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सोमवार, 21 नवंबर 2011

’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

मानव जीवन की एक गहरी समस्या, आत्‍महत्‍या को कामू ने जिस सौंदर्य बोध के साथ और नाजुकता से प्रगट किया है शायद ही किसी लेखक या दार्शनिक ने किया हो
      इस बार हम जिस किताब का परिचय आपको दे रहे है वह किताब नहीं, एक निबंध मात्र है। यह निबंध प्रसिद्ध अस्‍तित्‍ववादी लेखक आल्‍बेर कामू की पुस्‍तक ‘’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ में संग्रहीत है। यह किताब कामू ने एब्‍सर्डिटी, तर्कातीत या जीवन का जो अतर्क्‍य घटना हे जो सिर्फ मनुष्‍य के साथ घटती है। पूरी सृष्‍टि में मनुष्‍य अकेला प्राणी है जो अपने आपको मारता है। बाकी सारे प्राणी या तो अपने आप मर जाते है या दूसरों को मारते है। निश्‍चित ही यह घटना एब्‍सर्ड जो है और इस पर विचारशील लोगों को चिंतन करना चाहिए।

      ‘’मिथ ऑफ सिसिफस’’ की भूमिका में कामू लिखता है: ‘’यह स्‍वाभाविक और आवश्‍यक है कि हम जीवन के अर्थ पर चिंतन करें। इसलिए आत्‍महत्‍या के प्रश्‍न का सामना करना जरूरी है। हम ईश्‍वर में विश्‍वास करें या न करें, आत्‍महत्‍या योग्‍य नहीं है। जीवन एक निमंत्रण है जीने का, सृजन का।‘’
      इस किताब को अपनी मनपसंद किताबों में शामिल करते हुए ओशो केवल सिसिफस की कहानी कहते है।
      यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि वे केवल सिसिफस के निबंध को शामिल करना चाहते है या कामू की पूरी किताब को। जो भी हो, हम एक निबंध के बहाने किताब के रत्‍न भंडार में प्रवेश कर ही चूके है। तो इसमे छपे हुए कामू के अन्‍य निबंधों का जायजा लेने से क्‍यों चूकें। आल्बेर कामू एक उत्‍कृष्‍ट लेखक है। वह विचारक है इसलिए उसका लेखन अर्थगर्भित होता है। उसकी लेखन शैली का सौंदर्य उसे विचारों के आभूषण बनाकर पाठकों का मन मोह लेती है।
      मानव जीवन की एक गहरी समस्‍या आत्‍महत्‍या को कामू ने जिस सौंदर्य बोध के साथ और नाजुकता से प्रगट किया है शायद ही किसी लेखक या दार्शनिक ने किया हो।
      सबसे पहला निबंध है, ‘’अतर्क्‍य तर्क, ऐन एब्‍सर्ड रीज़निंग’’ वह कहता है, आत्‍महत्‍या एक सामाजिक और कानूनी दुर्घटना बन जाती है। लेकिन आत्‍महत्‍या बहुत ही निजी व्‍यक्‍तिगत मामला है। आदमी जितनी त्‍वरा और तीव्रता से जीना चाहता है उतनी ही तीव्रता से मरना चाहता है। यह उसके जीवन के प्रति प्‍यार का ही एक रूप है। आत्‍महत्‍या का ख्‍याल तो ह्रदय की गहन खामोशी में जन्‍मता है। जीना मनुष्‍य की एक आदत बन गई है। इस आदत को तोड़ने के लिए एक ख्‍याल उसके भीतर आता है आत्‍म हत्‍या का। यहीं उसने उठाया हुआ एक सजग, सचेत कदम है। आत्‍महत्‍या करने का निर्णय यहीं दर्शाता है कि आपने उस आदत को तोड़ने का निर्णय लिया, क्‍योंकि जीने के लिए आपके पास कोई ठोस वजह नहीं है। आत्‍महत्‍या करने का मतलब यह है कि आपने स्‍वीकार कर लिया कि जीवन बोझिल हो गया है। या आप उसे समझ नहीं पा रहे है। लेकिन अपने जीवन को समाप्‍त करना सिर्फ मन का निर्णय नहीं हो सकता। उसमें शरीर भी शामिल है। शरीर से पूँछें तो प्रत्‍येक शरीर जीना चाहता है। जिंदगी जो कि सतत मौत की और भाग रही है। उसमे शरीर अपनी जड़ें जमाकर जीवन का उत्‍सव मना रहा है।
