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शनिवार, 18 अप्रैल 2026

42-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-42

(सदमा - उपन्यास)

सोनी गेट पर खडी उनका इंतजार कर रही थी। और उसने नानी के पैर छूकर आर्शीवाद लिया और कहा की मैंने तो ड्राइवर राम दास को भेजा था। वह कहने लगा की वह तो काफी पहले ही चल दिये थे। मेरे वहाँ जाने से भी पहले ही। तब आप लोगों को इतनी देर कैसे लगी। तब नेहा लता ने कहां की रास्ते में सुंदर दृश्य को देख कर बैठ गए थे। सोनी ने सोम प्रकाश की और देखा तो वह नीची गर्दन किए खड़ा। मानो कोई अपराध भाव उसमे है। सोनी ने मौन भंग करते हुए कहां की सोम प्रकाश क्या बात है, मुझ से नाराज हो। बात नहीं कर रहे। तब सोम प्रकाश ने एक बार उपर गर्दन कर के उसे देखा उसकी आंखों में डर के अलावा एक प्रतिशोध भी झलक रहा था। लेकिन सोनी के चेहरे पर एक प्रकार की आभा साफ दिखलाई दे रही थी। उसकी आंखें सफटिक पारदर्शी थी। मन की झील में आँख उसका प्रति दर्पण होती है।

तब सोनी ने सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर अपने साथ चलने के लिए कहां। एक बार तो सोम प्रकाश सोनी के इस व्यवहार को देख कर कुछ घबराया। परंतु जैसे ही सोनी ने उसका हाथ पकड़ा उसकी उर्जा के संचार ने सोम प्रकाश के भाव भंगिमा को एक क्षण में बदल दिया। शायद सकारात्मक उर्जा जब हमें सहयोग देती है। तब हमारे अंदर का अंधकार जो एक भय के रूप में खड़ा हमें सही से देखने में समझने में मन और मस्तिष्क के बीच में अवरोध बन जाता है।

वह उस भय को  क्षण में विलीन कर देती है। दो मिनट में ही सोम प्रकाश की चाल और चेहरा सब बदल गया। तब सब अंदर जाकर सोफे पर बैठ गए। नानी बार-बार सोनी का चेहरा देख रही थी। उसके चेहरे पर झलकी उस आभा में भी कहीं दर्द की लकीरे थी। तब नानी ने उसे अपने पास बुलाया और उसके कंधों पर प्रेम से हाथ फेरते हुए कहां की अभी कितने दिन और है। तब सोनी ने कुछ शर्माते हुए कहा की बस कुछ ही दिन और है। तब नानी ने उसके पेट को छूते हुए कहां की मुझे तो आज ही लगाता है। तुम्हें दर्द तो नहीं हो रहा है। तब सोनी ने कहां की कुछ खास नहीं बस हल्का सा रीड की हड्डी के जोड़ से कुछ दर्द उठता सा दिखता है।

इतनी देर में चाय आ गई। सब ने चाय पी परंतु सोनी ने कहां की नानी कुछ दिन से चाय आदि मैं पी नहीं पा रही हूं। चाय की चार घूँट लेने पर ही गला जलने जग जाता है। कुछ भी खाने को मन नहीं होता। नानी हंसी की अब बस कुछ ही घंटे की बात है। घर में दही तो होगी। नानी ने राम लाल को बुला कर पूछा की राम लाल दही तो है। तब अचानक नानी कहने लगी मैं खूद ही जाकर देखती हूं। और वह उठी और अंदर किचन में राम लाल के पास चली गई। उसने एक कटोरी दही ली और उसमें दो चम्मच देसी खांड़ डाल कर अच्छे से मिला कर ले चली सोनी ये सब बड़े भाव से देख रही थी। की घर में अगर एक बड़ा बुजुर्ग हो तो उसका कितना महत्व है। और दही सोनी के हाथ में देते हुए नानी ने कहां की बेटी ये खा लो। तब सोनी की आंखों में प्रेम के आंसू झर गए। और वह खाने लगी। सच ही दही के खाने से उसे बहुत आराम मिला। तब नानी की और देखकर कहने लगी की अगर सोम प्रकाश स्वाथ होता तो मैं आप को कुछ दिन के लिए तो जरूर ही अपने पास रख लेती। खास कर इस समय मुझे अब आप के संग साथ की सख्त जरूरत है।

