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रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-042)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-042  (झुकने से उपलब्धि)

अभिवादनसीलिस्स निच्चं पद्धापचायिनो।
चत्वारो धम्मा बङ्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं।।९६।।

यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो।
एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झयिनो।।९७।।

यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवीरियो।
एकाहं जीवितं सेय्यो विरियमारभतं दल्हं।।९८।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं उदयब्बयं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो उदयब्बयं।।९९।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो अमतं पदं।।१००।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं धम्ममुत्तमं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं।।१०१।।


आस्कर वाइल्ड की एक छोटी सी कहानी है। एक आदमी मरा। जिंदगी में लोग जो करना चाहते हैं, सब करके मरा। बड़ा पद, बहुत धन, सुंदर स्त्रियां--जो भी मनुष्य की आकांक्षाएं हैं--सभी को पूरी करके मरा।
परमात्मा के सामने न्यायालय में उपस्थित किया गया। स्वभावतः परमात्मा नाराज था। उसने कहा, बहुत पाप किए तुमने। तुम्हारे पास अपने किए गए पापों के लिए कोई उत्तर है? उस आदमी ने कहा, जो मैं करना चाहता था वह मैंने किया और उत्तरदायी मैं किसी के प्रति नहीं हूं। परमात्मा थोड़ा चौंका। उसने कहा, तुम हिंसा किए, हत्या किए, खून किए? उस आदमी ने कहा, निश्चित ही। तुमने धन के लिए लोगों की जानें लीं? तुमने व्यभिचार किया, बलात्कार किया? उस आदमी ने कहा, निश्चित ही। लेकिन उस आदमी के चेहरे पर शिकन भी न थी। न अपराध का कोई भाव था। न कोई चिंता थी। परमात्मा थोड़ा बेचैन होने लगा। अपराधी बहुत आए थे, यह कुछ नए ही ढंग का आदमी था। परमात्मा ने कहा, जानते हो, तुम्हारा यह बार-बार कहना कि हां, निश्चित ही, मैं तुम्हें नर्क भेज दूंगा! उस आदमी ने कहा, तुम भेज न सकोगे। क्योंकि मैं जहां भी रहा, नर्क में ही रहा। अब तुम मुझे कहां भेजोगे? मैंने नर्क के सिवाय कभी कुछ जाना ही नहीं, अब तुम हमें और कहां भेजोगे जहां नर्क हो सकता है?
अब तो परमात्मा के चेहरे पर पसीना झलक आया। कुछ सूझा न उसे। अब तक के सारे निर्णय, अब तक की लंबी सनातन से चली आती हुई घटनाएं, कोई काम न पड़ीं। कोई फाइल सार्थक न मालूम हुई। उसने कहा--घबड़ाहट में--कि फिर मैं तुम्हें स्वर्ग भेज दूंगा। उस आदमी ने कहा, यह भी न हो सकेगा। परमात्मा ने कहा, तुम आखिर हो कौन? मेरे ऊपर कौन है, जो मुझे रोक सके तुम्हें स्वर्ग भेजने से! उस आदमी ने कहा, मैं हूं। क्योंकि मैं सुख की कल्पना ही नहीं कर सकता और हर सुख को दुख में बदल लेने में मैं इतना निष्णात हो गया हूं। तुम मुझे स्वर्ग न भेज सकोगे। तुम भेजोगे, मैं नर्क बना लूंगा। मैंने सुख का स्वप्न भी नहीं देखा। सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं, तुम मुझे स्वर्ग कैसे भेजोगे?
और कहते हैं, मामला वहीं अटका है। परमात्मा सोच रहा है, इस आदमी को कहां भेजें? नर्क भेज नहीं सकता, क्योंकि नर्क में वह रहा ही है। स्वर्ग भेज नहीं सकता, क्योंकि स्वर्ग भेजने का उपाय नहीं है।
इस कहानी को ध्यानपूर्वक समझने की कोशिश करना। यह किसी और आदमी की कहानी नहीं, सभी आदमियों की कहानी है। तुम वहीं भेजे जा सकते हो, जहां तुम जाना चाहते हो। और अगर सुख की तुम्हारे जीवन में स्वप्न की भी क्षमता खो गयी है, तो तुम्हें कोई भी स्वर्ग नहीं दे सकता। स्वर्ग कोई दान नहीं। स्वर्ग किसी के अनुग्रह से न मिलेगा। अर्जित करना होगा।
सुख भी सीखना पड़ता है। सुख का स्वाद भी सीखना पड़ता है। और अगर तुम स्वाद को न जानो, तो सुख पड़ा रहेगा तुम्हारी थाली में, तुम उसे चख न सकोगे, तुम उसे अपना खून-मांस-मज्जा न बना सकोगे, वह तुम्हारी रक्त की धार में न बह सकेगा, वह तुम्हारे जीवन की रसधार न बनेगी।
और दुख भी तुम्हारा जीवन का ढंग है। तुम्हारे हाथ में जो पड़ जाता है, तुम दुख में बदल देते हो।
जो देखते हैं दूर और गहरा, उनसे अगर पूछो, जागे हुओं से पूछो, तो वे कहेंगे, सुख और दुख होते ही नहीं। तुम्हीं हो। वही घटना सुख बन जाती है किसी के हाथ में, वही घटना दुख बन जाती है। कोई उसी घटना को दुर्भाग्य बना लेता है, कोई उसी को सौभाग्य बना लेता है। सारी बात तुम पर निर्भर है। तुम आत्यंतिक निर्णायक हो। परमात्मा भी तुम्हें स्वर्ग नहीं भेज सकता, नर्क नहीं भेज सकता। तुम जहां होना चाहते हो, वहीं हो और वहीं रहोगे। तुम्हारी स्वतंत्रता अंतिम है। तुम अपने मालिक हो।
बुद्ध का इस बात पर गहनतम जोर है कि तुम अपने मालिक हो, कोई और मालिक नहीं। इसलिए बुद्ध ने परमात्मा की बात ही नहीं की। उन्होंने कहा, बात ही क्या उठानी! आदमी आत्यंतिक रूप से जब खुद ही निर्णायक है, तो परमात्मा को छोड़ ही दो। परमात्मा को बीच में लाने से भ्रम बढ़ सकता है। भ्रम इस बात का कि चलो मैं गलती करूंगा, तो वह क्षमा कर देगा; कि चलो मैं भूल-चूक करूंगा, तो वह राह पर लगा देगा। इससे भूल-चूक करने में सुविधा मिल सकती है। परमात्मा की आड़ में कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने को बदलने के उपाय छोड़ दो।
तो बुद्ध ने कोई आड़ ही न दी। बुद्ध ने कहा, कोई आड़ की जरूरत नहीं, क्योंकि अंततः तो परमात्मा भी तुम्हारे विपरीत कुछ न कर सकेगा। हो, तो भी कुछ न कर सकेगा। और जब तुम्हीं करने वाले हो, तुम्हीं निर्णायक हो, तो यह परमात्मा शब्द कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बेईमानियों को, तुम्हारी धोखाधड़ियों को छिपाने का आधार बन जाए। इसे हटा ही दो।
इसलिए बुद्ध का सारा जोर तुम पर है, मनुष्य पर है। बुद्ध का धर्म मनुष्य केंद्रित-धर्म है, उसमें परमात्मा की कोई भी जगह नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि बुद्ध के धर्म में परमात्मा का आविर्भाव नहीं होता। होता है, लेकिन मनुष्य से होता है। परमात्मा कहीं दूर आकाश में बैठा हुआ किसी सिंहासन पर नहीं है। मनुष्य के हृदय से ही उठती है वह सुगंध। दूर आकाश को व्याप्त कर लेती है।
और धर्मों का परमात्मा अवतरित होता है--हिंदू कहते हैं, अवतार--बुद्ध का परमात्मा अवतरित नहीं होता, ऊपर से नीचे नहीं आता। ऊर्ध्वगमित होता है। नीचे से ऊपर जाता है। ज्योति की तरह है, वर्षा की तरह नहीं। वर्षा ऊपर से नीचे गिरती है। आग जलाओ, लपटें ऊपर की तरफ भागती हैं।
तो बुद्ध कहते हैं, जहां चैतन्य की ज्योति जलने लगी, वहां परमात्मा प्रगट होने लगता है। तुम जब पूरे जल जाओगे, जब तुम्हारे भीतर सारा कचरा-कूड़ा जल जाएगा, तुम खालिस कुंदन हो जाओगे, एक शुद्ध लपट रह जाओगे जीवन-चेतना की, बोध की, प्रकाश की, तुम्हीं परमात्मा हुए।
अभी तुम जो हो, उसके कारण भी तुम्हीं हो। कल तक तुम जो थे, उसके कारण भी तुम्हीं थे। कल भी तुम जो होओगे, उसके कारण भी तुम्हीं होगे। इस बात को खयाल में ले लेना। यह आधारभूत है। बुद्ध के साथ बचने का उपाय नहीं। लुका-छिपी न चलेगी। बुद्ध ने आदमी को वहां पकड़ा है जहां आदमी सदियों से धोखा देता रहा है। बुद्ध ने मनुष्य को छिपने की कोई ओट नहीं छोड़ी। इसलिए बुद्ध का साक्षात्कार आत्म-साक्षात्कार है। बुद्ध को समझ लेना अपने को समझ लेना है। बुद्ध के साथ पूजा न चलेगी, प्रार्थना न चलेगी; बुद्ध के साथ भिक्षापात्र न चलेगा; बुद्ध के साथ तो आत्मक्रांति, रूपांतरण, खुद को बदलने का दुस्साहस!
