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सोमवार, 11 मई 2026

56-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा (अंतिम पोस्ट)

 अध्याय-56

(सदमा - उपन्यास)

जीवन के उतर चढ़ाव के बीच में एक विश्राम स्थल भी आता है। वह प्रत्येक मनुष्य के जीवन में वो क्षण आता है। जिसे हम देख सके या न देख सके। बस अगर आपकी चढ़ाई कठिन है। तो आपको वो विश्राम स्थल बड़े आराम से जीवन में जब उतरेगा, या आयेगा तब आप उस विश्राम का को आसानी से महसूस कर सकेंगे। यही सब नेहालता और सोम प्रकाश के आस पास घट रहा था। उनके जीवन में तनाव पीड़ा और वेदना जो जन्म-जन्म तन-मन पर उन दोनों के माध्यम से झेली थी। उस का विश्रांत का अब आ गया था। अब दोनों को जीवन में कुछ सीधा और साफ मार्ग दिखाई दे रहा था।

मकान का बनना शुरू हो गया था। दूसरा नेहालता ने एक ‘’वेस्पा 150’’ स्कुटर ले लिया था। अभी तो उनके यहां पर कार खड़ी करने की जगह नहीं थी। इसलिए स्कूल जाने आने के लिए दोनों के लिए यह उपयोगी था। नेहालता बचपन से साइकिल तो बड़े आराम से चला लेती थी। इसलिए दो-तीन दिन में ही दोनों उस स्कुटर को बड़े आराम से चलाने लगे। पहले तो सोम प्रकाश को उसे चलने में डर लगा। क्यों वह काफी दिनों बाद उसे चला रहा था। कालेज के जमाने में उसने यार दोस्तों का स्कुटर चला कर सीखा था। परंतु जब नेहालता ने खूद चलाना शुरू किया तो सोम प्रकाश की भी हिम्मत बढ़ गई। इस से समय भी बच गया और आराम भी हो गया। बाजार से समान ले कर आने में काफी समय लग जाता था। और दूसरी बात अधिक सामान ला भी नहीं सकते थे। क्योंकि उसका वज़न दूरी के कारण कुछ बढ़ जाता सा महसूस होता था। ये आप भी जीवन में जी कर देख सकते है। आप काम से कम सामान भी अधिक दूरी तक ले जाते हुए थकान महसूस करेंगे

मकान का काम अपनी गति से चल रहा था। परंतु एक आदमी ऐसा चाहिए जो उसकी देख भाल कर सकते। वरना ये मजदूर तो केवल मटर गस्ती करते है। और साथ में सामान की बरबादी भी। इस बीच एक काम और अच्छा हो गया, छूटियों में पेंटल भी आ गये थे। अब धीरे-धीरे मकान बनने ने तेजी पकड़ ली थी। वह लगभग अपनी पूर्णता की और अग्रसर हो रहा था। बस थोड़ा चारदिवारी का कार्य उस का पलस्टर और रंग पेंट चल रहा था। इसके बाद जो सामने लोहे का गेट लगना है वह बाकि था। बस अब बरसात से पहले ही ये काम भी हो जाये तो अच्छा रहेगा।

बारात में अधिक आदमी नहीं गए केवल परिवार के ही लोग थे। करकरे साहब और सोनी जी और बस एक स्कूल का पुराना अध्यापक था जिसका ना मुत्तु स्वामी था वह कुंवारा था। सो वह जाने के लिए राज़ी हो गया। यानि नानी पहली बार अपने उटी को छोड़ कर जा रही थी। वह भी चेन्नई से हवाई जहाज की यात्रा करने के लिए। परंतु नानी को ये सब अच्छा लग रहा था। क्योंकि उसके सोम प्रकाश के जीवन में एक नया द्वार खुल रहा था। शादी बहुत सहज और सरलता से हुई। बस इस में एक बात थी शादी वाली दुल्हन भी बारात के साथ ही जा रही थी। यानि मार्ग और मंजिल एक हो गए थे। इसलिए माता पिता को चिंता थी कि कम से कम नेहालता को दस पंद्रह दिन पहले आ जाना चाहिए। तब नेहालता ने कहां की वहां आकर मैं करूंगी भी क्या जो सामान शादी के लिए चाहिए हम यहीं से खरीद रहे है।

