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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।
      ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।

      मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे।
      विद्वानों की कलम की बहुत सी स्‍याही नसरूद्दीन को कागज पर उतारने पर खर्च हुई है। जबकि नसरूदीन के पास उनके लिए कोई वक्‍त नहीं है। सूफी, जो कि विश्‍वास रखते है कि गहरी अंत: प्रज्ञा ज्ञान की पथप्रदर्शक है, इन कहानियों को ध्‍यान विधियों की तरह इस्‍तेमाल करते है। वे साधकों से कहते है कि इनमें कुछ मनपसंद कहानियों को चुनकर उन पर मनन करो और उन्‍हें जज़्ब करो। इस तरह उच्‍चतर प्रज्ञा में तुम्‍हारा प्रवेश होगा।
      मुल्‍ला नसरूदीन को ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति मानने की गलती न करें तो ही इसके मिथक को समझा जा सकता है। मुल्‍ला की लोकप्रियता का राज रही है। कि वह हर इंसान के भीतर बसता है। वह मानवीय मन का ही एक साकार रूप है। मुल्‍ला के लतीफ़ों को समझने के लिए कोई बड़ी दार्शनिक विद्वता नहीं चाहिए। एक ही बात आवश्‍यक है—अपने आप पर हंसने की क्षमता।
      मुल्‍ला: दरवेशों का मुखिया और परिपूर्ण सदगुरू था। कई लोग कहते है, मैंने सीखना चाहा लेकिन यहां मुझे सिर्फ पागलपन मिला। फिर भी गहरी समझ को कहीं और खोजेंगे तो पायेंगे।
नसरूद्दीन और ज्ञानी--
      दरबार में नसरूद्दीन के खिलाफ मुकदमा चल रहा था। दार्शनिक, तर्कशास्‍त्री और कानून के विद्वानों को नसरूदीन की जांच करने के लिए बुलाया गया था। मामला संगीन था। क्‍योंकि नसरूदीन ने कबूल किया था कि वह गांव-गांव घूमकर कहता था कि तथा कथित ज्ञानी लोग अज्ञानी, अनिश्‍चय में जीन वाले और संभ्रमित होते है।
      उस पर इल्‍जाम लगाया गया कि वह राज्‍य की सुरक्षा का सम्‍मान नहीं कर रहा है।
      सम्राट ने कहा, ‘’तुम पहले बोलों।‘’
      मुल्‍ला ने कहा, ‘’पहले कागज और कलम ले आओ।‘’
      कागज और कलम मंगवाये गये।
      ‘’इनमें से सात लोगों को ये दे दो और उनसे कहो कि वे सब एक सवाल का जवाब लिखें, ‘’रोटी क्‍या है?’’
      उन सबने अपने-अपने कागज पर लिखा। वे कागज सम्राट को दिये गये और उसने उन्‍हें पढ़कर सुनाया:
      पहले ने लिखा—रोटी एक भोजन है।
      दूसरे ने लिखा—वह आटा और पानी है।
      तीसरे ने लिखा—खुदा की भेट है।
      चौथे ने लिखा—सींका हुआ आटा है।
      पांचवें ने लिखा—आप किस चीज को रोटी कहते है इस पर निर्भर है।
      छठे ने लिखा—एक पोषक तत्‍व।
      सांतवे ने लिखा—कोई नहीं जानता कि रोटी क्‍या है।
      नसरूद्दीन ने कहा: ‘’जब वे सब मिलकर यह तय नहीं कर पाये कि रोटी क्‍या है तब बाकी चीजों के बारे में निर्णय ले सकेंगे। जैसे मैं सही हूं या गलत। क्‍या आप किसी की जांच परख या मूल्‍यांकन करने का काम ऐसे लोगों को सौंप सकते है। क्‍या अजीब नहीं है कि उस चीज के बारे में एक मत नहीं हो सकता जिसे वे रोज खाते है। और फिर भी मुझे काफिर सिद्ध करने में सभी राज़ी हो गए। उनकी राय का क्‍या मूल्‍य है?
