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मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन-- सत्र- ( 8 )

विद्रोह धर्म की बुनियाद 

      दुनिया में केवल जैन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो आत्‍महत्‍या का आदर करता है। अब यह हैरान होने की तुम्‍हारी बारी है। निश्चित ही वे इसे आत्‍महत्‍या नहीं कहते। वे इसको सुंदर धार्मिक नाम देते है—संथारा। मैं इसके खिलाफ हूं। खासकर जिस ढंग से यह किया जाता है—यह बहुत ही क्रूर और हिंसात्‍मक है। यह आश्‍चर्य की तो बात है कि जो धर्म अहिंसा में विश्‍वास करता है। वह धर्म संथारा, आत्‍महत्‍या का उपदेश देता है। तुम इसको धार्मिक आत्‍म हत्‍या कह सकते हो। लेकिन आत्‍महत्‍या तो आत्‍महत्‍या ही है। नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। आदमी तो मरता ही है।
      मैं इसके खिलाफ क्‍यों हूं, मैं किसी आदमी के आत्‍महत्‍या करने के अधिकार के विरोध में नहीं हूं। नहीं, यह तो मनुष्‍य का मूलभूत अधिकार होना चाहिए। अगर मैं जीवित रहना नहीं चाहता तो किसी दूसरे को  मुझे जीवित रखने का कोई अधिकार नहीं है। मैं जैनियों के आत्‍महत्‍या के विचार के विरोध में नहीं हूं। लेकिन वह विधि...उनकी विधि है कुछ न खाना, खाना छोड़ देते है, बिलकुल नहीं खाते। इस प्रकार बेचारे आदमी को मरने में करीब-करीब नब्‍बे दिन लगते है। यह यातना है। सताना है, तुम इसे और नहीं सुधार सकते, इससे अधिक कष्‍ट सोचा भी नहीं जा सकता। अडोल्‍फ हिटलर को लोगो को सताने का बढ़ीया तरीका नहीं सूझा।
      वे अपने बालों को कभी नहीं काटते, वे उन्‍हें अपने हाथों से उखाड़ते है1 देखो, कितना बढ़िया तरीका है।
हर साल जैन मुनि अपने बालों को उखाड़ता है—मुछ और दाढ़ी और शरीर के सभी बालों को अपने हाथों से उखाड़ता है। वे कोई यंत्र के, टेक्नोलॉजी के खिलाफ है। और वे इसे तर्क कहते है। किसी बात की तर्कित अंत तक जाना। अगर तुम उस्‍तरे का उपयोग करो तो वह टेक्नोलॉजी है। यहां तक कि ये तथाकथित पर्यावरण के हिमायती भी अपनी दाढ़ी बनाते रहते है। बिना यह जाने कि वे प्रकृति के विरूद्ध एक अपराध कर रहे है।
      जैन मुनि अपने बाल उखाड़ता है—चुपचाप एकांत में नहीं, क्‍यों‍कि एकांत तो उन्‍हें कभी मिलता ही नहीं। कोई भी बात गुप्‍त न रखना, पूरी तरह से सार्वजनिक होना, अपने आपकेा सताने का हिस्‍सा है। वे बाजार में नग्‍न खड़े होकर अपने बाल उखाड़ते है। भीड़ निश्चित ही ताली बजा-बजा कर सराहना करती है। और जैन, यद्यपि उनको बडी हमदर्दी अनुभव होती है......तुम उनकी आंखों में आंसू भी देख सकते हो। अचेतन में उन्‍हें भी बड़ा मजा आता है—और बीना टिकट बिना पैसे के।

