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बुधवार, 29 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--11)



एक राम सारै सब काम—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)
दिनांक 21 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
आदि अनादी मेरा सांई।
द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माई।।
जो बनमाली सींचै मूल, सहजै पिवै डाल फल फूल।।
जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल सहज ही आवै।।
जो काई कर भान प्रकासै, तौ निस तारा सहजहि नासै।
गरुड़ पंख जो घर में लावै, सर्प जाति रहने नहिं पावै।।
दरिया सुमरै एक हि राम, एक राम सारै सब काम।।
आदि अंत मेरा है राम। उन बिन और सकल बेकाम।।

कहा करूं तेरा बेद पुरान।। जिन है सकल जगत भरमान।।
कहा करूं तेरी अनुभै-बानी। जिन तें मेरी सुद्धि भुलानी।।
कहा करूं ये मान बड़ाई। राम बिना सबही दुखदाई।।
कहा करूं तेरा सांख औ जोग। राम बिना सब बंदन रोग।।
कहा करूं इंद्रिन का सुक्ख। राम बिना देवा सब दुक्ख।।
दरिया कहै राम गुरमुखिया। हरि बिन दुखी राम संग सुखिया।।
आज मम हिय-अजिर में मन-भावनी क्रीड़ा करो तो,
दरस-रस कसकनमयी तुम लगन-मधु पीड़ा भरो तो;
यह खड़ी है दरस-आशा एक कोने मग लजीली,
परस-उत्कंठा उठी है झूमती सी यह नशीली,
आज मिलने में कहो क्यों कर रहे हो हठ हठीली?
मन-हरण-गज-गमन-गति से चरण मन-मंदिर धरो तो;
आज मम हिय-अजिर में
मन-भावनी क्रीड़ा करो तो;
बहुत ही लघु हूं, परम अणु हूं, ससीमित, संकुचित हूं,
विवश हूं, गुणबद्ध हूं, गति-रुद्ध हूं, विस्मित, विजित हूं,
किंतु आशा निखिल संसृति की लिये मैं चिरव्यथित हूं
रुचिर पूर्ण रहस्य-उदघाटनमयी क्रीडा करो तो;
आज मम हिय-अजिर में
मन-भावनी क्रीड़ा करो तो;
क्यों उलहना दे रहे हो कि यह है संकुचित आंगन,
गगन सम विस्तीर्ण कर देंगे इसे तव मृदु पदांकन,
आज सीमा ने दिया है तुम असीमित को निमंत्रण,
ढुल पड़ो प्रेमेश, सीमित संकुचित व्रीड़ा हरो तो;
आज मम हिय-अजिर में
मन-भावनी क्रीड़ा करो तो;
क ही प्रार्थना है। एक ही निमंत्रण है। एक ही अभीप्सा है भक्त की कि यह मेरे छोटे से हृदय में, यह बूंद जैसे हृदय में तू अपने सागर को आ जाने दे। बूंद में सागर उतर सकता है। बूंद ऊपर से ही छोटी दिखाई पड़ती है। बूंद के भीतर उतना ही आकाश है, जितना बूंद के बाहर आकाश है। देर है अगर कुछ तो हार्दिक निमंत्रण की देर है। बाधा है अगर कुछ तो बस इतनी ही कि तुमने पुकारा नहीं।
परमात्मा तो आने को प्रतिपल आतुर है, पर बिन बुलाए आए भी तो कैसे आए? और बिन बुलाए आए तो तुम पहचानोगे भी हनीं। बिन बुलाए आए तो तुम दुतकार दोगे। तुम बुलाओगे प्राणपण से। रोआं-रोआं तुम्हारा प्रार्थना बनेगा, धड़कन-धड़कन तुम्हारी प्यास बनेगी। तुम प्रज्वलित हो उठोगे। एक ही अभीप्सा रह जाएगी। तुम्हारे भीतर उसे पाने की। उसी क्षण क्रांति घट जाती है। उसी क्षण उसका आगमन हो जाता है। वह तो आया ही हुआ था, बस तुम मौजूद नहीं थे। वह तो सामने ही खड़ा था, पर तुमने आंखें बंद कर रखी थीं। परमात्मा दूर नहीं है, तुम उससे बच रहे हो। परमात्मा दूर नहीं है, तुम सदा उसकी तरफ पीठ कर रहे हो।
और कारण है। तुम्हारा बचना भी अकारण नहीं है। बूंद डरती है कि अगर सागर उतर आया, तो मेरी बिसात क्या! मैं गई! अगर सागर आया तो मैं मिटी।
वही भय है कि कहीं मैं मिट न जाऊं। वही भय है कि कहीं मैं समाप्त न हो जाऊं! कहीं मेरी परिभाषा ही अंत पर न आ जाए! मेरा अस्तित्व ही संकट में न पड़ जाए!
इससे तुम पुकारते नहीं प्राणपण से। तुम प्रार्थना भी करते हो तो थोथी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो झूठी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो औपचारिक। और प्रार्थना कहीं औपचारिक हो सकती है? प्रेम कहीं उपचार हो सकता है? तुम्हारी औपचारिकता ही तुम्हारी उपाधि बन गई है, तुम्हारी बीमारी बन गई। कब तुम सहज होकर पुकारोगे? कब तुम समग्र होकर पुकारोगे? और बार-बार नहीं पुकारना पड़ता है। एक पुकार भी काफी है। लेकिन तुम पूरे के पूरे उस पुकार में सम्मिलित होने चाहिए। जरा सा भी अंश तुम्हारा पुकार के बाहर रह गया, तो पुकार काम न आएगी।
पानी उबलता है, भाप बनता है, सौ डिग्री पर; निन्यानबे डिग्री पर नहीं। एक डिग्री की रह गई, तो भी पानी भाप नहीं बनेगा। तुम्हारे भीतर जरा सा भी हिस्सा संदेह से भरा रह गया, सकुचाया, अपने को बचाने को आतुर, अलग-थलग, तुम्हारी प्रार्थना में सम्मिलित न हुआ, तो तुम वाष्पीभूत न हो सकोगे। और वाष्पी--भूत हुए बिना भक्त भगवान को नहीं अनुभव कर पाता है। भक्त को तो मिट ही जाना होता है। उसका निशान नहीं छूटना चाहिए। उसकी लकीर भी नहीं बचनी चाहिए। जैसे ही भक्त ऐसा मिट जाता है कि कुछ भी नहीं बचता उसका, जिसको कह सके मेरा जिसको कह सके मैं--उसी क्षण, तत्क्षण महाक्रांति घटती है!
प्रार्थना पूर्ण होती है, परमात्मा उतरता है।
आज मम हिय-अजिर में मन-भावनी क्रीड़ा करो तो,
दरस-रस-कसकनमयी तुम लगन-मधु पीड़ा भरो तो;
यह खड़ी है दरस-आशा एक कोने में लजीली,
परस-उत्कंठा उठी है झूमती सी यह नशीली,
आज मिलने में कहो क्यों कर रहे हो हठ हठीली,
मन-हरण गज-गमन-गति से चरण मन-मंदिर धरो तो;
आज मम हिय-अजिर में
मन-भावनी क्रीड़ा करो तो!
पुकारो उसे, कि आए और खेले तुम्हारे हृदय के आंगन में। कह दो कि आंगन छोटा है; मगर तुम्हारे आते ही बड़ा हो जाएगा। तुम पैर तो रखो, आंगन आकाश बन जाएगा। सागर आए तो, और बूंद समर्थ हो जाएगी सागर को भी अपने में समा लेने में। सच तो यह है, सागर बूंद को अपने में समाए कि बूंद सागर को अपने में समाए, यह एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं।
उस परम अवस्था में--जिसकी तलाश है, जन्मों-जन्मों से जिसकी तलाश है--न तो भक्त बचता है, न भगवान बचता है। क्या बचता है? भगवत्ता बचती है। एक तरफ से भगवान खो जाता है, एक तरफ से भक्त खो जाता है; जब भक्त ही खो जाता है तो भगवान कैसे बचेगा? भगवान तो भक्त की धारणा थी--कि मैं भक्त हूं तो तुम भगवान हो। भगवान तो भक्त की ही विचारणा थी। भक्त ही गया, भगवान भी गया। फिर जो बच रहता है उसे हम क्या नाम दें? में उसे नाम देता हूं भगवत्ता। सारा जगत चैतन्मय हो उठता है। रोआं-रोआं परमात्मा हो उठता है। कण-कण उस ब्रह्म की पुकार देने लगता है। पत्ते-पत्ते पर उसके हस्ताक्षर मिलने लगते हैं। उठो-बैठो, चलो-फिरो, सब उसी में है। उठना उसमें, बैठना उसमें, चलना उसमें, जीना उसमें, मरना उसमें। फिर जीवन की सुगंध और है। मछली जो तड़पती थी सागर के किनारे पर पड़ी, उसे मिल गया अपना सागर। अब जीवन का रस और है, आनंद और है।
और जब तक तुम्हारे जीवन में ऐसा महोत्सव न आ जाए, ठहरना मत। पड़ाव बहुत है और हर पड़ाव सुंदर है। लेकिन पड़ाव को पड़ाव समझना। रात रुक जाना, विश्राम कर लेना। याद रखना, सुबह उठना है और चल पड़ना है। पुकार दूर की है, पुकार अनंत की है। कुछ भी तुम्हें उलझाए न, कुछ भी तुम्हें अटकाए न। ऐसी चित्त-दशा का नाम संन्यास है। उस परम की खोज में कोई भी चीज बाधा न बन सके। ऐसी बेशर्त समर्पण की अवस्था का नाम संन्यास है।
दरिया के सूत्र प्यारे हैं।
आदि अनादी मेरा साई।
प्रार्थना पूरी हो गई है। प्रार्थना फल गई। फूल लग गए प्रार्थना में। वसंत आ गया। प्रार्थना के फूल से गंध उठने लगती है।
आदि अनादी मेरा सांई।
वह मेरा मालिक, वह मेरा स्वामी है--दोनों है। प्रारंभ भी वही है, अंत भी वही है। बीज भी वही है, वृक्ष भी वही है। जन्म भी वही है, मृत्यु भी वही है। मेरे उस परम प्यारे में सारे द्वंद्व एक हो गए हैं, सारे विरोध अपना विरोध छोड़ दिए हैं।
तुमने शायद महावीर की मूर्ति देखी हो ऐसी, या ऐसा चित्र देखा हो--जैनों के घरों में मिल जाएगा, जैन मंदिरों में मिल जाएगा--जिसमें सिंह और भेड़ साथ-साथ बैठे हैं। जैन तो कहते हैं कि यह महावीर के प्रभाव का प्रतीक है। उनके भीतर की अहिंसा का ऐसा प्रगाढ़ वातावरण पैदा हुआ कि सिंह और भेड़ साथ बैठ सके। न तो भेड़ भयभीत है और न सिंह भेड़ को खाने को आतुर है।
मेरे देखे उस चित्र का अर्थ कुछ और है। यह महावीर की अहिंसा के संबंध में सूचक नहीं है चित्र। यह चित्र और भी बड़ी महिमा का है। यह प्रतीक है कि महावीर अब उस अवस्था में हैं, जहां सहज द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं; जहां विपरीत एक हो जाते हैं; जहां शत्रुताएं लीन हो जाती हैं; जहां अतियों पर खड़े हुए, पास आ जाते हैं। यह महावीर की अहिंसा के प्रभाव को बताने के लिए नहीं हैं चित्र। क्योंकि महावीर की अहिंसा का अगर ऐसा प्रभाव होता तो जिन लोगों ने महावीर के कानों में सलाखें ठीक दीं, पत्थर मारे, उन लोगों पर अहिंसा का प्रभाव न हुआ? मनुष्यों पर प्रभाव न हुआ, सिंह पर और भेड़ पर प्रभाव हुआ! यह बात कुछ जंचती नहीं है। बात कुछ और ही है।
परम अवस्था में, जब भक्त भगवान में लीन होता है और भगवान भक्त में लीन होता है, जब बूंद और सागर का मिलन होता है और भगवत्ता शेष रह जाती है--तो उसमें कोई द्वंद्व नहीं रहता। वहां दिन और रात एक हैं। वहां हर तरह के द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। वह द्वंद्वातीत अवस्था है। वहां दो नहीं बचते। वहां दुई नहीं बचती। वहां बस एक बचता है। उस एक का ही गीत गाया है दरिया ने।
आदि अनादी मेरा सांई।
द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माई।
न तो वह दिखाई पड़ता है। और ऐसा भी नहीं कह सकते कि वह गुप्त है। इस परम अवस्था में वह दिखाई भी नहीं पड़ता और दिखाई पड़ता भी है। तर्क की जो कोटियां हैं, अब काम नहीं आतीं। अब तर्कातीत वक्तव्य देने होंगे। यह वक्तव्य तर्कातीत है।
उपनिषद कहते हैं: वह दूर से भी दूर और पास भी पास है। पूछा जा सकता है: अगर दूर से भी दूर है, तो पास से भी पास कैसे होगा? और अगर पास से भी पास है तो फिर दूर से भी कहने का अर्थ?