पहला सूत्र है--
'जो अभिवादनशील है और जो सदा वृक्षों की सेवा करने वाला है, उसकी चार बातें (धर्म) बढ़ती हैं: आयु, वर्ण, सुख और बल।'
एक-एक शब्द समझना होगा। क्योंकि बुद्ध जब शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो वह वैसा ही नहीं है जैसा औरों ने किया है। शब्द तो वही हैं, लेकिन बुद्ध ने उन पर अर्थों की बड़ी नयी कलमें लगायी हैं।
'जो अभिवादनशील है।'
बुद्ध ने अभिवादन करने को तो कोई भी नहीं छोड़ा। परमात्मा है नहीं। ऐसे तो कोई चरण नहीं हैं जहां सिर झुकाना हो। लेकिन फिर भी सिर झुकाने की कला को स्वीकार किया। इसलिए बात जरा सूक्ष्म हो जाती है। स्थूल पैर हों, तो सिर झुकाना बड़ा आसान। एक बार भरोसा कर लिया कि परमात्मा है, पैर हैं, झुक गए। झुकना सहज हो जाता है, पैर हों तो।
बुद्ध कहते हैं, पैर तो यहां कोई भी नहीं हैं। यहां कोई नहीं है जिसके सामने झुको, लेकिन झुकने की कला मत भूल जाना। इसलिए बात जरा सूक्ष्म और नाजुक हो जाती है। गहरी समझ होगी तो ही पकड़ में आएगी। स्थूल बुद्धि की भी पकड़ में आ जाता है कि यह पैर छूने योग्य हैं, क्योंकि इनसे पाने योग्य कुछ है। तो छूना भी व्यवसाय हो जाता है।
मंदिर में जाकर लोग झुक लेते हैं परमात्मा के चरणों में, पाने की आकांक्षा है कुछ। इन चरणों से मिल सकेगी, इन चरणों के प्रसाद से मिल सकेगी। यह झुकना न हुआ, सौदा हुआ। यह तुम परमात्मा का भी उपयोग करने चले गए। यह प्रार्थना न हुई। इसे तुम प्रार्थना मत कहना। यह तो परमात्मा को भी साधन बना लेना हुआ।
तुमने कभी ऐसी प्रार्थना की है जिसमें कुछ न मांगा हो? अगर नहीं, तो फिर प्रार्थना की ही नहीं। भक्ति शास्त्र कहता है--प्रार्थना करना, मांगना मत, नहीं तो प्रार्थना खंडित हो जाएगी। बुद्ध एक कदम और आगे ले जाते हैं। वे कहते हैं, प्रार्थना भी करना, मांगना भी मत, और कोई है भी नहीं जिससे तुम मांग सको। इसलिए मांगोगे, तो तुम कोरे आकाश में अपने से ही बातें कर रहे हो। इसलिए मांगना सिर्फ तुम्हारे अज्ञान की सूचना होगी। मगर अभिवादन, झुकने की कला, विनम्रता, समर्पित होने का भाव, ये बहुमूल्य हैं।
बुद्ध ने जोर परमात्मा से हटा दिया, तुम पर ला दिया। अभिवादन तुम्हें करना है, कृतज्ञता ज्ञापन तुम्हें करना है, अनुग्रह का भाव तुम्हें करना है, कोई वहां है स्वीकार करने वाला या नहीं; नमस्कार तुम्हें करनी है, कोई वहां है नमन योग्य या नहीं, इस व्यर्थ चिंता में मत पड़ो। क्योंकि नमस्कार ही वरदान है। तुम झुके, इसमें ही पा लिया।
कोई देता नहीं है, झुकने से मिलता है। वहां कोई दाता नहीं बैठा है कि तुम झुकोगे--ज्यादा झुकोगे तो ज्यादा देगा, कम झुकोगे तो कम देगा, दिन-रात झुकते ही रहोगे तो देता ही चला जाएगा। जो न झुकेंगे उनको सजा देगा, जो विपरीत चलेंगे उनको नर्क में डाल देगा, ऐसा वहां कोई भी नहीं है। तुम्हारे झुकने से ही मिलता है। झुकने में ही मिलता है। झुकना ही मिलना है। इसलिए बात बिलकुल आंतरिक है, तुम्हारी है, आत्मगत है। अकड़े, खोया। झुके, पाया। अकड़ से खोया, झुकने से पाया। न किसी ने छीना, न किसी ने दिया। परमात्मा को ऐसा बुद्ध ने हटा दिया। मंदिर नहीं मिटाया, परमात्मा को हटा दिया।
इसे थोड़ा समझो।
मंदिर को तो बनाए रखा। परमात्मा की मौजूदगी भी बाधा थी। मंदिर पूरा खाली न हो पाता था। परमात्मा की मौजूदगी के कारण, तुम झुकते भी थे तो स्वार्थ आ जाता था। परमात्मा की मौजूदगी के कारण, तुम जितना नहीं झुकना चाहते थे--कभी-कभी अतिशय कर जाते थे--उतना भी झुक जाते थे। धोखा आ जाता था। परमात्मा की मौजूदगी तुम्हें बिलकुल नितांत अकेला न होने देती थी। तुम पूरे-पूरे स्वयं न हो पाते थे।
कभी तुमने खयाल किया, दूसरे की मौजूदगी कभी अकेला नहीं होने देती। तुम अपने स्नानगृह में स्नान कर रहे हो, अचानक तुम्हें खयाल आ जाए कि कोई चाबी के छेद से झांक रहा है, सब बदल गया। एक क्षण में सब बदल गया। अब तुम वही नहीं हो जो क्षणभर पहले थे। क्षणभर पहले दर्पण के सामने मुंह बिचका रहे थे, बचपन आया था, लौट गए थे पीछे, खुश थे, गीत गुनगुना रहे थे। लाख कहते हैं लोग तुमसे, गीत गुनगुनाओ; तुम कहते हो, गला नहीं; स्नानगृह में भूल जाते हो। सभी गुनगुनाने लगते हैं। स्नानगृह में न गुनगुनाने वाला आदमी खोजना मुश्किल है। सभी वहां गायक हो जाते हैं। तुम ऐसे काम कर लेते हो कि अगर तुम भी अपने को पकड़ लो करते हुए, तो शरमा जाओ। मगर कोई झांकता है चाबी के छेद से, सब बदल गया। तुम वही न रहे जो क्षणभर पहले थे। मौजूदगी ने तुम्हें झूठा कर दिया।
बुद्ध कहते हैं, परमात्मा की मौजूदगी तुम्हें सच्चा ही न होने देगी। क्योंकि उसको तो चाबी के छेद से झांकने की जरूरत नहीं, वह तो सभी जगह मौजूद है। तुम नहा रहे हो, वह खड़े हैं। तुम कुछ भी करो, उनसे तुम बचकर न जा सकोगे। वह तुम्हें स्थान न देंगे। वह तुम्हें चारों तरफ से घेर लेंगे। तुम बंधे-बंधे हो जाओगे।
बुद्ध ने कहा है, परमात्मा से मुक्त हो जाना मोक्ष का पहला कदम है। तभी तुम्हारी सहजता प्रगट होगी, तभी तुम सहजस्फूर्त होओगे। कोई नहीं है, तुम ही हो--निर्णायक, नियंता, मालिक।
इसे तुम स्वच्छंदता मत समझ लेना। क्योंकि इसी के साथ आता है परम दायित्व। क्योंकि फिर तुम्हारे ऊपर जो भी बीत रहा है, उसके जिम्मेवार भी तुम्हीं हो। दुख पाया, तुम्हीं ने बोया होगा। नर्क आया, तुमने ही निमंत्रण भेजा होगा। अंधेरे ने घेर लिया है, तुमने ही रचा होगा, तुमने ही सजाया होगा। मांगा होगा किसी अज्ञान के क्षण में, आ गया है अब। मांगने और आने में समय का फासला रहा होगा, लेकिन बिना तुम्हारे मांगे कुछ भी नहीं आता। फसल तुम वही काटते हो, जिसके तुम बीज बोते हो।
स्वच्छंदता नहीं है, स्वतंत्रता है। लेकिन स्वतंत्रता परम दायित्व है। अब तुम किसी और पर बोझ न रख सकोगे। भगवान को मानने वाला तो बोझ रख सकता है। वह कहता है, तूने दिया। तूने ऐसा करवाया, हम क्या करें? वह तो अपनी गठरी परमात्मा के कंधों पर रखने की उसे सुविधा है। बुद्ध के पास यह उपाय नहीं। गठरी तुम्हारी है, तो कंधा भी तुम्हारा है। उतारनी है, तो जिस तरह बनायी है, उसी तरह उतारनी होगी। जिस तरह बीज बोए, उसी तरह काटने भी होंगे। एक-एक बीज को दग्ध करना होगा, तभी तुम्हारे भीतर मुक्ति का प्रकाश होगा।
'जो अभिवादनशील है।'
इसलिए बुद्ध कहते हैं, अभिवादनयोग्य तो कोई भी नहीं, लेकिन फिर भी अभिवादनशील तो रहना। कठिन होगा, लेकिन अगर समझोगे...बारीक है बहुत, फूल जैसा नहीं, सुगंध जैसा है। फूल को तो पकड़ भी लो, मुट्ठी में बांध भी लो। परमात्मा को मानने वाले की बातें फूल जैसी हैं। सुंदर। मुट्ठी में बांधी जा सकती हैं। बुद्ध की बातें फूल से मुक्त हो गयी सुवास जैसी हैं। अब तुम मुट्ठी भी न बांध सकोगे। अब बात बड़ी बारीक हो गयी। अब सीमाएं हट गयीं सब, असीम हो गयी।
'अभिवादनशील है जो।'
उसे बुद्ध चरित्र का पहला चरण मानते हैं। बुद्ध के पास जो जाता दीक्षा लेने, कहता--बुद्धं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। किसी ने बुद्ध को पूछा कि आप तो कहते हैं अभिवादनयोग्य कोई भी नहीं, फिर कौन के प्रति लोग आकर कहते हैं--बुद्ध के शरण जाता हूं? तो बुद्ध ने कहा, बुद्ध का अर्थ ही वही है, जिसने जान लिया कि मैं नहीं हूं। शून्य के प्रति शरण जाते हैं। मैं सिर्फ बहाना हूं। मैं नहीं रहूंगा तब भी यह पाठ जारी रहेगा। मेरे होने, न होने से इसमें कोई फर्क न पड़ेगा। मैं था, मैं नहीं था, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। ये बुद्ध पुरुष की शरण नहीं जाते, बुद्धत्व की शरण जाते हैं। बोधि की शरण जाते हैं। होश की शरण जाते हैं। जागरण की शरण जाते हैं। स्मृति की शरण जाते हैं। मैं तो बहाना हूं।