      दस निबंधों का संग्रह है और ये सभी निबंध एब्‍सर्डिटी को उजागर करते है। कामू का निबंध पढ़ने के बाद पाठक आत्‍महत्‍या और अतर्क्‍य पर सोचने के लिए विवश हो जाता है। और यहीं उसके विचार है। ये निबंध 1938-40 में लिख गये है। इसलिए तत्‍कालीन समय दार्शनिक गंभीरता और अस्‍तित्‍ववादी चिंतन इनमें भरपूर प्रतिबिंबित होता है। नीत्से, सार्त्र, शॉपेन हॉर, काफ्का, कामू इन सबके प्रखर बुद्धिवाद का साक्षात होने के बाद पता चलता है कि ईश्‍वर को क्यों मरना पडा। कामू से सहमत हुए बिना हम नहीं रह सकते कि ईश्‍वर का होना मानवीय बुद्धि का अपमान है।

किताब की एक झलक--
      में सिसिफस को पहाड़ की तलहटी में छोड़ देता हूं। आदमी अपना बोझ फिर खोज लेता है। लेकिन सिसिफस श्रेष्‍ठ दरजे की निष्‍ठा सिखाता है जो देवताओं को नकारती है और पत्‍थरों को प्रतिष्‍ठा देती है।
      देवताओं ने सिसिफस को पहाड़ की चोटी पर एक चट्टान को ले जाने की सज़ा दी थी। उसमें खूबी यह थी कि जब भी वह चट्टान शिखर पर ले जाता, तब वह अपने ही वज़न से नीचे लुढ़क जाती। देवताओं ने सोचा होगा कि किसी कारणवश व्‍यर्थ और निष्‍फल परिश्रम से बढ़कर कोई सज़ा नहीं हो सकती।
      यदि हम होमर (महान ग्रीक लेखक) में विश्‍वास करना चाहते  है तो सिसिफस मर्त्‍य मानवों के बीच सबसे समझदार और विवेकशील इंसान था। एक अन्‍य परंपरा के अनुसार उसे राहजनी का धंधा करने के लिए कहा गया था। मुझे इसमें कोई विरोधाभास नजर नहीं आता। वह पाताल में एक निष्‍फल मजदूर क्‍यों हुआ इस पर कई मत हो सकते है। लेकिन देवताओं के हिसाब से उस पर ये इल्‍जाम था कि वह बड़ा हल्‍का-फुलका है। वह उनके रहस्‍य चुराता था। इसोपस की कन्‍या एजिना को जुपिटर भगाकर ले गया था। उसके पिता को गहरा सदमा लगा और उसने सिसिफस से शिकायत की।
      उसने एक शर्त पर यह बात प्रकट करने का वादा किया कि इसोपस कोरित की नगरी को जल स्‍त्रोत उपलब्‍ध करवाएगा। उसके लिए उसको सज़ा दी गई। होमर कहता है कि सिसिफस ने मृत्‍यु को ज़ंजीरों में जकड़ दिया था। जो कि प्लूटो को साम्राज्‍य था और प्‍लूटो अपने सुनसान और वीरान साम्राज्‍य के दृश्‍य को बरदाश्त नहीं कर सका और उसने युद्ध के देवता को भेज कर मृत्‍यु देवता को सिसिफस के हाथों से मुक्‍त करवाया। ऐसा कहा जाता है कि सिसिफस जो कि मौत के करीब था, अपने पत्‍नी के प्रेम को अनुभव करना चाहता था।