सारे ज्ञानियों न विरोधाभासी वक्तव्य दिए हैं। विरोधाभासी वक्तव्य देने पड़े है। कोई उपाय नहीं है। परमात्मा को प्रकट करना हो तो कहना होगा: वह अंधेरा भी है प्रकाश भी है। हमें अड़चन होती है। हमारे तर्क की तो कोटियां हैं--अंधेरा कैसे प्रकाश होगा, प्रकाश कैसे अंधेरा होगा? हमने तो खंड बांट रखे हैं, लेबल लगा रखे हैं, जन्म अलग है, मृत्यु अलग है। मगर सच में, जरा गौर से देखो, जन्म मृत्यु से अलग है? जरा भी अलग है? बिना जन्म के मृत्यु हो सकेगी? जन्म के साथ ही तो मृत्यु आ गई। जन्म शायद उसी सिक्के का दूसरा पहलू है, जिसका एक पहलू मृत्यु है।
दरिया कहते हैं: न तो उसे देख सकते हो, वह दृश्य नहीं है। लेकिन मुष्ट भी नहीं है, गुप्त भी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि मुट्ठी में बंद है कि किसी को दिखाई न पड़े। वह दिखाई भी पड़ता है और दिखाई नहीं भी पड़ता है। इसका क्या अर्थ होगा? इस प्यारे विरोधाभासी वक्तव्य का क्या प्रयोजन है? वह उन्हें दिखाई पड़ता है, जो आंख बंद करते हैं और उन्हें नहीं दिखाई पड़ता, जो आंख खोले बैठे रहते हैं। आंख से देखने जो चलते हैं, उनके लिए अगोचर; लेकिन हृदय से जो देखने चलते हैं, उनके लिए गोचर। जो बुद्धि से सोचते हैं, उनके लिए असंभव है उसका देखना। लेकिन जिनके जीवन में प्रेम की तरंगें उठने गती है, उनके लिए इतना सरल, इतना सुगम--जितना सुगम कुछ और नहीं, जितना सरल कुछ और नहीं।
द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर। उसे नापा नहीं जा सकता, इसलिए अगम्य है। कोई परिभाषा नहीं बन सकती। बुद्धि उसे समझ पाए, इसका कोई उपाय नहीं है। लेकिन सौभाग्य से तुम्हारे पास बुद्धि ही नहीं है, कुछ और भी है। बुद्धि से ज्यादा भी कुछ और तुम्हारे पास है। तुम्हारे पास एक हृदय भी है--अछूता, कुंवारा--जिसे तुमने छुआ नहीं, जिसका तुमने उपयोग नहीं किया। क्योंकि संसार में उसकी जरूरत नहीं है। संसार में बुद्धि काफी है।
इसलिए स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक हम बुद्धि की शिक्षा देते हैं। पच्चीस वर्ष तक हम लोगों को बुद्धि में निष्णात करते हैं। उनके तर्क को धार देते हैं और उनके हृदय को बिलकुल मार देते हैं। उनके हृदय को हम छोड़ ही देते हैं। उसकी उपेक्षा हो जाती है। जैसे हृदय है ही नहीं।
यह ऐसे ही समझो, जैसे कोई हवाई जहाज किन्हीं नासमझों के हाथ में पड़ जाए और वह उसका उपयोग ठेले की तरह कर लगें। कर सकते हैं। म्यूनिसपिल कमेटी का सारा कूड़ा-कर्कट भर कर गांव के बाहर फेंक देने का काम वायुयान से लिया जा सकता है। कुछ थोड़े ज्यादा समझदार हों, तो शाद बस बना लें। लेकिन चले वह जमीन पर ही। जो आकाश में उड़ सकता था, उसके तुमने बस बना लिया है!
ऐसी ही मनुष्य की दशा है। बुद्धि तो जमीन पर चलती है, हृदय आकाश में उड़ता है। हृदय के पास पंख हैं, बुद्धि के पास पैर हैं। बुद्धि पार्थिव है। इसलिए जो लोग बुद्धि से ही सोचते हैं, उन्हें परमात्मा की कोई झलक भी न मिलेगी। स्वप्न में भी उसकी छाया न पड़ेगी। जो बुद्धि से ही सोचते हैं, वे तो एक न एक दिन इस नतीजे पर पहुंच जाएंगे कि ईश्वर नहीं है। उन्हें पहुंचना ही होगा। अगर वे ईमानदार हैं, तो उन्हें यह निष्कर्ष लेना ही होगा कि ईश्वर नहीं है। बुद्धि से सोचने वाले लोग सिर्फ बुद्धि से सोचने वाले लोग अगर कहते हों कि ईश्वर है, तो समझ लेना कि बेईमान हैं।
इस दुनिया में दो तरह के लोग हैं। यहां ईमानदार आस्तिक हैं; वह भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है। बस दिखाई पड़ते हैं ईमानदार; ईमानदार हो नहीं सकते। पाखंड है ईमानदारी का। ऊपर-ऊपर है। सच तो कहना चाहिए कि इस जगत में बेईमान आस्तिक हैं। बुद्धि से सोचते हैं, बुद्धि से जीते हैं। ईश्वर के लिए भी प्रमाण जुटाए हैं। और ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं हो सकता। वह स्वतःप्रमाण है। कौन उसके लिए गवाह होगा? कौन उसके लिए प्रमाण देगा? जो प्रमाण देगा, जो प्रमाण बनेगा, वह तो उस से भी बड़ा हो जाएगा। क्योंकि फिर तो प्रमाण पर निर्भर हो जाएगा ईश्वर। जो निर्भर होता है, वह छोटा हो जाता है। यहां तथाकथित ईमानदार आस्तिक ईमानदार नहीं हैं, हो नहीं सकते। क्योंकि उनकी आस्तिकता हृदय से नहीं उठी है--सिर्फ बौद्धिक है, संस्कारगत है, शिक्षण से मिली है।
तो मुझे कहने दो कि यहां दुनिया में बेईमान आस्तिक हैं। उनकी बड़ी संख्या है। उनकी भी बड़ी बुरी दशा है। आस्तिक और बेईमान! बेईमान होने से कैसे ईश्वर से संबंध जुड़ेगा? क्योंकि ईमान का अर्थ होता है धर्म। बेईमान का अर्थ होता है अधर्म। अधार्मिक आस्तिक।
और दूसरी तरफ ईमानदार नास्तिक हैं। बड़ी पहेली हो गई है मनुष्य के जीवन में। ईमानदार नास्तिक! वे कम से कम ईमानदार हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि कहती है कि ईश्वर नहीं है। बुद्धि तर्क खोजती है और कोई तर्क नहीं पाती, तो वे कहते हैं ईश्वर नहीं है। कम से कम इतनी ईमानदारी है। मगर उनकी ईमानदारी, उनका धर्म उन्हें नास्तिकता में गिराए दे रहा है। ईमानदार नास्तिक हो गए हैं, ईश्वर तक नहीं पहुंच पाते। बेईमान मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों में प्रार्थनाएं-पूजाएं कर रहे हैं। उनकी सब प्रार्थनाएं-पूजाएं झूठी हैं, पाखंड हैं। क्योंकि उनका ईश्वर ही केवल बुद्धि की मान्यता है।
एक तीसरे तरह के मनुष्य की जरूरत है। एक तीसरा मनुष्य अत्यंत अनिवार्य हो गया है। क्योंकि उसी तीसरे मनुष्य के साथ मनुष्यता का भविष्य जुड़ा है। वही एक आशा की किरण है। एक तीसरा मनुष्य, जो ईमानदार आस्तिक हो।
मगर तब हमें मनुष्य की पूरी प्रक्रिया बदलनी पड़े। हमें मनुष्य का पूरा ढांचा बदलना पड़े। हमें मनुष्य की बुद्धि को हृदय के ऊपर नहीं, हृदय को बुद्धि के ऊपर रखना पड़े। इसी क्रांति का नाम रूपांतरण है।
जिस दिन तुम भावना को विचार से ज्यादा मूल्य देने लगते हो, उस दिन तुम्हारे जीवन में धर्म की पहली-पहली झलक आई। जिस दिन तुम प्रेम को तर्क से ज्यादा मूल्यवान मानने लगते हो, उस दिन तुम्हारे पास परमात्मा का द्वार खुलने लगा बुद्धि की आंख से अगोचार है, हृदय की आंख से गोचर है। बुद्धि खोजने चले, कोई थाह न पाएगी। और हृदय खोजने चले तो तत्क्षण, अभी और यहीं है! अथाह की भी थाह मिल जाती है। असंभव भी संभव हो जाता है।
जग गया, हां जग गया वह सुप्त अश्रुत राग;
भर गया, हां, भर गया हिय में अमल अनुराग;
खुल गयी, हां, खुल गयी खिड़की नयन की आज; 
धुल गयी, हां, धुल गयी संचित हृदय की लाज;
नेह-रंग भर भर खिलाड़ी नैन खेलें फाग;
जग गया, हां, जग गया वह सुप्त अश्रुत राग।
दे रही, धड़कन हृदय की, द्रुत ध्रुपद की ताल;
हिचकियों से उठ रही है स्वर तरंग विशाल,
आह की गंभीरता में है मृदंग उमंग;
निठुर हाहाकार में है चंग-कारण रंग;
रंग-भंग अनंत-रति का दे गया वह दाग;
जग गया, हां, जग गया वह सुप्त अश्रुत राग।
प्यार-पारावार में अभिसारिका सी लीन,--
बावरी मनुहार-नौका डुल रही प्राचीन,
क्षीण, बंधन-हीन जर्जर गलित दारु-समूह,--
पार कैसे जाए? है यह प्रश्न गूढ़ दुरुह!
