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मंगलवार, 14 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल--(प्रवचन--01)



नमो नमो हरि गुरु नमो—(पहला—प्रवचन)  

दिनांक 11 मार्च, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र—
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो नमो सब संत।
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत।।
दरिया सतगुर सब्द सौं, मिट गई खैंचातान।
भरम अंधेरा मिट गया, परसा पद निरबान।।
सोता था बहु जन्म का, सतगुरु दिया जगाय।
जन दरिया गुर सब्द सौं, सब दुख गये बिलाय।।
रात बिना फीका लगै, सब किरिया सास्तर ग्यान।
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान।।

दरिया नरत्तन पायकर, कीया चाहै काज।
राव रंक दोनों तरैं, जो बैठैं नाम—जहाज।।
मुसलमान हिंदू कहा, पट दरसन रंक राव।
जन दरिया हरिनाम बिन, सब पर जम का दाव।।
जो कोई साधू गृही में, माहिं राम भरपूर।
दरिया कह उस दास की, मैं चरनन की धूर।।
दरिया सुमिरै राम को, सहज तिमिर का नास।
घट भीतर होय चांदना, परमजाति परकास।।
सतगुर—संग न संचरा, रामनाम उर नाहिं।
ते घट मरघट सारिखा, भूत बसै ता माहिं।।
दरिया आतम मल भरा कैसे राम निर्मल होय।
साबन लागै प्रेम का, रामनाम—जल धोय।।
दरिया सुमरिन राम को, देखत भूली खेल।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल।।
फिरी दुहाई सहर में, चोर गए सब भाज।
सत्र फिर मित्र जु भया, हुआ राम का राज।।
मनुष्य—चेतना के तीन आयाम हैं। एक आयाम है—गणित का, विज्ञान का, गद्य का। दूसरा आयाम है—प्रेम का, काव्य का, संगीत का। और तीसरा आयाम है—अनिर्वचनीय। न उसे गद्य में कहां जा सकता, न पद्य में! तर्क  तो असमर्थ है ही उसे कहने में, प्रेम के भी पंख टूट जाते हैं! बुद्धि तो छू ही नहीं पाती उसे, हृदय भी पहुंचते—पहुंचते रह जाता है!
जिसे अनिर्वचनीय का बोध हो वह क्या करें? कैसे कहे? अकथ्य को कैसे कथन बनाए? जो निकटतम संभावना है, वह है कि गाये, नाचे, गुनगुनाए। इकतारा बजाए कि ढोलक पर थाप दे, कि पैरों में घुंघरू बांधे, कि बांसुरी पर अनिर्वचनीय को उठाने की असफल चेष्टा करे।
इसलिए संतों ने गीतों में अभिव्यक्ति की है। नहीं कि वे कवि थे, बल्कि इसलिए कि कविता करीब मालूम पड़ती है। शायद जो गद्य में न कहा जा सके, पद्य में उसकी झलक आ जाए। जो व्याकरण में न बंधता हो, शायद संगीत में थोड़ा—सा आभास दे जाए।
इसे स्मरण रखना। संतों को कवि ही समझ लिया तो भूल हो जाएगी। संतों ने काव्य में कुछ कहा है, जो काव्य के भी अतीत है—जिसे कहा ही नहीं जा सकता। निश्चित ही गद्य की बजाए पद्य को संतों ने चुना, क्योंकि गद्य और भी दूर पड़ जाता है, गणित और भी दूर पड़ जाता है। काव्य चुना, क्योंकि काव्य मध्य में है। एक तरफ व्याख्या—विज्ञान का लोक है, दूसरी तरफ अव्याख्य—धर्म का जगत है;  और काव्य दोनों के मध्य की कड़ी है। शायद इस मध्य की कड़ी से किसी के हृदय की वीणा बज उठे, इसलिए संतों ने गीत गाए। गीत गाने को नहीं आए; तुम्हारे भीतर सोए गीत को जगाने को गाए। उनकी भाषा पर मत जाना, उनके भाव पर जाना। भाषा तो उनकी अटपटी होगी।
जरूरी भी नहीं कि संत सभी पढ़े—लिये थे, बहुत तो उनमें गैर पढ़े—लिखे थे। लेकिन पढ़े—लिखे होने से सत्य का कोई संबंध भी नहीं है; गैर—पढ़े—लिखे होने से कोई बाधा भी नहीं है। परमात्मा दोनों को समान रूप से उपलब्ध है। सच तो यह है, पढ़े—लिखे के शायद थोड़ी बाधा हो, उसका पढ़ा—लिखा ही अवरोध बन जाए; गैर—पढ़ा—लिखा थोड़ा ज्यादा भोला, थोड़ा ज्यादा निर्दोष। उसके निर्दोष चित्त में, उसके भोले हृदय में सरलता से प्रतिबिंब बन सकता है। कम होगा विकृत प्रतिबिंब, क्योंकि विकृत करने वाला तर्क मौजूद न होगा। झलक ज्यादा अनुकूल होगी सत्य के, क्योंकि विचारों का जाल न होगा जो झलक को अस्तव्यस्त करे। सीधा—सीधा सत्य झलकेगा क्योंकि दर्पण पर कोई शिक्षा की धूल नहीं होगी।
तो भाषा की चिंता मत करना, व्याकरण का हिसाब मत बिठाना। छंद भी उनके। ठीक हैं या नहीं, इस विवेचना में भी न पड़ना। क्योंकि यह तो चूकना हो जाएगा। यह तो व्यर्थ में उलझना हो जाएगा। यह तो गए फूल को देखने और फूल के रंग और फूल के रसायन और फूल किस जाति का है और किस देश से आया है, इस सारे इतिहास में उलझ गए; और भूल ही गए कि फूल तो उसके सौंदर्य में है।
गुलाब कहां से आया, क्या फर्क पड़ता है? ऐतिहासिक चित्त इसी चिंता में पड़ जाता है कि गुलाब कहां से आया! आया तो बाहर से है; उसका नाम ही कह रहा है। नाम संस्कृत का नहीं है, हिंदी का नहीं है। गुल का अर्थ होता है: फूल; आब का अर्थ होता है: शान। फूल की शान! आया तो ईरान से है, बहुत लंबी यात्रा की है। लेकिन यह भी पता हो कि ईरान से आया है गुलाब, तो गुलाब के सौंदर्य का थोड़े ही इससे कुछ अनुभव होगा! गुलाब शब्द की व्याख्या भी हो गई तो भी गुलाब से तो वंचित ही रह जाओगे। गुलाब की पंखुड़ियां तोड़ लीं, पंखुड़ियां गिन लीं, वजन नाप लिया, तोड़—फोड़ करके सारे रसायन खोज लिए—किन—किन से मिलकर बना है, कितनी मिट्टी, कितना पानी, कितना सूरज—तो भी तो गुलाब के सौंदर्य से वंचित रह जाओगे। ये गुलाब को जानने के ढंग नहीं हैं।
गुलाब की पहचान तो उन आंखों में होती है, जो गुलाब के इतिहास में नहीं उलझती, गुलाब की भाषा में नहीं उलझतीं, गुलाब के विज्ञान में नहीं उलझतीं—जो सीधे—सीधे, नाचते हुए गुलाब के साथ नाच सकता है; जो सूरज में उठे गुलाब के साथ उसके सौंदर्य को पी सकता है; जो भूल ही सकता है अपने को गुलाब में, डुबा सकता है अपने को गुलाब में और गुलाब को अपने में डूब जाने दे सकता है—वही जानेगा।
संतों के वचन गुलाब के फूल हैं। विज्ञान, गणित, तर्क और भाषा की कसौटी पर उन्हें मत कसना, नहीं तो अन्याय होगा। वे तो  हैं, अर्चनाएं हैं, प्रार्थनाएं हैं। वे तो आकाश की तरह उठी हुई आंखें हैं। वे तो पृथ्वी की आकांक्षाएं हैं—चांदत्तारों को छू लेने के लिए। उस अभीप्सा को पहचानना। वह अभीप्सा समझ में आने लगे तो संतों का हृदय तुम्हारे सामने खुलेगा।
और संतों के हृदय में द्वार है परमात्मा का। तुम्हारे सब मंदिर—मस्जिद, तुम्हारे गुरुद्वारे, तुम्हारे गिरजे, परमात्मा के द्वार नहीं हैं। लेकिन संतों के हृदय में निश्चित, द्वार है। जीसस के हृदय को समझो तो द्वार मिल जाएगा; चर्च में नहीं। मुहम्मद के प्राणों को पहचान लो तो द्वार मिल जाएगा; मस्जिद में नहीं।
ऐसे ही एक अदभुत संत दरिया के वचनों में हम आज उतरते हैं। फूलों की तरह लेना। सम्हाल कर! नाजुक बात है। ख्याल रखना, फूलों को, सोना जिस पत्थर पर कसते हैं, उस पर नहीं कसा जाता है। फूलों को सोने की कसने की कसौटी पर कस—कस कर मत देखना, नहीं तो सभी फूल गलत हो जाएंगे।
एक बाउल फकीर से एक बड़े शास्त्रज्ञ पंडित ने पूछा कि प्रेम, प्रेम...निरंतर प्रेम का जप किए जाते हो, यह प्रेम है क्या? मैं भी तो समझूं! इस प्रेम का किस शास्त्र में उल्लेख है, किन वेदों का समर्थन है?
वह बाउल फकीर हंसने लगा। उसका इकतारा बजने लगा। खड़े होकर वह नाचने लगा। पंडित ने कहा: नाचने से क्या होगा? और इकतारा बजाने से क्या होगा? व्याख्या होनी चाहिए प्रेम की। और शास्त्रों का समर्थन होना चाहिए। कहते हो प्रेम परमात्मा का द्वार है, मगर कहां लिखा है? और नाचो मत, बोलो! इकतारा बंद करो बैठो! तुम मुझे धोखे में न डाल सकोगे। औरों को धोखे में डाल देते हो इकतारा बजा कर, नाच कर। औरों को लुभा लेते हो, मुझको न लुभा सकोगे।
उस बाउल फकीर ने फिर भी एक गीत गाया। उस बाउल फकीर ने कहा: गीतों के सिवाय हमारे पास कुछ और है नहीं। यही गीत हमारे वेद, यही गीत हमारे उपनिषद, यही गीत हमारे कुरान। क्षमा करें! नाचूंगा, इकतारा बजाऊंगा, गीत गाऊंगा—यही हमारी व्याख्या है। अगर समझ में आ जाए तो आ जाए; न समझ में आए, दुर्भाग्य तुम्हारा। पर हमसे और कोई व्याख्या न पूछो। और कोई उसकी व्याख्या है ही नहीं।
और जो गीत उसने गाया, बड़ा प्यारा था। गीत का अर्थ था: एक बार एक सुनार एक माली के पास आया और कहा कि तेरे फूलों की बड़ी प्रशंसा सुनी है, तो मैं आज कसने आया हूं कि फूल सच्चे हैं, असली हैं या नकली हैं? मैं अपने सोने के कसने के पत्थर को ले आया हूं।
और वह सुनार उस गरीब माली के गुलाबों को पत्थर पर कस—कसकर फेंकने लगा कि सब झूठे हैं, कोई सच्चे नहीं हैं।
उस बाउल फकीर ने कहा: जो उस गरीब माली के प्राणों पर गुजरी, वही तुम्हें देखकर मेरे प्राणों पर गुजर रही है। तुम प्रेम की व्याख्या पूछते हो! और मैं प्रेम नाच रहा हूं। अंधे हो तुम! तुम प्रेम के लिए शास्त्रीय समर्थन पूछते हो—और मैं प्रेम को संगीत दे रहा हूं! बहरे हो तुम!
मगर अधिक लोग अंधे हैं, अधिक लोग बहरे हैं।
दरिया के साथ अन्याय मत करना, यह मेरी पहली प्रार्थना। ये सीधे—सादे शब्द हैं, पर बड़े गहरे हैं। जितने सीधे—सादे हैं उतने गहरे हैं।
नहीं पूरी पड़ीं सारी दिशाएं एक अंजलि को
अधूरी रह गयी मेरी विधा एकांत पूजन की
बंधी ओंकार की अविराम शैलाकार बांहों में
नहीं पूरी हुई कोई कड़ी मेरे समर्पण की
समूचा सूर्य भी आजन्म पूजादीप की मेरे
न बन पाया अकंपित वर्तिका का शुभ्र नीराजन
जपी, अपराह्न—रंजित, स्तब्ध मेरी आया—गायत्री।
जीवन भर भी तुम्हारी गायत्री हो जाए तो भी उस अनिर्वचनीय की व्याख्या नहीं होती! और सूरज भी तुम्हारी आरती का दीया बन जाए तो भी पूजा पूरी नहीं होती!
नहीं पूरी पड़ी सारी दिशाएं एक अंजलि को
अधूरी रह गयी मेरी विधा एकांत पूजन की
बंधी ओंकार की अविराम शैलाकार बांहों में
नहीं पूरी हुई कोई कड़ी मेरे समर्पण की
समूचा सूर्य भी आजन्म पूजादीप की मेरे
न बन पाया अकंपित वर्तिका का शुभ्र नीराजन
जपी, अपराह्न—रंजित, स्तब्ध मेरी आयु—गायत्री।
न कर पायी अभी तक अंश—भर उस दीप्ति का वंदन।
विकलता, व्यर्थता इस परिक्रमित चक्रांत जीवन की
तुम्हीं जानो, न जानो, और कोई तो न जानेगा
किया मैंने नहीं आह्वान करुणा का तुम्हारी जब
क्षमा की पात्रता मुझमें न कोई और मानेगा
रहा विश्वास भावातीत मन की गतिमयी लय सा
नियति मेरी रही केवल उसी संपूर्ति में पकती
भुलाकर स्वप्नगर्भा प्रेरणा की मुक्त राहों को
रही अपनी क्षुभित आराधना की दीनता तकती।
सदा टूटी किए सब अर्थ मेरे, शब्द तक मेरे
तुम्हारी भव्यता की दिव्य रेखाकृति न बन पायी
अव्यंजित ही सदा जो रह गयी अभिशप्त प्राणों में
वही असहाय मेरी भावना निस्पंद पथराई
तुम्हारी सर्वचेतन, सर्व—आभासित असीमा का
न कोई पारदर्शी बोध मेरी प्रार्थना पाती
अथाही, चिरविदारक शून्यता में मूक, जड़ जैसी
निपट असमर्थ मेरी मुग्धता अफलित रही आती।
न उसे कभी कहा गया न कभी उसे कभी कहा जा सकेगा; फिर बड़ी करुणा है संतों की कि अकथ्य को कथ्य बनाने की चेष्टा की है। जानते हुए, भलीभांति जानते हुए कि नहीं यह हुआ है, नहीं यह हो सकेगा; लेकिन फिर भी शायद कोई आतुर प्राण प्यास से भर उठें, शायद कोई सोई आत्मा पुकार से जग जाए। जानते हैं हम भली—भांति...
सदा टूटा किए सब अर्थ मेरे, शब्द तक मेरे
तुम्हारी भव्यता की दिव्य रेखाकृति न बन पायी
कौन बना पाया है परमात्मा के उस रूप को? कौन बांध पाया है रंगों में, शब्दों में? कोई रेखाकृति आज तक बन नहीं पायी है।
भुलाकर स्वप्नगर्भा प्रेरणा की मुक्त राहों को
रही अपनी क्षुभित आराधना की दीनता तकती।
भक्त जानता है अपनी असमर्थता को। संत पहचानता है अपनी दीनता को।
विकलता, व्यर्थता इस परिक्रमित चक्रांत जीवन की
तुम्हीं जानो, न जानो, और कोई तो न जानेगा।
और परमात्मा ही पहचानता है भक्त की असमर्थता। और परमात्मा ही पहचानता है भक्त की अथक चेष्टा—नहीं जो कहा जा सकता उसे कहने की; नहीं जो जताया जा सकता उसे जताने की; नहीं जो बताया जा सकता उसे बताने की।
इसलिए बड़ी सूक्ष्म प्रीति—भरी आंखें चाहिए। बड़ी सरल निर्दोष श्रद्धा—भरी बांहें चाहिए, तो ही आलिंगन हो सकेगा।
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो नमो सब संत।
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत।।
दरिया कहते हैं: पहला नमन गुरु को। और गुरु को हरि कहते हैं। नमो नमो हरि गुरु नमो! यह दोनों अर्थों में सही है। पहला अर्थ कि गुरु भगवान है और दूसरा अर्थ कि भगवान ही गुरु है। गुरु से बोल जाता है, वह वही है जिसे तुम खोजने चले हो। वह तुम्हारे भीतर भी बैठा है उतना ही जितना गुरु के भीतर लेकिन तुम्हें अभी बोध नहीं, तुम्हें अभी उसकी पहचान नहीं। गुरु के दर्पण में अपनी छवि को देखकर पहचान हो जाएगी। गुरु तुमसे वही कहता है जो तुम्हारे भीतर बैठा फिर भी तुमसे कहना चाहता है। मगर तुम सुनते नहीं। भीतर की नहीं सुनते तो शायद बाहर की सुन लो; बाहर की तुम्हारी आदत है। तुम्हारे कान बाहर की सुनने से परिचित हैं। तुम्हारी आंखें बाहर को देखने में निष्णात हैं। भीतर तो क्या देखोगे? भीतर तो आंख कैसे मोड़ें, यह कला ही नहीं आती। और भीतर तो कैसे सुनोगे; इतना शोरगुल है सिर का, मस्तिष्क का कि वह धीमी—धीमी आवाज न मालूम कहां खो जाएगी!
बोलता तो तुम्हारे भीतर भी हरि है, लेकिन पहले तुम्हें बाहर के हरि को सुनना पड़े। थोड़ी पहचान होने लगे, थोड़ा संग—साथ होने लगे, थोड़ा रस उभरने लगे, तो जो बाहर तुमने सुना है एक दिन वही भीतर तुम्हें सुनाई पड़ जाएगा। चूंकि गुरु केवल वही कहता है जो तुम्हारे भीतर की अंतरात्मा कहना चाहती है, इसलिए गुरु को हरि कहा और इसलिए हरि को गुरु कहा है।
नमो नमो हरि गुरु नमो!
दरिया कहते हैं: नमन करता हूं, बार—बार करता हूं।
नमन का अर्थ इतना ही नहीं होती कि किसी के चरणों में सिर झुका देना। नमन का अर्थ होता है: किसी के चरणों में अपने को चढ़ा देना। यह सिर झुकाने की बात नहीं है; यह अहंकार विसर्जित कर देने की बात है।
नमो नमो सब संत! और जिस दिन समझ में आ जाती है बात उस दिन बड़ी हैरानी होती है कि सभी संत यही कहते थे। कितने भेद—भाव माने थे, कितना विवाद थे, कितने वितंडा, कितने शास्त्रार्थ! पंडित जूझ रहे हैं, मल्लयुद्ध में लगे हुए हैं। हिंदू मुसलमान से बूझ रहा है, मुसलमान ईसाई से बूझ रहा है, ईसाई जैन से बूझ रहा है, जैन बौद्ध से जूझ रहा है; सब गुत्थरम—गुत्था एक—दूसरे से जूझ रहे हैं—बिना इस सीधी—सी बात को जाने कि जो महावीर ने कहा है उसमें और जो मुहम्मद ने कहा है उसमें, रत्ती भर भेद नहीं है। भेद हो नहीं सकता। सत्य एक है। उस सत्य को जान लेने वाले को ही हम संत कहते हैं। जो उस सत्य से एक हो गया, उसी को संत कहते हैं।
तो जिस दिन तुम्हें समझ में आ जाएगी बात तो तुम बाहर के गुरु में भगवान को देख सकोगे, भीतर के भगवान में गुरु को देख सकोगे—और सारे संतों में, बेशर्त! फिर यह भेद न करोगे कौन अपना कौन पराया। सारे संतों में भी उसी एक अनुगूंज को सुन सकोगे।
कितनी ही हों वीणाएं, संगीत एक है। और कितने ही हों दीप, प्रकाश एक है। और कितने ही हों फूल, सौंदर्य एक है। गुलाब में भी वही और जूही में भी वही, चंपा में भी वही और चमेली में भी वही। सौंदर्य एक है, अभिव्यक्तियां भिन्न हैं।
निश्चित ही कुरान की आयतें अपना ही ढंग रखती हैं, अपनी शैली है उनकी, अपना सौंदर्य है उनका। समझो कि जूही के फूल और उपनिषद के वचन, उनका सौंदर्य अपना है, अनूठा है। समझो कि कि चंपा के फूल। और बाइबिल के उद्धाहरण, समझो कि गुलाब के फूल। पर सब फूल हैं और सबमें जो फूला है वह एक है। वही सौंदर्य कहीं सफेद है और कहीं लाल है और कही सोना हो गया है।
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो सब संत।
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत।।
और दरिया कहते हैं: जिस दिन ऐसा दिखाई पड़ा कि बाहर भी वही, भीतर भी वही, और सारे संतों में भी वही—फिर अंततः यह भी दिखाई पड़ा कि जो संत नहीं हैं उनमें भी वही। पहचान बढ़ती गई, गहरी होती चली गई। जन दरिया बंदन करै...! अब तो दरिया कहते हैं कि मैं इसकी चिंता नहीं करता किसको वंदन करना—सिर्फ वंदन करता हूं!...नमो नमो भगवतं! अब यह भी फिकिर नहीं करता कि संत है कोई कि असंत है कोई, अच्छा है कि बुरा है कोई। पहले दिखाई पड़ा था कि फूलों में वही, अब कांटों में भी वही दिखाई पड़ता है। हीरों में दिखाई पड़ा था, अब कंकड़—पत्थरों में भी वही दिखाई पड़ता है। अब कौन चिंता करे! अब कौन फिकिर ले! अब तो सिर्फ बंदन करता हूं—सभी दिखाओ में वंदन करता हूं। सभी मंदिर—मस्जिद—गुरुद्वारे मेरे हैं।
अच्छों की तो बात ही छोड़ दो, बुरों में भी वही है। उसके अतिरिक्त कोई और है ही नहीं। इसलिए अब तो वंदन ही बचा। अब तो झुक—झुक पड़ता हूं। अब तो वृक्ष हो तो और पत्थर हो तो, उसकी छवि हर जगह पहचान आ जाती है।
दरिया सतगुर शब्द सौं, मिट गई खैंचातान।
बड़ी खेंचातानी में रहा हूं कि कौन सही कौन गलत, कौन शुभ कौन अशुभ, किस मंदिर जाऊं, किस मूर्ति की पूजा करूं, किस शास्त्र को पकडूं, कौन सी नाव पर सौं...। लेकिन एक बार सदगुरु का शब्द सुन लिया कि मिट गई खैंचातान कि सारी खेंचातान ही मिट गई; क्योंकि उस गुरु के एक शब्द में ही सारे गुरुओं के शब्द समाए हुए हैं। एक गुरु में सारे गुरु मौजूद हैं—जो हुए जो हैं, जो होंगे। एक गुरु में सारे गुरु मौजूद हैं।
भरम अंधेरा मिट गया, पारसा पद निरबान।।
एक शब्द भी कान में पड़ जाए सत्य का, एक रोशनी की किरण प्रविष्ट हो जाए तुम्हारे अंधकारपूर्ण ग्रह में, तुम्हारे हृदय में एक चोट पड़ जाए, तुम्हारा हृदय झंकार उठे—एक बार सिर्फ, बस काफी है। भरत अंधेरा मिट गया...उसी क्षण मिट जाता है सारा अंधकार—भ्रम का, माया का, मोह का। परसा पद निरबान। उसी क्षण उस महत पद का छूना हो जाता है, हाथ में आ जाता है, स्पर्श हो जाता है निर्वाण का।
कल के नीरस शब्दों में करनी है बात आज की,
अभिव्यक्ति भावना अपनी, भाषा में समाज की—
है विवश किंतु कर देता कवि को उसका ही स्वर,
माना कहना है कठिन, किंतु है मौन कठिनतर।
कविता साधन ही नहीं, साधना, साध्य सभी कुछ,
मंदिर, वंदना, प्रसाद और आराध्य सभी कुछ।
भ्रम है कहना निर्माण किया कविता का कवि ने,
रचना की थी या जगा दिया कमलों को रवि ने?
यह दूर हटा दो शब्द कोष, है व्यर्थ खोजना—
इस मुद्रित पुस्तक में यह जागृत शब्द योजना;
मेरी कविता का आशय तुम इस क्षण से पूछो,
सुन सको प्रतिध्वनि मन में यदि तो मन से पूछो।
मिल सकता तुमसे यदि मैं इतनी दूर न होता,
शब्दों का आश्रय लेने पर मजबूर न होता—
सांसों में आकार स्वयं बन जाती कविता,
तुम सुनते मेरी बात स्वयं बन जाती कविता।
सदगुरु के शब्द तो वे ही हैं जो समाज के शब्द हैं। और कहना है उसे कुछ, जिसका समाज कोई पता नहीं। भाषा तो उसकी वही है, जो सदियों—सदियों से चली आई है। जरा जीर्ण, धूल धूसरित। लेकिन कहना है उसे ऐसा कुछ नित नूतन, जैसे सुबह की अभी ताजीत्ताजी ओस, कि सुबह की सूरज की पहली—पहली किरण! पुराने शब्द बासे, सड़े—गले, सदियों—सदियों चले, थके—मांदे—उनमें उसे डालना है प्राण। उनमें उसे भरना है उस सत्य को जो अभी—अभी उसने जाना है—और जो सदा नया है और कभी पुराना नहीं पड़ता।
कल के नीरस शब्दों में करनी है बात आज की,
अभिव्यक्ति भावना अपनी भाषा में समाज की—
है विवश किंतु कर देता कवि को उसका स्वर,
लेकिन कहना तो होगा ही...
है विवश किंतु कर देता कवि को उसका स्वर,
माना कहना है कठिन, किंतु है मौन कठिनतर।
कहना कठिन है; लेकिन मौन चुप रह जाना और भी कठिन है। जिसने जाना है उसे कहना ही होगा। सुने कोई सुने, न सुने कोई न सुने; उसे कहना ही होगा। उसे अंधों के सामने दीए जलाने होंगे। उसे बहरों के पास बैठ कर वीणा बजानी होगी। मगर सौ में कोई एकाध आंख खोल लेता है और सौ में कोई एकाध पी जाता है उस संगीत को। पर उतना काफी है। उतना बहुत है। और ऐसा मत सोचना कि ये जो शब्द संतों से उतरते हैं, संतों के हैं। संत तो केवल माध्यम हैं।
कविता साधन ही नहीं, साधना, साध्य भी कुछ,
मंदिर, वंदना प्रसाद और आराध्य सभी कुछ।
भ्रम है कहना निर्माण किया कविता का कवि ने,
रचना की थी या जगा दिया कमलों को रवि ने?
सुबह जब सूरज उगता है तो क्या कमलों की रखना करता है? कमल तो थे ही,
सिर्फ सूरज के उगने से जाग जाते हैं।
कविता अस्तित्व काव्य से भरपूर है।
कविता बहती है नदियों में।
कविता हरी है वृक्षों में।
कविता झकोरे ले रही है सागरों में।
कविता ही कविता है।
सारा अस्तित्व उपनिषद है, कुरान है; मगर सोया पड़ा है। किसी सदगुरु की चोट से कमल खिल जाता है।
और धन्यभागी हैं वे जो शब्दों में नहीं उलझते और शब्दों में छिपे हुए निःशब्द को पकड़ लेते हैं; जो पंक्तियों के बीच पढ़ना जानते हैं; जो शब्दों के बीच झांकना जानते हैं। तो फिर एक शब्द भी काफी हो जाता है।
दरिया सतगुर सब्द सौं, मिट गई खैंचातान।
भरम अंधेरा मिट गया, परसा पद निरबान।।
छू लिया परमात्मा को! स्पर्श हो गया! दूरी नहीं है तुम में और परमात्मा में—अभी छू सकते हो, यही छू सकते हो! पर कान खोलो, आंख खोलो। चेतना का कमल खिलने दो।
सोता था बहु जन्म का, सतगुरु दिया जगाय।
जन दरिया गुर शब्द सौं, सब दुख गए बिलाय।।
कुछ और नहीं किया गुरु ने—सोए को जगा दिया; सोए को झकझोर दिया। छिपा तो सबके भीतर वही है; चाहिए कि कोई तुम्हें झकझोर दे। लेकिन तुम तो जाते भी हो मंदिर और मस्जिद, तो सांत्वना की तलाश करने जाते हो, सत्य की तलाश करने नहीं। तुम तो जाते भी हो संतों के पास तो चाहते हो थोड़ी—सी मीठी—मीठी बातें, कि तुम और सफलता से सपने देख सको। तुम जाते भी हो तो आशीष मांगने जाते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हो जाएं। और जो तुम्हें आशीष दे देते होंगे, वे तुम्हें प्रीतिकर भी लगते होंगे और जो तुम्हारी पीठ ठोंक देते होंगे और कहते होंगे; तुम बड़े पुण्यात्मा हो! और कहते होंगे। कि तुमने मंदिर बनाया और धर्म शाला बनाई और तुम कुंभ भी हो आए और हज की यात्रा कर ली, अब और क्या करने को शेष है? परमात्मा तुमसे प्रसन्न है। तुम्हारा निश्चित है।
जो तुमसे ऐसी झूठी बातें, व्यर्थ की बातें कह देते हों, वे तुम्हें प्रीतिकर भी लगते होंगे। झूठ अक्सर मीठे होते हैं। एक तो झूठ हैं, तो अगर कड़वे हों तो कौन स्वीकार करेगा। झूठ पर मिठास चढ़ानी पड़ती है—सांत्वना की मिठास। सत्य कड़वे होते हैं, क्योंकि सत्य तुम्हें सांत्वना नहीं देते, बल्कि तुम्हें जगाते हैं। और हो सकता है कि तुम अपनी नींद में बड़े प्यारे सपने देख रहे हो तो जगाने वाला दुश्मन मालूम पड़े।
सदगुरु सदा ही कठोर मालूम पड़ेगा। सदगुरु सदा ही तुम्हारी धारणाओं को तोड़ता मालूम पड़ेगा। सदगुरु सदा ही तुम्हारे मन को अस्तव्यस्त करता मालूम पड़ेगा; तुम्हारी अपेक्षाओं को छिन्न—भिन्न करता मालूम पड़ेगा। उसे करना ही होगा।उसकी अनुकंपा है कि करता है, क्योंकि तभी तुम जागोगे। भंग हों तुम्हारे स्वप्न, तो ही तुम जाओगे। नींद प्यारी लगती है, विश्राम मालूम होता है। जो भी जगाएगा वह दुश्मन मालूम होगा। पर बिना जगाए तुम्हें पता भी न चलेगा कि तुम कौन हो और कैसी अपूर्व तुम्हारी संपदा है!
यह रुपहली छांहवाली बेल,
कसमसाते पाश में बांधे हुए आकाश।
तिमिर तरु की स्याह शाखों पर पसर कर,
हर नखत की कुसुम कोमल झिलमिलाहट से रही है खेल।
यह रुपहली छांहवाली बेल।
लहराता गगन से भूमि तक जिनके रत आलोक का विस्तार,
रश्मियों  के वे सुकोमल तार,
उलझे रात के हर पात से सुकुमार।
इस धवल आकाश लतिका में,
झूलता सोलह पंखुरियों का अमृतमय फूल,
गंध से जिसकी दिशाएं अंध
खोजती फिरती अजाने मूल से संबंध।
वल्लरी निर्मूल—
फिर भी विकसता है फूल
विधि ने की नहीं है भूल।
है रहस्य भरा हृदय से हर हृदय का मेल।
हर जगह छाई हुई है,
यह रुपहली छांहवाली बेल।
हर हृदय में अपूर्व सुगंध भरी है; जरा संबंध जोड़ने की बात है। तुम कस्तूरी मृग हो—कस्तूरा हो! भागते फिरते दूर—दूर और जिस अंध की तलाश कर रहे हो, वह गंध तुम्हारे भीतर से ही उठ रही है। उस कस्तूरी के तुम मालिक हो। कस्तूरी कुंडल बसै!...तुम्हारे भीतर बसी है—कोई जगाए, कोई हिलाए, कोई तुम्हें सचेत करे। और जो भी तुम्हें सचेत करेगा वह तुम्हें नाराज करेगा। इतना स्मरण रहे तो सदगुरु मिल जाएगा। इतना बोध रहे कि जो तुम्हें जगाएगा वह तुम्हें जरूर नाराज करेगा, तो सदगुरु को खोजना कठिन नहीं होगा।
जो तुम्हें सांत्वना देते हो और तुम्हारे घावों को मलहम—पट्टी करते हों और तुम्हारे अंधेरे को छिपाते हों और तुम्हारे ऊपर रंग पोत देते हों, उनसे सावधान रहना। सांत्वना जहां से मिलती हो समझ लेना कि वहां सदगुरु नहीं है सदगुरु तो झकझोरेगा; उखाड़ देगा वहां से जहां तुम हो, क्योंकि नई तुम्हें भूमि देनी है और नया तुम्हें आकाश देना है।
सोता था बहु जन्म का, सतगुरु दिया जगाय।
जन दरिया गुरु शब्द सौं, सब दुख गए बिलाय।।
और दरिया कहते हैं: मैं चमत्कृत हूं कि जागते ही सारे दुख विलीन हो गए! मैं तो सोचता था एक—एक दुख का इलाज करना होगा। क्रोध है तो इलाज करना होगा। लाभ है तो इलाज करना होगा। मोह है तो इलाज करना होगा। अहंकार है, यह है, वह है...हजार रोग हैं। व्याधियां ही व्याधियां हैं। इतनी व्याधियों के लिए इतनी ही औषधियां खोजनी होंगी। लेकिन बस एक औषधि, और सारी व्याधिया मिट गई। क्योंकि जितने रोज हैं वे सिर्फ हमारे स्वप्न हैं; उनकी कोई सचाई नहीं है।
पापी पाप का स्वप्न देख रहा है, पुण्यात्मा पुण्य का स्वप्न देख रहा। जागा हुआ न तो पापी होता है न पुण्यात्मा होता है। जागा हुआ तो सिर्फ जागा हुआ होता है; उसका कोई स्वप्न नहीं होता। चोर चोर होने का स्वप्न देख रहा है और तुम्हारे तथाकथित साधु, साधु होने का सपना देख रहे हैं। जागा हुआ न तो असाधु होता न तो साधु होता, बस जागा हुआ होता है। और जागते ही सारे रोग मिट जाते हैं। एक समाधि सारी व्याधियों को ले जाती है।
पंख मेरे,
तू कृति हर बार,
नभ केवल प्रतीक्षा।
तू उमड़ बढ़ वक्र में अपने गगन का घेर,
उस अनियमित काल गति में सत्य अपने हेर,
फूंक अपनी तीव्र गति से उस मरण में प्राण,
दे निरर्थक कल्पनोपरि को धरा के मान
तू कृति सौंदर्य का,
कर शून्य भी स्वीकार:
तू रचा आकार, नभ केवल प्रतीक्षा।
उठ, नए विश्वास से बंजर धरा को गोड़,
बधिर नभ के मौन को किलकारियों से फोड़,
ज्योति के निःशब्द तारों में गुंजा दे गान,
जिस तरफ उड़ जाय तू खिल जाय वह वीरान।
तू कृति है गीत का,
कर मौन भी स्वीकार:
गा बहा रसधार, नभ केवल प्रतीक्षा।
ये तुले डैने अप्रतिहत व्योम में छा जायं
मर्म लघु के संतुलन में बृहत के पा जायं,
उधर विघ्नों की चुनौती इधर हठ निर्माण,
फहर अंबर चीरकर ओ धरा के अभिमान।
तू कृति है रहा का,
कर अगम भी स्वीकार:
फैल पारावार, नभ केवल प्रतीक्षा।
कोई जगाए, झकझोरे, कोई कहे—
उठ, नए विश्वास से बंजर धरा को गोड़,
बधिर नभ के मौन को किलकारियो से फोड़,
ज्योति के निःशब्द तारों में गुंजा दे गान,
जिस तरफ उड़ जाय तू खिल जाय वह वीरान।
तू कृति है गीत का,
कर मौन भी स्वीकार:
गा बहार रसधार, नभ केवल प्रतीक्षा।
हम वही हो सकते हैं जो हम हैं। हम वही हो सकते हैं जो हमारा स्वभाव है। पर हमें पता ही नहीं। अपना स्वभाव ही भूल गया। अपना स्वरूप ही भूल गया, कि हमारी बड़ी क्षमता है, कि हमारे भीतर स्रष्टा का आवास है, कि परमात्मा ने हमें अपने रहने के लिए आवास चुना है।
तू कृति है गीत का,
कर मौन भी स्वीकार:
गा बहा रसधार, नभ केवल प्रतीक्षा।
कोरे आकाश को बैठे हुए मत देखते रहो, आकाश कुछ भी न करेगा। हाथ जोड़े हुए मंदिरों में प्रार्थनाएं मत करते रहो; इससे कुछ भी न होगा। नभ केवल प्रतीक्षा! आकाश तो शून्य है; इसमें तुम्हें जागना होगा; निर्माण करना होगा; स्वयं को निखारना होगा; स्वयं की धूल झाड़नी होगी।
ये तुले डैने अप्रतिहत व्योम में छा जाएं
मर्म लघु के संतुलना में बृहत के पा जाएं,
उधर विध्नों की चुनौती इधर हठ निर्माण,
फहर अंबर चीरकर ओ धरा के अभिमान।
तू कृति है राह का,
कर अगम भी स्वीकार:
फैल पारावार, नभ केवल प्रतीक्षा।
कौन होगा जो ऐसा तुमसे कहे? वही—जिसने फैलाए हों अपने पंख और जिसने आकाश की  ऊंचाइयां जानी हों। वही—जिसने डुबकी मारी हो प्रशांतों में और गहराइयां पहचानी हों। वही—जिसके भीतर फूल खिले हों; जिसके भीतर मौन जगा हो। जिसने अपने भीतर परमात्मा को आलिंगन किया हो, वही तुम्हें भी जगा सकता है। लेकिन तुम पंडितों और पुरोहितों के पास चक्कर लगा रहे हो; न वे जगे हैं न वे जगा सकते हैं।
राम बिना फीका, सब किरिया सास्तर ग्यान।
दरिया कहते हैं: तुम किन के पास भटक रहे हो? राम जिन्हें मिला नहीं, राम जो अभी हो नहीं गए, राम जिनके भीतर अभी जगा नहीं...राम बिना फीका लगै! पंडित—पुरोहित, उनकी जरा आंखों में झांको। उनके जरा हृदय में टटोलो। अक्सर तो तुम उन्हें अपने से भी ज्यादा अंधकार में पड़ा हुआ पाओगे।
सब किरिया सास्तर ग्यान...जरूर क्रियाकांड वे जानते हैं और शास्त्र भी बहुत उनके पास हैं और शास्त्रों से सीखा हुआ तोतों जैसा ज्ञान भी उनके पास बहुत है। मगर उसका कोई मूल्य नहीं है। उनके जीवन पर उसकी कोई छाप नहीं है।
मैं मुल्ला नसरुद्दीन के गांव गया था। मुल्ला मुझे नगर का दर्शन कराने ले गया। विश्वविद्यालय की भव्य इमारत को देखकर मैंने मुल्ला से कहा: नसरुद्दीन, क्या यही विश्वविद्यालय है? सुंदर है, भव्य है!
हऔ—मुल्ला ने उत्तर दिया। फिर गांधी मैदान आया, विशाल मैदान! मैंने कहा: यही है गांधी मैदान? मुल्ला ने कहा हऔ! हर बात के उत्तर में हऔ शब्द सुनकर मैंने पूछा: यह हऔ क्या होता है?
हऔ—मुल्ला ने कहा—यहां का आंचलिक शब्द है। बिना पढ़े—लिखे लोग हां को हऔ बोलते हैं।
तो मैंने कहा: लेकिन नसरुद्दीन, तुम तो पढ़े—लिखे हो।
उसने कहा: हऔ!
पढ़े—लिखे होने से क्या होगा? शास्त्र ऊपर ही ऊपर रह जाते हैं; तुम्हारे अंतर को नहीं छू पाते। क्रियाकांड जड़ होते हैं। तुम रोज दोहरा लो गायत्री, मगर तोतों जैसी होती है।
एक—लिखे होने से क्या होगा? शास्त्र ऊपर ही ऊपर रह जाते हैं; तुम्हारे अंतर को नहीं छू पाते। क्रियाकांड जड़ जाते हैं। तुम रोज दोहरा लो गायत्री, मगर तोतों जैसी होती है।
एक नव—रईस ने, नए—नए हुए रईस ने, अपने मेहमानों का स्वागत करने के लिए अपने नौकर मुल्ला नसरुद्दीन को सिखाया कि वे जब भी कोई चीज मंगाएं तो वह पहले पूछ ले कि किस किस्म की चीज लाए। जैसे अगर वे कहें कि पान लाओ तो नौकर को तुरंत मेहमानों के सामने पूछना चाहिए: हुजूर, कौन सा पान? मगही या बनारसी? महोबा या कपूरी? ताकि रोब बंध जाए मेहमान पर कि कोई साधारण रईस नहीं है; सब तरह के पान उपलब्ध हैं घर में।
एक दिन मेहमानों के लिए उन्होंने शरबत मंगाया, तो हुक्म के मुताबिक मुल्ला नसरुद्दीन ने तुरंत लिस्ट दोहराई: कौन सा शरबत लाऊं हुजूर? खस का या अनार का? केवड़े का या बादाम का?
शरबत पी कर जब मेहमान विदा लेने लगे तो सौजन्यवश बोले: आप के पिताजी के दर्शन किए बहुत दिन हो गए हैं, क्या हम उन के दर्शन कर सकते हैं? नव रईस ने मुल्ला से कहा: जा मुल्ला पिताजी को बुला ला। आज्ञाकारी नसरुद्दीन तुरंत बोला: कौन से पिताजी? इंग्लैंड वाले या फ्रांस वाले या अमरीका वाले?
क्रियाकांड में उलझा हुआ आदमी इससे ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाता—सब थोथा—थोथा! समझ नहीं होती, क्या कर रहा है। जैसा बताया है वैसा कर रहा है। कितनी आरती उतारनी, उतनी आरती उतार देता है। कितने चक्कर लगाने मूर्ति के, उतने चक्कर लगा लेता है। कितने फूल चढ़ाने, उतने फूल चढ़ा देता है। कितने मंत्र जपने, उतने मंत्र जप लेता है। कितनी माला फेरनी, उतनी माला फेर देता है। लेकिन हृदय का कहीं भी संस्पर्श नहीं है। और न कहीं कोई बांध है।
राम बिना फीका लगै! दरिया ठीक कहते हैं: जब तक भीतर का राम न जगे या किसी जागे हुए राम के साथ संग—साथ न हो जाए तब तक सब फीका है।
सब किरिया सास्तर ग्यान...!
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान।।
और जब अपने भीतर ही सूरज उग आता है तो फिर बाहर के दीयों की कोई जरूरत नहीं रह जाती। न शास्त्र की जरूरत रह जाती है, न क्रियाकांडों की जरूरत रह जाती है। जब अपना ही बोध हो जाता है तो फिर आवश्यक नहीं होता कि हम दूसरों के उधार बोध को ढोते फिरें।
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान।
दरिया कहता है: अब तो कोई जरूरत नहीं है। अब उपनिषद कुछ कहते हों तो कहते रहें; ठीक ही कहते हैं। कुरान कुछ कहती हो तो कहती रहे; ठीक ही कहती है। अपना ही कुरान जग गया। अपने ही भीतर आयतें खिलन लगीं। अपने भीतर ही उपनिषद पैदा होने लगे। सदगुरु सिद्धांत नहीं देता; सदगुरु जागरण देता है। सदगुरु शास्त्र नहीं देता; स्वबोध देता है। सदगुरु क्रियाकांड नहीं देता; स्वानुभूति देता है, समाधि देता है।
दरिया नरत्तन पायकर, कीया चाहै काज।
राव रंक दोनों तरैं, जो बैठें नाम—जहाज।।
दरिया कहते हैं: जिंदगी मिली है तो कुछ कर लो। असली काम कर लो! कीया चाही चाहै काज! ऐसे ही व्यर्थ के कामों में मत उलझे रहना। कोई धन इकट्ठा कर रहा है, कोई बड़े पद पर चढ़ा जा रहा है। सब व्यर्थ हो जाएगा। मौत आती ही होगी। मौत आएगी सब पानी फेर देगी तुम्हारे किए पर। जिस काम पर मौत पानी फेर दे, उसको असली काज मत समझना।
दरिया नरत्तन पायकर, कीया चाहै काज।
यह मनुष्य का अदभुत जीवन मिला है। असली काम कर लो। असली काम क्या है? राव रंक दोनों तरैं, जो बैठैं नाम—जहाज। प्रभु का स्मरण कर लो। प्रभु के स्मरण की नाव पर सवार हो जाओ। इसके पहले कि मौत तुम्हें ले जाए, प्रभु की नाव पर सवार हो जाओ।
मुसलमान हिंदू कहा, षट दरसन रंक राव।
जन दरिया हरिनाम बिन, सब पर जम का दाव।।
और खयाल रखना, मौत फिकिर नहीं करती कि तुम हिंदू हो कि मुसलमान कि ईसाई कि जैन। और मौत फिकिर नहीं करती कि करीब हो कि अमीर। और मौत फिकिर नहीं करती कि चपरासी हो कि राष्ट्रपति। कोई फर्क नहीं पड़ता।
मुसलमान हिंदू कहा, षट दरसन रंक राव।
इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हें छहों दर्शन कंठस्थ हैं, कि तुम चारों वेद के पाठी हो, कि तुम पुरी कुरान स्मृति से दोहरा सकते हो। मौत इन सब बातों की चिंता नहीं करेगी।
जन दरिया हरिनाम बिन...सिर्फ एक चीज पर मौत का वश नहीं चलता—वह है राम का तुम्हारे भीतर जग जाना, राम की सुरति पैदा हो जाना। अन्यथा सब पर जम का दाव! सब पर मौत का कब्जा है। सिर्फ राम अमृत है, बाकी सब मरणधर्मा हैं।
और कितना ही धन मिल जाए, कहां होती पूरी वासना! लगता है और कितना ही पद हो, सीढ़िया पर आगे और सोपान होते हैं। और कहीं भी पहुंच जाओ, दौड़ जारी रहती है, आपाधापी मिटती नहीं।
कहो जागरण से जरा सांस ले ले,
अभी स्वप्न मेरा अधूरा—अधूरा।
इससे आदमी जागने तक से डरता है, क्योंकि न मालूम कितने स्वप्न अभी अधूरे—अधूरे हैं।
कहो जागरण से जरा सांस ले ले,
अभी स्वप्न अधूरा—अधूरा।
लकीरें बनी हैं न तस्वीर पूरी
अभी ध्यान है साधना है अधूरी
हुआ कल्पना का अभी तक उदय ही
रहा साथ मेरे अभी तक मलय ही
मुझे देवता मत पुरस्कार देना।
अभी यत्न मेरा अधूरा—अधूरा।
अभी चांद का रथ हुआ है रवाना
कली को न आया अभी मुस्कुराना
अभी तारकों पर उदासी न छाई
दिए ने न मांगी अभी तक बिदाई
प्रभाती न गाओ, सुबह मत बुलाओ,
अभी प्रश्न मेरा अधूरा—अधूरा।
अभी आग है आरती कब बनी है
अभी भावना भारती कब बनी है
मुखर प्रार्थना, मौन अर्चना नहीं है
निवेदन बहुत है समर्पण नहीं है
अभी से कसौटी न मुझको चढ़ाओ,
खरा स्वर्ण मेरा अधूरा—अधूरा।
पवन डाल की पायलों को बजाए
किरण फूल के कुंतलों को खिलाए
भ्रमर जब चमन को मुरलिया सुनाए
मुझे जब तुम्हारी कभी याद आए
तभी द्वार आकर तभी लौट जाना,
हृदय भग्न मेरा अधूरा—अधूरा।
आदमी डरा—डरा रहता है, क्योंकि सभी तो अधूरा—अधूरा है। इस संसार में कभी कुछ पकती ही नहीं और मौत आ जाती है; कभी कुछ पुरा नहीं होता और मौत आ जाती है। इसलिए सब आपाधापी व्यर्थ है, सारा श्रम निरर्थक है। करना हो कुछ तो असली काज, असली काम कर लो। जो बैठे नाम—जहाज...उसने कर लिया असली काज।
मुसलमान हिंदू कहा, षट दरसन रंक राव।
जन दरिया हरिनाम बिन, सब पर जम का दाव।।
जो कोई साधु गृही में, माहिं राम भरपूर ।
दरिया कह उस दास की, मैं चरनन की धूर।।
जिसको साधु में, असाधु में राम दिखाई पड़ने लगे, बस जानना वही पहुंचा है। जो कोई साधु गृही में, माहिं राम भरपूर। जो संसारी में भी राम को ही देखता है, गृही में भी राम को ही देखता है, अगृही में भी; संन्यासी और संसारी में जिसे भेद ही नहीं है; जिसे दोनों में एक ही राम दिखाई पड़ता है; जिसे बस राम ही दिखाई पड़ता है—दरिया कह उस दास की, मैं चरनन की धूर! बस मैं उसके ही चरणों की धूल हो जाऊं, इतना ही काफी है। बस इतनी आकांक्षा काफी है। जिसने राम को जाना हो, उसके चरण तुम्हारे हाथ में आ जाएं तो राम तुम्हारे हाथ आ गए। जिसने राम को जाना हो उसकी बात तुम्हारे कान में पड़ जाए तो राम की बात तुम्हारे कान में पड़ गई।
दरिया सुमिरै राम को, सहज तिमिर का नास।
घट भीतर होय चांदना, परमजोति परकास।।
दरिया सुमिरै राम को...बस एक राम की स्मृति, और सारा अंधकार मिट जाता है—ऐसे जैसे कोई दीया जलाए और अंधकार मिट जाए! इस बात को खूब ध्यान में रख लेना। तुम्हें बार बार उल्टी ही बात समझाई जाती रही है। तुम्हें निरंतर नीति की शिक्षा दी गई है और धर्म से तुम्हें वंचित रखा गया है। नीति की इतनी शिक्षा दी गई है कि धीरे—धीरे तुम नीति को ही धर्म समझने लगे हो।
नीति और धर्म बड़े विपरीत आयाम हैं। नीति का अर्थ होता है: एक—एक बीमारी से लड?ो। नीति का अर्थ होता है: क्रोध है तो अक्रोध साधो और लोभ है तो अलोभ साधो और आसक्ति है तो अनासक्ति साधो। हर बीमारी का इलाज अलग अलग। और धर्म का अर्थ होता है: सारी बीमारियों की जड़ को काट दो। जड़ है तुम्हारी सोई अवस्था, तुम्हारी मूर्च्छित अवस्था; उस जड़ को काट दो। जाग जाओ और सारी बीमारियां तिरोहित हो जाती हैं।
नीति है अंधेरे से लड़ना। इधर से धकाओ उधर से धकाओ; लेकिन अंधेरा कहीं धकाने से मिटता है? दीए को जलाओ! धर्म का अर्थ है: दीए को जलाओ। अंधेरे की बात ही छोड़ो।
मुझसे लोग आकर पूछते हैं: क्रोध कैसे मिटे लोभ कैसे मिटे, कामवासना का क्या करें? और मैं उन सभी को एक ही उत्तर देता हूं: ध्यान करो।
एक दिन एक व्यक्ति ने पूछा: क्रोध कैसे मिटे? मैंने कहा: ध्यान करो। वह बैठा ही था, तभी दूसरे ने पूछा कि लोभ कैसे मिटे? मैंने कहा: ध्यान करो। पहला वाला बोला कि रुकें, यही तो आपने मुझे भी कहा है। और मेरी बीमारी क्रोध है और इसकी बीमारी लोभ है। इलाज एक कैसे हो सकता है?
नीति प्रत्येक बीमारी की अलग—अलग व्यवस्था करती है। इसलिए नीति बड़ी तर्कयुक्त मालूम होती है। नीति कितनी ही तर्कयुक्त मालूम हो, व्यर्थ है। नीति को साध कर कोई कभी नैतिक नहीं हो पाता। हां, धर्म को जानकर लोग नैतिक हो जाते हैं। नैतिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता; धार्मिक व्यक्ति अनिवार्य रूप से नैतिक हो जाता है, स्वाभाविक रूप से नैतिक हो जाता है।
एक ही चीज करनी है—जागना है।
नींद क्या है? और जागना क्या है?
एक वस्तु है, एक बिंब है, मैं दोनों के बीच—
मेरे दृग दोनों के बीच!
कितना भी मैं चितवन फेरूं,
चाहे एक किसी को हेरूं,
उभय बने रहते हैं दृग में—
सर में पंकज—कीच
एक रूप है, एक चित्र है, मैं दोनों के बीच—
मेरे दृग दोनों के बीच!
मींच भले लूं लोचन अपने
दोनों बन आते हैं सपने,
मैं क्या खींचूं, वे ही खिंचकर
लेते हैं मन खींच!
एक सत्य है, एक स्वप्न है, मैं दोनों के बीच
मेरे दृग दोनों के बीच!
प्यास थल, जल की आशा में,
रटता है जब खग—भाषा में,
एक ब्रह्म है, एक प्रकृति है, मैं दोनों के बीच—
मेरे दृग दोनों के बीच!
यह मैं भाव, बस यह मैं भाव हमारी निद्रा है, हमारी तंद्रा है, हमारी मूर्च्छा है। जिसने मैं भाव छोड़ा वह जागा। इस मैं के कारण दो हो गए हैं जगत—प्रकृति और परमात्मा भिन्न मालूम हो रहे हैं, क्योंकि मैं बीच में खड़ा हूं।
मिट्ठी के घड़े को ले जाओ और नदी में डुबा दो। मिट्टी के घड़े में पानी भर जाएगा। बाहर भी वही पानी है, भीतर भी वही पानी है; बीच में एक मिट्टी की दीवाल खड़ी हो गई। अब घड़े का पानी अलग मालूम होता है, नदी का पानी अलग मालूम होता है। अभी—अभी एक थे, अब भी एक है; बस जरा सी घड़े की दीवाल, पतली सी मिट्ठी की दीवाल।
बस ऐसी ही क्षीण सी अहंकार की एक भावदशा है जो हमें परमात्मा से अलग किए हुए है। और हम बीच में खड़े हैं, इसलिए प्रकृति और परमात्मा अलग मालूम हो रहे हैं। जहां मैं गया वहां प्रकृति और परमात्मा भी एक हो जाते हैं।
दरिया सुमरै राम को, सहज तिमिरका नास।
घट भीतर होय चांदना, परमजोति परकास।।
याद आने लगे परमात्मा की...अहंकार खोए तो ही याद आए। या तो मैं या तू याद रखना। दोनों साथ नहीं रह सकते।
सूफी फकीर जलालुद्दीन की कविता तुम्हें याद दिलाऊं। प्रेमी ने अपनी प्रेयसी के द्वार पर दस्तक दी है। भीतर से आवा आई: कौन है? प्रेमी ने कहा: मैं हूं, तेरा प्रेमी! पहचाना नहीं? लेकिन प्रेयसी ने भीतर से कहा: यह घर छोटा है। प्रेम का घर छोटा है। इसमें दो न समा सकेंगे। लौट जाओ अभी। तैयारी करके आना, प्रेम के घर में दो नहीं समा सकते। एक म्यान में दो तलवारें न रह सकेंगी।
प्रेमी लौट गया। चांद आए और गए। सूरज उगे और डूबे। वर्ष, माह बीते। धीरे—धीरे मैं भाव को मिटाया, मिटाया, मिटाया। और जब मैं भाव मिट गया फिर द्वार पर दस्तक दी। वही प्रश्न: कौन है? लेकिन प्रेमी ने इस बार कहा: तू ही है। तू ही बाहर, तू ही भीतर!
और रूमी की कविता कहती है: द्वार खुल गए! जहां एक बचा वहां द्वार खुल जाएंगे। जब तक दो हैं, जब तक अड़चन है। दुई ही हमारी दुविधा है। दुई गई कि सुविधा हुई।
घट भीतर होय चांदना! जरा यह मैं मिटे, यह अहंकार का अंधकार मिटे तो चांद भीतर उग आता है। घट भीतर होय चांदना! चांदनी ही चांदनी हो जाती है। चांद की चांदी ही चांदी बिखर जाती है। परमजोति परकास! और उस ज्योति का अनुभव होता है, जो शाश्वत है—बिन बाती बिन तेल। न तो उसकी कोई बाती है और न कोई तेल है; इसलिए चुकने का कोई सवाल नहीं है, बुझाने का कोई सवाल नहीं।
सतगुर—संग न संचरा, रामनाम उर नाहिं।
ते घट मरघट सारिखा, भूत बसैं ता माहिं।।
जो व्यक्ति सतगुरु के संग न उठा—बैठा, जिस व्यक्ति ने सतगुरु न खोजा, जो व्यक्ति सतगुरु की हवा में श्वास न लिया...सतगुर संग न संचरा, रामनाम उर नाहिं...और जिसके हृदय में राम का नाम न जगा, राम का भाव न उठा, राम का संगीत न गूंजा—वह मरघट की भांति है। ते घट मरघट सारिखा! वह जिंदा नहीं है, मरा ही हुआ है। उसके पास जिंदगी जैसा क्या है? बस चलती—फिरती एक लाश है। ते घट मरघट सारिखा, भूत बसैं ता मांहिं। उसके भीतर आत्मा नहीं बसती, सिर्फ भूत समझो।
भूत बड़ा प्यारा शब्द है। इसका अर्थ होता है: अतीत। इसलिए तो कहते हैं: भूतपूर्व मंत्री! इस देश में बहुत भूत हैं—कोई भूतपूर्व मंत्री हैं, कोई भूतपूर्व प्रधानमंत्री हैं, कोई भूतपूर्व कुछ हैं, कोई कुछ हैं! भूतपूर्व राष्ट्रपति! भूत ही भूत!
भूत का अर्थ होता है: अतीत। जो बीत गया। जिस मनुष्य के भीतर सिर्फ अतीत ही अतीत है और वर्तमान का कई संस्पर्श नहीं है, वह भूत है। बस वह लग रहा है कि जी रहा है। उससे जरा दूर—दूर रहना और सावधान! कहीं लग—लुगा न जाए।
और मन का ढंग ही एक है—अतीत। मन भूत हैं। मन जीता ही अतीत में है। जो बीत गया उसी को इकट्ठा करता रहता है। सारे कल जो बीत गए हैं, उनको इकट्ठा करता रहता है। मन है ही क्या सिवाय स्मृति के ? और स्मृति यानी भूत।
अतीत से छोड़ो नाता, वर्तमान से जोड़ो। काश, एक क्षण को भी तुम्हारे भीतर भूत न रह जाए! भूत नहीं रहेगा तो उसकी छाया जो पड़ती है, भविष्य, वह भी नहीं रहेगी। भविष्य भूत की छाया है। भूत गया, भविष्य गया। तब रह जाता है शुद्ध वर्तमान। हीरे जैसा दमकता और चमकता यह क्षण! और इसी क्षण में से द्वार है परमात्मा का।
सत्संग का और कोई अर्थ नहीं होता है। सदगुरु के पास बैठने का और कोई अर्थ नहीं होता है। सदगुरु के पास बैठने का और कोई अर्थ नहीं होता है। सदगुरु के भीतर अब न भूत है न भविष्य। सदगुरु अब सिर्फ अभी और यही है। सदगुरु शुद्ध वर्तमान है; न पीछे की तरफ देखता है न आगे की तरफ, बस यहीं ठहरा हुआ है। इस क्षण के अतिरिक्त उसकी कोई और चिंतना नहीं है।
और तुम जानते हो, अगर यही क्षण हो तो विचार नहीं हो सकते। विचार या तो अतीत के होते हैं या भविष्य के होते हैं। वर्तमान का कोई विचार ही नहीं होता। इस महत्वपूर्ण बात को कुंजी की तरह सम्हाल कर रखना। वर्तमान का कोई विचार नहीं होता। वर्तमान में कोई विचार नहीं होता। विचार ही बनता है, जब कोई चीज बीत जाती है। विचार बीते का होता है, व्यतीत का होता है, अतीत का होता है; जा चुका उसकी रेखा छूट जाती है, लीक छूट जाती है, पद—चिह्न छूट जाते हैं। या विचार भविष्य का होता है—जो होना चाहिए, जिसकी आकांक्षा है, अभीप्सा है, जिसकी वासना है। लेकिन वर्तमान का क्या विचार है?
वर्तमान निर्विचार होता है। और निर्विचार हो जाना ही सत्संग है। ऐसे किसी व्यक्ति के पास अगर बैठते रहे, बैठते रहे—जा निर्विचार है, जिसके भीतर सन्नाटा है और शून्य है—तो शून्य संक्रामक है। उसके पास बैठते—बैठते शून्य की बीमारी लग जाएगी। तुम्हारे भीतर भी सन्नाटा छाने लगेगा। तुम्हारे भीतर भी धीरे—धीरे शून्य की तरंगें उतरने लगेंगी। जिसके साथ रहोगे वैसे हो जाओगे।
बगीचे से गुजरोगे, फूल न भी छुए, तो भी वस्त्रों में फूलों की गंध आ जाएगी। मेंहदी पीसोगे, मेंहदी हाथ में लगानी भी न थी, तो भी हाथ रंग जाएंगे।
सत्संग में बैठना, जहां फूल खिले हैं वहां बैठना है। थोड़ी बहुत गंध पकड़ ही जाएगी। तुम्हारे बावजूद पकड़ जाएगी। और वही गंध तुम्हें अपनी भीतर की गंध के मूलस्रोत की स्मृति दिलाएगी।
सतगुर—संग न संचरा, रामनाम उर नाहिं।
ते घट मरघट सारिखा, भूत बसै ता माहिं।
दरिया काया कारवी, मौसरा है दिन चार।
जबलग सांस सरीर में, तबलग राम संभार।।
कहते हैं: सुनो, समझो। यह शरीर तो मिथ्या है, मिट्टी का है। यह तो अब गया तब गया। यह तो जाने ही वाला है।
दरिया काया कारवी...यह तो बस माया का खेल है। यह तो जैसे किसी जादूगर ने धोखा दे दिया हो, ऐसा धोखा है।...मौसर है दिन चार। और बहुत ही छोटा अवसर है—दिन चार का। बस चार दिन का अवसर है।
जबलग सांस सरीर में, तबलग राम संभार।
इन छोटे से दिनों में, इन थोड़े से समय में, इन चार दिनों में, राम को सम्हाल लो। जबलग सांस शरीर में...और अंत क्षण तक स्मरण रखना जब तक श्वास रहे शरीर में तब तक राम को भूलना मत। राम को याद करते—करते ही जो विदा होता है उसे फिर दुबारा वापिस देह में नहीं आना पड़ता। राम में डूबा—डूबा ही जो जाता है, वह राम में डूब ही जाता है, फिर उसे लौटना नहीं पड़ता। फिर उसे वापिस संकीर्ण नहीं होना पड़ता। इस छोटी सी देह के भीतर आबद्ध नहीं होना पड़ता।
दरिया आतम मल भरा, कैसे निर्मल होय।
साबन लागै प्रेम का, रामनाम—जल धोय।।
बहुत गंदगी है, माना। निर्मल करना है इसे, दरिया कहते हैं। तो दो काम करना: प्रेम का साबुन! जितना बन सके उतना प्रेम करो। जितना दे सको उतना प्रेम दो। प्रेम तुम्हारी जीवन चर्या हो।
साबन लागै प्रेम का, रामनाम जल धोय
तो प्रेम से तो लगाओ साबुन और राम नाम के जल से धोते रहो। प्रेम और ध्यान, बस दो बातें हैं। ध्यान भीतर, प्रेम बाहर। प्रेम बांटो और ध्यान सम्हालो। ध्यान की ज्योति जले और प्रेम का प्रकाश फैले, बस पर्याप्त है। इतना सध गया, सब सध गया। इतना न सधा, तो चूके अवसर।
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल।।
दरिया कहते हैं: जब से राम का स्मरण आया, और सब खेल भूल गए। और सब खेल ही हैं। छोटे बच्चे मॉनोपाली का खेल खेलते हैं, बड़े बच्चे भी मॉनोपाली का खेल खेलते हैं। छोटे बच्चों का बार्ड होता है मॉनोपाली का, नकली नोट होते हैं। मगर तुम्हारे नोट असली हैं? उतने ही नकली हैं। मान्यता के नोट हैं। मान लिया है तो धन मालूम होता है। आदमी न रहे जमीन पर, सोना यही रहेगा, चांदी यहीं रहेगी; लेकिन फिर उसे कोई धन न कहेगा। हीरे भी पड़े रहेंगे, कंकड़—पत्थरों में हीरों में कोई भेद न रहेगा। कोहिनूर और कोहिनूर के पास पड़ा हुआ कंकड़, दोनों में कोई मूल्य भेद नहीं होगा। आदमी मूल्य भेद खड़ा करता है। सब मूल्य भेद आदमी के निर्मित है, बनाए हुए हैं, कल्पित हैं।
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल।
और कैसे—कैसे खेल चल रहे हैं! किसी तरह प्रसिद्ध हो जाऊं, लोग मुझे जान लें, लोगों में नाम हो, प्रतिष्ठा हो—सब खेल हैं! तुम ही न रहोगे, तुम्हारा नाम रहा न रहा, क्या फर्क पड़ता है! तुम न रहोगे, दस—पांच जो तुम्हें याद करते थे कल वे भी न रहेंगे। पहले तुम मिट जाओगे, फिर उन दस—पांच के मिटने के साथ तुम्हारी स्मृति भी मिट जाएगी।
कितने लोग इस जमीन पर रह चुके हैं, तुमसे पहले, जर उनकी याद करो। वैज्ञानिक कहते हैं: जिस जगह तुम बैठे हो वहां कम से कम दस आदमियों की लाशें गड़ी हैं। इतने लोग जमीन पर रह चुके हैं कि अब तो हर जगह मरघट है! बस्तियां कई बार बस चुकीं और उजड़ चुकीं। कई बार मरघट बस्तियां बन गए और बस्तियां मरघट बन गई।
मोहनजोदड़ो की खुदाई में सात पर्ते मिलीं। मोहनजोदड़ो सात बार बसा और सात बार उजड़ा। हजारों साल में ऐसा हुआ होगा। मगर कितनी बार मरघट बन गया और कितनी बार फिर बस गया! तुम मरघट जाने से डरते हो, डरने की कोई जरूरत नहीं है; जहां तुम रह रहे हो वहां कई दफा मरघट रह चुका है। छोड़ो भय।
सारी पृथ्वी लाशों से भरी है। फिर भी खेल नहीं छूटते। खेल छूटेंगे भी नहीं, जब तक कि राम नाम का स्मरण न आ जाए; जब तक प्रभु की तलाश तुम्हारे प्राणों को न पकड़ ले। जब तक उसकी प्यास ही एकमात्र प्यास न हो जाए तब तक खेल छूटेंगे भी नहीं। हां, उसकी प्यास पकड़े कि खेल अपने—आप छूट जाते हैं। फिर खयाल करना फर्क।
दरिया यह नहीं कह रहे हैं: खेल छोड़ दो। दरिया कह रहे हैं:। राम याद कर लो, खेल अपने से छूट जाते हैं। छूट जाएं ठीक, न छूटें ठीक। मगर इतना पक्का हो जाता है कि खेल खेल हैं, इतना मालूम हो जाता है। इतना मालूम हो गया, बात खत्म हो गई।
रामलीला में तुम राम बने हो कोई ऐसा थोड़े ही कि घर जाकर रोओगे कि अब सीता का क्या हो रहा होगा अशोक—वाटिका में! रामलीला में रोते फिरोगे, झाड़—झाड़ से पूछोगे कि है झाड़, मेरी सीता कहां है? और जैसे ही पर्दा गिरा कि भागे घर की तरफ, क्योंकि वहां दूसरी सीता प्रतीक्षा कर रही है। और रात जब नींद लग जाएगी तो दूसरी सीता को भी भूल जाओगे, क्योंकि नींद में और हजार सीताएं हैं, मिलन है। पर्दे पर पर्दे हैं, खेल पर खेल हैं।
नाटक में एक अभिनय कर लेते हो, ऐसा ही सारे जीवन को समझता है संन्यासी। जो अभिनय परमात्मा दे दे, कर लेता है। अगर उसने कहा कि चलो दुकानदार बनो तो दुकानदार बन गए। और उसने कहा कि शिक्षक बनो तो शिक्षक बन गए। उसने कहा कि स्टेशन मास्टर बन जाओ तो स्टेशन मास्टर बन गए; ले ली झंडी और बताने लगे। मगर अगर एक बात याद बनी रहे कि खेल उसका, हम सिर्फ खेल खेल रहे हैं जब उसका बुलावा आ जाएगा कि अब लौट आओ घर, पर्दा फिर जाएगा, घंटी बज जाएगी, घर वापिस लौट जाएंगे।
खेल छोड़ने की ही बात नहीं है; खेल को खेल जानने में ही उसका छूट जाना है। जानना मुक्ति है।
इसलिए मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम जहां हो वहां से भाग जाओ, क्योंकि अगर तुम भाग गए वहां से तो तुम भागने का खेल खेलोगे। तुम्हारे साथ बड़ी मुसीबत है। कुछ लोग गृहस्थी का खेल खेल रहे हैं, कुछ लोग संन्यास का खेल खेलने लगते हैं। अब जो पत्नी को छोड़कर भागा है, उसे एक बात तो पक्की है कि वह यह नहीं मानता कि पत्नी के पास रहना खेल था। खेल था तो भागना क्या था? खेल होता तो भागना क्या था? खेल ही है तो जाना कहां है? तो बच्चे थे, पत्नी थी, द्वार, घर, सब ठीक था; खेल था, चुपचाप खेलता रहता था छोड़कर भागा तो एक बात तो पक्की है कि उसने खेल को खेल न माना, बहुत असली मान लिया। अब यह भागकर जाएगा कहां? वह जो असली मानने वाली बुद्धि है, वह तो साथ ही जाएगी न! मत तो छूट नहीं जाएगा। घर छूट जाएगा, पत्नी छूट जाएगी; मगर पत्नी और घर को असली मानने वाला मन यह कहीं जाकर आश्रम बना लेगा तो आश्रम का खेल खेलेगा।
मेरे एक मित्र हैं। उनको मकान बनाने का शौक है। अपना मकान तो उन्होंने सुंदर बनाया ही बनाया; यह उनकी हॉबी है। किसी मित्र का भी मकान बनता हो तो वे उसमें भी दिन—रात लगाते। एक दिन मुझे खबर आई कि वे संन्यासी हो गए। मैंने कहा: यह तो बड़ा मुश्किल पड़ेगा उनको। हॉबी का क्या होगा? संन्यासी होकर क्या करेंगे? कोई दस साल बीत गए, तब मैं उस जगह से गुजरा जहां वे रहते थे पहाड़ी पर। तो मैंने कहा कि जरा मोड़ तो होगा, दस बारह मील का चक्कर लगेगा, लेकिन देखता चलूं कि वे कर क्या रहे हैं, हॉबी का क्या हुआ! हॉबी जारी थी। छाता लगाए भर दोपहरी में खड़े थे। मैंने पूछा: क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा: आश्रम बनवा रहे हैं! वही का वही आदमी है, वही का वही खेल। तो मैंने कहा: तुम वहीं से क्यों आए? यह काम तो तुम वहीं करते थे। और सच पूछो तो जब तुम मित्रों के मकान बनवाते थे तो उसमें कम आसक्ति थी; तुम यह अपना आश्रम बनवा रहे हो, इसमें आसक्ति और ज्यादा हो जाएगी।
वे कहने लगे: बात तो ठीक है। मगर यह मकान बनाने की बात मुझसे छूटती ही नहीं। बस इसके ही सपने उठते हैं—ऐसा मकान बनाओ वैसा मकान बनाओ...
तुम भाग जाओगे लेकिन तुम अपने को तो छोड़कर नहीं भाग सकोगे। तुम तो साथ ही चले जाओगे। तुम्हारी सारी भूल—भ्रांति साथ चली जाएगी।
नाटक...समझ में आ जाए कि नाटक है, बस बात खत्म हो गई। फिर जहां हो वहीं विश्राम हो गया। फिर जैसे हो वहीं संन्यस्त हो गए। यह बात ऊपर—ऊपर न रहे; यह बात भीतर बैठ जाए; यह रोएं—रोएं में समा जाए।
एक गांव में रामलीला हुई। लक्ष्मण जी बेहोश हैं, हनुमान जी गए हैं संजीवनी बूटी लेने। मिली नहीं तो पूरा पहाड़ लेकर आए। रामलीला का पहाड़! एक रस्सी पर सारा खेल बनाया गया था। गांव की रामलीला! जिस चर्खी पर रस्सी घूम रही थी, रस्सी और चर्खी कहीं उलझ गई। गांठ न खुले। जनता अलग बेचैन। लक्ष्मण जी भी बीच—बीच में आंख खोलकर देख लें कि बड़ी देर हुई जा रही है। रामचंद्र जी भी ऊपर की तरफ आंख उठाकर देखें और कहें कि हनुमान जी, कहां हो? जल्दी आओ। लक्ष्मण जी के प्राण संकट में पड़े हैं। हनुमान जी सब सुन रहे हैं, मगर बोलें तो क्या बोलें, क्योंकि वे अटके हैं। किसी को कुछ न सूझा; मैनेजर घबड़ाहट में आ गया, उसने रस्सी काट दी। रस्सी काट दी तो हनुमान जी धड़ाम से पहाड़ सहित नीचे गिरे। गिरे तो भूल ही गए।
रामचंद्र जी ने पूछा कि जड़ी—बूटी ले आए? लक्ष्मण जी मर रहे हैं।
हनुमान जी ने कहा कि ऐसी की तैसी लक्ष्मण जी की! और भाड़ में गई जड़ी बूटी। पहले यह बताओ रस्सी किसने काटी?
ऊपर—ऊपर हो तो यही हालत होगी। ऊपर—ऊपर नहीं, रोम—रोम भिद जाए। नहीं तो जरा सा खरोंच दिया किसी ने कि फिर भूल जाओगे। यह अंतर्तम में बैठ जाए बात कि यह जगत एक नाटक, एक लीला, एक खेल...फिर होशपूर्वक खेलते रहो खेल।
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल।।
और जिन्होंने इस तरह राम के साथ अपने मन को कर लिया है कि अब अपना भेद नहीं मानते; उसका खेल है, खिलवाता है तो खेलते हैं; बुलवा लेगा तो चले जाएंगे; न अपना कुछ यहां है, न लाए, न कुछ ले जाना है—धन्य हैं वे लोग।
सखि! मुझमें अब अपना क्या है!
घिसते घिसते मेरी गागर
आज घाट पर फूट गई है;
बिथर गया है अहं विवश हो,
मुझसे सीमा छूट गई है,
अब तरना क्या, बहना क्या है!
सखि! मुझमें अब अपना क्या है!
पाप पुण्य औ प्यारर् ईष्या
मैंने अपना सब दे डाला;
अर्पण करते ही मेरा सब
चमक उठा अब उजला काला;
अब सच क्या और सपना क्या है!
सखि! मुझमें अब अपना क्या हैं!
अपनी पीड़ाएं सखि! तेरे
स्वर्णिम अंचल पर सब लखकर,
मेरी वाणी मौन हो गई
एक बार अविराम मचलकर;
अब प्रिय से कुछ कहना क्या है!
सखि! मुझमें अब अपना क्या है!
इच्छाओं के अगम सिंधु में
जीवन कारज लहर बन गए;
सुधि का यान चला जाता है;
भय तिर—तिर कर प्यार हो गए;
पास दूर अब रहना क्या है?
सखि! मुझमें अब अपना क्या है!
, पीड़ा की दिव्य पुजारिन!
तूने जो वरदान दिया है,
तेरा ही तो मधुमय बोझा
बस क्षण भर को टेक लिया है,
मुझको इसमें सहन क्या है!
सखि! मुझमें अब अपना क्या है!
एक बार राम के साथ मन का मेल हो जाए, फिर अपना क्या है? फिर छोड़ना भी नहीं, फिर पकड़ना भी नहीं। फिर न कुछ त्याग है, न कुछ भोग है।
फिरी दुहाई सहर में, चोर गए अब भाज।
और जैसे ही यह पता चल जाता है कि मन राम में रम गया, कि सारे चोर भाग जाते हैं। भीतर के नगर में डुंडी मिट जाती है, कि अब भाग जाओ; अब यहां रहने में सार नहीं, मालिक आ गया! रोशनी आ गई। अंधेरा भाग जाता है।
फिरी दुहाई सहर में, चोर गए सब भाज।
सत्र फिर मित्र जु भया, हुआ राम का राज।।
फिर क्रोध करुणा हो जाती है; वासना प्रार्थना हो जाती है; काम राम हो जाता है; जो शत्रु थे वे मित्र हो जाते हैं। खूब प्यारी परिभाषा की है राम राज्य की! इससे बाहर का कोई संबंध नहीं है।
सत्र फिर मित्र जु भया, हुआ राम का राज!
भीतर मन राम के साथ एक हो गया...एक है ही, बस जान लिया, प्रत्यभिज्ञा हो गई कि एक ही है—कि रामराज्य हो गया! कि जीवन में फिर आनंद ही आनंद की वर्षा है! कि आ गया वसंत!
कसमसाई है लता की देह
फागुन आ गया
पारदर्शी दृष्टियां के पार
सरसों का उमगना
गंध—वन में निर्वसन होते
पलाशों का बहकना
अंजुरी भर भर लुटाता नेह
फागुन  आ गया
इंद्रधनुषी रंग का विस्तार
ओढ़े दिन गुजरते
अमलतासों से खिले संबंध
फिर मन में उतरते
पंखुरियों सा झर गया संदेह
फागुन आ गया
एक वंशी टेर तिरती
छरहरी अमराइयों में
ताल के संकेत बौराए
चपल परछाइयों में
झुके पातों से टपकता मेंह
फागुन आ गया
नम अबीरी धूप पर
छाने लगा लालिम कुहासा
पुर गया रांगोलियों से
व्योम भी कुमकुम छुआ सा
पुलक भरते द्वार, आंगन, गेह
फागुन आ गया
इस फागुन की प्रतीक्षा है। इसी फागुन की तलाश है—कि बरस जाएं रंग ही रंग, कि प्राण भर जाएं इंद्रधनुषों से, कि सुगंध उठे, कि दीया जले, कि रामराज्य आए। और आने की कुंजी सीधी साफ है—मैं तू का भेद मिट जाए। इधर मिटा मैं तू का भेद, उधर रामराज्य का पदार्पण हुआ।
यह तुम्हारा हक है, अधिकार है। गंवाओ तो तुम जिम्मेवार। अवसर को चूको मत। जागो।
अमी झरत, बिगसत कंवल!
दरिया कहते हैं: अमृत बरसत है और कमल खिलते हैं।

आज इतना ही।