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रविवार, 27 नवंबर 2011

थियोलॉजिया मिस्‍टिका: संत डियोनोसियस (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

थियोलॉजिया मिस्‍टिका—एलन वॉटस
     अगर ‘’गागर में सागर’’ इस मुहावरे का सही इस्‍तेमाल करना हो तो वह इस छोटी सी पुस्‍तिका के लिए किया जा सकता है। इतने थोड़े से शब्‍दों में इतना गहरा आशय भर देना, जैसे एक-एक शब्‍द अणु बम हो, एक रहस्‍यदर्शी ही कर सकता है।
      ग्रीक रहस्‍यदर्शी डियोनोसियस के वचनों ने यही कमाल कर दिखाया है। इसीलिए ओशो न उन वचनों के अपने प्रवचनों के काबिल समझा। डियोनोसियस पर दिये गये ओशो के प्रवचनों की किताब उसी नाम से प्रकाशित है। और डियोनोसियस को उन्‍होंने अपनी मनपसंद किताबों में भी सम्‍मिलित किया है।

      पूरी किताब कुल 20 पन्‍नों की है। उसमें दस पन्‍नों में सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखक एलन वॉटस की पठनीय भूमिका है। और दस पन्‍नों में डियोनोसियस के पाँच संक्षिप्‍त आलेख है। यह किताब इतनी दुर्लभ है कि आम दुकानों में मिलनी मुश्किल है। अंत: मैंने ओशो के निजी पुस्‍तकालय की शरण ली। और जो हाथ में आया वह अद्भुत था। किताब के आखिरी पृष्‍ठ पर ओशो ने अपने हाथों से बनायी हुई उनके प्रवचनों की रूपरेखा है। वह इस प्रकार है:
      डियोनोसियस: संत डियोनोसियस और टिमोथी के वचनों पर।
      पाँच सूत्र। हर सूत्र के बाद दो दिन प्रश्‍न-उत्‍तर। कुल पंद्रह प्रवचन।
      दिनांक: 11 अगस्‍त से 25 अगस्‍त, 1980।
      इससे हमें यह पता चलता है कि ओशो अपनी किताबें किस प्रकार संयोजित करते थे।
      एकल वॉटस अपनी भूमिका में लिखता है कि ईसाइयत की धारा में रहस्‍यवाद का खिलना एक विरोधी स्‍वर की भांति देखा जात था। जबकि विरोधाभास यह है कि स्‍वयं जीसस एक रहस्‍यदर्शी थे, उन्‍होंने परमात्‍मा के साथ मिलन को अनुभव किया था। लेकिन उनके आसपास उनके बाद जो धर्म बना वह रहस्‍यवाद का घोर विरोधी था।
      चर्च के धर्मगुरू जीसस के जीवन के करिश्‍मे बताकर लोगों को प्रभावित तो करते रहे लेकिन वे करिश्‍मे चेतना के जिस तल से प्रगट हुए वहां तक पहुंचने के लिए लोगों को इजाजत नहीं थी।
      ईसाइयत उसके मूल स्‍त्रोत: जीसस से बिछुड़ गई। ओर एक नैतिक संगठन बन गई जो अपराध भाव पर खड़ा था—जीसस को सूली देने का, उस जैसे, महान न बनने का अपराध भाव। तथापि ईसाई जगत में जो रहस्‍यवाद फला फूला, वह ग्रीक भाषा से अनुवादित डियोनोसियस के चंद पन्‍नों के कारण जो ‘’थियोलॉजिया मिस्‍टिका’’ नाम सक प्रसिद्ध हुए। वह संभवत: एथेन्‍स का पहला विशप था जिसका वजू—(बायबल) में उल्‍लेख किया गया। यही उल्‍लेख था जिसकी वजह से मध्‍ययुगीन धर्म वैज्ञानिकों की नजरों में डियोनोसियस की महिमा बढ़ गई। सेंट थॉमस के वचनों में ही इन वक्‍तव्‍यों को सम्‍मिलित किया गया था।
      जहां ईश्‍वर को लकड़ी और पत्‍थर की मूर्तियों की शक्‍ल में पूजा जाता था वहां उसे महज एक निराकार शून्‍य बताना धार्मिक अपराध ही था। लेकिन अब, बीसवीं सदी में, डियोनोसियस जैसों के रहस्‍यवाद को समझने का माहौल बन गया। उसकी एक वजह यह भी है कि पश्‍चिम अब एशियाई संस्‍कृति और अध्‍यात्‍म से परिचित होने लगा है।