स्वरत्तरंगें बढ़ रहीं, है बढ़ रहा अनुराग;
जग गया, हां जग गया वह सुप्त अश्रुत राग।
मृदुल कोमल बाहु-वल्लरियां डुल कर, बाल,--
कठिन संकेताक्षरों को आज करो निहाल;
आज लिखवा कर तुम्हारे पूजकों में नाम--
हृदय की तड़पन हुई है, सजनि पूरन काम,
राम के, अनुराग के अब खुल गए हैं भाग,
जग गया, हां, जग गया वह सुप्त अश्रुत राग।
तुम्हारे हृदय में एक गीत सोया पड़ा है, एक राग सोया पड़ा है। छेड़ते ही, जाग उठता है वह सोया राग। उस सोये राग का नाम ही भक्ति है। और भक्ति के लिए ही भगवान है। विचार के लिए नहीं, तर्क के लिए नहीं। जग गया, हां, जग गया वह सुप्त अश्रुत राग! जो कभी नहीं सुना था, जो सदा सोया रहा था, जग गया है। भर गया, हां, भर गया हिय में अमल अनुराग! और उसके जगते ही हृदय में प्रीति ही प्रीति का पारावार आ जाएगा। अभी झरत, बिगसत कंवल। झरने लगेगा अमृत। खिलने लगेंगे कमल!
खुल गयी, हां, खुल गई खिड़की नयन की आज;
धुल गई, हां, धुल गई संचित हृदय की लाज
नेह-रंग भर भर खिलाड़ी नैन खेलें फाग;
जग गया, हां जग गया वह सुप्त अश्रुत राग।
और जिस घड़ी तुम्हारा हृदय खुलता है, उमंग से भरता है, आंदोलित होता है, तरंगायित होता है, मदमस्त होता है, उस क्षण परमात्मा है। उस परमात्मा के लिए फिर कोई प्रमाण नहीं चाहिए। फिर सारी दुनिया भी कहे कि परमात्मा नहीं है, तो भी तुम्हारे भीतर एक अडिग श्रद्धा का जन्म होता है, जिसे डुलाया नहीं जा सकता। शायद हिमालय हिल जाए, लेकिन तुम्हारे भीतर की श्रद्धा नहीं हिलेगी।
पर श्रद्धा का जन्म हृदय में होता है, इसे फिर-फिर दोहरा कर तुमसे कह दूं। विश्वास बुद्धि के होते हैं, श्रद्धा हृदय की। इसलिए विश्वास से संतुष्ट मत हो जाना। नहीं तो तुम कागज के फूलों से संतुष्ट हो गए। असली फूल तो हृदय की झाड़ी में लगते हैं।
द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माई।
और एक बार उसकी झलक तुम्हें मिलने लगे तो फिर सारे जगत में उसके ही लीला है, उसका ही खेल है, उसकी ही माया है, उसका ही जादू है। वह चितेरा है और ये सारे चित्र उसने रंगे हैं। वह संगीतज्ञ है, और ये सारे राग उसने छेड़े हैं। वह मूर्तिकार है, और ये सारी प्रतिमाएं उसने गढ़ी हैं। मगर एक बार उससे पहचान हो जाए। जब तक तुम्हारी उससे पहचान नहीं हुई, तब तक तुम उसकी प्रतिमाओं में उसकी छाप न पा सकोगे? कैसे पाओगे? दिखाई भी पड़ जाए तो प्रत्यभिज्ञा न होगी।
जो बनमाली सींचै मूल, सहजै पिवै डाल फल फूल।
बहुत महत्वपूर्ण वचन है, सीधा-सरल। कहते हैं कि जो माली मूल को खींचता है, फिर साहज ही पत्तों को फूल को, डालियों को रस मिल जाता है, कोई पत्ता-पत्ता नहीं सींचना पड़ता। परमात्मा को खोजना नहीं पड़ता कि जाए वृक्ष में खोजें, पहाड़ में खोजें, नदी में खोजें, लोगों में खोजें। यह तो पत्ते-पत्ते खोजना हो जाएगा। ऐसे तो कब तक खोजोगे? जनम-जनम निकल जाएंगे और खोज न पाओगे। नहीं, बस मूल में खोज लो--और मूल तुम्हारे भीतर है! उसका मूल तुम्हारे हृदय में है वहां पहचान लो। वहां की पहचान के बाद जब तुम आंख खोलोगे, चकित हो जाओगे, अवाक रह जाओगे! वही-वही है। सब तरफ वही है।
और यह सहज हो जाएगा इसके लिए कोई प्रयास न करने पड़ेंगे। ऐसा बैठ-बैठ कर मानना न पड़ेगा कि यह कृष्ण की मूर्ति है! दिखाई तो तुम्हें पड़ता है पत्थर, मानते हो मूर्ति है। जानते तुम भी भीतर हो कि पत्थर है, मानते मूर्ति हो।
एक झेन फकीर एक मंदिर में रात रुका। सर्द रात थी, बहुत सर्द रात थी। और फकीर बड़ा मस्त फकीर था--अलमस्त फकीर। थोड़े से ही ऐसे फकीर हुए हैं! उसका नाम था इक्कू। जापान में बुद्ध की मूर्तियां लकड़ी की बनाई जाती हैं। उसने उठाकर एक मूर्ति जला ली। रात सर्द थी और तापने के लिए लकड़ी चाहिए थी। अब रात, और लकड़ी खोजने जाए भी कहां? आग जली। मस्त होकर उसने आग सेंकी। मंदिर मग आग जलती देखकर पुजारी जग गया कि मामला क्या है! एकदम आग जली, तेज रोशनी हुई। भागा आया। देखा, तो एक बुद्ध की मूर्ति तो गयी! बहुत नाराज हुआ--यह तुमने क्या किया, भगवान बुद्ध की मूर्ति जला दी! तुम्हें शर्म नहीं आती? तुम्हें संकोच नहीं लगता? तुम हो में हो कि तुम पागल हो! और तुम बौद्ध भिक्षु हो!
इक्कू ने पास में पड़ी हुई अपनी लकड़ी उठाई और जल गयी, मूर्ति की राख में लकड़ी से कुछ कुरेदने लगा, खोदने लगा, खोजने लगा। पुजारी ने पूछा: अब क्या खोज रहे हो? अब वहां राख ही राख है। इक्कू ने कहा कि मैं भगवान की अस्थियां खोज रहा हूं।
पुजारी ने अपना सिर ठोक लिया, उसने कहा: तुम मूढ़ हद दर्जे के हो! एक तो मूर्ति जला दी...और अब लकड़ी की मूर्ति में अस्थियां कहां है?
इक्कू ने कहा: तो फिर रात बहुत सर्द है और मंदिर में मूर्तियां बहुत हैं। दो चार और उठा लाओ। जब अस्थियां ही नहीं है, तो भगवान कहां है? तो भगवान कैसे? तुम भी जानते हो कि लकड़ी लकड़ी है। मानते भर हो कि भगवान है।
जानने और मानने में जब भेद होता है तो तुम्हारे जीवन में पाखंड होता है। जब जानना और मानना एक हो जाता हैं, तो श्रद्धा का आविर्भाग होता है। जानना और मानना भिन्न हो तो समझना विश्वास। जानते तो तुम भलीभांति हो कि ये रामचंद्र जी जो खड़े हैं रामचंद्र जी नहीं हैं। जानते तो तुम भलीभांति हो, मगर मानते हो कि रामचंद्र जी हैं। झुककर नमस्कार कर लेते हो। चरण छू लेते हो। तुम्हारा जानना और मानना इतना भिन्न होगा तो तुम दो खंडों में नहीं टूट जाओगे? तुम्हारे भीतर द्वैत नहीं हो जाएगा? और तुम्हारे भीतर कैसे धर्म का जन्म होगा? तुम तो एकाकार भी नहीं हो, तुम तो एक भी ही हो--और एक की तलाश को चले हो! एक हो जाओ तो उस एक को खोजा जा सकता है। जब तक तुम दो हो तब तक तुम द्वंद्व, द्वैत के जगत में ही डूबे रहोगे। इसी कीचड़ में फंसे रहोगे, इस कीचड़ के बाहर नहीं जा सकते।
ठीक कहते दरिया--जो बनमाली सींचै मूल, सहजै पिवै डा फल-फूल। सीधे-साधे आदमी हैं, सीधी-सादी भाषा में लेकिन बात गहरी से गहरी कह दी है। जो समझदार माली है वह पत्तों को नहीं खींचता।
माओत्सुत्तुंग ने अपने जीवन संस्मरणों में लिखा है कि मेरी मां को बगिया से बड़ा प्रेम था। उसकी बड़ी प्यारी बगिया थी। दूर-दूर से लोग उसकी बगिया को देखने आते थे। उसके प्रेम, उसके श्रम का ऐसा परिणाम था कि इतने बड़े फूल हमारी बगिया में होते थे कि लोग चकित होते थे! देखने आते थे।
फिर मां बूढ़ी हो गयी, बीमार पड़ी तो उसकी चिंता बीमारी की नहीं थी, अपने मरने की भी नहीं थी; उसकी चिंता एक ही थी--मेरी बगिया का क्या होगा? माओ छोटा था। रहा होगा कोई बारहत्तेरह साल का। उसने कहा: मां, तू चिंता न कर। तेरी बगिया में पानी डालना है न! पानी सींचना है न! वह मैं कर दूंगा।
और माओ सुबह से सांझ तक, बड़ी बगिया थी, पानी खींचता रहता। महीनों बाद जब मां थोड़ी स्वस्थ हुई, बाहर आकर देखा तो बगिया तो बिलकुल सूख ही गयी थी। एक फूल नहीं था बगिया में; फूल की तो बात छोड़ो, पत्ते भी जा चुके थे। सूखे नर-कंकालों जैसे वृक्ष खड़े थे। उसने माओ को कहा कि तू दिन-भर करता क्या है? सुबह से सांझ तक पानी खींचता है। कुएं से रहट की आवाज मुझे सुनाई पड़ती है दिनभर...। बगिया का क्या हुआ?