जैसे सुगंध आयी हो और तुम्हें कठिन हो जाए, कहां अभिवादन करो, तो फूल को अभिवादन कर दो। बाकी सुगंध तो अब मुक्त हो गयी है। फूल चला भी जाए तो भी सुगंध इस आकाश में व्याप्त रहेगी। बुद्ध आते हैं, जाते हैं, बुद्धों की सुवास तो सदा बनी रहती है। जिनके पास देखने की क्षमता होती है, अनुभव करने की क्षमता होती है, उनके लिए बुद्ध कभी मिटते नहीं। और जिनकी आंखें अंधी हैं, कान बहरे हैं, उनके सामने भी साकार बुद्ध की प्रतिमा खड़ी होती है, तो भी उन्हें कुछ दिखायी पड़ता नहीं।
'जो अभिवादनशील है, जो सदा वृक्षों की सेवा करने वाला है।'
वृक्षों की! कहां यह आदमी परमात्मा से मुक्त होने की बात करता है, कहां कहता है वृक्षों की सेवा! वृक्ष बुद्ध के लिए प्रतीक है--जीवन का, विकास का, हरियालेपन का, ताजगी का, गति का।
बुद्ध के मरने के पांच सौ वर्ष तक बुद्ध की कोई प्रतिमा नहीं बनायी गयी। क्योंकि बुद्ध ने कहा, जरूरत क्या? मैं जिस वृक्ष के नीचे ज्ञान को उपलब्ध हुआ था, उसी की पूजा कर लेना। इसलिए बोधिवृक्ष की पूजा चली। पांच सौ वर्षों तक बुद्ध के मंदिर बने, उनमें सिर्फ बोधिवृक्ष का प्रतीक बना देते थे। काफी था। वृक्ष जीवन का प्रतीक है।
बुद्ध ने कहा, बजाय परमात्मा के चरणों में झुकने के...क्योंकि परमात्मा के चरणों में झुकना बड़ा आसान है, इतनी महिमापूर्ण घटना के चरणों में झुककर तुम भी महिमावान हो जाते हो। तुमने खयाल किया, परमात्मा के चरणों में झुकने में भी हो सकता है अहंकार मजा लेता हो। हम कोई साधारण किसी के चरणों में थोड़े ही झुक रहे हैं, परमात्मा के चरणों में झुक रहे हैं! ये राम के चरण, ये कृष्ण के चरण! और हम झुकने वाले, हम भी कुछ छोटे न रहे! वृक्षों के चरणों में झुकना? यह बात ही कुछ बेबूझ हो जाती है। बुद्ध यह कह रहे हैं, झुकना ही हो तो छोटों के चरणों में झुकना। बुद्ध यह कह रहे हैं, झुकना ही हो तो ऐसे चरणों में झुकना कि कहीं झुकने में से ही अहंकार न निकलने लगे।
अब वृक्ष के चरणों में झुककर क्या अहंकार निकलेगा? लोग हंसें भला! लोग कहें, क्या कर रहे हो? मखौल भला उड़ायी जाए, लेकिन कहां सम्हालोगे अहंकार को! अहंकार तो सहारे चाहता है। अहंकार आकाश की तरफ देखता है। वृक्षों के चरणों में झुकने का अर्थ है, पृथ्वी के चरणों में झुकना। वहां, जहां वृक्ष की जड़ें हैं। मूल की तरफ झुकना, फूल की तरफ नहीं। परमात्मा तो आखिरी फूल है।
अगर हम जीवन को गौर से देखें तो वृक्ष जीवन की पहली झलक है, परमात्मा आखिरी। वृक्ष में पहली बार जीवन गतिमान हुआ है। परमात्मा अंतिम आरोहण है। तुम अंतिम की तरफ मत झुकना, तुम प्रथम की तरफ झुकना। क्योंकि यात्रा पहले ही कदम से होती है, अंतिम कदम से नहीं। मंजिल भूलो, उसकी कोई फिकर नहीं; पहले कदम को सम्हाल लो।
बड़े सौंदर्य का प्रतीक है वृक्ष। शांति का, मौन का, ताजगी का, नयेपन का-- अतीत के बोझ को नहीं ढोता; प्रतिपल नया है--छाया का, शीतलता का, विश्राम का; देता चला जाता है--दान का; तुम मारो पत्थर भी, तो भी फल ही दे देता है।
इसलिए बुद्ध ने बड़ी बेबूझ सी बात कही, 'जो अभिवादनशील है और वृक्षों की सेवा करने वाला है, उसकी चार बातें बढ़ती हैं।'
ये चार बातें समझने जैसी हैं।
'आयु, वर्ण, सुख और बल।'
कोई बड़ी बातें नहीं मालूम होतीं। यह भी कोई बात हुई, बुद्ध के मुंह पर शोभा भी नहीं देती। आयु बढ़ाकर भी क्या होगा? वर्ण बढ़ने से क्या होगा? शूद्र न हुए ब्राह्मण हुए, क्या फर्क पड़ेगा? सुख, सुख तो सब सांसारिक है। और बल, शक्ति, वह तो अहंकार का ही परिपोषण करेगी।
नहीं, बुद्ध का अर्थ समझना होगा। आगे के सूत्र साफ हो जाएंगे, तब खयाल में आ जाएगा।
बुद्ध कहते हैं, आयु का संबंध समय की लंबाई से नहीं, गहराई से है। तुम सौ साल जीओ, यह सवाल नहीं है। तुम एक क्षण ध्यान में जी लो, बस। आयु बढ़ी। अमृत का स्वाद लगा। सौ साल भी जीओ, तो स्वप्न में ही जीते हो। वह जीना वास्तविक आयु नहीं है, आयु का भ्रम है। जैसे कोई रात सपना देखे और सपने में हजार साल जीए, सुबह जागकर पाए, हाथ खाली के खाली। क्या सुबह कहेगा, रात बड़ी लंबी आयु पायी? स्वप्न में गंवायी, लंबी हो कि छोटी, क्या फर्क पड़ता है?
आयु को बुद्ध कहते हैं, ध्यानपूर्वक एक क्षण भी उपलब्ध हो जाए, तो शाश्वत है। ध्यान से समय के पार जाने का द्वार खुलता है। जिसे हम आयु कहते हैं, वह समय की लंबाई है। जिसे बुद्ध आयु कहते हैं, वह शाश्वत में छलांग है। वहां कोई समय नहीं। समय के नीचे उतर जाना है। समय से गहरे उतर जाना है। जैसे सागर की छाती पर लहरें हैं--तुम डुबकी लगा लो, लहरों के नीचे उतर गए। ऐसी समय की लहरें हैं सनातन, शाश्वत की छाती पर, तुम डुबकी लगा लो, तुम गहरे उतर गए। वहां है असली आयु। वहां बुद्ध पुरुष जीते हैं।
वर्ण से बुद्ध का अर्थ साधारण हिंदू वर्ण-व्यवस्था से नहीं है। क्योंकि बुद्ध ने कहा है, ब्राह्मण वही, जो ब्रह्म को जान ले। शूद्र वही, जो शरीर को ही सब मानकर जीए। तो बुद्ध ने कहा है, शूद्र सभी पैदा होते हैं, ब्राह्मण कभी-कभी कोई बन पाता है। पैदा तो सभी शूद्र होते हैं। शूद्र होना स्वाभाविक है। ब्राह्मण के घर में भी जो पैदा होता है, वह भी शूद्र ही पैदा होता है। लेकिन शूद्र के घर में भी कोई अगर स्वयं के ज्ञान को उपलब्ध हो जाए तो ब्राह्मण हो जाता है।
तो बुद्ध का वर्ण आत्मक्रांति का है।
बुद्ध कहते हैं, जिसने अभिवादन सीखा, जिसने झुकना सीखा, जिसने जीवन के मूल पर श्रद्धा के फूल चढ़ाए, उसके जीवन में शाश्वत उतरता है। शाश्वत के पीछे-पीछे ही शूद्रता विलीन हो जाती है, जैसे प्रकाश के आने पर छाया अंधेरा खो जाता है। वैसा व्यक्ति ब्राह्मणत्व को उपलब्ध हो जाता है, क्योंकि ब्रह्म को उपलब्ध हो जाता है। शाश्वत यानी ब्रह्म।
फिर सुख है। तुमने जिसे सुख कहा, वह नाममात्र को है, पीछे तो दुख ही छिपा है। ऊपर-ऊपर सुख लिखा है, भीतर-भीतर दुख छिपा है। बुद्ध सुख उसे कहते हैं, जो प्रथम में सुख, मध्य में सुख, अंत में सुख। जो कहीं से भी चखो, तो सुख। जिसे कैसे ही उलटो-पलटो, तो सुख। जिसको तुम कुछ भी करो, तो सुख।
जापान में बुद्ध का महान संन्यासी भक्त हुआ, बोधिधर्म। उसकी प्रतिमा पूजी जाती है। जापान में उसका नाम है, दारुमा। तुमने दारुमा की जापानी गुड़ियां देखी होंगी। उन गुड़ियों की खूबी यह है कि उनको फेंको कैसा ही, वे हमेशा पालथी मारकर बैठ जाती हैं। उनकी पालथी वजनी है, अंदर शीशा भरा है। उनको फेंको उलटा-सीधा, लुढ़काओ, कुछ भी करो, कोई उपाय नहीं है, दारुमा हमेशा अपनी पालथी मारकर बुद्ध की भांति बैठ जाते हैं।
इसको बुद्ध सुख कहते हैं। तुम कुछ भी करो, उलटा करो, सीधा करो, ऐसा, वैसा, यहां से चखो, वहां से चखो, तुम उसे सुख ही पाओगे। जो प्रथम में, मध्य में, अंत में सुख है।
तुमने जिन्हें सुख जाना है, वह प्रथम तो सुख मालूम होते हैं, मालूम हुए भी नहीं कि जहर फैला। स्वाद लिया भी नहीं था कि तिक्तता आने लगी। हाथ बढ़ा ही नहीं था कि कांटे चुभने लगे। यह सुख नहीं है। यह तो ऐसा ही है जैसा मछली को पकड़ने के लिए हम कांटे में आटा लगाते हैं। कोई आटा खिलाने को थोड़े ही मछलियों को बांधकर बंसी में बैठा है! आटे में कांटा छिपाया हुआ है। मछली कांटा नहीं खाएगी, आटा खाएगी। लेकिन जो बंसी लगाकर बैठा है, उसकी नजर कांटे पर है।
जिनको तुमने सुख कहा है, उनके भीतर कांटे छिपे हैं। फंसोगे तुम कांटे में। जाओगे आटे की आशा में। हजार-हजार अनुभवों के बाद भी हम सीखते नहीं। जहां-जहां सुख दिखायी पड़ता है, फिर दौड़ जाते हैं। फिर कहीं आटा दिखायी पड़ा, चली मछली! सब अनुभव को बिसरा कर, सब भूल कर।
पहले भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन आशा बड़ी अदभुत है। आशा से बड़ी कोई शराब नहीं। आशा कहती है, कौन जाने इस बार वैसा न हो, आटा ही आटा हो। एक बार कांटा था, हजार बार कांटा था, लेकिन एक हजार एकवीं बार हो सकता है कांटा न हो। अब तक बहुत दुख पाया, इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि आगे भी दुख होगा। एक और प्रयास करके देख लें। बस, आशा ऐसे ही एक प्रयास के सहारे जीती है। तुम फिर-फिर वही भूलें करते हो। तुम फिर-फिर उसी चाक में भरमते हो और आशा तुम्हें भरमाए चली जाती है।