      लेकिन किसी को भी या स्‍वयं को कष्‍ट पहुंचाना, सताना एक अपराध है।
      इसके साथ तुम समझ पाओगें कि में कोर्इ अपमानजनक, कोई अशिष्‍ट व्‍यवहार नहीं कर रहा था। मैं बहुत ही संगत, प्रासंगिक प्रश्‍न पूछ रहा था। उस दिन से मैंने जीवन भर के लिए सब प्रकार की मूख्रताओ, अंधविश्‍वासों—संक्षिप्‍त से धामिर्क कचरा, बुलशिट—के खिलाफ झगड़ा किया। बुलशिट शब्‍द अच्‍छा है, बहुत कुछ कह देता है, संक्षिप्‍त में।
      उस दिन मैंने अपना जीवन एक खेल, विद्रोही की तरह शुरू किया और मैं अपनी अंतिम सांस तक विद्रोही ही बना रहूंगा—या शायद उसके बाद भी, किसे पता है। जब मेरे पास शरीर नहीं होगा तो मेरे पास मेरे प्रेमियों के हजारों शरीर होंगे। में उन्‍हें उकसा सकता हूं—और तुम जानते हो कि मैं बहकाने बाला हूं। आने वाली सदियों तक मैं उनके दिमाग में विचार डाल सकता हूं। ठीक वही मैं करने बाला हूं। इस शरीर की मृत्‍यु के साथ मेरा विद्रोह नहीं मर सकता। मेरी क्रांति और भी अधिक तीव्रता से चलती रहेगी, क्‍योंकि तब इसे आगे बढ़ाने के लिए अनेक शरीर होगें, अनगिनत हाथ होंगे और बहुत आवाजें होंगी।
      वह दिन बहुत महत्‍वपूर्ण था, ऐतिहासिक रूप से महत्‍वपूर्ण था। उस दिन के साथ मैंने हमेशा उस दिन को याद किया है जब जीसस ने यहूदियों के मंदिर में रबाईयों से बहस की थी। वे मुझसे कुछ बड़े थे, शायद आठ साल के या नौ साल के। उन्‍होंने जिस प्रकार से बहस की उसने उनके समस्‍त जीवन-प्रवाह को निर्धारित किया।
      मुझे जेन मुनि का नाम याद नहीं है, शायद उसका नाम शांति सागर था। निश्चित ही वह शांति का सागर नहीं था। इसलिए उसका नाम तक मैं भूल गया। उसका अर्थ हो सकता है शांति, या मौन। ये वे बुनियादी अर्थ है। उसमें दोनों नहीं थे। न तो वह शांत था। न ही मौन था। बिलकुल भी नहीं। न ही तुम कह सकते हो कि उसमें कोई तूफान न था। क्‍योंकि वह इतना क्रोधित हो गया कि उसने चिल्‍ला कर मुझे बैठ जाने को कहा।
      मैंने कहा: ‘मुझे अपने घर में बैठ जाने के लिए कोई नहीं कह सकता। हाँ में आपको जाने के लिए कह सकता हूं। लेकिन मैं आपको जाने के लिए भी नहीं कहूंगा, क्‍योंकि अभी कुछ और प्रश्‍न पूछने है। कृपया नाराज न हो। याद रखें आना नाम, शांति सागर –शांति और मौन के सागर। आप छोटे बच्‍चे से इतना परेशान मत होइए।’
      वे शांत थे कि नहीं इसकी फ़िकर किये बिना मैंने अपनी नानी से पूछा, जो इस बात चीत को सुन कर बहुत हंस रही थी। आप क्‍या कहती है नानी। क्‍या मुझे इनसे और प्रश्‍न पूछने चाहिए या इन्‍हें अपने घर से जाने के लिए कहूं, नानी ने कहा: ‘तुम जो पुछना है पूछ सकते हो अगर ये अत्‍तर न देते इन्‍हें कह दो दरवाजा खुला है, वे जा सकते है।’
      यही वह महिला थी जिन्‍हें मैंने प्रेम किया। यही वह महिला थी जिन्‍होंने मुझे विद्रोही बनाया। यहां तक कि मेरे नाना भी भौचक्‍के रह गए कि इस प्रकार उन्‍होंने मेरा साथ दिया वह तथाकथित तुरंत चुप हो गया जिस क्षण उसने देखा कि मेरी नानी मेरे पक्ष ले रही है। केबल वे ही नहीं, सारे गांव के लोग तुरंत मेरे पक्ष में हो गए। बेचारा जैन मुनि बिलकुल ही अकेला रह गया।
      मैंने उससे कुछ और प्रश्‍न पूछे: ‘आपने कहा किसी बात में तब तक विश्‍वास नहीं करना जग तक कि तुमने स्‍वयं उसका अनुभव न किया हो। मुझे इसमें सच दिखाई देता है इसलिए यह प्रश्‍न.........’
      जैनी मानते है कि सात नरक है। छठवें नरक तक वापस आने की संभावना है, लेकिन सातवां शाश्‍वत है। शायद सातवां ईसाइयों का नरक है, क्‍योंकि वहां भी एक बार तुम उसमें गए तो हमेशा के लिए गए।
      मैंने कहा: ‘आपने सात नरकों की बात की, इसलिए प्रश्‍न उठता हैं कि क्‍या आपने सातवें नरक की यात्रा की है, क्‍या आप सातवें नरक में गए है? अगर वहां गए होते तो यहां नहीं हो सकते थे। अगर आप वहां गए तो किस अधिकार से कहते है कि सातवां नरक है, या अगर आप सात पर जोर देना चाहते है तो यह सिद्ध करें कि कम से कम एक आदमी शांति सागर सातवें नरक से वापस आया है।‘
      उसकी तो बोलती बंद हो गई। वह अवाक रह गया। वह विश्‍वास ही न कर सका कि एक बच्‍चा ऐसे प्रश्‍न पूछ सकता था। आज मुझे भी विश्‍वास नहीं हो सकता। मैं कैसे इस प्रकार का प्रश्‍न पूछ सका। इसका एक ही उत्‍तर में दे सकता हूं कि मैं अशिक्षित था, बिलकुल ही अज्ञानी था। ज्ञान, जानकारी तुम्‍हें बहुत चालबाज बना देती है। मैं चालाक नहीं था। मैंने वही प्रश्‍न पूछा जो कोई भी कोई बच्‍चा पूछ सकता था अगर वह शिक्षित न होता तो शिक्षा मासूम बच्‍चों के प्रति किया गया सबसे बड़ा अपराध है। शायद बच्‍चों की स्‍वतंत्रता इस संसार की अंतिम स्‍वतंत्रता होगी।
      मैं बिलकुल ही अज्ञानी, अंजान और सरल था। मैं पढ-लिख नहीं सकता था। अंगुलियों से ज्‍यादा गिन भी नहीं सकता था। यहां तक कि आज भी जब मुझे कुछ गिनना हाता है तो अपनी अंगुलियों से शुरू करता हूं। और अगर ऐ अंगुलि छूट गई तो गड़बड़ हो जाती है।
      वह उत्‍तर नहीं दे सका। मेरी नानी खड़ी हुई और कहा: ‘आपको उत्‍तर देना ही होगा। ऐसा मत सोचो कि एक बच्‍चा पूछ रहा है। मैं भी पूछ रही हूं, और आपकी मेजबान हूं।’
      अब फिर से मुझे एक अन्‍य जैन परंपरा के बारे में बताना पड़ेगा। जब जेन मुनि भोजन लेने के लिए किसी के घर आता है तो भोजन करने के बाद वह आशीर्वाद के रूप में परिवार को उपदेश देता है। उपदेश गृहिणी को संबोधित होता है।
      मेरी नानी ने कहा कि ‘आज आपने हमारे यहाँ भोजन किया है, इस घर की गृहिणी होने के कारण मैं भी यही प्रश्‍न पूछ रही हूं। क्‍या आप सातवें नरक में गए है। लेकिन तब आप यह नहीं कह सकते कि सात नरक है।‘
      बेचारा मुनि मेरी नानी जैसी सुंदर स्‍त्री का सामना न कर सका। वह इतना घबरा गया कि वह उठ कर घर के बहार जाने लगा। मेरी नानी ने चिल्‍ला कर कहा: ‘रुको, जाओ मत। मेरे बच्‍चें के प्रश्न का अत्‍तर कौन देगा? वह और भी कुछ पूछना चाहता है। आप किस तरह के आदमी हैं। बच्‍चें के प्रश्‍नों से भाग रहे है।‘
      चारों और सन्नाटा छा गया—ठीक जैसा यहां पर है—किसी ने कुछ न कहा मुनि ने आंखें झुका ली और तब फिर मैंने कहा कि मुझे कुछ नहीं पुछना। मेरे पहले दो प्रश्‍नों का अत्‍तर नहीं दिया गया और तीसरा मैंने इसलिए नहीं पूछा क्‍योंकि मैं घर के मेहमान को लज्जित नहीं करना चाहता। मैं पीछे हटता हुं। और मैं सच में ही वहाँ से चला दिया  और मुझे यह देख कर बडी खुशी हुई कि मेरी नानी भी मेरे पीछे-पीछे चली आई।
      मेरे नाना ने मुनि को विदा किया। लेकिन जैसे ही वह घर से बाहर निकला मेरे नाना तुंरत घर के भीतर आए और मेरी नानी से पूछा, ‘तुम पागल तो नहीं हो गर्इ हो, पहले तो तुमने इस लड़के का साथ दिया जो जन्‍मजात मुसीबत खड़ी करने वाला लड़का है। और फिर तुम मेरे गुरु को बिना प्रणाम किए ही इसके साथ चली गई।‘
      मेरी नानी ने कहा: ‘वह मेरा गुरु नहीं है। और जिसे तुम जन्‍म जात मुसीबत खड़ी करने बाला समझ रहे हो वह तो अभी बीज है। कोई नहीं जानता की वह आगे चल कर क्‍या बनेगा।‘
      अब मुझे मालूम हे कि उस बीज ने कौन सा रूप धारण किया। जब तक कोई पैदाइशी उपद्रवी न हो तब तक वह बुद्ध पुरूष नहीं बन सकता।
      और मैं कोई गौतम बुद्ध जैसा पारंपरिक बुद्ध ही नहीं हूँ, वे तो बहुत पारंपरिक है। मैं जो़रबा दि बुद्धा हूं। मैं पूर्व और पश्चिम का मिलन हूं, सच तो यह ही कि मैं पूर्व और पश्चिम में उचे और नीचे में, पुरूष और स्त्री में, अच्‍छे और बुरे में, परमात्मा और शैतान में बाँटता ही नहीं हूं। नहीं, हजार बार नहीं। मैं कभी किसी चीज को खँड़-खंड नहीं करता। अभी तक जो खंड़-खंड़ किया गया है। मैं उसे मिलाता हूं, यहीं मेरा काम है।‘
      मेरे पूरे जीवन में क्‍या हुआ, इसे समझने के लिए वह दिन बहुत महत्‍वपूर्ण है। क्‍योंकि जब तक तुम बीज को न समझोगे, तुम वृक्ष और फूलों और शाखाओं से झाँकते हुए चाँद से चूक जाओगे।
      उसी दिन से मैं हमेशा हर प्रकार की यातना के खिलाफ रहा हूँ। मैं हर तरह की तपश्‍चर्या के खिलाफ रहा हूं। निश्चित ही ये शब्‍द मैंने काफी बाद में जाने, पर शब्‍दों से क्‍या फर्क पड़ता है। मुझे त‍ब भी कुछ बदबू आ रही थी। तुम जानते हो कि मुझे सब तरह की यातनाओं से एलर्जी है मैं चाहता हूं कि हर मनुष्‍य पूरी तरह से जीए। जीवन का पूरी तरह से भोग करे।
न्‍यूनतम पर जीना मेरा ढंग नहीं है। मैं तो चाहता हूं कि हर व्‍यक्ति जीने के अंतिम बिंदु को छू ले। और वह अंतिम बिंदु के पार जा सके तो और भी अच्छा है। आगे बढ़ो। इंतजार मत करो, इंतजार में समय बरबाद मत करो।
      न्‍यूनतम तो कायर का तरीका है। अगर मेरा बस चले तो उनकी अधिकतम सीमा को न्‍यूनतम सीमा बना दूँ।  हम तारों पर पहुंचने की कोशिश कर रहे है। फ़िज़िक्स का भी यही लक्ष्‍य है, अंतत: हमारी गति प्रकाश की गति के बराबर हो जाए। अगर उस गति को हमने प्राप्‍त न किया तो हम नष्‍ट हो जाएंगे। अगर हम प्रकाश की गति उपलब्ध कर लें तो हम किसी भी मरती हुई पृथ्‍वी से या ग्रह से हट सकते है। एक न एक दिन हर पृथ्‍वी, हर ग्रह, हर तारा मरेगा, नष्‍ट होगा। इससे तुम कैसे बचोगे, तुम्‍हें बडी तीव्र टैकनॉलॉजी की जरूरत होगी। यह पृथ्‍वी सिर्फ चार हजार वर्ष में मर जाएगी। तुम कुछ भी करो, इसे बचाया नहीं जा स‍कता। प्रतिदिन यह अपनी मृत्‍यु के करीब आ रही है......और तुम एक घंटे में तीस मील की गति से जाने की कोशिश कर रहे हो। अरे, प्रति सेकेंड एक सौ छियासी हजार मील की गति से चलने की कोशिश करो। यही प्रकाश की गति है।
      मैं जीवन को समाप्‍त कर देने के खयाल के खिलाफ नहीं हूं, अगर कोई अपने जीवन का अंत कर देना चाहता है तो निश्चित ही यह उसका अधिकार है। ले‍किन इसके लिए शरीर को लंबे समय तक पीडित करने और सताने के मैं बिल‍कुल खिलाफ हुं। जब ये शांति सागर मरे तो इन्‍हें मरने के लिए कम से कम एक सौ दिन भूखा रहना पड़ेगा। एक सामान्‍य स्‍वस्‍थ आदमी को नब्‍बे दिन तक भूखा रहने की क्षमता है। अगर वह असाधारण रूप से स्‍वस्‍थ तो वह और भी अधिक दिन तक भूखा रह सकता है।
      तो याद रखो कि मैं उस व्‍यक्ति के साथ कठोर नहीं था। उस संदर्भ में मेरा प्रश्‍न बिलकुल उचित था—शायद और भी उचित था, क्‍योंकि वह उत्‍तर नहीं दे सका था। और आश्‍चर्य है आज तुम्‍हें बताना कि वह सिर्फ मेरे प्रश्‍न पूछने की ही शुरूआत नहीं थी बल्कि लोगों के उत्‍तर ने देने की भी शुरूआत थी। पिछले पैंतालीस वर्षो में किसी ने भी मेरे प्रश्‍नों के उत्‍तर नहीं दिया। मैं अनेक तथाकथित आध्‍यात्मिक लोगों से मिला हूं, लेकिन किसी ने कभी भी मेरे कोई भी प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं दिया। एक प्रकार से उस दिन ने ही मेरे समस्‍त जीवन कि दिशा को निश्चित कर दिया।
      शांति सागर बहुत नाराज हो गए, लेकिन मैं बहुत खुश था। और मैंने इसे मैंने अपने नाना से छिपाया नहीं। मैंने उनसे कहा: ‘नाना, वे भले ही नाराज हो गए, लेकिर मुझे तो बिलकुल सही लग रहा है। आपका गुरु साधारण योग्‍यता का आदमी है। आपको उससे अधिक अच्‍छे गुरु की खोज करनी चाहिए।’
      यहां तक वे हंस पड़े और उन्‍होंने कहा: ‘शायद तुम ठीक कहते हो, लेकिन अब इस उम्र में गुरु बदलना बहुत व्‍यावहारिक नहीं होगा।’ उन्होंने मेरी नानी से पूछा: ‘क्‍यों तुम्‍हारा क्या विचार है।‘
      मेरी नानी—जैसी कि वे स्‍पष्‍ट वक्‍ता थी—ने कहा: ‘बदलने के लिए कभी देर नहीं होती। इसमें देर-अबेर का कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर आप देखते हो कि आपने जो चुना है वह सही नहीं है, तो उसे बदल डालों। जल्‍दी करों उतना अच्‍छा है, अब तुम बूढे हो गये हो। ऐसा मत करो कि कहो कि मैं बूढा हो रहा हूं इसलिए बदल नहीं सकता। एक युवक न बदले तो चलेगा, लेकिन बूढा आदमी ऐसा नहीं कर सकता—और तुम काफी बूढे हो गए हो।‘
      और बस कुछ वर्ष बाद ही वे गुजर गये। लेकिन वे अपना गुरु बदलने का साहस न कर सके। वे उसी पुरानी लीक पर चलते रहे।
      मेरी नानी ऐ अदभुत प्रभावशाली शक्ति बन सकती थी। वे सिर्फ ऐ गृहि‍णी बनने के लिए नहीं थी। वे उस छोटे से गांव में सीमित रहने के लिए नहीं बनी थी। उनके बारे में पूरे विश्‍व को जानना चाहिए था। शायद मैं उनका माध्‍यम हूं। शायद उनहोंने स्‍वयं को मुझमें उड़े़ल दिया हो। उनका मुझसे इतना गहरा प्रेम था कि मैंने अपनी असली मां को कभी असली मां नहीं समझा मैं हमेशा अपनी नानी को ही अपनी असली मां समझता रहा।
      नानी ने ही मुझे पहली बार यह ब‍ताया कि सही भी गलत आदमी के हाथ में गलत हो जाता है। और गलत भी सही आदमी के हाथ में सही हो जाता है। इसलिए तुम इसकी चिंता मत करो कि तुम क्‍या कर रहे हो। केवल एक ही बात याद रखो कि तुम क्‍या हो रहे हो। ‘’करना’’ और ‘’होना’’ यही एकमात्र प्रश्‍न है। सभी धर्म करने पर जोर देते है, लेकिन में तो होने को महत्‍व देता हूं। अगर तुम्‍हारा होना, तुम्‍हारी बीइंग सही है। तो फिर तुम जो भी करोगे वह सही हो्गा। तब फिर तुम्‍हारे लिए कोई और आदेश नहीं है। केवल एक यही है कि तुम्‍हारा मात्र ‘होना’ इतनी समग्रता से हो कि उसमें कोई छाया भी न आ सके। त‍ब तुम कुछ भी गलत नहीं कर सकते हो। सारी दुनिया भले ही कहे कि यह गलत है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, केवल तुम्‍हारी अपनी बीइंग, अपनी आत्‍मा ही महत्‍वपूर्ण है।
      मुझे इसकी चिंता नहीं कि क्राइस्‍ट को सूली लगी। क्‍योंकि मुझे मालूम है कि सूली पर भी वे अपने भीतर पूर्ण विश्राम में थे। वे इतने विश्राम में थे कि वे प्रार्थना कर सके: ‘हे पिता, सच तो यह है कि उन्होंने पिता भी नहीं कहा। ‘अब्‍बा’ जो कि और भी सुंदर शब्‍द है। ‘अब्‍बा। इन लोगो को माफ़ कर देना, क्‍योंकि ये नहीं जानते कि ये क्‍या कर रहे है।’
      फिर करने पर जोर दिया जा रहा है, अफसोस कि वे सूली पर लटके हुए इस आदमी के ‘होने’ को देख सके। केवल ये होना ही महत्‍वपूर्ण है।
      मैं नहीं मानता कि मैंने उस जेन मुनि से इस प्रकार के अजीब और परेशान करने बाले प्रश्‍न पूछ कर कोर्इ गलती की। शायद मैंने उसकी सहायता ही की। शायद एक दिन उसकी समझ में आ जाए, और अगर उसमें साहस होता तो वह समझ जाता, लेकिन वह कायर था, वह भग खड़ा हुआ। और तब से मेरा अनुभव है कि ये सब तथाकथित महात्‍मा और संत कायर है। मैंने आज तक कोई ऐसा महात्‍मा—हिंदू, मुसलमान, ईसाई, या बौद्ध—नहीं देखा, जो कहा जो सके कि सच में विद्रोही है। जब तक कोई विद्रोही न हो तक कोई धार्मिक नहीं हो सकता। विद्रोह धर्म की बुनियाद है।
--ओशो

