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गुरुवार, 30 जून 2016

पध घुंघरू बांध--(प्रवचन--02)



समाधि की अभिव्यक्तियां—(प्रवचन—दूसरा)

प्रश्न-सार
1—न जाने वाली और आने-जाने वाली मस्ती क्या अलग-अलग हैं?
2—कभक्ति के मार्ग में साधु-संगति का इतना क्यों मूल्य है?
3—कई मनस्विद कहते हैं कि प्रेम मूलतः जैविक है, जो कि मनुष्य में दमन के कारण मानसिक हो जाता है।...?
4—भक्त की भाव-दशा के संबंध में कुछ कहें।
5—आप पूना पधारे, इसमें हमारी क्या पात्रता है? और आपके सामीप्य में मैं पूरा रूपांतरित नहीं हुआ, इसका पूरा का पूरा जिम्मा भी मेरा है। फिर भी जो आपने दिया है, वह बहुत है। मैं अनुगृहीत हूं।
6—क्या आप ईश्वर के होने का कोई प्रमाण दे सकते हैं?


पहला प्रश्न: आज फिर वही प्रश्न मन उठा रहा है--यह कि न जाने वाली मस्ती और आने-जाने वाली मस्ती क्या दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं? आपने कहा कि पच्चीस वर्षों से मैं एक ही मस्ती में हूं जो कि कभी जाती नहीं। और आपने यह भी कहा कि मंसूर को जब मस्ती पकड़ती थी तो वह और ही आदमी हो जाता था। इन दो वक्तव्यों में विरोध नहीं है, तो विरोध का आभास तो है ही। कृपापूर्वक इस विरोधाभास को दूर करें।

स परम मस्ती के प्रकट होने के ढंग दो हैं। मस्ती एक ही है; उसके प्रकट होने के ढंग दो हैं। कहीं तो बाह्य अभिव्यक्ति बनती है और कहीं केवल अंतर्धारा। कहीं तो भीतर-भीतर स्वाद चलता है और कहीं-कहीं स्वाद बह कर संगीत बन जाता है।
अंग्रेजी में दो शब्द हैं, महत्वपूर्ण हैं। एक शब्द है: इक्सटेसी। इक्सटेसी का अर्थ होता है: ऐसी आनंद की अनुभूति जो बाहर प्रकट हो। फुल खिलें, गीत झरें, सुगंध उड़े--बाह्य अभिव्यक्ति हो। और दूसरा शब्द है अंग्रेजी में: इन्सटेसी। उसका अर्थ होता है: अंतर्धारा बहे। किसी को कानोंकान पता भी न चले। जैसे नील नदी सैकड़ों मील तक जमीन के नीचे बहती है, फिर जमीन पर प्रकट होती है--ऐसी ही धारा अंतर में भी बह सकती है और बाहर भी प्रकट हो सकती है।
जो धारा बाहर प्रकट होगी वह सतत नहीं हो सकती। मीरा कितना ही नाचे, चौबीस घंटे नहीं नाच सकती। क्योंकि जिन उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है--शरीर का--वह तो थकेगा। मीरा का हो तो भी थकेगा। शरीर तो थकेगा। तो नृत्य चौबीस घंटे नहीं चल सकता। कभी चलेगा, कभी नहीं चलेगा। इसलिए मीरा की अभिव्यक्ति आती-जाती मालूम पड़ेगी। इससे यह मत समझ लेना कि समाधि आती-जाती है। समाधि तो बहती है भीतर; कभी प्रकट होती, कभी प्रकट नहीं होती। प्रकटन में बीच-बीच में अंतराल आ जाएंगे।
कोई चौबीस घंटे गीत तो नहीं गा सकता है। और वृक्ष भी तो वर्ष भर नहीं फूलते; हर दिन नहीं फूलते, हर समय नहीं फूलते। इसका यह अर्थ मत समझना कि जब वृक्ष नहीं फूला है, तो उसके प्राणों में फूल खिलाने वाली रसधार नहीं है। रसधार मौजूद है--कभी फूल बनेगी।
मीरा जब चुप बैठी है और उसने पैरों में घुंघरू नहीं बांधे और हाथ में वीणा नहीं उठाई, नाचती नहीं है, गाती नहीं है--तब भी भीतर तो धारा बह ही रही है; रस वैसा का वैसा है। पर तुम्हें पता न चलेगा।
ऐसा भी हो सकता है कि किसी का रस सदा ही भीतर रहे, जैसे बुद्ध का--कभी गीत न बना; कभी नृत्य न बना, कभी बाहर न आया; भीतर ही रमा रहा।
ये दो रूप हैं अभिव्यक्ति के। बुद्ध की नीलधारा सदा ही भूमि के नीचे रही। जो खोजेंगे वे बुद्ध को पाएंगे। जो बहुत खोदेंगे, उन्हें नीलधारा मिल जाएगी। वे उस जलस्रोत तक पहुंच जाएंगे।
मीरा की धारा बाढ़ की तरह है; बाहर प्रकट होती है। जो नहीं खोजते, कभी-कभी उन पर भी छींटें पड़ जाएंगे। कभी आकस्मिक छींटें पड़ जाएंगे; पास से गुजर जाओगे तो पड़ जाएंगे। दोनों ढंगों की अपनी खूबियां हैं, अपनी कमियां हैं।
जो बुद्ध की तरह भीतर ही डूबा रहेगा उसमें एक सातत्य होगा--अविच्छिन्न, अखंड। जो मीरा की तरह नाचेगा, गुनगुनाएगा, प्रकट करेगा, उसमें सातत्य नहीं होगा; उसमें विच्छिन्नता होगी।
तो जब मीरा नाचती तुम्हें दिखाई पड़ेगी तो एक तरह की मालूम होगी और जब नाचती नहीं दिखाई पड़ेगी तो दूसरी तरह की मालूम होगी। नाचते समय आविष्ट होगी--जिसको सूफी कहते है भाव; अहवाल; हाल। उस वक्त आविष्ट होगी। उस वक्त तुम देखोगे उसकी आंखों में शराब है। लेकिन यह ऐसी शराब हर वक्त नहीं दिखाई पड़ेगी। बुद्ध की आंखों में खोजोगे तो ही दिखाई पड़ेगी। मीरा में नहीं भी खोजोगे तो भी जब वह नाचती है, दिखाई पड़ जाएगी। बुद्ध में खोजोगे तो दिखाई पड़ेगी। लेकिन एक दफा दिखाई पड़ गई तो सतत दिखाई पड़ेगी। वह तारा डूबता नहीं। और परमात्मा इन दोनों ढंगों से प्रकट होता है।
तो मैंने जो वक्तव्य दिया उसमें कहीं कोई विरोध नहीं है। मंसूर आविष्ट होता था जैसे मीरा आविष्ट होती है। चैतन्य भी ऐसे ही आविष्ट होते थे। रामकृष्ण भी ऐसे ही आविष्ट होते थे। एक आवेश की दशा है, जहां वे अपना सब होश खो देते हैं; जहां मगन हो जाते हैं। उस क्षण जो उन्हें खोजने नहीं निकला है वह भी अवाक हो जाएगा; आश्चर्य-विमुग्ध हो जाएगा। चाहे भरोसा न भी ला पाए, लेकिन क्षण भर को उसके भीतर भी जिज्ञासा का जन्म होगा।
बुद्ध हैं, महावीर हैं, लाओत्सु हैं--वहां सन्नाटा है। वहां कोई उत्तेजना नहीं है। वहां तूफान नहीं है। उनके सागर में लहर भी नहीं उठती। जो खोजने आएगा, उसी को नाद सुनाई पड़ेगा। जो कान लगा कर सुनेगा, उसी को सुनाई पड़ेगा। नहीं तो तुम बुद्ध के पास से गुजर जाओगे, तुम्हें पता भी न चलेगा। मीरा के पास से बिना पता चले न गुजर सकोगे। मानो न मानो, लेकिन मीरा के पास क्षण भर तो रुक ही जाओगे। जो बहिर्दृष्टि हैं, वे भी रुक जाएंगे। बुद्ध के पास तो जो अंतर्दृष्टि हैं, वे ही रुकेंगे।
तो मंसूर आविष्ट होता है जैसे मीरा। बुद्ध अनाविष्ट रहते हैं। इसमें विरोध जरा भी नहीं है। जैसे परमात्मा हर चीज के लिए दो पहलू चुनता है--बाहर की तरफ, भीतर की तरफ; बहिर्मुखी और अंतर्मुखी। ऐसे ही समाधि भी दो ढंग की होती है--अभिव्यक्ति। समाधि के भीतर का स्वाद तो एक ही है। वह मीरा का हो कि महावीर का, कुछ फर्क नहीं पड़ता है। एक दफा जो आ गई समाधि तो आ गई, फिर जाती नहीं--प्रकट हो, न प्रकट हो।

दूसरा प्रश्न: भक्ति के मार्ग में साधु-संगति का इतना मूल्य क्यों है?

