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बुधवार, 22 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल--(प्रवचन--05)



जागे में फिर जागना—(प्रवचन—पांचवां)
दिनांक १५ मार्च, १९७९;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
तज बिकार आकार तज, निराकार को ध्यान।
निराकार में पैठकर, निराधार लौ लाय।।
प्रथम ध्यान अनुभौ करै, जासे उपजै ग्यान।
दरिया बहुत करत हैं, कथनी में गुजरान।।
पंछी उड़ै गगन में, खोज मंडै नहिं मांहिं।
दरिया जल में मीन गति, मारग दरसै नहिं।।
मन बुधि चित पहुंचै नहीं, सब्द सकै नहिं जाय।
दरिया धन वे साधवा, जहां रहे लौ लाय।।
किरकांटा किस काम का, पलट करे बहुत रंग।

जन दरिया हंसा भला, जद तक एकै रंग।।
दरिया बगला ऊजला, उज्जल ही होय हंस।
ए सरवर मोती चुगैं, वाके मुख में मंस।।
जन दरिया हंसा तना, देख बड़ा ब्यौहार।
तन उज्जल मन ऊजला, उज्जल लेत अहार।।
बाहर से उज्जल दसा, भीतर मैला अंग।
ता सेती कौवा भला, तन मन एकहि रंग।।
मानसरोवर बासिया, छीलर रहै उदास।
जन दरिया भज राम को ,जब लग पिंजर सांस।।
दरिया सोता सकल जग, जागत नाहीं कोय।
जागे में फिर जागना, जागा कहिए सोय।।
साध जगावै जीव को, मत कोई उट्ठे जाग।
जागे फिर सोवै नहीं, जन दरिया बड़ भाग।।
हीरा लेकर जौहरी, गया गंवारै देस।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस।।
दरिया हीरा क्रोड़ का, (जाकी) कीमत लखै न कोय।
जबर मिलै कोई जौहरी, तबही पारख होय।।

फिर दर्द उठा है, आंख भरी
सीने में बाए कोने से
फिर हूक उठी गहरी—गहरी
दिन तो दुनिया की ले दे में
कट गया चलो जैसेत्तैसे
पल पल पहाड़ जैसा भारी
यह रात कटेगी पर कैसे
खायेगी मेरा हृदय नोंच
यह सांध्य चील क्रूरता भरी कांटे बबूल के पलकें में
अनजाने ही उग आएंगे
मैं तो जागूंगा सो कर भी
सब सो—सो कर जग जाएंगे
टूटेगा तक का पोर—पोर
जैसे शराब उतरी—उतरी
फिर सुलगेगा चंदन भीतर
पर बाहर धुआं न आएगा
आवाज नहीं होगी कोई
घुन भीतर—भीतर खाएगा
फिर मुझको डसकर उलटेगी
वह स्मृतियों की सांपिन ठहरी
कब रेत बंधी है मुट्ठी में
कब अंजुरी में जल ठहरा है
कहती भी क्या गूंगी पीड़ा
सुनता भी क्या जग बहरा है
जिंदगी बूंद है पारे की
जो एक बार बिखरी, बिखरी
फिर दर्द उठा है, आंख भरी
सीने में बाएं कोने से
फिर हूक उठी गहरी—गहरी
इस जीवन को रास्ते में मत गंवा देना। चूंकि मिल गया है अनायास, निर्मूल्य मत समझ लेना। कीमत तो इसकी कोई भी नहीं, पर मूल्य इसका बहुत है। कीमत और मूल्य का भाषाकोश में तो एक ही अर्थ है, लेकिन जीवन के कोश में एक ही अर्थ नहीं। जिन चीजों की कीमत होती है उनका कोई मूल्य नहीं होता और जिन चीजों का मूल्य होता है उनकी कोई कीमत नहीं होती।
प्रेम का मूल्य है, कीमत क्या? ध्यान का मूल्य है, कीमत क्या? स्वतंत्रता का मूल्य है, कीमत क्या? और बाजार में बिकती हुई चीजें हैं, सब पर कीमत लगी है, पर उनका मूल्य क्या है?
जो व्यक्ति के ही जगत में जीता है वह संसारी है। जो मूल्य के जगत में प्रवेश करता है, वह संन्यासी है। मूल्य प्रसाद है परमात्मा का। लेकिन चूंकि प्रसाद है, इसलिए चूक जाने की संभावना है। कीमत देनी पड़ती तो शायद तुम जीवन का मूल्य भी करते। चूंकि मिल गया है; तुम्हारी झोली में कोई अनजान ऊर्जा उसे भर गई है; तुम्हें पता भी नहीं चला और कोई तुम्हारे प्राणों में श्वास फूंक गया है; तुम्हें खबर भी नहीं, कौन तुम्हारे हृदय में धड़क रहा है—इसलिए भूले—भूले कंकड़—पत्थर बीन—बीन कर ही जीवन को गंवा मत देना।
जब तक परमात्मा की खोज शुरू न हो तब तक जानना ही मत कि तुम जिए। जीवन की शुरुआत परमात्मा की खोज से ही होती है। जन्म काफी नहीं है जीवन के लिए। एक और जन्म चाहिए। और धन्यभागी हैं वे, जिनके जीवन में हूक उठती है, पुकार उठती है; पीड़ा का जिन्हें अनुभव होता है; जो परमात्मा की तलाश पर निकल पड़ते हैं; जो सब दांव पर लगाने को राजी हो जाते हैं।
फिर दर्द उठा है आंख भरी
सीने में बाएं कोने से
फिर हूक उठी गहरी—गहरी
कब रेत बंधी है मुट्ठी में
कब अंजुरी में जल ठहरा है
कहती भी क्या गूंगी पीड़ा
सुनता भी क्या जग बहरा है
जिंदगी बूंद है पारे की
जो एक बार बिखरी, बिखरी
सावधान! जिंदगी गंवानी तो बहुत आसान है, कमानी बहुत कठिन है। पारे की बूंद है, बिखरी तो बिखरी, फिर सम्हाल न सकोगे। और क्षण—क्षण बूंद बिखरती जा रही है और तुम हो कि खोए हो न मालूम किस व्यर्थता के जाल में—कोई धन, कोई पद, कोई प्रतिष्ठा...दो कौड़ी उनका मूल्य है; शायद दो कौड़ी भी उनका मूल्य नहीं है। कंकड़ पत्थर बीन रहे हो, जब कि हीरे की खदान बहुत ही निकट है, बहुत ही करीब है—तुम्हारे भीतर है! उसी हीरे की खदान तक कैसे पहुंचा जाए, इस संबंध में आज के सूत्र हैं।
पीड़ा की गंद लिए,
विष का अनुबंध लिए
चंदन की छांव तले, जीवन के गीत पले।
तिनकों का आलंबन आंधी की घातों पर,
कंपती सी आशाएं नश्वर संघातों पर।
मृत्यु की हथेली पर जीने की उत्कंठा,
धूप और छाहों की संघर्षी मातों पर।
अधरों से ओ पीए,
अंतर में नेह लिए,
जैसे तूफानों में बुझता सा दी जले।
सतरंगे मौसम को बंद किए बाहों में,
उद्वेलित यौवन का ज्वार लिए चारों में।
पलकों की कोरों पर अंजवाए गहराई,
अविरल गति चलने को पथरीली राहों में।
अपना अधिकार लिए,
उर में न ज्वार लिए,
सिकता पर रेखा बन ज्यों मिटती लहर ढले।
डसते विश्वासों पर आंसू से भरे भरे,
हारों की लड़ियों में कलियों से झरे झरे।
झीन अवगुंठन में सिंदूरी मांग लिए,
प्रतिबिंबित रूप निरख दर्पण में तिरे तिरे।
यौवन का मोड़ लिए,
हंसने की होड़ लिए,
जैसे निज स्मिति से पूनम का चांद छले।
जेठ की दोपहरी में शीतल जिज्ञासा बन,
द्वंद्वों के मंथन में अमृत अभिलाषा बन।
पनघट के घट—घट में सागर को सीमित कर,
दर्शन के प्यासे को जीवन की परिभाषा बन।
राग में विराग लिए,
तपने का त्याग लिए,
बनने को स्वर्ण मुकुट ज्यों कंचन देह जले।
जेठ की दोपहरी में शीतल जिज्ञासा बन!
यह जीवन तो जलती हुई दोपहरी है। यहां सब जल रहा है, धू—धू कर जल रहा है। यह जीवन तो चिताओं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। और तुम भी जानते हो और हर—एक जानता है, क्योंकि सिवाय घावों के हाथ लगता क्या है?
जेठ की दोपहरी में शीतल जिज्ञासा बन!
उठाओ जिज्ञासा को। खोजें उसे जो कभी खोएगा नहीं। खोजें उसे जिसे पा लेने पर फिर सारी खोज समाप्त हो जाती है।
द्वंद्वों के मंथन में अमृत अभिलाषा बन!
कब तक उलझे रहोगे दुई में, द्वैत में? कब तक बंटे रहोगे द्वंद्व में?
मध्ययुग में यूरोप में कैदियों को एक सजा दी जाती थी। सजा ऐसी थी कि कैदी को लिटाकर चार घोड़ों से उसके हाथ पैर बांध दिए जाते थे। एक घोड़े से एक हाथ, दूसरे घोड़े से दूसरा हाथ। तीसरे घोड़े से एक पैर, चौथे घोड़े से दूसरा पैर। और चारों घोड़ों को चारों दिशाओं में दौड़ा दिया जाता था। टुकड़े—टुकड़े हो जाता था आदमी, खंड—खंड हो जाता था। सजा का नाम था क्वार्टरिंग। और ठीक ही था सजा का नाम, क्योंकि चार टुकड़े हो जाते थे, चौथाई हो जाता था। सजा का नाम था चौथाई।
लेकिन जिंदगी को अगर गौर से देखो तो ऐसी सजा तुम खुद अपने को दे रहे हो। तुमने कितनी वासनाओं के साथ अपने को जोड़ लिया! अलग—अलग दिशाओं में जाती वासनाएं...कोई पूरब, कोई पश्चिम, कोई दक्षिण, कोई उत्तर। चार घोड़े नहीं, हजार घोड़ों से तुम बंधे हो। खंड खंड हुए जा रहे हो, टूटे जा रहे हो, बिखरे जा रहे हो। इसी बिखराव को तनाव कहो, चिंता कहो, बेचैनी कहो, विक्षिप्तता कहो, जो भी तुम्हें कहना हो, मगर यह बिखराव है। और इस बिखराव में कभी तुम्हें विश्राम न मिलेगा। तुम तपोगे, सड़ोगे, मरोगे; जिओगे कभी भी नहीं।
जीवन का संबंध तो तब होता है, जब तुम्हारी सारी वासनाएं एक अभीप्सा में समाहित हो जाती है; जब तुम्हारी अलग—अलग दिशाओं में दौड़ती हुई कामनाएं एक जिज्ञासा में रूपांतरित हो जाती है; जब तुम और सब न मालूम क्या—क्या छोड़कर सिर्फ उस एक के खोजने के लिए आतुर, आबद्ध हो जाते हो, कटिबद्ध हो जाते हो, प्रतिबद्ध हो जाते हो।
छोड़ो दो को, छोड़ो अनेक को—पकड़ो एक को, क्योंकि एक कोई पकड़ने में तुम भी एक हो जाओगे। अनेक को पकड़ोगे, तुम भी अनेक हो जाओगे। और एक होने का आनंद और एक होने की विश्रांति...।
जेठ की दोपहरी में शीतल जिज्ञासा बन,
द्वंदों के मंथन में अमृत अभिलाषा बन।
क्या मरणधर्मा तुम्हारी खोज है? क्या उसे खोज रहे हो जो मृत्यु तुमसे छीन लेगी? अमृत को कब खोजोगे?
