्षी, तुम पाओगे कि केवल साक्षी ही है जो अकारण है। उसका कारण नहीं है, कोई उसे करता नहीं है।
इसीलिए बुद्धपुरुष कहते हैं कि कोई सदगुरु ही तुम्हें मार्ग दिखा सकता है। वह रूपांतरण का कारण नहीं बन सकता है, क्योंकि सारी बात अकारण को खोजने की है, इसलिए सदगुरु कैसे उसे कर सकता है? कोई भी नहीं कर सकता। वह केवल तुम्हें मार्ग दिखा सकता है-यात्रा तुम्हें करनी पड़ती है।
कोई बुद्ध तुम्हें रूपांतरित नहीं कर सकता। अगर कोई बुद्ध तुम्हारा रूपांतरण कर सकता तो वह भी तुम्हारे माया के जगत का हिस्सा होगा, क्योंकि फिर तुम्हारे लिए कारण होगा। अगर तुम मेरे पास आते हो और प्रसन्नता अनुभव करते हो, तो उस अनुभूति का कारण है। अगर तुम मुझसे दूर जाते हो और अप्रसन्नता का अनुभव करते हो, तो उस अनुभूति का कारण है।
जरा देखो? सुख, दुख, उदासी, हर्ष, वे आते हैं और जाते हैं, वे ऋतुएं हैं तुम्हारे चारों ओर। साक्षी केंद्र बना रहता है, अकारण, अपरिवर्तनशील। उसे अपने भीतर खोजो, और तब सब-कुछ स्पष्ट हो जाता है। जब तुम भीतर स्पष्ट होते हो, सभी कुछ पारदर्शी हो जाता है। सत्य तुम्हारे चारों ओर सब तरफ है, केवल तुम्हें एक हो जाना है।

आज इतना ही।





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