उसने कहा: मैं क्या जानूं बगिया का क्या हुआ! मैं तो एक-एक पत्ते को धोता था, एक-एक फूल तो पानी देता था। मुझे पता नहीं, मैंने जितना श्रम कर सकता था, किया। मैं खुद ही हैरान था कि बात क्या है! एक पत्ता नहीं छोड़ा जिसको मैंने पानी न पिलाया हो।
मगर पत्तों को पानी नहीं पिलाया जाता, और न फूलों को पानी पिलाया जाता है। पत्तों और फूलों को पानी पिलाओगे तो बगिया मर जाएगी।
लेकिन इस माओ को क्षमा करना होगा। छोटा बच्चा है, माफ करना होगा। इसे क्या पता कि भूमि के गर्भ में छिपी हुई जड़े हैं--अदृश्य--उन्हें पानी देना होता है। उन तक पानी पहुंच जाए तो दूर आकाश में बदलियों से बात करती हुई जो शाखाएं हैं उन तक भी जल की धार पहुंच जाती है। पहुंचानी नहीं पड़ती, अपने से पहुंच जाती है। मूल को सम्हाल लो, सारा वृक्ष सम्हल जाता है।
मूल है तुम्हारे हृदय में। हृदय के अंतरगर्भ में छिपा है मूल।
अगर सच मग ही खोजना हो परमात्मा को तो बुद्धि से मत खोजने निकलना। अगर तय किया हो कि सिद्ध करना है परमात्मा नहीं है, तो बुद्धि से खोजने निकलना। बुद्धि बिलकुल सम्यक है पदार्थ की खोज में; लेकिन चैतन्य की खोज में बिलकुल ही असमर्थ है, नपुंसक है।
जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल सहज ही आवा।
दरिया कहते हैं: सम्राट को निमंत्रण दे दिया, तो उसके वजीर, उसे दरबारी, उसके सेनापति, सब अपने-आप उसके पीछे चले आते हैं। एक-एक को निमंत्रण भेजना नहीं पड़ता। बस सम्राट को बुला लो--राम को बुला लो--शेष सब अपने से हो जाता है। सब अपने-आप चला आता है। सारा संसार, सारे संसार का वैभव, सारे संसार का सौंदर्य, सारे संसार की गरिमा उसकी छाया है। मलिक आ गया तो उसकी छाया भी आ जाएगी।
तुम कभी किसी की छाया को निमंत्रण तो नहीं देते, कि देते हो? कि किसी मित्र की छाया को कहते हो कि आना कभी मेरे घर भोजन करने! छाया को तो कोई निमंत्रण नहीं देता। छाया यानी माया; जो दिखायी पड़ती है कि है और है नहीं। लेकिन मित्र को निमंत्रण दे दो कि छाया अपने-आप चली आती है। मालिक आ गया तो माया भी आ जाएगी। जब जादूगर ही आ गया तो उसका सारा जादू उसके साथ चला आया, उसके हाथों का खेल है।
लेकिन हम जीवन में ऐसा ही मूढ़तापूर्ण कृत्य किए चले जाते हैं। हम वैभव खोजते हैं, हम ऐश्वर्य खोजते हैं; ईश्वर को नहीं। ये दोनों शब्द देखना कितने प्यारे हैं! एक ही शब्द के दो रूप हैं--ईश्वर और ऐश्वर्य। ऐश्वर्य की छाया है। ईश्वर आ जाए तो ऐश्वर्य अपने से आ जाता है। मगर लोग ऐश्वर्य खोजते हैं। एक तो मिलता नहीं, और कभी भूले-चूके किसी तरह छाया को तुम पकड़ ही लो, तो ज्यादा देर हाथ में नहीं टिकती। कैसे टिकेगी? मालिक सरक जाएगा, छाया चली जाएगी।
एक गांव में एक अफीमची ने रात एक मिठाई के दुकानदार से मिठाई खरीदी। पुरानी कहानी है, आठ आने में काफी मिठाई आयी। रुपया था पूरा; दुकानदार ने कहा कि फुटकर पैसे नहीं हैं, सुबह ले लेना। अफीमची अपनी धुन में था। फिर भी इतनी धुन मग नहीं था कि रुपये पर चोट पड़े तो होश न आ जाए। थोड़ा-थोड़ा होश आया कि कहीं सुबह बदल न जाए। तो कुछ प्रमाण होना चाहिए। चारों तरफ देखा कि क्या प्रमाण हो सकता है। देखा एक शंकरा जी का सांड मिठाई की दुकान के सामने ही बैठा हुआ है। उसने कहा: ठीक है। यही दुकान है...। एक तो अपने को भी याद होना चाहिए कि किस दुकान पर...नहीं अपन ही सुबह कहीं और किसी की दुकान पर पहुंच गए तो झगड़ा-झांसा खड़ा हो जाए। यही दुकान है।
सुबह आया और आकर पकड़ ली दुकानदार की गर्दन और कहा: हद हो गई! मुझे तो रात ही शक हुआ था। मगर इतने दूर तक मैंने भी न सोचा था कि तू धंधा ही बदल लेगा आठ आने के पीछे। कहां हलवाई की दुकान, कहां नाईवाड़ा। वल्दीयत भी बदल ली! आठ आने के पीछे!
नाई तो कुछ समझा ही नहीं। उसने कहा: तू बात क्या कर रहा है! कहां का हलवाई, मैं सदा का नाई!
उसने कहा: तू मुझे धोखा न दे सकेगा। देख वह सांड, अभी भी अपनी जगह बैठा हुआ है! मैं निशान लगाकर गया हूं।
अब सांड का कोई भरोसा है! बैठा था हलवाई की दुकान के सामने सांझ को, सुबह बैठ गया नाई की दुकान के सामने। तुम छाया को पकड़ते हो, छाया छिटकती है। इधर पकड़े उधर छिटकी आज है, कल नहीं है। तुम्हारी जिंदगी व्यर्थ की आपाधापी में व्यतीत हो जाती है--छायाओं को पकड़ने में।
स्वामी राम ने लिखा है कि मैं एक घर के सामने से निकलता था, एक छोटा बच्चा अपनी छाया को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। सुबह थी, सर्द सुबह! मां काम में लगी थी, बच्चा आंगन में धूप ले रहा था। उसको अपनी छाया दिखाई पड़ रही थी। तो वह छाया को पकड़ने के लिए आगे बढ़े, लेकिन खुद आगे बढ़े तो छाया भी आगे बढ़ जाए। जितनी बुद्धि बच्चे में हो सकती है, सब तरकीबें उसने लगायी। इधर से चक्कर मारकर गया, उधर से चक्कर मारकर गया, लेकिन जहां से भी चक्कर मारकर जाए वह छाया उसके साथ हट जाए। रोने लगा। उसकी मां ने उसे बहुत समझाया।
राम खड़े होकर देखते रहे। यह खेल तो वही है जो पूरे संसार में हो रहा है, इसलिए राम खड़े होकर देखते रहे। उसकी मां ने बहुत समझाया कि पागल ऐसे छाया नहीं पकड़ी जा सकती! छाया तो हट ही जाएगी। मगर छोटे बच्चे को कैसे समझाओ? वह कहे मैं तो पकडूंगा मैं पकड़कर रहूंगा, कोई तरकीब होनी चाहिए।
आखिर राम आगे बढ़े आगे बढ़े। उन्होंने उस बच्चे की मां को कहा कि तू समझा न सकेगी, यह हमारा धंधा है। हम यही काम करते हैं। लोगों को यही समझाते हैं कि कैसे।
उस बच्चे का हाथ लिया, पूछा उससे: तू क्या पकड़ना चाहता है। उसने कहा कि वह छाया का सिर पकड़ना है। उस बच्चे का हाथ पकड़कर उसके सिर पर रख दिया। बच्चे के ही सिर पर रख दिया! खिलखिलाकर बच्चा हंसने लगा। उसने कहा: मैं जानता ही था कि कोई न कोई तरकीब पकड़ने की। मां से कहने लगा: देख, पकड़ ली न छाया! अब हाथ अपने सिर पर पड़ा तो छाया के सिर पर भी पड़ गया।
ईश्वर को बुला लो, सब ऐश्वर्य चला आता है।
जीसस का बड़ा प्रसिद्ध वचन है, मुझे बहुत प्यारा है! सीक यी फर्स्ट द किंगडम आफ गॉड, दैन आल ऐल्स शैल बी ऐडिड अन्टू यू...। पहले ईश्वर के राज्य को खोज लो, फिर शेष अब अपने-आप मिल जाएगा। मगर हम उल्टे लगे हैं। हम कहते हैं शेष सब पहले!
मेरे पास लोग आकर कहते हैं। वे कहते हैं: अभी नहीं, अभी तो संसार, घर-गृहस्थी, अभी तो सब पहले हम कर लें; संन्यास तो अंत में लेंगे। पहले शेष सब, फिर परमात्मा! पहले छाया पकड़ेंगे, फिर छाया के मालिक को पकड़ेंगे।
यह संसार बड़ा बचकाना है!