द्वंद्वों के मंथन में अमृत अभिलाषा बन।
पनघट के घट—घट में सागर को सीमित कर!
एक—एक घट में, एक—एक हृदय में पूरा आकाश उतर सकता है। ऐसी तुम्हारी गरिमा है, ऐसा तुम्हारा गौरव है। एक—एक बूंद सागर को अपने में समा सकती हैं, ऐसी तुम्हारी क्षमता है, ऐसी तुम्हारी संभावना है। लेकिन तुम आकाश की तरफ आंख ही नहीं उठाते। तुम जमीन में आंखों को गड़ाएं, कंकड़—पत्थरों में, कूड़े कर्कट में ही अपने जीवन को बिता देते हो। और भरोसा भी किन चीजों का कर रहे हो! तूफान आ रहा है बड़ा और पक्षी ने तिनकों से घोंसला बना लिया है और इस भरोसे में बैठा है कि सुरक्षा है। तूफान आ रहा है, भयंकर और रेत में तुमने ताश के पत्तों का घर बना लिया है। और इस भरोसे में बैठे हो कि क्या चिंता है। मौत आएगी, तुम्हारे सब ताश के घर गिरा जाएगी। इसके पहले कि मौत आए, अमृत का थोड़ा स्वाद ले लो।
तिनकों का आलंबन आंधी का घातों पर,
कंपती सी आशाएं नश्वर संघातों पर।
मृत्यु की हथेली पर जीने की उत्कंठा,
धूप और छाहों की संघर्षी मातों पर।
मौत के हाथ में बैठे हो। कब मुट्ठी बंध जाएगी, कहा नहीं जा सकता। मौत के हाथों में बैठे हो, फिर भी व्यर्थ में चिंता लगी है।
बौद्धों की एक प्रसिद्ध कथा है। एक राजकुमार युद्ध हार गया है और जंगल में शरण के लिए भाग गया है। दुश्मन पीछे लगे हैं। उनके घोड़ों की टाप का शोरगुल बढ़ता जाता है। और राजकुमार बड़ी मुश्किल में पड़ गया है। क्योंकि वह ऐसी जगह पहुंच गया है पहाड़ी की कगार पर, जहां रास्ता समाप्त हो जाता है। आगे भयंकर खड्डा है। पीछे दुश्मनों के आने की आवाज सघन होती जाती है। एक—एक घड़ी मौत करीब आ रही है। ऐसी ही दशा तुम्हारी है, जैसी उस राजकुमार की थी। फिर भी हिम्मत जुटाता है। आखिरी आशा बांधता है। सोचता है छलांग लगा दूं। क्योंकि दुश्मन के हाथ में पड़ा तो तत्क्षण गर्दन कट जाएंगी। छलांग लगाना भी कम खतरनाक नहीं है, खड्डा भयंकर है। बचने की आशा नहीं है, लेकिन फिर भी दुश्मन के हाथ में पड़ने से तो ज्यादा आशा है; शायद हाथ—पैर टूट जाएंगे लेकिन जीवन बचेगा। लंगड़ा हो जाऊंगा, लेकिन फिर भी जीवन बचेगा। और कौन जाने कभी—कभी चमत्कार भी हो जाता है कि गिरूं और बच जाऊं! न हाथ टूटें, न पैर टूटें।
तो नीचे झांककर देखता है। और नीचे देखता है कि दो सिंह मुंह बाएं ऊपर की तरफ देख रहे हैं। अब तो कोई भरोसा न रहा। घोड़ों के टाप की आवाज और जोर से बढ़ने लगी। और सिंह नीचे गर्जन कर रहे हैं। उन्होंने भी राजकुमार को देख लिया है कि वह खड़ा है ऊपर। अगर गिर जाए तो प्रतीक्षा में रत हैं कि तत्क्षण चीर फाड़ करके खा जाएंगे। कोई और रास्ता देखकर राजकुमार एक वृक्ष की जड़ों को पकड़कर लटक रहता है कि शायद दुश्मनों को दिखाई न पडूं। सोचकर कि रास्ता समाप्त हो गया है, वे वापिस लौट जाए। और वृक्ष की जड़ों में लटका हुआ सिंहों से भी बच जाऊंगा। अगर दुश्मन लौट आए तो एक आशा है कि मैं वापिस लौटकर बच सकता हूं।
जब वह जड़ों को पकड़कर लटक जाता है जब देखता है कि और भी मुसीबत है। एक सफेद और काला चूहा, जिस जड़ को वह पकड़कर लटका है, उसे काट रहे हैं। दिन और रात के प्रतीक हैं सफेद और काला चूहा। अब तो बचने की कोई संभावना नहीं है। दुश्मनों की आवाज बढ़ती जाती है, सिंहों का गर्जन बढ़ता जाता है। और चूहे हैं कि जड़ काटे डाल रहे हैं, कांटे डाल रहे हैं, अब कटी तब कटी...। ज्यादा देर नहीं है, जड़ कटती जा रही है। और तभी पास के एक मधुछत्ते से एक शहद की बूंद टपकती है। अपनी जीभ पर वह शहद की बूंद को ले लेता है। और उसका स्वाद बड़ा मधुर है। उस क्षण में भूल ही जाता है सब—दुश्मन के घोड़ों को टाप, सिंहों की गर्जना, वे सफेद और काले चूहे काटते हुए जड़—सब भूल जाता है। शहद बड़ा मीठा है।
बौद्ध कथा बड़ी प्यारी है। तुम्हारे संबंध में है। तुम्हीं हो वह राजकुमार। चारों तरफ से मौत घिरी है और शहद की एक बूंद का मजा ले रहे हो। और शहद की एक बूंद में सोचते हो सब मिल गया, अब तुम्हें मौत की चिंता नहीं है। जैसे अमृत मिल गया! तुम्हारे सुख क्या हैं? शहद की बूंदें हैं; जीभ पर थोड़ा सा स्वाद है। और मौत चारों तरफ से घिरी है।
तिनकों का आलंबन आंधी की घातों पर,
कंपती सी आशाएं नश्वर संघातों पर।
मृत्यु की हथेली पर जीने की उत्कंठा,
धूप और छाहों की संघर्षी मातों पर।
अधरों से आग पीए,
अंतर में नेह लिए,
जैसे तूफान में बुझता सा दीप जले।
बड़े तूफान हैं और तुम एक छोटे दीए हो। तुम्हारा बुझना निश्चित है। बचने का कोई उपाय नहीं। न कभी कोई बचा है, न कभी कोई बच सकेगा। लेकिन यह जो छोटा सा क्षण तुम्हारे हाथ में है, इसका सदुपयोग हो सकता है। यह क्षण सत्संग बन सकता है। यह क्षण तुम्हारे भीतर ज्योति का विस्फोट बन सकता है। यह क्षण तुम्हारे भीतर ध्यान बन सकता है। यह क्षण तुम्हारे भीतर साक्षी का भाव बन सकता है।
सोचो उस राजकुमार को फिर। काश मधु की बूंद में न उलझता! मौत को चारों तरफ घिरा देखकर शांत चित्त हो जाता। आखिरी इस क्षण में साक्षी हो जाता। आखिरी इस क्षण में जागकर शुद्ध चैतन्य हो जाता। तो सारी मृत्यु व्यर्थ ही जाती, अमृत से नाता जुड़ जाता।
साक्षी में अमृत है। जागरण में अमृत है। अमी झरत, बिगसत कंवल! जैसे ही तुम साक्षी हो जाते हो, अमृत की वर्षा होने लगती है और तुम्हारे भीतर छिपा हुआ शाश्वत का कमल खिलने लगता है।
दरिया कहते हैं—
तज बिकार आकार तज, निराकार को ध्यान।
निराकार में पैठकर, निराधार लौ लाय।।
कहते हैं: एक ही काम तुम कर लो तो सब हो जाए। व्यर्थ के विकारों में मत उलझे रहो। शहद की बूंदों में मत उलझे रहो—धोखा है। व्यर्थ के आकारों, आकृतियों में मत उलझे रहो—भ्रांतियां हैं, मृगमरीचिकाएं हैं। एक निराकार का ध्यान करो।
निराकार का ध्यान कैसे हो? मुझ से आकर लोग पूछते हैं: आकार का तो ध्यान हो सकता है, निराकार का ध्यान कैसे हो? ठीक है उनका प्रश्न, सम्यक है। राम का ध्यान कर सकते हो—धनुर्धारी राम! कृष्ण का ध्यान कर सकते हो—बांसुरी वाले कृष्ण। कि क्राइस्ट का ध्यान कर सकते हो—सूली पर चढ़े। कि बुद्ध का कि महावीर का। लेकिन निराकार का ध्यान! तुम्हें थोड़ी ध्यान की प्रक्रिया समझनी होगी। जिसका तुम ध्यान कहते हो, वह ध्यान नहीं है, एकाग्रता है। एकाग्रता के लिए आकार जरूरी होता है। क्योंकि किसी पर एकाग्र होना होगा। कोई एक बिंदु चाहिए—राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर...। कोई प्रतिमा, कोई रूप, कोई आकार, कोई मंत्र, कोई शब्द, आधार, कोई आलंबन चाहिए—तो तुम एकाग्र हो सकते हो।