      डियोनोसियस की तह में उतरना हो तो हमें समझना चाहिए कि वह दो तरह की धार्मिक भाषा का प्रयोग करता है। एक ईश्‍वर के संबंध में—जैसे, ईश्‍वर प्रकाश है, आनंद है। शक्‍ति है इत्‍यादि। लेकिन ये सब उपमाएं है। सीधे ‘’ईश्‍वर क्‍या है’’ इसे कहा नहीं जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे संगीत क्‍या है इसका वर्णन किया नहीं जा सकता। दूसरा प्रयोग है, ‘’नेति-नेति’’ जो उपनिषदों ने क्या है। ईश्‍वर क्‍या नहीं है। यह कहना अधिक सरल है। बजाय उसके कि वह क्‍या है।
      फिर डियोनोसियस, और उसके पश्‍चात सेंट थॉमस, स्‍पष्‍ट करते है: ‘’हमें नकारात्‍मक ढंग से ही चलना चाहिए क्‍योंकि ईश्‍वर इतनी विराट सत्‍ता है कि हमारी बुद्धि की एक भी धारणा उससे मेल नहीं खा सकती। जैसे पत्‍थर में छिपी हुई मूर्ति को प्रगट करने के लिए अनावश्‍यक पर्तों को हटाना पड़ता है। फिर मूर्ति अपने आप प्रगट हो जाती है। वैसे ही ईश्‍वर के आसपास की कल्‍पनाओं को हटाना पड़ता है। फिर वह तो है ही—लेकिन सोच-विचार का विषय नहीं, अनुभव का विषय है।
      डियोनोसियस के वक्‍तव्‍य कुछ इस गुणवत्‍ता के है कि लगता है, भारतीय अध्‍यात्‍म से उनका परिचय रहा होगा। ‘’प्‍लॉटिनस (इ.स.242) पंजाब आया था। सीरिया और भारत के बीच व्‍यापार संबंध थे। भारतीय साधु अलेक्‍झांड्रिया और रोम जाते थे। ‘’थियोलॉजिया मिस्‍टिका’’ के अंतिम परिच्‍छेद में मांडूक्य उपनिषाद प्रतिध्‍वनित होता है।
      ब्रह्म का वर्णन करते हुए डियोनोसियस कहता है: ‘’जो उसे समझ नहीं पाते वे ही समझ सकते है। जो समझते है, वे जानते ही नहीं।‘’
      जो कल्‍पना करते है वह उसकी कल्‍पना नहीं कर सकते। जो उसे नहीं समझते वे ही जान सकते है।‘’
      रहस्‍यवाद हमें इसलिए बेबूझ लगता है क्‍योंकि पश्‍चिम से प्रभावित तार्किक बुद्धि, ‘’मौन, शून्‍यता, नकारात्‍मक कथन अक्रिया।‘’ इस सब से भयभीत है। आधुनिक आदमी निरंतर शोरगुल करता रहता है। संसार में तो करता ही है लेकिन आस्‍तित्‍व के करीब जाकर भी उसे चुप रहना नहीं आता।
      इसलिए डियोनोसियस जब कहता है: ‘’उसे न देखते हुए, न जानते हुए हम देख और जान सकते है। जो दृष्‍टि और ज्ञान के पास है।‘’ तो आधुनिक मनुष्‍य उसे समझ नहीं पाता। यह विरोधाभास ही अस्‍तित्‍व ही बुनियाद है।
किताब की एक झलक:
      यह आलेख संत डियोनोसियस ने टिमोथी को संबोधित किया है।
      हे अस्‍तित्‍व के पार की त्रिमूर्ति, ईसाइयों की परिपूर्ण प्रज्ञा के रक्षक और उनके पालक देवताओं, हमें रहस्‍यपूर्ण साक्षात्‍कार की ऊँचाइयों पर ले जाओं। जो समस्‍त विचार और प्रकाश से  ऊपर है: जिस मौन के चमकीले अंधकार में, जो एकांत में प्रकट होता है। दिव्‍य सत्‍य के सरल, आत्‍यंतिक और अपरिवर्तनशील रहस्‍य छिपे हुए रहते है।
      यह अंधकार यद्यपि गहन रूप से दुर्भेद्य है, दैदीरूयमान रूप से स्‍पष्‍ट है। और यद्यपि वह स्‍पर्श और दृष्‍टि के परे है, वह हमारे अंधे मस्‍तिष्‍कों को भावतित सौंदर्य से भर देता है।
      यह मेरी प्रार्थना है। और तुम्हारे लिए, प्‍यारे टिमोथी—तुम रहस्‍यमय ध्‍यान में श्रम करते हुए, इंद्रियों का त्‍याग करो। बुद्धि की गतिविधि को, जो भी महसूस किया जाता है और जाना जाता है, और जो नहीं है, और है, उसे भी छोड़ दो। इस तरह तुम अनजाने में उसकी अखंडता को उपलब्‍ध होओगे जो सभी अस्‍तित्‍व और ज्ञान के पार है। इस तरह, सब चीजों से अदम्‍य, परम और विशुद्ध विराग पाकर तुम दिव्‍य अंधकार की उस उज्‍जवलता तक उठोगे जो अस्‍तित्‍व के पार है और सबसे श्रेष्‍ठ और स्‍वतंत्र है।
     
ओशो का नजरिया:
      ईसाइयत ने रहस्‍यवाद की सारी संभावनाएं नष्‍ट कर दीं। उसकी यातनाऔ से बचने के दो ही उपाय थे: एक था, या तो भूमिगत हो जाओ या किसी रेगिस्‍तान या पहाड़ों में चले जाओ; या फिर दूसरी संभवना यह थी कि बाहर से औपचारिक ईसाई बने रहो, ईसाई भाषा का उपयोग करो और तुम्‍हारा आंतरिक काम चुपचाप करते रहो।