तुम जरा अपनी ही तरफ सोचो। दौड़े रहते बाहर पकड़ने के लिए, क्या-क्या नहीं पाना चाहिए हो! मिलता कभी कुछ? हाथ लगता कभी कुछ? और तुम्हारे भीतर संपदाओं की संपदा है! तुम्हारे भीतर साम्राज्यों का साम्राज्य है।
जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल सहज ही आवै।
कौन सी सेना है इस सम्राट की? एक और अर्थ में भी यह सूत्र महत्वपूर्ण है। कुछ लोग क्रोध को वश में करने में लगे हैं, कुछ लोग लोभ को वश में करने में लगे हैं, कुछ लोग काम को वश मग करने मैं लगे हैं। और-और हजार बीमारियां हैं। लेकिन जानने वाले कहते हैं: बस राम, एक औषधि है। रामबाण औषधि है! बीमारियां कितनी ही हों, तुम राम की औषधि पी लो कि सब व्याधियों से, सब उपाधियों से छुटकारा हो जाएगा। तुम राम-नाम की समाधि लगा लो।
तुम क्रोध को सीधे-सीधे न जीते सकोगे। क्योंकि जिसके भीतर राम के दीया नहीं जला, उसके भीतर क्रोध न होगा तो और क्या होगा? वह क्रुद्ध है ही! क्रुद्ध है जीवन पर। क्रुद्ध है, क्यों मैं हूं, इस पर। क्रुद्ध है, क्यों संसार ऐसा है, इस पर। क्रुद्ध है, पूछता है कि कुछ भी न होता तो क्या हर्जा था? अगर मैं न होता क्या बिगड़ा जाता था? क्रुद्ध है हर छोटी-छोटी चीज पर। हां, कभी-कभी क्रोध फूट पड़ता है, लेकिन ऐसे क्रोध उसके भीतर सघन है, पकता ही रहता है। कभी-कभी मवाद बहुत हो जाती है तो बाहर आ जाती है, अन्यथा भीतर क्रोध सड़ाता ही रहता है। उसे।
तुम जब कभी-कभी क्रुद्ध होते हो तो यह मत सोचना कि क्रोध का कारण मौजूद हो गया, इसलिए क्रुद्ध हो गए। क्रोध तो तुम्हारे भीतर मौजूद ही था। बारूद तो भीतर तैयार ही थी। बाहर तो निमित्त मिल गया, एक बहाना, एक जरा सी चिनगारी, कि विस्फोट हो गया।
बुद्ध ने कहा है: सूखे कुएं में बांधो बाल्टी रस्सी में और डालो। खड़खड़ाओ खूब, खींचो, पानी भरकर नहीं आएगा। भरे कुएं में बाल्टी डालो, ज्यादा खड़खड़ाने का सवा ही नहीं है, तुम्हारे डालते ही बाल्टी भर जाती है। खिंचो, जल से भरी आ जाएगी। क्या तुम सोचते हो बाल्टी डालने के पहले कुएं में पानी न था? पानी न होता तो बाल्टी में आता ही कैसे? पानी तो भरा ही था, इसलिए बाल्टी में आ गया।
किसी ने तुम्हें गाली दी--गाली यानी बाल्टी डाली तुम्हारे भीतर, खड़खड़ाई--तुम्हारे भीतर क्रोध हो ही न तो बाल्टी खाली लौट आएगी। तुम्हारे भीतर क्रोध भरा हो तो बाल्टी भरी लौट आएगी। गालियां बाल्टियां हैं। परिस्थितियां बाल्टियां हैं। मनःस्थिति तुम्हारे भीतर जैसी है, वही भरकर आ जाएगा। वही बाल्टी किसी गंदे नाले में डालोगे तो गंदा जल आएगा और किसी स्वच्छ सरोवर मग डालोगे तो स्वच्छ जल आएगा। बुद्ध में वही बाल्टी डालोगे तो बुद्धत्व को लेकर आएगी।
निमित्त बाहर है, लेकिन मूल कारण भीतर है। जब तक तुम भीतर सोए हो, प्रभु का स्मरण नहीं हुआ, भीतर गहरी नींद में पड़े हो और राम की सुध नहीं आयी, अपनी सुध नहीं आयी--तब तक तुम कितना ही लड़ो क्रोध से मोह से माया से, जीत न सकोगे। एक तरफ से दबाओगे, दूसरी तरफ से उभर कर रोग खड़ा हो जाएगा। रोग दबाने से नहीं मिटते। रोगों का मूल कारण मिटाना होता है। तुम तो रोगों के ऊपरी लक्षणों से लड़ रहे हो।
सारी दुनिया मग यही चल रहा है, लोग लक्षणों से लड़ रहे हैं। लोग जाकर कसम ले लेते हैं मंदिर में कि अब क्रोध न करेंगे। क्या तुम सोचते हो कसम लेना क्रोध को रोक पाएगी? काश इतना आसान होता! काश कसमों से बातें हल होतीं! लोग व्रत  लेते हैं--अणुव्रत, महाव्रत! काश व्रतों के लेने से जीवन रूपांतरित होता होता! व्रत टूटते हैं, और कुछ भी नहीं होता। और ध्यान रखना, लिए गए व्रत जब टूटते हैं तो भयंकर हानि पहुंचाते हैं।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं: व्रत तो कभी लेना ही मत। क्योंकि पही तो बात यह है: व्रत लेने से कभी कोई रूपांतरण नहीं होता। अगर तुम समझ ही गए हो कि क्रोध व्यर्थ है तो व्रत थोड़े ही लेना पड़ेगा, बात खतम हो गई। तुम समझ गए कि क्रोध व्यर्थ है।
तुम दीवा से निकलने की कोशिश थोड़े ही करते हो; दरवाजे से निकलते हो, क्योंकि तुम जानते हो दीवाल है, सिर टूटेगा। वह जो शंकराचार्य को मानने वाला मायावादी है, जो कहता है सब माया है, वह भी दीवाल से नहीं निकलता। पूरी के शंकराचार्य भी दरवाजा खोजते हैं! महाराज, आप तो कम से कम दीवाल से निकल जाओ! सब माया है, दरवाजा भी माया है, दीवाल भी माया है; अब माया में क्या भेद है? जब दीवाल है ही नहीं, सिर्फ आभासती है, तो निकल ही जाओ न! अगर वहां सिद्धांत काम नहीं आते। वह उनको भी पता है। कहते हैं: ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या। मानते कुछ और हैं: जगत सत्य, ब्रह्म मिथ्या! कहां का ब्रह्म! यह जो तुम्हारी व्रतों की परंपरा है, यह संभव ही इसलिए हो पाती है कि नासमझी है। क्रोध जलाता है, दग्ध करता है, पीड़ा देता है, घाव बनाता है--तो कसम खा लेते हो। मगर कसम से कैसे क्रोध रुकेगा? क्या करोगे तुम कसम खाकर? जब क्रोध उठेगा झंझावात की तरह, तब तुम क्या करोगे? दबा लोगे, घोंट लोगे, पी जाओगे। अगर यह पीया गया क्रोध तुम्हारे भीतर जहर बनकर घूमेगा, तुम्हारे रोएं-रोएं में समा जाएगा। निकल जाता तो अच्छा ही था, वमन हो जाता, जहर बाहर निकल जाता व्यवस्था से। अब यह तुम्हारी व्यवस्था का अंग हो जाएगा।
तुम्हारे मुनि ऐसे ही अकारण ही तो दुर्वासा नहीं हो जाते। क्रोध को खूब दबाते हैं, तब दुर्वासा हो जाते हैं फिर छोटी-मोटी बात कि भभके। जरा-सी बात, जिस बात से कोई भी न भभकता, साधारण जन भी न भभकता, उस बात से भी दुर्वासा भभक जाते हैं। और ऐसे भभकते हैं कि एकाध जन्म नहीं बिगाड़ते, आगे के दो-चार जन्म बिगाड़ देने का अभिशाप दे देते हैं!
तुम्हारे ऋषि-मुनि अभिशाप देते रहे! ऋषि और मुनि और अभिशाप? ऋषि और मुनि का जीवन तो आशीर्वाद होना चाहिए, बस आशीर्वाद। अभिशाप? लेकिन अभिशाप का कारण है--वे दबाए गए क्रोध,र् ईष्याएं, वैमनस्य, हिंसाएं...वे सब कहां जाएंगी? वे सब इकट्ठी होती हैं, सघन होती हैं। कामवासनाएं दबाकर बैठ जाते हैं तो चित्त कामवासनाओं से ही भर जाते हैं। फिर चित्त मग कामवासनाओं के ही विचार उठते हैं, फिर कुछ और नहीं उठता। फिर ऊपर वे कितना ही राम-राम जपें और माला कितनी ही तेजी से फेरें...तेजी से फेरते हैं ताकि भीतर जो हो रहा है वह पता न चले, उलझे रहें किसी तरह, लगे रहें। मगर उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वह जो भीतर हो रहा है वह हो रहा है। भीतर एक फिल्म चल रही है उनके।
जितनी अश्लील फिल्में तुम्हारे ऋषि-मुनि देखते हैं उतनी अश्लील फिल्में कोई नहीं देखता। कोई देख ही नहीं सकता! अश्लील फिल्में देखने के लिए कुछ अर्जन करना होता है; कामवासना का खूब दमन मरना होता है। किस इंद्र को पड़ी है कि रूखे-सूखे बैठे एक ऋषि, ऐसे ही मरे मराए, अब इनको और क्या मारना है, कि इनके पास भेजता अप्सराओं कि जाओ और नाचो! कोई अप्सराओं को दंड देना है? कोई अप्सराओं का कसूर है?
न कोई अप्सराएं कहीं से आतीं, न कहीं जातीं; ऋषि-मुनियों के भीतर ही दबी हुई जो कामवासना है, यह इतनी भयंकर हो उठती है कि इसका प्रक्षेपण शुरू हो जाता है। मनोविज्ञान कहता है कि किसी भी वासना को दबा लो तो उसका हेलूसिलेशन, उसका प्रक्षेपण शुरू हो जाता है। तुम उसी को देखने लगोगे बाहर। पहले रात सपनों में देखोगे, फिर खुली आंख देखने लगोगे, दिवा-स्वप्नों में देखने लगोगे। और फिर तो तुम्हारे सामने इतनी स्पष्ट होने लगेंगी तस्वीरें, जितना दमन बढ़ता जाएगा उतनी तस्वीरें स्पष्ट होती जाएंगी। जब दमन पूर्ण होगा तो तस्वीरें थ्री-डायमेंशनल हो जाएंगी, बिलकुल यथार्थ मालूम होंगी। ऋषि-मुनियों की मैं गलती नहीं कहता। उन्होंने बराबर थ्री-डायमेंशनल अप्सराएं देखी है--जिनको तुम छू सकते हो, जिनसे बात कर सकते हो। दबाया भी खूब था, अर्जुन किया था।
व्रत लेकर तुम करोगे क्या? व्रत लेने में समझ बढ़ेगी? समझ ही होती तो व्रत लेते क्यों? और समझ ही बढ़ सकती है तो व्रत लेने की कोई जरूरत न पड़ेगी। तुम मंदिर में जाकर कसम तो नहीं खाते कि मैं कसम खाता हूं कि रोज कचरा अपने घर में सुबह इकट्ठा करके बाहर कचरे घर मग फेंकूंगा! रोज फेंकूंगा, नियम से फेंकूंगा; कसम खाता हूं, कभी नियम नहीं तोडूंगा! तुम अगर ऐसी कसम खाओ तो तुम्हारे मुनि-महाराज भी थोड़े हैरान हों कि यह भी क्या कसम है!
