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गुरुवार, 10 मई 2018

मा सीता के गीत-04


04-कौतुक घटित हुआ कैसा?

आई तेरे द्वार प्रभु, तुम तो थे ध्यानस्थ
अर्धखुली आंखों से तेरी बरस रहा था अमृत
मंदिर में जो भक्त खड़े थे, नाच रहे थे मस्त
झोली सबकी भरी हुई थी, निधि अमूल्य थी हस्त
मैं अभागी पहुंची देरी से, खाली झोली लिए हुए
कोने में इक खड हुई थी, नैनन अविरल अश्रु बहे

मा सीता के गीत-03


03-जिनको कभी जाना न था

कैसे थे ये क्षण अनोखे, स्वास्थ सौंदर्य से भरे
ह्रदय में जब थी न हलचल, फिर भी पुलकितताझरे

जीने की जो जिद थी अपनी, जाने कहां वह खो गई
देखते ही देखते, मैं देखती ही रह गई।
आंखें थी फिर भी सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था

बुधवार, 9 मई 2018

मा सीता के गीत-02

02-मंन्जिल तेरी यही

नैनों ने तेरे ढूंढ लिया है, मुझको इस बार
प्राणों ने तेरे पा लिया है, अपना प्राणाधार

अब पूछने की किससे भी, जरूरत तुझे नहीं
सुनने से देखने से तेरी, प्यास जो जगी।

इससे ही तो पहचानेगी, तू अपने को कभी
अंतर द्वधा को छोड दे, मंजिल तेरी यहीं
मंजिल तेरी यहीं।
( 4 दिसंबर 1973 बंबई)

मा सीता के गीत-01

01-क्या तुम वहीं हो?
जिसकी मुझे तलाश थी क्या तुम वहीं हो?
जिसकी थी प्यास प्राणों में क्या तुम वहीं हो?

व्याकुल हो नैन जब मेरे, उठते थे चाहूं ओर
मुझको खबर न थी किसकी तलाश थी उन्हें
क्या तुम वहीं हो?

झंझावत मेरे प्राणों में उठता था जब कभी
हैरान हो में देखती थी यहां वहां तभी
प्राणों में जिसकी तडप थी
क्या तुम हो वहीं ?

मा सीता के गीत-(मा सीता)

क्या तुम वहीं हो? –(मा सीता)

(ओशो को समर्पित काव्य गीत भाव मंजूषा)

ओशो का मैंने पहली बार जब क्रास मैदान मम्बई में 1973 बोलते हुए सूना तो मेरे पूर्व जन्मों की सारी यादें जीवित हो गई, मानों अंदर कुछ हो गया। कुछ सोया सा था वह जीवित हो गया।
शायद बीज तो थे, पर उन्हें माली की जरूरत थी। नहीं तो बीज में ओर पत्थर में क्या फर्क होगा। मैं इस वृद्धावस्था में भी जैसे पागल हो गई।
ओर यदि कोई कोई बात मेरेीसमण् में नहीं आई तो.......होगा उसमें जरूर कुछ। या कुछ इसमें भी, लेकिन यदि मुझे कुछ नहीं समझ में आता या पता चलता; तो जो समझ में आता है उसे क्यों छोड़ू?
.........देखा, तो मेरा कितना रूपांतरण होता गया है। वह मैं क्यों भूल रही हूं। उनके चरणों में बैठकर, उन्होंने तो इतना कुछ मुझे दिया कि वह कह नहीं सकती।

मा सीता के गीत-(ओशो के चरणो में)