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

अमृत कण


संक्रांति की घड़ी---

आज जितनी शुभ घड़ी है इतनी कभी न थी, क्‍योंकि सामूहिक नींद टूट गर्इ है,
अब सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद तोड़ने का सवाल है। पहले तो व्‍यक्तिगत नींद तो थी ही।
सामूहिक नींद भी थी। अब कम से कम सामूहिक नींद का बोझ हट गया है।
अब ता सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद है, तुम जरा करवट ले सकते हो,
जरी झकझोर सकते हो अपने को, तो उठ आने में देर न लगेगी।
इधर मैं अनेक लोगों पर ध्‍यान के प्रयोग करके कहता हूं तुमसे,
यह कोई सैद्धांतिक बात बात नहीं कह रहा हूं, समय बहुत अनुकूल है।                      सच हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद समय अनुकूल होता है।
जैसे एक साल में पृथ्‍वी का एक चक्‍कर पूरा होता है, सूरज का।
ऐसे पच्‍चीस सौ सालों में हमार सूर्य किसी एक महा सूर्य का एक चक्र पूरा करता है।
हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद संक्रमण की घड़ी आती है।
पच्‍चीस सौ साल पहले बुद्ध हुए, महावीर हुए, लाओत्से, कनफयूशियस,
च्‍वांगत्‍सु, लीहत्‍सु, जरथुस्‍त्र, साक्रेटीज, सारी दुनियां बुद्धो से भर गई,
उसके भी पच्‍चीस सौ साल पहले कृष्‍ण, मोजेज, भीष्‍म पितामह, पतंजलि जैसे
बुद्ध पुरूष देखे, ये संक्रांति की घड़ी  करीब है।
और संक्रांति की घड़ी का अर्थ होता है, जब सामूहिक नशा टूट जाता है।
सिर्फ व्यक्तिगत नशे के तोड़ने की जरूरत रहती है,
उसे तोड़ना बहुत कठिन नहीं है, आसान है।
इससे ज्‍यादा आसान कभी भी नहीं होगा।
कभी ऐसा होता है कि नाव ले जानी हो उस पार तो
पतवार चलानी पड़ती है, और ऐसा होता है,
कि पतवार नहीं चलानी पड़ती सिर्फ पाल खोल दो,
हवा अपने आप नाव को उस तरफ ले जाती है।

----ओशो  


शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

स्‍वणिम बचपन-- ( 7)