बुद्ध कहते हैं सुख उस घटना को, जो शाश्वत और ब्रह्म के अनुभव से उपलब्ध होती है।
और बल। बल, जब तुम अत्यंत निराकार हो जाते हो, तब तुम्हारे भीतर से बल प्रवाहित होता है। जब तुम बांस की पोंगरी बन जाते हो, तब तुम्हारे भीतर से अनंत की धारा प्रवाहित होने लगती है। तब तुम सिर्फ द्वार होते हो। बल तुम्हारा तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि अंश का क्या बल! खंड का क्या बल! अखंड का ही बल हो सकता है। बूंद का क्या बल! सागर का ही हो सकता है। जब बूंद अपने को सागर में खो देती है, विराट के साथ एक हो जाती है, तो बलवान होती है।
बुद्ध कहते हैं, तुम जब तक अपने को पकड़े रहोगे, निर्बल रहोगे। जैसे ही छोड़ा, बलवान हुए। यह बल, हमारा साधारण पद, प्रतिष्ठा, तलवार, धन, तिजोड़ी का बल नहीं है। यह बल शून्य का बल है। मिटने से उपलब्ध होता है।
जीसस ने कहा है, जो अपने को बचाएंगे, खो जाएंगे। जो अपने को खो देंगे, केवल वही बचते हैं। उसी बल की बात हो रही है।
जिंदगी जिससे इबारत हो तो वो जीस्त कहां
यूं तो कहने के तईं कहिए कि हां जीते हैं
ऐसे कहे चले जाते हैं कि हां, जीते हैं। मगर जिंदगी, जिसको कहें जिंदगी, वह कहां है! वह कहीं दिखायी नहीं पड़ती। जिंदा होकर भी हम मरे-मरे से हैं। न बल है, न सुख है, न ब्राह्मणत्व है, न शाश्वत की कोई झलक है। सब तरफ से मौत ने घेरा है, इसे तुम जिंदगी कहे चले जाते हो? प्रतिपल गंवाए चले जाते हो और इसको तुम विकास कहे चले जाते हो? हर सुख दुख बनता जाता है, हर स्वर्ग की आशा नर्क में परिवर्तित होती जाती है, फिर भी तुम कहे चले जाते हो कि जिंदगी है यह।
जिंदगी जिससे इबारत हो तो वो जीस्त कहां
यूं तो कहने के तईं कहिए कि हां जीते हैं
ऐसा किसको धोखा दे रहे हो? जिस दिन तुम्हें समझ में आ जाता है कि यह धोखा अपने को है, उसी दिन क्रांति की शुरुआत होती है, सूत्रपात होता है। और ध्यान रखना, जिस ऊर्जा से नर्क बनता है, उसी ऊर्जा से स्वर्ग भी बनता है। और जिस ऊर्जा से तुम्हारे जीवन में अंधकार आता है, उसी ऊर्जा से प्रकाश भी आता है। क्योंकि वे भिन्न नहीं हैं। सिर्फ तुम्हारे देखने का ढंग बदलने की बात है।
जहां घृणा करती है वास
जहां शक्ति की अनबुझ प्यास
जहां न मानव पर विश्वास
उसी हृदय में, उसी हृदय में
उसी हृदय में, वहीं, वहीं
जग की व्याकुलता का केंद्र
जहां से तुम्हारे भीतर अनबुझ प्यास उठती है शक्ति की और तुम दौड़ पड़ते हो धन पाने, पद पाने; वहीं से, उसी केंद्र से समझ के साथ जब यह दौड़ उठती है, तो तुम पद पाने नहीं, परमपद पाने चलते हो। तब तुम धन जो बाहर है उसे पाने नहीं, धन जो भीतर है उसे पाने चलते हो। तब तुम जिस जिंदगी का अंत आज नहीं कल कब्र में हो जाएगा, उस जिंदगी पर समय व्यय नहीं करते, तुम उस अमृत की खोज में लग जाते हो जिसका कोई अंत नहीं है।
पर आदमी स्थगित किए चला जाता है। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें इन बातों का स्मरण न आता हो। नहीं, इतना नासमझ भी मैंने नहीं देखा कि जिसको इन बातों का स्मरण न आता हो। लेकिन तुम कहते हो, कल।
बस कल कर लूंगा, था यही रोग मेरा
दिन गुजर गए वे हाय! क्या हाथ आया
तुम कहते हो, कल, बात तो जंचती है। मेरे पास लोग आ जाते हैं, कहते हैं, बात जंचती है, अभी समय नहीं आया।
समय कब आएगा? तुमने कुछ इंतजाम किया है? कहीं ऐसा न हो कि मौत पहले आ जाए। समय पर तुम्हारा कोई बस है? तुम मौत को अटका सकोगे थोड़ी देर कि पहले मेरे समय को आ जाने दे, फिर तू आ जाना?
अगर तुम मौत को न टाल पाओगे, तो कृपा करके कुछ और मत टालो। जिंदगी को तो तुम टाले चले जाते हो, मौत को तुम टाल न पाओगे। तुम किसे धोखा दे रहे हो? लेकिन कल इतना करीब लगता है कि लगा अब आया, अब आया--आता कभी नहीं। कल इतना पास मालूम होता है कि सोए कि कल हुआ। लेकिन कभी हुआ? आज तक हुआ? जो आज है, वह भी कल कल ही था। कल छोड़ा था आज के लिए, आज छोड़ोगे कल के लिए, ऐसा छोड़ते ही चले जाओगे। क्रांति इस तरह की आत्मवंचना से मरती है।
'दुःशील और असमाहित होकर सौ साल जीने की अपेक्षा शीलवंत और ध्यानी का एक दिन का जीना भी श्रेष्ठ है।'
दुराचरण में असमाहित होकर--और दुराचरण में असमाहित कोई होगा ही। लोग मेरे पास आते हैं, वे पूछते हैं, मन में बड़ी अशांति है, कोई उपाय? मैं उनसे पूछता हूं, पहले फिक्र करो अशांति है क्यों? क्योंकि अशांति कारण नहीं है, कार्य है। अशांति बीज नहीं है, फल है। बीज खोजो। तुम जरूर कुछ ऐसा करना चाह रहे हो, जिससे अशांति पैदा हो रही है। तुम जरूर ऐसा कुछ कर रहे हो, जिससे अशांति पैदा हो रही है। उसे तो तुम करते जाना चाहते हो और अशांति से भी बचना चाहते हो, यह असंभव है।
जैसे एक आदमी तेज दौड़ रहा है, छाती हांपने लगी। वह कहता है, छाती न हांपे, ऐसी कोई तरकीब बता दीजिए। लेकिन दौड़ जारी रखना चाहता है। वह कहता है, दौड़ेंगे तो, हम दौड़ने से कैसे रुक जाएं? असल में तो छाती न हांपे, इसीलिए पूछते हैं, ताकि ठीक से दौड़ सकें।
मेरे पास राजनेता आ जाते हैं। वे कहते हैं, मन में बड़ी अशांति है, रात नींद नहीं आती। मैं कहता हूं कि राजनीतिज्ञ को और नींद आती है, यह चमत्कार है! तुम्हें नहीं आती, यह स्वाभाविक है। अब या तो राजनीति छोड़ दो, या नींद को जाने दो। अक्सर तो वह नींद ही छोड़ने को राजी होते हैं। वह कहते हैं कि फिर अब थोड़ा सा तो फासला रह गया है, पहुंचे-पहुंचे हैं; उपमंत्री हो गए हैं, मंत्री हुए जाते हैं; या मंत्री हो गए हैं तो अब मुख्यमंत्री होने की बात है; अब थोड़े दिन और सही। इतना भूले-भटके, अब थोड़े दिन और सही।
लेकिन कभी कोई जानकर भूला-भटका है? ऐसा आदमी दोहरा धोखा दे रहा है। वह यह कह रहा है, हम समझ भी गए कि यह सब भूल-चूक है, लेकिन फिर भी अपनी मौज से कर रहे हैं। मौज से कभी किसी ने आग में हाथ डाला है? समझे कि रुक जाता है।
'दुःशील और असमाहित होकर सौ साल जीने की अपेक्षा...।'
जीना कहां है? जहां चित्त तनावों से भरा हो, जहां चैन न हो, जहां चैन की बांसुरी कभी बजी न हो, जहां कोई शीतल आंतरिक छाया न हो जहां विश्राम कर सको, जहां दो घड़ी सिर टिकाकर लेट सको ऐसा कोई स्थल, शरण-स्थल न हो, तो तुम सौ साल जीओ, यह ऐसे ही है जैसे कोई सौ साल एक सौ दस डिग्री बुखार में जीए। यह कोई जीना हुआ! इससे तो मर जाना भी शांति होती। कम से कम विश्राम तो होता। यह तो एक पीड़ा हुई, यह तो एक नर्क हुआ। समय की लंबाई से जीने का कोई संबंध नहीं। शांति की गहराई से जीने का संबंध है। उसी को बुद्ध आयु कहते हैं।
'...शीलवंत और ध्यानी का एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
किसको बुद्ध शीलवान कहते हैं? शील का, चरित्र का, बड़ा अपशोषण हुआ है। शील के नाम पर, चरित्र के नाम पर, लोगों को बड़े झूठे पाखंड सिखाए गए हैं। अक्सर होता है, जब कोई बहुत महत्वपूर्ण बात होती है, तो उसकी आड़ में धोखाधड़ी चल पड़ती है।
जितने परम ज्ञानी हुए, सभी ने शील के गुणगान गाए। स्वभावतः, शील का सिक्का चल पड़ा। समाज, समाज के ठेकेदार, पंडित-पुरोहित, उन्होंने भी शील का नकली सिक्का गढ़ लिया। जब शील की इतनी चर्चा चली और सारे बुद्धपुरुषों ने शील की बात कही, तो स्वभावतः नकली सिक्के भी चल गए। नकली सिक्के तभी चलते हैं जब असली सिक्के में कोई बल हो। तुमने नकली सिक्कों के नकली सिक्के तो नहीं देखे। असली सिक्कों के ही नकली सिक्के चलते हैं। जो नोट चलता ही न हो, उसका कोई नकल करके भी क्या करेगा? जो दवा खुद ही न बिकती हो, असली न बिकती हो, उसकी नकली कोई क्या तैयार करेगा? नकली तो सिर्फ इतनी खबर देती है, वह असली के प्रति सम्मान है। वह असली की प्रशंसा है नकली का होना।