एकाग्रता ध्यान नहीं है। ध्यान तो एकाग्रता से बड़ी उल्टी बात है। हालांकि तुम्हारे ध्यान के संबंध में जो किताबें प्रचलित हैं, उन सब में यही कहा गया है कि ध्यान एकाग्रता का नाम है। गलत है वह बात। गैर—अनुभवियों ने लिखी होगी। एकाग्रता तो चित्त की संकीर्ण करती है। एकाग्रता तो एक बिंदु पर अपने को ठहराने का प्रयास है। एकाग्रता विज्ञान में उपयोगी है। ध्यान बड़ी और बात है। ध्यान का अर्थ होता है: शुद्ध जागरूकता। किसी चीज पर एकाग्र नहीं, सिर्फ जागे हुए—बस जागे हुए।
ऐसा समझो कि टार्च होती है। टार्च हो ध्यान नहीं है, एकाग्रता है। जब तुम टार्च जलाते हो तो प्रकाश एक जगह जाकर केंद्रित हो जाता है। लेकिन जब तुम दीया जलाते हो तो दीया जलाना ध्यान है। वह एक चीज पर जाकर एकाग्र नहीं होता; जो भी आसपास होता है सभी को प्रकाशित कर देता है। एकाग्रता में मगर तुम टार्च लेकर चल रहे हो तो एक चीज तो दिखाई पड़ती है, शेष सब अंधेरे में होता है। अगर दीया तुम्हारे हाथ में है तो सब प्रकाशित होता है। और ध्यान तो ऐसा दीया है कि उस में कोई तलहटी भी नहीं है कि दीया तले अंधेरा हो सके। ध्यान तो सिर्फ ज्योति ही ज्योति है, जागरण ही जागरण है—और बिना बाती बिन तेल! इसलिए दीया तले अंधेरा होने की भी संभावना नहीं है।
ध्यान शब्द तो तुम समझो साक्षी—भाव। जैसे मुझे तुम सुन रहे हो, दो ढंग से सुन सकते हो। जो नया—नया यहां आया है, वह एकाग्रता से सुनेगा। स्वभावतः, दूर से आया है, कष्ट उठाकर आया है। यात्रा है। कोई शब्द चूक जाए! तो सब तरफ से एकाग्र होकर सुनेगा। सब तरफ से चित्त को हटा लेगा। जो मैं कह रहा हूं, बस उसी पर टिक जाएगा। लेकिन जो यहां थोड़ी देर रुके हैं, जो थोड़ी देर यहां रंगे हैं, जो थोड़ी देर यहां की मस्ती में डूबे हैं, वे एकाग्रता से नहीं सुन रहे हैं, ध्यान से सुन रहे हैं। भेद बड़ा है। एकाग्रता से सुनोगे, जल्दी थक जाओगे। तनाव होगा। एकाग्रता से सुनोगे तो यह पक्षियों का गीत सुनाई नहीं पड़ेगा। राह पर चलती हुई कारों की आवाज सुनाई नहीं पड़ेगी। एकाग्रता से सुनोगे तो और सब तरफ से चित्त बंद हो जाएगा, संकीर्ण हो जाएगा। ध्यान से सुनोगे तो मैं जो बोल रहा हूं वह भी सुनोगे; ये जो चिड़ियां टीवी—टुट—टुट, टीवी—टुट—टुट कर रही हैं, यह भी सुनोगे। राह से कार की आवाज आएगी, वह भी सुनोगे; ट्रेन गुजरेगी, वह भी सुनोगे। बस सिर्फ सुनोगे! जो भी है, उसके साक्षी रहोगे। और तब तनाव नहीं होगा, तब थकान भी नहीं होगी। तब ताजगी बढ़ेगी। तब चित्त निश्छल होगा, निर्दोष होगा, क्योंकि चित्त विराम में होगा।
निराकार पर ध्यान नहीं करना होता है। जब तुम ध्यान में होते हो तो निराकार होता है। आकार पर ध्यान करना एकाग्रता; और ध्यान करना निराकार से जुड़ जाना है।
निराकार में पैठकर, निराधार लौ लाय। सब आधार छूट जाते हैं वहां। निराधार हो जाता है व्यक्ति, निरालंब हो जाता है। बस मात्र होता है। शुद्ध होने की वह घड़ी है। बस, होने की वह घड़ी है। अपूर्व है। वहीं झरता है अमृत।
अमी झरत, बिगसत कंवल!
प्रथम ध्यान अनुभौ करै, जासे उपजै ग्यान।
सूत्र बड़ा बहुमूल्य है। तुम ने उल्टी बातें सुनी हैं आज तक। तुम से लोग कहते हैं कि पहले शास्त्र पढ़ो, ग्यान इकट्ठा करो, फिर ध्यान हो पाएगा। पहले ध्यान के संबंध में जानो, फिर ध्यान को जान सकोगे। दरिया कुछ और कह रहे हैं। दरिया वही कह रहे हैं जो मैं तुमसे कहता हूं। प्रथम ध्यान अनुभौ करै...। पहले ध्यान का अनुभव करना होगा।...जासे उपजै ग्यान। उस से ज्ञान का जन्म होगा। तुम उल्टा ही काम कर रहे हो। तुमने बैलों को बैलगाड़ी के पीछे बांध रखा है। इसीलिए कहीं नहीं पहुंच रहे हो, न कहीं पहुंच सकते हो। ज्ञान पहले और फिर सोचते हो ध्यान? नहीं, ध्यान पहले, फिर ज्ञान।
सच तो यह है कि ध्यान के पीछ ज्ञान ऐसे ही आ जाता है जैसे तुम्हारे पीछे तुम्हारी छाया चली आती है। अगर मुझे तुम्हारी छाया को निमंत्रण देना हो तो तुम्हें निमंत्रण देना होगा। मैं तुम्हारी छाया को सीधा निमंत्रण नहीं दे सकता। मैं तुम्हारी छाया को कितना ही कहूं कि आओ, स्वागत है, तो छाया के बस के बाहर है आना। हां, तुम आओगे तो छाया भी आ जाएगी।
ज्ञान ध्यान की छाया है। वेद से नहीं मिलता ध्यान, न मिलता ज्ञान। न कुरान से न बाइबिल से। और जिस को तुम ज्ञान समझकर इकट्ठा कर लेते हो—वेद, कुरान, बाइबिल धम्मपद से—ज्ञान नहीं है, कोरा थोथा पांडित्य है। तोतारटंत है। वह ज्ञान नहीं है, ज्ञान का धोखा है। असली फूल नहीं है, कागज का फूल है।
असली ज्ञान तो ध्यान में से उमगता है। ध्यान ज्ञान का गर्भ है।
वेद से तुम ने जो सीख लिए वचन और कुरान की आयतें कंठस्थ कर लीं, वह तो ऐसे ही है जैसे किसी दूसरे के बच्चे को गोद ले लिया। तो गोदी तो भर गई, लेकिन झूठी ही भरी। बात कुछ और है। जब कोई मां नौ महीने बच्चे को गर्भ में ढोती है, नौ महीने की लंबी पीड़ा जरूरी भूमिका है तो ही प्रेम उमगेगा। और जिसे नौ महीने पेट में ढोया है, उसके प्रति एक लगाव होगा, एक स्नेह होगा, एक अंतरसंबंध होगा।
और फिर यह भी खयाल रहे, जब एक बच्चे का जन्म होता है तो सिर्फ एक बच्चे का ही जन्म नहीं होता, दो चीजों का जन्म होता है। एक तरफ बच्चा पैदा होता है, एक तरफ मां पैदा होती है। उसके पहले मां नहीं थी, उसके पहले सिर्फ एक स्त्री थी। इधर बच्चा पैदा हुआ उधर मां पैदा हुई। बिना बच्चे के पैदा हुए स्त्री स्त्री रहेगी, मां न बनेगी। हां, बच्चा गोद लिया जा सकता है, लेकिन गोद लेने से मां पैदा नहीं होगी, मां का धोखा भला हो जाए।
और यही हो रहा है। मां तो लोग बनते ही नहीं। ध्यान का अर्भ तो निर्मित ही नहीं करते और ज्ञान को गोद ले लेते हैं। और ज्ञान को गोद ले लेना सस्ता है। किताबें, शास्त्र आसान हैं पढ़ लेने। परमात्मा के संबंध में जान लेना बहुत आसान है; परमात्मा को जानने के लिए जीवन को दांव पर लगाना होता है।
ठीक कहते हैं दरिया। मैं उन से सौ प्रतिशत राजी हूं। यह अनुभवी का वचन है। अगर दरिया को अनुभव न होता, तो यह बात कह ही नहीं सकते थे वे। जब मैंने दरिया पर बोलना शुरू किया, सोचा कि दरिया पर बोलूं, तो ऐसे ही कुछ वचनों में मुझे आकर्षित किया। क्योंकि ऐसे वचन केवल वे ही बोल सकते हैं जिन्होंने अनुभव किया हो!
