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बुधवार, 9 सितंबर 2026

58 - बौद्ध पथिक - (कविता) - ओशो की मधुशाला

58 - बौद्ध पथिक - (कविता) - मनसा-मोहनी 

ऐ दिनकर तू युगों-युगों से

निस-निस, नित-नित

यूं ही चलता ही जाता

एक बात बता मुझको कानों में

क्या तू नहीं चाहता

इस रस ही जीवन में

कुछ तो में परिवर्तन कर लूं

कभी भटक जाऊं इस पथ से

चाह कर कुछ तो भूले कर लूं........

इस परिवर्तित शील-कील पर

सब परिवर्तन घटता आया

समता तेरी छोटी तो क्‍या?

तू चलने से ना घबराया

उलझी राहे तमस पथों पर

मन के जाल ने तुझे उलझाया

दूर कहीं उस प्रिय पुकार ने

तुझको है क्‍या मार्ग सुझाया

जी चाहता है इस सुने पथ पर

झुक जाऊँ और वंदना कर लूं........

बदली ऋतु, बदलती है धरा

बदल गया निस-नित ये अंबर

कब बदलेगा मेरा जीवन

युगों-युगों यूंहीं चलता आया

थका हुआ हूं अब मैं हारा

कहीं तो होगा कोई किनारा

ढूंढ रहा हूं जिसे अम्बर में

वो बसा हुआ था मुझमें ही

धड़कन-धड़कन नित पुकारी

नाव डोलती नित लहरों पर

मन को क्‍या पन डुबी कर लूं........

किया संकल्प अब है मैंने

नहीं उगेगी नये कोमल पात

नहीं खिलेंगी अब कोई कलिया

थिर वहीं रहेगी जर्जर काया

क्या देख सकूंगा जीवन सत्‍य

कहीं गिरेगा जब फूल साख से

वहीं तो होगा मेरा संन्यास

एक बार बस बौद्ध पथिक बन

उन रहो पर मैं पग तो धर लूं....

जी चाहता है सुने पथ पर

झुक जाऊं और वंदना कर लूं.......

(ओशो की मधुशाला)

मनसा - मोहनी दसघरा 

 


 

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