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मंगलवार, 12 मई 2026

01-उन्माद बना कुछ रहने दो — (कविता) मनसा-मोहनी दसघरा

 01-उन्माद बना कुछ रहने दो — (कविता)

मत पूछो बहते जीवन का, उन्माद रहेगा कब तक।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

बजने दो दिल के तारों से, झंकार छुपे उन रागों को।

जीवन को फिर से बुनने है, उन उलझे टूटे धागों को।

मत पूछो सुने ह्रदय में,  आलाप उठेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

शून्य की मधुरस बेला में कुछ मौन मधुर क्षण जीने दो।

आपने आनंद के झरने को, बस खोल जरा तुम बहने दो।

मत पूछो आनंद-गुंजन का,माह गान बहेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का,  साथ चलेगा कब तक।।

 

तुम मत पकड़ो इन शब्दों को, न पद चापो पर ध्‍यान धरो।

इस शून्य डगर की बेला में, बस अपने को कुछ मौन करो।

मत पूछो सागर के सीने पर, तूफ़ान थमेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

सपनों की झिल-मिल पलकों पर,कोई आता है,कोई जाता है।

हंसना तो पल भर का होता ही है, विरह तो रोज रुलाता है।

मत पूछो छलती छवियों का, आवाहन चलेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

जो चित्र बनाये थे हमने, वो कितने बदरंग नीरस थे।

उन रंगो की मिटती छाया में, तेरी कहां वो सुरत है।

मत पूछो काले सायों का, ये साथ चलेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

 

साखी के टूटे प्यालों से, क्यों गिला करेगा अब कोई।

आनंद तो कितना छलका था, बस मैं ही जग थी सोई।

मत पूछो इन सूखे कंठों पे, उत्ताप  रहेगा  कब तक।।

आती जाती इन सांसों का,  साथ चलेगा कब तक।।

 

इन झूठे नकली मुखौटों से, हम ढकते झूठे चेहरों को।

यहां रात भटकती देखी है, वीरानी धुंधली गलियों में।

मत पूछो असली चेहरों का, दीदार करेंगे कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

जीवन तो झूठा लगता है, सब झूठे ही इसके मुखौटे है।

खुशियां मिलेगी तब कैसे, जब बीज विरह का बोते है।

जग में आते हम रोते है जब जाओ तो ये   जग रोये।

मत पूछो अपने खोने का,   एहसास रहेंगे कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

वीराना भटकते सायों में, तुम तृप्ति का ‘’आनंद’’ देखो।

मत पूछो उपवन के आँगन, मधुमास उठेगा कब तक।।


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