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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

02 - Notes of a Madman- ((नोट्स आफ एक मेडमैन) - हिंदी अनुवाद (ओशो)

Notes of a Madman- (नोट्स आफ एक मेडमैन) -  हिंदी अनुवाद (ओशो)

दी गई बातें से 1984 विविध

सत्र -02

मुझे बहुत खुशी, बहुत शांति और आशीर्वाद महसूस हो रहा है कि आप सब मेरे आस-पास हैं। यह बहुत सुंदर है। जीसस - इसलिए आनंदित  नहीं था... मैं और मेरे मित्र जो की मेरे  आस-पास है। यह था नहीं उसका कारण था क्योंकि उसके आस पास ऐसी सुंदर कंपनी नहीं थी, उसके आस पास केवल यहूदी थे। मेरे पास भी बहुत सारे यहूदी हैं। यहूदी सुंदर हैं, लेकिन यहूदी होना गलत है। पारंपरिक होना, किसी परंपरा से जुड़े होना, धर्म से जुड़े रहना, गलत है।

सभी को अपने जैसा होना सच है। यही मेरी शिक्षा है, बस खुद जैसा होना; बस अपनी पवित्रता में होना, बिना किसी डर के... इसका जो भी मतलब हो, बिना किसी डर के, क्योंकि अलग-अलग लोगों के लिए इसका मतलब अलग-अलग होगा।

बुधवार, 1 जुलाई 2026

01 - Notes of a Madman- ((नोट्स आफ एक मेडमैन) - हिंदी अनुवाद (ओशो)

Notes of a Madman- ((नोट्स आफ एक मेडमैन) -  हिंदी अनुवाद (ओशो)

दी गई बातें से 1984 विविध

श्रृंखला - 01 अध्याय शीर्षक: कोई नहीं

सत्र -01

कभी डरकर कुछ मत करो। मेरे शरीर की चिंता मत करो, वह ठीक है। मेरे शरीर की नहीं, मेरी सुनो। मेरा शरीर हमेशा थोड़ा अजीब ही रहता है... ऐसा तो होना ही है।

एक बार जब आप जागरूक हो जाते हैं, तो शरीर चेतना पर अपनी पकड़ खोने लगती है। आप हैं नहीं अधिक का यह दुनिया में। परंतु वह है, जग है संसार है। क्योंकि जो जाग कर एक मर बार जाता है,  और सच तो यह है नहीं, उसे फिर से जन्म नहीं लेना होता। वह ले भी नहीं सकता है जन्म, यह है एक असंभव चक्र। वह नहीं पा सकता  एक और शरीर। और सच ऐसा ही है, क्योंकि यह है मेरा अंतिम शरीर.

आप भाग्यशाली हैं कि आप एक ऐसे व्यक्ति के साथ हैं जो अंतिम शरीर में है। मैं फिर से नहीं रहूँगा क्योंकि मैं हूँ प्राणी। एक बार आप हैं स्वयं होना नहीं सकता होना फिर से जन्म लेना। यह होना ही मायने रखता है। यह होना ही है कौन है शाश्वत। निकायों में बार-बार आना और जाना; प्राणी अवशेष। निकायों हैं जन्म  लेना और मरना; अस्तित्व न तो जन्म लेता है और न ही मरता है।

मंगलवार, 30 जून 2026

28 - प्रियतम तुम न आये- (कविता) ओशो की मधुशाला

28 - प्रियतम तुम न आये- (कविता)


कोयल हरसूं गाये, फिर आम गए बोराये।

पुरवा मस्ती लाये, प्रियतम तुम न आये।

 

ये पलाश तुम जंगल के माथे का सिंदूर है,

छाया है सूखे पतझड़ में, बस तेरा ही रूप।

कैसा दिखता है तू संन्यासी भाव लिए,

तेरी खामोशी कैसे वीरान सूनसान घेरे रहती है,

तेरे इस साधु भाव से पतझड़ भी उपवन सा लग रहा है।

तेरे होने मात्र से जंगल को उत्सव से भर रहा है।

बसंत तू ही लेकर आया है....सच

सोमवार, 29 जून 2026

27 - एक कली न कहां - (कविता) -ओशो की मधुशाला

 27 - एक कली न कहां - (कविता)


मैंने एक कली से कहां

क्‍या मैं करूं तेरा गुण गान?