      उसने पत्‍नी को आदेश दिया कि उसकी लाश को सार्वजनिक चौराहे पर फेंक दे। सिसिफस की आँख खुली तब वह पाताल में था। वहां पर जो अनुशासन था वह मनुष्‍य लोक से इतना भिन्‍न था कि उससे झुंझला कर सिसिफस ने प्लूटो से इजाजत ली कि वह धरती पर आकर जब उसने सूरज और पानी, पत्‍थरों की ऊष्‍मा और समुंदर को अनुभव किया तो वह फिर से अंतहीन अंधकार में जाना नहीं चाहता था। पाताल से आये हुए बुलावे, क्रोध के इशारे, चेतावनी—सब बेकार साबित हुआ। कई साल तक वह समुंदर का किनारा और समुंदर के पानी की चमक और धरती की मुसकानों का आनंद लेता रहा। अब देवताओं को फतवा जरूरी था। बुध (मरक्यूरी) आया और इस उदंड शख्‍स का कॉलर पकड़कर घसीटता हुआ उसे पुन: पाताल में ले गया, जहां चट्टान उसका इंतजार कर रही थी।
      आप समझ ही गये है कि सिसिफस एक एब्‍सर्ड, अतर्क्‍य हीरो है। यह सही है—अपनी वासनाओं की वजह से और यातनाऔ की वजह से। देवताओं का तिरस्‍कार, मृत्‍यु से द्वेष से और जीवन से लगाव—इन सबकी अमानवीय सज़ा मिली जिसमे उसका पूरा अंतरतम एक निष्‍फल प्रयास में लगा रहता है।
      धरती के प्रेम में जो पागल है उसे अपने प्रेम की यह कीमत चुकानी पड़ती है। पाताल लोक में सिसिफस क्‍या करता रहा इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। खैर, मिथक बनते ही इसलिए है कि हमारी कल्‍पनाएं, उनमें प्राण फूंक दें।
      जहां तक इस मिथक का संबंध है हम इतना ही देखते है कि एक थका-मांदा शरीर एक चट्टान को लुढ़काते हुए पहाड़ पर ले जा रहा है—हजार बार। चेहरा खिंचा हुआ, गाल चट्टान के करीब तने हुए, कंधे मिट्टी से सने हुए उस सघनता को ठेलते हुए, पैर जोर लगाते हुए, हाथ फैले हुए—मिट्टी से भरे हुए उन दो हाथों की मानवीय सुरक्षा। उसके प्रदीर्घ प्रयास के अंत में उसके लिए मौजूद है बिना आकाश का अवकाश और बिना गहराई का समय। वहां से सिसिफस उस चट्टान को लुढ़काते हुए खाई में गिरता देखता है, जहां से उसे फिर ऊपर ले आना है। वह घाटी में उतर जाता है।
      इस वापसी में, इस अंतराल में मुझे सिसिफस बहुत आकर्षित करता है। जो चेहरा पत्‍थरों के साथ इतनी घनिष्‍ठता से काम करता है वह खुद पत्‍थर ही हो जाता है। मैं उस आदमी को बोझिल और नपे हुए डग भरते हुए, उस यातना तक पहुंचते हुए देखता हूं, जिसका कोई अंत नहीं होगा। वह समय जो सांस के अंतराल की तरह है। उसकी पीड़ा लौट आती है। वह चेतना का समय है। उन क्षणों में जब वह ऊँचाइयों को छोड़कर धीरे-धीरे देवताओं के विश्राम गृह की तरफ बढ़ता है तब वह अपनी तकदीर से श्रेष्‍ठतर होता है; वह उस चट्टान से अधिक शक्‍तिशाली होता है।
      अगर यह मिथक दुखांत है तो वह इसलिए कि उसका नायक सजग है। अगर हर कदम पर सफलता की आशा उसकी रीढ़ में जागती है तो उसकी यातना कहां तक बचेगी। आज का मजदूर अपने क्षेत्र में जिंदगी भर वहीं-वहीं काम करता रहता है, और उसकी तकदीर उससे तकदीर इससे कम बेतुकी नहीं है। लेकिन वह उन विरल क्षणों में दुखद होती है। जब वह सजग होता है। सिसिफस देवताओं का मजदूर, शक्‍तिहीन और विद्रोही, अपनी दयनीय हालत का पूरा लेखाजोखा जानता है। शिखर से उतरते समय वह यही सोचता रहता है। जो तरलता उसकी यातना का हिस्‍सा है, उन क्षणों में विजय का सरताज बनता है। ऐसी कोई किस्‍मत नहीं है जिसके आसपास तिरस्‍कार नहीं हो सकता।