भुुुुमिका-

मा सीता—
मा सीता का जन्म करांची (सिंध) पकिस्तान में 01-नवम्बर सन् 1913 को एक खुशहाल पटनानी परिवार में हुआ। ओशो जी की मां का जन्म भी 1913 में ही हुआ था परंतु उनकी तारिख का किसी को ज्ञात नही है। उस समय बाल विवाह की प्रथा थी। इस लिए उनका विवाह 14 साल कि छोटी उम्र में ही हो गया था। पति का नाम सुंदर दास प्रधाननी था। मा सीता के तीन पुत्र रतन पैदा हुए, बडी लडकी जिसका नाम कृष्णा था। जो 1931 में पैदा हुई, उसके बाद देव प्रधाननी जो 1933 में ओर सबसे छोटे बेटे नवीन प्रधाननी 1936 में पैदा हुए। वैसे तो सभी बच्चे ओशो से जुडे परंतु नवीन जो मा सीता के कहने से अमरिका चले गये थे वह एक मात्र सपुत्र थे जो ओशो मे पूर्णता से डूब गये। विभान से 1936 में प्रधाननी परिवार करांची छोड कर बम्बई आ गऐ थे।
बात उन दिनों की है जब ओशो जी बम्बई के क्रास मैदान पर गीता पर बोल रहे थे। तब मा सीता ने एक बार ओशो को प्रवचन करते हुए सूना ओर देख लिया । ये बात 1973 की है। तब तो मानों उनके अचेतन के पिछले जन्मों के सभी द्वार खुल गये। वह गा उठी क्या तुम हो वहीं...क्या तुम वहीं हो?------.जिस मैं ढूढ रही थी। मानों मीरा को कृष्ण मिल गये।
पैरों में दर्द के बावजुद भी वह दो मंजिल उतर कर किसी भी दर्द की परवाह न करते हुए ओशो जी प्रवचन सुनने आने लगी। रोज रोज वह गहरे से गहरे में डूब रही थी। किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था की वह एक नास्तिक सी दिखने वाली महिला को क्या हो गया। परिवार के लोग भी अचरज में थे कि व न तो मंदिर जाती थी ओर न कभी पूजा पाठ करती थी, ओर कितना सहासी महिला थी ओर इस साठ साल की उम्र मे उन्हें क्या हो गया है।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-12

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-बारहवां
विद्रोह की आग
मेरे प्रिय आत्मन्!
जरथुस्त्र एक पहाड़ से नीचे उतर रहा था। वह बहुत तेजी में था, जैसे कोई बहुत जरूरी खबर पहाड़ के नीचे ले जानी हो। भागता हुआ और हांफता हुआ वह बाजार में पहुंचा, मैदान में नीचे। बाजार की भीड़ में चिल्ला कर उसने पूछा कि तुम्हें कुछ पता चला? हैव यू गाट दि न्यूज, तुम्हें खबर मिली? लोग पूछने लगे, कौन-सी खबर? तो जरथुस्त्र हैरान हो गया--इतनी बड़ी घटना घट गई है और तुम्हें पता नहीं! तुम्हें खबर नहीं मिली कि ईश्वर मर गया है! लोग बहुत हैरान हुए। फिर जरथुस्त्र को लगा कि शायद वह जल्दी आ गया है, लोगों तक अभी खबर नहीं पहुंची है। मैं यह घटना पढ़ रहा था और मुझे लगा कि लोगों तक कोई भी महत्वपूर्ण खबर कभी भी नहीं पहुंचती है। और जो भी खबर लाते हैं, उन सभी को ऐसा लगता है कि शायद वे समय से पहले आ गए हैं, जल्दी आ गए हैं।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-11

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-ग्यारहवां
अशांति का बीजमंत्र

मेरे प्रिय आत्मन्!
वही विद्या है, जो विमुक्त करे--‘सा विद्या या विमुक्तये।’
इस संबंध में ही थोड़ी सी बात आज की सुबह मुझे आपसे कहनी है। बड़ा अदभुत है यह वचन। बड़ी मौलिक है यह परिभाषा। विद्या की परिभाषा भी यही है और विद्या की कसौटी भी यही है। जो मुक्त करे, वही विद्या है। लेकिन शायद, इसके दूसरे पहलू का आपको कोई खयाल न हो? हम तो मुक्त नहीं हैं। तो जो विद्या हमने पाई है, वह विद्या नहीं होगी, वह अविद्या होगी। हमारे जीवन ने तो कोई मुक्ति नहीं जानी। तो जिन विद्यालयों में हम पढ़े, वे विद्यालय न होंगे, अविद्यालय होंगे। विद्या की तो कसौटी और परिभाषा यही है कि जीवन मुक्ति के आनंद को उपलब्ध हो जाए।