प्रथम ध्यान अनुभौ करै...पहले ध्यान।...जासे उपजै ग्यान। अगर उन्होंने कहा होता वेद से ज्ञान उपजता है, मैं कभी भूलकर उन पर न बोलता। अगर उन्होंने कहा होता कि बाइबिल में ज्ञान है, मुझ से नाता ही टूट जाता। इस एक वचन ने मुझे जोड़ दिया। यह आदमी असली पारखी है, जौहरी है। इस ने गोद नहीं लिया है ज्ञान, इस ने ज्ञान को जन्म दिया है ध्यान के गर्भ से। इस ने पीड़ा सही है नौ महीने की। इसने बच्चे को बड़ा किया है। इसकी आत्मप्रतीति है।
और जीवन में भी तुम जानते हो, जो अनुभव से संभव होता है वह उधार अनुभव से संभव नहीं होता। बच्चों को मां—बाप लाख समझाएं—ऐसा मत करो, वैसा मत करो—बच्चे मानते नहीं। और ठीक ही करते हैं बच्चे, जो नहीं मानते हैं। क्योंकि मान लें तो नपुंसक रह जाएंगे सदा के लिए, थोथे रह जाएंगे। रीढ़ पैदा न होगी। अनुभव से ही मानते हैं। तुम कितना ही कहो बच्चे से कि मत जाओ दीए के पा, हाथ जल जाएगा; लेकिन जब तक एक बार उसका हाथ जले नहीं, जब तक उसे अनुभव न होगा। और तुम्हारी बात का कोई मूल्य नहीं है।
इसलिए हर बच्चा वही भूलें करता है जो सब बच्चों ने सदियों से की हैं। मां बाप की सिखावन काम नहीं आती। और जिन बच्चों पर काम आ जाती है वे बच्चे गोबर गणेश रह जाते हैं, खयाल रखना, उन में आत्मा पैदा नहीं होती। आत्मा तो अनुभव से पैदा होती है। जब बच्चे का हाथ जलता है तब वह जानता है कि आग जलाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन का एक मित्र उस से कह रहा था कि मुल्ला, क्या तुम मेरी पत्नी को जानते हो? मुल्ला ने कहा: नहीं भैया, मैं अपनी पत्नी को जानता हूं यही बहुत है।
अनुभव अपना...बस अपना अनुभव ही जीवन को सम्यक आधार देता है; दूसरे का अनुभव आधार नहीं देता। दूसरे के अनुभव को तुम समझ ही नहीं सकते। दूसरे के अनुभव और तुम्हारे बीच संबंध ही नहीं जुड़ता, सेतु नहीं बनता। उधार उधार ही रह जाता है। सूचनाएं सूचनाएं ही रह जाती हैं, ज्ञान नहीं बनतीं।
इस सूत्र को खूब हृदय में सम्हालकर रखा लेना, क्योंकि जो इसके विपरीत गए हैं भटक गए हैं। और जिन्होंने इस सूत्र का अनुसरण किया है वे पहुंच गए हैं। उन का पहुंचना निश्चित है।
प्रथम ध्यान अनुभौ करै, जासे उपजै ग्यान।
दरिया बहुत करत हैं, कथनी में गुजरान।।
लेकिन बहुत से लोग हैं जो सुने—सुनाए में ही जी रहे हैं। कथनी में गुजरान कर रहे हैं! हो सकता है उन्होंने प्यारे वचन इकट्ठे किए हों, सुभाषित संगृहीत किए हों; वेद का शुद्ध—शुद्ध उन्हें ज्ञान हो; कुरान की आयत—आयत उन्हें कंठस्थ हो। मगर इस से भी कुछ न होगा।
मोहम्मद के तो ध्यान में कुरान उतरी थी। कुरान उतरी थी, पढ़ी नहीं गई थी कुरान। मोहम्मद तो पढ़ना जानता भी नहीं थे। पहाड़ पर एकांत में ध्यान कर रहे थे। और तब अचानक जैसे कहीं अंतराकाश से कोई बोलने लगा। उदघोष हुआ। एक झरना फूटा और प्यारा झरना फूटा। कोई गुनगुनाने लगा प्राणों में। इसलिए कुरान में जैसा गीत है और कुरान में जैसा संगीत है वैसा किसी दूसरे शास्त्र में नहीं है। कुरान की तरंनुम किस को न बचा दे, किस के हृदय को न डांवांडोल कर दे! फिर कुरान के आधार पर जितनी भाषाएं दुनिया में पैदा हुई उनमें भी एक तरंनुम है, एक लय है, कुरान की छाप है। लेकिन कुरान कोई पढ़ी नहीं थी मोहम्मद ने, उतरी थी। इलहाम हुआ था। जन्मी थी। मोहम्मद क्या कर रहे थे? मोहम्मद चुपचाप बैठे थे। शून्य में थे, साक्षी भाव में थे, साक्षी भाव में थे। और जब भी तुम साक्षी हो जाओगे, कुरान उतरेगी। वही कुरान नहीं जो मोहम्मद पर उतरी थी, क्योंकि परमात्मा अपने को दोहराता नहीं है। परमात्मा का कार्बन कापियों में भरोसा नहीं है, विश्व नहीं है। परमात्मा हमेशा नया गीत गाता है। तो परमात्मा हर दिन नई सुबह लाता है। परमात्मा हर बार नए हस्ताक्षर करता है।
जैसे कि तुम्हारे अंगूठे को चिह्न तुम्हारा ही चिह्न है, दुनिया में किसी दूसरे आदमी के अंगूठे का चिह्न तुम्हारा चिह्न नहीं है। चकित करनेवाली बात है। चार अरब आदमी हैं दुनिया में, लेकिन तुम्हारे अंगूठे की प्रतिलिपि किसी दूसरे आदमी के अंगूठे की नहीं है। और ऐसा ही नहीं है कि तुम्हारे अंगूठे की जो छाप है वह जिंदा आदमियों में किसी की नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं जितने लोग इस जमीन पर अब तक हुए हैं उन में से किसी की छाप वैसी नहीं थी। और जितने लोग आगे भी कभी पैदा होंगे उन में से भी किसी की छाप वैसी नहीं होगी। हर अंगूठे की छाप अनूठी है।
जब अंगूठे तक की छाप अनूठी है तो आत्मा की छाप की तो बात ही न करो! जब तुम्हारे ध्यान में उतरेगा कोई गीत तो न तो वह वेद होगा, न गीता होगी, न कुरान होगा। यद्यपि उस में वही होगा जो कुरान में है, जो वेद में है, जो गीता में है। मगर गीत तुम्हारा होगा। गुनगुनाहट तुम्हारी होगी। लय तुम्हारी होगी। नाचोगे तुम! उस में अनूठापन होगा। उस में मौलिकता होगी।
और यह अच्छा है, शुभ है। काश, वही वही गीत बार—बार उतरता तो बड़ी ऊब पैदा होती। परमात्मा नित नूतन है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक ट्रेन में सफर कर रहा था। एक बड़े प्रसिद्ध कवि भी साथ में सफर कर रहे थे। कवि थे तो ट्रेन में बैठ—बैठे भी कविताएं लिख रहे थे। मुल्ला ने उन से पूछा: कोई किताब पत्रिका वगैरह है आपके पास? खाली बैठा हूं, कुछ पढूं।
कवि जी ने फौरन पास में रखी हुए एक किताब देते हुए कहा। यह पढ़िए, मेरी कविताओं का संकलन है। मुल्ला नसरुद्दीन बोला। धन्यवाद, उसे तो आप अपने पास रखिए। वैसे पढ़ने के लिए तो मेरे पास टाइम—टेबिल भी है।
एक तो आदमियों में हैं कवि, जो वही—वही दोहराए जाते हैं। इधर उधर थोड़ा बहुत भेद, फर्क, शब्दों का जमाव, तुकबंदी...बस तुकबंदी है।
राजस्थान की पुरानी कहानी है। एक जाट सिर पर खाट लेकर जा रहा था। गांव का कवि मिल गया, उस ने कहा: जाट रे जाट, सिर पर तेरे खाट!
जाट भी कोई ऐसा रह जाए पीछे...जाट और पीछे रहे जाए! उस ने कहा: कवि रे कवि, तेरी ऐसी की तैसी!
कवि ने कहा: तुकबंदी नहीं बैठती, काफिया नहीं बैठता।
जाट ने कहा: काफिया बैठे कि न बैठे, जो मुझे कहना था सो मैंने कह दिया। काफिया बिठा कौन रहा है, तू बिठाता रह काफिया!
एक तो तुकबंद हैं, जा जाट के साथ खाट का काफिया बिठा रहे हैं। परमात्मा कोई तुकबंद नहीं है। अनंत है परमात्मा। अनंत हैं उसकी अभिव्यक्तियां—हर बार नई।
जब भी तुम उधार ज्ञान इकट्ठा कर लेते हो तब तुम बासा ज्ञान इकट्ठा कर लेते हो। तुम्हारा परमात्मा पर भरोसा नहीं है, इसलिए तुम वेद पर भरोसा करते हो। तुम्हारा परमात्मा पर भरोसा नहीं है, इसलिए तुम कुरान को छाती से लगाए बैठे हो। काश, तुम्हारा परमात्मा पर भरोसा हो तो तुम कुरान भी छोड़ो, वेद भी छोड़ो, बाइबिल भी छोड़ो; तुम कहो परमात्मा से कि मैं राजी हूं, मुझ पर भी उतर! मेरे द्वार खुले हैं। मेरे भीतर भी आ। मुझ में भी गुनगुना। मेरा कसूर क्या है? मुझे भी छू। मेरी मिट्टी को भी सोना बना। मुझे भी सुगंध दे। आखिर मुझ से नाराजी क्या है?
जिसका परमात्मा पर भरोसा है, वही ध्यान कर सकता है। ध्यान का अर्थ भूल मत जाना—जागरूकता, साक्षी भाव और तुम कितना ही शास्त्र पढ़ो, तुम समझोगे वही जो तुम समझ सकते हो। अन्यथा हो भी कैसे सकता है? तुम वेद भी पढ़ोगे तो तुम वही थोड़े ही पढ़ लोगे जो वेद के ऋषि ने लिखा था। वेद के ऋषि ने जो लिखा है उसे समझने को, उस ऋचा को समझने को, उस ऋषि की बोध—दशा चाहिए पड़ेगी। बिना उस ऋषि की बोध—दशा के तुम कैसे समझोगे अर्थ?
अर्थ शब्दों में नहीं होता, अर्थ देखनेवाले की आंखों में होता है। अर्थ शब्द में छिपा नहीं है कि तुम ने शब्द को समझ लिया तो अर्थ समझ में आ जाएगा। शब्द तो केवल निमित्त है, खूंटी है। टांगना तो तुम्हें अपना ही कोट पड़ेगा। तुम जो टांगोगे, वही खूंटी पर टंग जाएगा। वेद को जब बुद्धू पढ़ेगा तो वेद भी उस के साथ बुद्धू हो जाते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन मुझ से कह रहा था: कल रात मेरा पड़ोसी आधी रात को मेरा दरवाजा पीटने लगा। तो मैंने कहा कि मुल्ला, तब तो तुम बहुत परेशान हुए होओगे। मुल्ला ने कहा: नहीं जी, मैं और परेशान होता! मैं तो अपना गाना पहले की तरह ही गाता रहा। उसी गाने की वजह से वह पड़ोसी दरवाजा पीट रहा है कि भइया, बंद करो। मगर मुल्ला समझे तब...! मुल्ला तो समझा कि है वैसा मूढ़, कि आधी रात और दरवाजा पीट रहा है! यह तो मुल्ला सोच भी नहीं सकता कि मेरे गाने की वजह से ही पीछ रहा है।
मुल्ला ने सितार बजाना शुरू किया तो वह एक ही तार पर रें—रें रें—रें...रें—रें करता रहता। पत्नी घबड़ा गई, पागल होने लगी। बच्चे घबड़ा गए, पड़ोसी घबड़ा गए। एक दिन सारे लोग इकट्ठे हो गए, हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि महाराज, बहुत संगीतज्ञ देखे हैं, मगर रें—रें रें—रें कितने दिन से तुम कर रहे हो और हम सब पगला रहे हैं! अब तो हमें दिन में भी, बाजार में काम करते वक्त भी तुम्हारी रें—रें सुनाई पड़ने लगी है। जान बख्शो! अगर संगीत ही सीखना है तो कम से कम दूसरे तारों को भी छुओ।
मुल्ला ने कहा: तुम समझे नहीं। दूसरे संगीतज्ञ इसलिए दूसरे तारों को छूते हैं तक वे अपना स्थान खोज रहे हैं; मुझे मेरा स्थान मिल गया है। अब मुझे खोजने की जरूरत नहीं है। मैंने पा लिया जो मुझे खोजना था, वह मुझे मिल गया। मुझे मेरा स्वर मिल गया है।
तुम पढ़ोगे भी शास्त्रों में तो क्या पढ़ोगे? मैंने सुना है कि कुरान में कहीं एक वचन आता है कि शराब पियो, वेश्यागामी बनो—और नर्क में सड़ोगे। मुल्ला नसरुद्दीन शराब भी पीता, वेश्यागामी भी...और कुरान भी पढ़ता है। तो मैंने पूछा: नसरुद्दीन, इस वचन पर तुम्हारी नजर नहीं गई? उस ने कहा। गई क्यों नहीं, कई बार गई। लेकिन अभी जितना मुझ से बन सकता है उतना कर रहा हूं। अभी आधा ही वचन मुझ से पुरा होता है। सामर्थ्य...मुल्ला ने कहा: सामर्थ्य अपनी—अपनी। बड़े पुरुष बड़ी बातें कह गए हैं। मगर जितना अपने से बने, उतना करो। साफ आज्ञा है। शराब पियो, वेश्यागमन करो—साफ आज्ञा है। नर्क में सड़ोगे—वह बाद की बात है, वह देखेंगे।
तुम समझोगे वही जो तुम समझ सकते हो। तुम अर्थ भी वे ही निकालोगे, जो तुम को ही समर्थित कर जाएंगे।
नहीं; ध्यान के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। ध्यान पहले तुम्हें ऋषि बनाएगा, तब ऋचाओं के अर्थ खुलेंगे। और मजा यह है कि जब तुम ऋषि हो जाओगे और वेदों की ऋचाओं के अर्थ तुम्हारे सामने खुलने लगेंगे—जैसे वसंत आ जाए और कलियां खिल जाएं—तब तुम्हें जरूरत ही न रहेगी वेदों में जाने के, क्योंकि तुम्हारा अपना वेद ही भीतर लहराने लगेगा। तब तुम स्वयं ही वेद हो जाओगे। तब तुम्हारा वचन—वचन वेद होगा। तब तुम्हारा शब्द—शब्द कुरान होगा। उसी की तलाश करो जिसे पा लेने से सारे शास्त्रों का सार मिल जाता है।
पंछी उड़ै में, खोज मंडै नहिं माहिं।
दरिया जल में मीन गति, मारग दरसै नाहिं।।
अदभुत वचन दरिया दे रहे हैं। एक—एक सूत्र ऐसा है कि हीरे जवाहरातों में भी तौलौ तो भी तौले न जा सकें, अतुलनीय है।
पंछी उड़ै गगन में...तुमने पक्षियों को आकाश में उड़ते देखा है, उनके पैरों के चिह्न नहीं बनते हैं। ऐसे ही ऋषियों की गति है। उनके पैरों के चिह्न नहीं बनते। परमात्मा के आकाश में जो उड़ रहे हैं, उनके पैरों के चिह्न कहां बनेंगे? इसलिए तुम किसी के अनुगामी मत बनना। अनुगमन हो ही नहीं सकता। पद चिह्न ही नहीं बनते।
पंछी उड़ै गगन में, खोज मंडै नाहिं माहिं। लेकिन आकाश में उसके कोई चिह्न नहीं पाए जाते। पक्षी उड़ जाता है, निशाना नहीं बनते। इसलिए कोई दूसरा पक्षी अगर उसका अनुगमन करना चाहे तो कैसे करे?
