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मंगलवार, 7 जून 2016

कहे होत अधीर--(प्रवचन--16)



एस धम्मो सनंतनो—(प्रवचन—सोलहवां)

प्रश्न-सार :

1—मैं निपट अज्ञानी! जब भी आंख बंद की, महा-अंधकार ही दिखता है। क्या कभी प्रकाश की किरण भी पा सकूंगा?

2—आप कहते हैं कि कवि ऋषि के निकट है, लेकिन बड़ा आश्चर्य होता है कि इतने संवेदनशील हृदय वाले कवि-कलाकार भी, जो कि जीवन में सत्यम् शिवम् सुंदरम् की तलाश में निकले हैं, वे भी यहां आने से कतराते हैं! आप कहते हैं कि ध्यान संवेदनशीलता को और गहरा करता है। फिर इन कवि-कलाकारों का भय क्या है? क्या ध्यान और सृजन साथ-साथ संभव नहीं हैं?

3—मैं जब भी पूना आता था, पूज्य दद्दाजी का अनंत स्नेह मुझ पर बरसता था। वे चले गए। और आप भी जब प्रवचन और दर्शन से उठ कर वापस जाते हैं तो हृदय में टीस सी उठती है कि कहीं अगर इस सदगुरु का साथ छूट गया तो फिर हमारा क्या होगा? ऐसे बुद्ध सदगुरु तो सदियों में मिलते हैं। हम संन्यासियों पर फिर यह अमृत-वर्षा कौन करेगा?



पहला प्रश्न:

भगवान! मैं निपट अज्ञानी! जब भी आंख बंद की, महा-अंधकार ही दिखता है। क्या कभी प्रकाश की किरण भी पा सकूंगा? कृपया समझाएं।

