है सृष्टि के लबों पर, फैलती मुस्कान
हो तुम।
गीत गाते भ्रमरों के, गुंज का
गुंजान हो तुम।।
गा रहा है गीत कोई, थी कभी नीरवता सोई।
बैठ कर अकुलाहटों में, दूर तनहाई
भी रोई।
किन सुरों में है गुनगुनाता,
विहंगम के कंठ बैठ गाता,
पुष्प बन कभी मुसकुराता,
दिखता वो नहीं है फिर भी
है जहां देखो वो पाता।
है वो कृति के पर भी,
सृष्टि की पहचान हो तुम।।
है सृष्टि के लबों पर,
फैलती मुस्कान हो तुम।
जब भी मैं दीपक जलाता, मुस्कराता
तुम्हीं को पाता।
एक विस्मृत सी कड़ी को, कौन छंद
में आन गाता।।
विरह वेदना की श्रुति यों को, न
बांधने की आन हो तुम।
साज भी तुम राग भी तुम, गीत की
पहचान हो तुम....
आ गई संध्या की बेला, मैं खड़ा
फिर भी अकेला
छटपटाते तट बंधो से, छूटता है
जीवन का मेला।
निहारते थे जिन पथों को, बुहारते
थे जिन पथों को।
पथ बन गई है मंजिल, पथ पर फैले गान
हो तुम
क्यों पथ को अब संवारे, वो धूल
ही पहचान हो तुम.....
है सृष्टि के लबों पर फैलती मुस्कान हो तुम।।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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