       जैन मुनि से संवाद
    
      गुड़िया को मालूम है कि मैं नींद में बोलता हूं, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं किससे बोलता हूं। सिर्फ मैं जानता हूं यह। बेचारी गुड़िया, मैं उससे बातें करता हुं और वह सोचती है और चिंता करती है कि क्‍यों बोल रहा हूं और किससे बोल रहा हूं। लेकिन उसे पता नहीं कि मैं इसी तरह उससे बातें करता हूं। नींद एक प्राकृतिक बेहोशी है। जीवन इतना कटु है कि हर आदमी को रात में कम से कम कुछ घंटे नींद की गोद में आराम करना पड़ता है। और उसको आश्‍चर्य होता है कि मैं सोता भी हूं या नहीं। उसके आश्‍चर्य को मैं समझ सकता हूं। पिछले पच्‍चीस सालों से भी अधिक समय से मैं सोया नहीं हूं।
      देव राज, चिंता मत करो। साधारण नींद तो मैं सारी दुनिया में किसी भी व्‍यक्ति से अधिक सोता हूं—तीन घंटे दिन में और सात, आठ या नौ घंटे रात में—अधिक से अधिक जितना कोई भी सो सकता है। कुल मिला कर पूरे दिन में मैं बारह घंटे सोता हूं। लेकिन भीतर मैं जागा रहता हूं। मैं अपने को सोते हुए देखता हूं। और कभी-कभी रात के समय इतना अकेलापन होता है कि मैं गुड़िया से बात करने लगता हूं। लेकिन उसकी बहुत मुश्किलें है। पहली तो यह कि जब मैं नींद में बोलता हूं तो हिंदी में बोलता हूं। नींद में मैं अंग्रेजी में नहीं बोल सकता, मैं कभी नहीं बोलुगां, हालांकि अगर मैं चाहूं तो बोल सकता हूं, एक आध बार मैंने कोशिश भी की है और मैं सफल भी रहा हूं। लेकिन मजा किरकिरा हो जाता है।
       तुम्‍हें मालूम होगा मैं उर्दू की प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का एक गीत रोज सुनता हूं। रोज यहां आने से पहले मैं उसको बार-बार सुनता हू। इतनी बार सून कर तो कोई पागल हो जाएगा। मैं रोज गुड़िया पर उसी गीत की ड्रि‍लिंग करता हूं। उसे सुनना  ही पड़ता है, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। जब मेरा काम पूरा हो जाता है। तो मैं फिर उस गीत को सुनता हूं। मैं अपनी भाषा को प्रेम करता हूं,...इस लिए नहीं की वो मेरी भाषा है, लेकिन वह इतनी सुंदर है कि अगर वह मेरी न भी होती तो भी मैं उसे सिखा होता।
      जो गीत वह रोज सुनती है और जो उसे बार-बार सुनना पड़ेगा, उसमें कहा है: ‘तुम्‍हें याद हो के न याद हो, वह जो हममें तुममें करार था। कभी तुम कहा करते थे‍ कि तुम दुनिया में सबसे खूबसूरत स्‍त्री हो। अब मुझे नहीं मालूम कि तुम मुझे पहचान पाओगें या नहीं। शायद तुम्‍हें याद नहीं, लेकिन मुझे अभी भी याद है। मैं न उस करार को भूल सकती हूं, न तुम्‍हारे शब्‍दों को जो तुमने मुझसे कहे थे। तुम कहा करते थे कि तुम्‍हारा प्रेम पावन है। क्‍या तुम्‍हें अभी भी याद है। शायद नहीं, लेकिन मुझे याद है—निश्चित ही पूरी तरह से नहीं, समय ने कुछ-कुछ भुला दिया है।’
      ‘मैं तो जीर्ण शीर्ण महल हूं, लेकिन अगर तुम देखो, अगर तुम ध्‍यान से देखो तो पाओगें कि मैं वैसी ही हूं। मुझे अभी भी तुम्‍हारा करार और तुम्‍हारे शब्‍द याद है। वह करार जो कभी हमारे बीच था, क्‍या वह तुम्‍हे अभी भी याद है के नहीं? मैं तुम्‍हारे बारे में नहीं जानती, लेकिन मुझे अभी भी याद है।
      मेरी नींद में जब मैं गुड़िया से बातें करता हूं तो फिर हिंदी में बोलता हूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि उसका अचेतन अभी भी अंग्रेजी नहीं है। वह इंग्‍लैड में सिर्फ कुछ वर्षो तक ही थी। उसके पहले वह भारत में थी और अब वह फिर भारत में है। इन दोनों कालों के बीच जो घटा, वह सब मैं पोंछ डालने की कोशिश करता  रहा हूं। इसके बारे में बाद में, जब समय आएगा....’
      आज मैं जैन धर्म के बारे में कुछ कहने बाला था। मेरा पागलपन तो देखो। हां, मैं बिना किसी सेतु के एक शिखर से दूसरे शिखर पर कूद सकता हूं। लेकिन तुम्‍हें एक पागल आदमी को थोड़ा सहन करना पड़ेगा। तुम प्रेम में पड़े हो, यह तुम्‍हारी जिम्‍मेवारी है, मैं इसके लिए जिम्‍मेवार नहीं हूं।
      संसार में सबसे कठिन तपश्‍चर्या बाला धर्म जैन  धर्म है, या दूसरें शब्‍दों में सर्वाधिक आत्‍मपीड़क और परपीडक धर्म जैन धर्म है। जैन मुनि स्‍वयं को इतना सताते है कि संदेह होने लगता है कि ये पागल तो नहीं है।
      मैं चार या पाँच साल का रहा होऊगां जब मैंने पहली बार एक दिगंबर जैन मुनि को देखा। वह मरी नानी के घर पा आमंत्रित था। मैं अपनी हंसी न रोक सका। मेरे नाना ने मुझे कहा: ‘चुप रहो, में जानता हूं कि तुम शरारती हो। जब तुम जब तुम पडोसियों को परेशान करते हो तो मैं तुम्‍हें माफ कर सकता हूं, लेकिन यदि तुमने मेरे गुरू के साथ कोई शैतानी की तो मैं तुम्‍हें क्षमा नहीं कर सकता। ये मेरे गुरु है। इन्‍होंने मुझे घर्म के आंतरिक रहस्‍यों में दीक्षा दी है।
      मैंने कहा: ‘आंतरिक रहस्‍यों से मेरा कोई संबंध नहीं हैं। मेरा तो दिलचस्‍पी बाहरी रहस्‍यों में है जो वह इतने साफ दिखा रहे है। ये नगन क्‍यों है। क्‍या ये कम से कम चडढी या ल्ंगोटी नहीं पहल सकते है?
      मेरे नाना भी हंस पड़े। उन्‍होंने कहा: ‘तुम समझते नहीं हो।’
      मैंने कहा: ‘ठीक है, मैं खुद ही उनसे पूछ लूंगा।’ फिर मैंने अपनी नानी से पूछा, ‘क्‍या मैं इस बिलकुल पागल आदमी से कुछ प्रश्‍न पूछ सकता हूं जो इस प्रकार पुरूष और स्त्रियों के सामने नग्‍न चले आते है?
          मेरी नानी ने हंस कर कहा: ‘जो पूछना हो पूछो, और तुम्‍हारे नाना क्‍या कहते है, इसकी फ़िकर मत करो। मैं तुम्‍हें इजाजत देती हूं। अगर ते कुछ कहें तो तुम इशारा कर देना। मैं उन्‍हें ठीक कर दूंगी।’
      नानी बहुत ही अच्‍छी थीं, बहुत साहसी थी; बिना किसी सीमा के पूर्ण स्‍वतंत्रता देने को तैयार थी। उनहोंने मुझसे यह भी नहीं पूछा कि मैं क्‍या पूछने जा रहा हूं। उन्होंने बस इतना ही कहा: ‘जो पूछना हो पूछो।’
      गांव के सब लोग जैन मुनि के दर्शन के लिए इकट्ठे हो गए थे। उनके तथाकथित उपदेश के बीच में मैं खड़ा हो गया। यह करीब चाल साल पहले की बात है। और तब से आज तक मैं निरंतर इन मूढ़ों से लड़ाई  लड़ रहा हूँ। जिसका अंत मेरी मृत्‍यु के साथ ही होगा। शायद तब भी समाप्‍त न हो, मेरे लोग शायद उसे जारी रखें।
      मैंने सरल से प्रश्‍न पूछे, लेकिन वह उत्‍तर न दे सका। मुझे बडी हैरानी हुई और मेरे नाना को बहुत शर्म आई। मेरी नानी ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा, ‘शाबाश तुमने कर दिखाया। मुझे पता था कि तुम कर सकोगे।’
      क्‍या पूछा था मैने?  सिर्फ सीधा-सरल प्रश्‍न पूछे थे। मैंने पूछा था, ‘आप दुबारा जन्‍म क्‍यों नहीं लेना चाहते, जैन धर्म में यह सरल सा प्रश्‍न है, क्‍योंकि जैन धर्म की कुल कोशिश है कि दुबारा जन्‍म न लेना पड़े। यह दुबारा जन्‍म को रोकने का पुरा विज्ञान है। तो मैने उससे बुनियादी प्रश्‍न पूछा। क्‍या आप दुबारा जन्‍म नहीं लेना चाहते?
      उसने कहा: ‘नहीं, कभी नहीं।’
      तो फिर मैंने पूछा: ‘आप आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते, आप अभी भी श्‍वास क्‍यों लिए जा रहे है। क्‍यों खाना, क्‍यों पानी पीना? खत्‍म करो, आत्‍महत्‍या कर लो। छोटी सी बात के लिए क्‍यों इतना उपद्रव करना।‘
      वह चालीस साल से ज्यादा उम्र का न था। मैंने उससे कहा: ‘अगर आप इस प्रकार चलते रहे तो शायद आपको और चालीस साल तक या उससे भी अधिक जीना पड़ेगा।’
      यह एक वैज्ञानिक तथ्‍य है कि जो लोग कम खाते है वे लंबा जीते है। देवराज निश्चित ही मुझसे सहमत होगा, यह तो बार-बार प्रमाणित किया जा चूका है कि अगर आप किसी भी प्राणी को उसकी आवश्‍यकता से अधिक भोजन दें तो वे मोटे और सुंदर और सुडौल जरूर हो जाते है, लेकिन वे जल्‍दी मर जाते है। अगर आप उनकी आवश्‍यकता से आधा भोजन दें, ता यह आश्‍चर्य की बात है कि वे सुंदर तो नहीं दिखाई देते, लेकिन औसत आयु से करीब-करीब दुगुनी आयु तक जीवि‍त रहते है। आधा भोजन और दुगुनी आयु: दुगुना भोजन और आधी आयु।
      तो मैंने जैन मुनि से कहा: ‘ये सब तथ्‍य उस समय मुझे मालूम नहीं थे—अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो आप जी‍वित क्‍यों है, क्‍या केवल मरने के लिए, तो फिर आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते?
      मुझे नहीं लगता कि ऐसा प्रश्‍न उससे कभी किसी ने पूछा होगा शिष्‍टाचार की इस दुनिया में अभी कोई असली प्रश्न नहीं पूछता है। और आत्‍महत्‍या का प्रश्‍न सबसे असली प्रश्‍न है। ‘अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो, तो आप आत्‍महत्‍या कर ले, मैं आपको रास्‍ता बता सकता हूं। यद्यपि दुनिया के रास्‍तों के बारे में मैं अधिक नहीं जानता, लेकिन जहां तक आत्‍म हत्‍या का सवाल है मैं आपको कुछ सु1झाव अवश्‍य दे सकता हूं, आप गांव की पहाड़ी से कूद सकते है या आप नदी में छलांग लगा सकते है।’
      मैंने जैन मुनि से कहा: ‘बरसात के दिनों में आप मेरे साथ नदी में कूद सकते हो। थोड़ी देर हमारा साथ रहेगा, फिर आप मर स‍कते है, और में दूसरे किनारे पहुंच जाऊँगा। मैं अच्‍छा तैर सकता हूं।’ वह बहुत चौड़ी नदी थी, विशेषकर बरसात के दिनों में तो मीलों चौडी, करीब-करीब समुद्र जैसी लगती था। जब उसमें खूब बाढ़ आती तब मैं उसमें कूद पड़ता—दूसरे किनारे पहुँचे के लिए या मरने के लिए, ज्‍यादा संभावना यही होती थी कि मैं दूसरे किनारे कभी नहीं पहुंचूंगा।
      उन्‍होंने मेरी और इतने गुस्‍से से देखा कि मुझे उनसे कहना पडा याद रखो, आपको दुबारा जन्‍म लेना ही पड़ेगा, क्‍योंकि आप में अभी क्रोध है। चिंताओं के संसार से मुक्‍त होने का यह तरीका नहीं है। आप इतने गुस्‍से से मुझे क्‍यों देख रहे है। मेरे प्रश्न का उत्‍तर शांति से दीजिए। सुखपूर्वक उत्‍तर दीजिए। अगर आप उत्‍तर नहीं दे सकते तो कह दीजिए कि मैं नहीं जानता। लेकिन इतना क्रोध मत कीजिए।
      उसने कह: ‘आत्‍महत्‍या पाप है, मैं आत्‍महत्‍या नहीं कर सकता। लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरा दुबारा जन्‍म न हो। सभी वस्‍तुओं का धीरे-धीरे त्‍याग करके मैं उस स्थिति को प्राप्‍त कर लूँगा।’
      मैंने कहा: ‘कृपया मुझे आप बताइए कि आपके पास है क्‍या। क्‍योंकि जहां तक मैं देख सकता हूं, आप नग्न हैं और आपके पास कुछ भी नहीं है।’
      मेरे नाना ने मुझे रोकने की कोशिश की। मैंने अपनी नानी की और इशारा किया और उनसे कहा, ‘याद रखिए, मैंने नानी से इजाजत ले ली है। और अब मुझे कोई भी रोक नहीं सकता, आप भी नहीं। मैंने नानी से आपके बारे में बात कर ली थी, क्‍योंकि मुझे डर था कि आप मुझसे नाराज हो जाएंगे। नानी ने कहा था बस मेरी तरफ इशारा कर देना। चिंता मत करों जैसे ही मैं उनकी तरफ देखूंगी, वे चुप हो जाएंगे।’
      और आश्‍चर्य, ठीक ऐसा ही हुआ। नानी ने देखा भी नहीं और नाना चुप हो गए। बाद में मैं और मेरी नानी खूब हंसे। मैंने उनसे कहा: ‘उन्‍होंने आप की तरफ देखा तक नहीं।’
      असल में उन्‍होंने अपनी आंखे बंद कर ली, जैसे कि ध्‍यान कर रहे हो। मैंने उनसे कहा: ‘नाना, बहुत खूब, आप क्रोधित हैं, उबल रहे है, आग जल रही है आपके अन्‍दर, फिर भी आप आंखें बंद करके ऐसे बैठे है, जैसे ध्‍यान कर रहे है। क्‍योंकि आपके गुरु अत्‍तर नहीं दे पा रहे है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह आदमी जो यहां उपदेश दे रहा है, मूर्ख है।’
      और मैं चार या पाँच साल से ज्‍यादा का न था। उसी समय से यही मेरी भाषा रही है। मैं मूढ़ को एकदम पहचान लेता हूं, वह कही भी हो, मेरी एक्‍सरे आंखों से कोई नहीं बच सकता है। मैं मानसिक-अपंगता को या किसी भी चीज को तुरंत देख लेता हूं।
      अभी उस दिन मैंने अपने एक संन्‍यासी को वह फाउंटेन पेन दिया जिससे मैंने उसका नया नाम लिखा था। सिर्फ यादगार के कि यही है वो पेन जिसका मैंने उसके नये जीवन की, संन्‍यास की शुरूआत में अपयोग किया था। लेकिन उसकी पत्‍नी भी वहां थी। मैंने उसकी पत्‍नी को भी संन्‍यास लेने के लिए आमंत्रित किया, वह राज़ी थी, और नही भी, डांवाडोल थी—वह हाँ कहना चाहती थी और फिर भी कह नहीं पा रही थी। फिर मैंने उसे फुसलाने की कोशिश की—मेरा मतलब है संन्‍यास के लिए। मैंने थोड़ी देर अपना खेल जारी रखा और वह हां कहने के बहुत करीब आ गई थी, अचानक मैं रूक गया। मैं भी तो उतना सीधा नहीं हूं जितना बाहर से दिखाई देता हूं। मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं जटिल हूं, मेरा मतलब यह है कि मैं चीजें इतनी स्‍पष्‍ट देख सकता हूं कि कभी-कभी मुझे अपना सीधापन और उसका निमंत्रण  वापस लेना पड़ता है।
      वह डर रहा था। मैं इस संन्‍यासी और उसकी पत्‍नी के आर-पार देख सकता था। उन दोनों के बीच कोई सेतु न था। और कभी रहा भी नहीं था, वे बस एक अंग्रेज दंपति थे, तुम जानते हो.....परमात्‍मा ही जाने कि उन्‍होंने शादी क्‍यों की थी? और परमात्‍मा तो है नहीं, मैं बार-बार यह दोहराता हूं, क्‍योंकि मुझे हमेशा लगता है कि तुम शायद सोचो कि परमात्‍मा सच में ही जानता है।
      परमात्‍मा नहीं जानता हैं, क्‍योंकि वह है ही नहीं। परमात्‍मा तो ऐसा शब्‍द है जैसे ‘जीसस’ इसका कोई अर्थ नहीं है। यह केवल एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है। जीसस को अपना नाम कैसे मिला, उसकी ऐसी ही तो कहानी है।
      जोसेफ और मेरी अपने बच्‍चे के साथ बेथलेहम से घर वापस जा रहे है। मैरी बच्‍चे के साथ गधे पर बैठी है। जोसेफ गधे की रस्‍सी हाथ में पकड़े आगे-आगे चल रहा है। अचानक उसका पैर एक पत्‍थर से टकराया, उसे जोर की ठोकर लगी। वह चीख पडा, ‘जीसस’ और तुम स्त्रियों के ढंग तो जानते ही हो,...मैरी ने कहा, ‘जोसेफ’ मैं सोच रही थी कि अपने बच्‍चे का नाम क्‍या रखें। और अभी-अभी तुमने सही नाम ले दिया—‘जीसस।’
      इस प्रकार बेचारे बच्‍चे को अपना नाम मिला। यह संयोग नहीं है कि जब तुम गलती से अपने हाथ पर हथौड़ा मार लेते हो तो चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस, ऐसा मत सोचो कि तुम कोई जीसस को याद कर हरे हो। चोट लगने से जोसेफ की भांति चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस।
      मैं यह कह रहा था कि जिसस—यहां तक कि जीसस भी नाम नहीं है, बल्कि सिर्फ एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है जिसे जोसेफ ने ठोकर लगने पर कहा था। इसी प्रकार है परमात्‍मा। जब कोई कहता है, ‘हे भगवान’ तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भगवान में विश्‍वास करता है। वह तो केवल यह कह रहा है कि यह शिकायत कर रहा है—अगर यहां आकाश में कोई सुनने के लिए बैठा है तो। जब वह कहता है भगवान तो यह ऐसे ही है जैसे सरकारी कागजातों पर लिखा होता है—जिस किसी से भी संबंधित हो। ‘हे भगवान।’ का इतना ही अर्थ है—‘जिस किसी से भी संबंधित हो।’ और अगर वहां कोई नहीं है तो ‘माफ करे, ये किसी से भी संबंधित नहीं है।’ और इसका प्रयोग करने से मैं अपने को रोक नहीं सका’।

--ओशो

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन-- सत्र-( 6 )



 सत्र---6     नानी—नानी का प्रेम....

