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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अमीरों का गुरु—भाग--3 (ओशो)

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
दि लास्‍ट टैस्‍टामैंट—ए बी सी नेटवर्क के साथ वार्तालाप—ओशो
प्रभु का राज्‍य पाने को कौन नहीं चाहेगा? जीसस ने कहा है, एक ऊँट तक सूई की आँख में से निकल जाये, लेकिन एक अमीर आदमी कभी स्‍वर्ग के द्वार में प्रवेश नहीं कर सकता। अब यह आदमी जिम्‍मेदार है सारी दूनिया में फैली हुई गरीबी के लिए। वह समृद्धि की भत्‍र्सना कर रहा है। वह उस सृजनात्‍मकता की निंदा कर रहा है। जिससे सारा विश्‍व समृद्ध किया जा सकता है।
      मैं सभी आयामों की समृद्धि के पक्ष में हूं, और मैं यह कभी नहीं कह सकता कि धन्‍य है गरीब। यही कार्ल मार्क्‍स ने कहा; ‘’धर्म लोगों की अफीम है। सुंदर शब्‍दों का प्रयोग करना आसान है, लेकिन यदि तुम उसमे छिपे हुए आशय को समझ सको तो ईसाई आज क्‍या कर रहे है, और पिछले हजार वर्षों में उन्‍होंने क्‍या किया?वे अनाथालय खोल लेंगे, वे संतति नियमन के विरोध में है। वे गर्भपात के विरोधी है।


प्रश्‍न—हां कुछ ऐसे है।
ओशो—और जो नहीं है वे जल्‍दी ही निष्‍कासित किये जाएंगे। उन्‍हें निष्‍कासित क्या जा रहा है। और जो ऐसे है...जैसे उदाहरणार्थ स्‍वयं पोप गर्भपात के विरोध में है, संतति नियमन के विरोध में है। मनुष्‍य जाति के जीवन में जो सबसे क्रांतिकारी घटना है—गर्भनिरोध की ‘’पिल’’ गोली उसके विरोध में पोप है। जनसंख्‍या बढ़ती जा रही है। गरीबी बढ़ती जा रही है। और कौन जिम्‍मेदार है। इसके लिए? मेरे देखे वे सब लोग अपराधी है।
प्रश्‍न—क्‍या पोप?

ओशो—हां, पोप, उसे जेल खाने में बंद होना चाहिए।
प्रश्‍न—क्‍यों?

ओशो—इस प्रकार की वाहियात बातें लोगों को सिखाने के लिए कि बच्‍चे पैदा किये जाओ—वे परमात्‍मा की देन है। इथियोपिया के लिए पोप जिम्‍मेदार है। भारत की गरीबी के लिए पोप जिम्‍मेदार है। जहां कहीं भी गरीबी है उसके लिए ये लोग जिम्‍मेदार है। एक और परमात्‍मा के नाम पर जनसंख्‍या बढ़ाये चले जाते है, जो पहले ही इतनी ज्‍यादा है। लेकिन असली बात यह है कि वे केवल गरीबों को इसाईयत में धर्मांतरण कर सकते है। मैंने आज तक भारत में एक भी अमीर आदमी को ईसाइयत में धर्म परिवर्तन करते नहीं देखा। सिर्फ भिखारी, अनाथ, वेश्‍याओं जैसे लोग ईसाई बनते है।
प्रश्‍न—क्‍या संस्‍थापित धर्म जैसे ईसाइयत, हिंदू या बौद्ध धर्म का ऐसा कोई अंग है जिसे आप अच्‍छा समझते है।
ओशो—एक भी नहीं। मुझे अतीत से कोई लेना देना नहीं है। मैं चाहता हूं कि वह पूरी तरह मिट जाये। मैं अतीत के साथ विच्‍छेद करना चाहता हूं। कि वह पूरी तरह मिट जाये। तभी एक नयी मनुष्‍यता, एक नये जगत , एक नये मनुष्‍य का जन्‍म संभव है। इसलिए मैं सुनिश्चत रूप से कहता हूं उन धर्मों में सभी कुछ गलत है। और इसके प्रमाण सामने है। पूरी दुनियां में बखेड़ा मचा हुआ है। यही वे लोग है जिन्‍होंने दुनिया को प्रेम के सिद्धांत दिये, विचारधाराएँ दीं, व्‍यवस्‍थाएं दीं। और यह परिणाम है बौद्ध, हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, इस्‍लाम धर्म का। यह है नतीजा।
प्रश्न—आप कहते है सारे संसार में बखेड़ा मचा हुआ है। वस्‍तुत: आप मनुष्‍य को, इस संसार को कैसा बनाना चाहते है।
ओशो—मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि स्वस्थचित्त होने का एक मार्ग है। मैं यह कह रहा हूं कि मुक्‍त हो जाओ उस पागलपन से जो अतीत ने तुम्‍हारे भीतर भर दिया है।
प्रश्‍न—कैसे?

ओशो—सिर्फ तुम्‍हारी विचार प्रक्रिया के साक्षी बनकर। यह मेरी ध्‍यान की प्रक्रिया है। यह कोई प्रार्थना नहीं है। क्‍योंकि करने के लिए कोई ईश्‍वर नहीं हे। केवल मौन में बैठना है, देखना है साक्षी भाव से विचारों का आना जाना। केवल साक्षी भाव—कोई हस्‍तक्षेप नहीं, यहां तक कि कोई निर्णय, कोई पक्ष नहीं। क्‍योंकि जैसे ही तुम कहते हो यह हो वैसे हो तुम शुद्ध साक्षी भाव खो बैठते हो। जैसे ही तुम कहते हो यह अच्‍छा है। यह बुरा है। तुम विचार प्रवाह में संलग्‍न हो गये। साक्षी और मन के बीच अंतराल बनाने में थोड़ा समय लगता है। इस अंतराल के बनते ही तुम बड़े आश्‍चर्य से भर जाते हो। तुम्‍हें पता चलता है कि तुम मन नहीं हो, तुम एक साक्षी हो। एक द्रष्‍टा मात्र।
      यह द्रष्‍टा होने की प्रक्रिया ही असली धर्म कि कीमिया है। क्‍योंकि जैसे-जैसे तुम साक्षी भाव में गहरे उतरते चलते हो, वैसे-वैसे विचार तिरोहित होने लगते है। और फिर एक घड़ी आती है जब एक भी विचार नहीं बचता।
      तुम होते हो, परंतु मन एकदम खाली रहता है। वही बुद्धत्‍व की घड़ी है। यही वह घड़ी है जब पहली बार तुम संस्‍कारों से मुक्‍त हो जाते हो; स्वास्थ चित हो जाते हो, सही अर्थ में मुक्‍त मानव हो जाते हो।
प्रश्न—ओशो, कुछ वर्ष पूर्व जब आप इस देश में आए है, तब से बहुत कुछ तथाकथित आरोप के रूप में आपके वे आपके लोगों के विरूद्ध लिखा गया है। क्‍योंकि यह आप पहली बार सार्वजनिक रूप से बोल रहे है। मेरा निवेदन है कि कुछ बातें जो की गई है, उनके विषय में स्पष्ट करें। उदाहरण के लिए, आपके बारे में ऐसा लिखा गया है, और लोगों ने भी कहा है, कि आप एक ‘’मुक्‍त यौन गुरु’’ (फ्री सेक्‍स गुरु है) और आप एनकांउटर थेरेपी और मनो नियंत्रण ग्रुप्‍स के माध्‍यम से स्वच्छंद संभोग को बढ़ावा देते हो। सही है या गलत?

ओशो—क्‍या आपको लगता है कि यौन के लिए भी पैसे चुकाये जाने चाहिए? क्‍या यक मुफ्त नहीं होना चाहिए। क्‍या उस पर कोई रकम चुकानी चाहिए?
      मेरी दृष्‍टि में सेक्‍स एक सहज, सुंदर व प्राकृतिक घटना है। यदि दो व्‍यक्‍ति एक दूसरे के साथ अपनी ऊर्ज बांटना चाहते है। तो इसमें किसी और को हस्‍तक्षेप करने को कोई अधिकार नहीं है। और ‘’मुफ्त यौन’’ कहने का मतलब है कि तुम सैक्‍स को भी एक वस्‍तु बनाना चाहते हो। कि उसे भी खरीदना होगा। चाहे एक रात के लिए वेश्‍या से चाहे पूरी जिंदगी भर पत्‍नी से, परंतु निश्‍चित ही वह खरीदा जाये और उसकी कीमत चुकाई जाये।
      हां, मैं मुक्‍त यौन में मानता हूं, मेरी दृष्‍टि में सेक्‍स बांटना  और उसका आनंद लेना यह  सबका जन्‍मसिद्ध अधिकार है।  वह एक क्रीड़ा है, उसे गंभीरता से लेने की कोई जरूरत नहीं है। जो लोग मेरे बारे में कहते है, कि मैं मुक्‍त सैक्‍स सिखाता हूं। वे असल में रूग्‍ण और दयनीय है। वे कामवासना से दमित लोग है।
प्रश्‍न—मुझे ऐसा लगता है, उनके कहने का मतलब यह है कि इस जगह की ऐसी छाप बनी हुई है कि यहां उन्‍मुक्‍त योगाचार होता है।
ओशो—नहीं यहां कोई उन्‍मत्‍त योगाचार नहीं होता। और अगर लोग उन्‍मत्‍त योगाचार करना चाहते हों तो इस मामले में किसी को कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। यदि कुछ लोग मिलकर सामूहिक संभोग करना चाहते है तो उसमे बुरा क्‍या है। उसमें किसी का क्‍या नुकसान है? यदि दो व्‍यक्‍ति आनंद ले सकते हो तो दस लोग मिलकर क्‍यो नहीं ले सकते? एक बार हम सेक्‍स को स्‍वाभाविक, आनंदपूर्ण क्रीडा.....
      इसी लिए मैं गर्भनिरोधक गोली को आग की खोज के बाद सबसे बड़ी क्रांति कह रहा हूं। गोली न हर तरह की वाहियात बातों से, उसकी गंभीरता से, विवाह से, कानूनी विधियों से मुक्‍त कर दिया है। उसकी वजह से पहली बार मनुष्‍य एक मनुष्‍य की तरह सेक्‍स का आनंद लेने में कामयाब हुआ। उन पशुओं की तरह नहीं जो जैविक बंधनों में जकड़े हुए है।
      यहां कोई उन्‍मत्‍त योगाचार नहीं हो रहा। परंतु मैंने उसे रोका भी नहीं है। वह लोगों पर निर्भर करता है। यदि वे उन्‍मत्‍त योगाचार करना चाहते है तो ठीक है। परंतु वे लोग भी तुम्‍हारे समाज द्वारा संस्कार बद्ध है। उनके दिमाग में भी एक ही व्‍यक्‍ति के साथ संबंध की धारण है। उनके दिमाग में भी एकाधिकार, एक विवाह प्रथा ठूँसे हुए है।
प्रश्न—क्‍या यह अच्‍छी बात नहीं है?

ओशो—वह बिलकुल ही अप्राकृतिक है। आदमी जरा भी एक पति-पत्नी को मान कर चलने वाला प्राणी नहीं है। वह बहुगामी है यह सब जानते है। तुम्‍हारी पत्‍नी चाहे कितनी भी सुंदर हो, लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि कभी-कभार तुम सपने में दूसरी स्‍त्रीयों को नहीं देखते। किसी को सबसे बढ़िया पत्‍नी मिली हो। पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मनुष्‍य स्‍वभावत: बहुगामी है। एक पतित्‍व, पत्‍नीत्‍व उस पर थोपा गया है।
प्रश्‍न– क्‍या आप यह कहा रहे है कि आदमी अपनी बहुगामी नैसर्गिक वृतियां का अनुगमन करे?