एक आर्य समाज मंदिर में ठहरने का बंदोबस्त कर दिया गया। शादी वाले दिन पेंटल के दो चार दोस्त बराती के नाम से आ गये थे। नेहा लता के कोई खास दोस्त नहीं आये बस पाँच चार ही आये सब को इस तरह से नेहालता की शादी की उम्मीद नहीं थी। वह तो तड़क भड़क की उम्मीद कर रहे थे। तो हो सकता है इस तरह की शादी में जाने से उनका अपमान हो। खेर ये शादी दो आत्मा को मधुर मिलन था। एक समाज नियम में प्रवेश करने का एक मार्ग था। लेकिन समाज और हम इस सब के लिए तैयार नहीं है। हम अपने जीवन के बस एक दो दिनों को ही महान मानते चले आ रहे है। कि शादी कौन रोज-रोज होती है। परंतु तुम्हारे ह्रदय में अगर प्रेम है तो ये सब ढ़पोरशंक की क्या जरूरत है। खेर न तो नेहालता के माता पिता ने कोई ना नुच की न ही उन्होंने समाज की परवाह की।

उन्होंने देखी केवल अपने बच्चो की खुशी को, वह जीवन में किसी तरह का बदलाव चाहते है। एक हम सफर का चुनाव जीवन को बहुत कुछ नया और उत्तम मार्ग दे जाता है। क्योंकि समाज इसे पसंद नहीं करता है। समाज इसे विरूद्ध अटल बना रहता है। समाज एक विशिष्ट व्यवस्था चाहता है। यदि तुम समाज का अनुसरण करते हो तो समाज तुमसे प्रसन्न रहता है। यदि तुम थोड़े से भी इधर-उधर भटक जाते हो तो समाज बहुत नाराज हो जाता हैऔर भीड़ पागल हो जाती है। यह तुम्हारे विचार, तुम्हारे पूर्वाग्रह, तुम्हारा ज्ञान और तुम्हारे धर्मशास्त्र है। जो सभी मिलकर एक मोटी पर्त की आंखों पर पट्टी बाँध देते हैं। और वे तुम्हें अंधा बनाकर, मूर्ख...एक मंदबुद्धि और मृतवत बनाकर रख देते है। एक यंत्र की तरह।

हमें लगता है ये है कहानी का अंत। परंतु न तो कहानी को कोई अंत होता है और न ही शुरू आत। क्या ऐसा होता देख कर हम उसे अंत समझ लेते है। जिसे हम अंत समझते है। या जो अंत घटता सा दिखता है क्या वो सच ही अंत है। नहीं वहीं से तो नया परिदृश्य पट खुलता है। जब हमने इस कहानी को शुरू किया तो वो पिछली कहानी के ठीक अंत से शुरू हुई। और आज हम यहां पर एक कहानी का अंत कर रहे है। पिछला अंत दुखद था। और ये अंत सुखद है। परंतु फिर क्या बीज से यात्रा शुरू हो कर बीज पर खत्म हो जाती है। उस बीच के पड़ाव तो दिखाई देते है। की वृक्ष बना, उस पर पक्षी चहके, उसने शरदी गर्मी को सहन किया। उस में फूल खिले और फिर कुछ फल बन गये। और वही फिर बीज पर जाकर उस फल का अंत हो गया। परंतु सच ही क्या बीज से लेकर बीज की कथा पूर्ण हो गई। नहीं बीज फिर चल पड़ेगा अपनी नई यात्रा पर। तब तक ये सिलसिला यूं ही अविरल चलता ही रहेगा। जब तक की वह नीर बीज को उपलब्ध न हो जाये। फिर भी कौन जाने वो अंत है या नहीं। कम से कम हम तो नहीं ही जानते।