नानी ने कहां की मैं कौन आप से दूर हूं। जरा आवाज देना तो आपके पास हाजिर हो जाऊंगी। अब तो सोम प्रकाश पहले से कुछ बेहतर है। और अब एक उम्मीद भी है, कि आने वाला समय और सहीं होगा। अभी तीन महीने की दवा दी है। अभी तो अगले महीने जाना होगा। तब तक तो शायद सोम प्रकाश एक दम से ठीक हो जायेगा। तब सोनी ने सोम प्रकाश की और देख कर कहा की क्यों सोम प्रकाश अब तुम चाचा बनने वाले हो। क्या ये सब पता है आप को? और सोम प्रकाश को बहुत अचरज हुआ। उसे ये सब सून कर अच्छा भी लगा उसने नेहा लता का हाथ पकड़ कर जानना चाहा की जो मैं सून रहा हूं वे सब सत्य ही है या नहीं। तब नेहा लता ने उसके सुर में सुर मिला कर कहां की अब तो आपको पार्टी देनी होगी। क्योंकि आप चाचा बनने बाले हो। और नानी जोर से हंसने लगी की क्यों इसे परेशान कर रही हो। हां बेटा ये सब ठीक कह रही है। सोनी अब मां बनने वाली है। तब सोम प्रकाश ने एक बार सोनी को प्रेम से देख और खड़ा होकर उसके पास चला गया और उसके सर पर हाथ रख कर कहां की मुझे अच्छा लगा तुम एक दम से ठीक हो जाओगी। इस सब बातों से वहां का माहोल एक दम से हल्का हो गया था। तब नेहालता ने पूछा की आपके पति नहीं दिखाई दे रहे कहां है। तब सोनी ने कहां की आज उनकी जरूरी मीटिंग है। बस कुछ ही देर में आने वाले है। जाना तो नहीं चाहते थे। परंतु मजबूरी थी।

और सच ही इतनी ही देर में श्री देवधर करकरे हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए ड्राइंगरूम में प्रवेश करते हुए दिखाई दिये। श्री देवधर जी को देख कर सब लोग खड़े हो गए। श्री देवधर करकरे ने नानी के पेर छू कर आर्शीवाद लिया और नेहा लता को प्रणाम करते हुए सोम प्रकाश को कहां की मेरे शेर तुम कैसे हो। तुम तो बहुत साहसी थे। किसी बात से नहीं घबराते थे। तब ये सब क्यों अब तो सब तुम्हारे साथ है। देखो इस देवी को जो हजारों मील से तुम्हारी बात सून कर तुमने मिलने के लिए आई है। और श्री देवधर जी ने सोम प्रकाश के दोनों कंधे पकड़ कर उनकी आंखों में झांका। इस सब से सोम प्रकाश के चेहरे पर भय की बजाए एक मंद सी मुस्कान फैल गई। तब वह नेहा लता से बात करते हुए कहने लगे बेटा मुझे माफ कर दे तुम इतने दिन से आई हुई हो। परंतु तुम्हारा हाल चाल पूछने मैं एक दिन भी नहीं आपके पास आ सका। क्योंकि अब मेरा शरीर इतना जवान नहीं रहा स्कूल से आते ही खाना खाने के बाद थोड़ा सा अगर विश्राम न करूं तो अब चलता नहीं। जी कोई बात नहीं सोनी जी और राम दास जी तो आ ही जाते थे। फिर यहां कोई दूख दर्द या असुविधा नहीं थी।