शील की बुद्धों ने बात की। लेकिन उनका शील से प्रयोजन बिलकुल अलग है। और जब तुम्हारे समाज के ठेकेदार, मंदिर-मस्जिदों के ठेकेदार शील और चरित्र की बात करते हैं, उनका मतलब बिलकुल और ही है। शब्द तो वही उपयोग करते हैं, लेकिन पीछे उनके अर्थ बिलकुल अलग हैं।
बुद्ध कहते हैं शील उस जीवन की व्यवस्था को, जो तुम्हारे आंतरिक ध्यान से उपजे। इसलिए शीलवंत और ध्यानी एक साथ उपयोग किया है। कहीं चूक न हो जाए। जो शील तुम्हारे ध्यान के साथ रगा-पगा हो; जिस शील में ध्यान की गंध हो; जिस ध्यान में शील की गंध हो; जो शील एक तरफ से शील हो, दूसरी तरफ से ध्यान हो; एक ही सिक्के के दो पहलू हों--एक तरफ शील, दूसरी तरफ ध्यान--तो ही सार्थक है। अन्यथा चरित्र धोखा हो जाता है, पाखंड हो जाता है।
चरित्र दो तरह से निर्मित हो सकता है। बाहर से आरोपित, अंतर से आविर्भूत। लोग कहते हैं, ऐसा चरित्र चाहिए, और तुम पर थोप देते हैं। यह चरित्र झूठा है। तुम करोगे भी, बेमन से करोगे। तुम करोगे भी, करना भी न चाहोगे। करने से पीड़ा होगी। न करने से भी पीड़ा होगी। तुम अड़चन में पड़ोगे। अगर यह तुम्हारी अपनी अंतर्दृष्टि नहीं है, तो तुम करके भी पछताओगे, क्योंकि तुम्हारा मन कुछ और करना चाहता था। तुम शराब पीना चाहे थे, तुम मधुशाला जाने को आतुर थे, लेकिन पैर न जा सके। बीच में मस्जिद खड़ी थी, मंदिर खड़ा था, पंडित-पुजारी खड़े थे, तुम इतनी हिम्मत भी न जुटा पाए कि मधुशाला जा सकते। तुम लौट पड़े, मस्जिद में नमाज पढ़ने लगे। करना तो था कुछ, समय तो भरना था किसी से, मन को तो उलझाना था कहीं। पूजा की, पाठ किया, प्रार्थना की, लेकिन सब झूठा होगा। सब ऊपर-ऊपर होगा। कागजी होगा। भीतर मन मधुशाला के ही सपने देखेगा। न जाओगे मधुशाला, तो पछताओगे कि जो करने का मन था, वह न कर पाए। यह कुंठा घेरेगी। तुम दबे-दबे अनुभव करोगे। तुम्हारा जीवन बोझ रूप हो जाएगा।
और अगर तुम गए, तो मधुशाला में बैठकर भी तुम सुख न पाओगे। क्योंकि तब अपराध पकड़ेगा कि यह मैंने क्या किया? बुरा किया। मंदिर को त्याग कर मधुशाला आया। पुजारी की न सुनी, साधु की न सुनी, ज्ञानी की न सुनी। तब तुम्हारे मन में कांटा चुभेगा। तुम कुछ भी करो, झूठा चरित्र दुख देगा। ऐसा करो--पक्ष में; या वैसा करो--विपक्ष में; झूठे चरित्र ने सुख जाना ही नहीं। फिर कैसा चरित्र सुख जानता है? जो तुम्हारे भीतर, तुम्हारी समझ, तुम्हारी अंतर्दृष्टि से निकलता है।
करो वही जो तेरे मन का ब्रह्म कहे
और किसी की बातों पर कुछ ध्यान न दो
मुंह बिचकाएं लोग अगर तो मत देखो
बजती हों तालियां अगर तो कान न दो
चरित्र बड़ी क्रांतिकारी घटना है। हुआ तो उलटा है। समाज में तुम अक्सर जो नपुंसक हैं, कमजोर हैं, उनको चरित्रवान पाओगे। हिम्मत न जुटा पाए--जाना तो मधुशाला था, मंदिर बीच में अड़ा था, प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती। हिम्मत न जुटा पाए--जाना तो वेश्या तक था, लेकिन रामायण बीच में खड़ी थी, मर्यादा बीच में खड़ी थी। जाना कहीं था, गए कहीं। चाहते थे पूरब, पहुंचे पश्चिम; कमजोरी के कारण...।
तुम अपने समाज में जिन लोगों को चरित्रवान समझते हो, जरा गौर से देखना। कहीं उनका चरित्र उनकी कायरता तो नहीं है? मैंने तो ऐसा सौ में निन्यानबे मौकों पर देखा कि जिनको तुम चरित्रवान कहते हो, वे कायर हैं। उनमें चरित्रहीन होने की हिम्मत नहीं, तो उन्होंने चरित्र का चोगा ओढ़ लिया है। वे कहते हैं, हम चरित्रहीन होना ही नहीं चाहते। लेकिन उनके भीतर वही कीड़ा काटता रहता है। अक्सर मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, दूसरे चरित्रहीन हैं, बेईमान हैं, धोखेबाज हैं, फल-फूल रहे हैं। और हम, जैसा शास्त्र में कहा है वैसा ही कर रहे हैं, कोई आशा नहीं दिखायी पड़ती, कोई सफलता नहीं मिलती।
चरित्रवान और ऐसी बात कहेगा! निश्चित ही यह चरित्रवान भी अपने चरित्र के द्वारा वही पाना चाहता है जो चरित्रहीनों ने चरित्रहीनता के द्वारा पा लिया। मगर यह चरित्र भी बचाना चाहता है। यह वेश्यालय भी जाना चाहता है शोभायात्रा में बैठकर, लोग फूलमालाएं चढ़ाएं और यह वेश्यालय पहुंच जाए। तो जो कुट-पिट कर पहुंचे हैं वेश्यालय, उनसे इसके मन मेंर् ईष्या है। पहुंचना तो इसे भी वहीं था, मंजिल तो इसकी भी वही थी, हिम्मत न जुटा पाए।
कमजोर चरित्रवान नहीं हो सकता। जो चरित्रहीन ही नहीं हो सका, वह चरित्रवान कैसे हो सकेगा? इसे मुझे फिर से दोहराने दो, जो चरित्रहीन भी होने की हिम्मत न जुटा पाया, वह चरित्रवान होने का साहस कैसे जुटा पाएगा? चरित्र क्या चरित्रहीनता से भी गया-बीता है? चरित्र तो महा ऊर्जा है।
करो वही जो तेरे मन का ब्रह्म कहे
और किसी की बातों पर कुछ ध्यान न दो
मुंह बिचकाएं लोग अगर तो मत देखो
बजती हों तालियां अगर तो कान न दो
और तब संघर्ष से, घर्षण से, भूल-चूक से, गिरने-उठने से, भटकने से, फिर राह पर आने से, तुम्हारे भीतर निखार आता है। तुम पकते हो। अनुभव पकाते हैं। बस जो भी करो, बोधपूर्वक करना, ध्यानपूर्वक करना। जो भी करो, निरीक्षण करते हुए करना। सजग-भाव से करना। वही ध्यान का अर्थ है।
तो कोई भी तुम्हें भटका न पाएगा। आज नहीं कल तुम्हारे भीतर उस शील की गंध उठेगी, जो किसी के द्वारा आरोपित नहीं है। जिसे तुमने अर्जित किया। जो तुम्हारी संपदा है। जिसके तुम मालिक हो। जो तुम्हारी अपनी अंतर्दृष्टि का तुम्हारे बाह्य-जीवन में फैलाव और विस्तार है, वह तुम्हें आभामंडल की तरह घेरे रहेगा।
नर का भूषण विजय नहीं
केवल चरित्र उज्ज्वल है
लेकिन उज्ज्वल चरित्र का अर्थ दूसरों की व्याख्या नहीं है। किसको दूसरे उज्ज्वल चरित्र कहते हैं, इससे कोई संबंध नहीं है। उज्ज्वल चरित्र का अर्थ है, ध्यान के उजाले में पाया गया। अपने बोध से पाया गया। फिर दुनिया चाहे तुम्हें चरित्रहीन कहे...। बहुत बार ऐसा हुआ है, दुनिया ने जिन्हें चरित्रहीन कहा, समय ने बताया वे चरित्रवान थे। और दुनिया जिन्हें चरित्रवान मानती रही, वे कहां खो गए, धूल में कहां मिट गए, उनका कुछ पता नहीं।
जीसस को लोगों ने चरित्रहीन कहा। जीसस से बड़े चरित्रवान व्यक्ति को तुम खोज सकोगे? लेकिन चरित्रहीन कहा। न केवल कहा, बल्कि उनकी अदालतों ने पाया कि वे चरित्रहीन हैं, फांसी लगा दी।
सुकरात को जहर दिया, क्योंकि अदालत ने तय किया कि वह चरित्रहीन है। अदालत ने जो जुर्म लगाए सुकरात पर, उनमें एक था कि न केवल वह खुद चरित्रहीन है, वह दूसरों को भी चरित्रहीनता के लिए उकसाता है। यही तो जुर्म मुझ पर भी लगता है। लेकिन जिन्होंने जुर्म लगाया था, वे कहां खो गए! उनका नाम भी किसी को याद नहीं। सुकरात का चरित्र रोज-रोज उज्ज्वल होता गया। जैसे-जैसे आदमी की समझ बढ़ी, वैसे-वैसे अनुभव में आया कि यह आदमी जो कह रहा था, यह समाज की धारणाओं के विपरीत था, लेकिन जीवन की आंतरिक-अवस्था के विपरीत नहीं था।
समाज चरित्रहीन है। इसलिए जब भी तुम्हारे बीच कोई चरित्रवान व्यक्ति पैदा होगा, समाज अड़चन अनुभव करता है। समाज को बेचैनी शुरू होती है। समाज ऐसा चरित्र चाहता है, जो समाज की चरित्रहीनता में व्याघात उत्पन्न न करे। ऐसा चरित्र चाहता है, जो बस ऊपर-ऊपर हो। जिससे कोई अड़चन जीवन की व्यवस्था में, ढांचे में न आए। गहरा चरित्र समाज नहीं चाहता। समाज चाहता है चरित्र की बात करो। समाज कहता है सत्य, अहिंसा, प्रेम की बात करो, उपदेश दो, लेकिन सच्चे बनने की चेष्टा ही मत करना, नहीं तो सारा समाज विपरीत हो जाएगा।
बाप अपने बेटे से कहता है, सच बोलो। फिर कोई आया है मेहमान, घर के बाहर खड़ा है, और बाप बेटे से कहता है, कह दो घर में नहीं हैं। और वह बेटा कहता है, सच बोलूं? तब अड़चन शुरू होती है। यह बेटा दुश्मन जैसा मालूम पड़ेगा, जब यह कहेगा सच बोलूं? और अगर यह बेटा जाकर कह दे कि पिताजी भीतर हैं और उन्होंने कहा है कि घर पर नहीं हैं, तो समझ में आएगा कि सच...!