दरिया जल में मीन गति...। जैसे नदी में कि सागर में, मछली चलती है...मारग दरसै नाहिं।...कोई मार्ग नहीं बनता उसके चलने से। कोई दूसरा उसके मार्ग का अनुसरण करना चाहे तो कैसे करे? परमात्मा के उस परम आकाश में भी, ध्यान के उस शून्याकाश में भी न कोई चिह्न बनते हैं, न कोई मार्ग।
पंछी उड़ै गगन में...दरिया जल में गीन गति...ऐसी ही गति है उस अंतर आकाश की। कहां कोई चिह्न कभी नहीं बनते। इसलिए वहां अनुगमन नहीं हो सकता है।
तुम्हें अपना रास्ता स्वयं ही बनाना होगा। हिंदू होने से काम न चलेगा, मुसलमान होने से काम न चलेगा। ईसाई, जैन, बौद्ध होने से काम न चलेगा। क्योंकि इस बात का तो यह अर्थ हुआ कि मार्ग बना बनाया है, सिर्फ तुम्हें चलना है। जैन होने का क्या अर्थ है, कि मार्ग तो बना गए तीर्थंकर, अब हमारा कुल काम इतना है कि चलना है। वे तो हाईवे तैयार कर गए। अब तुम्हें कुछ और करने को बचा नहीं है।
नहीं; मार्ग बनता ही नहीं सत्य का। सत्य का कोई मार्ग नहीं बनता।
पंछी उड़ै गगन में...। याद रखना, महावीर और बुद्ध और कृष्ण और क्राइस्ट ये सब आकाश में उड़ते पक्षी हैं। तुम इनका पीछा नहीं कर सकते। ये कोई चिह्न छोड़ नहीं गए हैं। चिह्न तो पंडितों ने बना लिए हैं।
बुद्ध ने कहा था, मेरी कोई मूर्ति मत बनाना। और आज दुनिया में जितनी बुद्ध की मूर्तियां हैं उतनी किसी की भी नहीं हैं, थोड़ा सोचो। कैसे अदभुत लोग हैं! बुद्ध जिंदगीभर कहते रहे, मेरी मूर्ति मत बनाना। हजार बार समझाया, मेरी मूर्ति मत बनाना। क्योंकि मेरी पूजा से कुछ भी न होगा। जाओ भीतर, जाओ अपने भीतर। अप्प दीपो भव! अपने दीए खुद बनो।
लेकिन बुद्ध की इतनी मूर्तियां बनीं, इतनी मूर्तियां बनीं, जितनी किसी की भी कभी नहीं बनी और शायद अब किसी की भी कभी नहीं बनेंगी! इतनी मूर्तियां बुद्ध की बनीं कि उर्दू में जो शब्द है बुत, वह बुद्ध का ही रूपांतर है। बुद्ध शब्द का अर्थ ही मूर्ति हो गया—बुत! इतनी मूर्तियां बनीं कि बुद्ध में और मूर्ति शब्द में पर्यायवाची संबंध हो गया, कुछ भेद ही न रहा। मूर्ति यानी बुद्ध की।
चीन में मंदिर है एक—दस हजार बुद्धों का मंदिर। एक मंदिर में दस हजार मूर्तियां हैं। हुआ क्या? बुद्ध कहते रहे, मेरी मूर्ति मत बनाना। फिर लोगों ने मूर्ति क्यों बना ली? लोग, जो पीछे आते हैं, उन्हें चिह्न चाहिए, उन्हें पद चिह्न चाहिए। उन्हीं मील के पत्थर चाहिए। उन्हीं साफ सुथरा रास्ता चाहिए। कोई इतनी झंझट नहीं लेना चाहता कि जंगल में अपनी पगडंडी खुद बनाए—चले और बनाए, चले और बनाए; जितना चले उतनी बने।
याद रखना, यह बात अति मौलिक, अति आधारभूत है। सत्य का कोई भी अनुसरण नहीं हो सकता। सत्य का अनुसंधान होता है। अनुकरण नहीं—अनुसंधान। किसी के पीछे चलकर तुम सत्य तक कभी न पहुंचोगे। अपने भीतर जाओगे तो सत्य तक पहुंचोगे। किसी के पीछे गए तो बाहर का अनुगमन रहा। अपने भीतर जाओगे, तब! बीहड़ है वहां, अंधकार है वहां। जंगल है, रास्ता साफ नहीं है। जाना कठिन है। लेकिन वह कठिनाई ही तो मूल्य है जो चुकाना पड़ता है।
कंपित, वंजुल तन, मंजुल मन, यौवन चंचल
नौ बंधन कील रहित तरणी, भव सिंधु विकल।
गहो मीत, बांह सदय!
भ्रम मय चिंतन शोचन, भ्रमित ज्ञान, अथिर चरण
दुर्दम तम तोम जाल, अगम दुसह काल—क्षण
आगत अनजान, दुखद, सुखद गत स्मरण मरण।
वर्तमान करो विजय!
जागें नव स्तव, अहरह, रत नित चरणारविंद,
मदमय संकेत दान काटे दिक काल बंध,
शरणागत आरत जन स्मितकांक्षा नित अमंद।
करो, बंधु, करो अभय!
प्लावित घन धाराधर, अच्छल जीवन सागर,
वात वसन झीन अमित, क्षेपण गति अति दुस्तर,
संशय भय दीन द्विपद, केवट तट अंध गहर।
करो सिंधु बिंदु विलय!
इस विराट सिंधु में अपने बिंदु को विलय करो।
करो बंधु करो अभय!
भय के कारण कुछ पकड़ो मत। भय छोड़ो।
मंदिर मस्जिद को भय के कारण पकड़ा है तुमने। तुम्हारा भगवान, तुम्हारे भय की ही प्रतिमा है। तुम्हें भगवान का कोई पता नहीं, क्योंकि तुम्हें ध्यान का ही कुछ पता नहीं है। तुम्हें भगवान का कोई पता नहीं, क्योंकि तुम्हें ध्यान का ही कुछ पता नहीं। एक तो भगवान है जो ध्यान में अवतरित होता है और एक भगवान है जो तुम्हारे भय के कारण तुम निर्मित कर लेते हो। जो तुमने मूर्तियां बना रखी हैं मंदिरों में, तुम्हारे भय के भगवान की हैं। तुमने ही गढ़ा है उन्हें। वे असली भगवान की नहीं हैं। असली भगवान तो वह है जिसने तुम्हें गढ़ा है। तुम भी खूब उसे चूका रहे हो! उऋण हो रहे हो कि तूने हमें गढ़ा, कोई फिक्र नहीं हम तुझे गढ़ते हैं! तुम्हीं बना लेते हो अपनी मूर्तियां, तुम्हीं सजा लेते हो अपने थाल। तुम्हीं गढ़ लेते हो अपनी प्रार्थनाएं। किसे धोखा दे रहे हो? आत्मवंचना है यह।
करो, बंध, करो अभय!
करो सिंधु बिंदु विलय!
डरो मत। भयभीत न होओ। धर्म का और भय से कोई संबंध नहीं है। धर्म का और भीरु से कोई नाता नहीं। तुमने शब्द तो सुना होगा सारी भाषाओं में इस तरफ के शब्द हैं। हिंदी में शब्द है—धर्म भीरु। धार्मिक आदमी को कहते हैं—धर्म भीरु। अंग्रेजी में भी ठीक वैसा शब्द है। धार्मिक आदमी को कहते हैं—गाड फीयरिंग, ईश्वर से डरने वाला।
महात्मा गांधी ने लिखा है: और किसी से मत डरो, मगर ईश्वर से जरूर डरना। और मैं तुमसे कहता हूं: और किसी से डरो तो डरो, ईश्वर से कभी मत डरना। क्योंकि ईश्वर से अगर डरे तो संबंध ही न हो सकेगा। उससे तो प्रेम करना। और प्रेम में कोई डरता है? प्रेम कहीं डरता है? प्रेम अभय है।
प्रेम से जोड़ो नाता। भय से नाते जुड़ते नहीं। और जिससे तुम भयभीत होते हो, तुम्हारे मन में उसके प्रति विरोध होता है, प्रेम नहीं होता।
तुलसीदास ने कहा है: भय बिनु होय न प्रीति। और मैं तुमसे कहता हूं: ठीक इससे उल्टी बात। तुलसीदास कहते हैं बिना भय के प्रीति नहीं होती। वे पता नहीं किसी प्रीति की बात कर रहे हैं, कि किसी के सिर पर लट्ठ लेकर खड़े हो गए और उस को भयभीत कर दिया और वह कहने लगा कि मुझे आपसे बड़ा प्रेम है! यह प्रीति हुई? वह प्रतीक्षा करेगा किसी क्षण में जब बदला ले सके। वह तुम्हें मजा चखाएगा। वह राह देखेगा...। भय बिनु होय न प्रीति?