इन सब बातों से वहां के वातावरण में जो भरी पन भरा हुआ था वह कुछ हलका हुआ। अब सोम प्रकाश भी कुछ सामान्य सा लग रहा था। तब उसने धीरे से देवधर जी को कहां की स्कूल में सब ठीक है। बच्चे कैसे है। तब श्री देवधर जी को ये बात सून कर बहुत अच्छा लगा। कहने लगे की वह तो तुम्हें बहुत याद करते रहते है। कब आ रहे हो उन से मिलने के लिए। तब थोड़ा अपने को सिकुड़ते हुए सोम प्रकाश ने कहा की अभी तो मैं नहीं पढ़ा पाऊंगा। तब श्री देवधर जी ने कहां की वो कोई बात नहीं आप केवल आ कर उन से मिल भर लोगे तो वह खुश हो जायेगे। आपके स्कूल में न आने से मानो स्कूल की रोनक कही गायब हो गई। बेटी अब आप की डुयुटी है, ये बात देवधर जी ने नेहालता केी और देख कर कही। आप सोम प्रकाश को जल्दी स्कूल में लेकर आना। सोम प्रकाश को लगा की नाहक मैंने स्कूल की बात को छेड़ दिया। तब सब ने हाथ धो कर खाना खाया। सोनी आज खाना नहीं खा रही थी। उसके चेहरे पर एक दर्द की हल्की सी परत दिखाई दे रही थी। जिसे केवल नानी ही देख पा रही थी। इसलिए खाना ने खाने पर भी नानी ने कहां की चलों तुम अपने कमरे में कुछ देर विश्राम कर लो। कितनी देर से तुम इधर-उधर भाग दौड़ कर रही हो। ऐसी अवस्था में ये सब ठीक नहीं है।

तब नानी ने सोनी को कहां की बेटी मुझे तो लगता है आज ही का दिन नहीं गुजरेगा। तब सोनी थोड़ा झेंपी की पुराने जमाने की औरतों को कितना अनुभव होता है। डा. तो सब चेक करने पर भी सही समय नहीं बता पाते। तब सोनी अंदर कमरे में जाकर पलंग पर लेट गई। नानी पास ही कुर्सी पर बैठ कर उसके तलवे और हाथ की मालिश करने लगी सोनी ने लाख मना किया की नानी आप मुझ से बड़ी है। आप ऐसा कर के मुझे पाप में धकेल रही है। नहीं बेटा ऐसा नहीं सोचते, छोटे तो जीवन भर सेवा करते है, परंतु बुर्जगो को कम ही सौभाग्य मिलता है। यही तो वह मोका है। तुम थोड़ा गहरी श्वास लो। देखो अब तुम्हारे पेट के उपर से कुछ जगह खाली हो गई है। क्योंकि बच्चे ने अपना स्थान छोड़ दिया है। तुम्हें दर्द तो नहीं हो रहा ना।

सोनी ने कहा-हां नानी दर्द कुछ तो हो रहा है। परंतु मैं उसमें एक आनंद महसूस कर रही हूं। वह एक सूखद दर्द है तो मेरे तन मन पर शीतलता की तरह फैल रहा है। हर दर्द पीड़ा और संताप नहीं होता। कुछ दर्द अति मधुर होते है। ये तो अब मैंने पहली बार जाना है। नानी मैं आप से एक बात कहूं आप आज मेरे साथ ही रह जाओगी तो मुझे बहुत आराम और अच्छा भी लगेगा। आप सोमू की या नेहा लता की चिंता न करें। अगर वो लोग यहां रहना चाहेंगे तो ठीक है, अगर घर पर ही जाना चाहे तो उसके साथ राम लाला या कोई दूसरा आदमी भी उनके साथ जा सकता है। फिर हमारा हरिप्रसाद किस दिन काम आयेगा। नानी खुद सोनी की हालत को देख कर उसके साथ रहना चाहती थी। ऐसे समय पर किसी बड़े बुर्जग का साथ होना अति जरूरी है आज कल न तो नर्स ही कुछ जानती है और न ही डाक्टर ही।

ये बात कर ही रहे थे की अचानक सोनी के दर्द शुरू हो गए। ये दर्द बच्चे के पैदा होने का था। नानी सोनी का चेहरा देख की समझ गई, अब ज्यादा देर नहीं है। तब उसने बाहर जाकर श्री देवधर जी को आवाज दी की आप जरा इधर आये। सोनी को दर्द शुरू हो गया है। ड्राइवर को बोले की गाड़ी तैयार रखे। कौन से अस्पताल में जाना है, कहां पर आपने इनका चेक कराया है। ये सब बाते नेहा लता ने भी सुन ली और वह भी नानी के पास आकर पूछने लगी की क्या बात है। तब नानी ने कहां की बेटी सोनी के बच्चा होने का दर्द शुरू हो गया है। अगर मैं उनके साथ जाऊं तो आप को कोई एतराज तो नहीं होगा। कोई तो उसके साथ रहे वह अकेली है। ऐसा मोका औरत के लिए जीवन मरण के बराबर होता है। जीव में से जीव का पैदा होना कोई बच्चों का खोल नहीं है। तब नेहा लता ने कहा की कैसी बाते करती हो नानी जी। ये तो बहुत ही अच्छा बात है, कि आप उनके साथ रहे। तब नानी ने कहां की आप दोनों यहां रहना चाहेंगे या घर....। तब नेहा लता ने कहां की हम घर पर ही जाना पसंद करेंगे।

और उधर ड्राइवर ने गाड़ी गैरज से बाहर निकाली। कुछ जरूरी कपड़े जो सोनी ने पहले ही तैयार कर रखे थे। उसे ड्राइवर ने ले जा कर कार में रख दिया और वह नानी के साथ कार की और चल दी। साथ में श्री देवधर करकरे जी के अलावा सोम प्रकाश और नेहा लता भी साथ चल दिये। गाड़ी में बैठ कर सब को नमस्कार कर सोनी नानी और श्री देवधर करकरे के साथ चली गई। पीछे खड़े रह गये तो सोम प्रसाद, नेहा लता, राम लाल और हरि प्रसाद। तब नेहा लता ने राम लाल की और अग्रसर होकर कहा की काका अब हम भी चलते है। क्योंकि फिर शरदी के दिन भी और दिनों से छोटे होते है, एक दम से जल्दी ही अँधेरा हो जायेगा। तब राम लाल ने कहा की बेटा गाड़ी तो नहीं है, तब आप क्या पैदल ही जाओगे। नेहा लता ने कहां की दूर ही कितना है। और बीच में जंगल से काफी छोटा पड़ता है। इस के साथ खाना भी तो आज कुछ अधिक हो गया। आप के हाथ का बना खाना स्वाद के कारण ज्यादा ही खा लिया वह भी कुछ तो हजम हो जायेगा।

राम लाल ने कहां की तब बेटी कहो तो एक कप चाय या काफी तो बना देता हूं। राम लाल की ये बात सून कर सोम प्रकाश ने कहां की नहीं, काका अब हम चलते है। और इस सब का इंतजार तो बेचारा हरिप्रसाद कब का कर ही रहा था। की लोग तो गाड़ी में न जाने कहां चले गए और अब ये भी चल दिये तो मेरा क्या होगा। वह तो सोम प्रकाश और नेहा लता के साथ जाना ही था। ये उनके लिए भी अच्छा था। क्योंकि फिर भी जंगल का मामला है। उपर से सोम प्रकाश अभी इतना चेतन नहीं हुआ है। और दोनों काका राम लाल को प्रणाम कर चल दिये। हाथ का वो डंडा जो राम लाल पकड़े हुआ था वह उसने सोम प्रकाश को दे दिया क्योंकि बेटा जंगल में जब भी जाओ एक लकड़ी साथ जरूर रखनी चाहिए। क्योंकि कीड़ा-काटा सौ बात और आपके साथ बेटी नेहा लता थी है।

