है निर्दय अशोक,
तुझे होता नहीं कभी कोई शोक।
जब सारी बगिया,
पतझड़ मना रही होती है।
तू निर्झर सा अडिग खड़ा,
कैसे झूमता,मुस्कराता रहता है।
तेरी मंजरी जब फूलती है।
कैसे गमक जाता है उपवन सारा।
कोयल के गीत,
भ्रमरों की गुंजान,
तितली की चपलता,
सब मुग्ध और मदहोश रहते है।
छाया रहता है तेरे होने का जादू।
सब और......
फिर तेरे आँचल के साये में।
सब कहते है,
सीता कैसे कुम्हला गई?
नहीं वो तो प्रेम प्रीत थी
भगवान की,
उस अहं के विनाश की
जिसने उसे छल से कैद किया था।
परंतु तू धन्य है।
तुमने उसे अपनी सीतल छाया,
प्यार के आँचल के तले सुलाया,
उसे मुरझाने न
दिया,
न उसे सूखने ही दिया,
छुपा लिया हनुमान को,
अपनी घनी लता कुंजों मैं।
शायद तभी तेरा नाम सार्थक बन पाया,
सच तुझे तो शोक नहीं,
पर हर लेता तेरा संग भी शोक सबका,
क्यों न मैं भी,
बैठ तेरे संग-साथ,
होने दूँ संप्रेषण तुझको अपने में,
और बहने दूं तेरा धारा अविरल यूं ही,
उस निष्ठुर पाप का करूं सामना,
बन जाऊँ मैं तेरे जैसा है,
और हर लूं सब के,
शोक, संताप और व्यथा।
और कह जाऊं मैं भी
अशोक...अशोक...अशोक
मनसा-मोहनी दसघरा
(ओशो की मधुशाला)
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