तुम जब आये मेरे द्वार, मैं
मद-अहं से भरा हुआ था।
तेरे पदचापों की ध्वनि, सुन
उसे अनसुना किया था।
डूबा सूरज हुआ अंधेरा,
चारों और तमस न घेरा,
करुणा करके तूने मुझपर
मंदिर में दें दिया बसेरा।
मद-मंदिर में छलक रही थी,
उत्सव-मस्ती महक रही थी,
प्याले सब के भरे हुए थे
भर-भर कर भी छलक रहे थे
मैं अपराध भाव सा लेकर
कोने-कातर में दुबक रहा था,
नयनों में अविरल आंसू थे
प्राणों में मधुर प्यास भरी थी
साँसे मेरी अटक रही थी
प्राणों
को बस समेट रही थी
फिर
कुछ तो घटा था मेरे अंदर
क्यों
बार-बार कोई पुकार रहा था।
प्यार
के अधीर तब मैं हो बेबस सी।
उत नीरस जीवन भी थिरक रहा
है।
हर सांस में हर आस बनी थी।
क्यों तेरे आने कि आस
जगी थी!
पल-क्षण में कुछ ऐसा घट गया
मेरे अंतस में कुछ नया डोल गया
आंखें मेरी बंद हो गई
दुनिया सारी पल में खो गई
भीतर झांक जब मैंने देखा
अंतस मेरा डोल रहा था
आनंद उत्सव कोई घोल रहा था
ये क्या मेरे अंतस में हो गया
पल भर पहले जो खाली था
मेरा प्याला भी भरा हुआ था
आनंद मदिरा से छलक रहा था
कैसा कौतुक ये घटित हो गया
चारों और थी प्रेम की वर्षा
अमृत उत्सव
बरस रहा था
मद-मदिरालय लरज रहा था
ह्रदय सागर सा गरज रहा था
मेरे अंतस की प्रेम पखावज
आंसू बन कर के बह रही थी
मैं हर्षित उद्विग्नता सा होकर
बिन पंखों के उड़ा में चला था
ध्यान की गंगा बहा ले रही थी
मैं उसमें बह-डूब रहा था
ये कैसा कौतुक विस्मय सा हो गया
मेरा प्याला भी भरा हुआ था........
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

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