उनको चलता देख कर हरि प्रसाद तो पल में समझ कर उससे भी आगे-आगे पगडंडी पर दौड़ने लगा और देखते ही देखते वह घने पेड़ों के बीच में तीनों प्राणी गायब हो गए। जब तक वह दिखाई देते रहे राम लाला उन्हें खड़ा होकर देखता ही रहा।

घर पर सोम प्रकाश और नेहालता आज दोनों अकेले थे। नेहा लता ने कभी नहीं सोचा था की किसी पुरूष के साथ अकेले उसे रहना होगा। परंतु वह सोम प्रकाश पर पूरा विश्वास करती थी। अपने से भी कहीं अधिक उसे सोम प्रकाश पर भरोसा था। उसके मन में बूंद भर भी भय नहीं था। इसलिए नीचे घर तक पहुंचते-पहुंचते श्याम ढल रही थी। अंबर में लालिमा तैर रही थी। बादल बार-बार अपना अकार ही नहीं रंग रूप में बदल रहे थे। मानो खुद ही चित्रकार चित्रकारी कर रहा है। वह दोनों जाकर बहार अंगन में बिछी कुर्सियों पर बैठ गये। तब नेहा ने अचानक सोम प्रकाश को कहां की मैं आपके लिए चाय बनाऊं। और सोम प्रकाश भी वैसे तो थक गया था। परंतु उसे लगा की क्यों न वह अपने हाथ से चाय बना कर नेहा लता को पिलाये जिससे उसे कुछ तो अच्छा लगेगा। नानी के न होने पर भी घर में एक सन्नाटा सा छाया हुआ था। कही अपना पन भी नानी के न रहने से कहीं खोया-खोया सा लग रहा था। मानो संबंधों का अपना पन एक अंधेरी खाई सा लग रहा था। उसे पाटने के लिए दोनों ही प्रयत्न कर रहे थे। दोनों ने बैठ कर साथ चाय का आनंद लिया सूर्य अस्ताचल की और चला गया था। दूर बस पहाडी पर कहीं कही उसके रंग के चितके नजर आ रहे थे। आसमां की लालिमा धीरे-धीर अंधकार का छद्म रूप ले रही थी। परंतु दूर इस फैलते अंधकार का नेहालता और सोम प्रकाश के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उनके जीवन में तो चंद्रमा की धवल रोशनी फैल रही थी। सोम प्रकाश सच ही बहुत सुस्वाद चाय बना कर लाया। वही सब सामान होने पर भी प्रत्येक आदमी के हाथ का बना खाना हो या दूसरी कोई चीज उसका स्वाद क्यों बदल जाता है। यहीं सब नेहा लता सोच रही थी। और उसने चाय की तारीफ करते हुए कहां की आप के हाथ में तो जादू है। और अपनी तारीफ सुनते हुए सोम प्रकाश थोड़ा झेप गया था। पास बैठा हरि प्रसाद अपना दूध खत्म कर के लम्बें पैर फैला कर वहीं सो गया था। दिन में काफी भारी खाना हो गया था इसलिए दोनों ने निर्णय लिया अब रात का खाना नहीं खायेंगे।

काफी देर दोनों चाँद की रोशनी में बैठे बाते करते रहे। वह इस बात को भी भूल गए की रात के कारण ठंड बढ़ रही है। ठंड दोनों को लग रही थी परंतु बातों का एक तार जूड़ा हुआ था। जिसे वह तोड़ना नहीं चाह रहे थे। क्योंकि जब नेहालता यहां बीमार होकर आई थी उसकी वो बाते तो नेहा लता को याद नहीं है। केवल उसने सूनी है नानी, या पेंटल के मुख से। और अब वह सोम प्रकाश से किस विषय पर बात करें उसे आज की बात कुछ समझ नहीं आ रही है। दोनों के बीच में अजीब विरोधाभास था। परंतु धीरे-धीरे वह उसे कुरेद कर खत्म कर रहे थे और आज के एकांत ने उस में दोनो की बहुत मदद की।