गाऊं तेरे लिए कोई गीत या गान

या करूं गली-गली तेरा बखान।

उसने एक बार मुझे यूं देखा

फिर वो हंसी और थोड़ी सी इतराई,

कुछ देर मौन रह कर उसने मुझे देख कर कहां

जैसे वो मानो खोल रहीं है वो किसी रहस्य से पर्दा,

और मुझे पास बूला कर धीरे से फुसफुसा कर 

सोमवार, 22 जून 2026

26 - चल पड़ा पथ पर पथिक जब—(कविता) -ओशो की मधुशाला

 26 - चल पड़ा पथ पर पथिक जब—(कविता)

चल पड़ा पथ पर पथिक जब, कौन बाधा रोकेगी उसको।

कौन डगर भटका सकेगी, दृढ़ हो विश्वास  जिसको।।


देख राहों की  रूकावट, तू न थकना, तू  न रुकना।

आंधी और तूफान से भी, तू न  डरना, न सहमना।

डिगने लगे विश्वास जब भी,

प्रेम पथ  के   बीज  बोना।

देख सागर की तू गर्जन,

लहर बन कर विलीन होना।

बुधवार, 17 जून 2026

25 - हे निर्दय अशोक—(कविता) - ओशो की मधुशाला

 25 - हे निर्दय अशोक—(कविता)


है निर्दय अशोक,

तुझे होता नहीं कभी कोई शोक।

जब सारी बगिया

पतझड़ मना रही होती है।

तू निर्झर सा अडिग खड़ा,

कैसे झूमता,मुस्कराता रहता है।

तेरी मंजरी जब फूलती है।

कैसे गमक जाता है उपवन सारा।

 

कोयल के गीत,

भ्रमरों की गुंजान,

तितली की चपलता,

सब मुग्‍ध और मदहोश रहते है।

रविवार, 14 जून 2026

24 - कारे बदरा अब तो आजा-(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

24 - कारे बदरा अब तो आजा-(कविता)

कारे बदरा अब तो आजा, मेरी आंख के मोती ले जा।

दूर कहीं जब मिले पिहरवा, उन चरणों में जाकर गहजा।।

 

प्रीतम को यूं जाकर कहना, घुटन भरा ये हो गया जीना।

तपती धरा को अब है सहना, मानो फूलों का है गहना।

दुख पीड़ा को पीते जाना, यूं दिल के टुकड़े सीते रहना।

नासूर बना जख्म जिगर का, किन यादों से अब है सीना।

शनिवार, 13 जून 2026

23 - फागुन का ये अल सावन -(कविता) - ओशो की मधुशाला

 23 - फागुन का ये अल सावन 


एक फूल के खिल जाने से,

आती उपवन की आहट है।

दूर कहीं पर नाद गुंजता,

अब पिया मिलन की आस है।

फागुन का ये अलसावन 

है प्रेम रंजन मधुभावन

गा रे गा मन फागुन के गुन

पद चाप सूने प्रीतम के आवन

भीतर-भीतर कुछ पगता है

तभी तो जीवन रंग भरता है।।

गुरुवार, 11 जून 2026

22-कौन हो तुम—(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

22-कौन हो तुम—(कविता)


है सृष्टि के लबों पर, फैलती मुस्कान हो तुम।

गीत गाते भ्रमरों के, गुंज का गुंजान हो तुम।।

 

गा रहा है गीत कोई, थी कभी नीरवता सोई।

बैठ कर अकुलाहटों में, दूर तनहाई भी रोई।

किन सुरों में है गुनगुनाता,

विहंगम के कंठ बैठ गाता,

पुष्प बन कभी मुसकुराता,

दिखता वो नहीं है फिर भी

है जहां देखो वो पाता।

है वो कृति के पर भी,

सृष्टि की पहचान हो तुम।।

है सृष्टि के लबों पर,

फैलती मुस्कान हो तुम।

बुधवार, 10 जून 2026

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता)


अंतर के दर्पण में मैंने..