सिमत नवलानी! अंधे व्यक्ति को अंधकार भी दिखाई नहीं पड़ता--नहीं दिखाई पड़ सकता है। अंधकार को देखने के लिए भी आंख चाहिए। आंख तो चाहिए ही चाहिए, कुछ भी देखना हो, भले वह अंधकार ही क्यों न हो।
साधारणतः लोग सोचते हैं कि अंधा आदमी अंधकार में जीता होगा। उनकी धारणा मूलतः गलत है। अंधे आदमी को अंधकार का क्या पता! अंधकार का तुम्हें पता है, क्योंकि तुम्हारे पास आंख है। जब तुम आंख बंद करते हो तो अंधकार दिखाई पड़ता है। लेकिन अंधे को नहीं दिखाई पड़ता।
अंधकार दिखाई पड़ता हो तो एक बात सुनिश्चित हो गई कि तुम्हारे पास आंख है। और यह बड़ा सौभाग्य है! अंधेरा दिखाई पड़ रहा है तो प्रकाश भी दिखाई पड़ेगा, क्योंकि प्रकाश अंधकार का ही दूसरा पहलू है। जैसे जीवन मृत्यु का दूसरा पहलू है, ऐसे ही अंधकार और प्रकाश एक ही सिक्के से जुड़े हैं--इस तरफ अंधकार, उस तरफ प्रकाश। प्रकाश और अंधकार में कोई मौलिक भेद नहीं है; भेद है सापेक्ष। कम प्रकाश की अवस्था को हम अंधकार कहते हैं; कम अंधकार की अवस्था को हम प्रकाश कहते हैं। मात्रा का भेद है, गुण का भेद नहीं है।
इसीलिए तो जिनकी आंखें तेज हैं...जैसे उल्लुओं को रात में भी दिखाई पड़ता है। उल्लू की आंख रात के अंधकार में भी प्रकाश ही पाती है। और आंखें कमजोर हों तो दिन की रोशनी में भी रोशनी कहां! तो दिन की रोशनी में भी अंधकार ही है।
सबसे पहला तथ्य समझ लेने जैसा है, वह यह है कि बजाय अंधकार की चिंता लेने के इस बात का सौभाग्य मानो कि तुम्हारे पास आंख है, कम से कम दिखाई तो पड़ता है!
लेकिन मनुष्य की यही बुनियादी भूल है--वह कांटे गिनता है, फूल नहीं। वह सौभाग्य नहीं तौलता, दुर्भाग्यों का अंबार लगाता है। जीवन में इतना परमात्मा ने दिया है, उसकी हम कभी कोई गणना नहीं करते। अभाव हमें घेरे रहता है। हम अभाव को ही देखने के आदी हो गए हैं।
नवलानी, पहली तो बुनियादी भूल यह छोड़ो। पहले तो प्रसन्न होओ कि मुझे दिखाई पड़ता है, अंधकार ही सही; कम से कम मेरे पास आंख है; मैं अंधा नहीं हूं। और जैसे ही यह क्रांति तुम्हारे भीतर घटेगी--अंधकार से नजर आंख पर लौट आएगी--वैसे ही प्रकाश की शुरुआत हो जाती है। प्रकाश आरंभ हुआ, सूर्योदय हुआ। जैसे ही तुमने अपनी दृष्टि गलत से सही की तरफ मोड़ी, नकार से विधायक की तरफ आए, वैसे ही सुबह होने लगी, सुबह फिर दूर नहीं है। और यह भी स्मरण रखो कि जब रात्रि का अंधकार बहुत गहन होता तो सुबह बहुत करीब होती है। सुबह होने के पहले अंधेरा बहुत घना हो जाता है। जाने के पहले अंधेरा अपने को इकट्ठा करता है, तो घना हो जाता है। विदा होने के पहले अपना साज-सामान बांधता है, बोरिया-बिस्तर बांधता है, तो घना हो जाता है।
तो दूसरी बात तुमसे कहना चाहता हूं: सौभाग्यशाली हो कि घना अंधकार मालूम हो रहा है। घने अंधकार के गर्भ में ही सुबह छिपी है, भोर छिपा है।
तुम कहते हो: "मैं निपट अज्ञानी!'
अच्छा लक्षण है। पांडित्य खतरनाक लक्षण है। मैं जानता हूं, ऐसा जानना, इस जगत में सबसे बड़ी बाधा है परमात्मा को जानने में। मैं नहीं जानता हूं, यह तो द्वार है। जिसने जाना कि मैं अज्ञानी हूं, उसने ज्ञान की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम उठा लिया। यह एक कदम इतना महत्वपूर्ण है, जितनी कि फिर पूरी यात्रा भी महत्वपूर्ण नहीं। इस एक कदम में करीब-करीब यात्रा पूरी हो जाती है।
दो कदम ही हैं परमात्मा और तुम्हारे बीच: पहला कदम कि मैं अज्ञानी हूं और दूसरा कदम कि मैं हूं ही नहीं। बस ये दो ही कदम हैं, और मंदिर आ गया। तीसरा तो कोई कदम ही नहीं है।
फिर दोहरा दूं: पहला कदम कि मैं अज्ञानी हूं। इस बात की स्वीकृति में ही अहंकार के प्राण तो निकलने लगे। क्योंकि अहंकार दावेदार है। अहंकार कहता है: मैं और अज्ञानी? होगी सारी दुनिया अज्ञानी, मैं ज्ञानी हूं! मैं और निर्बल? मैं बलवान हूं। मैं ऐसा! मैं वैसा! मैं के आभूषण हम बढ़ाते चले जाते हैं--इतना धन, इतना पद, इतना त्याग, इतना ज्ञान--सब मेरा! जितना तुम मेरे को फैलाते हो उतना ही तुम्हारा मैं सघन हो जाता है। और जितना मैं सघन है उतनी ही परमात्मा से दूरी बढ़ जाती है। मैं की सघनता अर्थात परमात्मा से दूरी। मैं पिघलने लगे, मैं गलने लगे--परमात्मा के पास आने लगे। मैं विसर्जित होने लगा, और दूरी कम होने लगी। जिस क्षण मैं नहीं बचा, उस क्षण परमात्मा ही है, और कोई भी नहीं।
और दोनों साथ नहीं हो सकते। मैं और परमात्मा, दोनों का साथ-साथ कोई अस्तित्व संभव नहीं है। जब तक मैं है तब तक तुम लाख दोहराओ--राम, कृष्ण, अल्लाह--नहीं कुछ होगा। जब तक तुम हो तब तक राम की तुम्हारे भीतर आने की कोई संभावना नहीं है। तुम मैं से भरे हो, जगह कहां? अवकाश कहां? राम को समाने के लिए आकाश चाहिए, भीतर विराट शून्य चाहिए! तुम्हारे सिंहासन पर तो तुम स्वयं ही विराजमान हो। परमात्मा आए भी तो बिठाओगे कहां? आ भी जाएगा तो पहचानोगे कैसे? द्वार पर खड़ा हो जाएगा परमात्मा तो भी तुम्हारा अहंकार तुम्हें पहचानने न देगा।
तुम्हारा अहंकार तो तुम्हें वही दिखलाता है जिससे अहंकार बढ़े। परमात्मा को देखने से तो अहंकार मिट जाएगा। इसलिए परमात्मा को अहंकार देखने ही नहीं देता। अहंकार ने ही तो सारे तर्क खोजे हैं परमात्मा के विरोध में। अहंकार ने ही तो घोषणा की है कि परमात्मा नहीं है।
जैसे-जैसे आदमी का अहंकार बढ़ा है...और इस सदी में बहुत बढ़ गया है! और बढ़ने के कारण भी हैं--विज्ञान का विकास, नई-नई तकनीकों की खोज, आकाश में उड़ना, चांद पर पहुंच जाना, एवरेस्ट की चढ़ाई। और आदमी को लगने लगा--मैं सब कुछ हूं! मैं सब कुछ कर सकता हूं! किसी प्रार्थना की, किसी पूजा की, किसी अर्चना की मुझे जरूरत नहीं है। मेरी बुद्धि, मेरा बुद्धिबल, मेरा विज्ञान, मेरा उद्यम सब हल कर लेगा। जो कल अज्ञात था, आज ज्ञात है। जो आज अज्ञात है वह कल ज्ञात हो जाएगा। अहंकार ने इस सदी में खूब फैलाव किया है, खूब विस्तार किया है। और जितना अहंकार बड़ा हुआ उतना ही परमात्मा तिरोहित होता चला गया। फिर हम पूछते हैं: परमात्मा कहां है?
तुम्हारे कारण परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता और तुम्हीं पूछते हो कि परमात्मा कहां है! जैसे किसी ने आंख पर पट्टियां बांध रखी हों और पूछता हो कि सूरज कहां है? कान बंद कर रखे हों और पूछता हो कि स्वर-संगीत कहां है? हृदय को बिलकुल मार डाला हो और पूछता हो--प्रेम क्या है? प्रार्थना क्या है? सारी संवेदनशीलता जड़ हो गई है। अहंकार तुम्हारी छाती पर पत्थर की तरह बैठ गया है। तुम अब अनुभव नहीं करते, केवल सोचते हो।
लोग प्रेम के संबंध में भी अब केवल सोचते हैं, विचारते हैं--प्रेम क्या है? यह भी एक विषय है सोचने-विचारने का, जीवंत अनुभव नहीं। तो परमात्मा तो बहुत दूर हो गया, बहुत-बहुत दूर हो गया। और तुम्हारे कारण! तुम जिम्मेवार हो।
नवलानी, यह शुभ कि तुम कहते हो: "मैं निपट अज्ञानी!'
यह साधक का पहला लक्षण है। यह संन्यास की शुरुआत है। उतरने लगे गंगा में।
दूसरा कदम है कि मैं नहीं हूं। और मैं अज्ञानी हूं, तो दूसरा कदम उठाना आसान हो जाता है। अज्ञानी मिट भी जाए तो क्या खोया! मैं पंडित हूं, ज्ञानी हूं--तो फिर मिटोगे नहीं। कैसे मिटोगे? इतने पांडित्य को कैसे छोड़ दोगे? इतनी मुश्किल से अर्जित पांडित्य--वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, बाइबिल, गुरुग्रंथ, धम्मपद--इतने श्रम से किए कंठस्थ, सारा जीवन उन पर न्योछावर किया, आज सब उसको छोड़ कैसे दोगे! और उस सब में ही तो तुम्हारी अकड़ है। लोग तुम्हें नमस्कार करते हैं। लोग तुम्हारा चमत्कार मानते हैं। लोग तुम्हारी बुद्धि की धाक मानते हैं। तुम छोड़ कैसे दोगे?
ज्ञानी का दंभ हो तो अहंकार छूट नहीं सकता। इसलिए मैंने यह तो सुना है कि कभी-कभी पापी परमात्मा तक पहुंच गए हैं; लेकिन पंडित कभी पहुंचे, ऐसा मैंने नहीं सुना। पंडित नहीं पहुंच सकते हैं। पापी तो झुकने को तैयार होता है। उसका पाप ही उससे कहता है कि किस बल से खड़ा होऊं! वह तो घुटनों के बल प्रार्थना करने को तत्पर होता है। उसकी आंखों से आंसू तो झरने को निरंतर तैयार होते हैं। उसकी आंखें तो कभी भी सावन-भादों बन सकती हैं। उसका हृदय तो रो ही रहा है।
पाप में कोई भी प्रसन्न नहीं होता, स्मरण रखना। बड़े से बड़ा पापी भी प्रसन्न नहीं होता। तुम बड़े से बड़े पापी से भी पापी कहो तो झगड़ने को राजी हो जाता है। वह भी नहीं मानता कि मैं पापी हूं। चोर भी नहीं मानता कि चोर हूं। हत्यारा नहीं मानता कि हत्यारा हूं। बेईमान नहीं मानता कि बेईमान हूं। बेईमान की भी कोशिश यही होती है कि सिद्ध करे कि ईमानदार है। झूठे की भी सारी ताकत इसमें लगती है कि मैं सत्य हूं।
तुम देखते हो सत्य का आकर्षण! तुम देखते हो ईमान का चुंबकीय प्रभाव! तुम देखते हो पुण्य की गरिमा! पापी भी, कम से कम, पुण्य को ओढ़ लेता है। अगर हृदय में नहीं है पुण्य, तो कम से कम ऊपर से ओढ़ लेता है। मगर इस ऊपर से ओढ़ने में भी वह पुण्य को नमस्कार कर रहा है। वह यह स्वीकार कर रहा है कि दर्द है मेरे भीतर, चाहता तो मैं भी था कि भीतर से भी पुण्य होता, फिर मजा और था--भीतर भी पुण्य, बाहर भी पुण्य! नहीं है भीतर तो कम से कम बाहर तो राम-नाम की चदरिया ओढ़ लूं। दूसरों को जब पुण्यात्मा दिखाई पड़ता हूं तो अच्छा लगता है। लेकिन खुद को तो पापी ही दिखाई पड़ते रहोगे; इसलिए भीतर दंश रहेगा, छाती में जैसे कटार चुभी हो, घाव रहेगा, टीस उठती रहेगी। चाहोगे तो तुम भी यही कि भीतर भी पुण्य का यही आनंद हो, यही स्वर्ग हो, यही सुगंध हो।
पापी भी चाहता है कि पाप से कैसे छूट जाए! कब छूट जाए! लेकिन ज्ञानी नहीं चाहता कि ज्ञान से छूट जाए। इसलिए मैं कहता हूं कि पापी तो परमात्मा तक पहुंच सकता है, क्योंकि अपने मैं का उसके पास कोई भी बल क्या है! उसके मैं में सामर्थ्य क्या है! उसकी जंजीरें लोहे की हैं, वह तोड़ सकता है। लेकिन पंडित, त्यागी, व्रती, दानी, वह कैसे तोड़ दे अपनी जंजीरों को! उसकी जंजीरें लोहे की नहीं हैं, उसकी जंजीरें सोने की हैं। उसकी जंजीरों में हीरे-जवाहरात जड़े हैं। उसकी जंजीरें मोतियों से मढ़ी हैं। उसकी जंजीरें बड़ी बहुमूल्य हैं। उसे जंजीरें जंजीरें नहीं मालूम होतीं; उसे तो जंजीरें आभूषण मालूम होती हैं। और बड़े श्रम से उसने उन जंजीरों को कमाया है। तुम उनको जंजीर कहो, उसे कष्ट होता है। किसी त्यागी से कहो कि त्याग जंजीर है; झगड़ने को राजी हो जाएगा। किसी योगी को कहो कि योग जंजीर है; जिंदगी भर तुम्हें क्षमा नहीं करेगा। किसी दानी को कहो कि दान जंजीर है; बदला लेगा, प्रतिशोध लेगा; कहेगा कि तुमने गाली दी मुझे।
पंडित नहीं छोड़ पाता, त्यागी नहीं छोड़ पाता अहंकार को।
नवलानी, यह बोध कि मैं निपट अज्ञानी, बड़ी बात है। शुभ मुहूर्त है ऐसी प्रतीति। इस शुभ घड़ी में चिंता न लो। इससे परेशान न हो जाओ। इससे आनंदित होओ।
कहते हो: "मैं निपट अज्ञानी! जब भी आंख बंद की, महा-अंधकार दिखा।'
शुरू-शुरू में होगा। जैसे दोपहरी में, भरी दोपहरी में धूप से यात्रा करके तुम घर आते हो, तो अपने घर में एकदम अंधकार दिखाई पड़ता है। आंखें बाहर की रोशनी से, चकाचौंध से भरी हैं। एकदम रोशनी के बाद जब तुम अंधेरे में आओगे या कम रोशनी में आओगे, तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। तुम बैठ जाते हो, सुस्ता लेते हो आधी घड़ी, फिर सब दिखाई पड़ने लगता है। आखिर आंखों को थोड़ा अवसर भी तो देना चाहिए। तुम एकदम आओ भरी दोपहरी में यात्रा करके, घर में प्रवेश करो और अंधकार दिखाई पड़े, और तुम समझो कि मारे गए, लगता है मैं अंधा हो गया!
इतनी जल्दी निर्णय न लो।
आंख की पुतलियां जब रोशनी में होती हैं तो छोटी हो जाती हैं, क्योंकि उतनी ज्यादा रोशनी भीतर नहीं ले जाई जा सकती। स्वचालित आंखें हैं। आंखों की पुतली छोटी हो जाती है। तुम धूप से आने के बाद आईने में जरा अपनी आंख देखना, तुम्हारी पुतली बहुत छोटी मालूम पड़ेगी। जैसे कैमरे का लेंस, जब तुम चित्र उतारते हो, अगर धूप में उतार रहे हो तो लेंस थोड़ी देर ही खुला रहना चाहिए, फिर जल्दी से बंद हो जाना चाहिए। ज्यादा रोशनी भीतर आ जाएगी, फिल्म खराब हो जाएगी। अगर अंधेरे में उतार रहे हो तो लेंस ज्यादा देर खुला रहना चाहिए, तभी तस्वीर उतर पाएगी। आंख धूप में होती है तो आंख का लेंस छोटा हो जाता है; उतनी धूप को भीतर ले जाने की कोई जरूरत नहीं है। और जब आंख अंधेरे में होती है तो फिर लेंस को बड़ा होना पड़ता है, आंख की पुतली बड़ी होती है। अब ज्यादा भीतर ले जाया जाए तो ही दिखाई पड़ सकेगा। इसलिए जब तुम धूप से एकदम आते हो कम धूप में तो आंख को थोड़ा समय देना पड़ता है; धीरे-धीरे आंख की पुतली, जो धूप की आदी थी, छोटी हो गई थी, फिर फैलती है, फिर बड़ी हो जाती है। फिर तुम्हें अंधेरे में भी दिखाई पड़ने लगता है।
और अब तक, आध्यात्मिक आंख का जहां तक संबंध है, तुम कभी भीतर आए नहीं हो, जन्मों-जन्मों से बाहर ही भटकते रहे हो--धूप-धाप बाहर की! तो तुम्हारी आंखें बिलकुल जड़ हो गई हैं। वे भीतर कैसे देखें, इसकी कला भूल गई हैं। जैसे एक आदमी धूप में ही, धूप में ही, धूप में ही रहता हो, वर्षों तक धूप में रहे, फिर एक दिन अंधेरे में लाया जाए, तो उसे महा-अंधकार दिखाई पड़ेगा। शायद उसे काफी समय लगेगा जब उसकी आंखें पुनः अंधकार में भी देखने में समर्थ हो सकें। इसीलिए ध्यान की जरूरत है। रोज-रोज बैठते रहो, डूबते रहो। अंधकार दिखाई पड़ता है, अंधकार के साक्षी रहो। आंख बंद कर लो और अंधकार को देखो। देखते रहो अंधकार को, कुछ और करना नहीं है, सिर्फ देखते रहो। इतना ही स्मरण रखो कि मैं देखने वाला हूं, मैं अंधकार नहीं हूं। मैं अंधकार होता तो अंधकार को कैसे देखता! मैं अंधकार से भिन्न हूं, तभी तो देख पा रहा हूं। देखने वाला दृश्य तो नहीं। दृश्य तो द्रष्टा से भिन्न है। यह अंधकार चारों तरफ घिरा है, ठीक है, घिरा रहे, मैं तो अलग हूं, मैं देख रहा हूं।
देखते रहो। धीरे-धीरे क्रमशः जन्मों-जन्मों की पुरानी आदत टूटेगी और तुम्हारी आत्मा की आंखें भीतर देखने में समर्थ हो जाएंगी। जिस दिन समर्थ हो जाएंगी उसी दिन धीरे-धीरे रोशनी आनी शुरू हो जाएगी। पहले भोर होगी--सूरज नहीं निकला, रात जा चुकी, दिन भी नहीं आया, लेकिन प्रकाश हो गया। फिर धीरे-धीरे सुबह होगी, सूर्योदय होगा। और एक दिन तुम अपने भीतर की अंतरात्मा की दोपहरी जान सकोगे--सूर्य ही सूर्य!
कबीर तो कहते हैं कि जैसे हजारों सूर्य एक साथ ऊग आएं!
कबीर जैसे द्रष्टाओं के वचन तुम पढ़ोगे तो हैरानी होगी। शायद इसीलिए प्रश्न उठा कि मैं कैसा अभागा, मैं कैसा पापी, मैं कैसा अज्ञानी, कि मैं तो जब भी भीतर देखता हूं अंधकार दिखता है। और कबीर कहते हैं: हजार-हजार सूरज जैसे एक साथ ऊग आएं! कब यह होगा? यहां तो दीया भी नहीं जलता, हजार सूरज की तो बात दूर! एक दीया नहीं जलता, एक सूरज नहीं निकलता!
निकलेगा। थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। प्रतीक्षा प्रार्थना की आधारभूमि है। काहे होत अधीर! पलटू कहते हैं: मत अधीर हो जाओ।

प्यासों के लिए
कुओं की कमी नहीं
और कुओं में पानी की।
फिर भी
न जाने क्यों
मनुष्य प्यासा खड़ा है।
शायद उसकी
डोर छोटी
और कठौता बड़ा है।

तृषा हो तो
ज्ञान के कुएं में
श्रद्धा की डोरी से
पात्रता के कठौते को बांध
उपार्जित कर लो अभिप्रेत,
डोरी ओछी न रही तो
तृप्ति अवश्यंभावी है।