नरेंद्र के पिता थोड़े झक्की हैं। मस्त हैं! लोग झक्की समझते हैं। वे गए तीर्थयात्रा को। वे चल पड़ते हैं जब उनकी मौज होती है, बिना किसी को खबर किए। बताते हैं पूरब जा रहे हैं, चले जाते हैं पश्चिम ताकि घर वाले उनका पीछा न कर सकें, पता न लगा सकें कहां हैं। निश्चित भाव से! पहुंच गए जैन तीर्थ--शिखरजी। वहां किसी दिगंबर जैन मुनि के दर्शन किए। वहां और भी लोग थे, सब नियम ले रहे थे। क्योंकि जैन मुनियों का वह खास काम है--व्रत लो! तीर्थयात्रा की, अब व्रत लेकर जाओ; अब यहां कसम खाओ इस तीर्थ-स्थल में। सब ले रहे थे। कोई कसम खा रहा था कि रात्रि-भोजन का त्याग करूंगा। कोई कह रहा था कि अब नमक नहीं खाऊंगा। कोई कह रहा था अब घी का उपयोग नहीं करूंगा। कोई कुछ कोई कुछ। जब उनका नंबर आया तो उन्होंने कहा कि महाराज, कसम खाता हूं कि अब से बीड़ी पीऊंगा।
झक्की हैं, मगर बात बड़े पते की कही उन्होंने! मुनि भी थोड़े चौंके। जिंदगी हो गई उनको भी लोगों को व्रत दिलवाते, मगर यह व्रत! पूछा कि होश में हो, यह कैसा व्रत! तो उन्होंने कहा कि दूसरे तो व्रत कई लेकर देखे, टूट जाते हैं; यह व्रत ऐसा है, कभी नहीं टूटेगा। और व्रत के न टूटने से आत्मा में बल आता है।
यह बात गहरी है! जब भी व्रत टूटता है तो आत्मा निर्बल होती है। यह बात बड़ी मनोवैज्ञानिक है। कभी-कभी झक्की बड़ी गहरी बातें कह जाते हैं। बड़ी दूर की बातें कह जाते हैं। क्योंकि उन्हें फिकिर तो होती नहीं है कि क्या कह रहे हैं। जैसा उन्हें सूझता है वैसा कह देते हैं। लोकलाज की फिकिर नहीं। लोकलाज की फिकिर हो तो कोई ऐसी कसम खाए कि कल से बीड़ी पीएंगे! और तब से वे बीड़ी पीते हैं, नियम पूर्वक पीते हैं। धार्मिक नियम हो गया! अब तो उनसे कोई छुड़वा भी नहीं सकता। व्रत उन्होंने ऐसा लिया, जो पूरा हो सके। परमात्मा अगर कहीं होगा तो जरूर उन पर प्रसन्न होगा कि कम से कम एक व्रतधारी तो है। हालांकि यह अणुव्रत है, बीड़ी कोई बड़ी चीज नहीं है। छोटा ही व्रत है मगर पूरा तो कर रहे हैं, नियम से पूरा कर रहे हैं।
लोग व्रत ले लेते हैं और टूट-टूट जाते हैं। परिणाम क्या होता है? एक आत्महीनता पैदा होता है। एक व्रत लिया, फिर टूट गया, पूरा न हो सका। ग्लानि पैदा होती है। अपने ही प्रति निंदा पैदा होती है। अपराध-भाव पैदा होता है। और इस जगत में सब से बुरी बात है अपराध-भाव पैदा हो जाना। जिसके मन में अपना ही सम्मान न रहा, उसके जीवन में परमात्मा की तलाश करनी बड़ी असंभव हो जाएगी। जिसका आत्म-गौरव खंडित हो गया; जिसे यह समझ में आ गया कि मैं दो कौड़ी का भी नहीं हूं--जो भी करता हूं वही टूट जाता है; जो भी करना चाहता हूं वही नहीं कर पाता हूं--उसके जीवन में तो पैर लड़खड़ा जाएंगे। वह तो यह आशा ही छोड़ देगा कि मैं की परमात्मा को पाने का अधिकारी हो सकता हूं। तुम लाख उससे कहो कि आत्मा परमात्मा छिपा है, तुम ठोंक-ठोंककर समझाओ उसे कि तुम्हारा स्वभाव ही मोक्ष है, निर्वाण है; पर नहीं उसे कुछ समझ में आएगा। वह तो अपने को तुमसे कहीं ज्यादा भलीभांति जानता है। वह जानता है छोटे-छोटे काम तो सधते नहीं। तीस साल हो गए, धूम्रपान छोड़ना चाहता हूं, वह नहीं छूटता--और मुझसे क्या होगा! मैं तो पापी हूं! नर्क ही मेरा स्थान है! स्वर्ग की आशा करना ही व्यर्थ है!
उसके जीवन में गहन निराशा पैदा हो जाती है। और इस सब के पीछे मौलिक कारण क्या है? मौलिक कारण यह है कि तुम पत्तों-पत्तों पर जाते हो, जड़ नहीं काटते
दरिया ठीक कहते हैं: जो नरपति को गिरह बुलावै!
ध्यान को पकड़ो! ध्यान है निमंत्रण परमात्मा के लिए। आने दो राम की थोड़ी झलक तुम्हारे भीतर और उस झलक के साथ ही तुम पाओगे: जो छोड़ना था, सदा छोड़ना था, छूट गया; और जो पकड़ना था, सदा पकड़ना था, अपने-आप हाथ में आ गया है। न छोड़ना पड़ता है कुछ, न तोड़ना पड़ता है कुछ, न पकड़ना पड़ता है कुछ। जीवन में एक सहज सरलता से क्रांति घटनी शुरू हो जाती है। और सहज क्रांति का सौंदर्य ही और है।
जो कोई कर भान प्रकासै, तौ निस तारा सहजहि नासै।।
जिसके भीतर प्रकाश हो गया उसके भीतर रात का आखिरी तारा अपने-आप डूब जाता है, डुबाना नहीं पड़ता। सुबह सूरज निकल कर घोषणा नहीं करता कि भाइयो एवं बहिनो! अब रात समाप्त हो गई! अब तारागण अपने घर-घर जाएं! इधर सूरज निकला उधर तारे गए, निकलता ही निकलता...सूरज का निकलना और तारागका जाना एक साथ, युगपत घटित होता है। सूरज निकलकर अंधेरे से निवेदन नहीं करता कि अब आप अपने घर पधारिए
अल्बर्ट आइंस्टीन के संबंध में मैंने सुना है। भुलक्कड़ स्वभाव का आदमी था। अक्सर ऐसा हो जाता है, जो लोग जीवन की बड़ी गहन समस्याओं में उलझे होते हैं उन्हें छोटी-छोटी बातें भूल जाती हैं। जो आकाश चांदत्तारों में उलझते होते हैं उन्हें जमीन भूल जाती है। इतनी विराट समस्याएं जिनके सामने हों, उनके सामने कई दफे अड़चन हो जाती है। जैसे एक बार यह हुआ कि उसको लगा, अलबर्ट आइंस्टीन को, कि आ गई बीमारी जिसकी कि डाक्टर ने कहा था। डाक्टर ने उसको कहा था कि कभी न कभी डर है, तुम्हारी रीढ़ कमजोर है, तो यह हो सकता है कि बुढ़ापे में तुम्हें झुककर चलना पड़े, तुम कुबड़े हो जाओ। एक दिन उसे लगा, सुबह ही सुबह बाथरूम में से निकलने को ही था कि आ गया वह दिन। वहीं बैठ गया। घंटी बजाकर पत्नी को बुलाया, कहा डाक्टर को बुलाओ, लगता है मैं कुबड़ा हो गया। चलते ही नहीं बन रहा है मुझसे। सिर सीधा करते नहीं बन रहा है। रीढ़ झुक गई है।
डाक्टर भागा गया। डाक्टर ने गौर से देखा और कहा कि कुछ नहीं है, आपने ऊपर का बटन नीचे लगा लिया है। अब उठना चाहते हो तो उठोगे कैसे?
आकाश की बातों में उलझा हुआ आदमी अक्सर इधर-उधर के बटन हो जाएं कोई आश्चर्य की बात नहीं।
एक मित्र के घर अल्बर्ट आइंस्टीन गया था मित्र ने निमंत्रण दिया था। फिर गपशप चली। खाना चला, फिर गपशप चली, मित्र घबड़ाने लगा, रात देर होने लगी, ग्यारह बज गए बारह बज गए। आइंस्टीन सिर खुजलाए, जम्हाई ले, घड़ी देखे, मगर जो बात कहनी चाहिए कि अब मैं चलूं वह कहे ही नहीं। एक बज गया, मित्र भी घबड़ा गया कि यह क्या रात भर बैठे ही रहना पड़ेगा! अब अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे आदमी से कह भी नहीं सकते कि अब आप जाइए, इतना बड़ा मेहमान! और देख भी रहा है कि जम्हाई आ रही है अल्बर्ट आइंस्टीन को, आंखें झुकी जा रही हैं, घड़ी भी देखता है; मगर बात जो कहनी चाहिए वह नहीं कहता। आखिर मित्र ने कहा कि कुछ परोक्ष रूप से कहना चाहिए। तो उसने कहा कि मालूम होता है, आपको नींद आ रही है, जम्हाई रहे हैं, घड़ी देख रहे हैं, काफी नींद मालूम होती है आपको आ रही है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा कि आ तो रही है, मगर जब आप जाएं तो मैं सोऊं। मित्र ने कहा: आप कह क्या रहे हैं? यह मेरा घर है!
तो अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा। भले मानुष! पहले से क्यों नहीं कहा? चार घंटे से सिर के भीतर एक ही बात भनक रही है कि यह कब कमबख्त उठे और कहे कि अब हम चले! इतनी दफे घड़ी देख रहा हूं, फिर भी तुम्हें समझ में नहीं आ रहा। मैं यही सोच रहा कि बात क्या है! जम्हाई भी लेता हूं, आंख भी बंद कर लेता हूं, सुनता भी नहीं तुम्हारी बात कि तुम क्या कह रहे हो। और यह भी देख रहा हूं कि तुम भी जम्हाई ले रहे हो, घड़ी तुम भी देखते, जाते क्यों नहीं, कहते क्यों नहीं कि अब जाना चाहिए।
आदमी करीब-करीब एक गहरे विस्मरण में जी रहा है, जहां उसे अपने घर की याद ही नहीं है; जहां उसे भूल ही गया कि मैं कौन हूं; जहां उसे भीतर जाने का मार्ग ही विस्मृत हो गया है। और इसलिए सारी अड़चन पैदा हो रही है। एक काम कर लो: भीतर उतरना सीख जाओ। और भीतर ज्योति जल ही रही है, जलानी नहीं है--बिन बाती बिन तेल! वह दीया जल ही रहा है।
जो कोई कर भान प्रकासै..और जिसके भीतर प्रकाश हो गया...तौ निस तारा सहजहि नासै।
गरुड़ पंख जो घर मग लावै, सर्प जाति रहने नहिं पावै।
इसलिए अंधेरे से मत लड़ो, प्रकाश को लाओ। और तुम अंधेरे से लड़ रहे हो! अंधेरे से लोग लड़े जा रहे हैं। कोई कहता है कामवासना मिटाकर रहेंगे। कोई कहता है क्रोध मिटाकर रहेंगे। कोई कहता है लोभ मिटाकर रहेंगे तुम मिट जाओगे, लोभ नहीं मिटेगा, कामवासना नहीं मिटेगी। तुम अंधेरे से लड़ रहे हो; ये सब नकार हैं। दीया जलाओ!
इसलिए मैं कहता हूं: ध्यान, ध्यान और ध्यान! सिर्फ दीया जलाओ और शेष सब चीजें अपने-आपे विदा हो जाएंगी।
दरिया सुमरै एकहि राम, एक राम सारे सब काम।।
जिसको मैं ध्यान कह रहा हूं, उसको दरिया कहते हैं राम का सुमरिण। एक ही बात है। एक राम सारै सब काम! फिर इतने-इतने उपद्रव जो तुम अलग-अलग उलझे हुए हो और पागल हुए जा रहे हो, ये सब सम्हल जाते हैं।
आदि अंत मेरा है राम...। दरियार कहते हैं: जब से जाना,जब से जागा, तब से एक बात साफ हो गई कि वही मेरा प्रारंभ है, वही मेरा अंत है, वही मेरा मध्य है।...उन बिन और सकल बेकाम! उनके बिना और सब व्यर्थ है।
मेरे इस सूने जीवन में
तुम आशा बनकर आते हो!
आ जाती जब नैराश्य-निशा
छा जाती है तब आस पास,
जीवन का पथ छिप छिप जाता
हो जाता मेरा मन उदास,
ऐसे में तुम राका-शशि से
आ मंद-मंद मुसकाते हो!
जीवन के इस सूने नभ में
घनघोर घटा छा जाती है,
सजधज कर नूतन साज सजा
जब अमा-निशा आ जाती है,
ऐसे में तुम खद्योत बने
जगमग जग ज्योति जगाते हो!
जीवन के नीरव सपनों को
दुश-शिशिर शून्य कर जाता है,
दावा की जलती लपटों से
जब मृदु उपवन जल जाता है,
ऐसे में तुम ऋतुराज बने
कोयल सी कूक सुनाते हो!