मगर तुलसीदास कोरे पंडित हैं; दरिया जैसे नहीं, बन कोरे पंडित! इसलिए मुझ से बहुत बार लोग पूछते हैं: आप कबीर पर बोले, नानक पर बोले, फरीद पर बोले, दरिया पर बोल रहे हैं, मीरा पर बोले, इतने संतों पर बोले; तुलसीदास पर क्यों नहीं बोलते? तुलसीदास पर मैं नहीं बोलूंगा। तुलसीदास की वाणी में मुझे ध्यान नहीं दिखाई पड़ता, अनुभव नहीं दिखाई पड़ता। पंडित हैं। बड़े कवि हैं। मगर कवियों में क्या लेना देना है? मैं कालीदास पर थोड़े ही बोलूंगा, भवभूति पर थोड़े ही बोलूंगा, शेक्सपियर पर थोड़े ही बोलूंगा। कवियों से क्या लेना देना है? महाकवि हैं और बड़े पंडित हैं और शास्त्रों के बड़े ज्ञाता हैं; मगर इन सब बातों का मेरी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है। अनुभव की चूक मालूम होती है कहीं, कहीं भूल मालूम होती है।
कहते हैं जब तुलसीदास को कृष्ण के मंदिर में ले जाया गया—नाभादास ने अपने संस्मरणों में लिखा है—तो तुलसीदास कृष्ण की मूर्ति के सामने झुके नहीं। जो ले गया था, उसने कहा: नमस्कार नहीं करिएगा? उन्होंने कहा: मैं तो सिर्फ धनुर्धारी राम के सामने झुकता हूं। जिसे ध्यान हो गया हो उसे धनुर्धारी राम और बांसुरी रखे कृष्ण में भेद मालूम पड़ेगा? जिसे ध्यान हो गया हो, उसे तो मंदिर और मस्जिद में भी भेद नहीं रह जाएगा। उसे तो महावीर, बुद्ध और मोहम्मद में भी भेद नहीं रह जाएगा। मगर तुलसीदास को अभी कृष्ण और राम में भी भेद दिखाई पड़ रहा है—दोनों हिंदू हैं! लेकिन तुलसीदास ने कहा कि मेरा माथा तो तभी झुकेगा, जब धनुष बाण हाथ लोगे! मेरा माथा तो सिर्फ राम के सामने झुकता है!
परमात्मा पर भी शर्त लगाओगे? यह माथा झुकाना हुआ? यह तो परमात्मा को झुकवाना हुआ! यह तो साफ बात हो गई कि हों इरादे, अगर चाहते हो कि मैं झुकूं, तो पहले तो झुको, लो धनुष बाण हाथ। यह तो बात साफ हो गई, यह तो सौदा हो गया। यह प्रार्थना न हुई। यह तो अपेक्षा हो गई कि मेरी अपेक्षा पहले पुरी करो तो फिर मैं झुकूंगा। पहले तुम मेरी अपेक्षा पूरी करो तो फिर मैं तुम्हारी अपेक्षा पूरी करूंगा।
नहीं; तुलसीदास दिखता है भय के कारण ही भक्त हैं। और भय से भक्ति पैदा नहीं होती। भक्ति तो प्रेम का परिष्कार है। भय के कारण ही तुम दूसरों के बनाए हुए रास्तों पर चलते हो, क्योंकि लगता है सुरक्षित हैं। बहुत लोग चल चुके हैं तो डर नहीं मालूम होता। अगर भीड़ गङ्ढे में भी जा रही हो तो तुम आसानी से जा सकते हो। क्योंकि इतने लोग कुछ गलती थोड़े ही कर रहे होंगे।
एक बार बर्नार्ड शॉ को किसी ईसाई पुरोहित ने कहा कि आप अपने को ईसाई नहीं मानते; करोड़ों लोग ईसाई हैं, क्या इतने लोग गलती कर सकते हैं, क्या इतने लोग गलत हो सकते हैं? बर्नार्ड शॉ ने जो उत्तर दिया वह बहुत अदभुत है। खूब ध्यानपूर्वक सुनना। बर्नार्ड शॉ ने कहा: इतने लोग सही हो ही नहीं सकते। क्योंकि सत्य तो कभी किसी एकाध के जीवन में उतरता है। इतने लोग अगर सत्य हों तो सारी पृथ्वी सत्य से जगमग हो जाए। बर्नार्ड शॉ ने कहा कि मैं तो इसीलिए ईसाई नहीं हूं कि इतने लोग ईसाई हैं तो सब गड़बड़ होगा। नहीं तो इतने लोग ईसाई हो सकते थे?
जहां भीड़ चले वहां सावधान हो जाना। भीड़ चाल भेड़ चाल है। और परमात्मा की तलाश तो केवल वे ही कर पाते हैं जिनके पास सिंहों की आत्मा है—जो सिंहनाद कर सकते हैं।
अकेले चलने में डर लगता है मगर ध्यान में तो अकेले चलना पड़ेगा। वहां पत्नी भी साथ नहीं हो सकती, मित्र भी साथ नहीं हो सकते।
यहां हम इतने लोग हैं। हम सब आंख बंद कर के ध्यान में हो जाए, तो सब अकेले हो जाओगे। सब पड़ोसी मिट जाएंगे। फिर यहां कोई न रहेगा। तुम अकेले बचोगे। और सब रहेंगे, वे भी अकेले—अकेले बचेंगे।
ध्यानी अकेला हो जाता है। इसलिए लोग ध्यान से डरते हैं। ध्यानी को तो जंगल में घुस पड़ना पड़ता है—बीहड़ जंगल में, जहां कोई पगडंडी भी नहीं! चलता है झाड़ियों में से, कांटों में से, उतना ही रास्ता बनता है।
ठीक कहते हैं दरिया:
पंछी उड़ै गगन में, खोज मंडै नहिं माहिं।
दरिया जल में मीन गति, मारग दरसै नहिं जाय।
दरिया धन वे साधवा, जहां रहे लौ लाय।।
वहां शब्द की तो कोई गति ही नहीं, तो शास्त्र कैसे तुम्हें समझाएंगे? वहां मन बुद्धि चित्त भी नहीं पहुंचते। तो सोचने, विचारने, अध्ययन करने, मनन करने से तुम वहां न पहुंचोगे।
दरिया धन वे साधवा...। दरिया कहते हैं: वे सरलचित्त लोग धन्य हैं, जो उस जगह पहुंच गए हैं—जहां शब्द नहीं पहुंचता, मन नहीं पहुंचता, चित्त नहीं पहुंचता, बुद्धि नहीं पहुंचती, जहां शास्त्रों की कोई गीत नहीं है; जहां विचार बहुत पीछे छूट जाते हैं। जो उस भावलोक में उतर गए हैं, वे धन्यभागी हैं।
किरकांटा किस काम का, पलट करे बहुत रंग।
गिरगिट किसी काम का नहीं होता; बहुत रंग बदलता है। और यही हालत है दुनिया में। तुम एक रंग से थक जाते हो तो दूसरा रंग बदल लेते हो। संसारी संसार से थक जाता है, जंगल भाग जाता है। लेकिन वही का वही है। चित्त वही, चिंतन वही, धारणाएं वही। जिस गीता को पकड़े बैठा संसार में था, उसी गीता को लेकर जंगल चला जाता है। समाज छोड़ देते हैं लोग।
एक मेरे मित्र जैन थे। समाज छोड़ दिया, घर छोड़ दिया, मुनि हो गए। मैंने उनसे पूछा कि अब तम अपने को जैन मुनि क्यों कहते हो? जब जैनों का समाज ही छोड़ दिया, जब जैन घर छोड़ दिया तो अब कैसे जैन? लेकिन वह छोड़ना सब ऊपर—ऊपर है, भीतर सब वही का वही है—वही पकड़, वही धारणाएं, वही शास्त्र। असली बात ऐसे नहीं छूटती। यह तो गिरगिट का रंग बदलना है।
हिंदू ईसाई हो जाते हैं; थक गए हिंदू होने से। बहुत गिर मार लिया, चलो अब ईसाई हो जाएं। ईसाई हिंदू हो जाते हैं। थे गए ईसाई होने से, चलो हिंदू हो जाएं। ऐसे लोग अपने रंग बदल लेते हैं। मगर रंग बदलने से कुछ भी नहीं होता, जब तक कि तुम्हारी आत्मा न बदले।
किरकांटा किस काम का, पलट करे बहु रंग।
जन दरिया हंसा भला, जद तब एकै रंग।।
हंस की अच्छा है, दरिया कहते हैं, कि सदा एक रंग। एक शुभ्र सादगी, एक सरलता, एक निर्मलता। ध्यान का रंग है शुभ्र, सादगी, निर्मलता, निर्दोषता। एक छोटे बच्चे की तरह निर्दोष चित्त ध्यान का रंग है।
और जो ध्यान को उपलब्ध होता है वही समर्थ होता है एक रहने में। जो ध्यान को उपलब्ध नहीं होता, उसके तो गिरगिट की तरह रंग बदलने ही पड़ते हैं। तुम खुद भी जानते हो। अपने अनुभव से जानते हो। जरा में सज्जन मालूम होते हो, जरा में दुर्जन हो जाते हो। अभी—अभी बिलकुल भले थे, अभी—अभी एकदम तलवार निकाल ली। अभी—अभी बिलकुल प्रेमपूर्ण मालूम होते थे, जरा सी कुछ बात हो गई, आगबबूला हो गए। सुबह मंदिर जा रहे थे, ऐसे भगत जी, मालूम होते थे। और तुम्हें ही कोई दुकान पर बैठा देखे...तो लुटेरे हो जाते हो। तम दिन में कितने रंग बदलते हो! यह गिरगिट होना छोड़ो। मगर यह तभी छूट सकता है जब तुम्हारे भीतर ध्यान का शुभ्र रंग फैल जाए।
दरिया बगला उजला, उज्जल ही होय हंस।
लेकिन खयाल रखना, दरिया कहते हैं कि मैं कह रहा हूं कि सफेद रंग, सफेद रंग बगुलों का भी होता है।
बगुले बहुत प्राचीन समय से ही शुद्ध सफेद खादी पहनते हैं। गांधी बाबा ने तो बहुत बाद में यह रज खोला। बगुलों को पहले से पता है, वे पहले से ही खादी पहनते हैं। और बगुले बड़े योगी होते हैं! देखो तुम एक टांग पर खड़े रहते हैं—बगुलासन आसन लगाए रहते हैं! नहीं तो मछलियां फंसे भी नहीं। एक टांग पर बगुला खड़ा रहता है—मछलियां को धोखा देने को। क्योंकि दो टांगें अगर मछलियों को दिखाई पड़ें तो उनको शक हो जाए कि यह बगुला है। एक टांग का कहीं कोई होता है? एक टांग का कहीं कोई हो सकता है। एक टांग का कोई होता ही नहीं। तो मछलियां निश्चित रहती हैं कि होगी लकड़ी गड़ी होगी कि कोई पौधा उगा होगा। मगर कोई बगुला...उसकी दे टांग होनी चाहिए। तो बेचारा बगुला सदियों से योग साध रहा है; एक टांग पर खड़ा रहता है। योगशास्त्र में बगुलासन भी एक आसन है, जिस में एक टांग पर खड़े रहना पड़ता है। और बिलकुल हिलता डुलता नहीं, क्योंकि जरा हिले डुले तो पानी हिल डुल जाए। पानी हिल डुल जाए तो मछलियां शंकित हो जाएं। तो बगुला ऐसा खड़ा रहता है—बिलकुल थिर, चित्त, एकाग्र!