      डियोनोसियस ने ही किया। तुम्‍हें सुनकर आश्‍चर्य होगा कि वह एथिक्स का पहला बिशप था। अद्भुत बुद्धिमान आदमी रहा होगा वह। एथिक्स का बिशप बने रहना, और फिर भी बुद्ध, लाओत्से और जुरतुस्‍त्र की भांति जीवन के गहनत्म रहस्‍यों को भेदना.....उसकी बुद्धिमता विरली होगी। वह मुखौटा ओढने में सफल रहा। उसने ईसाई संगठन को धोखा दिया।
      उसके वचन तब तक प्रकाशित नहीं हुए जब तक वह जिंदा था। उसने इस तरह चाल चली कि उसके मरने के बाद ही उसका लेखन प्रकाशित हुआ। ऐसा न होता तो वह चर्च के द्वारा सताया जाता और उस पर मुकदमा चलाया जाता। और जो समझदार है, आत्मघाती नहीं है, वह अकारण यंत्रणा सहन नहीं करेगा। यदि जरूरी हो तो वह चुनौती स्‍वीकार करेगा, लेकिन वह उसकी तलाश नहीं कर रहा है।
      डियोनोसियस विरल आदमी है। मूढ़ ईसाइयत और उसके कठोर संगठन के साथ रहकर बिशप होकर भी चेतना के अंतिम शिखर को छूना क़ाबिले तारीफ है। इससे पहले कि हम इन सूत्रों में प्रवेश करें कुछ बातें समझ लेने जैसी है।
      एक: ये सूत्र डियोनोसियस के एक शिष्‍य टिमोथी को लिखे गये पत्र है। जो भी श्रेष्‍ठ है, परवर्ती है, वह सिर्फ शिष्‍यों से कहा जाता है—उनसे जिनके साथ तुम्‍हारा ह्रदय धड़कता है, जो तुमसे प्रेम धागे से बंधे है।
      दूसरी: सत्‍य का अनुभव संगीत जैसा है। तुम संगीत का आनंद ले सकते हो। लेकिन दूसरे से उस अनुभव को बांट नहीं सकते।
      आध्‍यात्‍मिक अनुभव भी इसी प्रकार का है। इसीलिए प्रामाणिक धर्म सदा रहस्‍यपूर्ण होता है। रहस्‍य से मेरा मतलब है, जो महसूस किया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है। लेकिन जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
      डियोनोसियस ने उसे खास नाम दिया है: एग्‍नोसिया।
      तुमने शब्‍द एग्‍नोस्‍टिस सुना होगा। बर्ट्रेंड रसेल ने खुद के लिए यह विशेषण चूना है। नास्‍तिक बहता है: ‘’ईश्‍वर नहीं है’’—लेकिन वह इस तरह कहता है मानों वह जानता हो। मानो उसने सत्‍य की पूरी खोज कर ली और जान लिया कि ईश्‍वर नहीं है। यह घोषणा करके वह अपने ज्ञान की घोषणा कर रहा है। वह गनॉस्‍टिक है, ज्ञान वादी है, वह जानता है। ‘’ग्‍नोसिस’’  याने ज्ञान। आस्‍तिक कहता है, ईश्‍वर है—मानो वह जानता है, उसने पा लिया है। वह भी गनॉस्टिक है, ज्ञान वादी है।
      गनॉस्टिक का अर्थ है जो कहता है: ‘’मैं नहीं जानता—न इस प्रकार, न उस प्रकार। मैं निपट आज्ञानी हूं।‘’ इसलिए बर्ट्रेंड रसेल ने कहा है: ‘’मैं अज्ञान वादी हूं।‘’ निश्‍चित ही, रसे ने यह शब्‍द डियोनोसियस से चुना होगा।
      डियोनोसियस—मैं उनके वक्तव्यों वर बोला हूं। वे सिर्फ टुकड़े है जो उसके शिष्‍य ने लिखे है। लेकिन मैं उस पर इसलिए बोला हूं ताकि दुनिया को खबर हो कि डियोनोसियस जैसे व्‍यक्‍तियों का विस्‍मरण न हो जाए। वे असली लोग है।
      असली लोग तो उंगलियों पर गिने जायेंगे। असली व्‍यक्‍ति वह है जिसने असल का (सत्‍य का) दरस-परस किया है। सिर्फ बाहर से एक विषय की भांति नहीं बल्‍कि भीतर से, उसकी अपनी सत्‍ता की तरह। डियोनोसियस बुद्धों के महिमाशाली जगत का हिस्‍सा हे। मैं उसके कुछ वक्‍तव्‍यों का उल्‍लेख कर रहा हूं....मैं उसे किताब नहीं कह सकता; किताब टुकड़ों से कुछ ज्‍यादा होनी चाहिए।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड