(सदमा - उपन्यास)
श्याम
को ड्राइवर राम दास ने नानी के घर से आकर खबर दी की दीदी वहां तो सब ठीक है। अब तो
सोम प्रकाश बात भी कर रहे थे। मुझे पहचान भी रहे थे। और मुझे अपने पास बिठा कर चाय
भी पिलाई। मैंने कहां की दीदी याद कर रही है। तब थोड़े उदास हो गए। पता नहीं आपके
बारे में सून कर उनके चेहरे का रंग उड़ गया। वो लोग दवाई दो महीने की ले आये थे।
तब मैंने नेहालता जी को कहां की आपको और नानी को दीदी बहुत याद करती है। तब उन
लोगों ने कहा की याद तो हम भी आती है। देखते है, कल
आपके यहां दोपहर के समय आते है। मौसम भी अच्छा है। तब मैंने गाड़ी के लिए बोला तो उन्होंने
मना कर दिया की अंदर कच्ची पगड़ंडी से आ जायेगे थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। इस बात
को सून कर सोनी को अच्छा लगा की कम से कम नेहालता उसके घर आ तो रही है। श्याम को
सोनी ने राम लाल और राम दास को बुला कर कहां की कल नानी और सब लोग आ रहे है। खाने
के लिए सब्जी आदि की लिस्ट इस राम दास को दे दो। राम लाला कुछ बढ़िया सा खाना
बनाना और मीठे में भी कुछ सुस्वाद बनाना।
और दोनो राम आपने कार्य में श्याम से ही लग गए। ये बात सोनी ने अपनी पति को बतलाई की कल नानी और सोम प्रकाश आ रहे है। तब उसने कहां की ये तो बहुत अच्छी बात है। क्या सोम प्रकाश अब कुछ पहले से ठीक है। तब सोनी ने कहां की वह लड़की जिस के कारण सोम प्रकाश बीमार हुआ था वह अब सोम प्रकाश के पास बम्बई से आकर रह रही है।
और उसके इलाज में सहयोग कर रही है। तब उसके पति श्री देवधर करकरे को बहुत अचरज हुआ। ये तो गजब ही हो गया। ऐसा तो पहले न सूना ने देखा। बहुत साहस की लड़की है। हजारों मील से चल कर एक अंजाने लोगों में वह भी अकेली आ गई। तब सोनी ने कहां की वह कह रही थी की ये जो जीवन मुझे मिला है, ये सब सोम प्रकाश की ही देन है। अगर वह मेरे जीवन में नहीं आता तो शायद मेरा क्या होता इस की कल्पना नहीं की जा सकती। सोम प्रकाश के एक दोस्त यहां उन दिनों रहे थे ना। जो हमारे घर भी एक दो बार आये थे। उन्हीं से मैंने यहां बुला कर अनुरोध किया था, की आपका दोस्त बीमार है। और आप वहीं पर रहते है क्यों न आप उस लड़की को ढूंढ कर उसे इसका हाल बतला दे फिर उसकी मर्जी। कम से कम एक खाली पन तो भर जायेगा की उसे पता चल गया की किस ने किस के लिए क्या किया है।तब उसने बड़ी मेहनत
कर उसके घर का पता ठिकाना ढूंढा कर उससे मिला। और फिर उस ने अपने माता पिता से
आज्ञा ले कर यहां आने की जिद्द की। देवधर करकरे-अरे ये तो आपने कमाल का काम किया
जिस की कल्पना तक नहीं की जा सकती। तब तो मैं जल्दी ही स्कूल से आने की कोशिश करूंगा।
ऐसे लोगों के दर्शन से ही कितना लाभ होता है। और वो सोम प्रकाश का दोस्त अब कहां
है।
सोनी-वह तो (पेंटल)
अब बम्बई में ही है। परंतु मैंने फोन कर के उससे अनुरोध किया था की वह एक बार
नेहालता के माता पिता से जरूर मिल ले, ताकि
उन्हें थोड़ा सा भरोसा मिल जाये। शायद मिला या नहीं कह नहीं सकती क्यों उसने अभी
फोन नहीं किया। कि मैं वहां गया या नहीं। परंतु नेहालता के यहां आने पर उसके माता
पिता को मैंने अगले दिन ही फोन कर के बतला दिया था की वह यहां पर ठीक से पहुंच गई है।
सोनी के इस
परिवर्तन को देख कर उनके पति को बहुत अच्छा लग रहा था। एक तो सोनी जवान जो उम्र
में उनसे आधी, दूसरा वह गुणवान भी है। तो सोने पर