      अगर नीचे उतरना दुखभरा होता है तो कभी-कभी सुखद भी हो सकता है। मैं फिर कल्‍पना करता हूं कि सिसिफस अपनी चट्टान के पास लौट आया। और शुरू में वह दुःखी था, लेकिन जब धरती के चित्र स्‍मृति को जकड़ लेते है, जब सुख की पुकार अत्‍यधिक प्रबल होती है। तब मनुष्‍य के ह्रदय में उदासी होती है। यही चट्टान की विजय है, तब मनुष्‍य के ह्रदय में उदासी होती है—यही चट्टान की विजय है। यही चट्टान है। असीम दुःख को सहना दूभर है। टुकड़े-टुकड़े हुए सत्‍यों को देखते ही वे नष्‍ट हो जाते है। इसी तरह ईडीपस प्रारंभ में अपनी किस्‍मत को स्‍वीकार कर लेता है। बिना यह जाने की यह क्‍या है और जैसे ही वह जानता है, उसकी शोकान्‍तिका शुरू हो जाती है। साथ ही अंधा और हताश, वह जानता है कि उसे और संसार से जोड़ने वाला जो एक सुत्र है वह है, एक स्‍त्री का हाथ।
      अगर एब्‍सर्ड अतर्क्‍य को खोजना हो तो सुख पर ग्रंथ लिखे बिना नहीं हो सकता। आखिर विश्‍व एक ही है। सुख और अतर्क्‍य एक ही पृथ्‍वी के पुत्र है, उन्‍हें अलग नहीं क्या जा सकता। यह कहना गलत होगा कि सुख अतर्क्‍य की खोज से पैदा होता है।
      ऐसा भी होता है कि अतर्क्‍य का भाव सुख से पैदा होता है। ईडीपस कहता है, ‘’मैं निष्‍कर्ष निकालता हूं कि सब कुछ ठीक है।‘’ और यह वक्‍तव्‍य पवित्र है। वह मनुष्‍य के अनिर्बन्‍ध और सीमित ब्रह्मांड में गूंजता है। वह लिखता है कि सब कुछ समाप्‍त नहीं हुआ। इस विश्‍व के बाहर वह एक देवता को खदेड़ता है जो उसमे एक असंतोष लेकिर आया था। और व्‍यर्थ की यातना भुगतना चाहता था। वह वाक्‍य किस्‍मत को एक मानवीय मामला बनाता है जिसे मनुष्‍यों के बीच निपटारा करना चाहिए।
      सिसिफस की सारी खामोश खुशी इसी में निहित है। उसकी किस्‍मत उसी का हिस्‍सा है। उसकी चट्टान भी उसकी है। उसी तरह अतर्क्य मनुष्‍य जब अपने संत्रास पर चिंतन करता है तब सभी प्रतिमाओं को चुप करा देता है। और विश्‍व जब अपनी मूल खामोशी को उपलब्‍ध होता है तब पृथ्‍वी के असंख्‍य स्‍वर बोल उठते है। अवचेतन, रहस्‍यम पुकार, सभी चेहरों से निकलते हुए निमंत्रण एक आवश्‍यक पिछड़ना है और विजय की कीमत है। ऐसा कोई सूरज नहीं है जिसकी छाया न पड़ती हो। और रात को जानना भी जरूरी है। अतर्क्‍य मनुष्‍य, ‘’हां’’ कहता है, और उसके प्रयत्‍न अबाध रहेंगे। यदि व्‍यक्‍तिगत किस्‍मत है, तो फिर कोई उच्‍चतर किस्‍मत भी है। या हो भी, तो ऐसी जिसे वह अटल और तिरस्‍कार योग्‍य समझता है। बाकी समय के लिए वह स्‍वयं को अपने दिनों का स्‍वामी जानता है। उस महीने क्षण में जब इन्‍सान पीछे मुड़कर अपनी जिंदगी पर नजर डालता है, उस महीन क्षण में, जब इंसान पीछे मुड़कर  कर अपनी जिंदगी पर नजर डालता है। सिसिफस अपनी चट्टान की और लौटता हुआ सोचता है उन सारे बिखरे-बिखरे कृत्‍यों के बारे में जो उसकी किस्‍मत बन गये। उसकी स्‍मृति की आँख उन सबको जोड़ती है और जल्‍दी ही उसकी मृत्‍यु उसको सील कर देगी। चट्टान फिसलती ही रहती है।
      मैं सिसिफस को पहाड़ की तलहटी में छोड़ देता हूं। आदमी अपना बोझ फिर खोज लेता है। लेकिन सिसिफस श्रेष्‍ठ दरजे  की निष्‍ठा सिखाता है। जो देवताओं को नकारती है और पत्‍थरों को प्रतिष्ठा देती है। वह भी यही मानता है कि सब कुछ ठीक है। उसे यह विश्‍व न तो मुर्दा प्रतीत होता है। न निरर्थक। उस चट्टान का प्रत्‍येक अणु, अंधकार भरे पर्वत का एक-एक कतरा एक विश्‍व है। ऊँचाइयों पर चढ़ने के लिए किया जानेवाला संघर्ष ही मनुष्‍य के ह्रदय को आपूर करने के लिए काफी है। हम कल्‍पना कर सकते है। कि सिसिफस खुश है।
ओशो का नजरिया:--
      आठवीं किताब है, कामू की ‘’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ मैं तथाकथित अर्थ में कोई धार्मिक व्‍यक्‍ति नहीं हूं, मैं अपने ढंग का धार्मिक व्यक्ति हूं। इस कारण लोग आश्‍चर्य करते है कि मैं क्‍यों उन किताबों की बात कर रहा हूं, जो धार्मिक नहीं है। वे धार्मिक है, परन्‍तु तुम्‍हें इन किताबों में गहरे उतरना होगा तब तुम उनमें धार्मिकता पाओगे। ‘’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ एक पौराणिक कथा है। कामू ने इसका अपनी पुस्‍तक के लिए उपयोग किया है। मैं तुम्‍हें इसके बारे में बताता हूं।
      सिसिफस जो कि एक देवता था उसे स्‍वर्ग से निष्कासित कर दिया गया था। क्‍योंकि उसने परमात्‍मा का कहना मानने से इनकार कर दिया। उसे दंड दिया कि उसे एक बड़ी चट्टान घाटी से उठाकर शिखर पर पहुंचना है और शिखर इतना संकरा था कि जब भी वह चोटी पर पहुंचकर चट्टान को नीचे रखता, वह फिर नीचे लुढक जाती। सिसिफस वापस हांफता-कांपता पसीने से तरबतर घाटी में जाता है और फिर चट्टान उठाता है, यह जानते हुए की चट्टान फिर लुढ़क जायेगी। परन्‍तु वह क्‍या कर सकता था?
      यह आदमी की पूरी कथा है। इसलिए मैने कहा कि जरा तुम गहरे उतरोगे तो इसमे तुम धर्म पाओगे। यह हालत है आदमी की और हमेशा से ऐसी ही रही है। तुम क्‍या कर रहे हो? और सभी क्‍या कर रहे है? एक चट्टान को उठा रहे हो, उसे बिन्‍दु तक जहां से वह पुन: उसी घाटी में लुढ़क जाएगी। संभवतया हर बार ओर ज्‍यादा गहरे में, और हर सुबह नाश्ता करने के बाद तुम फिर उठाना शुरू कर दोगे, वह जानते हुए भी कि यह पुन: लुढक जाएगी।
      यह पौराणिक कथा बहुत प्‍यारी है। कामू ने इससे पुन: परिचित कराया है। वह एक धार्मिक व्‍यक्‍ति था, सच तो यह है कि वह असली यथार्थ वादी था। जां पाल सार्त्र नहीं था परन्‍तु वह प्रसिद्धि के पीछे भाग नहीं रहा था, इस कारण वह कभी सामने नहीं आया।
      वह चुप रहा, चुपचाप लिखता रहा। और चुपचाप मर गया। बहुत से लोग यह नहीं जानते है कि वह मर गया। वह इतना शांत व्‍यक्‍ति था—परन्‍तु जो उसने लिखा है, ‘’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ वह बहुत ही भावपूर्ण है। ‘’दि मिथ ऑफ सिसिफस’’ एक महानतम कलात्‍मक कार्य है।
ओशो
बुक्‍स आई हैव लव्‍ड