बिना साधु-संगति के लोकलाज कहां खोओगे? बिना साधु-संगति के तुम्हारी जड़ परंपराएं, लकीरें, लीकें कैसे मिटेंगी? बिना साधु-संगति के कैसे तुम कह सकोगे: छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।
छोड़ दी कुल की मर्यादा--कहती है मीरा--अब कोई मेरा क्या करेगा?
साधु-संगति में ही तुम्हें यह भरोसा मिलेगा कि यहां जगत में न कुछ कोई छीन सकता है, न कोई कुछ दे सकता है। न यहां नाम का कोई मूल्य है, न बदनामी में कुछ हर्जा है। यहां तो सब पानी पर खींची गई लकीरें हैं--नाम हो कि बदनामी हो। और धीरे-धीरे तुम्हें पता चलेगा की साधु-संगति में बदनाम हो जाना बेहतर, असाधुओं की संगति में नाम हो जाने से।
इधर मेरे सामने "दुलारी' बैठी है। पीछे उसने एक प्रश्न लिख कर भेजा था, और नीचे नोट लिख दिया था कि कृपा कर मेरा नाम प्रश्न में न लें। डरती होगी बेचारी। घर के लोगों से घबड़ाती होगी, मैं नाम ले दूं जो घर के लोगों को पता चलेगा कि दुलारी वहां थी। शायद चोरी-चोरी आ जाती होगी। तो स्वाभाविक है: जिस समाज में तुम रहते हो, जिस परिवार में रहते हो, जिन लोगों के बीच रहते हो, उनसे हजार तरह के समझौते करने होते हैं। इन समझौतों से तुम्हें कौन ऊपर ले जाएगा? इनसे तुम्हें कौन मुक्त करेगा? साधु-संगति के बिना कोई उपाय नहीं है।
साधु-संगति का अर्थ क्या है?--जो पहले से बिगड़े हुए हैं, उनके साथ उठना-बैठना। जो बिगड़ ही गए हैं, उनसे दोस्ती न करोगे तो बिगड़ोगे कैसे? वहीं बैठ-बैठ कर मीरा कहती है: संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई। उन्होंने तो गंवा ही दिया था खुद, उन्हीं के पास बैठ-बैठ कर यह बीमारी मीरा को भी लग गई।
एक संत तुम्हारी तरफ आंख उठा कर देख ले, काफी है--बजाय इसके कि सारा जगत तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाए। सारा जगत एक तरफ और संत की प्रेम-वर्षा की एक बूंद एक तरफ। तो भी बूंद वजनी है और पलड़ा तराजू का वहीं झुकेगा।
इसलिए लोग घबड़ाते हैं संतों के पास जाने में। और अगर प्रियजन, मित्र, पत्नी, पति, बेटे जाने लगें, तो भय पैदा होता है। क्योंकि एक बात उनका अनजाने में भी जाहिर है कि अगर संतों का प्रभाव पड़ा तो हमारा प्रभाव गया। पति क्यों भयभीत हो जाता है? पत्नी क्यों भयभीत हो जाती है?
यहां मेरे पास लोग आते हैं। तो अक्सर नियम से यह बात होती है। पति आ जाता है तो पत्नी बाधा डालती है; पत्नी आ जाती है तो पति बाधा डालता है। यह मामला क्या है? इतनी क्या बाधा? मगर भय स्वाभाविक है। भय यही है कि अगर पत्नी यहां ज्यादा दिन आई-गई, तो पति गौण हो जाएगा; उसके अहंकार को खतरा है। कोई बात उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी। कोई बात इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है कि किसी दिन अगर पति को भी छोड़ना पड़े तो पति को छोड़ा जा सकता है। यह बड़ा खतरा है। पति आता है तो पत्नी डरने लगती है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण पति के जीवन में कोई प्रविष्ट हुआ जा रहा है। और कल अगर जरूरत पड़ी तो पत्नी निर्णायक नहीं रह जाएगी। और हम चाहते हैं कि हमारा निर्णय दूसरे पर रहे; दूसरे पर हमारी मालकियत रहे; दूसरे पर हमारा कब्जा रहे।
तुम पूछते हो: "साधु-संगति का इतना मूल्य क्या?'
नहीं तो यह बीमारी कहां लगेगी?
संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई।
भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।
मीरा कहती है: देखती हूं जगत को तो रोना आता है। ये खुद तो भटके हैं लोग, दूसरों को भटका रहे हैं। ये खुद भी पाने से रुके हैं, दूसरों को भी रोक रहे हैं। ये अपने हाथ-पैर में जंजीरें डाले हैं। यद्यपि उसे आभूषण कहें, या जो भी नाम देना हो, प्यारे नाम दें--शृंगार कहें। इतना ही नहीं, ये दूसरों के पैरों की जंजीरें भी मजबूत कर रहे हैं। और कोई अगर झटके देना चाहता है, जंजीर तोड़ना चाहता है तो ये सब क्रुद्ध हो उठते हैं; ये सब तरफ से घेरा बांध देते हैं। ये हजार तरह के उपाय करते हैं कि तुम इनके घेरे के बाहर न निकल जाओ।
साधु के पास बैठने का अर्थ यह है कि वह खबर लाएगा तुम्हारे पिंजरों में--खुले आकाश की। साधु के पास बैठने का अर्थ यही है कि वह खबर लाएगा कि जंजीरों से मुक्त होने का उपाय है। मुझे देखो, वह कहेगा। जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं। और जंजीरें तोड़ते ही सारा आकाश हमारा है। इससे कम पर राजी भी मत होना।
साधु का अर्थ है कि तुम्हारे भीतर परमात्मा को पाने की प्यास को प्रज्वलित करेगा। तुम जो अपने पिंजरे में बंद होकर बैठ गए हो--माना कि तुम्हारा पिंजरा सोने का होगा, और आकाश तो सोने का नहीं है, यह भी सच है--मगर क्या सोने का पिंजरा इस खाली आकाश से बड़ा हो सकता है? या मूल्यवान हो सकता है? पिंजरा आखिर पिंजरा है--सोने का हो कि लोहे का। पिंजरे में तुम मालिक नहीं हो; तुम्हारी आत्मा गुलाम है। वह कारागृह है। यद्यपि सुविधा है पिंजरे में। रोटी समय पर मिल जाती है, सब तरह की सुरक्षा है। लेकिन सुरक्षा का क्या स्वतंत्रता के मुकाबले कोई मूल्य है? खतरा है उड़ते हुए पक्षी को आकाश में। पिंजरे में बंद पक्षी को इतना खतरा नहीं है; न दुश्मन हमला कर सकते हैं; न कोई बंदूक उठा कर गोली मार दे सकता है; न कल की चिंता है कि रोटी कौन देगा! सब समय पर मिलेगा। लेकिन एक कीमत चुकानी पड़ी--आत्मा चुकानी पड़ी है; आत्मा दे देनी पड़ी है। अब तो मालिक जो कहता है वही दोहराना पड़ेगा; जैसा जिलाता है वैसा जीना पड़ेगा। आत्मा तो बिक गई है, और सब मिल गया।
आकाश में उड़ते पक्षी के पास आत्मा है--और कुछ भी नहीं। मगर आत्मा सब कुछ है। साधु के पास बैठ-बैठ कर तुम्हें आकाश की याद आनी शुरू होगी। तुम पिंजरों में बहुत दिन रह लिए हो। तुम्हें याद ही बिसर गई है। तुम्हें खयाल भी नहीं रही कि आकाश है। आकाश की तो छोड़ो तुम्हें यह भी याद नहीं रही कि तुम्हारे पास पंख है और तुम उड़ सकते हो। जब बहुत दिनों तक न उड़ो तो पंखों की याद भी भूल जाती है। उड़ो तो ही पंखों की याद भी होती है। उड़ो तो ही पता चलता है कि पंख हैं। जो कभी चला नहीं वर्षों तक, उसे अगर पैरों की याद भूल जाए तो कुछ आश्चर्य तो नहीं।
कहते हैं, अगर कोई आदमी तीन साल तक अंधेरे में रह जाए तो उसकी आंखें रोशनी खो देती हैं। तीन साल तक देखे ही नहीं तो देखने की क्षमता खो जाती है। कहते है, कोई तीन साल तक चुप रह जाए तो फिर बोलते नहीं बनता; जबान लड़खड़ाने लगती है।
तो यह तो तीन साल की बात है, तुम जन्मों-जन्मों से नहीं उड़े हो; तुम सदियों से नहीं उड़े हो; तुम्हारी पहचान ही भूल गई है कि तुम्हारे पास पंख भी हैं। तुम्हें पंखों की याद भी नहीं है।
साधुओं के पास तुम्हें पंखों की फड़फड़ाहट सुनाई पड़ेगी। साधु को तुम उड़ते देखोगे आकाश में। उसका आनंद देखोगे। उसका रस पीयोगे। उसकी गरिमा से आह्लादित होओगे। उसका ज्वर, वह जो परमात्मा की गरमी से गरमा गया है, तुम्हें भी छुएगा। तुम थोड़े पिघलोगे। तब तुम्हारा बर्फ जैसा जम गया हृदय पिघलना शुरू होगा। और कहां करोगे यह? और कैसे करोगे यह? और कोई उपाय भी तो नहीं है।
कारागृह में आना चाहिए कोई--जो कारागृह के बाहर हो। वही खबर लाएगा बाहर की। जंजीरों से बंधे आदमी को कोई मिलना चाहिए जो जंजीरों में न हो। तो ही उसे समझ आएगी कि जंजीरों के बिना भी हो सकता है। और पक्षी को दिखाई पड़ना चाहिए कि उसी जैसा कोई पक्षी, ठीक उसी जैसा कोई पक्षी, पंख फैलाए आकाश में उड़ रहा है। तुम्हें याद भी न रहेगी और अचानक तुम अपने पंख फड़फड़ाने लगोगे। सदियों से बंद पड़े पंख फिर सजीव हो उठ सकते हैं।
इसलिए कहती है मीरा: भगत देख राजी हुई...जहां कोई परमात्मा का प्यारा मिला, वहां राजी हो गई; वहां अहोभाव से भर गई।...जगत देख रोई। यह जगत बड़ा दुखभरा है। और आश्चर्य यह है कि यहां सभी क्षमता लेकर पैदा होते हैं--परम आनंद की, सच्चिदानंद की। भक्त करते क्या हैं? साधु करते क्या हैं? यह मीरा क्यों भगत देख राजी हुई? वहां होता क्या है? वहां एक कीमिया चलती है। जैसे पारस को छूने से लोहा सोना हो जाता है, ऐसे साधु को छूने से तुम भी साधु होने लगते हो। वहां एक रूपांतरण हो रहा है।
जिससे हिल जाएं अर्श के पाये
अपने उस दर्द-ओ-गम की बात करो।
वहां परमात्मा के विरह की पीड़ा की चर्चा होती है।
जिससे हिल जाएं अर्श के पाये
--आकाश के भी अगर कहीं कोई पाये हों तो हिल जाएं, ऐसी विरह की पीड़ा की बात होती है।
अपने उस दर्द-ओ-गम की बात करो
जो रुला दे तमाम आलम को
बस उसी चश्म-नम की बात करो।
और वहां परमात्मा की प्यारी-प्यारी आंखों की बात होती है।
देखा नहीं कल मीरा ने कहा:
मोरे नैनन बसो नंदलाल।
मोहनी मूरत सांवली सूरत, नैनां बने बिसाल।
--ये तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखें, यह तुम्हारा प्यारा चेहरा, यह तुम्हारा सांवला रंग--मेरी आंखों में बस जाओ! मुझे घेर लो, मुझे मुझसे बचा लो! मेरा मुझमें कुछ न बचे। तुम्हीं बस जाओ।
जो रुला दे तमाम आलम को
बस उसी चश्मे-नम की बात करो।
क्या हकीकत गमे जहां की है
मेरे साकी के दम की बात करो।
और वहां तुम सुनोगे कि जगत माना कि बहुत बड़ा है, मगर क्या? कुछ भी नहीं। परमात्मा के समक्ष कुछ भी नहीं। और माना कि जंजीरें बहुत बड़ी हैं, लेकिन जो उस प्यारे को पुकारेगा उसके एक नाम की चोट मजबूत से मजबूत जंजीरों को गिरा देती है। उसका सहारा मिल जाए, फिर बड़े-बड़े पहाड़ भी आदमी लांघ जाता है। सुनते हैं न कि लंगड़े भी लांघ जाते हैं; अंधे भी देखने लगते हैं; बहरे भी सुनने लगते हैं!
क्या हकीकत गमे जहां की है
इस दुनिया के दुखों में रखा क्या है?
मेरे साकी के दम की बात करो
है रहीमो करीम अपना खुदा
हमसे लुत्फ-ओ-करम की बात करो।
साधु-संगत में होता क्या है?
वहां प्रभु की अनुकंपा की बात होती है। वहां तुम्हारे दुख, तुम्हारे अंधेरे, तुम्हारे अज्ञान की बात होती है। वहां तुम्हारे आंसू जगाए जाते हैं, सो गए आंसू, खो गए आंसू--पुनः पुकारे जाते हैं। और साथ ही परमात्मा की अनुकंपा की बात होती है। क्योंकि अगर परमात्मा की अनुकंपा की बात न हो, तो तुम वैसे ही दुखी हो, और दुखी हो जाओगे; वैसे ही गिरे पड़े हो गर्त में, और भी साहस खो दो, आत्मविश्वास खो दो। वहां तुम्हें खबर मिलती है कि तुम्हारा पाप कितना ही बड़ा हो, मगर उसकी करुणा उससे बड़ी है। तुम घबड़ाओ मत। तुम कितने ही भटके हो, उसका हाथ बहुत लंबा है। तुम कितने ही दूर निकल गए हो, उसका हाथ तुम तक पहुंच सकता है। पुकारो भर! तुम इतने दूर नहीं जा सकते कि वह तुम्हें उठा न ले। इसलिए तो भक्तों ने कहा: भगवान के हजार हाथ हैं। एक हाथ से बचोगे, दूसरे से बचोगे, हजार से तो न बच सकोगे। वह सब तरफ से उठा लेगा, सब दिशाओं से उठा लेगा। लेकिन तब तक न उठाएगा, जब तक तुम पुकारो न।
तो साधु-संगत में जीवन का दुख दिखाई पड़ता है। दुख ही दुख है यहां। यहां सुख कब किसने जाना! तुमने कभी सुखी आदमी देखा यहां? और कभी तुम्हें यहां सुखी आदमी मिल जाए तो तुम तत्क्षण पाओगे: वह यहां का नहीं है। वह वहां का है। वह यहां परदेस में है; यहां अजनबियों के बीच है।
है रहीमो करीम अपना खुदा
हम से लुत्फ-ओ-करम की बात करो।
तो वहां पाप की बात होती है; परमात्मा की करुणा की बात होती है। वहां हमारे दुख, पीड़ा की बात होती है। वहां उसके अमृत, उसके अमृत की वर्षा की बात होती है।
हिज्र भी है वसाल का पैगाम
ऐने राहत सितम की बात करो।
वहां विरह की बात होती है। और विरह के साथ ही साथ यह भी बात होती है कि विरह उससे मिलन की ही सूचना है; उसके मिलन की तैयारी है। विरह उससे मिलने की तैयारी है। हमने उसे खोया है--पाने को। हमने उसे खोया है--और-और पाने को। यह विरह भी उसके मिलन को प्रीतिकर बनाने वाला है।
हिज्र भी है वसाल का पैगाम
इसमें संदेश छिपा है मिलन का।
जो कदम हैं बजाते खुद मंजिल
इश्क के उस कदम की बात करो।