ज्योति-विनिंदक रूप उतारा,

पर असीम को सीमित करना..

सहज नहीं इससे मैं हारा;

निर्वासन, असफल रेखाएं,

हाथ उठा कर गगन निहारें;

चित्र किसी का प्राण अजाने..

मेरा ही आकार बन गया!

आड़ी तिरछी रेखाओं से

एक नया रूप आकार बन गया।

मंगलवार, 9 जून 2026

20 - तू बांसुरी बने तो - (कविता) - ओशो की मधुशाला

20 - तू बांसुरी बने तो - (कविता)

तू बांसुरी बने तो तुझे होंठों से लगा लूं।

तू फूल बने तो अपनी सांसो में समा लूं।

तू पीर बने तो तुझे मैं सीने से लगा लूं।

तू आस बने तो तुम्हें जीवन में बसा लूं। 

 

तन भी फूल मन फूल, हर और फूल समाया।

तेरी हंसी में प्रीतम हमने फूलो को हंसता पाया।

शनिवार, 6 जून 2026

19 - अरण्य उपवन - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 19 - अरण्य उपवन - (कविता)

अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ गुन-गन।

मन का मर्म इति, कहता है मत इसे सून।

 

चीढ़ के पात-पात को, छूती है जब पवन

कानों में गुंज उठता जल सा क्रीड़ा क्रंदन

अंबर पर वो तैर रहे है, धवल मेघ छूते पर्वत

पल-पल करते वे अठखेली, छवि बनते नित नूतन

लहर-लहर दौड़े फिरते, कौन पकड़ पाता अब उनको

गुरुवार, 4 जून 2026

18 - पत्थर की पुकार - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 18 - पत्थर की पुकार  -  (कविता)

कौन? कहता है

पत्थरों तुझे पीड़ा नहीं होती,

वो रो सकता है

और कर सकता है चीत्कार,

वो करता है

कुछ दिल की बातें कभी-कभी

मगर किसी मौन फुसफुसाहट कि तरह

जो हमारे कानों को

लगती है कुछ अनसुनी।

वो इतनी मंद्र ओर सुकोमल सी होती है।

बुधवार, 3 जून 2026

17-फागुन — (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

17-फागुन — (कविता)

फिसलन मन की अकड़न तन की

बस बन गया सारा पतझड़ जीवन

नहीं सुलझती सुलझी उलझन

है प्रेम प्रीत का ये कैसा बंधन

आओ साजन गदराया फागुन

भर गया मन में चंचल चितवन

 

दबे पाँव आकर सिरहाने

हवा लगी बाँसुरी बजाने

दुखता सिर सहलाने लगते

फागुन के दिन चार है हंसते

मंगलवार, 2 जून 2026

16-हम दीप जलाये बैठे है — (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

16-हम दीप जलाये बैठे है — (कविता)

हम दीप जलाए बैठे थे, इक आस लगाए बैठे थे।

हम दिल के टूटे तारों से, कोई गीत बनाए बैठे थे।


इक आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।

जो महक उठी थी प्राणों में, वो खो हुई एहसास सी थी।

वो दूर भले ही रहती थी, पर रहते दिल के पास ही थी।

जो आकर नहीं जाती है कभी, अनबूझी सी प्यास सी थी।

वो आकर भी कभी आ न सके, हम आस लगाए बैठे थे.....