उसे चाहे श्रद्धा कहो, चाहे प्रतीक्षा कहो, बात एक ही है। श्रद्धा की भी गुणवत्ता यही है कि वह प्रतीक्षा करने में तुम्हें समर्थ बनाती है। जिसे श्रद्धा होती है वह प्रतीक्षा कर सकता है। जिसे श्रद्धा नहीं हो सकती, उसे लगता है समय व्यर्थ जा रहा है, यह मैं क्या कर रहा हूं! एक दिन बैठता है, क्षण भर आंख बंद करता है, भीतर अंधेरा पाता है, सोचता है--इतनी देर मैं दुकान पर बैठता, बाजार गया होता, कुछ कमाई हो जाती। यह बैठ कर मैं क्या कर रहा हूं आंख बंद किए? क्यों समय खराब कर रहा हूं? ऐसे कुछ होने वाला नहीं। दो-चार बार बैठ कर देखेगा, कहेगा कि ये सब संत और फकीर या तो कुछ और ही तरह के लोग रहे होंगे, हमारे जैसे आदमी नहीं। इसीलिए तो हम उनको अवतार कहते हैं। अवतार कहने का मतलब यह कि भइया, तुम और ही तरह के हो। तुम्हें हो गया होगा, हमें होने वाला नहीं। हम तो मनुष्य हैं। तुम भगवान के घर से सीधे आ रहे हो। तुम पर भगवान की कृपा है, हम पर नहीं। तुम्हारे भाग्य में ऐसा लिखा है, हमारे भाग्य में ऐसा नहीं।
ये तरकीबें हैं हमारी कि तुम तीर्थंकर, कि तुम बुद्ध, कि तुम यह, कि तुम वह, कि तुम पैगंबर, कि तुम परमात्मा के बेटे। हम तो साधारण मनुष्य हैं, यह हमसे होने वाला नहीं है। या तो तुम ऐसा कह देते हो। अगर भले आदमी हुए तो इस तरह अपने को समझा लेते हो। अगर इतने भले आदमी न हुए तो कहते हो: पागल हैं ये सारे लोग, विक्षिप्त हैं। इनके मस्तिष्क खराब हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता। जो मुझे नहीं होता वह इन्हें कैसे हो सकता है! या तो ये दूसरों को धोखा दे रहे हैं या खुद धोखा खा रहे हैं।
मगर दोनों बातें गलत हैं। सच बात यह है कि बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, कृष्ण, क्राइस्ट, मोहम्मद, मूसा तुम्हारे जैसे ही लोग हैं। बिलकुल तुम्हारे जैसे लोग हैं। उतनी ही तुम्हारी संभावना है जितनी उनकी थी। उतने ही बीज तुम्हारे पास हैं जितने उनके पास थे। उतने ही फूल तुम्हारे भीतर खिल सकते हैं जितने उनके भीतर खिले। उतने ही सूरजों के तुम भी मालिक हो सकते हो जितने सूरजों के वे मालिक हो गए। वह परमात्मा तुम्हारे लिए भी उतना ही उपलब्ध है जितना उन्हें उपलब्ध था। सिर्फ तुम्हारी डोर छोटी पड़ रही है। कुआं भी है, जल भरा भी है, लेकिन तुम्हारी डोर श्रद्धा की, प्रतीक्षा की छोटी पड़ रही है। तुम प्रतीक्षा नहीं कर पाते।
इस सदी के मनुष्य ने कुछ चीजें गंवा दी हैं, उनमें एक प्रतीक्षा भी है। विनम्रता गंवा दी है, कारण मिल गया विज्ञान में। विज्ञान ने आदमी को अहंकार दे दिया कि मैं क्या नहीं कर सकता! सब कर लूंगा--तूफानों को जीत लूंगा, बादलों को जीत लूंगा, मरुस्थलों को बगीचे बनाऊंगा, आकाश में बस्तियां तैराऊंगा--क्या नहीं कर सकता हूं! विज्ञान ने मनुष्य को अहंकार दे दिया। और विज्ञान ने ही मनुष्य के हाथ से प्रतीक्षा भी छीन ली। क्योंकि विज्ञान ने कहा: जल्दी करो! जल्दी हो सकता है! जहां तुम तीन दिन में पहुंचते हो वहां हम तुम्हें तीन मिनट में पहुंचा सकते हैं। तो विज्ञान ने एक त्वरा सिखा दी, एक जल्दी सिखा दी। अब हर आदमी भागा जा रहा है। जो ट्रेन से सफर करता, वह हवाई जहाज से सफर कर रहा है। जो बैलगाड़ी से सफर करता, वह ट्रेन से सफर कर रहा है। तेजी है। लेकिन कोई पूछे कि समय बचा कर करोगे क्या? तो बड़ी हैरानी होती है। ट्रेन से न जाकर हवाई जहाज से गए, तीन दिन बच गए, अब क्या करना? अब ताश खेलो, शतरंज बिछाओ, सिनेमा देखो, रेडियो, टेलीविजन। या बैठ कर लोगों से बकवास करो। और कोई पूछे कि क्या कर रहे हो? तो तुम कहते हो, समय काट रहे हैं। पहले समय बचाते हो, फिर समय काटते हो, खूब बुद्धिमान हो!
पुरानी चीनी कथा है। एक बूढ़ा आदमी अपने जवान बेटे के साथ कुएं से पानी खींच रहा है। दोनों बैल की तरह जुते हैं और पानी खींच रहे हैं। शहर से आया हुआ एक आदमी, जो कनफ्यूशियस का शिष्य है, वह इन दोनों को इस भरी दोपहरी में, पसीने से लथपथ, और यह बूढ़ा होगा कोई सत्तर साल से भी ज्यादा उम्र का और इसका जवान बेटा और ये दोनों बैलों की तरह जुते हैं। उसने बूढ़े से कहा कि लगता है तुम्हें पता नहीं कि अब पानी खींचने के नये आविष्कार हो गए हैं!
बूढ़े ने कहा, चुप! बिलकुल चुप! पहले मेरे बेटे को चले जाने दो। अभी यह घर जाएगा रोटी लेने, फिर तुमसे बात करूंगा।
बेटा रोटी लेने गया, वह कनफ्यूशियस का अनुयायी बोला कि तुमने मुझे चुप क्यों किया?
उसने कहा, मेरे बेटे के कारण, क्योंकि वह सुन ले तो उसकी जिंदगी नष्ट हो जाए। मुझे पता है कि पानी खींचने के नये यंत्र आविष्कृत हो गए हैं। अब हमें बैलों की तरह जुतने की जरूरत नहीं है।
तो उस कनफ्यूशियस के मानने वाले ने कहा कि फिर तुम कैसे पागल हो! फिर क्यों मेहनत कर रहे हो? कितना समय नहीं बच जाएगा!
उस बूढ़े ने कहा, वह तो मुझे भी मालूम है, समय बच जाएगा। लेकिन मैं यह पूछता हूं, फिर मैं उस समय का क्या करूंगा? लडूंगा, झगडूंगा, जुआ खेलूंगा, शराब पीऊंगा--फिर मैं उस समय का क्या करूंगा? पहले तुम इसका उत्तर लाओ कि समय बच जाएगा तो मैं उस समय का क्या करूंगा? अपने गुरु कनफ्यूशियस से पूछो कि समय का क्या करूंगा, फिर तुम आना।
जब वह व्यक्ति कनफ्यूशियस के पास पहुंचा तो कनफ्यूशियस ने कहा, तुम्हें उस बूढ़े को परेशान करने की जरूरत नहीं। वह बहुत बुद्धिमान है। उसने ठीक कहा। आदमी समय बचा लेगा तो फिर करेगा क्या? फिर उपद्रव करेगा।
इसलिए तुम्हें गरीब आदमी भला मालूम होता है, क्योंकि उसके पास समय नहीं है उपद्रव करने को। गरीब आदमी में और कुछ खूबी नहीं है। गरीबी में जो अध्यात्म मालूम होता है वह गरीबी में नहीं है; उसका असली कारण केवल इतना है, उसके पास उपद्रव का समय नहीं है। रोटी-रोजी कमाए कि लड़े-झगड़े? बच्चे पाले कि जुआ खेले? किसी तरह छप्पर बचाए, कपड़े लाए कि शराब पीए? समय उसके पास है नहीं। उसके पास सपने तक देखने का समय नहीं है। रात जब सोता है तो घोड़े बेच कर सोता है। अमीर जब रात सोता है तो सो भी नहीं सकता। उसके पास इतना समय है कि वह दिन भर भी आराम करता रहा, अब रात नींद कैसे आए?
विज्ञान ने अहंकार दे दिया। ज्ञान सदा अहंकार देता है। और ज्ञान ने सुविधाएं दे दीं कि काम जल्दी से हो सकते हैं। मैं विज्ञान का विरोधी नहीं हूं, खयाल रखना। और न ही मैं इस बात का विरोधी हूं कि मशीनें समाप्त कर दी जाएं। लेकिन अगर मनुष्य में समझ हो...अगर मैं उस बूढ़े आदमी से मिला होता तो उससे कहता कि जब समय बचे तो ध्यान करना। कोई शतरंज खेलने की मजबूरी थोड़े ही है। कोई जुआ खेलने की जबरदस्ती थोड़े ही है। समय बचे तो ध्यान करना। समय बचे तो प्रार्थना में डूबना। समय बचे तो नाचना--परमात्मा की कृतज्ञता और धन्यवाद में।
लेकिन कनफ्यूशियस की दृष्टि में परमात्मा और प्रार्थना का कोई स्थान नहीं था। इसलिए कनफ्यूशियस उस बूढ़े की बात का जवाब नहीं दे सका। मैं गरीबी के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि गरीबी के कारण जो आदमी में सरलता दिखाई पड़ती है वह थोथी है। मैं तो अमीरी का पक्षपाती हूं। मैं चाहता हूं अमीर हो जाओ जितने हो सकते हो। लेकिन अमीर होने से कोई मतलब यह नहीं है कि तुम्हें शराब ही पीनी पड़ेगी। अरे और भी शराबें हैं! परमात्मा की शराब है। समय होगा तो उसे पीना। समय तो होना चाहिए, लेकिन ठीक दिशा में नियोजित करने के लिए अगर समझ हो तो कोई हर्जा नहीं।
विज्ञान ने अहंकार दे दिया और विज्ञान ने तुमसे प्रतीक्षा छीन ली। तुम धैर्य रखना ही भूल गए। तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा कि धैर्य का भी एक आनंद है, कि बैठे चुपचाप समय को गुजर जाने देने का भी एक मजा है।
नवलानी, आंख बंद करो, जितना समय मिले। अंधकार दिखाई पड़े, अंधकार सही, देखो। अंधकार भी परमात्मा का है। वह भी परमात्मा का एक रूप है। उसकी पीठ सही, मगर परमात्मा की पीठ भी आखिर है तो परमात्मा की पीठ। चलो पीठ की तरफ से ही नमस्कार करो! चलो पीठ की तरफ से ही बात कर लो! उसे सुनाई पड़ जाएगा। और इसीलिए तो हमने उसके तीन मुंह बनाए हैं, कि तुम कहीं से भी बोलो, उसे सुनाई पड़ जाए। तुम पीठ की तरफ से भी बोलो तो वह सामने है।
तीन मुंह विचारणीय है। क्योंकि विज्ञान कहता है: अस्तित्व जो है, वह तीन आयामी है, थ्री-डायमेंशनल है। अस्तित्व के तीन आयाम हैं। इसलिए बात बड़ी कीमती है कि परमात्मा के तीन मुख हैं। एक-एक आयाम में एक-एक मुख। तुम किसी भी आयाम से पुकारो, उस तक बात पहुंच जाएगी। अंधेरे को उसकी पीठ समझो, मगर उसकी ही पीठ है। छुरा मत भोंक देना! पूजा के फूल चढ़ाओ। पीठ की तरफ से भी चढ़ाए गए पूजा के फूल पहुंच जाएंगे। तुम घबड़ाओ मत। और अंधेरा है तो अंधेरे को देखते चलो, देखते चलो। देखते-देखते ही अंधेरा रोशनी बन जाएगा। देखते-देखते ही तुम्हारी आंख की ऐसी क्षमता, ऐसी प्रखरता हो जाएगी, ऐसी तीव्रता हो जाएगी, तुम्हारी आंख ऐसी रोशन हो जाएगी कि अंधेरे को भी रोशनी दे देगी।
और कुछ तो दिखाई पड़ रहा है, इसलिए खुश होओ! नाचो!

मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

उसके गीत गाओ! अंधेरे को भी उसके गीतों से भर दो! और काश तुम अंधेरे को भी उसके गीतों से भर दो तो दीये जलने लगेंगे--घी के दीये।

मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

छेडूं षड्ज स्नेह का साजन,
ऋषभ बने मेरा प्रिय भाजन,
बस स्वर ही हों आधार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

केश-राशि गांधार सुसज्जित,
मध्यम कर मध्यस्थ मिलन हित,
उड़ आऊं तेरे द्वार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

पंचम पिक-कूजन है मेरा,
धैवत धवल हास है तेरा,
सब सपने हों साकार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

छेडूं निषाद हर लूं विषाद,
कर संगम सरगम का निनाद,
है स्वर का यह संसार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

मन मृदंग की धिनगिन तिनगिन,
चौताले की किटतक गदगिन,
मैं दिन गिनगिन गई हार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

नादिर, नादिर, तोम दिर दिरदिर,
मन वीणा को आंदोलित कर,
मैं छेडूं तन के तार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

ताथेइ, ताथेइ, तत्त्तत् थेइ-थेइ,
नूपुर बांध नचूं नित नई-नई,
अब लोक-लाज दी डार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।

नाचो, गाओ--अंधेरे में ही सही, महा-अंधकार में ही सही। और तुम्हारे गीत दीये बन जाएंगे! और तुम्हारे नृत्य रोशनी को निकट लाने लगेंगे! धैर्य रखो और धन्यवाद दो। धन्यवाद देने को ही मैं नाचना कह रहा हूं। और कैसे धन्यवाद दोगे? कोई शिष्टाचार थोड़े ही है--कि शुक्रिया, थैंक यू, धन्यवाद! कहने से नहीं होगा।
नादिर, नादिर, तोम दिर दिरदिर,
मन वीणा को आंदोलित कर,
मैं छेडूं तन के तार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।
ताथेइ, ताथेइ, तत्त्तत् थेइ-थेइ,
नूपुर बांध नचूं नित नई-नई,
अब लोक-लाज दी डार, मीत मन बसिया।
मैं गाऊं तेरे गीत, मीत रंग रसिया।
गाओ! नाचो! गुनगुनाओ! आज अंधेरा है, कल यही अंधेरा रोशनी बनेगा। आज रात है, इसी रात से सुबह का जन्म होगा। बस एक बात महत्वपूर्ण है कि तुम्हें कुछ दिखाई पड़ रहा है, तुम द्रष्टा हो। और द्रष्टा जो है, उसे क्या कमी! उसे मालिक मिल ही गया। हालांकि पहचान नहीं हुई है अभी कि यही मालिक रहा, लेकिन मालिक का मिलना शुरू हो गया है।
और धैर्य रखना, श्रद्धा की डोर लंबाए चलना। आज न हो तो घबड़ा मत जाना। कल न हो तो घबड़ा मत जाना। जन्मों-जन्मों में भी हो तो समझना कि जल्दी हुआ। ऐसे जन्म-जन्म लगते नहीं, हो तो अभी सकता है। तुम्हारा जितना गहन धैर्य होगा उतनी जल्दी हो जाता है।
उस महागणित का तीसरा नियम...मैंने दो नियम तुमसे कहे...उस महागणित का तीसरा नियम कि जो जल्दी करेगा उसे देर हो जाती है। और जो अनंत धैर्य रखता है, अनंत प्रतीक्षा करता है, उसे बड़े जल्दी मिल जाता है। उसके भी बड़े अनूठे रंग, अनूठे ढंग, अनूठी अदाएं हैं! जो कहता है कि अनंत काल में भी मिलोगे तो मैं प्रतीक्षा के लिए बैठा रहूंगा। तुम्हें जल्दी करने की कोई जरूरत नहीं है, मैं बैठा हूं, बैठा हूं, बैठा ही रहूंगा। तुम जब आओ आना। मैं झुका हूं, तुम मुझे झुका ही पाओगे। तुम अनंत काल में आना, मैंने जो दीया तुम्हारे लिए जलाया है वह तुम्हारे लिए जलता ही रहेगा। तुम आओ या न आओ, मेरा द्वार खुला है, खुला ही रहेगा। जो ऐसा कहने को राजी है, ऐसा जीने को राजी है, उसे इसी क्षण, अभी, यहीं क्रांति घट सकती है!


दूसरा प्रश्न:

भगवान! आप कहते हैं कि कवि ऋषि के निकट है, लेकिन बड़ा आश्चर्य होता है कि इतने संवेदनशील हृदय वाले कवि-कलाकार भी, जो कि जीवन में सत्यम् शिवम् सुंदरम् की तलाश में निकले हैं, वे भी यहां आने से कतराते हैं! आप कहते हैं कि ध्यान संवेदनशीलता को और गहरा करता है। फिर इन कवि-कलाकारों का भय क्या है? क्या ध्यान और सृजन साथ-साथ संभव नहीं हैं?