जो कदम हैं बजाते खुद मंजिल
जो कदम अपने आप में अपनी मंजिल लिए हुए है, उस प्रेम के कदम की बात वहां होती है।
साध-संगत यानी प्रेम की चर्चा। तुम्हारे जीवन में प्रेम चाहिए; प्रेम का प्रकाश चाहिए। और यह तभी संभव है जब तुम किसी जले हुए दीये के पास बैठो। तुम्हारा दीया बुझा है, कैसे जलाओगे? जले हुए दीये के पास बैठो। सरको पास। भगत देख राजी हुई! सरको पास। जहां कोई साधु मिल जाए, करीब आओ। दूरी न रखो। दूरी गंवाओ। दूरी खोओ। दूरी बचाई तो हीरा पास था और गंवा बैठोगे। करीब आओ। क्योंकि एक क्षण ऐसा आता है करीब होने का, सामीप्य का, निकट होने का--जब जले हुए दीये से लपट बुझे हुए दीये पर छलांग लगाती है। एक खास दूरी पर यह घटना घटती है। तुम एक फीट की दूरी पर रख दो दीयों को, तो नहीं घटती। करीब लाते जाओ, करीब लाते जाओ। एक क्षण ऐसा आता है, अब भी दूरी है; लेकिन अब इतनी दूरी नहीं है कि लपट छलांग न ले सके। लपट छलांग ले लेती है। जहां एक दीया जलता था वहां दो दीये जल जाते हैं। यही शिष्यत्व है। यही साध-संगत है।
साधु-संगति के बिना रोशनी नहीं होगी। रोशनी के बिना रोशनी नहीं होगी।
नमूदे जिंदगी का राज क्या है
मैं खुद क्या हूं, मेरी आवाज क्या है
फसूने नगमा क्या है, साज क्या है
जनूने इश्क क्या है, नाज क्या है?
कहां समझोगे, कैसे समझोगे? नमूदे जिंदगी का राज क्या है?--इस जिंदगी का रहस्य क्या है? किसी रहस्य भरे व्यक्ति के पास जाओ। वहीं यह चमत्कार घट सकता है। गुलाब के फूल को पहचानना हो तो गुलाब के फूल के पास जाओ। चांदत्तारों से पहचान करनी हो तो चांदत्तारों पर आंखें टिकाओ। और परमात्मा को खोजना हो तो जहां परमात्मा की थोड़ी सी झलक मिलती है, वहां उठो-बैठो।
और खोने को क्या है? लोकलाज। और कुछ खास है नहीं। लोग इतना ही कहेंगे कि पागल है। तो लोगों को कहने का मूल्य भी क्या है? ये वे ही लोग हैं जो मीरा को भी पागल कहते थे। ये वे ही लोग हैं जो जीसस को भी पागल कहते थे। ये वे ही लोग हैं जो सदा से यही कहते रहे हैं। इनका धंधा यही है। इन्हें खुद पाना नहीं है; इन्हें किसी दूसरे को भी पाने नहीं देना है। ये दूसरे को क्यों नहीं पाने देना चाहते? क्योंकि ये खुद तो पा नहीं रहे हैं; दूसरा पा ले इनसे पहले, यह अड़चन मालूम होती है। और तुम ऐसा मत समझना कि तुम साध-संगत में न बैठो तो ये तुम्हें बहुत होशियार समझते हैं। तो भी कुछ होशियार तो समझते नहीं। इस दुनिया में हर आदमी अपने को होशियार समझता है, बाकी किसी को तो होशियार समझता ही नहीं। तुम कुछ भी करो, इससे भेद नहीं पड़ता--लोग तुम्हें होशियार मान नहीं सकते; क्योंकि तुम्हें होशियार मानने में फिर उनका क्या होगा?
मैंने सुना है, एक आदमी एक पूर्णिमा की रात में अपनी पत्नी को साथ लेकर चांद के नीचे यात्रा को निकला। अपना सांड भी उसने साथ ले लिया। पत्नी को बिठा लिया स्वभावतः सांड के ऊपर, खुद पैदल चला। कुछ लोग रास्ते में मिले, उन्होंने कहा: यह देखो औरत, यह बदचलन मालूम होती है! पति पैदल चल रहा है, खुद सांड पर बैठी है! शरम नहीं आती!
तो पत्नी ने कहा कि यह तो बात ठीक नहीं, मुझे नीचे उतार दो; तुम बैठ जाओ। तो पत्नी नीचे चलने लगी, बेचारा आदमी बैठ गया। थोड़ी देर बाद दूसरे लोग मिले, उन्होंने कहा: यह देखो, इन महाशय को देखते हो! हजरत को तो देखो! बेचारी औरत तो पैदल चल रही है, खुद मुस्तंडे की तरह है, सांड पर बैठे हुए हैं! शरम नहीं आती!
तो उस आदमी ने कहा कि यह तो बड़ा खतरनाक मामला है। तो वे दोनों बैठ गए। अब और क्या करें! दोनों बैठ गए, थोड़ी देर बाद फिर कुछ लोग मिले, उन्होंने कहा: यह देखो, अरे मार डालोगे सांड को! कुछ तो दया करो! दो-दो चढ़ कर बैठे हो, एक सांड पर! कुछ दया-भाव रखो! पशु भी आखिर प्राणी है।
उन्होंने सोचा: अब क्या करें? तो दोनों उतर कर चलने लगे। फिर कुछ लोग मिल गए। उन्होंने कहा: ये बुद्धू देखो! सांड साथ में है और पैदल चल रहे हैं! अकल नाममात्र को नहीं है।
उन्होंने कहा: अब क्या करना है? उन्होंने भी जिद्द कर रखी थी, जैसे तुमने जिद्द कर रखी है, कि लोगों को राजी ही करके रहेंगे। मगर लोग किसी से कभी राजी हुए? तुम कुछ भी करो, गलत। उन्होंने एक बांस उठाया और किसी तरह बांधा सांड को, कंधे पर लटकाया। अब क्या करें? सब कर चुके, अब एक ही उपाय बचा कि अब सांड को लेकर चलें, क्योंकि यह बेचारा सांड! अब आखिरी एक ही विकल्प बचा। लोगों ने देखा। उन्होंने कहा: ये मूढ़ देखो! इनसे बड़े मूढ़ कहीं देखे कि खुद तो सांड पर नहीं बैठे हैं, सांड को लेकर चल रहे हैं।
तुम कुछ भी करो, तुम पाओगे तुम्हारी निंदा की गई। और जब कुछ भी करने से निंदा होती हो तो, कुछ ऐसा करो जिससे कुछ मिलता हो, निंदा तो होनी ही है। परमात्मा को खोजने की दिशा में कदम उठाओ।
नमूदे जिंदगी का राज क्या है
मैं खुद क्या हूं, मेरी आवाज क्या है?
न तुम्हें पता है, न औरों को पता है। मगर वे और तुम्हें भी पता न होने देंगे।
फसूने नगमा क्या है, साज क्या है
जनूने इश्क क्या है, नाज क्या है?
यह प्रेम का पागलपन क्या है? यह प्रेम की मस्ती क्या है? यह तुम कहां सीखोगे? किसी मस्त के पास बैठो। किसी पियक्कड़ के पास बैठो।
ये रंगो बू ये रैनाई ये जल्वे
ये दिलकश सूरतो अंदाज क्या है?
यह जो चारों तरफ सौंदर्य की अनंत वर्षा हो रही है, यह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। किन्हीं ऐसी आंखों के पास बैठो जिन्हें यह दिखाई पड़ती है। किन्हीं आंखों का सहारा लो।
इसलिए तुमसे बार-बार कहता हूं: कभी-कभी मेरी आंखों से देखो। कभी-कभी मेरे कानों से सुनो। मेरे कानों से सुनोगे तो तुम्हें पता चल जाएगा:
मैं खुद क्या हूं, मेरी आवाज क्या है
नमूदे जिंदगी का राज क्या है
फसूने नगमा क्या है, साज क्या है
जनूने इश्क क्या है, नाज क्या है
ये रंगो बू ये रैनाई ये जल्वे
ये दिलकश सूरतो अंदाज क्या है
कहां तक हुस्न की फैली है वुसअत
न जाने इश्क की परवाज क्या है?
कहां तक प्रेम का आकाश फैला है! कितना विस्तीर्ण है प्रेम का आकाश! तुम तो अपने घर के आंगन से ही न निकले। तुमने तो आंख ही न उठाई। तुम तो चांदत्तारों को देखते ही नहीं। वह जो दूर-दूर तक फैला हुआ आकाश है, वह तुम्हें समझ नहीं आता। बाहर का आकाश समझ नहीं आता; भीतर का आकाश तो क्या समझ आएगा!
कहां तक हुस्न की फैली है वुसअत
कहां तक सौंदर्य है, कहां तक प्रेम है! कहां तक इसका विस्तार है।
न जाने इश्क की परवाज क्या है?
और कितने दूर तक उड़ सकता है, इसका भी तुम्हें कुछ पता नहीं। तुम तो पंख ही नहीं फड़फड़ाते। तो जो उड़ना जानता हो उसके पास जाओ। तैरना सीखना हो तो तैरने वाले के पास जाओ। पीना सीखना हो तो पियक्कड़ के पास जाओ।
जो आंखों में फिरे हर वक्त सूरत
जो गूंजे कान में आवाज क्या है
कहूं क्या दीदाओ दिल दोनों हैरां
ये ऐजाजे हजूमे नाज क्या है?
सीखोगे कहां?
इसलिए भक्ति के मार्ग में साधु-संगति का चरम मूल्य है। उससे ज्यादा मूल्यवान और कुछ भी नहीं। शास्त्र का वहां मूल्य नहीं है--संगति का मूल्य है। शब्द का वहां मूल्य नहीं है--संगीत का मूल्य है। तर्क का वहां मूल्य नहीं है--श्रद्धा का मूल्य है। क्योंकि तर्क से तो दूरी बनी रहती है। बुझा दीया और जला दीया दूर बने रहते हैं--तर्क के कारण। श्रद्धा में ही समीपता आती है, क्योंकि श्रद्धा ही दुस्साहस कर सकती है करीब आने का।
कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी--आज नहीं कल। लोग नाराज भी होने ही वाले हैं, तुम संसार को राजी रख कर परमात्मा को राजी ना कर पाओगे। यह समझौता होने वाला नहीं है। इस समझौते में पड़ना भी मत। होता हो संसार नाराज तो हो जाए। भगत देख राजी हुई! तुम तो भगत को देख कर राजी होओ!
ये पाठ महंगे हैं शुरू में। क्योंकि शुरू में ऐसा लगता है कि संसार सब कुछ है।
भगत के पास है क्या? संत के पास है क्या? जो है, वह साधारण चमड़े की आंखों से दिखाई भी नहीं पड़ता। वह तो पास रहोगे, रहते-रहते-रहते उसका रस लगेगा; रसायन पकड़ेगी।
जीवंत के पास आओ, ताकि कोई किरण तुम्हें छू ले; तुम्हारे अंधेरे को डगमगा दे; तुम्हारी सदियों से जमी धूल को उखाड़ दे; तुम्हारे पथरीले हो गए, जम गए हृदय को पिघला दे!

तीसरा प्रश्न: मीरा पर प्रवचन प्रारंभ करते हुए आपने हमें प्रेम के मानसरोवर में नौका-विहार के लिए आमंत्रित किया, हम कृतज्ञ हैं। लेकिन कई मनस्विद कहते हैं कि प्रेम मूलतः जैविक है, जो कि मनुष्य में दमन के कारण मानसिक रूप ले लेता है। मनस्विद यह भी कहते हैं कि कवि, कलाकार और संत ने जैविक प्रेम को ही तूल देकर वायवीय और अलौकिक बना दिया है। भगवान, इस वक्तव्य पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें!