लेकिन जिस विद्या से यह आनंद उपलब्ध न होता हो, उस विद्या को क्या कहें? सारे जगत में विद्या तो बढ़ती जाती है, विद्यालय बढ़ते जाते हैं, विद्यापीठ बढ़ते जाते हैं, विश्वविद्यालय बढ़ते जाते हैं, लेकिन मनुष्य कोई मुक्त होता दिखाई नहीं पड़ता है। वरन मनुष्य और भी बंधता जाता है, और भी जकड़ता जाता है, और भी नीचा गिरता जाता है।

मंगलवार, 8 मई 2018

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-10

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-दसवां
विषबुझी महतवाकांक्षा
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी इस चर्चा को शुरू करना चाहूंगा।
एक सम्राट के द्वार पर बहुत भीड़ लगी हुई थी। और भीड़ सुबह से लगनी शुरू हुई और बढ़ती ही चली गई थी। दोपहर आ गई थी और करीब-करीब सारा नगर वहां इकट्ठा हो गया था। जो आदमी भी आकर खड़ा हो गया, उसने हटने का नाम नहीं लिया। उस सम्राट के द्वार पर कोई बड़ी अनहोनी घटना घट गई थी। सांझ होते-होते तो दूर-दूर के गांव से भी लोग आ गए थे। क्या हो गया था वहां!--और सभी मंत्रमुग्ध खड़े थे!
सुबह ही सुबह एक भिखारी ने आकर भिक्षा मांगी थी सम्राट से। और कहा था, कि मैं एक ही शर्त पर भिक्षा लेना स्वीकार करता हूं--मेरा जो भिक्षापात्र है, उसे पूरा भर दोगे न! अधूरा भिक्षापात्र लेकर मैं किसी द्वार से जाता नहीं हूं।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-09

शिक्षा में क्रांति

प्रवचन-नौवां
प्रेम-केंद्रित शिक्षा

मेरे प्रिय!
मैं बहुत आनंदित हुआ कि युवकों और विद्यार्थियों के बीच थोड़ी सी बात कहने को मिलेगी। युवकों के लिए जो सबसे पहली बात मुझे खयाल में आती है वह यह है, और फिर उस पर ही मैं और कुछ बातें विस्तार से आज आपसे कहूंगा।
जो बूढ़े हैं उनके पीछे दुनिया होती है, उनके लिए अतीत होता है, जो बीत गया वही होता है। बच्चे भविष्य की कल्पना और कामना करते हैं, बूढ़े अतीत की चिंता और विचार करते हैं। जवान के लिए न तो भविष्य होता है और न अतीत होता है, उसे केवल वर्तमान होता है। यदि आप युवक हैं तो आप केवल वर्तमान में जीने की सामथ्र्य से ही युवक होते हैं। यदि आपके मन में भी पीछे का चिंतन चलता है तो आपने बूढ़ा होना शुरू कर दिया। अगर अभी भी भविष्य की कल्पनाएं आपके मन में चलती हैं तो अभी आप बच्चे हैं।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-08

शिक्षा में  क्रांति-ओशो

प्रवचन-आठवां
अज्ञान के नये आयाम-(प्रश्नोत्तर-चर्चाः 1968-69)
नई कला (माडर्न आर्ट) बिलकुल ही अजूबा हो गई है। इसमें कलाकार क्या अभिव्यक्त करना चाहता है?

असल में अगर ठीक से हम देखें तो सारी कलाएं जैसे-जैसे सत्य को बताने की दिशा में आगे बढ़ेंगी, वैसे-वैसे सत्य को बताने में तो समर्थ न होंगी; जो कुछ बता पा रही थीं उसको भी बताने में असमर्थ हो जाएंगी। वैसे हुआ है, हो रहा है। नई मूर्ति है या नई पेंटिंग है या नई कविता या नया संगीत है, चेष्टा है इस बात की कि व जो फार्म बाधा डालता है, वह जो आकार और वह आकृति और वह जो मीडियम बाधा डालता है, उससे हम मुक्त होकर इतना ट्रांसपेरेंट हो सकें कि वह बाधा न डाले, बल्कि मार्ग बन जाए। लेकिन परिणाम क्या होता है?

