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रविवार, 4 अक्टूबर 2026

03 - जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ? — (कविता) - परिजात के फूल

03 - जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ? — (कविता) - मनसा - मोहनी 

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ?

तेरी आंखों में नहीं दिखता, सपनों का अब वो संसार।

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ?

सपनों के इन इंद्र धनुष से कितने रंग सजाए है।

तेरे रंग के   आगे जोगी  सब बैरंग हो जाए है।

एक तरफ टूटे छंद मेरे थी एक तरफ आशाएं है।

जिनके पीछे दौड़ा रहा था, पाई वो छायाएं है।

छाया को क्यों तू माया सब कहता ?

भेद बता जा अब कि बार।

जागी तू क्यों आया मेरे द्वार ?………

 

दीप सजाये बैठी कब से, तुम आकर उसे जलाओगे।

फूलों की बगिया से चुनकर, जीवन हार  सजाओगे।

होली के नीरस रंगों में, तुम उत्सव रंग भर जाओगे।

काल कली के कोलाहल में, मधु रंग राग बजाओगे।

टूट चुकी अब नैया मेरी,

अब वो होगी कैसे पार ?

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ?……,

 

मिटते-लुटते इस जीवन में, कोई संग नहीं, कोई राह नहीं।

धूमिल होती इस छाया का, कोई रूप नहीं आकार नहीं।

बिखरे जीवन के तारों में, कोई छंद  नहीं, कोई राग नहीं।

आकार बनाऊं मैं क्या तेरा, अभी इतनी मुझमें जाग नहीं।

किन चेहरों में तुम को ढूंढूँ, कोई तो तुझसा रूप दाग नहीं।

है बुझती बाती, डूबी सांसे इन प्राणों में अब वो आग नहीं।

रूप के पीछे अरूप छुपा है,

क्या दर्शन होगा अब की बार?

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ?………

 

मर-मर कर भी नहीं मरे हम, ये क्या मिटना-मरना होता है।

इस धुँधली होती तेरी छवि को, मैं कहां देख अब पाता हूं।

हर रूप-कुरूप में तू ही बसा है, पर कहां पकड़ में आता है।

छाया की भांति तू तो जग में, नित आगे ही भागा जाता है।

अपने अंतस में जब भी देखा, बस उसको रिता ही पाता है।

जो दर्द के तारों को छूकर आये, वो गीत कहां बन पाता है।

किन कंठों से अब मैं गांऊ, जो गीत तुझे अब भाता है।

रोते-रोते थक गई आंखें,

दर्शन दे जा अब की बार।

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वार ?………

 

आस लगाती, सेज सजाती, फूल बिछाती हूं में रोज।

सूने पथ पर तुम आयेगा, तभी तो होगी जीवन मोज।

जीवन नैया डूब रही है, नित-नित बढ़ता जाता बोझ।

नहीं थकूंगा नहीं रुकूंगा,नित नये रूप धर लूंगा रोज।

मैं नाचूंगा और गाऊंगा, जब पैरो में   बांधूंगा सोज।

एक आस तो हर पल बहती रहती,

क्या उड़ेगा पंछी अब की बार ?

 

जोगी तू क्यों आया मेरे द्वारा ?....

तेरी आंखों  में नहीं दिखता सपनों का अब वो संसार।।

( परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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