नस्विद जानते क्या हैं? मन को भी नहीं जानते हैं अभी, आत्मा की तो बात ही छोड़ो। मनस्विदों को मनस्विद कहना भी अभी ठीक संगत नहीं है। अभी मनस्विद तो केवल मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन कर रहे हैं; अभी मन का अध्ययन शुरू नहीं हुआ। और मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन भी अभी ठीक से शुरू नहीं हुआ। मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन करते हैं, कहीं चूहों, बिल्लियों, कबूतरों--इनका अध्ययन करके।
यह ऐसे ही है, जैसे कोई फूल का अध्ययन करना चाहे और जड़ों को काट ले और उनका विश्लेषण करे; कोई कमल का अध्ययन करना चाहे और कमल जिस कीचड़ में पैदा हुआ उस कीचड़ को भर लाए घर और उसका अध्ययन करे। यह बात सच है कि मनुष्य के जीवन में जो प्रेम का फूल खिलता है, वह कामवासना की कीचड़ में ही खिलता है, यह बात बिलकुल सच है। मगर वह कामवासना की कीचड़ ही नहीं है--कीचड़ में खिलता है। लेकिन कमल कीचड़ नहीं है।
लेकिन विज्ञान में एक बड़ी भ्रांत धारणा है कि हर चीज को उसके मूल कारण पर ले जाओ। उसे पीछे की तरफ ले जाओ। विज्ञान की यह मान्यता है: कारण समझ लिया तो कार्य समझ लिया। विज्ञान की एक अंधी मान्यता है कि कार्य जो है वह कारण से बड़ा कभी नहीं होता। यह बात झूठ है। यह बात बुनियादी रूप से गलत है।
कार्य अक्सर कारण से बड़ा होता है। कीचड़ से ही कमल आता है, यह बात सच है; फिर भी कमल कीचड़ ही नहीं है, कीचड़ से बहुत ज्यादा है। और यह भी सच है कि अगर तुम कमल को जाकर विश्लेषण करोगे विज्ञान की प्रयोगशाला में, तो उसमें से वह फिर कीचड़ खोज लेगा--किन-किन तत्वों से बना है, निकाल कर रख देगा। और तब एक आश्चर्य की बात होती है कि सौंदर्य जो तुम्हें दिखाई पड़ा था उस कमल में वह नहीं मिलेगा फिर। न सौंदर्य मिलेगा, न वह जो निर्दोष कुंआरापन था कमल का, वह जो ताजगी थी कमल की, वह जो आनंद झलक रहा था कमल में--वह भी नहीं मिलेगा। न आनंद कमल का पकड़ में आएगा, न उसकी ताजगी, न कुंआरापन पकड़ में आएगा, न उसका सौंदर्य पकड़ में आएगा। कुछ भी पकड़ में नहीं आएगा। कमल को विश्लेषण करोगे, कीचड़ हाथ लगेगी। लेकिन कमल कीचड़ है?
मनस्विद की भी वही भूल है, क्योंकि मनस्विद अभी विज्ञान के पीछे चलता है--इसी भ्रांति में की किसी तरह उसका शास्त्र भी विज्ञान हो जाए। यह उसने गलत दिशा पकड़ी है।
जीवन में जिन चीजों से मिल कर कुछ बनता है, उन्हीं पर समाप्त नहीं होता। तुम हड्डी-मांस-मज्जा से बन कर बने हो, लेकिन तुम ज्यादा हो। तुम जानते हो भलीभांति, तुम जब आंख बंद करके बैठोगे तो तुम पाओगे कि न तो तुम हड्डी हो, न मांस-मज्जा हो। तुम चैतन्य हो। यह प्रत्येक की प्रतीति है कि वह चैतन्य है। लेकिन अगर तुम्हारे शरीर को तोड़ा-फोड़ा जाए, तो चैतन्य नहीं मिलेगा। चैतन्य चूक जाता है हाथ से। वह कैसे उड़ जाता है, पता नहीं चलता। वह अदृश्य है। दृश्य का सहारा लेकर टिका है। तुम्हारे शरीर के बिना कहीं मिलेगा नहीं। तुम्हारे शरीर पर पैर जमाए खड़ा है। लेकिन एक दिन शरीर पड़ा रह जाएगा और चैतन्य जा चुका होगा। तब तुम कितना ही खोजो चैतन्य को न पाओगे। अभी जब कि चैतन्य है, अभी भी अगर डाक्टर पूरा शरीर का छेदन कर डाले, तो भी कहीं चैतन्य को नहीं पाएगा। चैतन्य पाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि चैतन्य पकड़ा नहीं जा सकता। चैतन्य अनंत है, असीम है।
ऐसा ही मामला प्रेम का और काम का है। तथाकथित मनस्विद कहते हैं कि प्रेम तो जैविक वासना है, कामवासना है। ठीक कहते हैं। एक सीमा तक सच कहते हैं। लेकिन उन्हें और पार का कुछ भी पता नहीं कि यह जो कामवासना है, यह रूपांतरित हो सकती है।
तुम ऐसा समझो कि एक वीणा रखी है, और तुमने कभी वीणा नहीं देखी और तुम वीणा बजाना भी नहीं जानते हो--और तुमसे कोई पूछे कि यह वीणा क्या है? तुम क्या करोगे? तुम तार नाप लोगे कि कितनी लंबाई के तार लगे हैं इसमें। तुम, कितनी लकड़ी इसमें लगी है, वह हिसाब लगा दोगे। इसमें कितना हाथी-दांत लगा है, वह हिसाब लगा दोगे। इसमें क्या-क्या है, कितनी चमड़ी लगी है, वह हिसाब लगा दोगे। सब हिसाब लगा कर रख दोगे। मगर क्या तुम सोचते हो: इसमें वीणा का हिसाब आ गया? इसमें असली बात तो चूक ही गई कि वीणा में एक संगीत सोया था, जो अगर कुशल कोई होता तो छेड़ देता, तो जग जाता।
जब वीणा से संगीत पैदा होता है, तब संगीत क्या है? तार है? लकड़ी है? हाथी-दांत है? जो संगीत पैदा होता है, वह क्या है? निश्चित वीणा के बीना पैदा नहीं होता, लेकिन वीणा केवल उसकी अभिव्यक्ति में साधन है; वीणा उसका स्वरूप नहीं है। वह वीणा से कुछ ज्यादा है। वह वीणा पर थोड़ी देर के लिए टिक जाता है। उतरता है किसी आकाश से--वापस आकाश को लौट जाता है। वीणा माध्यम है।
ऐसी ही मनुष्य की जैविक वासना है; वह माध्यम है। उसी में प्रेम उतरता है। जो बजाना जानता है, जिसने काम पर ठीक-ठीक बजाना सीख लिया--उसे राम मिल जाता है। काम की वीणा में ही राम के स्वर उत्पन्न होते हैं।
फिर मनस्विद अध्ययन किसका करते हैं? मनस्विद अक्सर पागलों का अध्ययन करते हैं--विकृत मनोदशाओं का। और तो कोई उनके पास जाएगा भी क्यों?
फ्रायड ने जिंदगी भर विक्षिप्त लोगों का अध्ययन किया और विक्षिप्त लोगों के आधार पर उसने नतीजे निकाले, जिन नतीजों को वह सारी मनुष्यता पर लागू करना चाहता है। यह बात बड़ी बेहूदी है। यह ऐसा ही है कि एक आदमी जमाने भर के जड़बुद्धि मूढ़ों को इकट्ठा कर ले और उनका अध्ययन करे और फिर अध्ययन का निष्कर्ष आइंस्टीन पर और बर्ट्रेंड पर भी लगाना चाहे। हम उसे मूढ़ कहेंगे। हम कहेंगे: पहले तुम मूढ़ों का अध्ययन करते हो और फिर मूढ़ों का अध्ययन करके तुम उस अध्ययन को सब पर फैलाना चाहते हो--जो कि मूढ़ नहीं हैं! यह बात अवैज्ञानिक है। यह न्यायोचित नहीं है।
फ्रायड ने अध्ययन किया विक्षिप्त लोगों का, और विक्षिप्त लोगों के अध्ययन से उसने पाया कि सारी बीमारियां कामवासना की हैं। और सच पाया। क्योंकि मनुष्य-जाति ने कामवासना को इतना दबाया है, इतना दबाया है, कि लोगों को रुग्ण कर दिया है। वीणा बजाना तो आता नहीं, तो वीणा को ले जाकर खूब गहरे में दबा दिया है, क्योंकि वह घर में रखी रहे तो भी झंझट है। कभी बच्चे छेड़ देते हैं; कभी गिर जाती है तो आवाज होती है; कभी बीच रात में चूहे दौड़ जाते हैं और आवाज कर देते हैं। तो नींद टूट जाती है। इस वीणा को घर में रखने से फायदा क्या है? इसे दबा दो। इससे उपद्रव ही होता है।
अगर संगीत जगाना न आए तो वीणा से उपद्रव ही होता है। तो तुमने वीणा को दबा दिया है। जिससे महासंगीत पैदा होता, उसे तुम दबा कर बैठ गए हो। और उस दबाने के कारण हजार रोग पैदा होते हैं। क्योंकि जीवन में कुछ भी दबाया जाएगा तो रोग पैदा होगा।
जीवन में विकास होना चाहिए--दमन नहीं। और जीवन सतत विकासमान है--ऊपर और ऊपर। अगर तुम रुके तो तुम रुग्ण हो जाओगे। जैसे ही कोई धारा रुकती है, सड़ना शुरू हो जाती है। धारा बहती रहे तो स्वच्छ रहती है।
तो तुम्हारे तथाकथित धार्मिक लोगों ने भी इसमें हाथ बंटाया है--जिन्होंने दमन सिखाया है।
कामवासना के दमन का परिणाम है कि मनुष्य-जाति पागल होती है। फिर पागलों का अध्ययन करते हैं मनोवैज्ञानिक और वे उस अध्ययन को लागू करते हैं सभी के ऊपर। किसी मनोवैज्ञानिक ने मीरा का अध्ययन किया नहीं, बुद्ध का अध्ययन किया नहीं। और यही असली सबूत हैं मनुष्य के। बुद्ध का अध्ययन हो, मीरा का अध्ययन हो, मंसूर का अध्ययन हो, इनके अध्ययन से जो निष्पत्तियां मिलेंगी, वे हमें खबर देंगी कि मनुष्य क्या हो सकता है; मनुष्य की संभावना का द्वार खोलेंगी।
इसलिए मनस्विदों से सावधान रहना। धार्मिकों से सावधान रहना क्योंकि वे दमन सिखाते हैं। मनस्विदों से सावधान रहना, क्योंकि वे पागलों के द्वारा ली गई निष्पत्तियों को सबके ऊपर आरोपित करते हैं।
दोनों ही गलत हैं। दमन की कोई जरूरत नहीं है। जीवन सहज और सरल हो, मुक्त, निर्बाध! मगर उतना ही काफी नहीं। उतने से तुम स्वस्थ हो जाओगे, रुग्ण नहीं होओगे। मगर स्वास्थ्य काफी नहीं है। अपने आप में स्वास्थ्य का क्या मूल्य है? स्वास्थ्य का इतना ही मूल्य हो सकता है कि वह साधन बन जाए परमात्मा तक पहुंचने का। निर्बंध, अबाध जीवन की धारा हो तो स्वस्थ होगी। स्वस्थ धारा हो तो फिर सागर की तरफ ले चलो। फिर बहो सागर की तरफ। जिस दिन तुम जानोगे प्रेम को, उस दिन पाओगे कि मनोवैज्ञानिक गलत कहते हैं। जिन्होंने प्रेम का थोड़ा सा भी अनुभव किया है, वे जानते हैं कि मनोवैज्ञानिक गलत हैं।
लेकिन अड़चनें कुछ हैं। अड़चनें यह हैं कि प्रेम का अनुभव हो तो तुम्हें होता है। इस अनुभव को दुनिया के सामने रखा नहीं जा सकता। और इस अनुभव को दुनिया के सामने रखो तो दुनिया कुछ का कुछ समझेगी। क्योंकि दुनिया वही समझ सकती है जो समझ सकती है--जहां तक दुनिया की समझ है।
तुमने कभी कोशिश की? एक छोटे बच्चे को, चार साल के बच्चे को, तुम अगर काम-शास्त्र समझाना चाहो वात्स्यायन का, तो नहीं समझा पाओगे, लाख सिर पटको। कैसे समझाओगे? और बिलकुल मत समझाओ। वात्स्यायन के काम-सूत्र का पता ही न चलने दो इसको, लेकिन जब यह जवान हो जाएगा और इसकी काम-ऊर्जा पकेगी तो तुम्हारे बिना समझाए भी समझ लेगा।
पशु-पक्षियों को कौन समझाता है? वात्स्यायन की किताब पढ़ते नहीं, खजुराहो के मंदिर जाते नहीं। कौन समझाता है इनको? जब ऊर्जा पकती है तो समझ आती है।
ऐसे ही एक दिन जब प्रेम पकता है तो समझ आती है। मनस्विद ऐसे हैं जैसे चार साल का बच्चा; उसको हम कामवासना नहीं समझा सकते। ऐसे ही मनस्विद हैं; उसे हम प्रेम का रहस्य नहीं समझा सकते, क्योंकि उसने प्रेम के रहस्य को पकने ही नहीं दिया। पकना तो दूर है, वह तो एक जिद्द मान कर बैठा है कि ऐसी कोई चीज होती ही नहीं। जब होती ही नहीं तो खोज बंद हो गई। फिर इसके बड़े अजीब-अजीब परिणाम होते हैं।

एक मित्र ने प्रश्न पूछा है:

एक महिला ने मीरा पर महानिबंध लिखा है। उसने उसमें कहा है कि मीरा एक साधारण औरत थी और उसका गोपाल पांच हजार साल पहले हुआ कृष्ण नहीं था। लेकिन जो साधु उसके घर आया था, वह उसी साधु के प्रेम में पड़ गई थी। और उस समय वह पांच साल की नहीं थी, बल्कि युवती थी।
आपके बारे में भी समाज में एक बड़ा हिस्सा मानता है कि आप धर्म की आड़ में निर्बंध कामाचार को प्रोत्साहन दे रहे हैं।
क्या प्रत्येक ज्ञानी का मार्ग इसी प्रकार के क्लिष्ट धुएं से आच्छादित रहता है?