रविवार, 6 मई 2018

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-07

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-सातवां
नारी और क्रांति

मेरी प्यारी बहनो!
मनुष्य के इतिहास में नारी-जाति के साथ जो अत्याचार और अनाचार हुआ है, उस संबंध में थोड़ी सी बात प्रारंभ में ही कहना चाहूंगा और नारी के साथ जो हुआ है, उसके परिणाम में पूरी मनुष्य-जाति के जो अहित हुए हैं, उस संबंध में थोड़ी बात कहना चाहूंगा।
मनुष्य की पूरी जाति, मनुष्य का पूरा समाज, मनुष्य की पूरी सभ्यता और संस्कृति अधूरी है क्योंकि नारी ने उस संस्कृति के निर्माण में कोई भी दान, कोई भी कंट्रिब्यूशन नहीं किया। नारी कर भी नहीं सकती थी। पुरुष ने उसे करने का कोई मौका ही नहीं दिया। हजारों वर्षों तक स्त्री पुरुष से नीची और छोटी और हीन समझी जाती रही है। कुछ तो देश ऐसे थे जैसे चीन, चीन में हजारों वर्षों तक यह भी माना जाता रहा कि स्त्रियों के भीतर कोई आत्मा नहीं होती।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-06

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-छठवां
युक्रांद क्या है
मेरे प्रिय आत्मन्!
युवक क्रांति दल, युक्रांद की इस पहली बैठक को संबोधित करते हुए मैं अत्यंत आनंदित हूं। युवक क्रांति दल के संबंध में पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि मैं युवक किसे कहता हूं। युवक क्रांति दल की दृष्टि में युवक होने का संबंध उम्र और आयु से नहीं है। युवक से अर्थ हैः ऐसा मन जो सीखने को सदा तत्पर है--ऐसा मन जिसे यह भ्रम पैदा नहीं हो गया है कि जो भी जानने योग्य था, वह जान लिया गया है--ऐसा मन जो बूढ़ा नहीं हो गया है और स्वयं को रूपांतरित और बदलने को तैयार है। बूढ़े मन से अर्थ होता है ऐसा मन जो अब आगे इतना लोचपूर्ण नहीं रहा है कि नये को ग्रहण कर सके, नये का स्वागत कर सके। बूढ़े मन का अर्थ हैः पुराना पड़ गया मन। उम्र से उसका भी कोई संबंध नहीं है। आदमी के शरीर की उम्र होती है, मन की कोई उम्र नहीं होती है। मन की दृष्टि होती है, धारणा होती है।

पूना एक तीर्थ-यात्रा-2018

पूना एक तीर्थयात्रा—

पूना में गुजारे 21 दिन बहुत ही अभुत पूर्व थे, या ये समझ ली जिए कि प्यास अधिक थी या जल की मात्रा प्रचुर हो गई थी, आज ओशो आश्रम में ओशो उर्जा की बाढ सी महसूस हुई, सच जब में स्वीमिंगपूल में अकेला तेर रहा होता तो आस पास कोई नहीं होता, कितना गहरा ध्यान होने लग जाता था। कभी कभी तो ऐसा लगता बीच तरनताल में कि ह्रदय के आर पास किसी ने बिंध दिया है। एक क्षण के लिए तो भय लगता फिर उस दर्द में एक माधुर्य भर जाता। ओर कान सुनना बंद कर करते, चारों ओर की ध्वनिया शांत हो जाती ओर में एकल ही निश्चल सा तैरता होता, एक तो मन भी तरल है ओर जल का स्वभाव भी तरल है इस लिए जल में या जल के आस पास ध्यान अधिक गहरा जाता है।
ओर श्याद इस समय ओशो उर्जा की बाढ को झेलने के लिए साधक कम है, वहां तो इस समय काम करने वाले अधिक है जो ओशो के प्रति न तो संवेदन शील है ओर न उन्हें उस उर्जा से कुछ लेना देना है। इस लिए ओशो उर्जा का आनंद लेने का ये बहुत ही सुंदर समय है।

