कुल पेज दृश्य

शनिवार, 4 जून 2016

कहे होत अधीर--(प्रवचन--13)



ध्यान है मार्ग—(प्रवचन—तेरहवां)

सारसूत्र :


माया तू जगत पियारी, वे हमरे काम की नाहिं।
द्वारे से दूर हो लंडी रे, पइठु न घर के माहिं।।
माया आपु खड़ी भई आगे, नैनन काजर लाए।
नाचै गावै भाव बतावै, मोतिन मांग भराए।।
रोवै माया खाय पछारा, तनिक न गाफिल पाऊं।
जब देखौं तब ज्ञान ध्यान में, कैसे मारि गिराऊं।।
रिद्धि-सिद्धि दोई कनक समानी, बिस्तु डिगन को भेजा।

तीन लोक में अमल तुम्हारा, यह घर लगै न तेजा।।
तू क्या माया मोहिं नचावै, मैं हौं बड़ा नचनिया।
इहवां बानिक लगै न तेरी, मैं हौं पलटू बनिया।।

पाप कै मोटरी बाम्हन भाई, इन सब ही को बगदाई।
साइत सोधिकै गांव बेढ़ावै, खेत चढ़ाय के मूंड़ कटावै।।
रास वर्ग गन मूर को गाड़ि, घर कै बिटिया चौके रांड़ि।
और सभन को गरह बतावै, अपने गरह को नाहिं छुड़ावै।।
मुक्ति के हेतु इन्हें जग मानै, अपनी मुक्ति के मरम न जानै।
औरन को कहते कल्यान, दुख मा आपु रहै हैरान।।
दूध-पूत औरन को देते, आप जो घर-घर भिक्षा लेते।
पलटूदास की बात को बूझै, अंधा होई तेहु को सूझै।।

भलि मति हरल तुम्हार, पांडे बम्हना।।
सब जातिन में उत्तम तुमहीं, करतब करौ कसाई।
जीव मारिकै काया पोखौ, तनिको दरद न आई।।
रामनाम सुनि जूड़ी आवै, पूजौ दुर्गा चंडी।
लंबा टीका कांध जनेऊ, बकुला जाति पखंडी।।
बकरी भेड़ा मछरी खायो, काहे गाय बराई।
रुधिर मांस सब एकै पांडे, थू तोरी बम्हनाई।।
सब घट साहब एकै जानौ, यहिमां भल है तोरा।
भगवतगीता बूझि विचारौ, पलटू करत निहोरा।।


पना ही मन खो बैठे जब, औरों की क्या बात है,
सह ले पगले! चुप हो सह ले, आया जो आघात है।

दुनिया बहुत बड़ी है, जीवन का भी है विस्तार बड़ा,
तू किस भ्रम में युगोंऱ्युगों से इस सराय के द्वार खड़ा?
चलता-फिरता दिन है मूरख! चलती-फिरती रात है!

गहराई को कौन पूछता, गहरा तो है कूप भी,
पर न पहुंचता वहां समीरन, नहीं पहुंचती धूप भी,
जीत उसी की, जो लहरों का देता रहता साथ है!

बादल का क्या दोष फोड़ यदि सका न यह चट्टान तू?
पानी तो पानी है, मत कर यों अपना अपमान तू!
कल्प-कल्प का धैर्य जुटे जब, बनता तभी प्रपात है!

सह ले पगले! चुप हो सह ले, आया जो आघात है!
अपना ही मन खो बैठे जब, औरों की क्या बात है,
सह ले पगले! चुप हो सह ले, आया जो आघात है।