रुण सत्यार्थी! कवि तो निश्चित ही ऋषि के निकट है। कवि का अर्थ है जिसे झलकें मिलने लगीं परमात्मा की। और ऋषि का अर्थ है जो उसके साथ एकाकार हो गया। कवि का अर्थ है जिसने दूर से देखा है हिमालय के धवल शिखरों को। और ऋषि का अर्थ है जो उन शिखरों पर ही निवास करने लगा है। कवि में और सत्य में थोड़ी सी दूरी है; ऋषि सत्य के साथ एकाकार है।
मगर कवि हुए बिना कोई ऋषि नहीं होता। यद्यपि सारे कवि ऋषि नहीं हो पाते, लेकिन सारे ऋषि कवि तो होंगे ही। कोई चाहे तो झलकों पर ही अटक जाए, कोई चाहे तो झलकों में ही रम जाए। कवि पर तो बूंदाबांदी होती है; मूसलाधार वर्षा तो ऋषि पर होती है। कवि तो ऐसा समझो कि तालत्तलैयों में जीता है; ऋषि सागर में लीन हो गया होता है, सागर ही हो जाता है।
लेकिन कोई कवि चाहे तो अपनी तालत्तलैया को ही सागर समझ ले, तो ऋषि होने से वंचित रह जाएगा। तो बहुत से कवि अपनी तालत्तलैया को ही सागर समझ लिए हैं। इसलिए सोचते होंगे कि क्या जरूरत है कहीं जाने की! लगता है उन्होंने पा ही लिया। अभी सिर्फ सपना देखा है, अभी सत्य नहीं। सत्य की झलक पड़ी है, आभा पड़ी है, परछाईं पड़ी है सपने में, मगर सत्य नहीं।
झेन फकीर रिंझाई से एक कवि ने आकर कहा कि मैंने आपके द्वारा लिखी गई कविताएं देखी हैं।
झेन फकीर हाइकू लिखते हैं, छोटे-छोटे पद। बड़े अदभुत पद! दुनिया में उस तरह की कविता कहीं और होती नहीं। उसके लिए पहले झेन फकीर की वर्षों की साधना चाहिए। हाइकू छोटा सा होता है। ऊपर से उसमें शायद अर्थ दिखाई भी नहीं पड़ता। उसके अर्थ को खोलने के लिए भी ध्यान की जरूरत पड़ती है; ध्यान की कुंजी से ही अर्थ खुलता है।
उस कवि ने कहा कि आपके हाइकू मैंने पढ़े, इनसे बेहतर कविताएं तो मैं लिखता हूं। और आपको लोग बुद्ध कहते हैं, कि आप जागरूक, महा-प्रज्ञावान! और इनसे बेहतर कविताएं तो मैं लिखता हूं।
रिंझाई ने कहा, तुम बेहतर कविताएं लिखते होओगे, जरूर लिखते होओगे। पूरे चांद की रात थी और दोनों रिंझाई की बगिया में बैठ कर बात कर रहे थे। रिंझाई ने कहा, एक काम करो, मेरे साथ आओ। उसे उठा कर ले गया। बगिया में ही छोटी सी झील थी। झील में चांद झलक रहा था। झील में लहरें भी नहीं थीं। चांद बड़ा प्यारा लग रहा था। रिंझाई ने कहा, इस चांद को देखते हो?
उस कवि ने कहा, हां, देखता हूं। मगर इसमें मेरी बात का उत्तर कहां है?
रिंझाई ने कहा, इसमें उत्तर है। तुम्हारी कविताएं ऐसी ही हैं जैसे झील का चांद। और रिंझाई ने एक कंकड़ झील में फेंका, लहरें उठीं, चांद टुकड़े-टुकड़े हो गया। उसकी चांदी फैल गई पूरी झील पर, मगर चांद न बचा। और रिंझाई ने कहा, अब जरा आकाश की तरफ देखो। मेरे वक्तव्य ऐसे हैं जैसे वह चांद। अब एक कंकड़ उस चांद की तरफ फेंको, तब तुम्हें भेद पता चल जाएगा। तुम्हारी कविताएं परछाईं हैं; मेरे वक्तव्य परछाईं नहीं। तुम्हारी कविताओं में तुम हो; मेरे वक्तव्यों में मैं नहीं हूं।
कवि अहंकार से भर सकता है, अक्सर भर जाता है। क्योंकि उसे लगता है--मैं कितना संवेदनशील! मैं कितना भावना-प्रवण! कैसे प्यारे मैंने गीत रचे हैं! लेकिन ऋषि अहंकार से नहीं भरता; अहंकार से खाली होता है तभी ऋषि हो पाता है।
रवींद्रनाथ में कुछ-कुछ ऋषि का रूप था। मरते समय रवींद्रनाथ ने कहा कि यद्यपि मैंने छह हजार गीत लिखे हैं, शायद दुनिया में किसी ने छह हजार गीत नहीं लिखे, लेकिन फिर भी मैं पीड़ित विदा हो रहा हूं, क्योंकि जो मैं गाना चाहता था वह अभी तक नहीं गा सका। और हे परमात्मा, तू भी बेवक्त उठाए ले रहा है! अब मुझे लगता था कि मेरा साज बैठ गया है और गीत अब पैदा हुआ, अब पैदा हुआ। और तू मुझे उठाने लगा, तू मुझे दुनिया से हटाने लगा! जिंदगी भर में मैं मुश्किल से साज बिठा पाया हूं; सिर्फ साज बिठा पाया हूं, अभी गीत गाया नहीं; अभी सितार बजी नहीं, अभी सिर्फ तार कसे गए हैं; अभी सिर्फ तबला ठोंका-पीटा गया है, रास्ते पर लाया गया है--और तू मुझे विदा करने लगा!
जो लोग रवींद्रनाथ के गीत को पढ़ेंगे वे कहेंगे: यह कैसी बात! इतने प्यारे गीत! जिन पर नोबल पुरस्कार मिला, जिनका सारी दुनिया में सम्मान हुआ! खुद रवींद्रनाथ लेकिन प्रसन्न नहीं हैं। क्योंकि रवींद्रनाथ कहते हैं, मैं कुछ गाना चाहता था, जो अनगाया रह गया है। और गीतों में कुछ धुन आई, कुछ झलकी बात, लेकिन वह नहीं उतार पाया जो उतारना चाहता था।
रवींद्रनाथ में ऋषि की थोड़ी सी झलक है। झलक ही कहता हूं, रवींद्रनाथ अभी बुद्ध नहीं हैं। हो सकते थे; लेकिन उन्होंने भी सारी ऊर्जा गीतों में ही लगा दी, अंतर्यात्रा के लिए कुछ ऊर्जा बचाई नहीं। सुंदर गीत रचने में लगे रहे; लेकिन सौंदर्य का साक्षात्कार हो सके, इसकी तरफ कोई साधना नहीं की।
अरुण, तुम पूछते हो कि कवि ऋषि के निकट हैं...
निश्चित ही निकट हैं। अगर अहंकार कवि छोड़ दे तो ऋषि हो जाए। अगर मैं-भाव छोड़ दे तो ऋषि हो जाए। मगर कवि को मैं-भाव छोड़ना बहुत मुश्किल होता है। इस दुनिया में जिनके पास भी कोई गुण है, उन्हें अहं-भाव छोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि गुण अकड़ देता है--मैं कवि हूं, तो मैं विशिष्ट हूं, तो मैं कुछ साधारणजन नहीं हूं! यह अकड़ बाधा बन जाती है।
और फिर दूसरी बात, तुम्हारे सौ कवियों में से निन्यानबे तो कवि भी नहीं होते, ऋषि होना तो बहुत दूर। निन्यानबे तो बस तुकबंद होते हैं। तुकबंदों को मैं नहीं कह रहा हूं कि वे ऋषियों के निकट हैं। तुकबंदी तो बड़ी आसान बात है। वह तो थोड़ी सी भाषा और व्याकरण और मात्रा और छंद का तुम्हें बोध हो तो तुम भी तुकबंदी कर ले सकते हो। सौ में से निन्यानबे कवि तो तुम्हारे तुकबंद होते हैं। और जनता तुकबंदी को समझ पाती है, कविता को समझ भी नहीं पाती। क्योंकि कविता में कुछ दुरूह होता है, कुछ रहस्यमय होता है। तुकबंदी साफ-सुथरी होती है। आम जनता जिसको कवि मानती है, वह अक्सर कवि नहीं होता, वह कवि से भी बहुत दूर है।
तुम कवि-सम्मेलनों में तो जाकर देखते होओगे, जिनके लिए ताली पिटती है, अगर तुम्हें काव्य का थोड़ा भी बोध है तो तुम बहुत हैरान होओगे कि यह ताली किनके लिए पिट रही है! और जिन्हें सम्मान मिलना चाहिए था, लोग उन्हें हूट करते हैं, क्योंकि उनकी समझ में नहीं आता। जनता के तल पर जो है वह समझ में आता है। स्वभावतः, जनता जिस तल पर है उस तल पर ही जो बोलता है वह समझ में आता है। जो जरा ऊंचाइयां लेना शुरू करता है, जो जरा आकाश की तरफ उड़ता है, कि जनता नाराज होती है, कि फौरन पत्थर फेंके जाते हैं।
एक कवि एक बार जब घायल अवस्था में रात को देर से घर लौटे तो उनकी पत्नी ने झल्ला कर कहा, हे भगवान, लगता है कि तुम आज फिर...
कवि ने बीच में ही टोक कर कहा, नहीं-नहीं, भगवान की कसम, आज मैंने बिलकुल नहीं पी है।
पत्नी तैश में आकर बोली, पीने के लिए कौन कह रहा है! मैं तो कह रही थी कि लगता है तुम आज फिर किसी कवि-सम्मेलन में गए थे।
एक महाकवि किसी कवि-सम्मेलन में आमंत्रित था। जब उसकी बारी आई और उसने कविता-पाठ शुरू किया तो जनता एकदम चिल्लाने लगी कि बंद करो! बंद करो! जनता मचाने लगी शोर, लोग जोर-जोर से तालियां पीटने लगे, पैर फर्श पर रगड़ने लगे कि वह किसी तरह तो चुप हो। मगर वह था कि अपनी कविता में लीन, परम शांति से, परिपूर्ण अप्रभावित, जैसे कुछ हो ही नहीं रहा है, अपनी कविता पढ़े जा रहा था। आंखों से उसके झर-झर आंसू बह रहे हैं। शब्दों में उसके बड़ी गहराई थी। मगर गहराई समझे कौन! अब तुम भैंस के सामने बीन बजाओ तो भैंस पड़ी पगुराए! और कर भी क्या सकती है!
फिर जब बात हद से ज्यादा हो गई तो एक काला भुजंग पहलवान सा व्यक्ति उठ कर अपनी सीट पर से खड़ा हो गया और उसने जेब से एक चमचमाता हुआ लंबा सा छुरा निकाल लिया। उसकी आंखें अंगारों की तरह जल रही थीं। उसकी आंखों को देख कर महाकवि के तो प्राण-पखेरू उड़े-उड़े हो गए और उसने एकदम से अपना कविता-पाठ बंद कर दिया। उस पहलवान ने कहा, अरे मरियल चूहे, तू तो अपना कविता-पाठ जारी रख। तू मत घबड़ा। लेकिन पहले जरा उस उल्लू के पट्ठे का नाम बता, जिसने तुझे कविता-पाठ के लिए बुलवाया है!
आमजन क्या काव्य समझ सकेंगे! काव्य समझने के लिए भी एक संवेदनशीलता चाहिए। इसलिए तुम जिनको, अरुण, कवि मान लेते हो वे कवि तो हैं नहीं, ज्यादातर तो तुकबंद हैं। उन तुकबंदों को यहां आने से क्या सार! और जो कवि हैं उनमें एक अहमन्यता जगती है--कि हम तो पा ही लिए, इसलिए क्यों जाएं कहीं? क्या हमें जरूरत है जाने की? और कभी-कभी यहां आ भी जाते हैं तो मुझे सुनने नहीं आते, वे मुझसे आकर प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी कुछ कविताएं सुनें। कि बड़ी दूर से आया हूं, आपको कुछ कविताएं सुनाने आया हूं।
जो चांद देख रहा हो वह झील में बने प्रतिबिंबों की क्या चिंता करे! मगर उनको तो लगता है कि उन्होंने झील में जो प्रतिबिंब देखा है वही चांद है। इसलिए भी अड़चन है।
और तुम पूछते हो कि आप कहते हैं कि ध्यान संवेदनशीलता को गहरा करता है। फिर इन कवि-कलाकारों को भय क्या है?
ध्यान जरूर संवेदनशीलता को गहरा करता है। तो वे जो निन्यानबे प्रतिशत तुकबंद हैं उनको भय है; अगर वे ध्यान करेंगे, तुकबंदी बंद हो जाएगी। क्योंकि ध्यान की गहराई उन्हें दिखला देगी कि वे अब तक जो करते रहे हैं वह कौवों की कांव-कांव है, कविता नहीं। और वे जो एक प्रतिशत कवि हैं उनको भी डर है, क्योंकि उनको दिखाई पड़ेगा कि अब तक जिस चांद की उन्होंने चर्चा की है वह झील में बना हुआ चांद है, आकाश का असली चांद नहीं। इसलिए वे भी ध्यान से डरते हैं। ध्यान से बहुत तरह के भय हैं।
और कवि कहते ही हैं, जैसा तुमने कहा, अरुण, कि बड़ा आश्चर्य होता है कि इतने संवेदनशील हृदय वाले कवि-कलाकार भी, जो कि जीवन में सत्यम् शिवम् सुंदरम् की तलाश में निकले हैं, वे भी यहां आने से कतराते हैं!