ब जिस महिला ने मीरा पर यह खोज की होगी, यह खोज उसी महिला के संबंध में है, मीरा के संबंध में जरा भी नहीं है। और मुझे उस बेचारी पर दया आती है। नाम तो उन्होंने लिखा नहीं, जिसने यह महानिबंध लिखा है। उस पर मुझे दया आती है। लगता है, उसे साधु नहीं मिला। खुद साधु मिल जाता तो महानिबंध लिखने में समय खराब करती?...तो मीरा पर महानिबंध लिखने की जरूरत क्या है।
अब यह बड़े मजे की बात है। एक तो मीरा गलत; उसकी जिंदगी खराब गई इसके हिसाब से। और यह अपनी जिंदगी खराब कर रही है उस पर महानिबंध लिख कर! महानिबंध लिखने में वक्त लगता है--तीन-चार साल, पांच साल। ये पांच साल किसलिए खराब करते हो?
मगर यह जो महिला लिखी होगी किताब, ये उन्हीं तथाकथित मनस्विदों के आधार पर कही गई बातें हैं।
अब पहली तो बात यह है कि मीरा को समझने के लिए मीरा जैसी भाव-दशा चाहिए। मीरा को समझने के लिए किसी युनिवर्सिटी की डिग्री की कोई जरूरत नहीं है। मीरा के पास कोई डिग्री नहीं थी। मीरा को समझने के लिए मीरा का भाव चाहिए। बजाय इन देवी को कि ये महानिबंध लिखें, थोड़ा भक्ति-भाव सीखें, साधु-संगत करें; किसी साधु के प्रेम में पड़ें; थोड़ा बिगड़ें, कुछ रस लगे, कुछ धुन पकड़े और किसी दिन अपने को पाएं नाचते मीरा जैसा--तो कुछ समझ में आएगी बात; तो रास्ता खुलेगा। नहीं तो ये निष्कर्ष स्वाभाविक हैं।
यह बिलकुल स्वाभाविक है कि पांच हजार साल पहले कृष्ण हुए--अब पांच हजार साल पहले हुए कृष्ण को कैसे तो प्रेम करोगे? क्योंकि हमारा प्रेम तो बड़ा भौतिक अर्थ का होता है; शारीरिक होता है। हमारी धारणा उतनी है कि बस शरीर से होता है। शरीर से जो प्रेम है, वह कैसे मान सकता है कि पांच हजार साल के फासले पर प्रेम हो सकता है!
अब यह बड़ी मुश्किल है। यह ऐसा ही है जैसे अंधे आदमी को समझाओ की रोशनी होती है--ऐसे ही उसको समझाना, जिसको केवल शारीरिक प्रेम का ही पता है। उसको समझाना मुश्किल है कि प्रेम अनंतकाल की दूरी पर भी हो सकता है। प्रेम के लिए कोई बाधा न समय की है और न काल की है। प्रेम के लिए अगर कोई बाधा है तो सिर्फ अहंकार की है; और कोई बाधा नहीं है। सिवाय अहंकार के और कोई चीज प्रेम में बाधा बनती ही नहीं। अगर यह अकड़ है कि मैं हूं कुछ, तो भर प्रेम नहीं होता। फिर चाहे तुम्हारा प्रेमी तुम्हारे पास ही क्यों न बैठा हो; गलबांही डाले क्यों न बैठा हो। अगर अहंकार है तो प्रेम नहीं होता। पास बैठे रहो, शरीर से लगाया हुआ शरीर लगा हो, बैठा हो, तो भी प्रेम नहीं होता। अगर अहंकार है तो इतना बड़ा फासला है कि उसको पूरा नहीं किया नहीं जा सकता। और अगर अहंकार नहीं है--और वही तो भक्ति का सूत्र है--तो फिर कोई फर्क नहीं पड़ता। कृष्ण पांच हजार साल पहले हुए हों या पचास साल पहले हुए हों, कोई फर्क नहीं पड़ता। कृष्ण यहां हों कि किसी और चांदत्तारे पर हों, कोई फर्क नहीं पड़ता।
तो पहले तो इन देवी का यह कहना कि मीरा एक साधारण औरत थी, सिर्फ अपने संबंध में संकेत देना है।

दूसरी बात: मुझसे अगर कोई कहे तो मैं कोई साधारण औरत को, कुछ बुरा नहीं मानता। सभी साधारण हैं। असाधारण का क्या अर्थ होता है? असाधारण का इतना ही अर्थ होता है: जिसने अपनी साधारणता को पहचान लिया, वही असाधारण हो गया। जिसने अपनी निर-अहंकारिता को पहचान लिया, वही असाधारण हो गया। असाधारण का अर्थ होता है: अपनी साधारणता में मस्त हो गए।
मीरा को साधारण औरत कहने से यह महिला ही साधारण हो जाती है। अपने को साधारण जान लो, तो असाधारण हो जाओ। और मीरा ने अपने को बड़ा साधारण माना है। इतना ही कहती है कि हे प्रभु, मुझे चाकर रख लो; मुझे नौकर रख लो; मैं तुम्हारे पैर दबा दूंगी; मैं तुम्हारा काम कर दूंगी; सेवा-टहल कर लाऊंगी। मुझे चाकर राखो जी! और तो कुछ मांगती नहीं। कुछ तो मांग नहीं है मीरा की।
तो पहले तो मैं कहूंगा: मीरा को कोई भी दंभ नहीं है असाधारण होने का। यही उसकी असाधारणता है। वह बिलकुल साधारण है।
दूसरी बात इन देवी ने खोज की कि जो साधु उसके घर आया था, वह उसी साधु के प्रेम में पड़ गई थी; वह पांच हजार साल पहले हुए कृष्ण के प्रेम में नहीं थी। लेकिन इस साधु में भी कृष्ण उतने ही हैं। इस साधु की कोई खराबी है? इसका कोई कसूर? इस साधु के भी प्रेम में अगर मीरा पड़ जाए, तो इन देवी को कोई अड़चन मालूम होती है? कृष्ण तो सर्वव्याप्त है। कृष्ण कोई व्यक्ति का नाम थोड़े ही है।
अगर तुम मुझसे पूछो तो मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि कृष्ण से प्रेम करो। मैं कहूंगा: प्रेम करो; जिससे प्रेम हो जाए, वही कृष्ण है। कृष्ण से थोड़े ही प्रेम होता है; प्रेम से कृष्ण होते हैं। क्या फर्क पड़ता है? ठीक, चलो। यह अनाम साधु जो आया था, इसके प्रेम में पड़ गई होगी। तो भी कुछ हर्जा नहीं। प्रेम में पड़ गई, यह बात पक्की है। और प्रेम में पड़ गई कि मीरा--मीरा हो गई। किसके प्रेम में पड़ी, क्या फर्क पड़ता है? यहां नाम-धाम का ही फर्क है, बाकी तो एक ही बसा है। मगर इन देवी की चेष्टा यह है कि कृष्ण का प्रेम कुछ खास; कृष्ण का प्रेम होता तो चलो क्षमा कर देतीं ये उसको; मान लेतीं कि चलो ठीक है, चलने दो। मगर साधु! साधु में तुम्हें परमात्मा नहीं दिखाई पड़ता। तो कृष्ण में ही ऐसी क्या खूबी थी? ग्वाले थे!
किसी को कृष्ण की निंदा करनी हो तो क्या अड़चन है?--कि इस ग्वाले के प्रेम में पड़ गई! साधु भी उनका ही रूप है।
मगर ये देवी इस कोशिश में ही लगी हैं कि किसी तरह मीरा को छोटा सिद्ध करना है। कहीं इन देवी को चोट लग रही होगी। शायद ये भी कुछ तुकबंदी वगैरह जानती हों, तो शायद सोचती हों कि ये भी कुछ कवि इत्यादि हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन मुझसे बात कर रहा था। ऐसे साहित्य की बात चल पड़ी तो कहने लगा कि उर्दू साहित्य की हालत बड़ी खराब है! मैंने पूछा: मतलब? उसने कहा: अब आप तो जानते ही हैं, मिर्जा गालिब को मरे कितना समय हो गया! फिर इकबाल भी चले गए। और फिर मेरी भी तबीयत कुछ दिनों से ठीक नहीं रहती।
बस उर्दू साहित्य पूरा हो गया! इधर कुछ दिनों से मेरी तबीयत भी ठीक नहीं रहती! उर्दू साहित्य की हालत बड़ी खराब है! शायद कुछ तुकबंदी इन देवी को भी आती होगी। मीरा से अड़चन अटकती होगी। मीरा को किसी तरह नीचे लाना जरूरी है!
तुम ध्यान रखना: संतों की निंदा में अक्सर कारण यही होता है:र् ईष्या। यह बात मानना बहुत कठिन होती है अहंकार को कि कोई हमसे ऊपर। खींचो! किसी भी तरह खींचो!
इसलिए संतों की जब भी निंदा चलती है, तुम तत्क्षण मान लेते हो। तुम फिर खोज-बीन ही नहीं करते। फिर कोई फिकर ही नहीं करता--इस बात की खोज-बीन करने की कि इसमें सचाई कितनी है।
निंदा हम तत्क्षण स्वीकार करते हैं। प्रशंसा--हम एकदम ठिठक जाते हैं। हम कहते हैं: प्रशंसा! यह हो नहीं सकता। अच्छा तो हो ही नहीं सकता, हमारी यह मान्यता है। यह तो सिद्ध सिद्धांत है हमारा कि शुभ तो यहां होता ही नहीं; अशुभ ही होता है। अशुभ कोई कहे तो हम मान लेते हैं। शुभ की कोई खबर दे, हम लाख झंझटें खड़ी करते हैं, तर्क उठाते हैं।
इसलिए उनको यह भी अड़चन है। वे कहती हैं कि "साधु के प्रेम में पड़ गई थी--जो साधु घर आकर रुका था। और उस समय वह पांच साल की नहीं थी, बल्कि युवती थी।' यह भी उसको अड़चन रही होगी कि अब पांच साल की अगर मानो, तो फिर यह साधु के प्रेम में पड़ना कुछ जंचेगा नहीं; इसमें कुछ ताल-मेल नहीं बैठेगा। फिर इसको वासना नहीं कहा जा सकेगा। तो मीरा को खींच कर युवती बनाना पड़ता है। हो सकता है, साधु का नाम गोपालदासजी या ऐसा कुछ रहा हो! बाबा गोपालदास! या रणछोड़दासजी! कुछ ऐसा नाम रहा हो और मीरा धोखा दे रही हो दुनिया को। पड़ी है इस लफंगे के चक्कर में और बातें कर रही कृष्ण की। ऐसी उनकी चेष्टा है।
यह चेष्टा क्षुद्र वृत्ति से उठी है। मीरा को समझने के यह ढंग नहीं।
मुझे कुछ अड़चन नहीं है। मीरा अगर जवान रही हो तो और भी अच्छा। इसमें क्या अड़चन है? जवानी में कुछ बुराई नहीं है। जवानी में बुराई होती तो परमात्मा जवानी लाता ही नहीं। परमात्मा जवानी से बहुत खुश है--इसलिए तो जवानी को सौंदर्य देता, प्रतिभा देता, रूप-रंग देता। जब फूल पूरा खिलता है तो कोई कसूर तो नहीं है। कोई बौड़ी जो खिली नहीं है, कोई बड़ी महिमा की बात तो नहीं है। तो पांच साल की बच्ची बौड़ी है। जवान युवती खिल गया फूल है। क्या हर्ज है?
और मीरा किसके प्रेम में पड़ी यह मुझे अड़चन नहीं आती। हां, दूसरों को अड़चन आएगी। ऐसे धर्मगुरु तुम्हें मिल जाएंगे जो इसका खंडन करेंगे, कि यह बिलकुल गलत है। मुझे इसमें अड़चन नहीं आती कि किसके प्रेम में पड़ी। प्रेम में पड़ी यह काफी है। मैं प्रेम का हामी हूं। पक्षपाती हूं। तुम किसी को तो प्रेम करो! तुम प्रेम तो करो! तुम प्रेम का स्वाद तो ले लो। तुम किसी के भी साथ प्रेम का स्वाद ले लो, तुम धीरे-धीरे पाओगे: वहीं से परमात्मा का रास्ता बनना शुरू हो गया। क्योंकि प्रेम उसका रास्ता है। अप्रेम विपरीत जाना है परमात्मा के; प्रेम उसके अनुकूल जाना है। जिससे हो जाए, उससे करो। प्रेम के संबंध में शर्तबंदी न रखो।
प्रेम प्रार्थना का प्रथम रूप है; भक्ति की शुरुआत है।