       लेकिन दुर्भाग्‍य से ‘सैड’ शब्‍द से फिर उस जर्मन आदमी एकिड़ सैड कि याद आ गइ, है भगवान, उसे मैं जीवन में फिर कभी कुछ कहने वाला नहीं था। मैं उसकी पुस्‍तक से यह जानने की कोशिश कर रहा था कि उसको मुझमें ऐसा क्‍या गलत दिखाई दिया कि जिसके आधार पर वह यह कह रहा है कि मैं एनलाइटेंड नहीं हूं। उत्‍सुकता वश मैं यह देखना चाहता था कि उसने क्‍यों इस तरह का निष्‍कर्ष निकाला। और जो मुझे मालूम हुआ वह सचमुच हंसने जैसा है। मैं इल्युमिनटेड हूं, ऐसा मानने का उसका कारण यह है कि मैं जो कह रहा हूं वह निश्चित ही समस्‍त मानवता के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। लेकिन मैं एनलाइटेंड नहीं हूं, ऐसा मानने का उसका कारण है मेरे बोलने का ढंग से मैं बोलता है।
      क्‍योंकि ऐसा लगता है जैसे कि यह व्‍यक्ति अनेक एनलाइटेंड लोगों से मिल चुका है। अनेक एनलाइटेंड लोगों को जानता है। मेरे बोलने के ढंग इसे उन लोगों जैसा नहीं लगता है।
मैं उसके लिए एक अमरीकन शब्‍द का प्रयोग करना चाहता हूं: यह सन-ऑफ-ए-बिच, सिर्फ जड़बुद्धि है। वोधिधर्म को अगर यह अभिव्‍यक्ति मालूम होती तो वह चीन के सम्राट वू से जरूर कहता, ‘यू सन-ऑफ-ए-बि‍च’, जहन्‍नुम में जाओ और मुझे अकेला छोड़ दो।‘’ लेकिन उन दिनों यह अमरीकन अ‍भिव्‍यक्ति थी ही नहीं। नहीं की अमरीका नहीं था। यह तो यूरोपियन मान्‍यता है कि कोलंबस ने अमरीका की खोज की, कई बार उसे खोजा जा चूका है, लेकिन हमेशा उसे दबा दिया गया।
      क्‍या मैं तुम्‍हें याद दिलाऊ कि मैक्सिको शब्‍द संस्‍कृत के मक्षिका शब्‍द से आता है। और मैक्सिको में ऐसे हजारों प्रमाण मिलते है जिनसे सिद्ध होता है। जिसस क्राइस्‍ट से बहुत पहले वहां पर हिंदू धर्म प्रचलित था—कोलंबस तो बहुत बाद में आया। सच तो यह है कि अमरीका, विशेषकर दक्षिण अमरीका एक ऐसे महाद्वीप का हिस्‍सा था जिसमें अफ्रीका भी सम्मिलित था। भारत ठीक मध्‍य में था। अफ्रीका नीचे था और अमेरिका ऊपर था वे। एक बहुत ही उथले सागर से विभक्‍त थे। तुम उसे पैदल चल कर पार कर सकते थे। पुराने भारतीय शास्‍त्रों में इसके उल्‍लेख है। वे कहते है कि लोग एशिया से अमरीका पैदल ही चले जाते थे। यहां तक कि शादियाँ भी होती थी। कृष्‍ण के प्रमुख शिष्‍य और महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अर्जुन ने मैक्सिको की एक लड़की से शादी की थी। निश्चित ही वे मैक्सिको को मक्षिका कहते थे। लेकिन उसका वर्णन बिलकुल मैक्सिको जैसा ही है।
      मैक्सिको में हिंदुओं के देवता गणेश की मूर्तियां है, इंग्‍लैड में गणेश की मूर्ति का मिलना असंभव है। कहीं भी मिलना असंभव है, जब वक कि वह देश हिंदू धर्म के संपर्क में न आया हो। जैसे सुमात्रा, बाली, और मैक्सिको में संभव है—लेकिन और कहीं नहीं, जब तक वहां हिंदू धर्म न रहा हो। मैं तो यह कुछ उल्‍लेख कर हरा हूं, अगर तुम इसके बारे में और अधिक जानकारी पाना चाहते हो तो तुम्‍हें भिक्षु चमन लाल की पुस्‍तक ‘’हिंदू अमरीका’’ देखनी पड़ेगी, जो कि उनके जीवन भर का शोधकार्य है। यह बड़े आश्‍चर्य की बात है कि कोई भी उनकी पुस्‍तक पर ध्‍यान नहीं देता। ईसाई तो‍ निश्चित ही ध्‍यान नहीं द सकते, लेकिन प्रतिभाशाली लोगों को कोई पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।
      लेकिन एनलाइटेंड या इल्युमिनटेड व्‍यक्ति को कैसे बोलना चाहिए, इसका निर्णय करने बाले ये कोन है। क्‍या इन्‍होंने वोधिधर्म को जाना है, क्‍या इन्‍होंने उनके चित्र को देखा है? ये तो तुरंत इस नतीजे पर पहुंच जाएंगे कि एनलाइटेंड व्‍यक्ति‍ ऐसा दिखार्इ नहीं दे सकता। वह बहुत ही डरावना दिखता है। उसकी आंखें जंगली शेर जैसी है। और वह तुम्‍हारी तरफ देखता है तो ऐसा लगता है मानो अभी यह चित्र में से कूदेगा और तुम्‍हारे उपर झपटेगा और तुम्हे मार डालगा। ऐसा वह था। लेकिन छोड़ो वोधिधर्म को, क्‍योंकि अब चौदह सदियां बीत गई है।
      मैं वोधिधर्म को व्‍यक्तिगत रूप से जानता था। मैंने उसके साथ कम से कम तीन महीने यात्रा की थी। जैसे मैं उसे प्रेम करता था वैसे ही वह मुझसे प्रेम करता था। तुम्‍हें यह जानने की उत्‍सुकता होगी कि यह मुझे क्‍यों प्रेम करता था। यह मुझे इसलिए प्रेम करता था क्‍योंकि मैंने उससे कभी कोई प्रश्‍न नहीं पूछा। उसने मुझसे कहां, ‘’मुझे मिलने वालों में तुम ऐसे पहले व्‍यक्ति हो जो कोई प्रश्‍न नहीं पूछता। और मैं प्रश्‍नों से सिर्फ ऊबता हूं। तुम एकमात्र व्‍यक्ति हो जो मुझे बोर नहीं करते।‘’
      मैंने कहा: ‘’इसका एक कारण है।‘’
      उसने पूछा: ‘’क्‍या कारण है?’’
      मैने कहा: ‘’मैं केवल उत्‍तर देता हूं, मैं कभी प्रश्‍न नहीं पूछता। अगर तुम्‍हारे पास कोई प्रश्‍न हो तो तुम मुझसे पूछ सकते हो। अगर तुम्‍हारे पास प्रश्न नहीं है तो अपना मुहँ बंध रखो।‘’
            हम दोनों हंसे, क्‍योंकि हम दोनों एक जैसे पागल थे। उसने मुझे अपने साथ यात्रा जारी रखने को कहां, लेकिन मैंने कहा, ‘’मुझे माफ करो। मुझे अपने रास्‍ते जाना है। और अब वह तुम्‍हारे रास्‍ते से अलग होता है।‘’
      वह भरोसा न कर सका। उसने इससे पहले अपने साथ चलने के लिए कभी किसी को नहीं कहा था। वह वही आदमी था जिसने अस जमाने के सबसे बड़े साम्राज्‍य से महान चीनी सम्राट बू को भी ऐसे इनकार कर दिया था जैसेकि वह कोर्इ भिखारी हो। वोधिधर्म को भरोसा नहीं आया कि मैंने उसके साथ निमंत्रण को अस्‍वीकृत कर दिया है।‘’
      मैंने कहा: ‘’अब तुम्‍हें मालूम हुआ कि अस्‍वीकृत होने पर कैसा लगता है। मैं तुम्‍हें इसका स्‍वाद देना चाहता था। अलविदा’’ लेकिन वह चौदह सौ साल पहले कि बात है।
      या अगर उसे सि‍र्फ भारतीय बुद्धत्‍व से प्रयोजन है, जो एक मूर्खों को प्रभावित करता लगता है, अन्‍यथा भारत का इससे क्‍या लेना-देना है। बुद्धत्‍व तो सभी जगह घटा है। लेकिन अगर उसे केबल भार‍तीय बुद्धत्‍व से प्रयोजन है, तो रामकृष्‍ण हमारे बहुत निकट है। उनके शब्‍दों को भी ज्‍यों का त्‍यों प्रस्‍तुत नहीं किया गया है। क्‍योंकि वे देहाती थे और देहाती भाषा का ही प्रयोग करते थे। लोगों के अनुसार जिन शब्‍दों को प्रयोग समाधिस्‍थ व्‍यक्ति को नहीं करना चाहिए, वे सब निकाल दिए गए थे। मैंने बंगाल में धूम-धूम कर ऐसे लोगों से पूछा है जो अभी जीवित है कि रामकृष्‍ण कैसे बोलते थे। उन सब ने बताया कि वे भयंकर थे। वे ऐसे बोलते थे जैसे आदमी बोलना चाहिए—सीधा साफ, बिना लाग-लपटे के।
      मैं अपने नाना की मृत्‍यु के बारे में बसत कर रहा था।
      वह हमेशा के लिए बिछुड़ना था। हम दुबारा नहीं मिलेंगे। फिर भी इसमें एक सौंदर्य था। और उनहोंने मंत्र जाप से इसे सुंदर, और प्रार्थना पूर्ण बना दिया—इसमें सुगंध आ गई। वे बूढे थे और मर रहे थे, शायद जबरदस्‍त हार्ट-अटैक से। हमे इसके बारे में कुछ पता न था। क्‍योंकि गांव में कोई डाक्‍टर नहीं था, कोई दवा की दुकान तक नहीं थी। तो हमें‍ उनकी मृत्‍यु का कारण नहीं मालूम। लेकिन मैं सोचता हूं कि वह जबरदस्‍त हार्ट-अटैक था।
      मैंने उनके कान में पूछा: ‘’नाना, विदा होने से पहले क्‍या आप मुझे कुछ कहना चाहते है। कोई अंतिम शब्‍द, या आप मुझे कुछ देना चाहते है। जो सदा आपकी याद दिलाता रहे।‘’
 ़    उन्‍होंने अपनी अंगूठी निकाल कर मेरे हाथ में रख दी। वह अंगूठी अब किसी संन्‍यासी के पास है। मैंने वह किसी को दे दी।
      लेकिन वह अंगूठी हमेशा एक रहस्‍य थी। वे बार-बार उस अंगूठी के भीतर देखते रहते थे। लेकिन अपने पूरे जीवन में उन्‍होंने कभी-कभी किसी को नहीं देखने दिया कि उसके भीतर क्‍या है। उस अंगूठी के दोनों और कांच की खिड़की थी जिसमें से देखा ज सकता था। ऊपर ऐ हीरा लगा हुआ था और दोनों और कांच की खिड़की थी। भीतर जैन तीर्थ कर महावीर की एक बहुत छोटी लेकिन बहुत सुंदर मूर्ति थी। और दोनों खिड़कियों में मैग्नीफ़ाइंग ग्‍लासेस थी। जिसके कारण वह बहुत बड़ी दिखाई देती थी। वह मेरे काम की न थी, क्‍योंकि पूरी कोशिश की लेकिन मुझे अफसोस है कि कभी महावीर से उतना प्रेम नहीं कर सका जितना मैं बुद्ध से करता हूं। यद्यपि वे दोनों समकालीन थे। 
      महावीर में कमी है, और उसके बिना मेरा ह्रदय उनके लिए नहीं धड़क  सकता। वे बिलकुल पत्‍थर की मूर्ति जैसे दिखाई देते है। बुद्ध अधिक जीवंत दिखाई देते है, लेकिन मेरे स्‍तर की जीवंतता तक नहीं। इसीलिए मैं चाहता हूं कि वे जो़रबा भी बने। अगर कभी वे मुझे परलोक में कहीं मिले तो बडी मुश्किल होने बाली है। वे मुझ पर जोर से चिल्‍लाएंगे, तुम चाहते हो कि मैं जो़रबा बन जाऊँ।