सुहागे वाला कार्य ही समझों। दोनों पति पत्नी की इस बात में मधुरता थी। एक अपना पन
था। अब देवधर करकरे को समझ नहीं आ रहा था की सोनी में ये परिवर्तन किस कारण से हुआ
है। लोगों की सोहबत से या बच्चे के गर्भ में आने से ये स्वभाव कहीं बच्चे का
स्वभाव तो उस पर हावी नहीं हो रहा था। तब तो और भी अधिक खुशी की बात थी। की जरूर बच्चा
गुणवान ही पैदा होगा। चाहे वह लड़का हो या लड़की। दोनो पति पत्नी बात करते हुए
गार्डन में घूम रहे थे। सोनी अब अपने गर्भ में पूरे दिनों से थी। परंतु फिर भी
श्याम को या सुबह जरूर आधा घंटा बहार घूमती थी। लेकिन रात को सोने से पहले राम लाल
गर्म पानी में थोड़ा सा नमक डाल कर जरूर लता था। खाना खाने के बाद वह गर्म पानी
में दस-पंद्रह मिनट जरूर पैर डाल कर बैठती थी। आज कल उसके दोनों पैरों में सूजन
रहती थी। परंतु आज श्याम को चलने से उसके पेट के पीछे रीड की हड्डी की जड़ के पास
से एक दर्द की लहर उठती और कुछ ही पलो में बद हो जाती। इसका कारण उसे समझ नहीं आ
रहा था। इसलिए ये कोई खास बात न होने पर उसने श्री देव धर करकरे को ये बात नहीं
बतलाई थी।
सुबह ही तैयार हो
कर श्री देव धर करकरे अपनी स्कूल में चले गए। परंतु
घर में खाने की खुशबु बहुत अच्छी आ रही थी। कई बार जाकर सोनी ने देखा की सब कार्य
ठीक से हो रहा है या नहीं। उसने राम लाल को कहां की रायता भी तो बनाना किस का
रायता बना रहा है। तब राम लाल ने कहां की बेटी रायता मैं सोच रहा था की खीरे का
बना देता तो अच्छा लगता। और उसे काटने के अलावा कुतरा कस में कस कर बनाऊं तो कही
अच्छा होगा। या कहो तो गाजर का बना देता हूं। तब नेहा ने कहां की ये रायता पहले
मैंने खाया ही नहीं दूसरा नानी के खाने में भी आसानी रहेगी। क्योंकि उनके तो कम ही
दाँत है इसलिए वह नरम भोजन ही चबा पाती है। और राजमा के साथ चावल, पापड़, और सुखी सब्जी में क्या बना रहे हो। तब राम
लाल ने कहां की आज कल गोभी बहुत मुलायम और ताजा आ रही है। इसलिए मैं कल गोभी ले
आया था। आलू गोभी ठीक रहेगा। और साथ में थोड़ी नागौरी पूरी हो जायेगी।
ये सब बाते सुन कर
सोनी को बहुत अच्छा लग रहा था। वे लोग पहली बार घर पर आ रहे थे। तब कुछ अच्छा भोजन
तो होना ही चाहिए। घर के साथ-साथ उसके ह्रदय में भी एक खुशी भरी हुई थी। वह न जाने
क्यों आज कल कुछ अतिरिक्त खुशी उसके अंतस में समाई रहती थी। वरना तो जिस दिन से ये गर्भ उसके पेट में आया
वह हमेशा खुश ही रहती थी। उससे पहले उसका मन कितना चिड़चिड़ा रहता था। हमेशा आग
में जलती रहती थी। जो वासना उसे जलाती सुलगाती रहती थी। वह अचानक अषाढ़ के एक ही दोगडे
में मानो शांत हो गई और वहाँ पर उग गए प्रेम के मधुर पुष्प। और इस का सारा श्रेय
वह पेंटल जी को ही देती है। परंतु बीज का तो महत्व है परंतु घरा भी तो उतनी ही उर्वरक
होनी चाहिए। परंतु जेष्ठ की जलन में सोनी को पता नहीं चल रहा था की उसके अंदर भी
प्रेम का सागर है। वह तो दुनियां की सबसे अभागिन अपने को मान बैठी थी। परंतु एक पल
में जो हुआ उस का किसी को काई पता नहीं था। जीवन एक जल की तरह से बहाव है जब आदमी
उस से संघर्ष करता है तो विरोधाभास हो जाता है। और जैसे ही वह अपने को छोड़ देता
है, एक दम से सब निर्मल हो उठता है।
श्री
देवधर करकरे जी का आज स्कूल में जाने का मन तो नहीं कर
रहा था। परंतु आज बोर्ड की मीटिंग थी इसलिए जाना बहुत जरूरी था। वरना तो मेहमान घर