बाप चाहता भी नहीं था कि सच बोलो। वह तो यह कह रहा था कि अपने बेटों को भी यही सिखा देना कि सच बोलो। बोलता कौन है! ये सिखाने की बातें हैं। ये सामाजिक रीति-रिवाज हैं, औपचारिकता है। सच बोलने ही मत लगना। सच बोलने की बात करते रहना, इससे झूठ बोलने में सुविधा होती है। सच की चर्चा करो! एक हाथ सच की बात करता रहे, दूसरे हाथ से जेब काट लो।
बेईमानी करने के लिए ईमानदारी का थोड़ा सा धुआं तो पैदा करना जरूरी है। असल में अगर तुम साफ-साफ बेईमान हो जाओ, तो तुम बेईमानी न कर सकोगे। कैसे करोगे? अगर तुम सबसे कह दो कि मैं झूठ बोलता हूं, तो तुम सच्चे हो गए। अब और कैसे झूठ बोलोगे? अगर तुम लोगों से कह दो कि मैं चोर हूं, और चोरी करो--कैसे चोरी कर पाओगे? तब तो अचौर्य की दिशा में यात्रा शुरू हो गयी तुम्हारी।
अगर चोरी करनी है, तो शोरगुल मचाना कि चोरी पाप है; डंका बजाना कि चोरी पाप है। इतने जोर से बजाना कि कोई यह तो सोच ही न सके कि तुम, और चोरी कर सकते हो। इतना शोरगुल मचाने वाला आदमी चोरी करेगा! कभी नहीं। जिनकी तुम चोरी करोगे, वे भी यह भरोसा न कर सकेंगे कि यह आदमी, और चोरी करेगा!
तो चोर को अगर समझ हो, तो वह अचौर्य की शिक्षा देता है। झूठे को अगर थोड़ी अकल होती है, तो वह सच का शास्त्र फैलाता है। उसी के सहारे झूठ चलता है। झूठ के पास अपने पैर नहीं। उसको सच के पैर उधार लेने पड़ते हैं। बेईमानी के पास अपना बल नहीं। उसे ईमानदारी की आत्मा उधार लेनी पड़ती है। अधर्म खुद नहीं चल सकता, पंगु है। उसे धर्म के कंधे पर बैठना पड़ता है। इसलिए तो मंदिरों की गहराई में तुम खोजोगे, तो धर्म को ऊपर, अधर्म को भीतर पाओगे। पाखंड जी सकता है तभी, जब वह घोषणा करता रहे कि पाखंड नहीं हूं मैं। यही है सत्य, प्रचार जारी रहे। सदियों का प्रचार, झूठ को सच जैसा बताने लगता है।
चरित्र का अर्थ है, किसी के द्वारा थोपी गयी धारणाओं का अंधानुकरण नहीं, अपनी ही आंख से परखे गए मार्गों का अनुसरण।
जहां भुजा का पंथ एक हो, अन्य पंथ चिंतन का
सम्यक-रूप नहीं खुलता उस द्विधाग्रस्त जीवन का
तुम्हारा हाथ कुछ करे, तुम्हारा मन कुछ करे, तो तुम दुविधा में रहोगे। तुम्हारा सम्यक-रूप कभी खुल न सकेगा। तुम जो करो वही तुम्हारा भीतर का मन भी कहे, तुम जो कहो वही तुम करो भी, तुम्हारे भीतर एक समस्वरता हो--समस्वरता यानी शील।
इसलिए बुद्ध कहते हैं, 'दुःशील और असमाहित।'
जो आदमी शील को छोड़ेगा, उसके भीतर की समता, समाहितता, सामंजस्य, संगीत, समन्वय खो जाएगा। शील, समाहित, समाधिस्थ--उसके भीतर सब शांत हो जाएगा, समता हो जाएगी, सम्यकत्व हो जाएगा। और सौ साल अशांत जीने की बजाय शीलवंत और ज्ञानी का एक क्षण का जीना भी श्रेष्ठ है।
'आलसी और अनुद्यमी होकर सौ साल जीने की अपेक्षा दृढ़ उद्यमशील का एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
'आलसी और अनुद्यमी होकर...।'
आलस्य का अर्थ क्या है? आलस्य का अर्थ है, जीवन तो मिला, लेकिन हम उपयोग नहीं करेंगे। सुबह हुई, लेकिन उठेंगे नहीं। सुबह का अर्थ है, उठो। भोर हुई, रात गयी, पक्षी भी जाग गए, जिनको तुम पशु कहते हो निंदा से, वे भी उठ गए, वृक्षों ने भी आंखें खोल दीं, फूल सूरज की खोज पर निकल पड़े, सब तरफ जीवन उठा, तुम पड़े हो! तुम यह कह रहे हो कि भगवान, तूने मार क्यों न डाला? तू मार ही डालता तो अच्छा था। हम उठने को तैयार ही नहीं। तुममें और कब्र में पड़े आदमी में फर्क क्या है?
आलस्य का अर्थ है, तुम जीवन का अवसर खो रहे हो। जहां ऊर्जा बहनी चाहिए, जहां ऊर्जा का प्रवाह होना चाहिए, जहां ऊर्जा नृत्यवान होनी चाहिए, वहां तुम बैठे हो सुस्त, काहिल, मुर्दे की भांति। जहां प्रेम की तरंग उठनी थी, वहां तुम उदास बैठे रहे, धूल चढ़े। जहां तुम्हारा चित्त का दर्पण चमकना था, जीवन का प्रतिफलन होता, वहां तुम पड़े रहे एक कोने में, अपने को अपने ही हाथ से अस्वीकार किए।
आलस्य का अर्थ है, जीवन अवसर देता, तुम खोते। जीवन बुलाता, तुम सुनते नहीं। जीवन आवाहन देता, तुम बहरे रह जाते। जीवन हजार-हजार तरफ से चोटें करता--उठो! तुम ऐसे जड़ कि चोटों को धीरे-धीरे पी जाते, अभ्यस्त हो जाते, पड़े रहते अपनी जगह।
'आलसी और अनुद्यमी होकर सौ साल जीने की अपेक्षा...।'
फिर फायदा क्या? आलस्य है क्रमिक आत्मघात। मरना ही हो, एकदम से मर जाओ। यह धीरे-धीरे का मरना क्या? यह आहिस्ता-आहिस्ता मरना क्या? जीना हो, भभककर जी लो!
पश्चिम की एक बहुत विचारशील महिला रोजा लक्जेंबर्ग का बड़ा प्रसिद्ध वचन है कि अगर जीना हो, मशाल को दोनों तरफ से जलाकर जी लो।
अगर जीना हो! अगर न जीना हो, तुम्हारी मर्जी, मशाल को जलाओ ही मत। अगर दूसरे भी आग लगा जाएं, तो धुआं फेंकते रहो। जरा गौर से अपनी मशालें देखना। धुआं ही धुआं निकलता रहता है। लपट का पता ही नहीं चलता।
लेकिन जहां भी धुआं है, वहां लपट छिपी है। जरा हिम्मत जुटाओ! जरा खोजो! धुआं खबर दे रहा है आग की। धुआं ही धुआं उठाते रहोगे जिंदगी में? फिर सुख न पाया, आनंद न पाया, रस न पाया--शिकायत किसकी?
'आलसी, अनुद्यमी होकर सौ साल जीने की अपेक्षा दृढ़ उद्यमशील का एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
बुद्धपुरुष की तरह एक क्षण जी लेना भी श्रेष्ठ है, हजारों साल बुद्धुओं की भांति जीने की बजाए। एक क्षण की प्रज्वलित चेतना सब झलका जाती है। एक क्षण का प्रज्वलित बोध सारे जगत को खोल जाता है, सारे रहस्य उघाड़ जाता है, सब पर्दे उठा जाता है, सब घूंघट हटा जाता है। सब जो मिलना चाहिए, एक क्षण में मिल सकता है, तुम्हारी त्वरा चाहिए।
बहुत शेष है, बहुत शेष है, बहुत शेष है
हम मत भूलें, हम मत अपना गुणगान करें
जिस घर को छूने, सागर की लहरें दौड़ रही हैं
आओ, उस घर के मालिक से कुछ पहचान करें
ऐसा सोचकर मत बैठे रहना कि बहुत शेष है, बहुत शेष है, बहुत शेष है, जल्दी क्या है? ऐसा सोच-सोचकर आलस्य को मत सजाते-संवारते रहना।
जिस घर को छूने, सागर की लहरें दौड़ रही हैं
जरा गौर से देखो सागर की लहरों को। कितनी उत्तुंग हैं, कितनी उतावली हैं, कितनी प्यासी हैं, कैसी भाग-दौड़ मची है, कैसी प्रतिस्पर्धा है!
जिस घर को छूने, सागर की लहरें दौड़ रही हैं
आओ, उस घर के मालिक से कुछ पहचान करें
और तुम्हें मौका मिला है मनुष्य होने का। घर से ही नहीं, घर के मालिक से पहचान हो सकती है। लहरें तो किनारों को छूकर लौट जाएंगी, किनारे का राजा अपरिचित रह जाएगा। लहरें तो घर की दीवालों को छूकर लौट जाएंगी, तो भी इतनी उतावली हैं! तुम घर के मालिक से पहचान कर सकते थे, लेकिन तुम्हारे चैतन्य के सागर की लहरें उठतीं तो ही। उद्दाम वेग चाहिए, त्वरा चाहिए।
ऐसे धीमे-धीमे टिमटिमाते-टिमटिमाते जीना क्यों? भभककर दोनों ओर से जले मशाल, उसको ही बुद्ध जीवन कहते हैं। तब तुम्हारे जीवन में एक क्रांति घटित होती है--लंबाई समाप्त हो जाती है, गहराई शुरू होती है। तब तुम ऐसे एक लहर से दूसरी लहर पर नहीं जाते, एक लहर से सीधे सागर की गहराई में जाते हो।
'उत्पत्ति और विनाश का दर्शन किए बिना सौ साल जीने की अपेक्षा उत्पत्ति और विनाश के दर्शन का एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
तुम्हें यही पता नहीं, कहां से आते हो, कहां जाते हो, कौन हैं? फिर भी तुम किस मुंह से कहते हो जीवित हो! और इससे बड़ी बेहोशी क्या होगी? और सोयापन क्या होगा? नींद में और जागरण में और फर्क क्या होगा? न पता कहां से आते, न पता कहां जाते। न पता क्यों हैं, क्या हैं, किसलिए हैं। ये कैसे तुम लकड़ी के एक टुकड़े की तरह नदी में बहे चले जाते हो--न कोई गंतव्य है, न कोई दिशा है, न कोई बोध है--थपेड़ों पर। परिस्थितियां जहां ले जातीं। तुम एक दुर्घटना हो। और दुर्घटना के ऊपर उठना साधना है।
पश्चिम में एक शब्द जोर से प्रचलित होता जा रहा है--एक्सीडेंटल मैन। दुर्घटनात्मक आदमी। आदमी एक दुर्घटना मालूम होता है। ऐसा लगता है, चीजें घट रही हैं, घटती जाती हैं; कुछ भी हो रहा है, क्यों हो रहा है, सन्निपात जैसा मालूम होता है। कुछ कारण नहीं दिखायी पड़ता। कुछ आकस्मिक संयोग मिल जाते हैं, कुछ हो जाता है, फिर तुम छिटक जाते हो; फिर कुछ संयोग मिल जाते हैं, फिर हो जाता है। भीतरी कोई जैसे समस्वरता नहीं है जीवन में।
ऐसे ही समझो कि गुलाब का पौधा है, चमेली के पास लगा था, चमेली का फूल खिल आया है। पौधा गुलाब का था, चमेली के पास लगा था, नकल में पड़ गया। चमेली का फूल खिल आया है। अब मुश्किल हुई खड़ी! यह चमेली का फूल गंधहीन होगा, क्योंकि गंध तो गुलाब की हो सकती थी। यह चमेली का फूल छाती पर बोझ होगा। यह फूल हो ही नहीं सकता, पत्थर होगा। क्योंकि फूल का तो मतलब यह है कि प्राण भीतर फूल जाएं, खिल जाएं, प्रफुल्लित हो जाएं। भीतर की नियति तो अधूरी रह गयी, अधमरी रह गयी, यह तो कुछ का कुछ हो गया।
दुर्घटना का अर्थ है, जो तुम होने को हो वह तो नहीं हो पाते, कुछ का कुछ हो जाते हो। जैसा मैं लोगों को देखता हूं, किसी को भी उस जगह नहीं पाता जहां उन्हें होना चाहिए। लोग असंगत स्थितियों में बैठे हैं।
एक मित्र दस दिन पहले वापस इंग्लैंड गए। संन्यस्त हुए, दांत के डाक्टर हैं। दस साल से दांत के डाक्टर हैं, छोड़ना चाहते हैं, परेशान हैं, संगीतज्ञ होने की धुन थी सदा से। अब संगीतज्ञ और दांत का डाक्टर! कोई लेना-देना नहीं। दांतों की कटकटाहट सुनी है, संगीत सुना कभी?
