मैंने एक कली से कहां,
क्या मैं
करूं तेरा गुण गान?
गाऊं तेरे लिए कोई गीत या गान
या करूं गली-गली तेरा बखान।
उसने एक बार मुझे यूं देखा
फिर वो हंसी और थोड़ी सी इतराई,
कुछ देर मौन रह कर उसने मुझे देख कर कहां
जैसे वो मानो खोल रहीं है वो किसी रहस्य से पर्दा,
और मुझे पास बूला कर धीरे से फुसफुसा कर
मंद्र मधुर स्वर में कहां,
क्यों करना चाहते हो तुम मेरा गुणगान,
तुम दोगे मुझे जो भी नई पहचान,
वो होगा मेरी मौत का ही फरमान।
खिलने से पहले ही वो मुझे नोच लेंगे,
छीन लेंगे मेरी अस्मिता का झीना सा पर्दा,
और चढ़ा देंगे पुजा के नाम पर,
किसी पत्थर के चरणों में,
या किसी मधुबाला की वेणु में,
या किसी सुहागन की सेज पर,
या किसी मुर्दे के कफन पर,
फिर सुबह से पहले मसली कुचली,
पड़ी होगी कहीं ताज या सी।
ये जो नकाब पहन का तुम मुझे लुभा रहे हो
ये तुम्हारा साधुवाद है छलावा, एक
धोखा है,
और देखना तुम छल रहे हो अपने को ही,
चढ़ाना है तुम्हें अपने अहंकार का शीश,
जब उन के चरणों में,
बलि चढ़ा रहे हो मेरी,
में तो खुद ही चढ़ी हूं,
उस अस्तित्व के हाथों,
और खिली हूं अपनी पूर्णता में।
खिलना तो है तुम्हें अपना फूल, और
दे रहें हो धोखा खूद को।
ये प्रपंच-ये तटस्थता जीने नहीं देगी तुम्हें चैन से,
जब तक तुम नहीं हो जाते पूर्ण,
नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी शिव शाला,
न वैभवशाली, न मधुशाला, और न मधुबाला।
और ये कह कर उसने मुझसे अपना मुख फेर लिया,
और कर ली आंखें बद।
ये भी न कहां तुम चले जाओ।
और मेरा व्यापारी मन, जड़वत ठगा
सा निरुत्तर हो गया,
पत्थर हुए शरीर को लिए बस खड़ा रहा
उसे निहारता ही रह गया.........अडिग निश्चल सा
और है सखी मैं नहीं कह सका
ह्रदय की बात कैसे कहता
शब्द भी कहीं दूर पड़े रह गये।
और मेरे होंठ सिल गये।
मनसा - मोहनी दसघरा
(ओशो की मधुशालाा)
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