अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ
गुन-गन।
मन का मर्म इति, कहता है मत इसे
सून।
चीढ़ के पात-पात को, छूती है जब
पवन
कानों में गुंज उठता जल सा क्रीड़ा क्रंदन
अंबर पर वो तैर रहे है, धवल मेघ
छूते पर्वत
पल-पल करते वे अठखेली, छवि बनते
नित नूतन
लहर-लहर दौड़े फिरते, कौन पकड़ पाता अब उनको
टूट रहे थे सारे बंधन, बिखर रही
सारी बेड़ियां
घुलता मिटता उनका यौवन, न माने तन-मन
कि बात
चेतना के सब पंख फैल गये, है खुलने
कि अब है आस,
पकड़ छिटकती सी दिखे, कहां धरा
कहां गगन
अपने होने को कैसे, जाना सधन
सुमन वो वन
तन का ये छूटता भार, छिटकते से
सारे बंधन।
मुक्त हास जब बनता लगे, अपना रूप
अपना ये तन।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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