इस जगत में केवल वे लोग प्रेम दे सकते हैं जिन्हें आपके प्रेम की कोई अपेक्षा नहीं हैकेवल वे ही लोग! प्रेम को जाने या उस में डूबने के लिए वही लोग अग्रसर होते है जो मिटने की चाहत रखते है। सच वही इस जगत को प्रेम देते हैं। जिनको हम समझ ही नहीं पाते। हम सोचते हैं, वे तो प्रेम से मुक्त हो गए हैं। वे ही केवल प्रेम दे रहे हैं। आप प्रेम से बिलकुल मुक्त हैं। क्योंकि उनकी मांग बिलकुल नहीं है। आपसे कुछ भी नहीं मांग रहे हैं, सिर्फ दे रहे हैं।

प्रेम का अर्थ है: जहां मांग नहीं है और केवल देना है। और जहां मांग है वहां प्रेम नहीं है, वहां सौदा है। जहां मांग है वहां प्रेम बिलकुल नहीं है, वहां लेन-देन है। और अगर लेन-देन जरा ही गलत हो जाए तो जिसे हम प्रेम समझते थे, वह घृणा में परिणत हो जाएगा। लेन-देन गड़बड़ हो जाए तो मामला टूट जाएगा। ये सारी दुनिया में जो प्रेमी टूट जाते हैं, कुछ ही दिनों में एक दूसरे से ऊब जाते है। वो क्या है? क्या  वह प्रेम है नहीं, उसमें और क्या बात है? उसमें कुल इतनी बात है कि लेन-देन गड़बड़ हो जाता है। मतलब हमने जितना चाहा था की इतना मिलेगा, उतना नहीं मिला; या जितना हमने सोचा था दिया, उसका ठीक प्रतिफल नहीं मिला। सब लेन-देन टूट जाते हैं।

प्रेम जहां लेन-देन है, वहां बहुत जल्दी घृणा में परिणत हो सकता है, क्योंकि वहां प्रेम है ही नहीं। लेकिन जहां प्रेम केवल देना है, वहां वह शाश्वत है, वहां वह टूटता नहीं। वहां कोई टूटने का प्रश्न नहीं, क्योंकि मांग थी ही नहीं। आपसे कोई अपेक्षा न थी कि आप क्या करेंगे तब मैं प्रेम करूंगा। कोई कंडीशन नहीं थी। प्रेम हमेशा अनकंडीशनल है। कर्तव्य, उत्तरदायित्व, वे सब अनकंडीशनल हैं, वे सब प्रेम के रूपांतरण हैं।

तो हम आपसे नहीं कहते कि आप कैसे कर्तव्य निभाएं। जब आपको यह खयाल ही उठ आया है कि कैसे कर्तव्य निभाएं, तो आप पक्का समझ लें, आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है। तो मैं आपसे यह कहूंगाप्रेम कैसे पैदा हो जाए। और यह भी आपको इस सिलसिले में कह दूं कि प्रेम केवल उस आदमी में होता है जिसको आनंद उपलब्ध हुआ हो। जो दुखी हो, वह प्रेम देता नहीं, प्रेम मांगता है, ताकि दुख उसका मिट जाए। आखिर प्रेम की मांग क्या है? सारे दुखी लोग प्रेम चाहते हैं। वे प्रेम इसलिए चाहते हैं कि वह प्रेम मिल जाएगा तो उनका दुख मिट जाएगा, दुख को भूल जाएगे। या उनके जीवन में खूशी भर जायेगी। परंतु प्रेम की आकांक्षा भीतर दुख के होने का सबूत है। तो फिर प्रेम वह दे सकेगा जिसके भीतर दुख नहीं है। जिसके भीतर कोई दुख नहीं है, जिसके भीतर केवल आनंद रह गया है, वह आपको प्रेम दे सकेगा।

इति शुभम् फिर इस प्रेम बीज से एक यात्रा शुरू होगा उस सब का हमें फिर से इंतजार है।

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