     
तस्‍करी--
      नसरूदीन गधे पर बैठ कर पर्शिया से ग्रीस बार-बार जाता था। और हर बार वह घास की गठरियां ले जाता था। सरहद के संतरी घास को उघाड़ कर बारीकी से छानबीन करते लेकिन उसमे कुछ भी नहीं मिलता। लौटते समय वह खाली हाथ लौटता।
      संतरी पूछते, ‘’तुम क्‍या ले जा रहे हो नसरूदीन।‘’
      ‘’मैं एक तस्‍कर हूं।‘’
      नसरूदीन की अमीरी बढ़ती गई और वह ईजिप्‍त जाकर बस गया। वर्षों बाद कस्‍टम का एक अधिकारी उसे मिला और उसने पूछा :’’मुल्ला अब जबकि तुम ग्रीस और पर्शिया के इलाके से बहार हो, इतनी शान औ शौकत से रह रहे हो। तुम क्‍या चुराकर ले जाते थे जिसे हम कभी पकड़ नहीं पाये।
      गधे, नसरूदीन ने कहा।
मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं--
      एक दिन लोग दौड़ते हुए मुल्‍ला नसरूदीन के पास आये। उन्‍होंने हांफते हुए कहा, ‘’मुल्‍ला तुम्‍हारी सास नदी में गिर गई। और वहां बहाव तेज है, वह समुंदर में बह जायेगी।
      पलक झपकते ही नसरूदीन नदी में कूद पडा और बहाव से उल्‍टे तैरने लका।
      लोग चिल्‍लाए, ‘’नहीं-नहीं, मुल्‍ला नीचे की और। व्‍यक्‍ति यहां से नीचे की और ही बह सकता है।
      मुल्‍ला ने कहा: ‘’सुनो मैं अपनी सास को अच्‍छी तरह से जानता हूं, अगर हम कोई नीचे की और बहता हो तो मेरी सास को ऊपर की और खोजना पड़ेगा।‘’
राज दरबार में--
      एक बार जगमगाती हुई पगड़ी पहन कर नसरूदीन दरबार में दाखिल हुआ। वह जानता था कि राजा उसे पसंद करेगा। और वह पगड़ी को उसे बेचने में सफल हो सकता है।
      ‘’मुल्‍ला, तुमने इस शानदार पगड़ी की क्‍या कीमत चुकाई।
      ‘’हजार स्‍वर्ण मुद्राएं सरकार।‘’
      वजीर मुल्‍ला की चाल को समझते हुए राजा के कान में फुसफुसाया: कोई बुद्धू ही इस पगड़ी की इतनी कीमत दे सकता है।
      तुमने इतनी ज्‍यादा कीमत क्‍योंकर चुकाई। हजार स्‍वर्ण मुद्राओं की पगड़ी कभी सूनी नहीं।
      बादशाह सलामत मैंने इसलिए दीं क्‍योंकि मैं जानता था पूरी दुनियां में एक ही बादशाह है, जो इसकी कीमत दे सकता है।
      राजा ने उसकी प्रशंसा से प्रसन्‍न होकर नसरूदीन को दो हजार स्‍वर्ण मुद्राएं दे दी।
      बाद में मुल्‍ला ने वज़ीर को बताया: ‘’तुम्‍हें पगडियों की कीमत पता होगी लेकिन मुझे राजाओं की कमजोरी पता है।‘’
खाने की चीज और पढ़ने की चीज--
      नसरूदीन बाजार से एक कलेजा खरीदा और वह उसे ले जा रहा था। दूसरे हाथ में उसे पकाने की विधि लिखा हुआ कागज था जिसे एक मित्र के पास से लाया था।
      अचानक चील ने झपट्टा मारा और उसके हाथ से कलेजा लेकर उड़ गई।
      नसरूदीन ने चिल्‍लाकर कहा, ‘’अरे मूरख, मांस ले गई तो ले जा, लेकिन उसे बनाने की विधि तो मेरे पास ही है।‘’
किसी और की चिट्ठी--
      नसरूदीन की लिखावट अच्‍छी नहीं थी। उसकी पढ़ने की क्षमता और भी खराब थी। लेकिन गांव के बाकी लोगों की अपेक्षा वह ज्‍यादा पढ़ा लिखा था। एक दिन एक आदमी का उसके भाई को संबोधित पत्र लिखने के लिए नसरूदीन तैयार हो गया।
      उस आदमी ने कहा, ‘’तुमने जो लिखा है उसे पढ़कर सुनाओ, मैं यह पक्‍का करना चाहता हूं कि कुछ रह तो नहीं गया।
      मुल्‍ला ने अपनी लिखाई पर नजर डाली। ‘’मेरे प्‍यारे भाई’’ से आगे वह पढ़ ही नहीं पाया। तब उसे इधर उधर देख कर कहां की कुछ समझ नहीं आ रहा की क्‍या लिखा है आगे।
      उस आदमी ने कहा, गजब है, तुम ने अभी-अभी आपने ही हाथ से सब लिखा है, और खुद तुम ही नहीं पढ़ पा रहे हो, फिर भला दूसरा इसे कैसे पढ़ सकता है।
      नसरूदीन ने कहा, पर भाई ये मेरी समस्‍या नहीं है। मेरा काम है, लिखना, सो मैंने लिख दिया। अब आगे वाले पढ़े या न पढ़े मैं क्‍या कर सकता हूं।
      वह गांव का आदमी मान गया। उसने कहा, ‘’और फिर चिट्ठी तुम्‍हारे लिए भी तो नहीं है।‘’
ओशो का नजरिया--
      मुल्‍ला नसरूद्दीन काल्‍पनिक चरित्र नहीं है। वह सूफी था। और उसकी मजार अभी तक है। लेकिन वह ऐसा आदमी था कि अपनी कब्र में जाकर भी उसने मज़ाक करना न छोड़ा। उसने ऐसी वसीयत लिखवाई कि उसकी कब्र का पत्‍थर मात्र एक दरवाजा हो, जिसपर ताला लगा हो। और चाबियां समुंदर में फेंक दी हों।
      अब यह अजीब है। लोग उसकी कब्र देखने जाते है। और उस दरवाजे के चारों और घूमते है। क्‍योंकि दीवालें है ही नहीं, सिर्फ द्वार खड़ा है बिना दीवालों के। और द्वार पर ताला पडा है। मुल्‍ला कब्र में पडा हंसता होगा।
      मैंने नसरूदीन से जितना प्रेम किया है उतना किसी से नहीं किया होगा। वह उन लोगों में से एक है जिन्‍होंने धर्म और हास्‍य को एक किया। नहीं तो वे हमेशा एक दूसरे की और पीठ किये हुए खड़े है। नसरूदीन ने उनकी पुरानी शत्रुता छोड़ने के लिए उन्‍हें विवश किया। जब धर्म और हास्‍य मिलते है। जब ध्‍यान हंसता है और हंसना ध्‍यान बन जाता है तब चमत्‍कार घटता है—चमत्‍कारों का चमत्‍कार।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड