शिक्षा में क्रांति-ओशो
प्रवचन-ग्यारहवां
अशांति का बीजमंत्र
मेरे प्रिय आत्मन्!
वही विद्या है, जो
विमुक्त करे--‘सा विद्या या विमुक्तये।’
इस संबंध में ही थोड़ी सी बात आज की सुबह
मुझे आपसे कहनी है। बड़ा अदभुत है यह वचन। बड़ी मौलिक है यह परिभाषा। विद्या की
परिभाषा भी यही है और विद्या की कसौटी भी यही है। जो मुक्त करे, वही
विद्या है। लेकिन शायद, इसके दूसरे पहलू का आपको कोई खयाल न
हो? हम तो मुक्त नहीं हैं। तो जो विद्या हमने पाई है,
वह विद्या नहीं होगी, वह अविद्या होगी। हमारे
जीवन ने तो कोई मुक्ति नहीं जानी। तो जिन विद्यालयों में हम पढ़े, वे विद्यालय न होंगे, अविद्यालय होंगे। विद्या की तो
कसौटी और परिभाषा यही है कि जीवन मुक्ति के आनंद को उपलब्ध हो जाए।
लेकिन जिस विद्या से यह आनंद उपलब्ध न होता
हो, उस विद्या को क्या कहें? सारे जगत में विद्या तो
बढ़ती जाती है, विद्यालय बढ़ते जाते हैं, विद्यापीठ बढ़ते जाते हैं, विश्वविद्यालय बढ़ते जाते
हैं, लेकिन मनुष्य कोई मुक्त होता दिखाई नहीं पड़ता है। वरन
मनुष्य और भी बंधता जाता है, और भी जकड़ता जाता है, और भी नीचा गिरता जाता है।