पर आये और आप है की उस दिन आप को काम ही प्यारा हो। ये सब कितना गलत लग रहा था।
परंतु वह सोनी को कह कर जा रहे थे, कि मैं
जल्दी आने की कोशिश करूंगा। परंतु कितनी ही जल्दी आने के बारे में कहे फिर भी 12
तो बज ही जायेगे। तब इस बीच ड्राइवर को भी उनके पास भेज दिया जाये तो अच्छा होगा।
तब सोनी ने श्री देवघर करकरे से कहां की अगर देर हो तो आप कार को नानी को लेने के
लिए भेज देना। दस बजे तक। ये सब तय होने पर ड्राइवर को भी बोल दिया गया। परंतु
ड्राइवर को नहीं पता था की इस बात की नानी हर को कोई खबर नहीं थी। वह लोग तो सुबह
नौ बजे ही तैयार हो कर चाय आदि पीकर पैदल ही जंगल के रास्ते से सोनी के घर की और
चल दिए। रास्ता इतना कठिन नहीं था। फिर भी नानी की उम्र तो हो गई थी। इसलिए जब
चढ़ाई आती तो नानी थक जाती। परंतु सोम प्रकाश आज आराम से चल रहा था। इस रास्ते को
उसने यहां से हजारों बार पार किया था। बाजार जाना हो या स्कूल जाना हो वह यहीं से
तो आता-जाता था। उसे चलने का बचपन से ही बहुत शोक है।
नेहालता भी थक तो
रही थी। परंतु वह दिखा नहीं रही थी। की वह क्यों थक रही है। क्योंकि इस तरह की
खड़ी चढ़ाई पर चलने की जब तक आपको आदत नहीं होगी आप बहुत जल्दी थक जायेगें। आप को
इन रास्तों पर सीधे सड़क पर चलने की तरह से नहीं चल सकते। क्योंकि अगर आप खड़े
होकर चले तो आपका संतुलन पीछे की और होगा। और आप जल्दी ही थक जायेगें। अगर आप आगे
की और झूक कर चलेंगे तो आपकी गति तो कम होगी परंतु आप का संतुलन बना रहेगा। इस तरह
से नेहा लता को चलते देख कर सोम प्रकाश ने नेहा का कंधा पकड़ कर कहा की आप थोड़ा
आगे की और झूक कर चले तब आप को थकावट नहीं होगी। ये बाते जब नानी ने या नेहा लता
ने सूनी तो उन्हें अच्छा लगा की अब सोम प्रकाश में एक भावुकता का जन्म हो रहा है। और
सच ही जब नेहा लता उस तरह से चलने लगी तो उसे पता ही नहीं चला चढ़ाई की थकान का।
ड्राइवर जब तक कार
ले कर घर पर पहुंचा तब तक तो वह आधा रास्ता तय कर चूके थे। क्योंकि सड़क तो काफी
घूम फिर कर जाती है। और बीच से जंगल का रास्ता था, तो
जरा कठिन परंतु है एक दम छोटा। वह करीब एक घंटा चलने पर सोनी के घर के पास पहुंच
गए। तब आज पहली बार नेहा लता सोनी का बँगला देख रही थी। शान दार बँगला था। ऊटी के
कुछ गिने चुने घरों में उस की गिनती होती थी। परंतु जब सोनी घर पर आई थी तो उसकी
सरलता और सादगी देखते ही बनती थी। उस बड़े बंगले में मात्र चार पाँच प्राणी ही तो
रहते थे। एक दो माली, एक ड्राइवर और दूसरा राम लाल खाना
बनाने और घर की देख भाल करने वाला। और दो प्राणी पति पत्नी सोनी और उनके पति श्री देवधर
करकरे जी।
सोम प्रकाश भी उस
बंगले को देख कर अचरज से भर रहा था। और नानी को कह रहा था की हम कहां जा रहे है, नानी। तब नानी को कुछ अजीब लगा की हर वस्तु को लगभग पहचान रहा है। परंतु
क्या इसे बंगले की जरा भी याद नहीं ये तो यहां कितनी ही बार आ चूका है। परंतु शायद
जब वह सोनी से इस बंगले में मिलता था तो उसके अचेतन में एक भय समाया ही रहता था।
जिस के कारण अचेतन में इस बंगले की प्रतिछवि एक दम से साफ नहीं थी। परंतु वह सोनी
को जानता था। धीरे-धीरे जैसे-जैसे वह बँगला नजदीक आ रहा था सोम प्रकाश के चेहरे पर
भय के बादल साफ दिखाई दे रहे थे। उसने इस बीच नेहा लता का हाथ अपने हाथ में ले
लिया। जैसे कोई बालक जब अपने को असुरक्षित समझता हो तो अपने किसी प्रिय या विश्वास