इस जीवन में जो भी घटता है, तुम्हारे अतिरिक्त कोई और उसका कारण नहीं है। तुम हो मालिक अपनी नियति के। कोई और विधाता नहीं है जो तुम्हारा भाग्य निर्मित करता है। तुम ही रोज अपना भाग्य निर्मित करते हो। तुम ही लिखते हो अपनी किस्मत रोज, प्रतिपल। मूर्च्छित जीओगे तो नरक में जीओगे। होश में जीओगे तो जहां हो वहीं स्वर्ग है। मूर्च्छित जीओगे तो सराय घर जैसी मालूम होगी। और फिर बड़ी मुश्किल होगी। क्योंकि सराय सराय है, तुम्हारे मानने से घर न हो जाएगी। आज नहीं कल सराय छोड़नी ही पड़ेगी। और तब बहुत पीड़ा होगी। इतने दिन की आसक्ति, इतने दिन का लगाव, इतने पुराने बंधन, इतनी गहरी जड़ें--सब उखाड़ कर जब अनंत की यात्रा पर निकलोगे, बहुत पीड़ा होगी। लौट-लौट कर देखोगे। न जाना चाहोगे। तड़पोगे। पकड़-पकड़ रखना चाहोगे। देह को पकड़ोगे, मन को पकड़ोगे। लेकिन कुछ भी काम न आएगा। जाना है तो जाना होगा। कितना ही रोओ, कितना ही तड़फो, कितना ही चिल्लाओ-चीखो, सराय सराय है और घर नहीं हो सकती है।
और जो सराय को सराय की तरह देख लेता है, उसने अपने घर की खोज में एक बहुत महत्वपूर्ण कदम उठा लिया। क्योंकि अंधेरे को अंधेरे की तरह पहचानना प्रकाश को प्रकाश की तरह पहचानने के लिए अनिवार्य पृष्ठभूमि है। गलत को गलत की तरह देख लेना सही को देखने के लिए भूमिका है।
दुनिया बहुत बड़ी है, जीवन का भी है विस्तार बड़ा,
तू किस भ्रम में युगोंऱ्युगों से इस सराय के द्वार खड़ा?
कभी यह सराय, कभी वह सराय। कभी यह देह, कभी वह देह। कभी यह योनि, कभी वह योनि। और दुनिया का विस्तार बहुत बड़ा है! सराय ही सराय फैली हैं। एक सराय से चुकते हो, दूसरी सराय में उलझ जाते हो। अपना घर कब तलाशोगे? अपनी खोज कब करोगे? धन खोजा, पद खोजा, प्रतिष्ठा खोजी; अपने को कब खोजोगे? औरों की ही खोज में लगे रहोगे? अपने से अपरिचित! और जो अपने से अपरिचित है, वह कैसे दूसरे से परिचित हो सकता है? जो अपने से ही परिचित नहीं, उसे परिचय की कला ही नहीं आती। वह दूसरों से भी अपरिचित ही रहेगा। उसका सब ज्ञान मिथ्या है, थोथा है। जो अपने से परिचित है, उसने ठीक बुनियाद रखी ज्ञान की।
अपने से परिचय का नाम ध्यान है। आत्म-परिचय की प्रक्रिया ध्यान है। और जिसने ध्यान की शिला पर अपने मंदिर को बनाया है, उसके मंदिर के शिखर आकाश में उठेंगे; बादलों को छुएंगे; चांदत्तारों का अमृत उन पर बरसेगा; सूरज की रोशनी में चमकेंगे। उसके जीवन में गरिमा होगी। और जिसने जीवन का मंदिर बना लिया, उसके मंदिर में एक दिन परमात्मा की प्रतिष्ठा होती है।
मंदिर तुम बनाओ, परमात्मा तो अपने से आ जाता है। प्रतीक्षा ही कर रहा है कि कब बनाओगे, कब भेजोगे नेह-निमंत्रण, कब पुकारोगे।
मगर पुकारो भी तो कैसे पुकारो? ठहराओगे कहां? तुम खुद ही सराय में ठहरे हो। उस मालिकों के मालिक को सराय में तो नहीं ठहराओगे! सराय में वह आएगा भी नहीं। उसके योग्य स्थान बनाना होगा।
एक सूफी कहानी है, एक सम्राट एक फकीर का बहुत सम्मान करता था। लेकिन जब भी सम्राट मिलना चाहता, फकीर कहता, मैं खुद ही आता हूं, आप परेशान न हों। और फकीर सम्राट के महल पहुंच जाता। सम्राट को जिज्ञासा लगी कि कभी फकीर मुझे अपने झोपड़े तक नहीं आने देता, राज क्या है! एक दिन बिना बताए सम्राट फकीर के झोपड़े पर पहुंच गया। फकीर तो खेत में काम करने गया था। उसकी पत्नी थी, उसने कहा, बैठें! विराजें! मैं बुला लाती हूं। दौडूंगी, जल्दी ही बुला लाऊंगी, खेत ज्यादा दूर नहीं है।
लेकिन सम्राट ने कहा, मैं यहीं टहलता हूं, तू बुला ला।
फकीर की पत्नी ने सोचा कि शायद खाली जगह में सम्राट बैठ नहीं सकता, इसलिए उसके पास जो कुछ भी था, फटी-पुरानी चटाई, वही उसने बिछा दी। कहा, आप बैठें तो!
लेकिन सम्राट ने चटाई की तरफ एक दफा देखा और कहा कि मैं टहलता हूं, तू बुला ला।
सोचा उसने कि शायद चटाई योग्य नहीं सम्राट के। तो उसके पास जो शाल थी--किसी ने फकीर को भेंट की थी--उसे बिछा दिया चटाई पर। कहा, बैठें!
लेकिन सम्राट ने कहा, मैं टहलूंगा, तू जाकर अपने पति को बुला ला, समय खराब न कर।
फकीर की पत्नी गई। जब वे दोनों वापस आ रहे थे तो राह में उसने पूछा कि सम्राट बहुत अजीब आदमी है! अपने पास जो प्यारी से प्यारी चटाई थी, वह मैंने बिछा दी। फिर तुम्हारी जो शाल थी, जिसे तुम कभी-कभी सूफियों के उत्सव में ओढ़ कर जाते थे, वह भी मैंने बिछा दी; उससे ज्यादा कीमती तो हमारे पास कुछ है नहीं। लेकिन सम्राट है कि टहल ही रहा है! वह कहता है, मैं बैठूंगा नहीं, टहलूंगा।
फकीर हंसने लगा। उसने कहा, पागल, सम्राट को बिठाना हो तो स्वर्ण-सिंहासन चाहिए। और इसीलिए तो मैं उसे बार-बार कहता था, मैं खुद ही आता हूं। हमारे घर में उसे बिठाने योग्य स्थान नहीं है।
अगर सम्राट के लिए स्वर्ण-सिंहासन चाहिए तो परमात्मा के लिए भी कोई सिंहासन भीतर बनाओ। स्वर्ण-सिंहासन परमात्मा के काम नहीं आएगा। चेतना का सिंहासन बनाओ। समाधि का सिंहासन बनाओ। बुद्धत्व का सिंहासन बनाओ। तो फिर तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार है। तत्क्षण स्वीकार हो जाता है! तुम भेजो भी नहीं निमंत्रण, तो भी परमात्मा आकर स्वयं द्वार पर दस्तक दे देता है। तुम्हारी तैयारी पूरी हुई कि परमात्मा प्रकट होता है।
लेकिन तुम पड़े हो सराय में। एक से छूटते हो तो दूसरे में उलझ जाते हो। सोचते हो शायद यह घर होगा। उससे छूटे तो तीसरे में उलझ जाते हो। और यह संसार सरायों का विस्तार है, बहुत बड़ा विस्तार है! इस संसार में उलझने की हमारी जो आदत है, उसका नाम माया है। माया से ऐसा मत समझना कि यह संसार झूठा है, जैसा कि तुम्हारे पंडित-पुरोहित, साधु-महात्मा तुम्हें समझाते हैं कि संसार असत्य है।
संसार असत्य नहीं है, तुम्हारा मन असत्य है। संसार तो परिपूर्ण रूप से सत्य है। तुम्हारी आत्मा भी सत्य है, संसार भी सत्य है। लेकिन दोनों के बीच में एक असत्य खड़ा हो गया है, उस असत्य का नाम मन है। मन माया है। और जिसे माया से मुक्त होना है उसे मन से मुक्त होना होगा।
लेकिन चूंकि महात्मा समझाते हैं--संसार माया है, तुम संसार से भागते हो। लेकिन भाग कर कहां जाओगे? जहां रहोगे वहीं संसार बन जाएगा। एक झोपड़े में रहोगे तो उसी झोपड़े से मेरा, ममत्व का भाव जुड़ जाएगा। एक वृक्ष के नीचे बैठोगे तो उसी से ममत्व हो जाएगा। कल अगर आकर कोई दूसरा उस वृक्ष के नीचे बैठ जाएगा तो तुम लट्ठ लेकर खड़े हो जाओगे कि रास्ता लगो! मैं बीस साल से इस वृक्ष के नीचे बैठता हूं, यह जगह मेरी है!
और जहां मेरा है, ममत्व है, वहीं माया है। माया यानी मेरे का भाव। फिर यह मेरे का भाव तुम किस चीज पर आरोपित करते हो, इससे भेद नहीं पड़ता। धन पर करो, पद पर करो, त्याग पर करो, धर्म पर करो--मेरा धर्म--तो वहां भी माया शुरू हो गई। और मेरा कहां से पैदा होता है? मेरा पैदा होता है मन से। मन का प्रक्षेपण है मेरा। मन गया--मेरा गया। मेरा गया--तेरा गया। और जहां न मेरा है न तेरा है, वहां जो शेष रह जाता है वही परमात्मा है।
पलटू के ये सूत्र प्यारे हैं, समझने की कोशिश करना।
माया तू जगत पियारी, वे हमरे काम की नाहिं।
कहते हैं कि माया, तू जगत भर को प्यारी है, मगर हमारे काम की नहीं है। क्यों हमारे काम की नहीं है? जिसने एक क्षण भी अ-मन की अवस्था का जान लिया, माया फिर उसके काम की नहीं है। जिसने पल भर भी झलक पा ली समाधि की, माया फिर उसके काम की नहीं है। फिर उसने देख लिया आर-पार माया का धोखा।
जैसे तुम जाते हो न सिनेमागृह में! परदे पर धूप-छाया का खेल चलता है। और तुम भलीभांति जानते हो कि धूप-छाया है, फिर भी आंदोलित हो उठते हो। कभी रोते हो, कभी हंसते हो। कभी धक से तुम्हारा हृदय बंद हो जाता है। कोई ऐसी रोमांचक घटना घटती है तो रोमांचित हो उठते हो। परदे पर कुछ भी नहीं है, तुम जानते हो, फिर भी भूल-भूल जाते हो। एक दिन सिनेमागृह में बैठ कर ऐसे देखना कि तीन घंटे सिनेमा चले तो तीन घंटे स्मरण रहे कि परदा है, परदे पर धूप-छाया का खेल है, और कुछ भी नहीं। और तुम तब बड़े हैरान होओगे। अगर तुम यह याद रख सको कि धूप-छाया है, भूलो न, तो न तो दुख पकड़ेगा, न सुख पकड़ेगा, न रोमांच होगा, न घबड़ाहट होगी, न पीड़ा होगी। परदे पर कोई मर जाए तो और परदे पर शहनाई बजे किसी के विवाह की तो--सब बराबर होगा।
ऐसी ही दशा ज्ञानी की है, ध्यानी की है, समाधिस्थ की है। उसे इस विराट के परदे पर जो भी खेल चल रहा है, वह मन का प्रक्षेपण है। वह अपने ही मन का फैलाव है। वहां कुछ भी नहीं है। जिस मकान को तुम कह रहे हो मेरा, जिस मकान के लिए तुम लड़ोगे अदालत में, जिस मकान के पीछे हाथापाई हो सकती है, सिर खुल सकते हैं, गर्दनें कट सकती हैं, लहू बह सकता है, जीवन लिए-दिए जा सकते हैं--उस मकान को पता ही नहीं है कि तुम्हारा है। उस मकान को तुम्हारी कोई खबर ही नहीं है। तुम व्यर्थ ही लड़े-मरे जा रहे हो।
भर्तृहरि के जीवन में उल्लेख है।
भर्तृहरि अदभुत व्यक्ति हैं। जैसा व्यक्ति होना चाहिए वैसे व्यक्ति हैं। पहले भोग का सारा संसार देखा और अपने भोग के सारे निष्कर्ष कुछ सूत्रों में लिखे, उन सूत्रों का नाम है: शृंगार-शतक। वे बड़े प्यारे सूत्र हैं। जगत के संबंध में भोगियों ने जो भी वक्तव्य दिए हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ हैं। चार्वाक को भी मात कर दिया। एपिकुरस को बहुत पीछे छोड़ दिया। माक्र्स और एंजिल्स किसी कोटि में नहीं आते। भर्तृहरि ने माया में जैसी महिमा देखी है अपने शृंगार-शतक में, किसी ने भी नहीं देखी।
लेकिन जो इतना गहरा माया में उतरेगा उसको एक दिन वैराग्य पैदा होने ही वाला है। होने ही वाला है, अपरिहार्य, उससे बचा नहीं जा सकता। क्योंकि माया में जो इतने गहरे जाएगा, आर-पार, वह देख लेगा माया की व्यर्थता। दूर बैठ कर देखते रहो सिनेमागृह में तो शायद तुम्हें पता भी न चले कि सामने जो है, सिर्फ तस्वीरें हैं। और यह जिंदगी ऐसा सिनेमा है जिसका न तुम्हें शुरू दिखाई पड़ता है न अंत। जैसे कि मध्य में तुम पहुंचे हो सिनेमागृह में। शुरू में पहुंचते तो परदा दिखाई पड़ता, फिर फिल्में शुरू होतीं, तो तुम्हें पता रहता। यह जीवन एक ऐसा सिनेमागृह है जिसका न कोई शुरू है न कोई अंत। तुम हमेशा मध्य में आते हो और मध्य में ही उठ जाते हो। यह खेल जारी रहता है। इसलिए तुम्हें कभी परदा खाली दिखाई नहीं पड़ता।
लेकिन काश, तुम परदे के पास जाकर टटोल कर देख लो तो तुम बड़े चकित होओगे, वहां कोई भी नहीं है, खाली परदा है! परदे पर धूप-छांव की माया है, धूप-छांव का खेल है।
भर्तृहरि ने बहुत गौर से, बहुत गहराई से संसार को भोगा। उसी भोग से उनका योग निकला। वे सब छोड़ कर जंगल चले गए।
इस छोड़ कर जाने में त्याग नहीं था, खयाल रखना। त्यागता तो वह है जिसका मोह अभी शेष हो। जिसका मोह ही न बचा उसका त्याग क्या? व्यर्थता दिखाई पड़ गई। फिर छोड़ना क्या है? छूट जाता है। सच्चा त्याग होता है, किया नहीं जाता। जो किया जाता है वह झूठा, वह कभी सच्चा नहीं।
भर्तृहरि को दिखाई पड़ गई व्यर्थता, एक दिन चल पड़े जंगल--अपनी तलाश में। झांक लिया दूसरे में, पाया कुछ भी नहीं है--अपनी ही कामनाएं, अपनी ही वासनाएं प्रक्षेपित हो जाती हैं; दूसरा परदे का काम करता है। तो अब यह भीतर कौन छिपा है, जिससे यह सारा जादू, यह सारा तिलिस्म पैदा होता है, इसकी तलाश में निकल गए।
फिर उन्होंने समाधि की अपूर्व दशा पाई और तब दूसरे सूत्र लिखे: वैराग्य-शतक। वह भी अदभुत है। जैसे शृंगार-शतक बेजोड़ है, अद्वितीय है, वैसे ही वैराग्य-शतक भी बेजोड़ है, अद्वितीय है। वैराग्य की भी इतनी गहराई और इतनी ऊंचाई और इतनी गरिमा और इतनी महिमा किसी और ने नहीं गाई। मगर यह गा सकता है कोई भर्तृहरि जैसा व्यक्ति ही। जिसने राग जाना हो वही वैराग्य जान सकता है। जिसने अंधेरा जाना हो वही रोशनी का अर्थ समझ सकता है। और जिसके पैरों में कभी कांटे चुभे हों वही फूलों की कमनीयता से परिचित हो सकता है। जिसने जहर पीया हो वही अमृत का स्वाद पहचान पाएगा।
जंगल में भर्तृहरि एक दिन बैठे हैं--एक वृक्ष के नीचे, एक शिला पर--शांत, मौन, ध्यान में लीन। तभी कोई घुड़सवार गुजरता है। घोड़े की टापों से उनकी आंखें खुल जाती हैं। क्या देखते हैं कि घुड़सवार तो चला गया हवा की भांति, लेकिन घुड़सवार के झोले से एक बहुमूल्य हीरा गिर गया और वह पड़ा है सामने भर्तृहरि के।
बेहोशी बड़ी सूक्ष्म है। एक क्षण को भर्तृहरि को मन हो आया कि उठा लूं। बस एक क्षण को! एक पुलक--बड़ा प्यारा है! बहुमूल्य दिखाई पड़ता है। हीरों के पारखी थे, जन्म ही हीरों में हुआ था, जीए ही हीरों में थे। बहुत हीरे देखे थे, लेकिन यह हीरा बहुमूल्य दिखाई पड़ रहा था--उठा लूं! लेकिन तभी हंसी आ गई कि अपने सब हीरे छोड़ कर आया हूं, वह किसलिए? और यह पराए दूसरे गिरे हीरे को उठा रहा हूं। फिर वही जाल! फिर सराय में प्रवेश! फिर किसी मूढ़ता में बंधने की आतुरता! अपने पर हंसे। और ध्यान रखना, जो दूसरों पर हंसता है वह नासमझ है। और जो अपने पर हंसता है, बुद्धिमत्ता उसकी है--बुद्धत्व उसका है।
हंसे, मुस्कुराए, मन की चालबाजी देखी। देखा कि मन अभी भी मूर्च्छित होने को कितना तत्पर है! ऐसा मस्त हो रहे थे सोच कर, मन के ये जाल देख कर, मन के प्रति साक्षी हो रहे थे। तभी देखा कि दोनों तरफ से दो घुड़सवार आए हैं, दोनों की नजर एक साथ हीरे पर पड़ी। हीरा था भी ऐसा कि नजर से बच नहीं सकता था। सुबह के सूरज में उसकी चमक अनूठी थी। उसके चारों तरफ जैसे इंद्रधनुष बुन गया हो! किरणें लौट रही थीं उससे। दैदीप्यमान था। दोनों घुड़सवारों की नजर एक साथ पड़ी। दोनों ने अपनी तलवारें म्यान से निकाल लीं और हीरे के पास टेक दीं और दोनों ने दावा किया कि पहले नजर मेरी पड़ी, इसलिए हीरा मेरा है! और भर्तृहरि देख रहे हैं। अब भर्तृहरि को और हंसी आने लगी कि यह खेल तो बढ़ने लगा! यह खेल तो अब खतरनाक हुआ जा रहा है! और देर न लगी, तलवारें चल गईं। और तलवारें ऐसी चलीं कि एक-दूसरे की छाती में घुस गईं। थोड़ी देर में दोनों ही घुड़सवार जमीन पर पड़े थे मुर्दा। हीरा अपनी जगह पड़ा था। भर्तृहरि हंसे और आंखें बंद कर लीं। और भर्तृहरि ने कहा कि अच्छा हुआ मैं नहीं उठा, नहीं तो यह गति होती। नजर तो मेरी पहले पड़ी थी, मैं झंझट में पड़ जाता।
और भर्तृहरि ने कहा कि हीरे को बेचारे को पता ही नहीं कि दो आदमी आए भी, गए भी! और हीरे पर कितना ममत्व रोप गए कि अपना जीवन चढ़ा गए। और हीरे को खबर भी नहीं है, हीरा धन्यवाद भी नहीं देगा। कभी हीरे को फिर मिल जाएंगे तो हीरा पहचानेगा भी नहीं। उस क्षण भर्तृहरि का अगर कोई सूक्ष्म राग कहीं छिपा रह गया था, वह भी तिरोहित हो गया।
माया तू जगत पियारी...
पलटू कहते हैं: सारा जगत तेरे प्रेम में पड़ा है।
वे हमरे काम की नाहिं।
लेकिन हमारे काम की तू नहीं है। हम जाग गए। हमने देख लिया तेरा असली रूप।