मैंने पूछा, दस साल? वे बोले, सोचने में ही! दांत का डाक्टर भी नहीं हो पा रहा हूं, क्योंकि मन वहां लगता नहीं। करता हूं दिनभर, मगर लगता है, यह मैं क्यों समय खो रहा हूं! यह जीवन गया, यह दिन और गया। यह एक दिन और बीता। मौत और करीब आयी। जो हाथ वीणा को छूने चाहिए थे, जो वीणा को छूने को आतुर हैं, वे व्यर्थ लोगों के दांतों की सफाई करने में लगे हैं।
दांत के डाक्टर होने में कुछ बुराई नहीं है। लेकिन तुम्हारी नियति हो, दुर्घटना न हो। क्योंकि जिसको दांत का डाक्टर होना था, वह अगर वीणा लेकर बैठ जाए, तोड़ डालेगा। उनका वीणावादन लोगों के प्राणों में शांति न लाएगा, घबड़ाहट ले आएगा। वे लोगों की शांति को नष्ट कर देंगे।
जिसको जो होना है, वही हो। लेकिन यह तो कैसे? हमें उत्पत्ति का ही पता नहीं--हम कैसे बनते हैं! हम कैसे होते हैं! हम कैसे बिखरते हैं! यह तो हमें जब तक अपने स्वभाव से पहचान न होगी तब तक हम दुर्घटना ही रहेंगे।
बुद्ध कहते हैं, 'उत्पत्ति और विनाश का दर्शन किए बिना सौ साल जीने की अपेक्षा उत्पत्ति और विनाश के दर्शन का एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
जिसने ठीक से देख लिया, कहां से आता हूं, क्या है मेरा मूल स्रोत, कहां जाता हूं, क्या है मेरा गंतव्य, तो कई बातें दिखायी पड़ जाएंगी। एक बात तो यह दिखायी पड़ेगी कि शरीर पैदा होता है, शरीर समाप्त हो जाता है। क्या मेरे भीतर कुछ और है, जो न कभी पैदा होता, न कभी समाप्त होता? अगर शरीर को तुमने गौर से देख लिया, तो तुम्हें उस सनातन का स्वर भी भीतर सुनायी पड़ने लगेगा, जो न कभी शुरू हुआ और न कभी समाप्त होता है।
अभी तो तुमने शरीर की मंजिल को अपनी मंजिल समझ रखा है, वही दुर्घटना हो गयी है। अभी तुमने आजीविका को जीवन समझ रखा है, वही दुर्घटना हो गयी है। जीवन कुछ और है, सिर्फ रोटी-रोजी कमा लेना ही नहीं। रोटी के ही सहारे कौन कब जी पाया है? रोटी जरूरी है, पर्याप्त नहीं। बिना उसके न जी सकोगे, लेकिन अगर उसी से जीए, जीना न जीना बराबर है।
होड़ देवों से लगायी, मनुज भी बनना न सीखा
विश्व को वामनपगों से नापने की कामना है
आदमी क्या से क्या नहीं होना चाहता? लेकिन वही नहीं हो पाता, जो हो सकता था।
होड़ देवों से लगायी, मनुज भी बनना न सीखा
विश्व को वामनपगों से नापने की कामना है
पहले तुम वही हो जाओ, जो तुम हो सकते हो। पहले अपनी नियति को पहचान लो। पहले तुम वही हो जाओ, जो तुम हो। तुम्हारा होना ही तुम्हारा भाग्य है। उसकी पहचान के बिना इर्द-गिर्द तुम कितने ही चक्कर काटो, तुम दुर्घटना ही रहोगे।
कहां से बढ़ के पहुंचे हैं कहां तक इल्मो-फन साकी
मगर आसूदा इन्सां का न तन साकी न मन साकी
कितना ज्ञान बढ़ गया! कितना इल्म, कितना फन, कितनी कला, कितना विज्ञान, लेकिन न आदमी के तन को शांति है, न मन को शांति है।
कहां से बढ़ के पहुंचे हैं कहां तक इल्मो-फन साकी
मगर आसूदा इन्सां का न तन साकी न मन साकी
कहीं कुछ भूल हो रही है। स्वभाव से पहचान नहीं बैठ रही है। इल्म और फन किसी और मार्ग पर लिए जा रहे हैं। आदमी कुछ और होने को बना था। आदमी के भीतर कुछ और है जो उसे तृप्त करेगा, उसकी प्यास को बुझाएगा, और इल्मो-फन कुछ और बताए जाते हैं। जरा ध्यान रखना, दुर्घटना इतने जोर से घट रही है, घटती रही है कि बहुत संभावना है, तुम भी धोखे में आ जाओ।
अक्सर ऐसा होता है, लोग अनुकरण में लग जाते हैं। तुमने देखा, किसी ने नया मकान बनाया। बस, तुम्हें जरूरत न थी क्षणभर पहले तक इस नए मकान की, क्षणभर पहले तक तुमने स्वप्न भी न देखा था इस मकान का, क्षणभर पहले तक तुम्हें खयाल भी न था कि अपने पास जो मकान है वह ठीक नहीं, किसी और ने मकान बनाया, बस अनुकरण पैदा हुआ। चले तुम। अब तुम भूल ही गए कि इस मकान को बनाने में वर्षों लगेंगे। यह जरूरत है तुम्हारी? यह तुम सच में चाहते हो? वर्ष इस पर खराब करने जैसे हैं? इसे सोचकर, समझकर, होश से तुम चुन रहे हो? कि सिर्फ एक पागलपन ने, एक जुनून ने पकड़ा कि पड़ोसी के पास है, मेरे पास क्यों न हो? किसी के पास कार देख ली, तुम बेचैन हो गए।
ध्यान रखना, अनुकरण से जो चलेगा, वह थपेड़ों में जीएगा। वह समय को ऐसे ही गंवा देगा। तुम अपनी जरूरत को समझना। अपने भीतर की आंतरिक जरूरत को पहचानना। और अपने स्वभाव को देखना कि मेरे लिए क्या हितकर है? मेरी आंतरिक आकांक्षा, अभीप्सा क्या है? मैं क्या पाकर सुखी हो सकूंगा? तुम यह मत देखना कि दूसरे क्या पाकर सुखी हो गए हैं।
पहली तो बात, वे सुखी हुए हैं या नहीं, तुम तय नहीं कर सकते। किसी के पास बड़ा मकान है, इससे कोई सुखी हो गया है, ऐसा मत सोच लेना। तुमसे छोटे मकान वाले तुमको भी सुखी समझ रहे हैं। किसी के पास बड़ी कार है, इससे वह सुखी हो गया है, ऐसा मत समझ लेना। सुख चेहरे पर है, वह दूसरे को दिखाने के लिए है। चेहरे बाजारू हैं। उनको हम बाजार में काम लाते हैं, घर पर रख देते हैं। वे मुखौटे हैं।
फिर दूसरी बात, हो सकता है दूसरा सुखी हो गया हो, उसके स्वभाव के साथ कुछ तालमेल बैठा हो। लेकिन तुम्हारे स्वभाव के साथ तालमेल बैठेगा?
