ओ प्यारे न्यारे प्रीतम..
तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं
तुम अपने प्रेम की बाते मुझे मत बतलाओ
मैंने उन्हें छूआ है, उसमें में
डूबी हूं।
उसने मुझे घेरा है अपने आगोश में
जानते हो तुम अब मैं उसे
भली भांति जानने लगी हूं
तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने
अब पल-पल अनुभव किया है,
और सबसे अधिक बुरा यह है कि
तुम्हारा चाबुक मारने जैसा डांट-फटकार
में भी मैंने उस प्रेम का अनुभव महसूस करने लगी हूं।
तुम अपनी वाणी से अपने प्रेम का बखान मत करो
वह एक ऐसा प्रवाहमान लावा है—
जिसमें मैं और मेरी सारी कमजोरी, मेरा भय,
मेरा अपना पन और नीचता डूब गई है।
अब भी आप उसकी तीव्र जलन और दर्द
को मेरे ह्रदय में महसूस कर सकते हो।
और केवल कुछ स्थान ही भय विहीन बने हैं
तुम्हारे प्रेम के ताप में वह सभी कुछ है
लेकिन उसने मेरी बुद्धि को नष्ट कर दिया है
तुम्हारे प्रेम की सुरक्षा की खातिर
मैंने अपने पिता को छोड़कर
तुम्हें अपने को सौंप दिया हैं।
तुम्हारे प्रेम का प्रमाण यह है कि
मैं एक बंदिनी बनकर रह गई हूं
तुम्हारे प्रेम के गीत न मुझे स्वर ही बना दिया है
मैं अब और गीत नहीं गा पाऊंगी
मैं अब और हूं ही नहीं
तुमने मुझसे प्रेम का एक जाम
ऐसे पिलाया है, जिसका शरूर
नित प्रति दिन चढ़ ही रहा है
वो नशा भी कितना मधुर है
जिसमें हो का एक प्रकाश है
किसी बेहोशी में भी, नहीं होने देता बेहोश।
ओ मेरे प्यारे प्रितम तुम ही अब मैं हूं
नहीं बची बीचकी दूरी कोई।
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