नयनों की अंजलि में जल भर दे दूंगी मैं शाप।
               कि चुप रह बैरी, चुप रह।

तू कागज की नाव चला ले
मन को भ्रम से तू नहला ले
मेरे मीत मगर छलिया हैं
गोताखोर बड़े बढ़िया हैं
जाल बिछा कर स्वयं न फंस री रस मुरली का ताप।
               न सह री बैरी, मत बह।

पानी बिना कमल कब खिलता
प्यासे से पानी कब मिलता
यह गुलाब का रंग धूल में
मिल जाएगा बस न भूल में
देख सुहागिन मेरी चुनरी, जा अपना पथ नाप।
                  कि सुन री बहरी, मत ढह।

सोने के हैं देव किसी के
चांदी सी मैं उनकी रानी
सुरभि-सिंगार परस पारस को
अमृत पा जाता है पानी
मनमानी मत कर पगली री, जल मत मद में आप।
                    कि सुन री बैरिन, मत कह।
तू कागज की नाव चला ले
मन को भ्रम से तू नहला ले
मेरे मीत मगर छलिया हैं
गोताखोर बड़े बढ़िया हैं
जाल बिछा कर स्वयं न फंस री रस मुरली का ताप।
             न सह री बैरी, मत बह।
नयनों की अंजलि में जल भर दे दूंगी मैं शाप।
               कि चुप रह बैरी, चुप रह।

एक दफा दिखाई पड़ना शुरू हो जाए तो सब नावें कागज की हैं और सब घर बालू से बने हैं। और सब सपने पानी पर खींची गई लकीरें हैं। और हम कितने दौड़ते हैं, कितना श्रम लेते हैं, कितना गंवाते हैं--कुछ कमाने की आशा में! और फिर खाली हाथ जाते हैं। और ऐसा नहीं है कि कमाई नहीं हो सकती है; कमाई हो सकती है, मगर हमारी दिशा गलत है।
पलटू कहते हैं: द्वारे से दूर हो लंडी रे, पइठु न घर के माहिं।
कहते हैं: आगे बढ़! माया से कहते हैं: आगे बढ़! अब कागज की नावें मैं नहीं चलाऊंगा। रेत में भवन मैं नहीं बनाऊंगा। पानी के बबूलों पर मैं नहीं अब अपनी अभीप्साएं रोपूंगा। आगे बढ़! जैसे कोई भिखमंगों को कह दे कि आगे बढ़ो!
और माया को कहते हैं दासी। साधारणतः तो आदमी माया का दास है। सारे लोग माया की सेवा में लगे हैं। फिर चाहे धन, चाहे पद, चाहे प्रतिष्ठा--क्या तुम्हारी माया का नाम है, इससे भेद नहीं पड़ता, तुम सेवा में संलग्न हो। लेकिन जो जागते हैं, जरा सा भी जागते हैं, उन्हें दिखाई पड़ता है कि हम मालिक हैं। हम उस मालिक के हिस्से हैं, हम मालिक ही हो सकते हैं।
उपनिषद कहते हैं: उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लो, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है।
हम उस मालिक के हिस्से हैं, इतना ही नहीं; वह मालिक कुछ ऐसा है कि उसके हिस्से हो नहीं सकते। तो जब भी हम उस मालिक से आते हैं, पूरा का पूरा मालिक हमारे भीतर होता है।
पी.डी.ऑस्पेंस्की ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ टर्शियम आर्गानम में लिखा है कि दुनिया में दो तरह के गणित हैं। साधारण गणित। साधारण गणित का नियम है--आधारभूत नियम--कि अंश हमेशा अंशी से छोटा होता है। स्वभावतः, किसी चीज का हिस्सा उस पूरी चीज से छोटा होगा ही। एक पत्ते को तुम तोड़ लोगे तो पत्ता वृक्ष से छोटा होगा। फूल की एक पंखुड़ी को तोड़ोगे तो फूल से पंखुड़ी छोटी होगी। यह साधारण गणित है, ऑस्पेंस्की कहता है। और वह यह कहता है कि एक और भी गणित है--महागणित, पारलौकिक गणित।
उपनिषद जब कहते हैं कि पूर्ण से पूर्ण को निकाल लो, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है और पूर्ण में तुम पूर्ण को डाल दो तो भी पूर्ण बढ़ता नहीं--न घटता, न बढ़ता--यह किसी दूसरे गणित की बात हो रही है।
ऑस्पेंस्की कहता है: उस दूसरे गणित का नियम है--अंश अंशी के बराबर होता है, छोटा नहीं होता। साधारण गणित के हिसाब से बूंद सागर से छोटी है, बहुत छोटी है; महागणित के हिसाब से बूंद में सागर समाया हुआ है, बूंद सागर के बराबर है। क्योंकि जो राज सागर का है वही बूंद का है। आकार पर न जाओ, प्रकार पर मत जाओ--ये तो ऊपर की बातें हैं। भीतर के राज समझो, भीतर के रहस्य में झांको। एक बूंद में पानी का सारा रहस्य छिपा हुआ है। अगर हम एक बूंद को पूरा-पूरा समझ लें तो हमने सारे संसार के सागरों को समझ लिया। और इतना ही नहीं, जो गहरे गए हैं वे कहते हैं कि अगर हम एक बूंद को पूरा समझ लें तो हमने पूरे अस्तित्व को पूरा समझ लिया। क्योंकि एक बूंद में सब समाया हुआ है। बूंद में सब राजों का राज छिपा हुआ है।
फूल की एक पंखुड़ी को तुम पहचान लो तो तुमने सारे विश्व को पहचान लिया। क्योंकि फूल की एक पंखुड़ी में सारा विश्व समाया हुआ है, सारे विश्व का हाथ है, दान है। सूरज कुछ दे गया है, सागर कुछ दे गया है, चांद कुछ दे गया है, तारे कुछ दे गए हैं। सबने दान दिया है, तब फूल निर्मित हुआ है।
और अगर पूर्ण से पूर्ण को भी निकाल कर पीछे पूर्ण शेष रहता है, तो फिर कुछ अड़चन नहीं है। हम मालिक हैं, क्योंकि हम मालिक के हिस्से हैं। और हम पूरे-पूरे मालिक हैं। हम अंश ही नहीं, अंशी हैं। इसलिए उपनिषद कह सके: अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! इसलिए मंसूर कह सका: अनलहक! मैं सत्य हूं! मैं परमात्मा हूं! इसलिए जीसस कह सके कि मुझमें और मेरे पिता में कुछ भी भेद नहीं है; हम दोनों एक हैं, एक के ही दो नाम हैं।
द्वारे से दूर हो लंडी रे...
हे दासी, हट द्वार से!
पइठु न घर के माहिं।
सुन, घर के भीतर प्रवेश मत करना! इधर मैं मालिक हूं। पलटू कहते हैं: मैं मालिक हूं, यहां रास्ता नहीं है तेरे लिए। वहां जा जहां गुलाम हैं। वहां जा जहां लोग तेरे पैर दबाने को आतुर हैं। मैंने तो तुझे देख लिया। अब ये छायाएं मुझे धोखा नहीं दे सकतीं।
माया आपु खड़ी भई आगे, नैनन काजर लाए।
हालांकि माया बहुत लुभाएगी, आंखों में काजल लगाएगी, आगे-आगे खड़ी हो जाएगी। तुम बाएं मुड़ोगे, दाएं मुड़ोगे; तुम इधर जाओगे, तुम उधर जाओगे; हमेशा आगे-आगे आएगी। रिझाएगी।
माया आपु खड़ी भई आगे, नैनन काजर लाए।
नाचै गावै भाव बतावै, मोतिन मांग भराए।।
मोतियों से मांग भरेगी अपनी। सुंदर-सुंदर रूप धरेगी। नाचेगी, गाएगी, बहुत तरह के भाव बताएगी। और सारा मजा यह है कि ये सब तुम्हारे ही मन के खेल हैं। ये मोती तुम्हीं उसकी मांग में भर रहे हो। और ये नाच-गान तुम्हीं उसमें डाल रहे हो। यह जो माया का सौंदर्य है, यह तुम्हारी कल्पना की सृष्टि है। लेकिन बड़ी भूल हो रही है समझने में, क्योंकि प्रोजेक्टर, वह जो प्रक्षेपण का यंत्र है, पीछे है।
तुम जब फिल्म देखते हो, तुम्हारी नजर तो परदे पर लगी होती है, लेकिन असली खेल परदे पर नहीं है, असली खेल तो पीछे है। तुमसे पीछे जो दीवाल है पीठ की तरफ, वहां प्रोजेक्टर है, वहां से खेल चल रहा है। प्रत्येक व्यक्ति का मन एक प्रोजेक्टर है, एक प्रक्षेपण यंत्र है। सामने खेल दिखाई पड़ रहा है। और इसलिए तुम्हें भ्रांति हो जाती है कि खेल वहां होना चाहिए जहां दिखाई पड़ रहा है। लेकिन तुम्हारा मन सारा खेल फैला रहा है। जिन्होंने मन को पूर्णतया शांत कर दिया है वे बड़े चकित हुए--मन के शांत होते ही सारा खेल खो जाता है! माया विलीन हो जाती है! लेकिन यह भ्रांति स्वाभाविक है, क्योंकि तुम्हारी नजरें आगे टिकी हैं, तुम कुछ का कुछ समझ रहे हो।
गर्मियों की छुट्टियों में शहर से गांव लौटे नौजवान चंदूलाल की दोस्ती गांव की एक लड़की से हो गई। धीरे-धीरे संबंध आगे बढ़े, मेल-मुलाकातें बढ़ीं। एक दिन खेत में शाम के वक्त वे दोनों घूम रहे थे, पास ही में एक गाय और बछड़ा आपस में मुंह रगड़ रहे थे। चंदूलाल ने उनकी ओर इशारा करते हुए शरमा कर डरते-डरते अपनी प्रेमिका से कहा, बुरा न मानना, मेरा मन भी ऐसा ही करने का होता है।
प्रेमिका बोली, अरे इसमें बुरा मानने की क्या बात है! और इतना डर क्यों रहे हो? शौक से करो। आखिर यह गाय मेरे चाचाजी की ही तो है, इसमें शरमाने की बात ही क्या है?
चंदूलाल कुछ कह रहे हैं, चंदूलाल की प्रेयसी कुछ और समझ रही है। कुछ है, और कुछ समझा जा रहा है। बस यही माया है, यही भ्रांति है, यही हमारा भटकाव है।
रोवै माया खाय पछारा, तनिक न गाफिल पाऊं।
जब देखौं तब ज्ञान ध्यान में, कैसे मारि गिराऊं।।
और अगर तुम नाचने-गाने से न माने, तो माया रोएगी भी, छाती भी पीटेगी।
रोवै माया खाय पछारा...
पछड़-पछड़ जाएगी, गिर-गिर पड़ेगी। लेकिन पलटू कहते हैं: मुझे उलझाने का कोई उपाय नहीं है--न तेरा नाच, न तेरा गीत, न तेरा रोना, न तेरा पछाड़ खाकर गिर पड़ना। मैं जानता हूं कि सब मेरे मन का खेल है, इसलिए मैं गाफिल नहीं हूं। मैं होश से भरा हूं। मैं जागा हुआ हूं। तू कर अपने सारे खेल, तू दिखा अपने सारे खेल। मैं जानता हूं भलीभांति कि ये सब खेल मेरे ही निर्मित हैं। मैंने ही अतीत में ये बीज बोए थे जो आज फसल बन कर खड़े हो गए हैं।
सरकारी राशन की दुकान के सामने बहुत भीड़ लगी हुई थी और एक व्यक्ति, जो कि बगल में एक बड़ा सा थैला दबाए हुए था, बार-बार भीड़ को चीर कर आगे निकल जाने की कोशिश कर रहा था। मगर भीड़ भी आखिर भीड़, कैसे कोई आगे निकल जाए! वह बार-बार धक्के मार-मार कर उस व्यक्ति को पीछे धकेल देती थी। जब तीन घंटे हो गए और वह व्यक्ति धक्के खा-खा कर परेशान हो गया, तो भीड़ को संबोधित करके बोला कि भाइयो एवं बहनो, यदि आप लोगों ने मुझे आगे नहीं जाने दिया तो मैं तुम्हें कहे देता हूं कि दुकान आज फिर बंद ही रहेगी। क्योंकि दुकान खोलूंगा तो मैं ही न!
वह दुकान का मैनेजर है, उसके बिना दुकान नहीं खुल सकती।
माया की कुंजी तुम्हारे मन के पास है। तुम जरा मन को एक तरफ हटा कर रख दो, फिर लाख माया उपाय करे, दुकान नहीं खुल सकती। तुम्हारे भीतर माया की कुंजी है, यह हमारा सौभाग्य! कुंजी किसी और के पास होती तो शायद इस संसार में फिर मुक्त होने का कोई उपाय न था। फिर तो मुक्ति भी एक तरह की गुलामी होती; कोई दूसरा मुक्त करता तो हम मुक्त होते। लेकिन चूंकि कुंजी हमारे पास है, यह हमारा चुनाव है। हम चाहें तो गुलाम रहें और चाहें तो मालिक हो जाएं।
पलटू कहते हैं: हम तो मालिक हो गए हैं, इसलिए हम पर अब तेरा जोर न चलेगा।
जब देखौं तब ज्ञान ध्यान में...
मैं तो तुझे ज्ञान और ध्यान के जगत से देख रहा हूं। मैं तो अपने साक्षी-भाव में थिर हूं। और मेरे साक्षी-भाव में अगर कोई भी बात है तो बस एक ही है कि कैसे तुझे मार गिराऊं। सदा के लिए कैसे तुझे मार गिराऊं कि तेरा उठना ही संभव न रह जाए। इतना तो हो गया है कि मैं जाग गया हूं और तू मुझे धोखा नहीं दे पाती; लेकिन इतना अभी नहीं हुआ है, इतना नहीं जाग गया हूं कि तेरा आना ही बंद हो जाए। अधजगा हूं!
ऐसी थोड़ी-थोड़ी, जैसे सुबह कभी-कभी तुम्हारी अवस्था होती है--नींद भी नहीं, जागे भी नहीं, थोड़ा-थोड़ा जाग भी गए हैं। राह पर कोई गुजरता है तो आवाज भी सुनाई पड़ती है। बच्चे स्कूल जाने की तैयारी करते हैं तो आवाज सुनाई पड़ती है। पत्नी चौके में चाय बनाने लगी है तो केतली में होती आवाज सुनाई पड़ती है। चाय की गंध भी तुम्हारे नासापुटों तक आने लगी है। सुबह के सूरज की किरणें तुम्हारे चेहरे पर पड़ रही हैं, उनकी गर्मी भी मालूम हो रही है। लेकिन फिर तुम एक करवट लेकर सो गए हो। सोचते हो: अभी और पांच-दस मिनट। सोए भी नहीं हो, जागे भी नहीं हो।
ध्यान की अवस्था का अर्थ होता है: न तो सोए, न जागे। और समाधि का अर्थ होता है: पूर्णतया जागे। समाधि ध्यान की ऐसी समग्रता है कि जिससे फिर नीचे नहीं गिरा जा सकता। लेकिन ध्यान से तो चूक होती है। ध्यान से तो बहुत बार तुम चूक जाओगे। स्मरण करते-करते भूल जाओगे।
मेरी बीबी मुझे आदमी नहीं, जानवर भी नहीं, बल्कि कीड़ा-मकोड़ा समझती है--मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन मुझसे कह रहा था। वह अक्सर मुझे मक्खी, मच्छर, तिलचट्टा, भुनगा आदि भी कहती है। और कभी-कभी बहुत गुस्से में तो चींटा, जुआं, दीमक तक कह बैठती है। और आजकल इतना ही नहीं, वह मुझे पिस्सू तक कहने लगी है।
अरे बड़ी दुष्ट स्त्री है--मैंने उससे कहा--ऐसी बुरी स्थिति में आखिर तुम करते क्या हो?
मैं क्या करूंगा भला--नसरुद्दीन ने भयभीत स्वर में जवाब दिया--बस इतना ही करता हूं कि डी.डी.टी., फ्लिट वगैरह घर में नहीं रखता कि कहीं मुझ पर छिड़क कर प्राण ही न ले ले। और मलेरिया वाले जब छिड़काव के लिए आते हैं तो उन्हें बाहर से ही दस-पांच रुपये देकर भगा देता हूं।
अब अगर बीबी जनम भर से यही कह रही हो कि तुम तिलचट्टा हो, भुनगा हो, सुनते-सुनते भरोसा आ गया होगा। सम्मोहित हो गया होगा। किसी चीज की पुनरुक्ति बार-बार की जाए तो हमें उस पर भरोसा आने लगता है।
ऐसे ही तुम्हें माया पर भरोसा आया है। जन्मों-जन्मों की पुनरुक्ति है। अनंत काल से तुम्हारा मन यही बातें दोहराता रहा है--और धन, और पद, और प्रतिष्ठा, और यश! और-और की धुन लगा रखी है। चौबीस घंटे और-और के लिए तड़फ रहा है। तुम उसकी धुन सुनते-सुनते, सुनते-सुनते सम्मोहित हो गए हो। माया है सम्मोहन, एक तरह का भ्रम, जो निरंतर दोहराने से सत्य जैसा मालूम होने लगा है। अब पत्नी ही नहीं मानती कि नसरुद्दीन पिस्सू है, नसरुद्दीन भी मानने लगा है--और भयभीत है, और डरा हुआ है।
माया का यह जो तुम्हारा सम्मोहन है, संतों की सदा से एक ही चेष्टा रही--कैसे तुम्हें झकझोर दें! कैसे तुम्हें इतना हिला दें कि तुम्हारा यह सुनिश्चित हो गया सम्मोहन टूट जाए! कैसे तुम्हें असम्मोहित कर दें! इसलिए निरंतर बुद्धपुरुष चिल्लाते रहे हैं। तुम सुनो कि न सुनो, पुकारते रहे हैं। तुम मानो कि न मानो, तुम उन्हें सूली चढ़ाओ कि तुम उन पर पत्थर फेंको, मगर वे हैं कि अपने धुन के मस्त, वे तुम्हें पुकारते ही चले जाते हैं। क्योंकि उन्हें दिखाई पड़ता है कि सिर्फ तुम्हारी मान्यता ने अड़चन डाल दी है।
एक बार मेरे पास एक आदमी को लाया गया। उसका मस्तिष्क कुछ विक्षिप्त जैसा हो गया था। उसे यह भ्रांति हो गई थी कि दो मक्खियां उसके भीतर घुस गई हैं, क्योंकि वह मुंह खोल कर सोता है और दो मक्खियां एकदम भीतर चली गईं, अब वे निकलती ही नहीं हैं। वे भीतर भनभन-भनभन- भनभन कर रही हैं। पेट में जाती हैं, कभी सिर में चली जाती हैं, कभी पैर में घुस जाती हैं। अब मक्खियों का क्या! डाक्टरों के पास ले जाया गया, बहुत चिकित्सा की गई। उसकी क्या चिकित्सा हो सकती है? कोई बीमारी हो तो चिकित्सा हो जाए! माया कोई बीमारी नहीं है कि उसकी चिकित्सा हो जाए। इसलिए माया की कोई औषधि नहीं है। परेशान हो गए घर के लोग। उसकी पत्नी उसे मेरे पास ले आई, कहा कि हम आपके सिवाय अब कहां जाएं? हम परेशान हो गए हैं। आप ही कुछ करो।
मैंने कहा कि यह मेरा धंधा ही है। तू ठीक जगह आ गई। इतने दिन तू भटकी क्यों? लोगों को मक्खियों से छुड़ाना, यही मेरा काम है।
उसने कहा, क्या और लोग भी इस तरह के हैं? मैं तो सोचती थी यह बीमारी मेरे पति को ही हुई है।
मैंने कहा, तू फिक्र छोड़। यह सभी पतियों को है। पत्नियों को भी है। पहले इसकी छुड़ा दूंगा, फिर तेरी छुड़ा दूंगा।
लेकिन मुझे--उसने कहा--है ही नहीं।
मैंने कहा, तू समझी नहीं बात। अलग-अलग तरह की मक्खियां हैं। बीमारी बहुत ढंग से आती है यह।
उसने कहा, होगा। आप आध्यात्मिक बातें न करें, मेरे पति का किसी तरह ये दो मक्खियों से छुटकारा दिलवा दें बस।
पति ने कहा कि बहुत मुश्किल है। कितना तो इलाज करवा चुके। कितनी दवा पी चुका। दवा पी-पी कर परेशान हो गया। क्योंकि मैं दवा पीता हूं, दवा पेट में गई, मक्खियां सिर में चली जाती हैं। आखिर मक्खियों का दवा कैसे पीछा करे!
मैंने कहा कि तू घबड़ा मत। उसे मैंने कहा, तू लेट जा बिस्तर पर, आंख बंद कर ले। ये मक्खियां हैं, मेरी समझ में आ रही हैं।
उसने कहा, आप पहले आदमी हैं। अब तक जितने डाक्टरों के पास गया, वे सब कहते हैं, यह सब मन का खयाल है।
मैंने कहा, गधे हैं। अरे मक्खियां कहीं मन का खयाल! और यह तो साफ दिखाई पड़ रही हैं कि तेरे भीतर घूम रही हैं!
उसने कहा, हाथ में हाथ दीजिए। आप पहले आदमी हैं जिस पर मुझे भरोसा आया। आप शायद कुछ कर पाएं। क्योंकि मुझे उन पर शक पहले ही हो जाता, जब वे कहते हैं कि ये मक्खियां हैं ही नहीं, ये क्या खाक मेरा इलाज करेंगे! जो बीमारी ही नहीं मान रहे, जो मुझ पर संदेह कर रहे हैं, जो मेरा प्राण लिए ले रही हैं मक्खियां--न सो सकता, न बैठ सकता, न काम कर सकता--क्योंकि भनभन-भनभन, उनका चक्कर जारी है। इधर मैं इतना परेशान हो रहा हूं और इन सज्जनों को सूझी हैं ज्ञान की बातें कि मक्खियां हैं ही नहीं, बस मन का खयाल है। अरे मन का खयाल, मैं क्या कोई पागल हूं!
पागल कभी नहीं मानते कि वे पागल हैं।
मैंने कहा, तुम और पागल! तुम बिलकुल समझदार आदमी हो। तुम गिनती तक ठीक कर रहे हो। दो मक्खियां, बिलकुल दो हैं। तुम लेट जाओ बिस्तर पर, आंख बंद कर लो।
उसकी आंख पर मैंने पट्टी बांध दी और मैंने कहा कि तुम विश्राम करो, मैं जरा मक्खियों को पकड़ने की कोशिश करता हूं। कभी मैंने उसका पैर दबाया, कभी उसका पेट दबाया। वह बड़ा प्रसन्न था कि एक आदमी तो मिला जो मानता है। कभी उसके सिर पर हाथ रखा।
उसने कहा, हां, बिलकुल यहीं हैं।
फिर मैं भागा घर में। मैंने फिक्र की कि किसी तरह दो मक्खियां पकड़ लूं। अब कभी मक्खियां पकड़ी नहीं थीं पहले, बामुश्किल...पड़ोसी के पास गया, पड़ोसी के घर में मिल गईं मक्खियां। और वे भी मिलीं ऐसे कि उनकी तेल की बोतल, खोपड़े के तेल की बोतल, वह कभी-कभी मैं देखता था धूप में रखी पिघलने के लिए सर्दी के दिनों में, उसमें मुझे मक्खियां दिखाई पड़ती थीं। तो मैंने उनसे कहा कि तुम्हारी बोतल आज काम आ जाएगी, वे दो मक्खियां उसमें से निकाल दो।
वे दो मक्खियां निकाल कर लाया, एक शीशी में बंद कीं। जंतर-मंतर जो भी करने थे वे किए। आखिर उस आदमी की आंख खोलीं। बोतल उसके हाथ में थमा दी। उसने कहा कि यह कोई बात हुई! ये रहीं मक्खियां! उसने कहा, बुलाओ मेरी पत्नी को! मूरख मेरा तीन साल से प्राण खाए जा रही है कि छोड़ो, ये मक्खियां हैं ही नहीं, तुम नाहक...! अब ये मक्खियां कहां से आईं?
उसकी पत्नी को मैंने कहा कि अब तू मत कहना कुछ और, तू मान लेना कि हां, हमारी गलती थी। वह आदमी ठीक हो गया। वे मक्खियां गईं। वह भनभन गई। वह झंझट उसकी समाप्त हुई।
बहुत बार बुद्धपुरुषों को तुम्हारे लिए न मालूम कितने उपाय ईजाद करने पड़े हैं, क्योंकि तुम्हारी बीमारी मौलिक रूप से व्यर्थ है और झूठी है। इसलिए कोई उपाय वस्तुतः सत्य नहीं है। इसलिए सारे बुद्धों ने कहा है: एक दिन उपाय भी छोड़ देना। क्योंकि उपाय सिर्फ तुम्हारी झूठी बीमारी को अलग करने के लिए है। जैसे एक कांटे से दूसरा कांटा निकाल लें, फिर दोनों को फेंक दें।
पलटू कहते हैं: रोवै माया खाय पछारा, तनिक न गाफिल पाऊं।
बस इतना ही खयाल रखता हूं कि तनिक भी अपने को गाफिल न पाऊं, क्योंकि मैं गाफिल हुआ कि माया का कब्जा हुआ। मैं होश में रहूं तो माया का कब्जा नहीं होता।
जब देखौं तब ज्ञान ध्यान में, कैसे मारि गिराऊं।
बस एक ही सुरति बंधी है, एक ही टेक लगी है, कि कब ऐसा प्रज्वलित प्रकाश मेरे भीतर हो जाए जो कभी न बुझे! कब ऐसी ज्योति जल उठे ज्ञान की, ध्यान की, कि उसकी रोशनी में यह माया फिर निर्मित न हो सके। यह निर्मित अंधेरे में ही हो सकती है। और जब तक अंधेरा है तब तक तुम लाख बचो, बच नहीं पाओगे।
चंदूलाल ने अदालत में अपनी पत्नी से तलाक लेने के लिए अर्जी दी थी। तलाक की अर्जी में उन्होंने शिकायत की थी कि उनकी पत्नी लगातार पिछले तीस वर्षों से कोई न कोई वस्तु, जैसे बेलन, गुलदान, थाली इत्यादि फेंक-फेंक कर मार रही है। मजिस्ट्रेट ने चंदूलाल से कहा, चंदूलाल, तुम्हारी शिकायत समझ में आती है, बिलकुल ठीक है। पत्नियां इस तरह के कार्य करती हैं, यह ज्ञात है। मैं भी शादीशुदा हूं। लेकिन तुम्हारी पत्नी पिछले तीस वर्षों से बेलन, गुलदान और न जाने क्या-क्या फेंक-फेंक कर मारती रही और तलाक के लिए अर्जी तुम आज दे रहे हो!
चंदूलाल ने कहा, क्या करूं हुजूर, पहले तो जब यह बेलन इत्यादि फेंक कर मारती थी तो निशाना चूक जाता था, लेकिन कल से इसका निशाना बिलकुल अचूक हो गया है। अब इसके साथ जीना बिलकुल असंभव है, बिलकुल मुश्किल है। और मैं जागा रहता हूं तब मारती है, तो सिर बचा लेता हूं, उचक कर जगह से हट जाता हूं। मगर मैं सोया रहता हूं तब भी मारती है। और निशाना इसका अचूक हो गया है। अब नहीं चल सकता यह संबंध।
नींद में तुम हो और किसी का निशाना अचूक हो, तब तो बचने का उपाय भी नहीं। ऐसी ही दशा है। माया से तलाक लो। माया से तलाक का नाम संन्यास है। और माया से तलाक का अर्थ क्या होता है? यह नहीं होता कि भाग खड़े हुए जंगल की तरफ। माया के तीर जंगल तक पहुंच जाएंगे, अगर तुम नींद में हो। माया का फैलाव बड़ा है। दूर-दूर तक उसके तीर पहुंच जाएंगे। इसलिए सवाल भागने का नहीं है, जागने का है। तुम जहां हो वहीं जाग जाओ, फिर माया का कोई तीर तुम तक नहीं पहुंच सकता। माया ही मर जाती है। इधर तुम जागे कि माया मरी। तुम जब तक सोए हो, माया जीवित है। तुम्हारी निद्रा ही माया है।
इसलिए बुद्ध ने कहा है: मूर्च्छा माया है। संसार नहीं, मूर्च्छा। महावीर ने कहा है: निद्रा माया है। संसार नहीं, निद्रा।
रिद्धि-सिद्धि दोई कनक समानी, बिस्तु डिगन को भेजा।
और वे कहते हैं: जैसे-जैसे मेरा ध्यान सम्हल रहा है, वैसे-वैसे माया नई अड़चनें खड़ी कर रही है, ऋद्धि-सिद्धियां भेज रही है। अब उसने और सूक्ष्म उपाय खोजने शुरू किए हैं। अब धन नहीं भेजती, क्योंकि धन की व्यर्थता मैंने देख ली। अब पद नहीं भेजती, पद की व्यर्थता मैंने देख ली। अब ऋद्धि-सिद्धियां आनी शुरू हो गई हैं। अब मेरे हाथ में चमत्कार की शक्ति आ रही है कि मिट्टी छुऊं तो सोना हो जाए, कि मुर्दे को छुऊं तो मुर्दा जग जाए।
पलटू कहते हैं: मैं भलीभांति पहचानता हूं, ये भी माया के अंतिम जाल हैं। और अगर मैं इनमें उलझ गया तो वापस पुनः गिर पडूंगा, ये सारी ऊंचाइयां खो जाएंगी। फिर वहीं के वहीं।
मन सब तरह के उपाय करता है अपने को बचाने के। ऋद्धि-सिद्धियां मन को बचाने के उपाय हैं। और बड़े सूक्ष्म उपाय हैं। और ऐसे प्रीतिकर और ऐसे मधुर और ऐसे स्वादिष्ट, कि छोड़ने का मन न हो। मन जहर भी देगा तुम्हें, तो शक्कर चढ़ा कर देता है, शक्कर में पाग कर देता है।
रिद्धि-सिद्धि दोई कनक समानी, बिस्तु डिगन को भेजा।
मुझे डिगाने को, मुझे हिलाने को, मेरे ध्यान को खंडित करने को, मेरी निश्चल हो गई झील में लहरें उठाने को अब ये ऋद्धियां-सिद्धियां आ रही हैं।
तीन लोक में अमल तुम्हारा, यह घर लगै न तेजा।
लेकिन खयाल रखो, होगा तीन लोकों में तुम्हारा विस्तार, मगर इस घर में तुम्हारा तीर नहीं लगेगा। ऋद्धि-सिद्धि भी मुझे धोखा नहीं दे पाएंगी।
इसलिए सच्चा साधु चमत्कार नहीं करता, सिर्फ झूठे साधु! सच्चा साधु चमत्कार नहीं कर सकता। क्योंकि चमत्कार करने का अर्थ ही यह हुआ कि गिर गया समाधि से, पहुंचते-पहुंचते चूक गया, शिखर छूने-छूने के करीब था कि फिर भटक गया। फिर ऋद्धि-सिद्धियों का अहंकार खड़ा हो जाएगा।
तीन लोक में अमल तुम्हारा, यह घर लगै न तेजा।
पलटू कहते हैं: लेकिन तू भी जान रख, इस घर में तेरा तेजा न चलेगा, तेरा तीर न चलेगा। इस घर में तेरी गति नहीं होगी। चलता होगा तीन लोक में तेरा अमल। तू जान, तेरे तीन लोक जानें।
तू क्या माया मोहिं नचावै...
बड़ा प्यारा वचन है। कहते हैं: क्या तू मुझे नचाएगी!
मैं हौं बड़ा नचनिया।
मैंने कई को नचाया है। मैं खुद नचाने का धंधा ही करता रहा हूं। मेरा काम ही यह है, मेरा व्यवसाय ही यह है। तू मुझे क्या नचाएगी?
इहवां बानिक लगै न तेरी...
यहां तेरा दांव चलने का नहीं है।
मैं हौं पलटू बनिया।
तू खयाल रख! मैं पलटू बनिया हूं, मैंने बहुतों को नचाया है। मैं सब धोखेधड़ियां जानता हूं। ऐसी कौन धोखाधड़ी है जो मैंने नहीं की? ऐसी कौन सी जालसाजी है जो मैंने नहीं की? ऐसी कौन सी बेईमानी है जो मैंने नहीं की?
मैं हौं पलटू बनिया।
मैंने यह सब व्यापार खूब कर लिया है, जन्मों-जन्मों से कर लिया है। मैं कोई सीधा-सादा ब्राह्मण नहीं हूं कि पूजा-पाठ करके बैठा रहा हूं। मैंने सब जुए खेल लिए हैं।
प्यारी बात कह रहे हैं, ठीक बात कह रहे हैं। मैंने सब धंधे, सब गोरखधंधे कर डाले हैं। तू मुझे नहीं नचा सकेगी।
इसलिए मैं भी तुमसे कहता हूं: जीवन से भागना मत, नहीं तो माया तुम्हें कहीं भी उलझा लेगी। तुम कच्चे रहोगे। तुम्हें माया के जालों का अनुभव ही न होगा। तुम संसार में जीओ ठीक से और माया के सारे खेल पहचान लो। संसार माया के खेल पहचान लेने के लिए परम अवसर है। भागो मत। तुम भी किसी दिन ऐसी समर्थ अवस्था में हो जाओ, यह मैं चाहता हूं, कि कह सको कि मैं हूं बड़ा नचनिया! मैंने बड़े-बड़ों को नचा दिया है, तू मुझे न नचा सकेगी।
इहवां बानिक लगै न तेरी, मैं हौं पलटू बनिया।
पाप कै मोटरी बाम्हन भाई, इन सब ही को बगदाई।
तूने सबको भटका दिया। बाम्हन भाई को भी भटका दिया। बिचारा भोला-भाला है, धोखाधड़ी कभी की नहीं। किताबों का कीड़ा है। रटता रहा ऋचाएं वेद की।
पाप कै मोटरी बाम्हन भाई, इन सब ही को बगदाई।
और तूने ब्राह्मण के सिर पर भी पाप की पोटरी रख दी। उस पर भी तेरी चाल चल गई।
साइत सोधिकै गांव बेढ़ावै, खेत चढ़ाय के मूंड़ कटावै।
उस ब्राह्मण को, जो दूसरों के लिए मुहूर्त देखता है, जो गांव भर को रास्ता बताता है--उसको भी भरमा दिया!
रास वर्ग गन मूर को गाड़ि...
कुंडली मिला कर, जन्मकुंडली बना कर जो लोगों के नक्षत्रों का तालमेल बिठाता है...
घर कै बिटिया चौके रांड़ि।
उसकी खुद की बेटी घर में विधवा होकर बैठी है! और फिर भी लोग ऐसे मूढ़ हैं कि उससे जाकर अपनी जन्मकुंडली मिलवा रहे हैं।
और सभन को गरह बतावै, अपने गरह को नाहिं छुड़ावै।
दूसरों को बताता है कि तुम पर ग्रहों का चक्कर है और खुद ग्रहों के चक्कर में पड़ा है, उनसे छूट नहीं पाता। भोला-भाला है बेचारा। थोथा पांडित्य है उसके पास। उसको शायद तूने धोखा दे दिया हो। मगर...
इहवां बानिक लगै न तेरी, मैं हौं पलटू बनिया।
यहां तेरी चालबाजियां न चलेंगी। तू अगर सेर है तो मैं सवा सेर हूं। मैं तेरे हर धोखे को पहचान लूंगा, क्योंकि हर धोखा मैं कर गुजरा हूं। ऐसा कौन सा धोखा है जो मैंने नहीं किया! मैंने बहुतों की जेबें काटी हैं। तू आगे बढ़!
किसी शहर में दो देहाती सड़क के बीचों-बीच चल रहे थे। चौराहे पर खड़े हुए पुलिसमैन ने कहा, भाई साहब, किनारे से चलिए।
दोनों फुटपाथ पर आकर कहने लगे, अजीब आदमी है, खुद तो सड़क के बीचों-बीच खड़ा है और हमें फुटपाथ पर चलने को कह रहा है!
ऐसी ही अवस्था तुम्हारे ब्राह्मण की है। उसकी कौन सुने! कौन उसकी माने! लोग देखते तो हैं कि उसकी खुद की हालत खराब है, वह खुद ही तो भीख मांगता फिर रहा है। अपना जीवन तो सुधार नहीं पाया है, दूसरों को समझा रहा है। लेकिन पलटू जैसे लोग जब रूपांतरित होते हैं तो जरूर लोग उनकी बात सुनते हैं, क्योंकि जीवन में परिपक्व होकर आए हैं, अनुभव लेकर आए हैं। पंडित तो केवल औपचारिक बातें करता है। बातें ही बातें हैं, उन बातों में कुछ सार नहीं। बात में कुछ बात नहीं है। थोथी है। बिलकुल औपचारिक है। क्रियाकांड है। और क्रियाकांड के कारण खुद भी मुसीबत में पड़ा है और दूसरों को भी मुसीबत में डालता है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर लखनऊ से मियां बदरुद्दीन मेहमान बन कर रुके। सुबह दोनों को एक साथ पाखाना जाने का हुआ। तहजीब के अनुसार नसरुद्दीन ने कहा, पहले आप!
बदरुद्दीन कैसे पीछे रहते। वे बोले, जी नहीं, पहले आप।
मुल्ला बोले, जी नहीं, पहले आप!
लेकिन बदरुद्दीन बोले, अजी नहीं मियां, पहले आप।
तो नसरुद्दीन ने बड़े इत्मीनान से कहा, मियां, हमारा तो यहीं हो गया। अब आप ही जाइए।
औपचारिकताएं--पहले आप! पहले आप! किसी को प्रयोजन नहीं है, लेकिन चलती हुई बातें हैं, सदा से मानी जाती रही हैं, उस ढंग से ही चलना चाहिए।
पंडित के पास सिवाय औपचारिकता के और कुछ भी नहीं है। बोध नहीं है, अनुभव नहीं है, ध्यान नहीं है। और जहां ध्यान नहीं वहां ज्ञान कैसे होगा? ध्यान की ही सुगंध है ज्ञान। ध्यान का ही संगीत है ज्ञान। ध्यान की वीणा पर ही जो संगीत उठता है उसका नाम ज्ञान है।
शास्त्रों से नहीं मिलता ज्ञान। ज्ञान तो मिलता है स्वयं में प्रवेश से। कितना ही जान लो कुरान और बाइबिल और पुराण और वेद और उपनिषद--नहीं कुछ होगा। हां, अपने को जान लोगे तो फिर कुरान में भी बहुत कुछ पाओगे, क्योंकि वह भी किसी अपने को जाने हुए आदमी की वाणी है। फिर गीता में भी बहुत कुछ पाओगे। मगर पहली अनुभूति तो अपने भीतर होनी चाहिए। पहली किरण तो अपने भीतर टूटनी चाहिए। तुम्हारे हाथ में दीया हो तो तुम्हें गीता में बहुत खजाने मिलेंगे। खजाने वहां हैं, लेकिन तुम्हारे हाथ में दीया न हो तो क्या तुम खाक वहां पाओगे! और तुम्हारे पास जौहरी की आंख न हो तो हीरे-जवाहरात मिल भी जाएं तो क्या करोगे? पहचान ही न सकोगे कि वे हीरे-जवाहरात हैं। और तुम अंधे अगर हो, तब तो फिर बहुत मुश्किल हो गई। और यही हालत है: अंधे हो, जौहरी नहीं हो, हाथ में दीया भी नहीं है और खोज में लगे हो!
दर्शनशास्त्र की ऐसी व्याख्या की जाती है कि एक अंधा आदमी, अमावस की रात, एक ऐसे भवन में जहां दीया भी नहीं जल रहा है, एक काली बिल्ली को खोज रहा है जो कि वहां है ही नहीं! एक तो अंधा, फिर अमावस की रात, फिर एक दीया भी नहीं घर में, फिर काली बिल्ली--और वह भी वहां मौजूद नहीं है! वह भी मौजूद होती तो भी एक बात थी कि चलो खोजते-खोजते किसी तरह--अगर अंधा न खोज पाता तो कम से कम बिल्ली अंधे को खोज लेती--किसी तरह मिलन हो जाता। लेकिन वह बिल्ली भी वहां है नहीं।
दर्शनशास्त्र ऐसा ही है। सारा पांडित्य ऐसा है। थोथा! और उसके थोथे होने का कारण है: गलत शुरुआत; दूसरे से शुरुआत--उधार। कृष्ण को मान लो, बुद्ध को मान लो, महावीर को मान लो--और उनको मानने में भूल ही जाओ कि तुम भी हो। जैन हो जाओ, ईसाई हो जाओ, मुसलमान हो जाओ--और यह भूल ही जाओ कि तुम आत्मा हो, न हिंदू, न मुसलमान, न ईसाई।
और सभन को गरह बतावै, अपने गरह को नाहिं छुड़ावै।
मुक्ति के हेतु इन्हें जग मानै, अपनी मुक्ति के मरम न जानै।
और लोग मुक्ति के लिए इन पंडित-पुरोहितों को मानते हैं और इनको खुद की मुक्ति का कुछ भी पता नहीं। मर्म ही पता नहीं। राज ही पता नहीं। ये खुद तुमसे भी ज्यादा बंधनों में पड़े हैं।
औरन को कहते कल्यान, दुख मा आपु रहै हैरान।
ब्राह्मण को नमस्कार करो तो वह कहता है: कल्याण हो! और इनकी शक्ल तो देखो। जिसको इनकी शक्ल दिखाई पड़ जाए, कल्याण होता हो तो रुक जाए। ये कहते हैं--कल्याण हो!
मेरे गांव में मेरे एक शिक्षक थे। संस्कृत पढ़ाते थे। उनकी आदत थी, नमस्कार करो, वे कहें: कल्याण हो! जब पहली दफा मैं उनकी कक्षा में भरती हुआ और मैंने पहली दफा उनको नमस्कार किया, उन्होंने कहा, कल्याण हो! मैंने उनसे कहा कि सुनिए, आपका हो गया? उन्होंने कहा, यह भी कोई पूछने की बात है! मैंने कहा, अगर आपका न हुआ हो तो मेरा कैसे करवाइएगा?
उन्होंने मुझे अलग से बुलाया और कहा कि इस तरह की बातें नहीं करते हैं सबके सामने। अरे, यह तो एक उपचार है।
तो मैंने कहा, फिर मैं नमस्कार करना आपको बंद कर दूंगा, क्योंकि मेरा नमस्कार उपचार नहीं है, हार्दिक है। तो कम से कम मुझसे तो झूठ न बोलो। जब तुम्हारा ही नहीं हुआ है तो मेरा तुम कैसे करोगे?
जब भी मैं उनसे नमस्कार करता, उनको बड़ी बेचैनी होती, क्योंकि वह उनकी आदत थी--कल्याण हो। वह उनकी बिलकुल जड़ आदत थी, जैसे ग्रामोफोन रिकार्ड। तो जब मैं उनको नमस्कार करूं, वे एक क्षण को झिझक जाएं, क्योंकि अब क्या करें! क्योंकि वह जो "कल्याण हो' एकदम उनके मुंह में आए, और वे जानते थे कि उन्होंने कहा कल्याण हो कि मैं उनको पकडूंगा।