ओशो—उसे सिर्फ अपनी प्रकृति का अनुगमन करना चाहिए फिर वह चाहे जहां ले जाये। बहुगामी बिलकुल ठीक है। असल में एक पतित्‍व-पत्‍नीत्‍व की अथवा बहुपतित्‍व-पत्‍नीत्‍व की कोई आवश्‍यकता नहीं है। मैं तो उसके भी एक कदम आगे हूं। मेरी दृष्‍टि में प्रेम और सेक्‍स का संबंध एक पूर्णत: मुक्‍त घटना है।
प्रश्‍न—आप यह कहना चाह रहे है, और मुझे लगता है आपने इस विषय में पहले भी सुझाव दिया है कि लोगों को सेक्‍स के विषय में कोई तथाकथित ‘’पश्‍चिमी खूंटियां’’ नहीं रखनी चाहिए। अभी-अभी आपने यह भी भविष्‍यवाणी की है कि एड्स दुनियां की दो तिहाई जनसंख्‍या को मार डालेगा, और आपने अपने अनुयायियों से कहा है कि वे संभोग में न उतरें। और यदि करना ही हो, तो एक ही व्‍यक्‍ति से करें, ऐसा क्‍यों?

ओशो—एड्स एक बिलकुल नयी घटना है, और उसके लिए सारे पुराने धर्म जिम्‍मेदार है।
प्रश्‍न—वे एड्स के लिए जिम्‍मेदार है?

ओशो—हां, एड्स के लिए।
प्रश्‍न—क्‍यों?

ओशो—जो भी गलत है उस सबके लिए वे जिम्‍मेदार है। ब्रह्मचर्य की सीख देकर समलैंगिकता तथा अन्‍य सब तरह की विकृतियां धार्मिक लोगों की बनाई हुई है। अब, स्‍त्रियों और पुरूषों को जबर्दस्‍ती ब्रह्मचारी बनाए रखना उनकी जैविक, रासायनिक, शारीरिक रचना उनकी सारी प्रकृति के विरूद्ध है। उनके लिए वह असंभव है। वे कोई न कोई मार्ग ढूंढ़ेगें, और निश्‍चित ही वह मार्ग विकृति का होगा।
      महिला संन्‍यासियों को अलग एक मठ में रखा जाता था, पुरूष संन्‍यासियों को अलग मठ में रखा जाता है। अभी भी ऐसे मठ है। जहां कभी भी स्‍त्री ने प्रवेश नहीं किया है। अब ये पुरूष संन्‍यासी असली समलैंगिक है। ये स्‍त्री संन्‍यासिनियां, स्‍त्री समलैंगिक कामुकता की अग्रदूत है। और एड्स इस सभी विकृतियां का अंतिम परिणाम है।
      मैं अपने लोगों को ब्रह्मचर्य के लिए इसलिए नहीं कहता कि उसमे कोई आध्‍यात्‍मिकता है। मैं उनसे कहता हूं कि बिना दमन के, केवल एक समझ के साथ तुम ब्रह्मचर्य पा सकते हो। उसके कारण तुम्‍हें कोई स्‍वर्ग में पुरस्कार मिलने वाला नहीं है। तुम तो सिर्फ अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति सावधानी भरत रहे होंगे। इतना पुरस्‍कार काफी है। परंतु यदि ब्रह्मचर्य पालना कठिन हो तो अपनी हिफाजत के लिए एड्स रोकने के लिए जो भी संभव तरीके हों वे अपनाए। एड्स के कारण अधिकतम जनसंख्‍या नष्‍ट हो जायेगी।
ओशो
दि लास्‍ट टेस्‍टामेंट