पात्र का सहारा ले लेता है।
इस तरह से सोम
प्रकाश का नेहा लता का हाथ पकड़ने को वह तुरंत समझ गई। सोम प्रकाश के हाथों से इस
सर्दी में भी पसीना बह रहा था। उसकी आंखों में एक भय की छाया साफ दिखाई दे रही थी।
परंतु नेहालता इनका कारण तो समझ नहीं रही थी, परंतु वह
समय गई की जरूर कुछ गलत है। इसलिए उसने इस बात को अति साधारण तरह से ले लिया। और
पेड़ो के बीच में एक उंची सी शिला थी। जिस पर सब ने बैठ कर विश्राम करने का निर्णय
लिया। नानी ने तो मना किया की अब सामने ही तो है बँगला। तब वहीं चल कर विश्राम
करेंगे। परंतु नेहा लता ने बात को टाल दिया। उसने बोतल से सोम प्रकाश को पानी दिया
और फिर नानी को कहां की आप भी थोड़ा पानी पी लो। नानी ने भी कुछ पानी की दो चार
घूँट ली और बोतल नेहा लता की और बढ़ा दी। हवा में एक ठंडक थी परंतु वह हवा अपने
में ताजगी समेटे चल रही थी। उसके सामने वो ठंडक कोई विरोध नहीं थी। दूर पहाड़ी पर
अभी भी कहीं कही बर्फ की चादर दिखाई दे रही थी। ऊंचे सफेदे के वृक्ष हवा में झूमते
और सांय-सांय की आवाज कर रहे थे। सफेदे का पत्ता जब हवा चलती है तो कैसे झूम-झूम
को नाचता सा प्रतीत होता है।
चारों और जमीन पर
हरी घास की चादर बिछी थी। बीच-बीच में कहीं कही पत्थर का उभार उसके सौंदर्य को और
भी सुंदर बना रहा था। ऊपर से देखने पर दूर गुजरती वह सड़क कैसी आड़ी तिरछी दिख रही
थी। बल खाते रास्ते भी अपने में एक अद्भुत सौंदर्य समेटे लगते है। उसके दोनों और उगे
वृक्षों की कतार इस मार्ग को और उभार रही थी। दूर झील में आसमान की परछाई के कारण
कैसा सुरभि नीला पन फैला हुआ था। किसी-किसी किनारे पर दूर पहाड़ की परछाई और उस पर
तैरते बादलों की छवि झील में एक विषमय की स्थिति पैदा कर रही थी। उस पर तैरती नाव
कैसी खिलोना सी लग रही थी। उसके चारों और घने वृक्षों को देख कर नहीं लगाता था की
नीचे जमीन भी होगी। कुछ देर इधर-उधर की बाते कर नेहालता सोम प्रकाश के अंदर के भय
को तिरोहित कर देना चाहती थी। और इस बात का नानी को पता भी न चले यही वह सोच रही
थी। नहीं तो नानी नाहक परेशान हो उठेगी। और सच ही कुछ देर इधर-उधर के दृश्य और बातें करने से सोम प्रकाश की मन स्थिति सामान्य सी लग रही
थी। ये बात नेहा लता ने पहली बार महसूस की सोम प्रकाश में ये भय कहां से उतर आया।
इससे पहले तो उसने इतनी महीने साथ रहने पर कभी उसे महसूस नहीं किया।
नानी ने भी कहां की
अब तो चलना चाहिए वह लोग इंतजार कर रहे होंगे। और वह उठ कर चलने लगे इतनी देर में
दौड़ता हुआ हरि प्रसाद उनके पास पहुंच गया। वह कई दिनों से घर से गायब था। उसका जब
मन होता तो वह सोनी के घर पर आ जाता था। और मन आता तो नानी के घर पर आ जाता था। और
वह दौड़ कर नेहालता के पास आ कर उसके हाथ को चाटने लगा। वह सब के सामने अपनी खुशी
को बतला रहा था। की देखो मुझे तुम्हारा आने का पता था। मैं तो पहले से यहां पर आ
गया था। तब नेहालता ने उसने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा की तुझे कैसे पता चला की
हम आ रहे है। और इस बात को सून कर मानो हरिप्रसाद समझ गया और जोर-जोर से भोंक का
कहा रहा था मैं कोई बुद्धु नहीं हूं। और उसके इस भोंकने को एक आदेश समझ कर सब उठ
कर चल दिये। और नाचता सा हरिप्रसाद सबसे आगे चल रहा था। जैसे वह सब को मार्ग दिखला
रहा हो।

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