एक दिन मैंने एक छोटे से बच्चे को, जो स्कूल के ग्राउंड में खेल रहा था, उससे मैंने कहा कि तू मेरे पास खड़ा रह और ये पंडितजी आ रहे हैं, तू नमस्कार करना। वे पंडितजी आए। उस छोटे बच्चे ने, जैसा मैंने उससे कहा था, उनसे नमस्कार किया। उन्होंने तत्क्षण कहा, कल्याण हो!
मैंने कहा, ठहरिए। आप फिर कल्याण करने लगे!
उन्होंने मुझसे कहा, भाई, तुम क्या मेरा बोलना ही बंद कर दोगे? तुमसे तो मैं डरने लगा हूं। तुम तो नमस्कार करते हो तो मुझे बड़ी झंझट होती है कि क्या करूं, क्या न करूं! अब दूसरों पर भी तुम रुकावट डालने लगे!
मैंने कहा, मेरी रुकावट की कुल कोशिश इतनी है कि मैं आपको याद दिलाऊं कि कल्याण अभी आपका नहीं हुआ है। पहले अपना कल्याण कर लें। फिर बांटें, जरूर बांटें। कल्याण से ज्यादा बांटने योग्य और है भी क्या इस जगत में!
औरन को कहते कल्यान, दुख मा आपु रहै हैरान।
खुद हैरान हो रहे हैं दुख में, परेशान हो रहे हैं। खुद बिना अनुभव के हैं और दूसरों को अनुभव बांट रहे हैं!
मुल्ला नसरुद्दीन की पूरी मित्र-मंडली एक दिन सिनेमा देखने गई। बरसात के दिन थे, सभी लोग रेनकोट पहने टिकट के लिए लंबी लाइन में खड़े थे। ढब्बूजी ने पीछे पलट कर मुल्ला से कहा, नसरुद्दीन, बड़े जोरों से लघुशंका लगी है। क्या करूं समझ में नहीं आता! यदि लाइन छोड़ कर बाथरूम तक जाऊं तो फिर पीछे खड़ा होना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में टिकट मिलना मुश्किल लगता है। और यदि न जाऊं तो डर है कि कहीं कपड़े ही खराब न हो जाएं। बड़ी विकट समस्या है।
मेरी बात मानो--मुल्ला ने सलाह दी--सामने खड़े चंदूलाल के रेनकोट की पाकेट में जीवन-जल का त्याग कर दो।
ढब्बूजी ने मुस्कुरा कर कहा, और यदि उसे पता चल गया तो?
कुछ पता नहीं चलता--मुल्ला बोला--वैसे भी कितनी बारिश हो रही है!
अरे मजाक मत करो--मुल्ला से ढब्बूजी ने कहा--यदि इस चंदूलाल को पता चल गया तो बहुत झगड़ा-फसाद हो सकता है।
मुझ पर विश्वास रखो, पता नहीं चलेगा--नसरुद्दीन ने ढाढस बंधाया।
मगर मैं कैसे भरोसा करूं! जिंदगी भर के लिए दुश्मनी हो जाएगी। बड़ा डर लगता है मुझे ऐसा करने में।
अरे यार ढब्बूजी, तुम तो सचमुच एकदम ढब्बू हो! फिक्र मत करो, जैसा मैं कहता हूं वैसा करो। मैं यह तुमसे अपने अनुभव से कह रहा हूं--मुल्ला नसरुद्दीन ने रहस्य खोला--जब मैंने तुम्हारे रेनकोट की जेब में पेशाब की थी, तुम्हें पता चला? तो फिर तुम क्यों डरते हो?
थोड़ा अनुभव से हो तो बात में बल होता है। पंडितों की बात में बल नहीं होता, हो भी नहीं सकता, निर्बल होती है। उनको साक्षी खोजनी पड़ती है औरों में। ज्ञानी अपना साक्ष्य स्वयं है। अगर वह शास्त्रों का उल्लेख भी करता है तो शास्त्रों को साक्षी देता है, शास्त्रों की साक्षी नहीं लेता।
मैं अगर कभी गीता, कुरान या बाइबिल का उल्लेख करता हूं तो इसलिए नहीं कि मेरी बात में उनकी बात से बल पड़ जाएगा। मेरी बात तो मेरा अनुभव है। कुरान, बाइबिल, गीता हुए हों या न हुए हों, सब जल जाएं और राख हो जाएं, तो भी मेरी बात में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी बात का बल उतना ही रहेगा। अगर मैं उनका उल्लेख करता हूं तो उनकी साक्षी नहीं ले रहा हूं; उनको साक्षी दे रहा हूं। और पंडित जब उनकी बात करता है तो उनकी साक्षी ले रहा है; उसके पास अपना तो कुछ है नहीं। उससे अगर गीता छीन लो, वह एकदम निपट अज्ञानी हो जाएगा। गीता में उसके प्राण हैं। गीता मरोड़ दो, उसके प्राण मर जाएंगे।
शास्त्रों में तुम्हारे प्राण नहीं होने चाहिए, नहीं तो तुम जीवन भर भटकोगे। अनुभव में तुम्हारे जीवन की जड़ों को फैलाओ।
दूध-पूत औरन को देते, आप जो घर-घर भिक्षा लेते।
खुद तो भीख मांगते फिरते हैं और दूसरों को आशीर्वाद देते हैं।
पलटूदास की बात को बूझै, अंधा होई तेहु को सूझै।
बड़ी अदभुत बात कही! यह तो सूत्र खूब सम्हाल कर रख लेना!
पलटूदास की बात को बूझै, अंधा होई तेहु को सूझै।
पलटूदास कहते हैं: ये जो तथाकथित आंख वाले लोग हैं, ये तो अंधे हैं। इनकी आंखें बाहर की तरफ खुली हैं। मेरे हिसाब से ये सब अंधे हैं। मेरे हिसाब से तो वह आंख वाला है जो बाहर से आंख बंद कर लेता है, बाहर के प्रति जो अंधा हो जाता है, उसको भीतर दिखाई पड़ता है।
और ध्यान क्या है? बाहर के प्रति अंधा हो जाना! ताकि सारी जीवन-ऊर्जा, देखने की सारी शक्ति और क्षमता अंतर्मुखी हो जाए। ताकि जो प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता था वह स्वयं पर पड़ने लगे। अपनी मशाल में अपने को देखने की क्षमता। अभी अपनी मशाल से तुमने दूसरों को देखा है, औरों को देखा है, सारा संसार छान डाला है। लेकिन दीया तले अंधेरा! दीये से तुम सब खोजते फिर रहे हो और खुद दीये के तले अंधेरा इकट्ठा होता चला गया है। अब यह ज्योति अंतर्मुखी होनी चाहिए।
संसार की दृष्टि में तो अंधे बन जाओ। आंख बंद करो, अंतर्यात्रा पर चलो। लोग पागल कहेंगे, दीवाना कहेंगे, परवाना कहेंगे, अंधा कहेंगे, सब कुछ कहेंगे। फिक्र मत करना, क्योंकि वे थोड़े से ही लोग, जो इतनी हिम्मत करते हैं बाहर के प्रति अंधे हो जाने की, स्वयं को जान पाते हैं। और जिसने स्वयं को जान कर फिर आंख खोली, उसे यह सारा जगत स्वयं से ही भरा हुआ मालूम पड़ता है। तब कोयल की कूक में भी उसका अपना ही कंठ है। और फूल की सुगंध में अपनी सुगंध है। और पहाड़ों की ऊंचाइयों में अपनी ऊंचाई है। और सागरों की गहराई में अपनी गहराई है। तब सारा अस्तित्व उसे स्वयं का विस्तार मालूम होता है: अहं ब्रह्मास्मि! अनलहक!
भलि मति हरल तुम्हार, पांडे बम्हना।
तुम्हारी मति बिलकुल हर ली गई है। हे पांडे, हे ब्राह्मण!
सब जातिन में उत्तम तुमहीं, करतब करौ कसाई।
कहते तो फिरते हो कि सब जातियों में उत्तम हम हैं, लेकिन जो तुम करते हो वह कसाई का कर्तव्य है। कसाई से भी बुरा है। क्योंकि कसाई तो पशुओं को काटता है, तुम लोगों को काट रहे हो। कसाई तो छोटी-मोटी हिंसा करता है, तुम इतनी बड़ी हिंसा कर रहे हो लोगों को धोखा देकर कि उनकी जन्मों-जन्मों की यात्रा बिगाड़ रहे हो।
भलि मति हरल तुम्हार...
कैसी तुम्हारी मति हर ली गई है? माया ने तुम्हें खूब भरमाया! हे पांडे बम्हना!
सब जातिन में उत्तम तुमहीं, करतब करौ कसाई।
जीव मारिकै काया पोखौ, तनिको दरद न आई।।
तुम्हें दर्द होता ही नहीं! तुम्हें पीड़ा होती ही नहीं! तुम धोखे पर धोखा दिए जाते हो। खुद धोखा खाते हो, औरों को धोखा दे रहे हो। खुद माया के चक्कर में हो, औरों को ब्रह्मज्ञान समझा रहे हो। यह तो जीव की हत्या है। यह तो लोगों की आत्माओं को नष्ट करना है।
रामनाम सुनि जूड़ी आवै, पूजौ दुर्गा चंडी।
और परमात्मा का सच्चा स्मरण तो तुम्हें कभी आता नहीं, अगर कोई दिलाना भी चाहे तो बुखार चढ़ता है।
आखिर बुद्धों को देख कर सदा पंडितों को बुखार चढ़ आया है। फिर बुखार में वे अल्ल-बल्ल बकने लगते हैं। अभी दो शंकराचार्यों ने मेरे खिलाफ वक्तव्य देने शुरू किए। सन्निपात! बुखार चढ़ा! जूड़ी आ गई! अब मुझे कई पत्र आए कि मैं जवाब दूं।
अब बुखार चढ़े आदमी की बात का कोई जवाब दिया जाता है? सन्निपात में कोई कुछ कह रहा हो, उसको क्या कोई जवाब देते हैं?
रामनाम सुनि जूड़ी आवै...
और जब भी कोई तुम्हारे भीतर राम को जगाने की क्षमता रखने वाला आता है, तुम्हें एकदम बुखार चढ़ता है, तुम्हें एकदम घबड़ाहट शुरू होती है, क्योंकि तुम्हारा धंधा गया, तुम्हारा व्यवसाय गया, तुम्हारी लूट-खसोट बंद हुई। तुम्हारी प्रतिष्ठा, तुम्हारी पूजा मिट जाएगी। जब कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद होता है जो लुटाने लगता है राम को, तब तुम घबड़ाते हो। तुम्हारे मंदिरों का क्या होगा? कौन तुम्हारे मंदिरों में आएगा और कौन तुम्हारी मस्जिदों में, कौन तुम्हारे गिरजों में, कौन तुम्हारे गुरुद्वारों में? तुम तो दुर्गा, चंडी इत्यादि की पूजा में लोगों को लगाए रखते हो। सब व्यर्थ की बकवास में लोगों को लगाए रखते हो। यज्ञ करो, वर्षा होगी। यज्ञ करो, ज्यादा वर्षा नहीं होगी। यज्ञ करो, बीमारी कट जाएगी।
पांच हजार साल से यज्ञ करवा रहे हो और इस देश में जितनी दुर्घटनाएं घटती हैं उतनी दुनिया में कहीं नहीं घटतीं। पांच हजार साल की यज्ञ-पूजा-पाठ का यह फल है, तो एक बात सिद्ध होती है कि परमात्मा तुम्हारे यज्ञों से बहुत नाराज है, बहुत परेशान है।
एक आदमी मरा। वह जिंदगी भर परमात्मा की प्रार्थना करता था--सुबह, शाम, दोपहर। और जब भी मौका मिले राम-राम राम-राम करता रहता। और एक माला हाथ में रखता था, जब अवसर नहीं होता तो माला ही फेरता रहता। उसका साझीदार भी था। वह कभी मंदिर भी नहीं गया, रामनाम भी नहीं लिया, माला उसने छुई नहीं। दोनों एक साथ कार में एक्सीडेंट हुआ और मरे। दोनों को, देवदूत आए और रामनाम करने वाले को--रामनाम चदरिया ओढ़े हुए था, हाथ में माला लिए हुए था-- उसको नरक ले जाने लगे; और उसके साझीदार को स्वर्ग।
उसने कहा, ठहरो, कुछ भूल-चूक हो रही है। हम तो सुनते आए थे कि यहां सरकारी दफ्तरों में भूल होती है, वहां भी हो रही है। देखते नहीं रामनाम चदरिया और मेरे हाथ की माला और राम-राम जप रहा हूं! जिंदगी हो गई राम-राम जपते। और मुझे नरक! और इस दुष्ट को स्वर्ग--नास्तिक को! जो कभी गया नहीं मंदिर, नाम लिया नहीं।
देवदूतों ने कहा, गलती नहीं हुई है। फिर भी अगर तुम्हें शिकायत हो, हम तुम दोनों को परमात्मा के सामने मौजूद कर देते हैं, अपना निवेदन कर लो।
उसने कहा, यह ठीक है, मुझे मौजूद किया जाए।
उसने परमात्मा के सामने कहा कि यह क्या हद बेईमानी, अन्याय! और हम तो सुनते आए थे: देर है, अंधेर नहीं है। मगर यहां अंधेर भी दिखाई पड़ रहा है। देर तो है ही, क्योंकि जिंदगी भर के बाद...रामनाम का कुछ फल मिलना चाहिए था...देर तो वैसे ही बहुत हो गई, अब अंधेर हो रहा है। इस नास्तिक को स्वर्ग और मुझ आस्तिक को नरक, इसके पीछे राज?