न तो कोई सत्यम् की खोज में निकला है, न कोई शिवम् की, न कोई सुंदरम् की। ये सब बातें हैं। कविता लिखने से यह खोज नहीं होती। यह खोज तो लंबी अंतर्यात्रा है। यह तो अंतस के निखार से होती है। सत्य कहीं बाहर थोड़े ही है कि तुम खोज लोगे। सत्य भीतर है, तुम्हारे भीतर दबा पड़ा है। वहीं खोदना होगा। और सत्य ही सुंदर है। और सत्य ही शिवम् है। ये अलग-अलग नाम हैं। यह त्रिमूर्ति--सत्यम् शिवम् सुंदरम्--एक ही परमात्मा के तीन चेहरे फिर। यह ब्रह्मा, विष्णु, महेश से भी ज्यादा सुंदर त्रिमूर्ति है--सत्यम् शिवम् सुंदरम्। मगर कवि इसकी बात करते हैं। बात एक बात है, खोज बड़ी और बात है।
एक आदमी विवाह करना चाहता था। तो वह ऐसी पत्नी से विवाह करना चाहता था जो भोजन बनाने में कुशल हो, क्योंकि होटलों का भोजन खा-खा कर परेशान हो गया था। बड़ी उसने खोजबीन की, आखिर स्त्रियों के एक कालेज में एक प्रोफेसर महिला उसे जंची। उस महिला के पास पीएच.डी. थी पाकशास्त्र में। उसने उससे विवाह कर लिया। बड़ा खुश था कि सौभाग्यशाली हूं। लेकिन पहले ही दिन जब भोजन बनाने की बात उठी तो उसकी पत्नी ने कहा कि भोजन तो हमें होटल में चल कर करना पड़ेगा। भोजन कैसे बनाना, इस संबंध में मैं जानती हूं, भोजन मैंने कभी बनाया नहीं। भोजन के संबंध में व्याख्यान दे सकती हूं, शास्त्र लिख सकती हूं। आखिर मैंने पीएच.डी. लिखी, थीसिस लिखी, मुझे भोजन पकाने के लिए समय कहां मिला!
भोजन कैसे बनाना, इस संबंध में जानकारी एक बात है और भोजन बनाना बिलकुल दूसरी बात है। यह भी हो सकता है कि भोजन बनाने वाले को कुछ भी पता न हो कि भोजन कैसे बनाना। उससे अगर तुम व्याख्यान देने को कहो तो शायद वह दे भी न सके। उससे अगर तुम लेख लिखने को कहो तो शायद वह लिख भी न सके। भोजन बनाना एक और बात है।
इसलिए इस भूल में मत पड़ जाना कि कवि चूंकि सत्यम् शिवम् सुंदरम् की बातें करते हैं और कहते हैं कि हम सत्यम् शिवम् सुंदरम् के खोजी हैं, इसलिए वे खोजी हैं। नहीं, वे सिर्फ बातें ही करते हैं। बातें ही बातें हैं। न उन्हें सत्य से कोई संबंध है, न सुंदरम् से, न शिवम् से। मैं बहुत कवियों को जानता हूं, बहुतों से मेरा निकट परिचय है। सत्य की वे कैसे खोज करेंगे बिना ध्यान के? ध्यान के अतिरिक्त तो कभी कोई सत्य की खोज कर ही नहीं सका है। और जिसने सत्य नहीं जाना वह सत्य के दूसरे दो पहलू शिवम् और सुंदरम् कैसे जानेगा?
यह तो ध्यान की ही आंख है जो भीतर सत्य को देखती है, बाहर जगत में फैले हुए सौंदर्य को देखती है। यह तो ध्यान की ही आंख है जो भीतर सत्य, बाहर सौंदर्य और व्यक्तियों के अंतर-संबंधों में शिवम् को देख पाती है। सत्य है तुम्हारी अंतर-अनुभूति। सौंदर्य है सृष्टि में छिपे हुए परमात्मा की प्रतीति। और शिवम् है मनुष्य मनुष्य, मनुष्य और पशु, मनुष्य और पौधे, मनुष्य और पत्थर, इनके बीच जो संबंध है, उसका प्रसाद, उसका प्रसादपूर्ण रूप।
नहीं, तुकबंदों को इससे क्या लेना-देना! हां, सौ में कोई एकाध कवि होता है, वह भी विचार करता रहता है। और विचार करते-करते यह भ्रांति पैदा हो जाती है कि हमने जान लिया। और लोग बैठ ही जाते हैं भरोसा करके कि जान लिया, अब कहां जाना है! अगर बुद्ध, महावीर और कृष्ण से भी उनका मिलना हो तो भी उनकी उत्सुकता यह नहीं होगी कि कुछ सीख लें। उन्होंने तो मान ही लिया कि जो पाना था वह पा लिया है। इस जगत में सबसे ज्यादा अभागा व्यक्ति वही है जो हो तो बीमार, लेकिन अपने को स्वस्थ मानता हो; जो हो तो अज्ञानी, लेकिन ज्ञानी मानता हो; हो तो भोगी, लेकिन त्यागी मानता हो; हो तो संसारी, लेकिन संन्यासी मानता हो। क्योंकि जिसने अपने को अपने से विपरीत मान लिया उसके रूपांतरण की संभावना ही समाप्त हो गई।
विवाह के पंद्रह वर्षों के बाद श्रीमती चंदूलाल ने एक सुंदर लड़की को जन्म दिया। सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए। और खुशी के इस अवसर पर चंदूलाल ने एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया, जिसमें शहर के सभी गणमान्य लोगों को निमंत्रित किया गया। बड़ा धूम-धड़ाका हुआ। लोगों की प्रसन्नता का कोई अंत न था, क्योंकि विवाह के पंद्रह वर्ष बाद कन्या का जन्म हुआ था। इस महान खुशी के अवसर पर चंदूलाल के मित्र ढब्बूजी ने श्रीमती चंदूलाल से कहा, भाभीजी, काश लड़की की जगह लड़का पैदा होता तो बस मजा आ जाता! चार चांद लग जाते! जैसे सोने में सुगंध आ जाती!
श्रीमती चंदूलाल बोलीं, अरे शुक्र मनाओ भइया कि लड़की ही हो गई। यदि मैं तुम्हारे मित्र चंदूलाल के भरोसे ही बैठी रहती तो यह लड़की भी न होती।
और तुम्हारे कवि बस अपनी कविता के भरोसे बैठे हैं--न सत्यम् होने वाला है, न शिवम्, न सुंदरम्। उनकी जीवन-दिशा बौद्धिक है, हार्दिक नहीं है।
तुम कहते हो, कवि बड़े संवेदनशील होते हैं। ऐसा कहा जाता है; ऐसा माना भी जाता है कि होना चाहिए कवि को संवेदनशील। मगर ये तो अपेक्षाएं हैं, आदर्श हैं; ऐसा होता नहीं। हां, कभी-कभी क्षण होते हैं कवि के जीवन में जब वह संवेदनशील होता है। उन्हीं क्षणों में थोड़ी-बहुत शायद झलक उसको चांद की मिल जाती हो। मगर ये क्षण तो आए और गए। और जब ये क्षण चले जाते हैं तो कवि साधारण लोगों से भी ज्यादा कठोर हो जाता है।
यह जीवन के समझने जैसे सूत्रों में से एक है। जो कभी-कभी किन्हीं क्षणों में बहुत संवेदनशील हो जाता है, वह फिर संतुलन बनाने के लिए, जब वे क्षण चले जाते हैं, तो बहुत कठोर हो जाता है।
जीवन में हमेशा संतुलन होता है। इसलिए तुम अक्सर देखोगे, जो स्त्री तुम्हें बहुत प्रेम करती है वह कभी-कभी तुम्हें बहुत घृणा भी करेगी। जो तुम्हारी सदा सेवा करती है, कभी-कभी अति क्रुद्ध भी हो जाएगी। मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि जब पति और पत्नी में झगड़ा बंद हो जाए तो समझ लेना संबंध समाप्त हो गया। उनमें झगड़ा चलता है, वह इस बात का सबूत है कि उनमें अभी प्रेम चलता है।
यह बात उलटी लगेगी, मगर यह सच है। झगड़ा इस बात का सबूत है कि किन्हीं-किन्हीं तरल क्षणों में वे एक-दूसरे के प्रति बहुत प्रेम से भर जाते हैं। और फिर जब उन्हें याद आती है कि अरे, हम क्या कर गुजरे! किसके प्रति प्रेम प्रकट कर दिया! तो फिर बदला। जब तक बदला न ले लें तब तक फिर चैन नहीं आती। फिर जब कठोर हो जाते हैं बदले में, तो फिर पछतावा होता है कि अरे, अपने ही पति के प्रति, अपनी पत्नी के प्रति ऐसा दर्ुव्यवहार! फिर अति प्रेम पैदा होता है। और यह खेल जिंदगी भर जारी रहता है। यह झूला है जो पति-पत्नी झूलते रहते हैं। ऐसे कई झूले हैं जीवन में और तरहत्तरह के लोग झूला झूल रहे हैं।
नागार्जुन की एक कविता है: झूला झूलें जवाहरलाल!
जवाहरलालजी संवेदनशील व्यक्ति थे, बहुत कवि हृदय थे। मगर उतने ही कठोर भी, उतने ही क्रोधी भी। उतने ही तरल। भाव आ जाए तो सब कुछ करने को तैयार और जरा सी बात में बिगड़ भी उठें तो सब होश-हवाश खो दें।
मगर यह जवाहरलाल का ही मामला नहीं है, सभी जवाहरलाल झूला झूल रहे हैं। एक अति से दूसरी अति पर, लोग घड़ी के पैंडुलम की तरह हैं। तुम अपने भीतर इस पैंडुलम को घूमता देखो और धीरे-धीरे इसके कम से कम विस्तार को कम करो, इसकी चाप को कम करो। धीरे-धीरे-धीरे एक दिन जब तुम्हारा पैंडुलम बीच में थिर हो जाएगा--कि जवाहरलाल झूला झूलेंगे ही नहीं, कि झूला बिलकुल ठहर जाएगा--उस ठहरी हुई चित्त की दशा में कवि ऋषि हो जाता है। उस चित्त की ठहरी हुई दशा में चित्त के पार हो जाता है, चित्त का अतिक्रमण हो जाता है।
और तुमने पूछा अरुण कि क्या ध्यान और सृजन साथ-साथ संभव नहीं हैं?
साथ-साथ ही संभव हैं। साथ-साथ न हों तो संभव ही नहीं हैं। कोई ध्यानी हो और उसके जीवन में सृजनात्मकता न हो, तो समझना उसका ध्यान थोथा और पाखंड।
लेकिन सृजनात्मकता के सीमित अर्थ मत लेना। क्योंकि बुद्ध ने न तो कोई कविता रची, न कोई मूर्ति बनाई, न कोई पेंटिंग। लेकिन बुद्ध ने जो भी किया वह सभी सृजनात्मक है। लोगों की आत्माएं रंग दीं! पत्थर जैसे लोगों में परमात्मा की मूर्ति को निखार कर प्रकट कर दिया! अनेक-अनेक लोगों में चेतना के दीये जला दिए! उठे तो सृजन, बैठे तो सृजन। जो छुआ, मिट्टी को छुआ तो सोना बना दिया! सृजनात्मकता के सीमित अर्थ नहीं हैं। बुद्धों का सृजन सूक्ष्म है। वे कोई छैनी-हथौड़ी लेकर पत्थर में मूर्ति खोदेंगे, ऐसा नहीं है। पर उनके हाथ में भी छैनी-हथौड़ी है--दिखाई नहीं पड़ने वाली। और वे भी मूर्ति निर्मित करते हैं--लेकिन चैतन्य की; चिन्मय; मृण्मय नहीं। वे भी उघाड़ते हैं परमात्मा को, परम सौंदर्य को, मगर देखने वाले ही देख सकते हैं। सबको नहीं दिखाई पड़ेगा। वे भी वीणा के तार छेड़ते हैं, मगर वह वीणा तुम्हारे हृदय की वीणा है। और जिनके तार छिड़ गए हैं वही जानते हैं। जिन्होंने पीया है, वही उस स्वाद को पहचानते हैं।
ध्यान है अगर सच्चा तो सृजन तो होगा ही होगा, क्योंकि ध्यान परमात्मा से जोड़ेगा और परमात्मा स्रष्टा है। परमात्मा से जुड़ कर फिर बचता क्या है--सिवाय इसके कि तुम भी स्रष्टा हो जाओ! और जो सच्चे सृजनात्मक लोग हैं, वे सच्चे हो ही नहीं सकते जब तक कि ध्यान न हो। तब तक उनकी सृजनात्मकता सृजनात्मकता नहीं है, बस जोड़त्तोड़ है।
जिनको हम सृजनात्मक कहते हैं आमतौर से, वे करते क्या हैं? कुछ इधर का लिया, कुछ उधर का लिया। कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा! बस वे इधर से कुछ, उधर से कुछ जोड़-जाड़ कर...मगर उसको कोई सृजन नहीं कहा जा सकता; उसमें कुछ नया नहीं है, कुछ नूतन नहीं है; जोड़त्तोड़ है।
अगर ध्यान न हो तो तुम जो भी रचोगे वह जोड़त्तोड़ होगा, रचना नहीं होगी। और अगर सृजनात्मकता न हो तो तुम जिसको ध्यान कहते हो वह थोथा होगा, मिथ्या होगा। आंख बंद करके आसन मार कर बैठ जाते होओगे, मगर बस गोबर-गणेश! भीतर कुछ भी नहीं। भीतर चल रही है खोपड़ी में वही दुनिया, वही उपद्रव, वही आपाधापी, वही विचारों और वासनाओं का व्यवसाय और व्यापार।
अरुण, ध्यान और सृजनात्मकता दोनों एक ही सत्य की अनुभूतियां हैं, एक ही सत्य की अभिव्यक्तियां हैं।