दरिया कहते हैं कि मैं सफेद रंग की बात कर रहा हूं, तुम कहीं भूल मत बैठ जाना। क्योंकि हंस भी सफेद होते हैं, बगुले भी सफेद होते हैं।
दरिया बगला उजला, उज्जल ही होय हंस। दोनों उजले हैं, मगर दोनों के उजले पन में बड़ा फर्क है।
ए सरवर मोती चुगैं, वाके मुख में मंस। एक तो मानसरोवर में मोती चुगता है और दूसरा केवल मछलियां पकड़ता है। दूसरा केवल मांस चीथड़ों के लिए लालायित रहता है। एक के मुंह में मांस है और एक के मुंह में मोती है। मोतियों से पहचान होगी—कौन बगुला है कौन हंस है! जिस वाणी से मोती झरते हों, जिसके पास मोतियों की वर्षा होती हो, जहां से तुम भी अपनी झोली मोतियों से भरकर लौट आओ—बैठना वहां। लगाना प्राणों को वहां। जोड़ना अपनी आत्मा को वहां।
दरिया बगला उजला, उज्जल ही होय हंस।
ए सरवर मोती चुगैं, वाके मुख में मंस।।
बस में सफर कर रही एक महिला ने अपने सहयात्री। मुल्ला नसरुद्दीन को कहा कि आप शायद कुछ कहना चाह रहे हैं? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जी नहीं। मैं क्यों कुछ कहना चाहूंगा? उस महिला ने कहा: तो फिर शायद आप जिसे अपना पैर समझकर खुजला रहे हैं, वह मेरा पैर है यह बता देना जरूरी है।
मुल्ला गया था नुमाइश में। लखनऊ की नुमाइश। रंगीन लोग, रंगीन हवा। एक सुंदर सी महिला को मुल्ला धक्का धुक्की करने लगा। मौका देख कर च्यूंटी इत्यादि भी ले ली। आखिर उस महिला से न रहा गया। उसने मुड़कर मुल्ला की तरफ कहा कि शर्म नहीं आती! खादी के सफेद कपड़े पहने हो। गांधीवादी टोपी लगाए हो। शर्म नहीं आती!
मुल्ला ने कहा: जब दिल्ली में ही किसी को नहीं आती तो मुझे ही क्यों आएं? कोई मैंने शर्म का ठेका लिया है?
महिला भी कुछ चुप रह जानेवाली नहीं थी। उसने कहा: छोड़ो खादी की बात बाल भी सफेद हो गए। कुछ सफेद बालों की तो लाज रखो!
मुल्ला ने कहा: बाल कितने ही सफेद हो गए हों, दिल मेरा अब भी काला है। अब बालों की सुनूं, दिल की सुनूं, तू ही बता।
बगुला ऊपर—ऊपर सफेद है, दिल तो बहुत काला है। रंग बस ऊपर—ऊपर है। भीतर तो बड़ा तमस है। और खयाल रखना, बगुला हो जाना बहुत आसान है। कहते हैं न बगुला भगत!
जन दरिया हंसा तना, देख बड़ा ब्यौहार।
तन उज्जल मन उजला, उज्जल लेत अहार।।
इसलिए तन को ही देखकर मत उलझ जाना। बाहर—बाहर के व्यवहार को देखकर मत उलझ जाना। अंतरतम में झांकना।
तन उज्जल मन उजला, उज्जल लेत अहार।
देखना व्यवहार। देखना आहार। देखना बाहर, देखना भीतर।
सत्संग का यही अर्थ है कि गुरु के पास सब रंगों में बैठकर देखना, सब ढंगों में बैठकर देखना। सब दिशाओं से गुरु से संबंध जोड़ना, ताकि उसकी अंतरात्मा की झलक तुम पर पड़ने लगे।
बाहर से उज्जल दसा, भीतर मैला अंग।
ता सेती कौवा भला, तन मन एकहि रंग।।
दरिया कहते हैं: बगुले से तो कौआ भला, कम से कम बाहर भीतर एक ही रंग तो है। राजनेताओं से तो अपराधी भले हैं कम से कम बाहर भीतर एक ही रंग तो है! तुम्हारे तथाकथित संतों से तो पापी भले हैं, कम से कम बाहर भीतर एक ही रंग तो है।
बाहर से उज्जल दसा, भीतर मैला अंग।
लेकिन सदियों—सदियों से तुम्हें पाखंड सिखाया गया है। तुम्हें यही सिखाया गया है—बाहर कुछ भीतर कुछ। तुम्हें यही सिखाया गया है कि तुम्हें भीतर जो करना हो करो, मगर बाहर एक सुंदर रूप रेखा बनाए रखो। लोग अपने घर में बैठकर खाना सजाकर रहते हैं, बाकी उनका घर गंदा पड़ा रहता है। बस बैठकखाना सजा रहता है। ऐसी ही लोगों की जिंदगी है; उनका बैठकखाना सजा रहता है। चेहरे पर उनके मुस्कान रहती है। मुंह में राम, बगल में छुरी।
मुल्ला नसरुद्दीन मुझसे कह रहा था कि मैं डर के कारण हंसता हूं। मैंने पूछा: यह भी कोई बात हुई! लोग आनंद के कारण हंसते हैं, डर के कारण? तुम कुछ नई ही बात ले आए! तुम क्या तुलसीदास जी के अनुयायी हो या क्या बात है—भय बिनु होय न प्रीति! तुम्हें डर से हंसी आती है? डर से लोग कंपते हैं, हंसोगे क्यों?
उसने कहा कि नहीं, आप समझे नहीं आपको क्या मालूम, मेरी पत्नी जब भी कभी चुटकुले सुनाने लगती है तो उसके डर से मुझे हंसना ही पड़ता है। और वही चुटकुले वह कई दफे सुना चुकी है, मगर फिर भी मुझे हंसना पड़ता है।
एक पाखंड है जिसमें हम दीक्षित किए जाते हैं। रास्ते पर कोई मिल जाता है तुम कहते हो: जयराम जी, सौभाग्य कि सुबह—सुबह आपके दर्शन हुए! शुभ घड़ी, शुभ मुहूर्त...। और मन में कहते हो कि यह दुष्ट कहां से सुबह—सुबह दिखाई पड़ गया! अब पता नहीं दिन में क्या हालत होगी! कोई घर आता है तो कहते हो: आओ, विराजो। स्वागत। पलक पांवड़े बिछाते हैं। और भीतर—भीतर कहते हो: यह कमबख्त! इसको आज ही आने की सूझी!
मुल्ला नसरुद्दीन के घर एक दिन एक दंपति ने दस्तक दी। मुल्ला ने डरते—डरते आधार दरवाजा खोला। नंग—धड़ंग था। सिर्फ गांधी टोपी लगाए हुए था। स्त्री तो बहुत घबड़ा गई। लेकिन अब मेहमान आ ही गए हैं तो मुल्ला ने कहा: आइए—आइए, बड़ा स्वागत है! आइए! डरते—डरते पति पहले घुसा, पीछे पत्नी भयभीत...। पति ने पूछा: यह तुमने क्या ढंग बना रखा है? नंगे क्यों बैठे हो?
तो मुल्ला ने कहा कि इस समय मुझ से कोई मिलने आता ही नहीं। इसलिए मस्त, अपना घर अकेला नंगा बैठा हुआ हूं।
तो पत्नी ने पूछा: फिर यह टोपी क्यों लगाई है? तो मुल्ला ने कहा: कभी कोई भूल चूक से शायद आ ही जाए।
लोग दोहरे इंतजाम किए हुए हैं। एक उनकी जिंदगी है, जिसे वे अंधेरे में जीते हैं और एक जिंदगी है, जिसे वे उजाले में दिखाते हैं।
दरिया कहते हैं: इससे तो कौआ भला। ता सेती कौवा भला, तन मन एकहि रंग। काला ही सही, मगर कम से कम तन और मन तो एक है! बुरे भी होओ तो इतना बुरा नहीं है, अगर तुम निष्कपट होओ और जैसे हो वैसा ही अपने को प्रकट करते हो। पाखंडी पापी से भी बदतर है। लेकिन पाखंडियों की पूजा होती है, पापियों को सजा मिलती है। पाखंडी सिर पर बैठे हैं। इसलिए जिनको भी सिर पर बैठना है, वे पाखंड को अंगीकार कर लेते हैं।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं, स्मरण रखना: पाखंड इस जगत में सब से बड़ी दुर्गति है। उससे और ज्यादा नीचे गिरने का कोई उपाय नहीं है। अगर हंस हो सको तो अच्छा—बाहर—भीतर एक शुभ रंग। अगर हंस न हो सको तो कम से कम कौआ बेहतर बाहर भीतर एक रंग, कम से कम एक बात में तो हंस जैसा है; यद्यपि रंग काला है, मगर बाहर भीतर की एकता तो है। मगर बगला भगत मत होना। वह सबसे बदतर अवस्था है।
मानसरोवर बासिया, छीलर रहै उदास।
जन दरिया भज राम को, जब लग पिंजर सांस।।
वह जो मानसरोवर का अनुभव कर लिया है हंस, अब उसे छिछले, गंदे तालाब में अच्छा नहीं लगता। इस बात को खयाल में लो।
मैं तुमसे कहता हूं: संसार मत छोड़ो, लेकिन ध्यान में डूबो। एक दफा ध्यान का स्वाद आएगा। कि बस संसार गंदा तालाब हो जाएगा। हो ही जाएगा; छोड़ना न पड़ेगा, भागना न पड़ेगा। अपने को मनाना न पड़ेगा। त्यागना न पड़ेगा। अपने आप छिछला गंदा तालाब हो जाएगा। मानसरोवर की जिसे झलक भी मिल गई; उस स्फटिक मणि जैसे स्वच्छ जल की जिसे झलक भी मिल गई; या एक घूंट जिसने पी ली—उसके लिए यह सारा संसार अपने आप व्यर्थ हो जाता है। इसलिए मैं छोड़ने को नहीं कहता; हां, छूट जाए तो बात और। छूट जाए तो गरिमा और, गौरव और। छोड़ना मत। छोड़ने से सिर्फ अहंकार बढ़ेगा और पाखंड बढ़ेगा।
संसार में रहते—रहते ही यह तुम्हें साफ होने लगे कि भीतर एक मानसरोवर है तो तुम भीतर डुबकी मारोगे। भीतर पियोगे। भीतर नहाओगे। और बाहर ठीक है, कीचड़ है सो है। बाहर की कीचड़ तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगी? बाहर की कीचड़ बहुत से बहुत तुम्हारी देह को ही छू सकती है। और तुम्हारी देह भी कीचड़ से बनी है। सो कीचड़ से कीचड़ का क्या बिगड़ेगा?