शुक्रवार, 4 मई 2018

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-05

शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-पांचवां
प्रेम-विवाह ओर बच्चे
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।

जो अनुभव है परमात्मा का अनुभव है। सारे मनुष्य का अनुभव शरीर का अनुभव है। सारे योगी का अनुभव सूक्ष्म शरीर का अनुभव है। परम योगी का अनुभव परमात्मा का अनुभव है। परमात्मा एक है, सूक्ष्म शरीर अनंत है। स्थूल शरीर अनंत है। जो सूक्ष्म शरीर है, वह है--काॅ.जल बाडी। वह जो सूक्ष्म है, वह नये स्थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे हैं कि बहुत से बल्ब जले हुए हैं। विद्युत तो एक है, विद्युत बहुत नहीं हैं। वह ऊर्जा, वह शक्ति, वह इनर्जी एक है लेकिन दो अलग बल्बों से वह प्रकट हो रही है। बल्ब का शरीर अलग-अलग है, उसकी आत्मा एक है। हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है, लेकिन है एक सूक्ष्म उपकरण ही, सूक्ष्म देह है! दूसरा उपकरण है--स्थूल देह।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-04


शिक्षा में क्रांति-ओशो

प्रवचन-चौथा
शिक्षक, समाज ओर क्रांति
मेरे प्रिय आत्मन्!
शिक्षक और समाज के संबंध में कुछ थोड़ी सी बातें जो मुझे दिखाई पड़ती हैं, वह मैं आपसे कहूं। शायद जिस भांति आप सोचते रहे होंगे उससे मेरी बात का कोई मेल न हो। यह भी हो सकता है कि शिक्षाशास्त्री जिस तरह की बातें कहता है उस तरह की बातों से मेरा विरोध भी हो। न तो मैं कोई शिक्षाशास्त्री हूं और न ही समाजशास्त्री। इसलिए सौभाग्य है थोड़ा कि मैं शिक्षा और समाज के संबंध में कुछ बुनियादी बातें कह सकता हूं। क्योंकि जो शास्त्र से बंध जाते हैं उनका चिंतन समाप्त हो जाता है। जो शिक्षाशास्त्री हैं उनसे शिक्षा के संबंध में कोई सत्य प्रकट होगा, इसकी संभावना अब करीब-करीब समाप्त मान लेनी चाहिए। क्योंकि पांच हजार वर्ष से वे चिंतन करते हैं लेकिन शिक्षा की जो स्थिति है, शिक्षा का जो ढांचा है, उस शिक्षा से पैदा होने वाले मनुष्यों की जो रूप-रेखा है वह इतनी गलत, इतनी अस्वस्थ और भ्रांत है कि यह स्वाभाविक है कि शिक्षाशास्त्रियों से निराशा पैदा हो जाए।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-03

शिक्षा में क्रांति-ओशो

तीसरा प्रवचन
शिक्षा ओर धर्म
मेरे प्रिय!
एक फकीर बहुत अकेला था। स्वप्न में उसे परमात्मा के दर्शन हुए तो उसने पाया कि परमात्मा तो उससे भी अकेला है। निश्चय ही वह बहुत हैरान हुआ और उसने भगवान से पूछा, क्या आप भी इतने अकेले हैं? लेकिन आपके तो इतने भक्त हैं, वे सब कहां हैं? यह सुन कर भगवान ने उससे कहा था, मैं तो सदा से अकेला ही हूं और इसलिए ही जो नितांत अकेले हो जाते हैं वे ही केवल मेरा अनुभव कर पाते हैं। रही भक्तों और तथाकथित धार्मिकों की बात, सो वे मेरे साथ कब थे? उनमें से कोई राम के साथ है, कोई कृष्ण के, कोई मोहम्मद के और कोई महावीर के। उनमें से मेरे साथ तो कोई भी नहीं है। मैं तो सदा का ही अकेला हूं। और इसलिए जो किसी के भी साथ नहीं है, बस अकेला ही है वही केवल मेरे साथ है।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-02