      न तो जो़रबा अकेले बच सकता है—वह हिरोशिमा में समाप्‍त हो जाएगा—न ही बुद्ध    मनुष्‍य के भावी मनोविज्ञान को अध्‍यात्‍म और भौतिकवाद, पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु होने की जरूरत है। किसी दिन संसार मेरा आभार मानेगा कि मेरा संदेश पश्चिम पहुंच रहा है। अन्‍यथा आज तक तो मुमुक्षु पूर्व जाते रहे है। लेकिन इस बार एक जीवित बुद्ध का संदेश पश्चिम में पहुंच रहा है।
      पश्चिम नहीं जानता की बुद्धो को कैसे पहचाना जाए, क्‍योंकि उसने कभी किसी बुद्ध को जाना ही नहीं। उसने आंशिक बुद्धो को जाना है। जीसस को, पाइथागोरस को, डायोजनीज को। उन्‍होंने कभी समग्र बुद्ध को नहीं जाना। यह आश्‍चर्यजनक नहीं है कि वे मेरे बारे में वाद-विवाद
कर रहे है।
       क्‍या तुम्‍हें मालूम है कि भा‍रतीय समाचार-पत्रों में वे क्‍या छाप रहे है। वे एककहानी छाप रहे है कि शायद दुश्‍मनों ने मेरा अपहरण कर लिया है और मेरा जीवन खतरे में है। अब मैं यहां पर हूं और उनको मुझसे कोई मतलब नहीं है। भारत सड़ा-गला देश है। लगभग दो हजार वर्षो से यह सड़ा गला देश, दुर्गंध आती है इससे। भारतीय आध्‍यात्मिकता से अधिक दुर्गंध और किसी चीज से नहीं आती। यह लाश है और बहुत पुरानी लाश है—दो हजार वर्ष पुरानी।
      लोग भी कैसी कहानियां गढ़ लेते है कि दुश्‍मनों ने मेरा अपहरण कर लिया है और अब मेरा जीवन खतरे में है। सच तो यह है कि पिछले पच्‍चीस वर्षो से लगातार मेरा जीवन खतरे में है। यह चमत्‍कार ही है कि मैं अभी तक जीवित हूं।
      मैं तुम्‍हें कह रहा था मेरे नाना ने मृत्‍यु से पहले अपनी सर्वाधिक प्रिय वस्‍तु मुझे दी—महावीर की मूर्ति, जो अंगूठी में हीरे के पीछे छिपी हुई थी। आंखों में आंसू भर कर उन्‍होंने कहा, तुम्‍हें देने के लिए मेरे पास और कुछ नहीं है। क्योंकि जो कुछ भी मेरे पास है। तुमसे भी ऐसे ही छीन लिया जाएगा जैसे मुझसे छीन लिया गया है। जिसने स्‍वयं को जाना है, उसके प्रति अपना प्रेम ही मैं तुम्‍हें दे स‍कता हूं।
      यद्यपि मैंने उनकी अंगूठी अपने पास नहीं रखी, फिर भी मैंने उनकी इच्‍छा को पूरा कर दिया है। मैंने उस एक को जाना है, और मैंने उसे अपने भीतर जाना है। एक अंगूठी में होने से क्‍या फर्क पड़ता है। लेकिन बेचारे वृद्ध आदमी, उनहोंने अपने गुरु महावीर को प्रेम किया, और उन्‍होंने अपना प्रेम मुझे दिया। अपने गुरु के प्रति उनके प्रेम का मैं आदर करता हूं। नाना के होठों पर अंतिम शब्‍द थे: ‘’चिंता मत करो, क्‍योंकि मैं मर नहीं रहा हूं।‘’
      हम सबने इंतजार किया कि शायद वे और कुछ कहेंगे, लेकिन वे अंतिम शब्‍द थे। उनकी आंखें बंद हुई और वे नहीं रहे।
      अभी भी मुझे वह मौन याद है। बैलगाड़ी एक नदी के पाट में से गुजर रही थी। मुझे सब विस्‍तार से याद है। मैं कुछ नहीं बोला, क्‍योंकि मैं अपनी नानी को परेशान नहीं करना चाहता था। वे कुछ न बोली। कुछ क्षण बित गये, फिर मुझे उनकी कुछ चिंता हुई और मैंने कहा: ‘कुछ बोलों, इतनी चुप मत रहो, यह असहनीय है।’
      क्‍या तुम भरोसा कर सकते हो, उनहोंने एक गीत गाय, ऐसे मैंने सीखा कि मृत्‍यु का भी उत्‍सव मनाया जा सकता है, उन्‍होंने वो गीत गया जो मेरे नाना से पहली बार प्रेम हुआ था उस समय गया था।
      यह भी उल्‍लेखनीय है कि नब्‍बे वर्ष पहले, भारत में नानी में प्रेम करने का साहस था। वे चौबीस साल की उम्र तक अविवाहित रहीं। यह विरली बात थी। एक बार मैंने उनसे पूछा कि आप इतनी उम्र तक अविवाहित क्‍यों रहीं। वे इतनी सुंदर थी.......मैंने मजाक में उनसे कहा कि छतरपुर का राजा भी शायद आपके प्रेम में पड़ गया होता।
      वे बोली: ‘आश्‍चर्य है, तुमने यह बात कैसे कही, क्‍येांकि वह मेरे प्रेम में पड़ गया था। लेकिन मैंने उसे इनकार कर दिया। और केवल उसको ही नहीं और बहुतों को भी।
      उन दिनों भारत में लड़कियों की शादी सात साल की उम्र में या ज्यादा से ज्‍यादा नौ साल की उम्र में कर दी जाती थी। प्रेम का भय....अगर वे बड़ी हुई तो शायद वे प्रेम में पड़ सकती है, लेकिन नानी के पिता कवि थे। उनके गीत अभी भी खजुराहो तथा आस-पास क गांवों में गाए जाते है। उन्‍होंने जोर दिया कि जब तक वह राज़ी नहीं होती तक वे उसकी किसी से शादी नहीं करेंगे। संयोग से नानी का प्रेम मेरे नाना से हो गया। मैंने उनसे पूछा, ‘यह और आश्‍चर्य की बात है कि आपने छतरपुर के राजा को इनकार कर दिया और इस गरीब आदमी के प्रेम में पड़ गई। किस लिए, निश्चित ही वे कोई बहुत सुंदर नहीं थे, और न किन्‍हीं और अर्थों में असाधारण थे। तुम उनके प्रेम में क्‍यों पड़ी?
            उन्‍होंने कहा: ‘तुम गलत सवाल पूछ रहे हो, प्रेम में ‘क्‍यों’ नहीं होता। मैंने सिर्फ उनको देखा, और बस कुछ हो गया। मैंने उनकी आंखों देखी और मुझे गहन विश्वास पैदा हो गया—एक अटूट विश्‍वास जो आज तक डांवाडोल नहीं हुआ।’
      मैंने अपने नाना से पूछा था, ‘’नानी कहती है कि उनको आपसे प्रेम हो गया था। उनकी तरफ से तो ठीक है, लेकिन आप क्‍यों विवाह के लिए राज़ी हो गए।‘’
      उनहोंने कहां: ‘मैं कवि या विचारक नहीं हूं, लेकिन मैं सौंदर्य को देखूं तो उसे पहचान सकता हूं।’
      मैंने अपनी नानी से अघिक सुंदर स्‍त्री कभी नहीं देखी। मैं स्‍वयं उनके प्रेम में था, और उनके पूरे जीवन उनसे बहुत प्रेम करता रहा। अस्‍सी साल की अवस्‍था में जब उनकी मृत्‍यु हुई तो मैं तुरंत घर पहुंचा। वहां वे लेटी हुई थी—मृत। सब लोग मेरा इंतजार कर रहे थे। क्‍योंकि नानी ने उनसे कहा था कि जब तक मैं न पहुंच जांऊ तब तक उनका अंतिम संस्‍कार न किया जाए। और उन्‍होंने जोर देकर कहा था कि उनकी चिता को मैं ही अग्नि दूँ। तो वे मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं अंदर गया और उनके चेहरे से कपड़ा हटाया.......और में अभी भी सुंदर थी। असल में पहले से भी सुंदर, क्‍योंकि सब बिलकुल शांत था—जीवन की भाग दौड़ समाप्‍त हो गई थी। श्‍वास की हलन-चलन भी बंद हो गई थी। वे केवल उपस्थिति मात्र थी।
      उनकी चिता को आग देना मेरे जीवन को सबसे कठिन काम था। यह वैसे ही था जैसे कि मैं लियोनार्डो या विन सेंट वान गॉग के सबसे सुंदर चित्र को आग लगा रहा होऊं। निश्चित ही, मेरे लिए वे मोना लिसा से भी अधिक मूल्‍यवान थी। क्लियोपैट्रा से भी अधिक सुंदर थी। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
      सौंदर्य की जो परख जो मेरे भीतर है यह उन्‍हीं की देन है। मैं जो हूं, वैसा होने में उन्‍होंने सब तरह से मेरी मदद की है। उनके बिना मैं शायद एक दुकानदार होता, या डाक्‍टर, या इंजीनियर होता। क्‍योंकि जब मैंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की तो मेरे पिता इतने गरीब थे कि मुझे विश्‍वविद्यालय भेजने के लिए कर्ज तक लेने को तैयार थे। उनका पूरा आग्रह था कि मैं विश्‍वविद्यालय जाऊँ। मैं जाना चाहता था, लेकिन मेडिकल कालेज नहीं जाना चाहता था और इंजीनियरिंग कालेज भी नहीं जाना चाहता था। मैंने डाक्टर या इंजीनियर बनने से साफ मना कर दिया। मैंने उनसे कहा, ‘अगर आप सच जानना चाहते है तो सच यह है कि मैं संन्‍यासी बनना चाहता हूं, एक घुमक्कड़।’
      उन्‍होंने कहा: ‘क्‍या, एक घुमक्‍कड़?
      मैंने कहा: ‘हां, में विश्‍वविद्यालय दर्शनशास्‍त्र, ये फिलासफी पढ़ना चाहता हूं, ताकि मैं एक दार्शनिक घुमक्‍कड़ बन सकूँ।’
      वे मना करते हुए बोले: ‘इसके लिए तो मैं कर्ज के झंझट नहीं लूँगा।’
      मेरी नानी ने कहा: ‘बेटा, तुम फ़िकर न करो, तुम जाओ और जो करना चाहते हो करो। मैं जिंदा हूं। मैं अपना सब कुछ बेच-बाच कर भी तुम्‍हारी इच्‍छा पूरी करूंगी। मैं तुमसे कभी नहीं पूछूंगी कि तुम कहां जाना चाहते हो और क्या पढ़ना चाहते हो।’
      उनहोंने कभी नहीं पूछा, और वे बराबर मुझे पैसे भेजती रही, तब भी जग मैं प्रोफेसर बन गया। मुझे उन्‍हें कहना पडा कि अब तो मैं स्‍वयं कमा रहा हूं और अब तो मुझे उनको पैसे भेजने चाहिए।
      लोग आश्‍चर्य करते थे, कि इतनी पुस्‍तकें खरीदने  के लिए मेरे पास इतना पैसा कहां से आता है क्‍योंकि मेरे पास हजारों पुस्‍तकें थी। जब मैं हाईस्‍कूल में पढ़ता था उस समय भी मेरे घर में हजारों पुस्‍तकें थी। मेरा सारा घर पुस्‍तकों से भरा हुआ था। और सब आश्‍चर्य करते थे कि मेरे पास पैसा कहां से आता है। मेरी नानी ने मुझसे कहा हुआ था, कभी किसी को मत बताना कि तुमको मुझसे पैसा मिलता है। वे मुझे बराबर पैसे भेजती रही। तुम्‍हें जान कर आश्‍चर्य होगा कि जिस महीने उनकी मृत्‍यु हुई उस महीने भी उन्‍होंने हमेशा की तरह मुझे पैसे भेजे। जिस दिन उनकी मृत्‍यु हुई उस सुबह उन्‍होंने चेक पर हस्‍ताक्षर किए थे। और तुम्‍हें यह जान कर और भी आश्‍चर्य होगा कि वही अंतिम रकम थी उनके बैंक में। शायद किसी तरह उन्‍हें मालूम था कि अब कोई कल नहीं होगा।
      मैं अनेक प्रकार से भाग्‍यवान हूं, लेकिन ऐसे नाना-नानी पाने के लिए विशेष भाग्‍यवान हूं ...... और वे सुनहरे आरंभिक वर्ष।
        

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--सत्र ( 5 )


सत्र—5      ‘’नमो अरिहंताणं.....
जब बचपन में मैं अपने नाना के पास रहता था तो यही मेरा तरीका था, और फिर भी मैं सज़ा से पूरी तरह सुरक्षित था। उन्‍होंने कभी नहीं कहा कि यह करो और वह मत करो। इसके विपरीत उन्‍होंने अपने सबसे आज्ञाकारी नौकर भूरा के मेरी सेवा में मेरी सुरक्षा के लिए नियुक्‍त कर दिया। भूरा अपने साथ सदा एक बहुत पुरानी बंदूक रखता था। और थोड़ी दूरी पर मेरे साथ- साथ चलता था। लेकिन गांव वालों को डराने के लिए इतना काफी था। मुझे अपनी मनमानी करने का मौका देने के लिए इतना काफी था।
      कुछ जो भी तुम सोच सकते हो.....जैसे भैंस पर उलटी सवारी करना, और भूरा पीछे-पीछे चल रहा  है। बहुत समय बाद विश्वविद्यालय के म्‍यूजियम में मैंने भेस पर उलटे बैठे हुए लाओत्से की मूर्ति देखी। मैं इतनी जोर से हंसा की म्‍यूजियम का निदेशक भागा हुआ आया कि क्‍या हो गया, क्‍या कुछ गड़बड़ है, क्‍योंकि मैं हंसी के कारण पेट पकड़ कर जमीन पर बैठा हुआ था। उसने पूछा ‘क्‍या कोई तकलीफ है।’
      विशेष कर मेरे गांव में और पूरे भारत में कोई भी भेस की सवारी नहीं करता। लेकिन चीनी अद्भुत लोग है, और यह व्‍यक्ति लाओत्से तो सबसे अद्भुत था। लेकिन परमात्‍मा जाने—और परमात्‍मा ही जानता है, मुझे भी नहीं पता—कि कैसे मुझे बाजार में भेस पर उलटी सवारी करने की सूझी, मैं सोचता हूं शायद इसलिए क्‍योंकि मुझे बेतुकी बातें हमेशा बहुत पसंद रही है।
      बचपन के वे दिन—अगर वे फिर से मुझे मिल सकें तो मैं दुबारा जन्‍म लेने को तैयार हो जाऊँगा, लेकिन तुम जानते हो और मैं भी जानता हूं कि कुछ भी पुनरुक्त नहीं होता और न किया जा सकता। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि मैं दुबारा जन्‍म लेने को तैयार हो जाऊँगा, अन्‍यथा कौन चाहता है, चाहे वो दिन कितने ही सुंदर क्‍यों ने हो।
      मैं गलत-नक्षत्र में पैदा हुआ था। मुझे दुःख है कि मैं बड़े ज्‍योतिषी से पूछना भूल गया कि मैं इतना शैतान क्‍यों था। मैं शैतानी के बीना जी नहीं सकता। वही मेरा पोषण है।
       मैं अपने बूढे नाना को और मेरी शैतानी यों से उन्‍हें जो परेशानियां हुई उन्‍हें समझ सकता हूं। दिन भर वे अपनी गद्दी पर बैठे अपने ग्राहकों को कम और मेरी शिकायत करने बालों की अधिक सुनते। लेकिन वे उनसे कहते, ‘उसने जो नुकसान किया हो उसका मैं हर्जाना देने को तैयार हूं, लेकिन या रखिए, मैं उसको सज़ा नहीं दूँगा।’
      शायद उनका वह धैर्य, मेरे जैसे शैतान बच्‍चे के साथ.... यहां तक कि मैं भी सहन नहीं कर सकता। अगर वैसा बच्‍चा मुझे दिया जाता और सालों तक...हे भगवान, -- कुछ ही मिनटों के लिए भी, तो मैं उसे हमेशा के लिए घर से बाहर निकाल देता।
      शायद वे वर्ष मेरे नाना के लिए चमत्‍कार साबित हुए। उस असीम धैर्य का परिणाम हुआ, वे और-और मौन होते गए। मैंने रोज-रोज इसे बढ़ते देखा। कभी-कभी मैं कहता, ‘नाना आप मुझे दंड दे सकते है। आपको इतना सहनशील होने की जरूरत नहीं है।’ और तुम भरोसा कर सकते हो, वे रोने लगते, उनकी आंखों में आंसू आ जाते, और वे कहते ‘तुम्‍हें सज़ा दूँ, वह मैं नहीं कर सकता। मैं अपने आप को सज़ा दे सकता हूं, लेकिन तुम्‍हें नहीं।’
मैंने कभी एक क्षण के लिए भी उनकी आंखों में मेरे लिए गुस्‍से की परछाई तक नहीं देखी। और मेरा भरोसा करो, मैने वह सब किया जो हजार बच्‍चे कर सकते है। सुबह से, नाश्‍ते  से भी पहले से लेकर देर रात ते मुझे शैतानी सूझती। कभी-कभी तो में रात को इतनी देर से घर आता-सुबह तीन बजे। लेकिन वे भी क्‍या आदमी थे। उन्‍होने कभी नहीं कहा, तुमने बहुत देर कर दी। यह एक बच्‍चे के घर आने का समय नहीं है। नहीं एक बार भी नहीं। सच तो यह है कि मेरे सामने वे दिवाल पर लगी हुई घड़ी की तरु भी न देखते।
      इस तरह मैंने धार्मिकता सीखी। वे मुझे कभी मंदिर नहीं नहीं ते गए, जहां वे जाने थे। मैं भी उस मंदिर में जाता था, लेकिन सिर्फ तब जब वह बंद होता था। केवल प्रिज्‍म चुराने के लिए क्‍योंकि उस मंदिर में प्रिज्‍म से बने बड़े सुंदर फानूस लगे हुए थे। मैं सोचता हूं, धीरे-धीरे लगभग मैंने सब प्रिज्‍म चुरा लिए। जब मेरे नाना को यह बताया गया तो उन्‍होंने कहा, तो क्‍या हुआ, मैंने ये फानूस दान दिए थे। मैं और दे सकता हूं। वह कोई चोरी नहीं कर रहा है। यह तो उसके नाना की संपत्ति है। मैंने वह मंदिर बनवाया था।‘’
      पुजारी ने शिकायत करनी बंद कर दी। क्‍या फायदा था?  वह तो सिर्फ नाना का नौकर था।
      नाना रोज सुबह मंदिर जाते थे। फिर भी उन्‍होंने कभी नहीं कहा, ‘तुम मेरे साथ चलो। ’उन्‍होंने कभी कोई सिद्धांत मेरे दिमाग में नहीं डाला। यह बहुत बड़ी बात है। कोई सिद्धांत न थोपना। एक असहाय बच्‍चे को जबरदस्‍ती अपनी मान्‍यताए्ं मनवाना बहुत सहज है। लेकिन वे प्रलोभन में नहीं आए.....हां, मैं इसे सबसे बड़ा प्रलोभन कहता हुं। जैसे ही तुम किसी को अपने पर किसी तरह से निर्भर देखते हो, वैसे ही शिक्षा देने लगते हो। उनहोंने मुझसे कभी यह तक नहीं कहा, ‘तुम जैन हो।’
      मुझे अच्‍छी तरह याद है—एक बार जब जनगणना हो रही थी, जनगणना अधिकारी हमारे घर आया। उसने बहुत तरह की पूछताछ की उसने नाना के धर्म के बारे में पूछा तो उन्‍होंने कहा कि उनका धर्म जैन है। फिर उसने नानी के बारे में पूछा, मेरे नाना ने कहा: ‘आप खुद उनसे पूछ सकते है। धर्म व्‍यक्ति गत मामला है। मैंने खुद कभी उनसे नहीं पूछा।’ क्‍या व्‍यक्ति थे।
      मेरी नानी ने उत्‍तर दिया, ‘मैं किसी भी धर्म को नहीं मानती, सब धर्म मुझे बचकाने लगते है। ’वह अफसर भौचक्‍का रह गया। मैं भी बहुत हैरान हुआ। वे किसी धर्म को में विश्वास नहीं करती। भारत में ऐसी स्‍त्री खोजना असंभव है जो किसी धर्म में विश्वास न करती हो। लेकिन वे खजुराहो में जन्मी थी, शायद तांत्रिकों के परिवार में, जो कभी किसी धर्म में विश्वास नहीं करते। वे ध्‍यान करते है, लेकिन वे किसी धर्म में कभी विश्वास नहीं करते।
      पश्चिमी मन को यह बहुत असंगत लगता है: बिना धर्म के ध्‍यान; हां...सच तो यह है कि अगर तुम किसी धर्म में विश्वास करते हो तो तुम ध्‍यान नहीं कर सकते। धर्म तुम्‍हारे ध्‍यान में बाधा है। ध्‍यान के लिए किसी परमात्‍मा, किसी स्‍वर्ग या नरक, किसी दंड के डर या सुख के लोभ की कोई आवश्‍यकता नहीं है। ध्‍यान का मन से कुछ लेना-देना नहीं है, ध्‍यान मन के पान है। और धर्म केवल मन के भीतर है।
       मैं जानता हूं कि नानी कभी मंदिर नहीं गई, लेकिन उन्‍होने मुझे कभी एक मंत्र सिखाया जो आज मैं पहली बार बताऊगां। वह जैन मंत्र है, लेकिन उसका संबंध केवल जैनियों से नहीं है। यह तो केवल संयोग है कि यह मंत्र जैन धर्म के साथ संबंधित है......
      नमो अरिहंताणं नमो नमो।
      नमो सिद्धाणं नमो नमो।
      नमो उवज्‍झायाणं नमो नमो।
      नमो लोए सव्‍वसाहूणं नमो नमो।
      एसो पंच नमुक्‍कारो
      ओम् शांति शांति शांति ........
यह मंत्र बहुत सुंदर है। अब मैं अनुवाद करने की कोशिश करता हूं, ‘मैं अरिहंतों के चरणों में झुकता हूं, जैन धर्म में अरिहंत उसे कहते है जिसे बौद्ध धर्म में बोद्यिसत्‍व क‍हते है—जिसने परम सत्‍य को पा लिया, लेकिन किसी और कि चिंता नहीं करता। वह अपने धर पहुंच गया और संसार की और उसने पीठ कर ली। वह कोई धर्म नहीं बनाता, वह कोई उपदेश भी नहीं देता, वह कोई धोषणा भी नहीं करता। निश्चित ही सबसे पहले उसको ही याद किया जाना चाहिए। सबसे पहले उन सब लोगों का स्‍मरण जिन्‍होंने स्‍वयं को जाना और चुप रह गए। पहला आदर शब्‍दों के लिए नहीं, वरन मौन के लिए है, दूसरों की सेवा के लिए नहीं, वरन स्‍वयं को जानने के लिए है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरों की सेवा होती है या नहीं, वह प्राथमिक नहीं है, गौण है। प्राथमिक है कि उसने स्‍वयं को जाना और इस दुनिया में स्‍वयं को जानना बहुत मुश्किल है।
      लाग कल्‍पनाओं में जी रहे है, वही उनका जीवन है—एक कल्‍पना मात्र, जो कही है नहीं, होली घोस्‍ट, लेकिन उससे क्‍या फर्क पड़ता है कि घोस्‍ट होली है या अन होली। असल में वह है ही नहीं। बेवकूफी की हद है कि ईसाई त्रिमूर्ति में होली घोस्‍ट को सम्मिलित किया गया है, परमात्‍मा, बेटा और होली घोस्‍ट। सिर्फ स्‍त्री से बचने के लिए उन्‍होंने होली घोस्‍ट को वहां रखा हुआ है। मां को हटा कर होली घोस्‍ट को वहीं रखा है। इस होली घोस्‍ट ने पूरी ईसाइयत को बरबाद किया है। क्‍योंकि एकदम शुरूआत से ही, एक दम बुनियाद से ही यह झूठ और भ्रमों पर आ‍धारित है।
      लेकिन इस होली घोस्‍ट जैसे घि‍नौने व्‍यक्ति को त्रिमूर्ति में  सम्मिलित करने के लिए ईसाइयों को क्षमा नहीं किया जाएगा, और इस पवित्र घोस्‍ट ने बेचारी मेरी को गर्भवती बनाने का अपवित्र काम किया। किसने तुम सोचते हो बेचारे बढ़ई की पत्‍नी को गर्भ वती बनाया? होली घोस्‍ट ने, वाह, महान पवित्रता है, तो फिर अपवित्रता क्‍या होगी।