चौथा प्रश्न: भक्त की भाव-दशा के संबंध में कुछ कहें।

क्त की भाव-दशा ऐसे ही है जैसे प्रतिपल बदलता हुआ मौसम। अभी सूरज निकला है और हवाएं शांत हैं और वृक्ष किरणों में नहाए खड़े हैं। और अभी-अभी वर्षा हो सकती है, मेघ घिर जाएं, जल बरसने लगे; सूरज बदलियों में छिप जाए। अभी-अभी हवा के झोंके आ सकते हैं और वृक्षों को हिला डालें। और अभी-अभी सब कुछ हो सकता है।
भक्त की भाव-दशा बड़ी तरंगायित दशा है। भक्त जड़ नहीं है--प्रवाह है।
तो किसी एक शब्द से भक्त की दशा नहीं कही जा सकती। कभी रोता है--विरह में। और कभी हंसता है--मिलन में। कभी भक्त को नाचते पाओगे, जैसे सारे जगत की संपदा मिल गई; और कभी ऐसे जार-जार रोते पाओगे, जैसे सब खो गया। कभी प्रभु का गुणगान करते पाओगे--भगत देख राजी हुई! और कभी संसार की तरफ देखते हुए भक्त को बड़ा उदास पाओगे--जगत देख रोई!
तो कोई भाव-दशा को एक शब्द नहीं दिया जा सकता; परिभाषा नहीं हो सकती। भक्त की भाव-दशा बदलती है। तब तक बदलती रहती है जब तक भक्त भगवान ही नहीं हो जाता; जब तक भगवान में लीन नहीं हो जाता।
तो मीरा के भजनों में भी तुम अलग-अलग भावों के प्रतिबिंब पाओगे। कभी रोने के, कभी हंसने के, कभी मस्ती के, कभी आनंद के--कभी नाराजगी के भी। भक्त भगवान से नाराज भी हो जाता है। वह हक है उसका नाराज होने का। ज्ञानी तो डरता है। वह तो संभल कर चलता है। वह तो व्यवहार की बातें करता है--भगवान से भी! औपचारिकता। भक्त नहीं डरता। भक्त का क्या डरना! प्रेम कभी डरता ही नहीं। जिससे तुम्हारा प्रेम है, उससे तुम निर्भय हो जाते हो। तो भक्त कभी जूझ भी लेता है; कभी दो-दो बातें हो जाती हैं। कभी मनमुटाव भी हो जाता है। कभी दो-चार दिन के लिए नाराज भी हो जाता है तो भक्ति इत्यादि छोड़ देता है। रख देता है मूर्ति-वूर्ति बंद करके संदूक में--कि रहो, पड़े।
भक्त की यह तरलता समझनी होगी। उसकी सरलता समझनी होगी। उसकी सहजता समझनी होगी। कभी-कभी रूठ जाता है और प्रतीक्षा करता है कि मनाओ अब। और भगवान मनाते भी हैं। भक्त को मनाना ही होगा। यह खेल दोनों तरफ से चलता है।
ज्ञानी तो बिलकुल अकेला है। वहां छिया-छी खेलने का उपाय ही नहीं। लेकिन भक्त एक अपूर्व स्थिति में है; वहां छिया-छी चल सकती है। कभी छिप जाता है। कभी आवाज देता है कि खोजो मुझे। कभी खोजने निकलता है।
कांटों पै एतबार किया है कभी-कभी
फूलों को शर्मसार किया है कभी-कभी
पैमानाए बहार किया है कभी-कभी
जल्वों को आशकार किया है कभी-कभी
रहम आ गया जो इनपै मेरे जब्ते इश्क को,
आंखों को अश्कबार किया है कभी-कभी
रस्मो रिवाजे इश्क का कायल नहीं मगर
दामन को तारत्तार किया है कभी-कभी
गो बेखबर नहीं हूं हकीकत से खार की
फूलों पै एतबार किया है कभी-कभी।
जो देवता भी पा न सके मैंने वो कदम
चूमे हैं, उनसे प्यार किया है कभी-कभी
सर आस्तां पे तेरे झुकाए रहा मगर
इसको सुपुर्द-ए-दार किया है कभी-कभी
मैं हूं तो कोई दूसरा कैसे हुआ कहीं
मैं ही को "तू' शुमार किया है कभी-कभी
ऐसा चलता है।
कांटों पै एतबार किया है कभी-कभी
फूलों को शर्मसार किया है कभी-कभी।
कभी भरोसा कांटों पर हो जाता है। कभी जीवन का दुख, परमात्मा से विरह--एक कांटे की तरह चुभ जाता है। बड़ी विषाद की दशा हो जाता है। अंधेरी रात छा जाती है। अमावस आ जाती है भक्त के प्राणों पर। और कभी-कभी फूल खिलने लगते हैं, पूर्णिमा हो जाती है। संसार भूल जाता है, विरह भूल जाता है। उसकी एक छोटी सी किरण भी मिलती है तो मिलन का रस...आलिंगन मिलने लगता है।
पैमानाए बहार किया है कभी-कभी
जल्वों को आशकार किया है कभी-कभी।
कभी सब मरुस्थल जैसा मालूम पड़ता है; कभी सब पतझड़ हो जाता है। और कभी वसंत आता है और वसंत का सारा सौंदर्य आता है और वसंत की जवानी आती है! और खूब फूल खिलते हैं और पक्षी खूब गीत गाते हैं!
भक्त में सारे मौसम हैं। ज्ञानी एक मौसम में जीता है--थिर; स्थितिप्रज्ञ। ज्ञानी की लौ ऐसी है कि जहां हवा का झोंका भी नहीं आता। वह ज्ञानी की चेष्टा है। ध्यान का वही अर्थ है। ध्यान का अर्थ है: चित्त बिलकुल थिर हो जाए; जरा भी हिले-डुले नहीं। थिरता ज्ञानी का प्रयास है!
भक्त कहता है: डुलाओ मुझे! हिलाओ मुझे! नचाओ मुझे!
पैमानाए बहार किया है कभी-कभी
जल्वों का आशकार किया है कभी-कभी
रहम आ गया जो इनपै मेरे जब्ते इश्क को
आंखों को अश्कबार किया है कभी-कभी।
कभी मुस्कुराता है, कभी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है।
रस्मो रिवाजे इश्क का कायल नहीं मगर
दामन को तारत्तार किया है कभी-कभी।
भक्त कहता है कि मुझे रस्मो-रिवाज, वे जो प्रेम के औपचारिक नियम हैं, उनका मैं कायल नहीं हूं, उनको मैं मानता भी नहीं हूं; लेकिन फिर भी कभी ऐसी घड़ियां आ गईं कि अपने वस्त्रों को फाड़ कर फेंक दिया है।
दामन को तारत्तार किया है कभी-कभी
गो बेखबर नहीं हूं हकीकत से खार की
--हालांकि मुझे पता है कि कांटे की भी असलियत है।
गो बेखबर नहीं हूं हकीकत से खार की
फूलों पै एतबार किया है कभी-कभी।
फिर भी फूलों पर भरोसा, वह भी हुआ है। सब हुआ है।
भक्त का जीवन बड़ा समृद्ध है। ज्ञानी का जीवन एक-आयामी है; भक्त का जीवन बहु-आयामी।
जो देवता भी न पा सके मैंने वो कदम
चूमें हैं, उनसे प्यार किया है कभी-कभी
मगर "कभी-कभी।' यह रोज बदलती है बात। यह रोज घटती है बात। भक्त का भाव रूपांतरित होता रहता है। भक्त का भाव जीवंत है। जहां जीवन है, वहां रूपांतरण है। भक्त का भाव बहती हुई गंगा की भांति है। ज्ञानी का ज्ञान सरोवर की तरह बंद--ठहरा हुआ। भक्त के जीवन में सब आता है, सब जाता है। लेकिन इन सबके पीछे एक सारसूत्र है--जो ठहरा रहता है।
जैसे फूलों की माला में एक सूत्र, धागा पिरोया होता है, अलग-अलग फूल हो सकते हैं--गुलाब का फूल, गेंदे का फूल, चंपा, चमेली--मगर सबके पीछे पिरोया हुआ एक सूत्र होता है--समर्पण का भाव; प्रेम। वह भाव-दशा उसकी थिर है। नाराज होता है, तब भी प्रेम में कमी नहीं है। रूठ जाता है, तब भी प्रेम में कमी नहीं है। पूजा करता है, तब भी प्रेम में कुछ फर्क नहीं है। आंसू बहाता है, उदास है, कि खुश है; लेकिन प्रेम सतत बना रहता है। ऊपर-ऊपर सब फूल बदलते रहते हैं; भीतर एक एकरसता बनी रहती है।
बसाया बिजलियों में आस्मां की
इलाही खैर मेरे आशियां की
समेटा दो जहां को अपने दिल में
खबर पाई निशाने बेनिशां की
जिधर उठी निगाहें शौक अपनी
उधर आई सिमट रौनक जहां की,
जहां जोश आया एक नारा लगाया
भर आया जी तो पैहम एक फुगां की
जहां सर झुक गया सजदे हुए हैं
रही बंदिश न संगे आस्तां की
भक्त पर कोई बंदिश नहीं है, कोई नियम, व्यवस्था, अनुशासन नहीं है। भक्त का भाव परम स्वच्छंद भाव है।
जहां सर झुक गया सजदे हुए हैं
जहां सिर झुक गया, वहीं प्रार्थना हो गई।
रही बंदिश न संगे आस्तां की।
फिर इसकी फिकर नहीं की, कि किस देहरी पर सिर झुका--मंदिर थी कि मस्जिद थी; कि राम थे कि रहीम थे; कि कृष्ण थे कि क्राइस्ट थे। इस पर कोई बंदिश नहीं है भाव की। भाव बंदिश जानता ही नहीं। भाव परम स्वतंत्रता की दशा है।
बसाया बिजलियों में आस्मां की
इलाही खैर मेरे आशियां की
और कितनी ही पीड़ा मिले, धन्यवाद नहीं छूटता। और कितना ही विरह सताए, धन्यवाद नहीं छूटता। कहा है--
बसाया बिजलियों में आस्मां की
इलाही खैर मेरे आशियां की।
अगर बिजलियों में भी आसमान की, भक्त को अपना घर बनाना पड़ा हो, अपना आशियां बनाना पड़ा हो, अपना नीड़ बनाना पड़ा हो--तो भी वह कहता है: इलाही खैर मेरे आशियां की! तेरी बड़ी कृपा है!
समेटा दो जहां को अपने दिल में
खबर पाई निशाने बेनिशां की।
और जिसने भी, ये जो दो दुनियाएं हैं--यह और वह; संसार और परलोक--जिसने इन दोनों को समेट लिया अपने दिल में, और जिनकी वासना इन दोनों की तरफ दौड़ती अब नहीं, बंद हो गई, रुक गई। न इस दुनिया में कुछ चाहता है, न उस दुनिया में कुछ चाहता है; जिसने ऐसी स्थिति बना ली कि परमात्मा को चाहता है, और कुछ भी नहीं चाहता--न स्वर्ग के सुख, न संसार के सुख।
समेटा दो जहां को अपने दिल में
खबर पाई निशाने बेनिशां की।
उसे खबर मिलती है उस निशान की--जो बेनिशां है। उसे उस जगह का पता मिल जाता है जो लापता है। उसे अज्ञात का ज्ञान होना शुरू होता है। उसे अदृश्य दृश्य होता है; अश्राव्य सुनाई पड़ने लगता है।
जहां सर झुक गया सजदे हुए हैं
रही बंदिश न संगे आस्तां की।
जैसे-जैसे भक्त आगे बढ़ता जाता है, जैसे-जैसे भक्ति प्रगाढ़ होती है, प्रांजल होती है, वैसे-वैसे सभी मूर्तियां उसी की हो जाती हैं। तब सभी में वह--अगर कृष्ण का भक्त है तो कृष्ण को देखने लगता है; राम का भक्त है तो राम को देखने लगता है। वह तो बहाना है--राम और कृष्ण। वह तो शुरुआत है--क ख ग। जैसे-जैसे बढ़ते जाते हो, फिर कुछ फर्क नहीं रह जाता। फिर तो जो दिखाई पड़ता है, वही कृष्ण दिखाई पड़ता है। और जब तक ऐसा न हो जाए तब तक जानना: अभी भक्ति की बातें तुमने सुनीं और बातें तुमने कीं; लेकिन भक्ति में बहे नहीं, भक्ति को पीया नहीं।

पांचवां प्रश्न: आप पूना पधारे, इसमें हमारा क्या पात्रता हो सकती है? फिर भी आपने अपनी करुणा का सागर ही हम पर उंडेल दिया। मैं उसमें थोड़ा ही भीग पाया, लेकिन उससे भी जीवन में बहुत आनंद पाता हूं। साथ ही यह खटका भी है कि पूर्ण जीवन-रूपांतरण का अवसर सामने है और मैं चूकता चला जाता हूं। इसकी जिम्मेवारी पूरी की पूरी मेरी है। लेकिन भगवान, जो भी अपने दिया, वह बहुत है और उसके लिए मेरा अहोभाव स्वीकार करें।