आतुर जग के सब साज क्षणिक
नश्वरता का नर्तन होता,
यह देख चकित हो मेरा मन
जग की नादानी पर रोता,
तब तुम्हीं प्रेरणा-राग छेड़
नवजीवन-गति सुनाते हो!
उसकी तरफ आंख उठाओ। अभी झरत, बिगसत कंवल! उसकी तरह हृदय को खोलो--और मृत्यु गई, अंधकार गया, पाप गया!
कहा करूं तो बेद पुराना...। सुनो, क्रांति का उदघोष है दरिया के इस वचन में! कहा करूं तेरा बेद पुराना...क्या करूं तेरे वेद का और तेरे पुराण का? मुझे तो तू ही चाहिए! ये खिलौने देकर मुझे न समझा। तू मुझे इतना नासमझ न समझ। पंडितों को भुला लिया भुला ले, मैं कोई पंडित नहीं हूं।
कहा करूं तेरा बेद पुराना। जिन है सकल जगत भरमाना।
वेद और पुराण में सारा जगत उलझा हुआ है--कोई कुरान में कोई बाइबिल में, कोई धम्मपद में। सारा जगत उलझा हुआ है। लोग शब्दों के जाल में लगे हैं; शब्दों की खाल निकाल रहे हैं। बात में से बात निकालते जाते हैं। बड़ा विवाद खड़ा किया हुआ है। फुर्सत ही नहीं किसी को राम की तरफ नजर उठाने की।
सिग्मंड फ्रायड के जीवन में उल्लेख है कि जीवन के अंतिम वर्ष में उसने अपने सारे सहयोगियों को, सारे मित्रों को, शिष्यों को अपने घर निमंत्रित किया कि शायद यह आखिरी दिन है अब। सारी दुनिया में उसके शिष्य थे, वे सब इकट्ठे हुए। खास खास! उनको भोजन पर आमंत्रित किया। फ्रायड बैठा है, भोजन चल रहा है, विवाद छिड़ गया। फ्रायड के ही किसी सिद्धांत के संबंध में विवाद छिड़ गया कि फ्रायड का क्या मतलब है। एक कहता कुछ, दूसरा कहता कुछ, तीसरा कहता और ही कुछ तूत्तू मैं-मैं होने लगी। बात यहां तक बढ़ गई कि मारपीट हो जाए, ऐसी संभावना आ गई। फ्रायड ने जोर से टेबिल पीटी और कहा कि सज्जन, मैं अभी जिंदा हूं, यह तुम भूल ही गए। मैं मर जाऊं, फिर तो यह गति होगी ही, मुझे पता है; मगर मेरे सामने यह गति कर रहे हो तुम! मैं मौजूद हूं, तुम मुझसे पूछते भी नहीं कि आपका क्या प्रयोजन है कम से कम जब तक मैं मौजूद हूं तब तक तो मुझ से पूछ लो। आपस में ही लड़े जा रहे हो! परमात्मा सदा मौजूद है, उससे ही पूछो। क्या वेद पुराण कुरान में उलझे हो? जो मोहम्मद के कान में गुनगुना गया, वह तुम्हारे कान में भी गुनगुनाने को राजी है। जो वेद के ऋषियों के हृदय में तरंगें उठा गया, तुम पर उसकी अनुकंपा कुछ कम नहीं है। तुम भी उसके उतने ही हो। देखा नहीं, दरिया ने कहा कि जो मैं धुनिया तो भी हूं राम तुम्हारा माना कि धुनिया हूं, इससे क्या होता है; हूं तो तुम्हारा! तुम मेरे उतने ही हो जितने किसी और के! मैं तुम्हारा उतना ही हूं जितना कोई और तुम्हारा। दीन-हीन सही, अपढ़-अज्ञानी सही; लेकिन हूं तो तुम्हारा! बस इतना ही काफी है। तो भरोसा है कि तुम्हारी अनुकंपा मुझ पर उतनी ही है जितनी किसी और पर। कहा करूं तेरा बेद पुराना। जिन है सकल जगत भरमाना।।
कहा करूं तेरी अनुभै-बानी। जिनतें मेरी सुद्धि भुलानी।।
और सभी कहते हैं कि अनुभव की वाणी है। वेद भी यही कहते, धम्मपद भी यही कहता, कुरान, बाइबिल भी यही कहते कि सब अनुभव की वाणी है। और मेरी सुधि इन सब अनुभवियों की वाणी में भट गई। मुझे मेरा पता ही नहीं मिल रहा है। इतने सिद्धांत, इतने सिद्धांतों के जाल, इनमें से बाहर निकलना मुश्किल हुआ जा रहा है। मछली की तरह फंस गया हूं सिद्धांतों के जाल में।
और यह भी नहीं कहते दरिया कि यह अनुभव की वाणी न होगी, लेकिन किसी दूसरे की अनुभव की वाणी तुम्हारा अनुभव नहीं बनती, नहीं बन सकती! अनुभव हस्तांतरणीय नहीं है। अनुभव जैसे ही तुमसे कहा गया, झूठ हो जाता है। मेरा अनुभव मेरा अनुभव है, कोई उपाय नहीं है कि इसे मैं तुम्हारे में दे दूं। देना चाहता हूं तो भी कोई उपाय नहीं है। जैसे ही शब्दों में बांधूंगा, आधा तो मर जाएगा। और फिर तुम तक पहुंचते-पहुंचते जो आधा बचा है वह भी मर जाएगा। और तुम जो समझोगे वह कुछ और ही होगा। तुम वही समझोगे तो तुम समझ सकते हो।
तुम्हारी अपनी अपेक्षाएं हैं। तुम्हारी अपनी धारणाएं हैं। तुम्हारा अपना बांध हुआ चित्त है। तुम्हारे पास एक मन है; उस मन से ही तुम सुनोगे।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन एक होटल में ठहरा था। ट्रेन पकड़नी थी। भागा भागा नीचे आया टैक्सी में सामान रखा। सब सामान रख गया, एक नजर डाली, तभी देखा कि छाता भूल आया है ऊपर ही। फिर भागा। चौथी मंजिल, पुराने दिनों की कहानी लिफ्ट भी नहीं। चढ़ा सीढ़ियां हांफता-हांफता, तब तक अपने कमरे पर पहुंचा तब तक वह कमरा किसी और को दिया जा चुका था। तो ताले के छेद में से देखा कि भीतर क्या हो रहा है। छाते का क्या हुआ! मगर भीतर एक रंगीन दृश्य है। छाता-वाता भूल गया। एक नया-नया विवाहित जोड़ा हनीमून मनाने आया है। पति पूछ रहा है पत्नी से: ये प्यारी-प्यारी आंखें, ये मीनाक्षी जैसी आंखें, किसकी हैं? मुल्ला आतुर होकर सुनने लगा, सांस रोककर सुनने लगा। पत्नी ने कहा: तुम्हारी, तुम्हारी! और किसकी?
और यह सुए जैसी लंबी नाक, यह किसकी है?
तुम्हारी, तुम्हारी! और किसकी?
और ये लाल सुर्ख ओंठ...और ऐसी यात्रा चलने लगी पूरे शरीर पर, पूरा भूगोल...! इधर मुल्ला की ट्रेन, इधर नीचे खड़ी टैक्सी, वह भोंपू बजा रहा, इधर भूगोल रसपूर्ण से रसपूर्ण हुआ जा रहा। और छाता! उसकी तुम मुसीबत समझ सकते हो। आखिर उससे रहा नहीं गया, जब भोंपू बहुत बजा और उसने देखा घड़ी में कि अब चूकने की स्थिति है, जोर से दरवाजा खटखटाया और कहा कि एक बात मेरी भी सुन लो, जब छाते का नंबर आए तो खयाल रखना, वह मेरा है।
अपनी-अपनी चित्त की धारणा है। अब वह छाता ही छाता छाया हुआ है!
तुम जब सुनते हो कुछ तो तुम खाली थोड़े ही सुनते हो, शून्य थोड़े ही सुनते हो, मौन थोड़े ही सुनते हो। हजार तुम्हारे विचार हैं...हिंदू है, मुसलमान है, ईसाई है, सब वहां खड़े हैं। जो तुमने पढ़ा है, सुना है, वहां खड़ा है। उस सब भीड़-भाड़ में से जब अनुभव की वाणी गुजरती है, खंड-खंड हो जाती है, टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। उस पर न मालूम कैसे-कैसे रंग चढ़ जाते हैं, न मालूम कैसे-कैसे ढंग चढ़ जाते हैं! तुम तक पहुंचते-पहुंचते कुछ का कुछ हो जाता है।
एक मकड़ी के उलझते हुए जालों की तरह,
जिंदगी हो गई अनबूझ सवालों की तरह।
छलछलाती है भरी आंख किसी खंडहर की,
कोई अहसास गुजरता है कुदालों की तरह।
जब से देखे हैं फटे पांव पहाड़ों के कहीं
हर नदी दीखती रिसते हुए छालों की तरह
रोज सहा हूं कोई दर्द जलावती का,
दौरेत्ताजीर में आजाद खयालों की तरह।
मैं तेरे शहर में जब भी गया हूं, पाया है,
कोई आवाज उफनती है उबालों की तरह।
दफन हैं ख्वाब कई जेहन के तहखाने में,
जुल्म के वक्त जमींदोज रिसालों की तरह।
दीखता है मुझे हर शख्स पिटे मोहरे-सा,
दौर ये है किसी शतरंज की चालों की तरह।
अंधेरी रात सचाई का गला घोंट रही,
कोई फरब उभरता है उजालों की तरह।
तुम्हारे शास्त्र फरेब हैं। और ऐसा नहीं है कि जिन्होंने कहा है वे अनुभवी नहीं थे। जिन्होंने कहा है वे अनुभवी थे। बुद्ध ने धम्मपद में अपने को उंडेल दिया है और पर्वत के प्रवचन में जीसस ने अपने प्राण डालने की चेष्टा की है और भगवदगीता में कृष्ण ने गा दिया है गीत जितना श्रेष्ठता से गाया जा सकता है। मगर तुम तक पहुंचते-पहुंचते कुछ का कुछ हो जाता है।
एक मकड़ी के उलझते हुए जालों की तरह,
जिंदगी हो गयी अनबूझ सवालों की तरह।
अंधेरी रात सचाई का गला घोंट रही,
कोई फरेब उभरता है उजालों की तरह।
शब्द बड़े फरेब सिद्ध हुए हैं। शब्दों से सावधान! शून्य को गहो, मौन को पकड़ो क्योंकि मौन में ही, शून्य में ही परमात्मा तुम से बोलेगा, तुम्हारा वेद जन्मेगा, तुम्हारा कुरान जन्मेगा, तुम्हारी बाइबिल पैदा होगी! और जब तुम्हारी होगी, अपनी होगी, निजता की होगी, तुम्हारे हृदय का उस पर रंग होगा, तुम्हारी धड़कन होगी उस में, तुम उस में सांस लेते हुए होओगे--वैसा जीवन सत्य ही मुक्त करता है। उधार सत्य मुक्त नहीं करते, बंधन बन जाते हैं।
और चिंता न करना कि तुम अपढ़, तुम अज्ञानी, तुम्हारे वचन वेद जैसे शुद्ध कैसे हो पाएंगे; चिंता न करना कि तुम्हारी वाणी में बुद्ध जैसी प्रखरता कैसे होगी? चिंता न करना। तुतलाया ही तुमने तो ही अगर सत्य तुम्हारा है तो बुद्धों के स्फटिकमणियों जैसे दिए गए सत्य भी तुम्हारे तुतलाते सत्यों के सामने फीके पड़ जाएंगे। तुम्हारा अपना अनुभव ही...। अंधे से कितने ही प्रकाश की बातें करों, क्या होगा? और बड़े-बड़े महाकवि प्रकाश के गीत गाए अंधे के सामने क्या होगा? और अंधे की आंख खुले और अंधा रोशनी को देख ले, सब हो जाएगा।
मेरा स्वर सीमित रहने दो!