शिक्षा में क्रांति-ओशो

दूसरा- प्रवचन
धर्म ओर विज्ञान
मेरे प्रिय!
एक अमावस की गहरी अंधेरी रात्रि की बात है और एक छोटे से गांव की घटना। आधी रात्रि बीत गई थी और सारा गांव नींद में डूबा हुआ था। कुत्ते भी भौंक-भौंक कर सो गए थे कि अचानक एक झोपड़े से उठ रही रोने की और चिल्लाने की आवाज ने सभी को जगा दिया। अर्धनिद्रित लोग उस झोपड़े की ओर भागने लगे, बूढ़े और बच्चे--सभी। उस सोए गांव में एक विक्षिप्त सी गति आ गई। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। फिर भी लोग उस झोपड़े के आस-पास इकट्ठे हो रहे थे। झोपड़े के भीतर से आवाज आ रही थीः ‘आग लगी है, मैं जल रही हूं, मेरा घर जल रहा है।’ कुछ लोग तो पानी भरी बाल्टियां ले-ले कर भी आ गए थे। लेकिन झोपड़े के आस-पास आग लगे होने का कोई भी चिह्न नहीं था। आग तो दूर, उस झोपड़े में एक दीया भी नहीं था।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-01

शिक्षा में क्रांति-ओशो

पहला प्रवचन
नये मनुष्य के जन्म की दिशा

मेरे प्रिय!
मैं आपके बीच उपस्थित होकर अत्यंत आनंदित हूं। निश्चय ही इस अवसर पर मैं अपने हृदय की कुछ बातें आपसे कहना चाहूंगा। शिक्षा की स्थिति देख कर हृदय में बहुत पीड़ा होती है। शिक्षा के नाम पर जिन परतंत्रताओं का पोषण किया जाता है उनसे एक स्वतंत्र और स्वस्थ मनुष्य का जन्म संभव नहीं है। मनुष्य-जाति जिस कुरूपता और अपंगता में फंसी है, उसके मूलभूत कारण शिक्षा में ही छिपे हैं। शिक्षा ने प्रकृति से तो मनुष्य को तोड़ दिया है लेकिन संस्कृति उससे पैदा नहीं हो सकी है, उलटे पैदा हुई है--विकृति। इस विकृति को ही प्रत्येक पीढ़ी नई पीढ़ियों पर थोपे चली जाती है। और फिर जब विकृति ही संस्कृति समझी जाती हो तो स्वभावतः थोपने का कार्य पुण्य की आभा भी ले लेता हो तो आश्चर्य नहीं है। और जब पाप पुण्य के वेश में प्रकट होता है, तो अत्यंत घातक हो ही जाता है।

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

अजहू चेत गवांर-(पलटू दास)-प्रवचन-10

अनंत भजनों का फल : सुरित-प्रवचन-दसवां

दिनांक 30 जूलाई 1977, ओशो आश्रम पूना।

प्रश्नसार:
1-क्या भजन जब पूरा हो जाता है, तब जो शेष रह जाता है, वही सुरति है?

2-रामकृष्ण परमहंस अपने संन्यासियों को कामिनी और कांचन से दूर रहने के लिए सतत चेताते रहते थे। आप प्रगाढ़ता से भोगने को कहते हैं। इस फर्क का कारण क्या है?

3-जहां ज्ञानी मुक्ति या मोक्ष की महिमा बखानते हैं, वहां भक्त उत्सव और आनंद के गीत गाते हैं। ऐसा क्यों है?

4-आपने कहा कि तुम जो भी करोगे गलत ही करोगे, क्योंकि तुम गलत हो। ऐसी स्थिति में आप हमें साफ-साफ क्यों नहीं बताते कि हम क्या करें?