मानसरोवर बासिया...जिसको ध्यान में बसना आ गया, छीलर रहे उदास...वह अपने आप छिछले सागर, छिछले सरोवर, छिछले तालाबों के प्रति उदास हो जात है। ध्यान रखना, उसके लिए हमारे गहरे से गहरे सागर भी छिछले हो जाते हैं, जिसने भीतर का सागर देख लिया।
जन दरिया भज राम को, जब लग पिंजर सांस।
फिर तो एक ही बात रह जाती है करने योग्य कि जब तक पिंजड़े में सांस चलती है, श्वास श्वास में प्रभु का स्मरण चलता है। रहता है संसार में, रहता है बाजार में, मगर बसता है मानसरोवर में। बसता है परमात्मा में, राम में।
दरिया सोता अकल जग, जागत नाहिं कोय।
जागे में फिर जागना, जागा कहिए सोय।।
छोटे से सूत्र में साक्षी का पूरा शास्त्र कह दिया। दरिया सोता सकल जग...यहां तो सारा संसार सोया हुआ है तुम जो भी कर रहे हो, नींद में कर रहे हो। यहां कोई जागा हुआ नहीं है।
एक दाढ़ी वाले साहब बस में खड़े—खड़े सफर कर रहे थे। एक स्टाप पर एक बहुत ही ठिगने कद का व्यक्ति उस में सवार हुआ। उसका हाथ डंडे तक नहीं पहुंच रहा था। इसलिए वह उन दाढ़ी वाले साहब की दाढ़ी कर खड़ा हो गया। कुछ देर तक तो दाढ़ी वाले साहब चुप रहे लेकिन वे फिर उस से बोले: मेरी दाढ़ी छोड़...। उस ठिगने आदमी ने कहा: क्यों, क्या आप अगले स्टाप पर उतरने वाले हैं?
अपनी—अपनी सूझ। अपनी—अपनी ऊंचाई। अपनी—अपनी तंद्रा। अपनी—अपनी बुद्धिहीनता।...और हम चले जा रहे हैं। और हम किए जा रहे हैं, जो भी हमसे बनता है।
एक कवि महोदय माइक छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे। जब श्रोताओं ने बहुत चिल्ल पों मचाई तो कवि महोदय बोले: ठीक है, अब आप थोड़ी और सब्र करके मेरी अंतिम पंद्रहवीं कविता सुन लें।
ऐसा बार—बार कह कर तो आप उन्नीस कविताएं पहले ही सुना चुके हैं—कई श्रोताओं ने चिल्लाकर टोका। कवि महोदय ने शांत मुद्रा की और देखा और बोले: गिनती में भूल सुधार के लिए धन्यवाद। और यह कह कर वे पुनः कविता पाठ करने में तल्लीन हो गए।
लोग बस चले जा रहे हैं। कहां जा रहे हैं, क्योंकि जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, जो कर रहे हैं उस से कुछ हो रहा है कि नहीं हो रहा है—किसी को चिंता नहीं है। होश ही नहीं है। जिंदगी ऐसे धक्कम धुक्की में बीती जाती है, आपाधापी में बीती जाती है।
दरिया सोता सकल जग, जागत नाहीं कोय।
जागे में फिर जागना...। इसके जागना नहीं कहते जिसको तुम जागना कहते हो। यह जो रात नींद टूट जाती है और सुबह उठ गए और कहा कि जाग गए इस को जागना नहीं कहते। जागने वाले इसको जागना नहीं कहते। जागने वाले किस को जागना कहते हैं? जागे में फिर जागना!इस जागने में भी जो जाग जाए। नींद टूट गई, वह तो देह की थी। आत्मा की नींद जब टूट जाए।
रात सपने देखते हो, दिन विचार करते हो। दोनों हालत में तंद्रा घिरी रहती है। अगर विचार छूट जाएं, अगर विचारों का सिलसिला बंद हो जाए—तो जागना, तो साक्षी, तो ध्यान। निर्विचार चित—जागने का अर्थ है।
जागे में फिर जागना, जागा कहिए सोय।
जो समाधि को उपलब्ध है, वही जागा हुआ है। इसलिए हमने समाधिस्थ लोगों को बुद्ध कहा है। बुद्ध का अर्थ होता है: जागा हुआ।
बुद्ध से किसी ने पूछा, तुम कौन हो? क्योंकि इतने सुंदर थे! देह तो उनकी सुंदर थी ही, लेकिन ध्यान ने और अमृत की वर्षा कर दी थी—अमी झरत, बिगसत कंवल! ध्यान ने उन्हें और नई आभा दे दी थी। एक अपूर्व सौंदर्य उन्हें घेरे था। एक अपरिचित आदमी ने उन्हें देखा और पूछा: तुम कौन हो? क्या स्वर्ग से उतरे कोई देवता?
बुद्ध ने कहा: नहीं।
तो क्या इंद्र के दरबार से उतरे हुए गंधर्व? बुद्ध ने कहा: नहीं।
तो क्या कोई यक्ष? बुद्ध ने कहा: नहीं। ऐसे वह आदमी पूछता गया, पूछता गया—क्या कोई चक्रवर्ती सम्राट? बुद्ध ने कहा: नहीं। तो उस आदमी ने पूछा: कम से कम आदमी तो हो! बुद्ध ने कहा: नहीं।
तो क्या पशु पक्षी हो? बुद्ध ने कहा: नहीं। तो उसने फिर पूछा थककर कि फिर तुम हो कौन, तुम्हें कहो? तो बुद्ध ने कहा: मैं सिर्फ एक जागरण हूं। मैं बस जागा हुआ, एक साक्षी मात्र। वे तो  सब नींद की दशाएं थीं। कोई पक्षी की तरह सोया है, कोई पशु की तरह सोया है। कोई मनुष्य की तरह सोया है, कोई देवता की तरह सोया है। वे तो सब सुषुप्ति की दशाएं थीं। कोई स्वप्न देख रहा है गंधर्व होने का, कोई यक्ष होने का, कोई चक्रवर्ती होने का। वे सब तो स्वप्न की दशाएं थीं। वे तो विचार के ही साथ तादात्म्य की दशाएं थीं। मैं सिर्फ जाग गया हूं। मैं इतना ही कह सकता हूं कि मैं जागा हुआ हूं। मैं सब जागकर देख रहा हूं। मैं जागरण हूं—मात्र जागरण!
ऐसे को हम जागा हुआ कहते हैं।
साध जगावै जीव को, मत कोई उट्ठे जाग।
सदगुरु जाते हैं, लेकिन कुछ थोड़े से ही लोग जगते हैं। कौन लोग? जो मत हैं, मलमस्त हैं। कुछ थोड़े से मस्त। कल मैंने जो तुमसे कहा न—यहां बुद्धिमानों के लिए आमंत्रण नहीं है, यहां मस्तों के लिए आमंत्रण है! यहां दीवानों के लिए बुलावा है। बुद्धिमानी तो कचरा है।
इसलिए इस आश्रम का नियम है कि जहां जूते उतारते हो, वहीं बुद्धिमानी भी उतार कर रख आया करो। यहां तो आओ पियक्कड़ की तरह। दरिया कहते हैं: साध जगावै जीव को, मत कोई उट्ठे जाग। कोई मतवाला, कोई दीवाना जागता है। चतुर, होशियार चूक जाते हैं। अपनी चतुराई में चूक जाता हैं। सोच ही विचार में चूक जाते हैं—जागना कि नहीं जागना? जागने से फायदा क्या है? और फिर इतने—इतने स्वप्न चल रहे हैं, कहीं टूट गए जागने से! जो हाथ में है वह भी छोड़ देना, उसके लिए जो अभी हाथ में नहीं है। समझदार तो कहते हैं, हाथ की आधी रोटी भली है दूर की पूरी रोटी के बजाय। पता नहीं आधी भी छूट जाए और पूरी भी न मिले! यह तो कोई मस्त, यह तो कोई दीवाने, यह तो कोई जुआरी, यह तो कोई दुस्साहसियों का काम है।
साध जगावै जीव को, मत कोई उट्ठे जाग।
जागे फिर सोवै नहीं, जन दरिया बड़ा भाग।।
और जो एक दफा जाग गया, फिर सोता नहीं—सो ही नहीं सकता। वह बड़भागी है!
हीरा लेकर जौहरी, गया गंवारै देस।
लेकिन अधिकतर तो हालत ऐसी है कि सदगुरु आते हैं, बहुत कम लोग पहचान पाते हैं। उनकी हालत वैसी है जैसे—हीरा लेकर जौहरी गया, गंवारै देस। गंवारों के देस में कोई जौहरी हीरा लेकर गया।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस।
परख ही न थी, तो जिन्होंने भी देखा, कंकड़ कहा। हंसे होंगे। जौहरी ने दाम मांगे होंगे, तो कहा होगा: पागल हो गए हो, हमें तो तुम ने बुद्धू समझा है? इस कंकड़ को हम खरीदेंगे! ऐसे कंकड़ तो यहां गांव में जगह—जगह पड़े हैं। कहीं और जाओ। किन्हीं बुद्धुओं को फंसाओ। इतने हम पागल नहीं हैं!
हीरा लेकर जौहरी, गया गंवारै देस।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस।।
दरिया हीरा क्रोड़ का...हीरा तो करोड़ का!
दरिया हीरा क्रोड़ का, कीमत लखै न कोय।
जबर मिलै कोई जौहरी, तब ही परख होय।।
वे थोड़े से दीवाने, जिनकी आंखों में मस्ती का रंग छा गया है, वे ही पहचान पाएंगे, हीरे को परख पाएंगे।
जीसस को कितने थोड़े लोगों ने पहचाना! हीरा आया और गया! बुद्ध को कितने थोड़े लोगों ने संग साथ दिया! हीरा आया और गया! हीरे आते रहे, जाते रहे; थोड़े से दीवाने पहचानते हैं। लेकिन जो पहचान लेते हैं, वे मुक्त हो हो जाते हैं। वे बड़ भागी हैं।
तुम भी बड़भागी बनो!

आज इतना ही।