परमात्मा ने कहा कि तू मेरा सिर खा गया। जिंदगी भर न तू खुद सोया, न मुझे सोने दिया। क्योंकि तू राम-राम राम-राम करता रहे तो मैं सोऊं कैसे? जैसे कोई आदमी तुम्हारे पास ही बैठा हुआ तुम्हारा नाम जपता रहे तो नींद कैसे आए? स्वर्ग में तो तुझे मैं रहने ही नहीं दूंगा। और अगर तू ज्यादा जिद्द करेगा तो तू रह यहां, हम चले नरक! तेरे साथ रहने से तो नरक में रहना बेहतर। कम से कम सोने को तो मिलेगा! दिन भर की मेहनत के बाद रात को विश्राम तो कर लेंगे! कोई खोपड़ी में तो भनभनाता नहीं रहेगा कि राम-राम राम-राम। और यह रामनाम चदरिया देख कर ही मुझे...तेरे हाथ की यह माला...इन सबके कारण ही तुझे नरक भेज रहा हूं। मेरात्तेरा साथ नहीं हो सकता।
ऐसा ही लगता है कुछ। पांच हजार साल से यज्ञ-हवन चल रहे हैं, पूजा-पाठ चल रहा है। जितनी बाढ़ यहां आती है, दुनिया के किसी देश में नहीं आती। जितना सूखा यहां पड़ता है, दुनिया के किसी देश में नहीं पड़ता। जितने बांध यहां टूटते, दुनिया के किसी देश में नहीं टूटते। जितनी रेलगाड़ियां यहां उलटती हैं, कहीं नहीं उलटती हैं। भगवान जैसे बहुत परेशान है।
रामनाम सुनि जूड़ी आवै, पूजौ दुर्गा चंडी।
पूजन तुम करते हो काल्पनिक देवताओं का। मनुष्य की ईजादें हैं ये सब। लेकिन भीतर जो छिपा बैठा है साक्षी परमात्मा, उसकी कोई याद दिलाए कि बस तुम्हें घबड़ाहट शुरू होती है।
लंबा टीका कांध जनेऊ, बकुला जाति पखंडी।
तुम बगुले की जाति के हो, हे पांडे बम्हना!
लंबा टीका कांध जनेऊ, बकुला जाति पखंडी।
ऊपर से तुम बिलकुल शुभ्र मालूम पड़ते हो, जैसे कि परमहंस हो, मगर हो तुम बगुले। एक टांग पर भी खड़े रहते हो, मगर नजर मछली पर लगी है। ऊपर से तो ऐसा लगता है बड़े रामनामी, लेकिन भीतर? भीतर कुछ भी नहीं है। राम से कुछ नाता नहीं है।
बकरी भेड़ा मछरी खायो, काहे गाय बराई।
पूछते हैं कि हमें आश्चर्य होता है कि तुम बकरी खा जाते, भेड़ खा जाते, मछली खा जाते। काहे गाय बराई! तुमने गाय कैसे छोड़ रखी है, यही आश्चर्य की बात है!
वह भी बहुत बाद में छोड़ी, पहले तो ब्राह्मण गाय भी खाते रहे हैं। गौमेध यज्ञ होते रहे हैं। वह भी बहुत बाद में छोड़ी। वह भी इसलिए छोड़ी कि गाय कृषि के लिए बहुत उपयोगी हो गई। लोगों ने छुड़वाई होगी तब छोड़ी।
यह जान कर तुम हैरान होओगे कि भारत में लोगों की आमतौर से धारणा है, और भारत के बाहर भी धारणा है, कि ब्राह्मण सब शाकाहारी हैं। यह बात झूठ है। होना चाहिए, मगर हैं नहीं। बंगाली ब्राह्मण मछली खाता है मजे से। और काश्मीरी ब्राह्मण तो सब कुछ खाता है। इसीलिए तो पंडित नेहरू मांसाहारी थे--काश्मीरी ब्राह्मण। काश्मीरी ब्राह्मण को कुछ अड़चन ही नहीं है। अगर भारत भर के ब्राह्मणों का हिसाब-किताब लगाया जाए तो तुम हैरान होओगे, उनको शाकाहारी नहीं कहा जा सकता।
बकरी भेड़ा मछरी खायो, काहे गाय बराई।
रुधिर मांस सब एकै पांडे, थू तोरी बम्हनाई।।
अब ऐसे लोगों से अगर ब्राह्मण नाराज न हों तो क्या करें! अगर शंकराचार्यों को जूड़ी न आ जाए तो क्या हो! थू तोरी बम्हनाई! वे कहते हैं: थूकते हैं तेरे ब्राह्मणत्व पर!
सब घट साहब एकै जानौ, यहिमां भल है तोरा।
अगर अपना भला चाहते हो तो अभी भी जागो। और--सब घट साहब एकै जानौ--सब घट में एक ही साहब विराजमान है, इसको पहचानो। शूद्र में भी वही है जो तुममें है। ब्राह्मण में ही नहीं है परमात्मा, हिंदू में ही नहीं है परमात्मा--सबमें व्याप्त है। इस एक सर्वव्यापी को पहचानो।
सब घट साहब एकै जानौ, यहिमां भल है तोरा।
भगवतगीता बूझि विचारौ, पलटू करत निहोरा।।
पलटू कहता है: फिर भगवदगीता को बूझना। फिर मैं निहोरा करूंगा तुम्हारा कि अब बूझो भगवदगीता, अब पढ़ो भगवदगीता, अब करो मनन। मगर पहले ध्यान। और एक को पहचान लो, फिर भगवदगीता को पहचान सकोगे। अभी तुम भगवदगीता रटते रहो, तोतों की तरह दोहराते रहो, किसी काम की नहीं है।
शास्त्रों से ज्ञान नहीं मिलता; लेकिन ज्ञान मिल जाए तो शास्त्रों में अदभुत संपदा भरी पड़ी है। बिना आत्मज्ञान के शास्त्रों से तुम जो अर्थ लेते हो, वह अर्थ नहीं, अनर्थ हो जाता है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने देखा कि एक कार तेजी से लुढ़कती हुई नीचे की ओर चली आ रही है। नसरुद्दीन ने पूरी ताकत लगा कर उसे रोका। कुछ कदम वह कार के साथ घिसटता भी चला गया, लेकिन उसने हिम्मत न हारी। अंततः उसने कार रोक ही दी। कुछ ही देर में पीछे से एक आदमी प्रकट हुआ, उसके सिर से पसीना बह रहा था। वह बोला, कार किसने रोकी?
नसरुद्दीन ने गर्व से छाती फुला कर कहा, श्रीमान, मेरे सिवाय और कौन रोक सकता है! जब मैंने देखा कि कार लुढ़कती चली जा रही है तो मैंने पूरी शक्ति लगा कर आखिर उसे रोकने में सफलता पा ही ली।
वह व्यक्ति बोला, अरे उल्लू के पट्ठे! मैं इसे ढकेल कर नीचे ले जा रहा था और तूने सब गुड़-गोबर कर दिया! तुझसे किसने कहा कि तू कार रोक?
मगर नसरुद्दीन ने तो दया-भाव से रोकी। उसने सोचा कि कार लुढ़कती चली जा रही है बिना ड्राइवर के, पता नहीं कहां गिरेगी, किसकी जान लेगी! लेकिन कार को कोई पीछे से धक्का देकर उतारता ला रहा है, इसकी फिक्र ही नहीं की।
शास्त्र अगर तुम सामने से देखोगे तो शब्द ही पकड़ में आएंगे। जरा शास्त्रों के पीछे कौन छिपा है...। गीता के पीछे कृष्ण छिपे हैं; जब तक तुम्हें कृष्ण जैसी चेतना न मिल जाए तब तक गीता समझ में न आएगी। और बाइबिल के पीछे क्राइस्ट छिपे हैं। और धम्मपद के पीछे बुद्ध छिपे हैं। पीछे कौन छिपा है? वैसे ही तुम हो जाओ। तो पलटू कहते हैं: शास्त्र से हमारा विरोध नहीं है। विरोध अगर हमारा है तो तुम्हारे थोथे पांडित्य से है, जिसने चेतना को तो जगाया नहीं और शब्दों के संग्रह में लग गया। कितने ही शब्द इकट्ठे कर लो...।
मगर इस देश की शब्दों में बड़ी आस्था है। सत्यों में नहीं, शब्दों में!
महात्मा गांधी ने अछूत को हरिजन कह दिया--और समस्या हल हो गई! जैसे शब्द बदल देने से समस्या हल होती है! पहले अछूत जलाए जाते थे, अब हरिजन जलाए जा रहे हैं। जब अछूत को नहीं छोड़ा तो हरिजन को क्यों छोड़ेंगे?
ऐसे तो अछूत शब्द भी कुछ बुरा नहीं है। उसके भी अच्छे अर्थ किए जा सकते हैं। भगवान को हम कहते हैं: अदृश्य, अनिर्वचनीय, अवर्णनीय, असर्‌पश्य। उसको अछूत भी कह सकते हैं, जिसको छुआ न जा सके। अछूत के दो अर्थ हो सकते हैं--जो छूने योग्य नहीं; और यह भी हो सकता है--जो छुआ न जा सके। तो अछूत शब्द में कुछ बुराई नहीं थी। उसको हरिजन कर दिया, समझे कि बस समस्या हल हो गई।
हम तो समस्या हल करने में बड़े होशियार हैं! हमारी होशियारी का कोई हिसाब ही नहीं है!
अभी श्री मोरारजी देसाई ने सुझाव दिया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक को कि आप अगर हिंदू राष्ट्र की जगह भारतीय राष्ट्र कहना शुरू कर दें तो फिर कोई अड़चन न रहे। और उन्होंने जल्दी से स्वीकार कर लिया, इसमें क्या अड़चन है? हिंदू राष्ट्र न कहेंगे, भारत राष्ट्र कहेंगे। बस समस्या हल हो गई! यानी यह इतना आसान इस देश को लगता है, जरा शब्द बदल दिए और भीतर वही आदमी बैठा है, वही सब कुछ खेल चलेगा। लेकिन हिंदू राष्ट्र की जगह भारत राष्ट्र कर दो, फिर कोई अड़चन नहीं है। और सचाई यह है कि भारत राष्ट्र और भी ज्यादा हिंदू शब्द है। हिंदू शब्द तो हिंदू है ही नहीं। हिंदू शब्द तो परदेसियों ने दिया। उसका हिंदुओं से कुछ लेना-देना नहीं है।
जब पहली दफा यूनानी भारत आए और उन्होंने सिंधु नदी पार की, तो यूनानी भाषा में स शब्द के लिए ह उच्चारण है, इसलिए उन्होंने सिंधु नदी को हिंदू नदी कहा। और उस नदी के पास जो लोग बसते थे उनको हिंदू माना।
जब पारसी, पर्शियन पहली दफा सिंधु के पास आए, तो उनकी भाषा में सिंधु का उच्चारण इंदु हुआ। उससे इंडस नदी का नाम हो गया और भारत का नाम इंडिया हो गया।
वे सब सिंधु नदी से ही बने शब्द हैं और दूसरों ने बनाए हैं। हिंदुओं का उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। हिंदुओं का शब्द तो भारत ही है।
इसलिए अगर बालासाहब देवरस एकदम से राजी हो गए तो कुछ आश्चर्य नहीं। वे तो खुश ही हुए होंगे कि यह तो और भी अच्छा हुआ। हिंदू शब्द से झंझट मिटी; यह हमारा है भी नहीं, म्लेच्छों ने दिया है। हमारा तो शब्द भारत ही है, तो हम भारत राष्ट्र कहेंगे। और मोरारजी देसाई समझे कि समस्या हल हो गई, और क्या समस्या है! समस्या बस शब्द बदल कर हल कर लेते हैं हम।
हिमालय के पास एक जंगली गाय होती है। उसने बड़ा उत्पात मचा रखा था नेहरू के जमाने में। उसकी संख्या बहुत बढ़ गई थी और वह खेतों में हमला करने लगी थी। और बड़ी जंगली गाय है, बड़ी शक्तिशाली गाय है। उसको मारना जरूरी हो गया कि शिकारियों को कहा जाए कि गोली मारो और जो जितना शिकार करेगा उसको ईनाम मिलेगा। लेकिन गाय शब्द जुड़ा हुआ है उसमें! तो पार्लियामेंट में झंझट उठी कि गाय को मारा नहीं जा सकता, नहीं तो हिंदू नाराज हो जाएंगे। जंगली गाय!
फिर किसी समझदार ने कहा कि जंगली गाय कहते ही क्यों हो उसको? जंगली घोड़ा! और बात हल हो गई। उसका नाम जंगली घोड़ा कर दिया गया और जंगली घोड़ा काटा गया और हिंदुओं ने कोई अड़चन न उठाई। जंगली घोड़े मार डाले गए। घोड़ों से किसको लेना-देना है! लेकिन जंगली गाय...।
अब बड़े मजे की बात यह है कि नाम बदलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता, मर रहा है वही प्राणी। उसको जंगली घोड़ा कहो कि जंगली गाय कहो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। हिंदू को मारो तो परमात्मा मरता है, मुसलमान को मारो तो परमात्मा मरता है--मरता वही एक है!
मगर हम शब्दों में बड़ा भरोसा करने लगे हैं। यह देश शब्दों का दीवाना देश है। और यह पंडितों का परिणाम है। पंडितों का छाती पर चढ़ा रहना सदियों तक, इसको शाब्दिक बना दिया है। शब्दों से मुक्त हो, तो फिर कहते हैं--
भगवतगीता बूझि विचारौ, पलटू करत निहोरा।
फिर तो मैं तुमसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करूंगा कि अब डुबकी मारो भगवदगीता में। और तब तुम बड़े हीरे ले आओगे। सागर में भी इतने हीरे नहीं हैं, इतने रत्न नहीं हैं, इतने मोती नहीं हैं--जितने भगवदगीता में हैं! मगर उसके लिए उपलब्ध हैं वे जिसने ध्यान में गोता लगाना सीख लिया है। ध्यान के अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं है।

आज इतना ही।