अपनी अभीप्सा को शुद्ध-शुद्ध पहचानना जरूरी है आदमी के लिए, ताकि वह दुर्घटनाओं से बच जाए। अन्यथा मैं अनेकों को देखता हूं, वे सब दुर्घटनाओं में ग्रस्त हैं। जहां उन्हें जाना नहीं था, चल पड़े। पहुंच जाएं तो परेशान होंगे, क्योंकि तब पाएंगे, अरे! यहां तो कभी आना ही न चाहा था। जहां पहुंच गए, जहां पहुंचने के लिए जीवनभर जद्दोजहद की, वहां पहुंचकर पता चला कि यह तो अपनी मंजिल ही न थी। अब लौटना भी मुश्किल हो गया। लौटने का समय भी न रहा, सांझ हो गयी। अब तो रात घिरने लगी। तब वे तड़फेंगे। एक-एक क्षण बहुमूल्य है। स्वभाव से उसे कसते रहना।
दूसरों का अनुकरण करने का कुछ बुनियादी कारण है। और वह कारण यह है कि अपना ही अनुकरण करने में हमें आश्वस्तता नहीं मालूम होती। पता नहीं ठीक हों कि न हों। दूसरों ने तो करके दिखा दिया है। यह देखो महावीर पहुंच गए। यह देखो बुद्ध पहुंच गए। ये तो पहुंच गए। इनका पहुंचना तो प्रामाणिक है। अब हम चलेंगे, अंधेरे में टटोलेंगे, पता नहीं पहुंचें कि भटकें। बेहतर, किसी के पीछे हो लें। पीछे होने का कारण यह है कि तुम सोचते हो, दूसरा पहुंच गया, तो अब हम सिर्फ सहारा पकड़कर पहुंच जाएंगे।
लेकिन दूसरा अपने स्वभाव को पहुंचा। तुम अपने स्वभाव को पहुंचने थे। बुद्ध के पीछे चलोगे तो तुम भी वहीं पहुंच जाओगे जहां बुद्ध पहुंचे। लेकिन बुद्ध के स्वभाव से उसका तालमेल था, संगीत था, समन्वय था; तुम पहुंचकर भी बेचैन रहोगे। इसलिए अनुकरण से कोई कभी नहीं पहुंचता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है, मौलिक है।
समझो सबसे, करो अपनी। और करने का साहस रखो। भूल से डरो मत। जो भूल से डरा, वह जल्दी ही अनुयायी बन जाता है। अनुयायी बनने का मतलब ही यह है कि भूल करने की हम हिम्मत नहीं करते।
प्रकाश मेरे अग्रजों का है
परंपरा का है
पोढ़ा है, खरा है
अंधकार मेरा है
कच्चा है, हरा है
प्रकाश मेरे अग्रजों का है
परंपरा का है
पोढ़ा है, खरा है
अंधकार मेरा है
कच्चा है, हरा है
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारा अंधकार ही तुम्हारे काम आएगा। दूसरों का उधार प्रकाश काम न आएगा। उधार प्रकाश अपने अंधकार से भी बदतर है। क्योंकि उससे तुम्हारे जीवन का कोई तालमेल ही न बैठेगा। तुम्हारी टोपी ही तुम्हारे सिर पर बैठेगी। दूसरों के जूते काटेंगे, कभी ढीले पड़ जाएंगे, कभी छोटे पड़ जाएंगे। तुम्हारे पैर का जूता तुम्हीं को खोजना, बनाना है। तुम भीतर कुछ इतने अनूठे हो कि तुम जैसा न कभी कोई हुआ है, न कभी कोई होगा।
इसलिए उधार कपड़े मत मांगना। जीने की हिम्मत, साहस रखना; तो ही तुम दुर्घटना से बचोगे। अन्यथा दुर्घटना सौ में निन्यानबे मौकों पर करीब-करीब निश्चित है। सौ में कोई एकाध सौभाग्यशाली बच पाता है। जो बच जाता है, वह बुद्धत्व को उपलब्ध होता है।
'अमृतपद (निर्वाण) का दर्शन किए बिना सौ साल जीने की अपेक्षा अमृतपद का दर्शन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
जिसे हम जीवन कहते हैं, क्षणभंगुर है। अभी है, अभी गया। अभी था, अभी न हुआ। आभास की तरह। चांद के प्रतिबिंब की तरह है झील में। जरा सी झील हिली, चांद का प्रतिबिंब टूटा, बिखरा--चांदी फैल गयी। अभी था, अभी खो गया। यह जो संसार है, स्वप्न से ज्यादा नहीं है। क्षणभंगुर है।
इसके साथ बहुत माया-मोह में मत पड़ जाना। क्योंकि तुम जब तक माया-मोह बसा पाओगे, यह बदल जाता है। यह बेईमान है। इसका विश्वास मत कर लेना। इधर तुम घर बनाने को तैयार थे, तब तक भूमि ही खिसक जाती है। तुम जब तक नाव बनाकर तैयार हुए, नदी ही विदा हो जाती है। तुम्हारा और इस संसार का कभी मेल न होगा। क्योंकि यह पल-पल भागा जाता है, पल-पल बदला जाता है।
जिसने संसार की क्षणभंगुरता देख ली, उसके ही जीवन में निर्वाण का, शाश्वत का स्मरण शुरू होता है।
विकसते मुरझाने को फूल
उदय होता छिपने को चंद
शून्य होने को भरते मेघ
दीप जलता होने को मंद
यहां किसका अनंत यौवन!
अरे अस्थिर छोटे जीवन!
छलकती जाती है दिन-रैन
लबालब तेरी प्याली मीत
ज्योति होती जाती है क्षीण
मौन होता जाता संगीत
करो नैनों का उन्मीलन,
क्षणिक है मतवाले जीवन!
जरा आंख को मींड़कर देखो--दीया चुकता जाता है। जरा आंख खोलकर देखो--संगीत समाप्त होता जाता है। जरा गौर से चारों तरफ देखो--यहां कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है, सब बदला जा रहा है।
इस बदलते हुए प्रवाह में तुमने घर बनाने की सोची! सराय तक बनाते, तो ठीक था। रात का विश्राम ठीक था, सुबह चल पड़ना होगा। रुक जाते, पड़ाव समझते, ठीक था, समझदारी थी; घर बनाने बैठ गए हो! स्थाई घर बना रहे हो! अस्थाई तत्वों से स्थाई घर बनाने की कामना की है! तो दुख पाओगे। तो भरमोगे, भटकोगे; और निर्वाण का परमपद तुम्हारे खयाल में भी न आएगा।
गुंचा चटका और आ पहुंची खिजां
फस्ले-गुल की थी फकत इतनी बिसात
इधर खिला भी नहीं फूल कि आ गया पतझड़। इतनी ही बिसात है। आदमी को तुमने खिलते देखा? कली खिल कहां पाती है? कभी-कभी खिलती है। तब तो हमें बुद्धों का स्मरण हजारों साल तक रखना पड़ता है। बुद्धों का मतलब है, जिनकी कली खिली। अधिक लोग तो कली की तरह ही मर जाते हैं।
गुंचा चटका और आ पहुंची खिजां
फस्ले-गुल की थी फकत इतनी बिसात
बस इतनी सी सीमा। खिल भी न पाए और मौत आ गयी। हंस भी न पाए और आंसू घिर आए। डोला उठा भी न था कि अर्थी उठ गयी। इसे गौर से जो देखता है, पहचानता है, समझता है, धीरे-धीरे पाता है, यहां घर बनाने जैसा नहीं। अमृत में घर बनाएंगे, मरणधर्मा में क्या घर बनाना! निर्वाण में घर बनाएंगे, संसार में क्या घर बनाना! यहां कुछ भी तो साथ देगा नहीं। संगी-साथी सब दो दिन के आश्वासन हैं, सांत्वना हैं, संतोष हैं। कौन किसका साथी है? राह पर मिल लिए, थोड़ी देर साथ हो लिए, फिर राहें अलग हो जाती हैं, फिर हम अलग हो जाते हैं।
कौन होता है बुरे वक्त की हालत का शरीक
मरते दम आंख को देखा है फिर जाती है
औरों की तो बात ही छोड़ दो, अपनी ही आंख फिर जाती है। वही साथ नहीं देती।
कौन होता है बुरे वक्त की हालत का शरीक
मरते वक्त देखा है?
मरते दम आंख को देखा है फिर जाती है
यहां सब खयाली पुलाव है। यहां सब सपने का जाल है। यहां कोई अपना नहीं। यहां कोई संगी-साथी नहीं। शाश्वतता में साथ खोजो। बुद्ध का वचन है, अमृतपद। जो कभी मरे न, जो मरणधर्मा नहीं है।
'अमृतपद का दर्शन किए बिना सौ साल जीने की अपेक्षा अमृतपद का दर्शन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
'उत्तम धर्म का दर्शन किए बिना सौ साल जीने की उपेक्षा उत्तम धर्म का दर्शन कर एक दिन जीना भी श्रेष्ठ है।'
उत्तम धर्म उस प्रक्रिया का नाम है जिससे अमृतत्व उपलब्ध होता है। उत्तम धर्म उस विधि का नाम है जिससे तुम समय से हटकर शाश्वत के करीब आते हो। उत्तम धर्म उस कीमिया का नाम है जिससे तुम दूसरों के आरोपित चरित्र से मुक्त होकर अपने शील के निकट आते हो। उत्तम धर्म उस विज्ञान का नाम है जिससे तुम दुर्घटना से बचते और तुम्हारे जीवन में गंतव्य दिशा आती।
धर्म तो बहुत हैं, उत्तम धर्म एक है। धर्म तो हिंदू है, मुसलमान है, ईसाई है, जैन है, बौद्ध है; उत्तम धर्म विशेषणशून्य है। उत्तम धर्म शास्त्र में नहीं, स्वयं में है। उत्तम धर्म किसी दूसरे के सिखाए नहीं सीखा जाता, अपने ही अनुभव, अपने ही जीवन की कसौटी पर कस-कसकर पाया जाता है। धर्म सीखा जा सकता है, उत्तम धर्म जीया जाता है। वेद में, कुरान में, बाइबिल में जो है, वह धर्म है। अब तो धम्मपद में जो है, वह भी धर्म है। जब तुम्हारे भीतर जागरण होता है और तुम गवाह हो जाते हो वेदों के, कुरानों के, बाइबिलों के, धम्मपदों के; जब...।
अभी तो ऐसा होता है, तुम वेद पढ़ते हो, तुम कहते हो, शायद ठीक हो, शायद ठीक न हो, कौन जाने? अभी तुम चेष्टा करके मान भी लो कि बुद्ध जो कहते हैं ठीक ही कहते होंगे, तो भी यह चेष्टा ही होगी, श्रद्धा न होगी। भीतर कहीं संदेह खड़ा ही रहेगा।
लेकिन फिर एक ऐसी घड़ी आती है तुम्हारे ही ध्यान की, तुम्हारे ही मौन की कि तुम भी इसी सत्य के दर्शन को उपलब्ध होते हो, जिसको बुद्ध उपलब्ध हुए हैं, महावीर उपलब्ध हुए हैं, वेदों के ऋषि उपलब्ध हुए हैं; मोहम्मद ने पाया, क्राइस्ट ने पाया; तुम्हारी आंखें भी उसी परमसत्य को देखती हैं। तुम खुद ही आ गए गौरीशंकर के करीब। अब यह कोई सुनी-सुनायी बात न रही। यह कोरी हवा में उठी बात न रही। अब यह तुम्हारा अपना अंतरदर्शन हुआ। यह तुम्हारा अनुभव हुआ। यह शीतलता तुमने पायी। यह आनंद तुमने भोगा। यह नाच तुम्हारे जीवन में उठा। यह सुगंध तुम्हें घेर गयी। अब तुम यह कह सकते हो कि वेद सही हैं। इसलिए नहीं कि वेद सही होने चाहिए, बल्कि इसलिए कि मेरा अनुभव कहता है। अब तुम कह सकते हो कि बुद्ध ठीक हैं। इसलिए नहीं कि बुद्ध गलत नहीं हो सकते, बल्कि इसलिए कि अब मेरा बुद्धत्व कहता है कि उनके ठीक होने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। मैं गवाह हूं।
उत्तम धर्म का अर्थ है, जिस दिन तुम गवाह बन जाओ। और वैसा जीवन ही जीवन है। बुद्ध कहते हैं, एक क्षण भी उत्तम धर्म का जीवन जी लिया, अर्थात अपने अनुभव का, अपने प्रकाश का, अपनी ज्योतिर्मयता का, तो सौ वर्ष जीने से बेहतर है।

आज इतना ही।