कसो न इतने तार टूट कर
ही रह जाए जीवन-वीणा!
इसके जर्जर तारों का स्वर,
अस्फूट है अस्फूट ही रहने दो!
मेरा स्वर सीकित रहने दो!
नहीं साध मेरी स्वर-लहरी,
धरती अंबर को छू पाए!
केवल इसे तुम्हीं सुन पाओ,
इसको अपने तक रहने दो!
मेरा स्वर सीमित रहने दो!
मेरी इस निरीहता की निज,
क्षमता से तुलना मत करना!
मेरे अंतर की साधों को,
निज पर अवलंबित रहने दो!
मेरा स्वर सीकित रहने दो!
मैंने अपने श्रद्धा से प्रिय,
तुमको पूजित देव बनाया!
तुम केवल इतना ही कर दो,
मुझको भी कुछ तो रहने दो!
मेरा स्वर सीमित रहने दो!
चिंता न करना, तुम्हारा स्वर सीकित होगा--स्वर तुम्हारा हो! तुतलाया हो, मगर तुम्हारा हो! अनगढ़ हो, मगर तुम्हारा हो! तो मुक्तिदायी है। नहीं तुम गा सकोगे गीत उपनिषदों जैसे। दरिया नहीं गा सके। नहीं गा सकोगे तुम गीत बुद्धों जैसे। चिंता नहीं है। यह प्रश्न कला का नहीं है, न भाषा का है, न व्याकरण का है, न शैली का है, न छंद का है। यह प्रश्न तो आत्म-अनुभव का है। और दूसरों की वाणी में अगर उलझ गए और दूसरों की वाणी को ही अगर अपनी वाणी मान लिया तो फिर तुम्हारा सत्य तुम्हें कभी भी न मिलेगा। फिर तुम उलझे रहोगे मकड़ों के जालों में। सब सिद्धांत, सब शास्त्र मकड़ी के जाले हैं। सावधान!
कहा करूं यह मान बड़ाई, राम बिना सब कही दुखदाई।
दरिया कहते हैं: बहुत सम्मान मिलता है, मान मिलता है; लेकिन इस सब का कोई मूल्य नहीं है। राम के बिना कुछ भी मिल जाए, दुख ही लाता है, सुख ही लाता।
कहा करूं तेरा साख और जोग।
सांख्य भारत में पैदा हुआ सब से ज्यादा सूक्ष्म शास्त्र है, सब से ज्यादा बारीक दर्शन है। तो कहते हैं: क्या करूं तेरे सांख्य का और क्या करूं तेरे योग का? योग भारत में पैदा हुआ अभ्यास का सबसे ज्यादा वैज्ञानिक क्रम है। सांख्य विचार का और योग अभ्यास का। सांख्य मनन का और योग साधन का। ये चरमोत्कर्ष हैं। मगर दरिया कहते हैं: मेरे किस काम के? जब तक मेरे भीतर सांख्य पैदा न हो, जब तक मेरा योग न जन्मे, जब तक मेरा तुझसे योग न हो, तब तक तू मेरा सांख्य न बने--तब तक मैं राजी नहीं।
कहा करूं तेरा साख और जोग, राम बिना सब बंदन रोग।
तेरे बिना तो मैंने सारी वंदनाओं को रोग जाना है, सारी प्रार्थनाओं को दो कौड़ी का माना है। तू है तो सब है, तू नहीं तो कुछ भी नहीं।
इंद्रधनुषी सांझ के सूने क्षणों में
प्रार्थना में झुक गया है शीश मेरा!
शांत हलचल हो गयी सूने गगन की,
शांत हलचल हो गयी है व्यथित मन की,
राग-रंजित सी दिशाएं शांत निरव,
विकला पांखी ले चुके तरु पर बसेरा!
प्रार्थना में कुछ न कहने को हृदय की बात,
प्रार्थना में मन नहीं है रूप-गुण-लय-स्नात,
शेष केवल शांत नीरव तृप्ति-सुख का भाव
छू नहीं सकता जिसे मन का अंधेरा!
इंद्रधुषी सांझ के
सूने क्षणों में
प्रार्थना में झुक गया है
शीश मेरा!
न तो शब्दों की कोई बात है प्रार्थना, न क्रियाकांड का इससे कोई संबंध है। भाव के, प्रेम के किसी क्षण में कहीं भी सिर झुक जाए, वहीं प्रार्थना हो जाती है। मगर राम की प्रतीति के बिना कैसे झुके सिर, कहां झुके सिर? राम की उपस्थिति के बिना कैसे यह अनुग्रह का भाव पैदा हो, कि सिर झुकाऊं कि धन्यवाद दूं?
इसलिए तुम्हारी प्रार्थनाएं सिर्फ औपचारिकताएं है। तुम समय खराब कर रहे हो तुम्हारी प्रार्थनाओं में। पंडित-पुजारियों के साथ तुम जीवन का अमूल्य अवसर व्यर्थ कर रहे हो। अपने एकांत में, अपने ही ढंग से--पुकारो! अपने एकांत में, अपने ही ढंग से, उससे दो बातें कर लो। दो बातें करनी हों तो दो बातें कर लो, न करनी हों चुप बैठ रहो मौन बैठ रहो। और प्रार्थना को कोई बंधी-बंधाई लकीर मत बनाना, कि वही-वही प्रार्थना रोज दोहरा रहे हैं। वह मुर्दा हो जाएगी, यांत्रिक हो जाएगी। इतना ही नहीं कर सकते क्या, परमात्मा से कहने को दो शब्द रोज उसी क्षण नहीं खोज सकते? वहां भी तुम तैयार किए हुए, पूर्व-नियोजित, शब्दों का ही व्यवहार, जारी रखोगे! कम से कम उससे तो हार्दिकता का नाता जोड़ो!
कहां करूं इंद्रिन का सुक्ख। राम बिना देव सब दुक्ख।
दरिया कहते हैं: मैंने तो सिवाय दुख के और कुछ नहीं पाया। इंद्रियों ने आशाएं बहुत दीं, आश्वासन बहुत दिए, वचन बहुत दिए, मगर वचन पूरे न किए। हर इंद्रिय ने कहा सुख दूंगी और हर इंद्रिय ने दुख दिया।
इस संसार में हर नर्क के दरवाजे पर स्वर्ग की तख्ती लगी है। स्वर्ग की तख्ती देखकर तुम भीतर चले जाते हो। तुम्हारा तख्तियों पर बड़ा भरोसा है। फिर भीतर फंस गए, फिर निकलना आसान नहीं है। कब समझोगे? कितने बार तो उलझ चुके हो! ऐसे भी तो बहुत देर हो चुकी है, अब जागो!
राम बिना देवा सब दुक्ख...। राम के बिना सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं देखा है।
मैं एक बूंद जिस सागर की
वह सागर अब तक पा न सकी!
जाने किस क्षण किस रवि ने निज
उत्तप्त किरण से वाष्प बना
मुझको सागर से अलग किया
दिखला अनुपम मोहक सपना!
मैं उड़ी छोड़ भू, अंबर में,
पाने जीवन का नव विकास,
था ज्ञात किसे बन जाएगा
क्षण-भर का उड़ना चिर प्रवास!
जो छोड़ चली सागर असीम
उस सागर में फिर आ न सकी,
मैं एक बूंद जिस सागर की
वह सागर अब तक पा न सकी!
क्या ज्ञात मुझे कब तक मुझको
जग में यों ही भ्रमना होगा,
क्या ज्ञात मुझे कब क्या क्या
जग में स्वरूप धरना होगा!
पर इतना दृढ़ विश्वास मुझे
जो सागर उस दिन छोड़ चली,
उसकी लहरें में एक दिवस
फिर लय जीवन अपना होगा!
विश्वास मुझे यह चिर महान
यद्यपि अब तक पथ पा न सकी!
मैं एक बूंद जिस सागर की
वह सागर अब तक पा न सकी!
सुख है क्या? तुम्हारे बीच और अस्तित्व के बीच छंद का छिड़ जाना सुख है। तुम्हारे बीच और अस्तित्व के बीच नृत्य का छिड़ जाना सुख है। तुम्हारी बीच और अस्तित्व के बीच जब कोई विरोध नहीं होता, तब सुख है।
सुख एक संतुलन है, एक संगीत है, एक समन्वय है, एक लयबद्धता है! बूंद जब तब सागर में एक न हो जाए जब तक सुख नहीं। राम सागर है, तुम बूंद हो।
दरिया कहै राम गुरमुखिया। हरि बिन दुखी राम संग सुखिया।।
कहते हैं: बस एक बात, एक पते की बात आखीर में कह देते हैं; सारे गुरुओं ने यही कही है। सारे गुरुओं का सारा यूं कह देते हैं। सारे गुरु-मुखों से यही गंगा निकली है--हरि बिन दुखी, राम संग सुखिया!...जो राम के बिना है, वह दुख में जी रहा है, नर्क में जी रहा है; जो राम के साथ है वह सुख में जी रहा है, वह स्वर्ग में जी रहा है।
और चाहो तो अभी राम के साथ हो जाओ। चाहो तो इसी क्षण राम के साथ हो जाओ। चाहो तो इसी क्षण तुम्हारा जीवन एक गीत बने, एक नृत्य बने, एक उत्सव बने। चाहो तो इसी क्षण हजार-हजार फूल लिखें!
सतरंगी सपनों ने
पाया है जीवन।
यादों के झूले में
आ कर कोई झूला,
आंगन में हंसता
गुलमोहर फूल।
फूलों से महका है
छोटा सा आंगन।
सिंदूरी संध्या में
कोयल की कूकें,
उठ आई जियरा में
मीठी सी हूकें
आएगा कब वो
मदमाता सावन।
मौसम ने छेड़ा है
सपनीले मन को,
छू कर जगाया है
सोए यौवन को।
सदियों से प्यास है
मेरा ये उपवन!
पुरावा के झोकों से
उड़ता है आंचल,
रह रह कर होती है
सांसों में हलचल।
जैसे किसी ने
थामा है दामन।
सतरंगी सपनों ने
पाया है जीवन।
अभी उतर आएं सारे इंद्रधनुष तुम्हारे प्राणों में! अभी शास्त्र छोड़ो, शब्द छोड़ो--शून्य गहो! हिंदू, मुसलमान, ईसाई होना छोड़ो--भक्त बनो!
अमी झरत, बिगसत कंवल!

आज इतना ही।