पूछा है--स्वामी सत्य निरंजन ने। एक ही भूल है इस प्रश्न में, बाकी सब ठीक है। और भूल समझ में आ जाए तो वह जो अड़चन मालूम हो रही है, मिट जाएगी, बाधा हट जाएगी। और भूल ऐसी सूक्ष्म है कि एकदम से समझ में न आएगी। और जब मैं कहूंगा तो तुम चौंकोगे।
कहा है सत्य निरंजन ने कि "करुणा का सागर हम पर उंडेल दिया। इसमें हमारी क्या पात्रता हो सकती है?'
पात्र तो तुम हो ही जन्म से। अपात्र तो कोई होता ही नहीं। अपात्र परमात्मा बनाता ही नहीं। क्योंकि अगर तुम अपात्र हो तो फिर बनाने वाला अपात्र हो जाएगा। अगर घड़ा ठीक न बने तो घड़े को थोड़े ही दोष देते हो; कुम्हार को दोष देते हो। और कुम्हार वही है--एक ही है। वही बुद्ध का घड़ा बनाता है, वही मीरा का, वही तुम्हारा निरंजन! कुछ भेद नहीं है बनाने वाले में। वही हाथ, वही कला। सच तो यह है, कि बनाते-बनाते और कलाकार हो गया है। बुद्ध को ढाई हजार साल पहले बनाया था; तुमको ढाई हजार साल बाद बनाया। तो ऐसा थोड़े ही है कि बूढ़ा होता जा रहा है और बुद्धि गंवाता जा रहा है, कि सठिया गया है। ढाई हजार साल के अनुभव के बाद तुम्हें बनाया--और सुंदर बनाया है।
रवींद्रनाथ ने कहा है: परमात्मा हारता ही नहीं; बनाए जाता है। हम चाहे उसकी मर्जी पूरी करें, न करें; मगर वह थकता नहीं। वह नये-नये संस्करण भेजता ही चला जाता है। वह जगत को रोक नहीं देता। यह उसके प्रेम की लीला है।
तुम पात्र ही हो। पात्रता के लिए कुछ और करना नहीं है। लेकिन तुम्हारे धर्मगुरुओं ने तुम्हें सिखाया है कि पात्रता के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा: ब्रह्मचर्य साधो; नहीं तो अपात्र! परमात्मा ने दी है काम-ऊर्जा और तुम्हारा धर्मगुरु सिखा रहा है: ब्रह्मचर्य साधो; नहीं तो अपात्र। अब तुम झंझट में पड़े। अब यह ब्रह्मचर्य सधता नहीं। साधने की कोशिश करो तो और मुश्किल खड़ी होती है। जितना साधो उतना ही मन और कामनाग्रस्त होता चला जाता है। तो फिर अपात्रता का खयाल पैदा होता है।
अपात्रता पैदा की तुम्हारे धर्मगुरु ने। वह तुममें अपराध-भाव पैदा करवाता है। यह ऐसा ही कि तुम दो बार खाना खाते हो, धर्मगुरु कहता है: एक बार खाओ तो पात्र। अब तुम एक बार खाते हो, तो दिन भर भूख लगी रहती है। बार-बार भोजन के ही खयाल आते हैं। बिस्तर पर लेटते हो तो बस थालियां सज जाती हैं। रास्ते पर निकलते हो तो और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। इधर से हलुवे की अंध आती है, उधर से भजिए ही गंध आती है। वैसे कभी नहीं आती थी; जब से एक दफा भोजन शुरू किया, तो एकदम रास्ते पर जाओ तो बस आदमी जो दिखाई नहीं पड़ते--भजिए, मिठाई की दुकानें, भोजनालय। और चित्त बड़े-बड़े विचारों में पड़ता है। अब तुम अपात्र हुए। अब झंझट बनी। अब तुमको लगा कि यह मामला क्या है; मैं क्या पागल हूं भोजन के पीछे?
पागल नहीं हो। तुम्हारे धर्मगुरु ने तुम्हें अस्वाभाविक करके पागलपन की हालत करवा दी। उलटा-सीधा कुछ करोगे--अपात्र मालूम होने लगोगे। किसी ने बता दिया कि रोज तीन बजे रात उठना। अब उठने लगे तीन बजे; अब दिन भर नींद आती है। पूछने गए गुरु से, तो गुरुदेव कहते हैं कि तामसी हो। यह तामस का लक्षण है--दिन में नींद का आना। स्वभावतः तामस का लक्षण है। तुमको भी जंचती है कि बात तो ठीक है। और यही गुरुदेव ने बताया था कि तीन बजे उठना। अब गुरुदेव समझाते हैं कि तामस से छूटना है तो तामसी भोजन छोड़ो; तुम सिर्फ दूध पर ही रहने लगो। अब तुम दूध पर रहने लगो तो अब भोजन के खयाल आते हैं।
जाओ गुरु के पास। गुरु कहते हैं: तुम भ्रष्ट हो, पापी हो। भोजन के खयाल! ये होने ही नहीं चाहिए। तुम अपात्र हो।
सारे संसार को परमात्मा तो पात्र की तरह बनाता है, लेकिन तुम्हारे महात्मा सब पात्रों को यह भ्रांति दे देते है कि तुम अपात्र हो। यहां पात्र ही पात्र हैं, क्योंकि सब पर परमात्मा के हस्ताक्षर है; अपात्र कोई हो कैसे सकता है! मैं तुम्हें यही स्वतंत्रता देना चाहता हूं कि तुम पात्र हो और अगर कभी अपात्रता पैदा होती हो तो जरा गौर करना: तुम जरूर किसी मूढ़ की बात मान कर चल रहे होओगे, जिससे अपात्रता पैदा होती है। तुम अस्वाभाविक हो रहे होओगे। तुम निसर्ग से चूक रहे होओगे, इसलिए अपात्रता पैदा होती है। अपात्रता तुम्हारी नियति नहीं है, तुम्हारा स्वभाव नहीं है। और अगर तुम नैसर्गिक हो जाओ तो तुम पात्र हो। एक बात।
दूसरा तुम पूछते हो कि "जो भी थोड़ा मैं भीग पाया, उससे जीवन में बहुत आनंद है।'
थोड़े भी भीग गए तो शुरुआत हो गई। बच न सकोगे। एक कदम मुझमें उतरे तो फिर लौट न सकोगे। एक कदम मेरे साथ चल लिए तो बात खतम हो गई; अब पीछे लौटना नहीं है। देर अबेर कुछ भी हो जाए, आगे बढ़ना ही होगा। क्योंकि जहां आनंद मिलना शुरू हुआ--आनंद खींचता है चुंबक की तरह। फिर तुम आज नहीं...सब दांव पर लगा दोगे।
और निरंजन, जल्दी ही दांव पर लगाने की तैयारी आ रही है। समय आ रहा है, सब दांव पर लगाना होगा।
थोड़े भीग गए, पर्याप्त है। ये थोड़े से जो छींटे पड़ गए, ये काफी हैं। ये तुम्हें पूरा रंग डालेंगे। ये छींटे ऐसे नहीं हैं कि सिर्फ छींटे हैं--एक-एक बूंद सागर को लिए है। एक-एक बूंद सागर है।
और तुम कहते हो: "यह खटका भी रहता है कि पूर्ण जीवन-रूपांतरण का अवसर सामने है, और मैं चूकता चला जाता हूं। इसकी जिम्मेवारी पूरी की पूरी मेरी है।'
यह भ्रांति छोड़ो। यही मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि--"इसकी जिम्मेवारी पूरी की पूरी मेरी है'--यह भ्रांति छोड़ो। क्योंकि यह भी सूक्ष्म अहंकार है। यह तुम्हें कठिन होगा समझना। लेकिन समझना जरूरी है। यह भी सूक्ष्म अहंकार है कि जिम्मेवारी मेरी है। यह "मैं' छोड़ो। "मैं' अनेक-अनेक ढंगों से निर्मित हो जाता है। अब वह एक नया रास्ता खोज रहा है। वह कह रहा है कि कोई क्या करे! वे तो इतना बरसा रहे हैं, मैं नहीं ले रहा, तो जिम्मेवारी मेरी है। यह बात बिलकुल तर्कयुक्त लगेगी कि जिम्मेवारी मेरी है। मगर "मैं' इससे ही भर जाएगा। और वही अड़चन है।
"मैं' अड़चन है। "मैं' के कारण ही पूरा रूपांतरण नहीं हो रहा है। और "मैं' अब एक नई शक्ल ले रहा है। और ऐसी शक्ल ले रहा है, कि बड़ी होशियारी की, कि तुम पहचान भी न पाओगे।
अब "मैं' कह रहा है कि अब क्या किया जा सकता है? मैं ही अपात्र! मैं ही पापी। मैं ही अज्ञानी। मैं ही बुरा-भला।
खयाल रखना: मैं इतना कुशल है कि अगर ठीक चीजें न मिलें तो विपरीत चीजों से भी अपने को भरता है। पहले कहता है: मैं ज्ञानी। अगर यह सिद्ध हो जाए कि मैं ज्ञानी नहीं तो भी छोड़ता नहीं पीछा; कहने लगता है: मैं अज्ञानी। पहले कहता है: मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति। फिर समझ में आने लगे कि यह बात तो ठीक नहीं, तो वह कहने लगता है: मैं ना-कुछ, आपके चरणों की धुल! मगर "मैं' वहां भी कायम है।
"मैं' अपने को बचाता है। "मैं' के रास्ते सूक्ष्म हैं, बड़े सूक्ष्म हैं! और इस कुशलता से बचाता है कि तुमको शक भी न आएगा। अब इस पर तुम्हें शक भी नहीं आ सकता है कि इसकी जिम्मेवारी पूरी की पूरी मेरी है। पूरी की पूरी! अभी तुम पूरे हो ही नहीं, तो पूरी की पूरी जिम्मेवारी तुम्हारी कैसे हो जाएगी? अभी तुम हो कहां कि जिम्मेवारी तुम्हारी हो जाए? जिम्मेवारी हो ही कैसे सकती है?
बुद्ध से किसी ने कहा कि मेरे पास बहुत धन-संपत्ति है, मैं लोगों की सेवा करना चाहता हूं। आप मुझे आज्ञा दें, मैं क्या करूं?
बुद्ध उसकी तरफ देखते रहे और बड़े उदास हो गए। और उस आदमी ने कहा: आप एकदम उदास क्यों हो गए? आपका चेहरा एकदम उदास क्यों हो गया? आप फूल की तरह खिले रहते हैं, आप एकदम कुम्हला क्यों गए?
बुद्ध ने कहा: इसलिए कि तू अभी है ही नहीं, सेवा कैसे करेगा! सेवा के पहले होना चाहिए।
गुरजिएफ कहता था अपने शिष्यों को कि तुम अभी हो ही नहीं। इसलिए पहली बात तो है कि तुम हो जाओ, फिर दूसरी बातें। लेकिन हमने यह मान कर पकड़ ली है बात कि हम हैं। यह मूल भ्रांति है।
तो निरंजन, यह फिकर छोड़ो कि इसकी जिम्मेवारी तुम्हारी है। तुम हो ही नहीं अभी। और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम यह कहने लगो कि मैं नहीं हूं। नहीं तो तुम फिर पकड़ जाओगे। सिर्फ समझ लो।
एक शून्य है। इस शून्य को समझ लो, पहचान लो। और जैसे ही यह शून्य का भाव स्पष्ट हो जाएगा, फिर कोई रुकावट न रहेगी। शून्य पूर्ण से भर ही जाता है; अपने आप भर जाता है, कुछ करना नहीं पड़ता। यह "मैं' ही अड़चन बना है।
इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि बहुत निष्ठावान लोग, बड़े उत्तरदायी लोग चूकते चले जाते हैं। निरंजन ऐसे ही निष्ठावान हैं। उनकी श्रद्धा मुझमें गहरी है। उनका लगाव गहरा है। चुपचाप छाया की तरह यहां वे मेरे काम में लगे रहते हैं। यह भी पहली दफा प्रश्न पूछा है। प्रश्न भी कभी नहीं पूछा है; लेकिन चुपचाप? कानोंकान किसी को खबर न हो।
जो लोग पूना में मेरे बहुत निकट आए हैं, उनमें निरंजन एक हैं। लेकिन यह दायित्व का भाव बचा हुआ अहंकार है। इसे भी जीने दो। इसके जाते ही सब हो जाएगा। और सब होने की घड़ी करीब आ रही है।

आखिरी प्रश्न: मैं ईश्वर में भरोसा नहीं करता हूं। क्या आप ईश्वर के होने का कोई प्रमाण दे सकते हैं?