तीसरा प्रश्न:

भगवान! मैं जब भी पूना आता था, पूज्य दद्दाजी का अनंत स्नेह मुझ पर बरसता था। वे चले गए। और भगवान, आप भी जब प्रवचन और दर्शन से उठ कर वापस जाते हैं तो हृदय में टीस सी उठती है कि कहीं अगर इस सदगुरु का साथ छूट गया तो फिर हमारा क्या होगा? ऐसे बुद्ध सदगुरु तो सदियों में मिलते हैं! भगवान, हम संन्यासियों पर फिर यह अमृत-वर्षा कौन करेगा? बताने की कृपा करें।

कृष्ण सत्यार्थी! कल की न सोचो, आज काफी है। आज पीओ! कल के सोच में आज न गंवाओ।
जीसस अपने शिष्यों के साथ एक रास्ते से गुजर रहे थे और उन्होंने शिष्यों से कहा, देखो, खेत में खिले हुए लिली के फूल देखते हो! इन लिली के फूलों के सौंदर्य को देखते हो! इनके सौंदर्य का राज जानते हो? देखते हो इनकी महिमा! सम्राट सोलोमन भी, अपने सुंदरतम वस्त्रों में सजा हुआ, इतना सुंदर न था। रहस्य क्या है इन लिली के फूलों का?
शिष्य तो चुप रहे। उन्हें तो पता भी नहीं था कि यह भी कोई आध्यात्मिक प्रश्न है। लिली के फूलों का रहस्य उन्होंने कभी सोचा भी न था। जीसस ने स्वयं ही उत्तर दिया कि इनका रहस्य है कि ये कल के संबंध में नहीं सोचते। ये अभी जीते हैं, यहीं जीते हैं। इसीलिए इतने परम सुंदर हैं।
छोटे-छोटे बच्चों में तुम जो सौंदर्य देखते हो वह क्यों है? वह लिली के फूलों का सौंदर्य है। तुमने छोटे बच्चों में कभी कोई कुरूप बच्चा देखा? बड़ा मुश्किल है कुरूप बच्चा खोजना। सभी बच्चे प्यारे लगते हैं। और आदमी के ही बच्चे नहीं, कुत्ते, बिल्ली, किसी के भी बच्चे। कुत्तों के पिल्ले देखे? सभी अच्छे लगते हैं, सभी प्यारे लगते हैं, सभी में कुछ महिमा मालूम होती है। लेकिन जैसे ही बड़े होते हैं, भेद पड़ने शुरू होते हैं--फिर चाहे मनुष्य के बच्चे हों चाहे पशुओं के। बाद में तो बहुत थोड़े से लोग सुंदर रह जाते हैं। कभी-कभार किसी सुंदर व्यक्ति से मिलना होता है--सच में जो सुंदर हो। नाक-नक्श का ही सौंदर्य नहीं, आत्मा का सौंदर्य जिसमें झलकता हो--मुश्किल से कभी ऐसे व्यक्ति का मिलना होता है। क्यों? ये सारे सुंदर बच्चे कहां खो जाते हैं? ये कल की चिंता में लग जाते हैं। और जहां चिंता आई वहां चिता दूर नहीं है, समझ लेना। चिंता चिता है।
एक पुरानी कहानी है पंचतंत्र में। एक गांव में एक युवक था। उसका कुल काम इतना था--डट कर दूध पीना, दंड-बैठक मारना और हनुमानजी के मंदिर में पड़े रहना। और गांव के लोग उसे प्रेम करते थे, क्योंकि उसके कारण गांव की दूर-दूर तक ख्याति थी। उस जैसा पहलवान नहीं था। और उसको कुछ काम ही नहीं था और, बस दूध पीना, दंड-बैठक मारना और हनुमानजी का सत्संग करना। लेकिन सम्राट उससे बहुत नाराज था। क्योंकि सम्राट जब भी अपने हाथी पर बैठ कर निकलता मंदिर के सामने से, वह युवक कभी-कभी बाहर आ जाता और हाथी की पूंछ पकड़ लेता, और सम्राट अटक जाता। हाथी न चल पाए। ऐसा उस युवक का बल था!
अब तुम सोच सकते हो कि सम्राट बैठा हाथी पर, महावत हाथी को मार रहा है, धक्के दे रहा है कि चल! और वह युवक पीछे पूंछ पकड़े खड़ा है और हाथी सरकता नहीं! तो भद्द हो जाती, भीड़ लग जाती। तुम सम्राट की हालत देखते हो कैसी बुरी हो जाती होगी--कि मेरी भी क्या स्थिति है! हाथी सही अपने पास, मगर किस काम का है!
आखिर सम्राट ने एक फकीर से कहा कि कुछ रास्ता बनाना पड़ेगा। क्योंकि बाहर निकलने में मैं डरता हूं कि कहीं वह युवक न मिल जाए। वह मेरे हाथी की दुर्गति कर देता है, मेरी दुर्गति कर देता है। वह तमाशा बना देता है! और वह मंदिर बीच बाजार में है। और एक ही रास्ता है, वहां से गुजरे बिना बन भी नहीं सकता। कहीं भी जाओ तो वहीं से गुजरना पड़ता है। और उस युवक को कोई धंधा नहीं है। बस वह वहीं बैठा रहता है हनुमानजी के मंदिर में। मैं इतना डरने लगा हूं कि मैं पहले खबर करवा लेता हूं कि वह युवक मंदिर में है कि कहीं गया हुआ है? वह कहीं जाता भी नहीं। बस या तो दंड-बैठक मारता रहता है या दूध पीता रहता है। बस हनुमानजी और वह, सत्संग! क्या करूं?
उस फकीर ने कहा, फिक्र न करो। तुम एक काम करो, युवक को बुलवाओ।
युवक बुलाया गया। फकीर ने कहा कि देख, कब तक लोगों पर निर्भर रहेगा? किसी दिन अगर लोगों ने खिलाना-पिलाना बंद कर दिया, फिर तेरा क्या होगा?
युवक ने यह कभी सोचा ही न था--कि फिर क्या होगा? "फिर' कभी सवाल ही नहीं उठा था। फुरसत कहां थी फिर-इत्यादि की! उसने कहा, यह मैंने कभी सोचा नहीं।
तो उस फकीर ने कहा, सोच, नहीं तो बाद में मुश्किल में पड़ेगा। जवानी हमेशा थोड़े ही रहेगी। आज है, कल खतम हो जाएगी। आज लोग खिलाते-पिलाते हैं, क्योंकि गांव की प्रतिष्ठा है कि हमारे पास पहलवान है, जैसा पहलवान कहीं भी नहीं। मगर कल बूढ़ा हो जाएगा, फिर क्या होगा? सुन मेरी। सम्राट राजी है, तुझ पर बहुत प्रसन्न है। वह तुझे एक रुपया रोज देने को राजी है। उन दिनों एक रुपया चांदी का एक महीने के लिए काफी था। एक रुपया रोज देने को राजी है, मगर एक छोटा सा काम करना पड़ेगा।
उस युवक ने कहा, काम! काम तो मैं कुछ जानता नहीं। दंड-बैठक लगा सकता हूं, दूध पी सकता हूं और हनुमानजी का सत्संग कर सकता हूं। काम मैं कुछ और तो जानता नहीं। पढ़ा-लिखा भी ज्यादा नहीं, बस हनुमान-चालीसा। वह भी मुझे याद है, वह भी मैं पढ़ नहीं सकता। तो काम मैं क्या करूंगा?
फकीर ने कहा, काम ऐसा देंगे जो तू कर सकता है। बड़ा सरल काम है। रोज सुबह छह बजे मंदिर का दीया बुझा दिया कर और रोज शाम छह बजे जला दिया कर। इसका तुझे एक रुपया मिलेगा।
उसने कहा, यह काम सरल है। मैं मंदिर में पड़ा ही रहता हूं, सांझ जला दूंगा छह बजे, सुबह छह बजे बुझा दूंगा और एक रुपया मिलेगा रोज। युवक राजी हो गया।
सम्राट ने कहा, इससे क्या होगा? और आपने एक मुसीबत कर दी। वह और दूध पीएगा! और यह कोई काम है?
फकीर ने कहा, तुम थोड़ा रुको, जल्दी न करो। हमारे अपने रास्ते होते हैं। महीने भर बाद इसका उत्तर दूंगा। महीने भर तक तुम गांव में बाहर निकलना ही मत।
महीने भर बाद फकीर ने कहा कि अब तुम अपने हाथी पर बैठ कर जाओ।
सम्राट निकला अपने हाथी पर। महीने भर से युवक राह भी देख रहा था कि सम्राट निकला नहीं! उसको भी मजा आता था--हाथी की पूंछ पकड़ कर रोक देना। उस दिन उसने हाथी की पूंछ पकड़ कर रोका कि घिसट गया, बुरी तरह घिसट गया, बड़ी भद्द हो गई। महावत को हाथी को मारना भी नहीं पड़ा। हाथी ही घसीट दिया युवक को।
सम्राट ने फकीर से पूछा, तुमने क्या किया? मैं तो सोचता था उलटी हालत हो जाएगी।
उसने कहा कि नहीं, इसको फिक्र में डाल दिया। अब इसको एक चिंता बनी रहती है कि छह बजे कि नहीं? यह बार-बार लोगों से पूछता है, भाई, कितने बजे? छह तो नहीं बज गए? रात भी चैन से सो नहीं पाता, दो-चार दफे उठ आता है कि छह तो नहीं बज गए, वह दीया बुझाना है। शाम छह बजे ठीक दीया जलाना है। इसकी पुरानी मस्ती चली गई। इसको मैंने चिंता दे दी। इसकी मस्ती चली गई, इसका बल चला गया।
कृष्ण सत्यार्थी, कल की क्या चिंता! मैं यहां हूं, अभी हूं। तुम यहां हो, अभी हो। पीओ अमृत! कल से ही तो तुम्हें मुक्त करना है। और तुम मेरे बहाने भी कल की चिंता लोगे, तब तो यह बात उलटी हो गई। कल जो बीत गया, बीत गया। कल जो आया नहीं, नहीं आया। और कभी आएगा भी नहीं। जो आता है वह सदा आज है। बस आज में जीओ।
तुम कहते हो: "पूज्य दद्दाजी का अनंत स्नेह मुझ पर बरसता था।'
वह हो गया बीता कल। भूलो अतीत को। अगर उनका प्रेम तुम पर बरसा, तो तुमने एक ही आनंद जाना--किसी का प्रेम पाने का। मगर तुम्हें दूसरे आनंद की पहचान नहीं कि वे कितने आनंदित थे प्रेम देने में! ऐसा ही अब तुम प्रेम दो। और मैं तुमसे कहता हूं--प्रेम पाने में कुछ भी नहीं है, प्रेम देने में अनंत आनंद है! प्रेम पाने में आखिर तुम भिखारी होते हो, प्रेम देने में तुम सम्राट होते हो।
तुम तो पूज्य दद्दाजी से थोड़े दिन से परिचित थे, मुझे तो उन्होंने जन्म दिया, तो जीवन भर से मैं उन्हें जानता था। उनका एक ही आनंद था: बांटो! जो भी है, बांटो! उनकी जो तस्वीरें मुझे खयाल हैं, वे बस सबका सार एक ही है कि बांटो, जो भी है। नहीं भी उनके पास कुछ होता तो भी बांटने की ही चेष्टा में वे संलग्न रहते थे। उन्हें बांट कर आनंद मिला। बांटते-बांटते उन्हें बुद्धत्व मिल गया! तुम कब तक लेते रहोगे? एक सीख पकड़ लो।
तुमने घटना का एक ही पहलू देखा कि वे तुम्हें प्रेम देते थे और तुम्हें अच्छा लगता था। मगर तुमने घटना का दूसरा और गहरा पहलू नहीं देखा कि उनको प्रेम देने में कितना अच्छा लगता था! और वही असली बात है। प्रेम दो, और तुम पाओगे कि तुम्हारा भी आनंद अनंतगुना हो गया।
दोनों हाथ उलीचिए, यही सज्जन को काम!
जैसे नाव में पानी भर जाता है तो आदमी दोनों हाथ उलीचता है, ऐसा जो भी तुम्हारे पास हो, दोनों हाथों से उलीचो, बांटो। और जितने ज्यादा लोगों को बांट सको उतना ही तुम्हारा आनंद फैलता जाएगा। प्रेम का जितना तुम्हारा विस्तार होगा उतनी ही तुम्हारे आनंद की गहराई होगी।
मगर कल में न अटको। कल में अटके तो आंसुओं में उलझ जाओगे। जो बीता सो बीता। जो गया सो गया। अब लौट-लौट कर पीछे मत देखो।
तुम न केवल पीछे देख रहे हो, तुम आगे भी देख रहे हो। और पीछे और आगे जुड़े हैं। अतीत और भविष्य संयुक्त हैं। जो पीछे देखता है वही आगे भी देखता है। इस दृष्टि से हमारी भाषा दुनिया की अदभुत भाषा है। हम बीते हुए दिन को भी कल कहते हैं और आने वाले दिन को भी कल कहते हैं, क्योंकि दोनों एक से हैं। दुनिया की किसी भाषा में दोनों का एक ही नाम नहीं है। इसलिए मुझे तो कई दफा मुश्किल हो जाती है, क्योंकि दुनिया में कोई और भाषा नहीं है जिसमें दोनों का नाम एक ही हो। तो कई दफा मुझे तय करना मुश्किल हो जाता है कि टुमारो का मतलब टुमारो कि यस्टरडे? यस्टरडे का मतलब यस्टरडे कि टुमारो?
हमारे पास शब्द है--कल, दोनों के लिए एक शब्द। और दोनों शब्द बने हैं काल से। काल यानी समय। और काल यानी मृत्यु भी! हमारी भाषा अनूठी है, उसमें ज्ञानियों की छाप है, उसमें बुद्धों के हस्ताक्षर हैं। उसमें कुछ धुन उनकी बजती रह गई है। ऐसी भी कोई भाषा नहीं है दुनिया में जिसमें मृत्यु और समय के लिए एक ही शब्द हो--काल। क्यों? क्योंकि समय ही मृत्यु है। जो समय में जीएगा वह मरेगा। जो समयातीत को जान लेगा, कालातीत को जान लेगा, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं है; वह अमृत है, वह शाश्वत है।
और काल से बने हैं कल। साधारणतः हम समझते हैं कि समय के तीन पहलू हैं--कल, आज और आने वाला कल। नहीं, समय के केवल दो पहलू हैं--बीता कल और आने वाला कल। आज समय का हिस्सा नहीं है। अभी, यही क्षण, समय का हिस्सा नहीं है। बीता क्षण समय है। आने वाला क्षण समय है। समय अभाव का नाम है। जो है वह समय नहीं है। जो है वह तो परमात्मा है। जो है वह तो कालातीत है।
तो कृष्ण सत्यार्थी, तुम बीते कल में उलझे--कि दद्दाजी का प्रेम याद आता है। अब तुम जब भी यहां आओगे, उनकी कमी तुम्हें खलेगी। अतीत तुम पर बोझिल होता जाएगा। और अब उन्हें पाने का तो कोई उपाय नहीं। अब सिर्फ तुम परेशान हो सकते हो। और उसी परेशानी से अब एक नई परेशानी पैदा हो रही है।
तुम कहते हो कि जब आप प्रवचन से या दर्शन से उठ कर वापस जाते हैं, तो हृदय में टीस सी उठती है कि अगर इस सदगुरु का साथ छूट गया तो फिर हमारा क्या होगा?
भाई मेरे, तुम्हारा जो कुछ करना है अभी करो! होगा की बात ही मत लाओ। काल करै सो आज कर। कल पर मत छोड़ो। बहुरि करोगे कब! अगर कल पर छोड़ा तो कभी न कर सकोगे, क्योंकि कल कभी आता ही नहीं; जब भी आता है, आज। और आज में करने की तुम्हारी आदत नहीं; कल पर छोड़ते हो। तो छोड़ते ही चले जाओगे। जिसने कहा कल करेंगे, अच्छा होता वह कह देता कि नहीं करेंगे; उसमें कम से कम सचाई होती। कल करेंगे, इसमें झूठ है; इसमें अपने को छिपा लिया उसने; न करने की वृत्ति को दबा लिया; ओढ़ लिया ऊपर से पाखंड, मुखौटा चढ़ा लिया। दूसरों को धोखा होगा, वह तो ठीक है, खुद भी धोखा खा जाओगे।
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।
पल में तो प्रलय हो सकती है। अभी हो, अभी नहीं हो जाओगे। दद्दाजी अभी थे, अभी नहीं--इसमें कुछ सीखो। साढ़े तीन बजे दोपहर मैं उनको देखने गया, बातचीत की, बैठे--और सांझ विदा हो गए!
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।
कल पर मत टालो। आज भी बड़ा शब्द है, ज्यादा तो अच्छा हो--अब।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।
लेकिन लोग ऐसे मूढ़ हैं कि जीवन के श्रेष्ठतम सूत्रों से भी गलत अर्थ निकाल लेते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक मनोवैज्ञानिक से पूछा कि मैं क्या करूं? मेरे दफ्तर में लोग काम ही नहीं करते! जिससे कहो वही कहता है: कल देखेंगे। कि कर लेंगे, क्या जल्दी पड़ी है! फाइलें इकट्ठी होती जाती हैं, कोई काम करता नहीं। महा अलाल इकट्ठे हो गए हैं। मैं क्या करूं?
मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह सूत्र हरेक की टेबल पर टांग दो--
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।
जंची बात नसरुद्दीन को, उसने कहा यह ठीक है। बनवा कर सुंदर तख्तियां हरेक कमरे में, हरेक कार्यकर्ता के सामने, हरेक कर्मचारी के सामने टांग दीं बड़े-बड़े अक्षरों में।
तीन दिन बाद मनोवैज्ञानिक ने फोन किया कि नसरुद्दीन, क्या हाल हैं?
नसरुद्दीन ने कहा, अस्पताल में भरती हूं। आप आ जाएं। और देर न करें। पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब। आ ही जाएं शीघ्र, क्योंकि शरीर में फ्रैक्चर ही फ्रैक्चर हो गए हैं। क्या कमाल का सूत्र दिया आपने!
मनोवैज्ञानिक तो बहुत हैरान हुआ। भागा, देखा तो पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं नसरुद्दीन पर! पलस्तर चढ़ा है--पैर पर, हाथ पर, खोपड़ी पर। पूछा, यह हुआ क्या? यह दुर्गति कैसे हुई?
उसने कहा, यह तुम्हारे सूत्र की कृपा है। अभी उठ नहीं सकता, नहीं तो वह मजा चखाता...। क्योंकि जैसे ही मैंने यह तख्ती टांगी, उपद्रव हो गया। वह जो खजांची था वह सारी तिजोरी लेकर नदारद हो गया। और एक चिट लिख कर छोड़ गया कि जिंदगी भर से सोच रहा था कि कब तिजोरी लेकर नदारद हो जाऊं, आपने क्या सूत्र टांगा कि मैंने सोचा बात तो बिलकुल सच है--पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब! सो मैं तो जाता हूं, जयरामजी की!
और वह जो मैनेजर था वह मेरी टाइपिस्ट को लेकर भाग गया। वह भी लिख कर नोट छोड़ गया कि नजर तो मेरी तुम्हारी टाइपिस्ट पर बहुत दिन से थी, मगर तुम्हारे डर से छिप-छिप कर छेड़ खानी करता था। मगर तुमने सूत्र क्या टंगवा दिया, मैंने भी सोचा बात तो सच है, जिंदगी यूं ही बीती जा रही है, ऐसे ही ख्वाब देखते-देखते। तो अब जा रहा हूं और तुम्हारी टाइपिस्ट को भी भगाए लिए जा रहा हूं। अब कहीं रहेंगे छिप कर और जीएंगे मौज से।
और मेरा जो दरबान है, वह एकदम भीतर घुसा और लगा मुझे पीटने। मैंने पूछा, भाई, तू यह क्या करता है? उसी ने ही ये मेरी हड्डी-पसली तोड़ दीं।
उसने कहा कि चाहता तो कब से करना था यह कि तुम्हारी हड्डी-पसली तोड़ दूं। लेकिन यह सोच कर कि देखेंगे, फिर देखेंगे...बाल-बच्चों वाला आदमी हूं, कोई झंझट हो, पुलिस हो, अदालत हो। मगर तुमने तख्ती क्या टांगी, मैंने कहा कि बात तो ठीक है।
मनोवैज्ञानिक ने कहा कि मैं बड़ा दुखी हूं। मुझे क्या पता था कि सूत्र का ऐसा परिणाम होगा! अब यह सूत्र किसी को न दूंगा। मुझे क्षमा करो। बहुत दुख हो रहा होगा तुम्हें, जगह-जगह पीड़ा हो रही होगी।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जब हंसता हूं तभी दर्द होता है, वैसे नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक ने कहा, हंसते किसलिए हो?
तो उसने कहा, हंसता इसलिए हूं कि क्या गजब दुनिया है! काहे के लिए सूत्र टांगा था और क्या हो गया! कैसे गजब के लोग हैं! इससे कभी-कभी हंसी आ जाती है भीतर ही भीतर तो दर्द होता है, हंसी में; नहीं तो वैसे तो सब शांत पड़ा हूं तो ठीक है।
कृष्ण सत्यार्थी, न तो बीते कल की सोचो, न आगे कल की सोचो। इस क्षण मैं हूं, इस क्षण तुम हो--इस मिलन को गहराओ। इस मिलन को पूर्ण बनाओ, इसे समग्र करो।
मन मृग बावरे
मृग-मरीचिका है जग,
अच्छा नहीं प्यारे
इससे लगाव रे!

