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सोमवार, 14 नवंबर 2011

दी कन्‍फेशन्‍स ऑफ सेंट ऑगस्‍टीन-ओशो की प्रिय पुस्‍तकें

 दी कन्‍फेशन्‍स ऑफ सेंट ऑगस्‍टीन
संत अगस्‍तीन एक महान संत और बिशप था। जो सन 354 में न्‍यूमिडिया में पैदा हुआ जिसे अब अल्‍जीरिया कहते है।

अगस्‍तीन के पिता जमीदार थे। और पेगन (गैर-धार्मिक) थे। अगस्‍तीन की मां मोनिका का प्रभाव उन पर अधिक था। कन्‍फेशन्‍स में मोनिका का जिक्र बार-बार आता है। और कुछ परिच्‍छेद तो केवल उसी के बारे में है। मोनिका की बदौलत अगस्‍तीन ईसाई धर्म में शिक्षित हुआ। अगस्‍तीन एक मेधावी युवक था। इसलिए उसके पिता उसे वकील बनाना चाहते थे। वह जब अठारह साल का हुआ तो पिता ने उसे कार्थाज नामक एक बड़े शहर में उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए भेज दिया। लेकिन वहां पर उस मायावी नगरी के मोह जाल में फंस गया और एक स्‍त्री के साथ अनैतिक संबंध बना बैठा। यह संबंध पंद्रह साल तक चला। और उस स्‍त्री से उसे ऐ बैटा भी पैदा हुआ। जिसे अगस्‍तीन ‘’मेरे पाप का फल’’ कहते है। इस समय उनकी उम्र उन्‍नीस साल थी।


विख्‍यात दार्शनिक सिसेरो का ग्रंथ पढ़कर उनका चित भोग-विलास से हटकर दर्शन और स्‍वयं की खोज में संलग्‍न हुआ। किसी भी प्रामाणिक खोजी के भीतर जो सवाल मंडराते है। वे उनके भीतर भी उठे थे, पापा क्‍या है? पूण्‍य क्‍या है? यदि प्रेम पूर्ण और न्‍यायपूर्ण परमात्‍मा ने संसार की रचना की है तो यहां पाप पुण्‍य क्‍यों है? दु:ख क्‍यों है? उस समय उपलब्‍ध धार्मिक ग्रंथ ‘’दि ओल्‍ड टैस्टामैंट’’ में वे इनका जवाब ढूंढने लगे। लेकिन उस ग्रंथ की कहानियों में जो विरोधाभास था, उसमें वर्णित संत पुरूषों के जीवन में जो अनैतिकता का चित्रण था उसे पढ़कर अगस्‍तीन और भी उलझन में पड़ गये।

मिलन शहर में आकर उनका परिचय ईसाइयत के उच्‍चतर दर्शन में हुआ, जिसमें परमात्‍मा को से विश्‍वव्‍यापी चेतना के रूप में प्रस्‍तुत किया है। यह उन्‍हें ज्ञात हुआ कि परमात्‍मा आत्‍मा का ही उन्‍नत रूप है। और प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को उसे पाने का हक है। बशर्ते कि वह तपस्‍या की अग्‍नि से गूजरें। यहां से अगस्‍तीन की आध्‍यात्‍मिक अंतर् यात्रा शुरू हुई।

ईसाई धर्म में अपने अपराधों की स्‍वीकारोक्‍ति, प्रचलित है। चर्च में जाकर व्‍यक्‍ति अपने दुष्‍कर्मों की स्‍वीकारोक्‍ति, कन्फेशन्स कर प्रायिश्चत ले सकता है। इस छोटी सी किताब को इसी रूप में प्रस्‍तुत किया गया है। संत अगस्‍तीन ईश्‍वर को अपनी जीवनी सुनाते है। यह किताब उन्‍होंने सन 395 के बाद लिखी। तब वे बिशप बन चुके थे। और उनकी आयु लगभग 46 वर्ष की थी।

अगस्‍तीन के जीवन काल में ही इस किताब की ख्‍याति दूर-दिगन्‍त तक फैल गई। और शीध्र ही उसे ‘’न्‍यू टैस्टामैंट’’ के बाद सर्वाधिक प्रसिद्ध ईसाई लेखन का दर्जा मिला। ‘’कन्‍फेशन्‍स‘’ की मुद्रित प्रति सबसे पहले सन 1475 में लैटिन भाषा में प्रकाशित हुई।

अँगरेजी अनुवाद सर टॉ वी मैथ्यू ने किया जो 1620 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद ‘’कन्‍फेशन्‍स के कई अनुवाद हुए लेकिन सर मैथ्यू का अनुवाद बेजोड़ रहा। उनकी भाषा तथा अभिव्‍यक्‍ति की समृद्धि तथा प्राचीन लैटिन शब्‍दों के आशय को आधुनिक अंग्रेजी में रूपांतरित करने का कौशल अनूठा है।

किताब के नौ परिच्‍छेद है जो कि अगस्‍तीन की बृहत रचना ‘’रिट्रेक्‍टेशन्‍स’’ से अलग किये गये है। कुछ पन्‍ने है 254। इन ढाई सौ पन्‍नों में अगस्‍तीन बचपन से लेकर अपने जीवन के मुख्‍य प्रसंगों का वर्णन करते हुए अपने उन छोटे-मोटे पापों को प्रगट करते है जिनका बोझ उनकी छाती पर सवार है।

पूरी किताब किसी ‘’भक्‍ति सूत्र’’ की भांति प्रतीत होती है। सूरदास की मानिंद ‘’प्रभु जी तुम चंदन हम पानी’’ के अंदाज में अगस्‍तीन परमात्‍मा का स्‍तुतिगान करते है। इस भक्‍त के ह्रदय में समसामयिक समाज के प्रति विद्रोह की चिनगारी भी धधकती है। उन्‍हें स्‍कूल जाना, ग्रीक भाषा का गणित और व्‍याकरण सीखना और प्रवचन की कला सीखना बिलकुल पसंद नहीं है। अगस्‍तीन का कथन ह्रदय को छू लेता है। जब वे परमात्‍मा से कहते है कि मेरी सबसे पहली प्रार्थना यह थी: हे प्रभु कल स्‍कूल में मेरे शिक्षक मेरी पिटाई न करें।

आज इक्कीसवी सदी में हमें कन्‍फेशन्‍स पढ़कर बहुत आश्‍चर्य होता है। क्‍योंकि जिन्‍हें अगस्‍तीन पाप कह रहे है वह हमारी आम जिंदगी का हिस्‍सा हो गये है। पढ़ाई की उपेक्षा खेल कूद में अधिक रस लेते है। शिक्षकों या बुज़ुर्गों के प्रति मन में क्रोध होना, इन्‍हें आज कौन पाप कहेगा? लेकिन अगस्‍तीन इन छोटी-छोटी बातों के लिए क्षमा मांगता है।

उनके यौवन में तो वे वासना के ज्‍वार में डूब ही गये थे। लेकिन अपने धार्मिक संस्‍कारों के कारण वे उससे उबर भी गये। और उसके बाद एक निष्‍णात प्रवचनकर्ता और बिशप बन गये।

कन्‍फेशन्‍स का अंत उनकी मां की मृत्‍यु से होता है। मोनिका एक साध्‍वी थी और उसका अंत भी जीसस क्राइस्‍ट में निमज्‍जित होने के भाव को लेकर ही हुआ। मां की मृत्‍यु के बाद भी अगस्‍तीन फिर परमात्‍मा से अपने मानवीय दुःख शोक और मां के शरीर से जो लगाव था उसके लिए क्षमा मांगते है।

साधारणतया मनुष्‍य जिन क्षुद्र भावों को छुपाता है उन्‍हें अगस्‍तीन जैसा प्रतिष्‍ठित बिशप सरलता से प्रगत करता है। शायद इसी कारण यह छोटी सी किताब पंद्रह सौ साल तक ‘’बेस्‍ट सेलर’’ सर्वाधिक बिकनेवाली किताबों में से एक थी। अपने हर ज़ख़्मों को उघाड़ कर जमाने के सामने रख देना बड़ी ताकत और हिम्‍मत का काम है। सत्‍य के प्रति उनकी इसी निष्‍ठा ने अगस्‍तीन को संत बना दिया।



किताब की एक झलक:--

जैसे ही मेरे ह्रदय की गुह्म गहराइयों से दुःख का अंबार फट पडा। और मेरी आंखों के सामने उसका ढेर लग गया। एक प्रबल तूफान उभरा और उसके पीछे आयी आंसुओं की वर्षा। इस आशंका से कि मैं अभूतपूर्व चीख-पूकार से उन्‍हें प्रकट करूंगा। मैं अलिपियस के पास से उठ गया—क्‍योंकि इस रूदन प्रक्रिया के लिए मुझे एकांत की जरूरत थी। और मैं बहुत दूर चला गया। ताकि उसकी मौजूदगी मेरे लिए बाधा न बने। एक अंजीर के पेड़ के नीचे मैं गिर पडा और अपने आंसुओं को पूरी आजादी दे दी। और वे नदियों की भांति मेरी आंखों से बह निकले—तेरे लिए एक स्‍वीकार योग्‍य हवन, मेरे प्रभु। और मैं तुझे पुकारता रहा: कब तक है प्रभु। आखिर कब तक। क्‍या तुम हमेशा मुझसे खफा रहोगे? मेरी पुरानी अशुद्धियों का ख्‍याल मत करों।

मैं (बाय बल के) इन शब्‍दों से पुलकित था, इसलिए मैं ये उदगार कहता रहा—कब तक, कब तक? कल.....फिर अभी क्‍यों नहीं? इसी क्षण मेरी अशुद्धि का अंत क्‍यों नहीं कर देते? इस तरह कहते हुए मेरे ह्रदय के सबसे कड़वे दुःख में डूबा रोता रहा।

और आश्‍चर्य; मैंने एक आवाज सुनी। मानों कोई बालक या बालिका थी। नजदीक ही कहीं। गुनगुनाते हुए कह रही थी। ‘’उठाओ और पढ़ो’’ और तत्‍क्षण बदले हुए तेवर से मैं गौर से सोचने लगा कि क्‍या बच्‍चे किसी खेल में इन शब्‍दों को गुनगुनाते है; लेकिन मुझे याद नहीं आ सका की मैंने ऐसा कुछ सुना हो। फिर अपने आंसुओं की धारा को रोकते हुए मैं उठा और मैंने सोचा कि ईश्‍वर यही चाहता है। कि मैं धर्मग्रंथ का वह परिच्‍छेद पढ़ूं जो किताब खोलने पर अनायास खुलेगा। क्‍योंकि मैंने सुन रखा था कि कैसे एंटनी ने इत्तेफ़ाक से एक पृष्‍ट पढ़ने पर यह सोचा कि यह उसे दी गई चेतावनी है; मानो वह परिच्‍छेद उसी के लिए लिखा गया था--

‘’जा, तेरे पास जो भी है उसे बेच दे और गरीबों को बांट दे, और तुझे स्‍वर्ग की संपदा मिलेगी। तुम आओ और मेरे पीछे चलो।‘’

इस आदेश पर अमल करके वह फौरन तेरे में समा गया।

इसलिए शीध्रता से मैं वहां गया जहां अलिपियस बैठा था, क्‍योंकि मैंने एपॉसल की किताब वहां छुपा रखी थी। जब मैं वहां से उठा था। मैंने जल्‍दी से वह किताब उठाई उसे खोला और जहां मेरी नजर पड़ी वहीं से पढ़ना शुरू किया: ‘’न तो दंगे-फसाद में न शराब में, न तो व्‍यभिचार में उच्छृंखल आचरण में, न संघर्ष और ईर्ष्‍या में वरन अपने ध्‍यान को परमात्‍मा क्राइस्‍ट में केंद्रित करो। और मांस और उसकी सुख पूर्ति के लिए कुछ भी न करो।‘’

इसके आगे मैने नहीं पढ़ा, और न ही इसकी कोई जरूरत थी, क्‍योंकि इस वाक्‍य के समाप्‍त होते ही मेरे ह्रदय में एक सुस्‍पष्‍ट और अमिट रोशनी प्रगट हुई जिसमें मेरे पुराने संदेहों का अँधेरा छट गया।

फिर किताब को बंद करके उस पर एक उँगली रखकर मैंने शांत मुद्रा से अलिपियस को वह सब बताया जो घटा था। और उसने मुझे वह सब कहा जो उसके भीतर तरंगायित हुआ था। और जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था। फिर उसने मुझे वह अंश दिखाने के लिए कहा जो मैंने पढ़ा था। वह उससे आगे की पंक्‍ति पढ़ने लगा: और अब उसे अपने साथ ले चलो जिसका विश्‍वास कमजोर है।‘’ और यह संदेश उसने अपने आप पर लागू किय—और वैसा मुझे कहा भी। इस आदेश से उसे बहुत बल मिला और बिना किसी झंझट या विलंब से वह मेरे साथ हो लिया। हालांकि मेरे साथ उसके मतभेद थे लेकिन शुभ उद्देश्‍य और निश्‍चय के तले वे सब विलीन हो गये।

वहां से हम मेरी मां के पास गये, उसे पूरा वाकया सुनाया और वह आनंदित हुई। वह प्रसन्‍नता से नाच उठी और है प्रभु, उसने तुझे बहुत धन्‍यवाद दिया। तू जो कि उससे कर सकता है। जो हम मांगते है या सोचते है। अब उसको दिखाई दिया कि तुने मेरे बारे में इतना अधिक दिया है जितना वह अपनी उदासी और दुखभरी प्रार्थनाओं में भी नहीं मांग सकती थी। क्‍योंकि तूने मुझे इस कदर तेरे प्रति समर्पित कर लिया कि अब मैं इस जगत की कोई महत्वाकांक्षा या पत्‍नी इत्‍यादि की चाहत ही नहीं कर सकता। विश्‍वास के नियम पर मेरे पाँव जमाकर तूने उसे दिखा दिया है कि मुझे कहां खड़ा होना चाहिए।

इस तरह तूने उसके शोक को आनंद में बदल दिया—इतना ओतप्रोत जितना कि उसने सोचा भी नहीं होगा: इतना निर्मल और विशुद्ध जितना कि मेरे जैसे बेटे के भीतर उसे मिलना मुश्‍किल था।



ओशो का नजरिया--

अगस्‍तीन पहला आदमी है जिसने अपनी जीवनी निर्भीकता से लिखी है। लेकिन वह दूसरी अति पर चला गया। अपनी किताब ‘’कन्‍फेशन्‍स’’ में अगस्‍तीन बहुत ज्‍यादा क्षमा याचना करता है—उन पापों के लिए भी जो उसने किये भी नहीं—सिर्फ स्‍वीकारोक्‍ति के आनंद के लिए। दुनिया को यह कहने का आनंद, कि ऐसा एक भी पाप नहीं है जो मैंने नहीं किया है। आदमी जो भी पाप कर सकता है वे मैंने सब किये है।‘’

यह सच नहीं है, कोई आदमी सभी पाप नहीं कर सकता। ईश्‍वर भी नहीं। ईश्‍वर का क्‍या कहना है। शैतान भी सोचने लगता है कि अगस्‍तीन जिन पापों की माफी मांग रहा है उनका मजा कैसे लिया जाये।

अगस्‍तीन ने अतिशयोक्ति की। यह संतों की आम बीमारी है। वे हर बात को बढ़ा-चढ़ा कर बोलते है—उनके पापों को भी; ताकि उसके बाद वह आपने पूण्‍य को भी बढ़ा चढा कर बात सके। यह कहानी का दूसरा हिस्‍सा है। अगर तुम अपने पापों की अतिशयोक्‍ति करते हो तो उसकी पृष्‍ठभूमि में छोटे से पुण्‍य भी बहुत बड़े बहुत रोशन मालूम होंगे। वे स्‍याह बादल बिजली को अधिक प्रगट करते है। पाप किये बगैर तुम संत नहीं बन सकते। जितने बड़े पाप, उतना बड़ा संत, सीधा गणित है।

फिर भी मैं इस किताब को अपनी मन पंसद किताब में शामिल करता हूं, क्‍योंकि यह बड़ी खूबसूरती से लिखी गई है। मैं ऐसा आदमी हूं—कृपा करके इसे दर्ज करो—अगर झूठ भी खूबसूरत हो तो मैं उसके सौंदर्य के लिए उसकी तारीफ करूंगा। उसके झूठ के लिए नहीं, कौन फ्रिक करता है वह झूठ है या नहीं। लेकिन उसकी सुंदरता उसे पढ़ने का आनंद देती है।

कन्‍फेशन्‍स झूठों का श्रेष्‍ठतम कृति है। लेकिन इस आदमी ने अपना काम बेहतरीन ढंग से किया है। निन्यानवे प्रतिशत सफल हुआ है। उसके बाद कइयों ने कोशिश की—टालस्‍टाय ने भी, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। अगस्‍तीन उससे बेहतर साबित हुआ।

ओशो

बुक्‍स आय हैव लव्‍ड