      एक बात निश्चित है कि ईसाइयत स्‍त्री से पूरी तरह बचने की, उसे पूरी तरह से मिटा देने की कोशिश करती रही है। उन्‍होंने एक परिवार तक बना दिया। अगर कोई बच्‍चा परिवार का चित्र बनाए—पिता, बेटा और होली घोस्‍ट—तो तुम कहोगे, यह क्‍या मूर्खता है, मां कहां है।
      बिना मां के पिता कैसे हो सकता है, बिना मां के बेटा कैसे हो सकता है, एक छोटा बच्‍चा भी तुम्‍हारे तर्क को समझ सकता है। लेकिन ईसाई धर्मशास्‍त्री नहीं वह बच्‍चा नहीं है, वह मंदबुद्धि बच्‍चा है। उसके दिमाग में कुछ गड़बड़ है, विशेषकर बाई और का उसका दिमाग या तो खाली है या उसमें कचरा भरा हुआ है।
      जैन ‘अरिहंत’ उस व्‍यक्ति को कहते हैं जिसने स्‍वयं को उपलब्‍ध कर लिया है, और उस आत्‍म-अपलब्धि के सौंदर्य से इतना खोया हुआ है कि वह समस्‍त संसार को भूल गया है। अरिहंत शब्‍द का अर्थ है: जिसने शत्रु को मार डाला। और शत्रु है अहंकार, मंत्र के पहले भाग का अर्थ है: मैं उसके चरणों में झुकता हूं जिसने स्‍वयं को अपलब्‍ध कर लिया है।
      दूसरा भाग है: ‘नमो सिद्धाणं नमो-नमो।‘
      यह मंत्र प्राकृत में है, संस्‍कृत में नहीं। प्राकृत जैनियों की भाषा है। यह संस्‍कृत से ज्‍यादा प्राचीन है। संस्‍कृत शब्‍द का अर्थ होता है परिष्‍कृत। तुम परिष्‍कृत शब्‍द से ही समझ सकते हो कि इसके पहले अवश्‍य कुछ रहा होगा, अन्‍यथा तुम किसे परिष्‍कृत करोगे? प्राकृत का अर्थ‍ है बिना परिष्‍कृत के, स्‍वाभाविक, अनगढ़। और जैन का यह कहना बिलकुल ठीक है कि उनकी भाषा दुनियां में सबसे प्राचीन है। उनका धर्म भी अति‍ प्राचीन है।
      हिंदुओं के ग्रंथ ऋग्‍वेद में जैनियों के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का उल्‍लेख है। निश्चित ही इसका मतलब हुआ कि वह ऋग्‍वेद से बहुत पुराना है। ऋग्‍वेद दुनिया में सबसे प्राचीन पुस्‍तक है। और इसमें जैन तीर्थंकर आदिनाथ का उल्‍लेख इतने आदर के साथ किया गया है की एक बात निश्चित है कि वे उन लोगों के समकालीन नहीं हो सकते जिन्‍होंने ऋग्‍वेद लिखा है।
      समकालीन गुरु को पहचानना बहुत मुश्किल है। उसकी किस्‍मत में तो निंदा ही होती है – चारों और से हर प्रकार की निंदा। उसको आदर नहीं मिलता। वह आदर योग्‍य व्‍यक्ति नहीं होता। समय लगता है, उसको क्षमा करने में लोगों को हजारों साल लगते है। केवल तभी वे उसका आदर दे पाते है। जब वे उसकी निंदा करने के अपराध-भाव से मुक्‍त होते है, तो वे उसका आदर करने लगते है, उसकी पूजा करने लगते है।
      मंत्र प्राकृत में है, अपरिष्‍कृत एवं अनगढ़।
      दुसरी पंक्ति है: ‘नमो सिद्धाणं नमो नमो।’
      मैं उसके चरणों में झुकता हूं जो अपने स्‍वभाव में पहुंच गया है।
      तो पहले और दूसरे में क्‍या अंतर है?
      अरिहंत कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखता, कभी किसी प्रकार की सेवा की चिंता नहीं करता
--क्रिश्चियन सेवा या कोई और सेवा। लेकिन सिद्ध कभी-कभी डुबती मानवता को बचाने के लिए अपना हाथ बढ़ा देता है। लेकिन कभी-कभी ही, हमेशा नहीं। यह कोई अनिवार्यता नहीं है, यह कोई जरूरी नहीं है। यह उसका चुनाव है कि वह ऐसा करे या न करे।
      इसलिए तीसरी पंक्ति है: ’नमो आयरियाणं नमो नमो।’ 
      मैं आचार्यों, गुरूओं के चरणों में झुकता हूं।
      उन्‍होंने भी उसी को उपलब्‍ध किया है, लेकिन वे संसार की और मुख किए हुए हैं। वे संसार की सेवा करते है। वे संसार में रहते हुए भी नहीं रहते.....फिर भी संसार में है।
     चौथी पंक्ति हैं: ‘नमो उवज्‍झायाणं नमो नमो।’
      मैं उपाध्‍यायों, शिक्षकों, के चरणों में झुकता हूं।
      शिक्षक और गुरू के सूक्ष्‍म अंतर को तुम जानते हो। गुरु ने जाना है, और जो जाना है उसे वह दूसरों को बाँटता है। शिक्षक ने जानने बाल से प्राप्‍त किया है। और उसका ज्‍यों का त्‍यों  संसार को दे देता है। लेकिन उसने स्‍वंय नहीं जाना है।
      इस मंत्र के रचयिता सचमुच अद्भुत है। वे उनके चरणों में भी झुकते है। जिन्‍होंने स्‍वयं नहीं जाना है। लेकिन कम से कम सद गुरूओं का संदेश लोगों तक पहुंचा रहे है।
      पाँचवीं पंक्ति उन सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण वाक्‍यों में से जिनसे संपर्क में मैं अपने जीवन में कभी भी आया। यह बड़ी अद्भुत बात है कि जब मैं छोटा सा बच्‍चा था तभी मेरी नानी ने इसे मुझे दिया। जब मैं तुम्‍हें यह समझाऊंगा तो तुम भी इसके सौदर्य को देखोगे। केवल उनमें ही इसको मुझे देने कि क्षमता थी। यद्यपि सब जैन इसको अपने मंदिरों में दोहराते है, लेकिन मैं किसी और को नहीं जानता जिसमें इसकी घोषणा करने का साहस रहा हो। लेकिन दोहराना एक बात है और अपने किसी प्रिय व्‍यक्ति के जीवन में इसे उतारना बिलकुल दूसरी बात है।
      ‘नमो लाए सव्‍वसाहूणं नमो नमो।’
      मैं उन सब लोगों के चरणों में झुकता हूं जिन्‍होंने स्‍वयं को जाना है।
      बिना किसी भेद भाव के—चाहे वे हिंदू हो, चाहे वो जैन हो, चाहे बौद्ध, चाहे ईसाई, चाहे मुसलमान। मंत्र कहता है, मैं उन सबके चरणों में झुकता हूं जिन्‍होंने स्‍वयं को जाना है।
      जहां तक मैं जानता हूं, यही एकमात्र मंत्र है जो पूर्णत: धर्म निरपेक्ष है।
      जानने का कोई विषय नहीं है, जानने को कुछ नहीं है, केवल जानने वाला है।
      यह मंत्र एकमात्र धार्मिक बात थी--अगर‍ तुम इसे धार्मिक कह सको—जो मुझे मेरी नानी द्वारा दी गई। और वह भी मेरे नाना के द्वारा नहीं, बल्कि मेरी नानी के द्वारा दी गई। क्‍यों‍कि एक रात मैंने उनसे पूछा।......एक रात उन्‍होंने कहा: ’तुम जागे हुए लगते हो, क्‍या नींद नहीं आ रही, क्‍या तुम कल करने वाली शैतानियों के बारे में सोच रहे हो।’
      मैंने कहा: ‘नहीं। लेकिन पता नहीं क्‍यों एक प्रश्‍न मुझमें उठ रहा है। सबका कोई न कोई धर्म होता है। और जब लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम कौन से धर्म के हो। तो मैं कंघे बिचका देता हूं। अब कंधे बिचकाना तो कोई धर्म नहीं है। तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि मुझे क्‍या करना चाहिए।‘
      उन्‍होंने कहा: ‘मैं स्‍वयं किसी धर्म को नहीं मानती, लेकिन मुझे यह मंत्र बहुत प्रिय है और यही मैं तुम्‍हें दे सकती हूं। इसलिए नहीं की यह परंपरागत जैन मंत्र है, बल्कि सिर्फ इसलिए कि मैने इसके सौदर्य को अनुभव किया है। मैंने इसे लाखों बार दोहराया है और हमेशा मुझे बहुत शांति मिली है। केवल इस भाव से कि उन सबको प्रणाम है जिन्‍होंने जाना है। यह मंत्र मैं तुम्‍हें दे सकती हूं। इसलिए इससे अधिक मेरे लिए संभव नहीं है।’
      अब मैं कह सकता हूं कि वे सचमुच महान थी। क्‍योंकि जहां तक धर्म का संबंध है, सब झूठ बोल रहे है। ईसाई, यहूदी, जैन, मुसलमान, सब झूठ बोल रहे है। वे परमात्‍मा की, स्‍वर्ग और नरक की देवताओं की और सब तरह की बकवास करते है। जब कि पता उन्‍हें कछ नहीं है। वे महान थी। इसलिए नहीं कि वे जानती थी, बल्कि इसलिए कि वे एक बच्‍चे से झूठ नहीं बोल सकती थी।
      किसी को झूठ नहीं बोलना चाहिए—कम से कम बच्‍चे से झूठ बालना तो अक्षम्‍य है। सदियों से बच्‍चों का शोषण किया गया है, क्‍योंकि वे विश्‍वास करने को तैयार रहते है। बहुत आसानी से तुम उनसे झूठ बोल सकते हो। और वे तुम्‍हारा विश्‍वास कर लेते है, अगर तुम पिता हो, मां हो, तो वे सोचते हैं कि तुम सच ही बोलोगे। इसी तरह पूरी मनुष्‍यता भ्रष्‍टता में जीती है, झूठ के गहरी कीचड़ में, जो बच्‍चों से कह रहे है।
      अगर हम एक काम कर सकें, एक छोटा सा काम: हम बच्‍चों से झूठ न बोले और उनके सामने अपने अज्ञान को स्‍वीकार कर लें, तो हम धार्मिक हो जाएंगे और हम उन्‍हें धर्म के मार्ग पर ले आएंगे। बच्‍चे तो सरल होते है। उनके ऊपर अपना तथाकथित ज्ञान मत थोपों। लेकिन पहले तुम्‍हें स्‍वयं सत्‍य और सरल होना चाहिए, भले ही इससे तुम्‍हारा अहंकार टूटता हो—और इससे टूटे गा, ये तोड़ते ही वाला है।
      मेरे नाना ने मुझसे मंदिर जाने के लिए या उनके साथ चलने के लिए कभी नहीं कहा। मैं उनके पीछे बहुत बार जाता था, लेकिन वे कहते, ‘अगर तुम मंदिर जाना चाहते हो तो अकेले जाओ। मेरे पीछे मत आओ।’
      वे कठोर व्‍यक्ति नहीं थे, लेकिन इस बात पर वे बहुत सख्‍त थे। मैंने बहुत बार उनसे पूछा, क्‍या आप अपने कुछ अनुभव मुझे बता सकते है। और वे हमेशा टाल जाते। जब बैलगाड़ी में ते मेरी गोद में अंतिम साँसे ले रहे थे तो उनहोंने अपनी आंखे खोली और पूछा, समय क्‍या है, मैंने कहा: ‘नौ बज रहे होंगे, एक क्षण के लिए वे चुप रहे और फिर उनहोंने कहां:’
      ‘’नमो अरिहंताणं नमो नमो।
      नमो सिद्धाणं नमो नमो।
      नमो उवज्‍झायाणं नमो नमो।
      नमो लोए सव्‍वसाहूणं नमो नमो।
      ओम् शांति: शांति: शांति:.....।’’
इसका क्‍या अर्थ हुआ, इसका अर्थ हुआ ‘’ओम्’’—ध्वनि रहित की परम ध्‍वनि।
और वे सूर्य की पहली किरणों में ओस की  बूंद की भांति लुप्‍त हो गए।
वहां केवल शांति है, शांति है, शांति है......... अब मैं इसमें प्रवेश कर रहा हूं.......