प्यास बुझाने को
पोखर बहुत हैं यहां,
अच्छा नहीं प्यारे
सरवर का चाव रे!

प्राप्य की अवहेला
और वह भी अप्राप्यहित,
अच्छा नहीं प्यारे
जुए का दांव रे!

जो है उसे हम उसके लिए दांव पर लगाते रहते हैं जो नहीं है, या नहीं हो गया है। अच्छा नहीं दांव रे!
प्राप्य की अवहेला
और वह भी अप्राप्यहित,
अच्छा नहीं प्यारे
जुए का दांव रे!
मगर यहां सब यही कर रहे हैं। जागो! इससे बचो! और मत चिंता लो कि मेरा साथ छूट गया तो फिर क्या होगा! सारी शक्ति इसमें लगाओ कि साथ है तो कुछ हो। फिर क्या होगा, साथ छूट गया। जब साथ होकर कुछ न हुआ तो साथ छूट कर क्या हो जाएगा? जब साथ रह कर कुछ नहीं पाया तो साथ छूटने में भी क्या खो दोगे?
और अगर साथ रह कर कुछ पा लो तो साथ छूटेगा ही नहीं, इतना मेरी तरफ से आश्वासन है। अगर मेरी सुनो, अगर मेरे साथ जुड़ जाओ--और वह अभी हो सकता है, कल नहीं होगा--तो साथ नहीं छूटेगा।
दद्दाजी और तुम्हारा साथ छूट गया; मेरा और उनका साथ नहीं छूटा है। इसलिए मेरी आंखें गीली भी नहीं हुईं। साथ ही नहीं छूटा है तो आंखें गीली करने का प्रयोजन क्या है? मैं उन्हें खुशी से विदा दे दिया, क्योंकि विदा में वे कहीं जा ही नहीं रहे हैं। यहां कुछ मिटता नहीं है।
मगर हमारा साथ ही कहां है, इसलिए छूट जाता है। अब तुम चौंकोगे। मैं कहता हूं: साथ नहीं है, इसलिए छूट जाता है। साथ हो तो छूटता ही नहीं।
साथ बना लो। और इसे कल पर मत टालो। यह जुआ महंगा पड़ सकता है। साथ बन जाए जो क्रांति हो जाए।
बांध सकते हैं न मुझको
जड़ जगत के क्षुद्र बंधन।
रोक सकते हैं न मेरा
मार्ग झंझा या प्रभंजन।

मैं नहीं हिम, जो कि रवि के
प्रखर कर से पिघल जाता।
मैं नहीं अलि, जो मुकुल पर
मुग्ध हो पथ भूल जाता।

मैं नहीं शतदल, जिसे जब,
चाहता सविता खिलता।
मैं नहीं चातक, जिसे जब,
चाहता स्वाति पिलाता।

मैं न केकी-कोकिला, घन
घुमड़ कर जिनको मना लें।
या शलभ, जिनको कोई भी
दीप दीपित कर बुला लें।

मैं, न होकर भी नहीं हूं,
रिक्तता का अंश आली।
दासता की आज मैंने
शृंखलाएं तोड़ डालीं!

और दासता की दो ही शृंखलाएं हैं: दो कल--बीता कल, आने वाला कल। इनकी ही तुम्हारे ऊपर जंजीरें हैं। इन दो को तोड़ डालो। फिर तुम्हें कोई भी न रोक सकेगा--न तूफान, न आंधी; न झंझा, न प्रभंजन। फिर तुम परमात्मा में आरूढ़ हो गए। और परमात्मा में आरूढ़ हो जाओ तो ही सदगुरु के साथ का कुछ अर्थ हुआ, तो ही किसी बुद्ध के पास बैठने में सार्थकता है।
कृष्ण सत्यार्थी, छोड़ो कल, छोड़ो काल। डूबो दो क्षणों के बीच में जो है अंतराल, उसमें। वही द्वार है परमात्मा का, शाश्वत का, सनातन का। एस धम्मो सनंतनो!

आज इतना ही।