हम दीप जलाए बैठे थे, इक आस लगाए
बैठे थे।
हम दिल के टूटे तारों से, कोई
गीत बनाए बैठे थे।
इक आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।
जो महक उठी थी प्राणों में, वो
खो हुई एहसास सी थी।
वो दूर भले ही रहती थी, पर रहते
दिल के पास ही थी।
जो आकर नहीं जाती है कभी, अनबूझी
सी प्यास सी थी।
वो आकर भी कभी आ न सके, हम आस लगाए बैठे थे.....
तुम कहते थे हम भूले है तुम्हें, फिर हिचकी क्यों आती है हमें।
जीवन के सूने आंगन में, ये कोयल
भी क्यों तड़पाती है हमें।
कभी छूती हे वो यादों तेरी, दर्द
सिहरन क्यों भर जाती है हमें।
नासूर बन गया है दर्द तेरा, पर
हम जख्म सजाए बैठे है।
आंखों के आंसू सूख गये,
सपने भी हम से रूठ गये,
एक आस लगाये बैठे थे,
बस पलकें बिछाए बैठे थे।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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