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शनिवार, 13 जून 2026

23 - फागुन का ये अल सावन -(कविता) - ओशो की मधुशाला

 23 - फागुन का ये अल सावन 


एक फूल के खिल जाने से,

आती उपवन की आहट है।

दूर कहीं पर नाद गुंजता,

अब पिया मिलन की आस है।

फागुन का ये अलसावन 

है प्रेम रंजन मधुभावन

गा रे गा मन फागुन के गुन

पद चाप सूने प्रीतम के आवन

भीतर-भीतर कुछ पगता है

तभी तो जीवन रंग भरता है।।

 

होंठ तुम्हारे धीर लपेटे

कैसे लगते है जामुन-जामुन

कहां हमें आता है गाना

कहो हवा से कान लगाना

अब फिर गा उसकी सन-सन सुन-सुन

रंग बिरंगे अब गीत हमारे  

किन फूलों का रंगे लिए है। 

अक्षर-अक्षर लागे प्यारा,

लेकर प्रेम प्रीत की धारा।

फूलों पर मंडराते ये भौंरे

कहता है मन इनकी न सुन।।

 

भोर साँझ वाले अम्बर से 

खिलते उलझे दिखते रंग के बादल

नहीं संभलता अब मन का जौबन

फूलों से चिड़ियों के पर सा

पेरो के इन पद चापो से

रंग अनूठे रखते है चुन-चुन

 

इस होली पर आकर प्‍यारे

अब ऐसा रंग लगाना न्‍यारे

मन के रंग भी फीके पड़ गये

ऐसा दाग विरह का देना

लाख जतन कर हार गई हूं,

छुड़ा सके ना कोई साबुन

 

सूरज करता रोज़ ठिठोली

खेले अंबर भी ख मिचौनी

आकर नित-नित चीर रहा है,

आसमान में रचे रंगोली

दर्द बढ़ रहा रोज-रोज नित

रात उतरती रुनझुन-रुनझुन।।

 

किन रंगों से है रची जिन्दगी

किन रंगों से भरा ये उपवन

कुछ रंगों के मिट जाने से

ये क्या मिट जाता है जोबन।

कुछ रंगों सी बची जिन्दगी

ग्रह हमारे काल गर्त में

सगुन बन गये ऐसे सब अस गुन

तुम प्रियतम कब आन मिलोगे

इस आस लगाये बैठा सावन।। 

 

कौन पुकारे किसी पुकारे

किन्हीं आस से बंधा ये जीवन

तुम सांसों में तुम आंखों में

तुम ही जीवन की डोर बने हो

हम तो प्रियतम एक खिलोना

बन तेरे संग रचे बसे है

तुम चाहो तो रंग दो जीवन

चाहे तो पतझड़ बन जाये

आओ प्रति आओ प्रिय

यहीं आस अब श्वास बनी है

कौन कहेेेगा इसको उपवन।।   

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 


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