मैं प्रमाण हूं। और क्या प्रमाण होता है? मेरे प्रेम को देखो! मेरी शांति को देखो! मेरे आनंद को देखो! चखो थोड़ा।
मैं जो कहूंगा, उससे प्रमाण होगा? कहे हुए शब्द तो शब्द ही होंगे। मेरे पास आओ। प्रमाण तो मिलेगा निकटता से। मेरे साथ बिगड़ो। मेरे साथ राजी होओ। कुछ चिंता न करो कि ईश्वर पर भरोसा नहीं है। हो भी कैसे भरोसा? कैसे भरोसा आए? जो तर्क दिए गए हैं, सब लचर और कमजोर हैं। क्योंकि ईश्वर के लिए कोई ठीक तर्क हो नहीं सकता। ईश्वर तर्कातीत है। जिन्होंने तर्क दिए, हानि की, लाभ नहीं किया। क्योंकि उनके तर्कों के कारण ईश्वर को असिद्ध करने का उपाय मिल गया। जिन्होंने तर्क दिए ईश्वर के लिए कि ये-ये कारण हैं ईश्वर के होने में, उन्होंने रास्ता खोल दिया नास्तिकों के लिए। क्योंकि नास्तिक उन तर्कों का खंडन कर सकते हैं। खंडन की वजह से फिर ऐसा लगता है कि नास्तिक जीत गए। और जो भी तर्क दिए गए हैं ईश्वर के लिए, सब खंडित किए जा सकते हैं। मैंने अब तक ऐसा एक तर्क नहीं पाया जो खंडित न किया जा सकता हो।
अगर नास्तिक और आस्तिक का तार्किक विवाद हो, तो नास्तिक ही जीतेगा, आस्तिक नहीं जीत सकता है। यह बात सच है। यह मैं आस्तिक होकर कह रहा हूं। आस्तिक कमजोर है। आस्तिक लचर है। उसकी दलीलें नपुंसक हैं। वह जो कहता है, ठीक नहीं है, मगर रास्ता बना देता है--नास्तिक का खंडन करने का रास्ता बना देता है।
आस्तिक को चुप हो जाना चाहिए--नास्तिक विदा हो जाएंगे। आस्तिक को तर्क देना ही नहीं चाहिए, क्योंकि ईश्वर के लिए तर्क हो नहीं सकता। आस्तिक को तर्क बनना चाहिए--तर्क देना नहीं चाहिए।
उसे यह नहीं कहना चाहिए कि हर चीज का बनाने वाला होता है, तो इतनी बड़ी पृथ्वी, इतने चांद-सूरज, इतना बड़ा विराट ब्रह्मांड--तो कोई बनाने वाला होना चाहिए। नास्तिक तत्क्षण पूछता है: फिर उस बनाने वाले का बनाने वाला कौन?
...चारों खाने चित! अगर तुम यह कहो कि उस बनाने वाले का कोई बनाने वाला नहीं, जैसा कि आस्तिक कहते रहे--तो यह बेईमानी की बात है। फिर अगर उस बनाने वाले को बनाने वाले की जरूरत नहीं, तो इस ब्रह्मांड को ही बनाने वाले की क्या जरूरत है? फिर तो तुम्हारा तर्क बेमानी हो गया। तर्क की बुनियाद यही थी कि हर चीज के लिए कोई बनाने वाला होना चाहिए।
तुम अगर यह कहो कि यह ब्रह्मांड इतना जटिल है, इसके पीछे कोई न कोई कारीगर होना चाहिए--ठीक। लेकिन तुम्हारा कारीगर तो इससे भी ज्यादा जटिल होगा न! उसके पीछे भी कोई कारीगर होना चाहिए। यह बात कहां अंत होगी? यह दलील फिजूल है। यह बचकानी है।
मैं ईश्वर के लिए कोई प्रमाण तर्क की तरह नहीं देना चाहता। नहीं दे सकता हूं। और मैं चाहूंगा कि कोई न दे। जिन्होंने दिए हैं, उन्होंने ईश्वर को नहीं जाना--तो ही दिए हैं। तेरी अपनी दृष्टि यही है कि जिन-जिन ने ईश्वर के लिए तर्क दिए हैं, वे तार्किक थे; अनुभवी संत नहीं। अनुभवी तो चुप रह जाएगा। अनुभवी कहेगा: ईश्वर के लिए क्या प्रमाण?
विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा: ईश्वर है? मैं प्रमाण चाहता हूं।
रामकृष्ण ने कहा: तू देखना चाहता है?
विवेकानंद ने बहुत लोगों से पूछी थी यह बात, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा था कि तू देखना चाहता है? जिसके पास गए थे, उसने कुछ तर्क बताया था। और विवेकानंद बुद्धिशाली व्यक्ति थे; उन्होंने उसका तर्क खंडन किया था। लेकिन रामकृष्ण ने कोई तर्क ही न दिया तो खंडन का तो उपाय ही न छोड़ा। उलटा दूसरा प्रश्न पूछा, प्रश्न के उत्तर में प्रश्न पूछा कि तू ईश्वर को जानना चाहता है, यह बोल? अभी जानना है? इसी वक्त?
तो विवेकानंद थोड़े घबड़ाए कि यह मामला क्या है जानने का, कि कोई पास की कोठरी में बंद है। विवेकानंद पहली बार डरे किसी आदमी से। कहा: मैं सोच कर आऊंगा।
रामकृष्ण ने कहा: यह भी काई प्रश्न है? सोच कर आओगे! पहले ही सोच लेना था। ईश्वर के संबंध में प्रश्न उठाते हो तो पहले ही सोच लेना था।
मैं तुम्हें कोई तर्क नहीं दूंगा। मैं भी तुमसे कहता हूं: जानना है? अभी जानना है? तैयार हो जाओ। हिम्मत करनी होगी। यह बड़ी बेबूझ यात्रा है। ये कच्ची हिम्मत के लोग इसमें न जा सकेंगे। यह बड़ा दुर्धर्ष मार्ग है। क्यों? क्योंकि अपने को बिना मिटाए कोई परमात्मा को नहीं जान सकता, इसलिए।
तुम कहते हो: परमात्मा को जानना है।
मैं तुमसे कहता हूं: मिटना होगा, तो ही जान सकोगे।
रोशनी को जानना है? अंधेरा जाएगा, तो जान सकोगे।
परमात्मा को जानना है? अहंकार को जाना होगा, तो ही जान सकोगे। तुम चाहो कि अहंकार के रहते जान लूं, तो न जान सकोगे।
यह तो ऐसे ही हुआ कि आदमी कहे कि मैं आंख तो बंद रखूंगा और रोशनी जानना चाहता हूं; आंख मैं नहीं खोलूंगा, आंख तो बंद ही रखूंगा और रोशनी जानना चाहता हूं। और अगर हम उससे कहें कि आंख खोल कर ही जान सकते हो, वह कहे, मैं आंख भी क्यों खोलूं, मुझे रोशनी पर भरोसा भी नहीं है, पहले भरोसा आए, तब मैं आंख खोलूं--तो क्या करोगे इस आदमी के साथ? और ये आंखें तो बाहर की हैं, जबरदस्ती भी खोली जा सकती हैं। भीतर की आंखें जबरदस्ती नहीं खोली जा सकतीं। इन पंक्तियों पर ध्यान करना:
निकल के जन्नत से आए थे हम, वहां कोई हमनफस नहीं था
चले हैं दुनिया से तेरी या रब यहां कोई हमनवा नहीं है
यह सिलसिला मौत-औ-जिंदगी का तो है फरेबे निगार यकसर
न कोई आया यहां कहीं से, यहां से कोई गया नहीं है
तलाशे दरमां में मैं भटकता कहां फिरूंगा मेरे मसीहा
तेरी नजर के सिवा मेरे दर्दे दिल की कोई दवा नहीं है
तुम्हीं कहो मैं तुम्हारे दर से कहां चला जाऊं उठ के आखिर
सिवा तुम्हारे जहां में मेरा कोई भी तो आसरा नहीं है
जो तू है तो मैं नहीं हूं पैदा, जो मैं हूं तो तू नहीं है जाहिर
यहां तो बस बात एक की है, यहां कोई दूसरा नहीं है
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के
खुदी की तकमील करके देखें जो कह रहे हैं खुदा नहीं है
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के!
एक ही रास्ता है उसे पाने और जानने का: अपने को मिटा देना।
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के
खुदी की तकमील करके देखें जो कह रहे हैं खुदा नहीं है।
तो कहते हैं ईश्वर नहीं है, वे एक छोटा सा काम करके देखें: अपने को शून्य करके देखें; अपने को मिटा कर देखें। तत्क्षण, क्षण भी नहीं जाता, पल भी नहीं बीतता: इधर तुम मिटे, उधर परमात्मा हो जाता है।
जो तू है तो मैं नहीं हूं पैदा, जो मैं हूं तो तू नहीं है जाहिर
यहां तो बस बात एक की है, यहां कोई दूसरा नहीं है।
तुम पूछते हो: परमात्मा कहां है? और मैं कहता हूं: परमात्मा कहां नहीं है?
तुम पूछते हो: "परमात्मा का प्रमाण?'
मैं पूछता हूं: तुम्हारा प्रमाण? तुम हो, इसका प्रमाण है? क्या प्रमाण है? क्योंकि जो भी अपने भीतर गए, उन सभी ने पाया कि वहां कोई नहीं है; सन्नाटा है; वहां "मैं' नहीं है। कभी जरा शांत बैठ कर अपने भीतर जाकर खोजो कि "मैं' कहां है? और तुम बड़ी मुश्किल में पड़ोगे; टटोलोगे, टटोलोगे--इस द्वार, उस द्वार; इस किनारे, उस किनारे; अंधेरे में भटकोगे, टकराओगे--मगर कभी "मैं' न पाओगे; क्योंकि कभी किसी ने पाया ही नहीं।
तुम यह जान कर चकित होओगे कि परमात्मा को पाने वालों की तो लंबी कतार है और छोटे-मोटे पाने वालों की नहीं, उनकी जिनकी बात की गरिमा होगी ही। वेदों से लेकर अब तक परमात्मा को पाने वाले गवाह तो बहुत हैं। लेकिन तुमने कभी ऐसा कोई गवाह सुना जिसने अहंकार पाया हो; जिसने यह सिद्ध कर दिया हो कि मैं हूं? आज तक नहीं हो सका। जो भी सिद्ध करने गए--असिद्ध हो गए। जो भीतर गए, उन्होंने पाया: मैं नहीं हूं। और पाया की परमात्मा है।
परमात्मा तुम्हारे भीतर है। "मैं' तुम्हारी भ्रांति है। परमात्मा की किताब को तुमने गलत ढंग से पढ़ा है; "मैं' कि तरह पढ़ लिया है। और तुम भीतर जाते भी नहीं। वहां असली किताब है। वहां वेदों का वेद, कुरानों की कुरान है। वहां श्रीमदभगवद्गीता है। वहां भगवान है, वहां तुम जाते ही नहीं; तुम बाहर दौड़ रहे हो: धन कमाओ, पद कमाओ, यह कमाओ, वह कमाओ! और यह सारी कमाई किसलिए, तुम्हें पता है? "मैं' को सिद्ध करने के लिए। बड़ा राज्य होगा तो बड़ा "मैं' सिद्ध हो जाएगा। धन का ढेर होगा तो बड़ा "मैं' सिद्ध हो जाएगा। राष्ट्रपति हो जाऊंगा, प्रधानमंत्री हो जाऊंगा--तो "मैं' सिद्ध हो जाएगा। यह "मैं' की दौड़। "मैं' को सिद्ध करने में लगे हो।
और "मैं' कभी सिद्ध होता नहीं, क्योंकि "मैं' है नहीं। जो है नहीं, वह सिद्ध हो नहीं सकता। तुम दो और दो को पांच बनाने में लगे हो; यह होता नहीं; यह असंभव है।
सिकंदर से पूछो। मरते वक्त कहा कि मुझे अरथी पर ले जाना तो मेरे दोनों हाथ लटके रहने देना बाहर। वजीरों ने पूछा: क्यों? तो उसने कहा: इसलिए ताकि लोग देख लें कि मैं खाली हाथ जा रहा हूं। दौड़ा-धूपा, आपा-धापी की; मगर हाथ खाली के खाली रहे। मैं शून्य की तरह जा रहा हूं।
क्या कह रहा है सिकंदर? सिकंदर यह कह रहा है: अहंकार पाया नहीं; शून्य ही था और शून्य ही जा रहा हूं। काश, इस शून्य को स्वीकार कर लिया होता, राजी हो गया होता, अहंकार की दौड़ में समय खराब न किया होता--तो परमात्मा उतर आता!
जो तू है तो मैं नहीं हूं पैदा, जो मैं हूं तो तू नहीं है जाहिर
यहां तो बस बात एक की है, यहां कोई दूसरा नहीं है
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के
खुदी की तकमील करके देखें जो कह रहे हैं खुदा नहीं है।

आज इतना ही।