नेहा लता पूछ रही थी की जब मैं बीमार थी तो आप को बहुत सताती थी। कभी बंदर या कुछ भी बनने को मजबूर कर देती थी। एक दिन तो आपके सारे कागज पत्र मैंने खराब कर दिये थे। तब आप मुझ पर गुस्सा हुए ......और मैं नाराज हो कर दूर नदी के पास एकांत में जाकर छप गई थी। तब आपने मुझे कहां-कहां नहीं ढूंढा था। क्या ये सब बाते आप को याद है। मुझे तो याद नहीं। परंतु सोम प्रकाश ने कहा की पूरी तरह से तो मुझे भी याद नहीं आ रही है। आज दोनों अपने अचेतन में दबी उन यादों को दोहराना चाह रहे थे। जिसमें वह कुछ-कुछ कामयाब भी हो रहे थे।

ठंड का पता तो तब चला जब उन्होंने देख की हरि प्रसाद तो गोल गुड़ंल बना कुं.... कुं ....कर रहा है। तब जाकर उन्हें होश आया की बाहर बहुत ठंड हो गई थी। दोनो का ही नहीं बेचारे हरिप्रसाद का बदन भी एक दम से ठंडा हो गया था। तब नेहा ने कहां की देखो बातों में इतना खो गए की ठंड का आभास भी नहीं हुआ। आपका सार बदन एक दम से ठंडा हो गया है। परंतु नेहा लता के तो होंठ भी ठंड के कारण नीले हो गए थे। तब सोम प्रकाश ने कहां की चलों कुछ आग जला लेते है। ये बात सून कर हरि प्रसाद तो पल में उनसे आगे भाग कर आग जलाने वाली चिमनी के पास बैठ गया। तब नेहा लता ने कहां की इसे कैसे हमारी भाषा का ज्ञान हो जाता है। हम समझते है की ये हमारी बात को नहीं समझता। परंतु शायद ये मन के भावों तरंग को पकड़ लेते है।

चिमनी में आग जलाने के बाद उन्हें थोड़ा चेन मिला। धीरे-धीरे ठंड बढ़ती गई और उन दोनों को बातों के बीच पता ही नहीं चला की ठंड बढ़ रही है रात के कारण। जब शरीर कुछ गर्म हो गया तो नेहा लता ने कहां की मैं आप का बिस्तरा लगा देती हूं। आज के एकांत ने उन दोनों के अंदर दबे किसी अंजान से भय को बाहर निकाल लिया। ऐसा नहीं था की नेहालता सोम प्रकाश पर विश्वास नहीं करती थी। परंतु वह एक सूनी और अंधेरी पर्त थी। जो उसके चेतनी मन ने केवल शब्दों में सूनी थी उसकी संवेदना को वह आज महसूस कर रही थी। आज एकांत के कारण उस मन के अनेक पर्दे हट गये । सोम प्रकाश के लिए भी ये रात बहुत शुभ बन कर आई। आज उसने नेहा लता को देखा उसे जाना। पहले केवल एक अपरिचित नजरों से देखता था। जब उसे ये बात बतलाई गई की यही वह नेहा लता है जिसे आप ले कर आये थे। तो उसकी दबी वह पुरानी अंधेरी पर्त का गुबार कुछ हटा उसने अपने मस्तिष्क पर अधिक जोर दे कर सोचा। और मन मानने को कर रहा था की यहीं हो सकती है। परंतु अंदर अब भी कहीं शक का कीड़ा रेंग रहा था।

आज वह फिर से नेहा लता के संग साथ में अपने अंदर एक परिचित सी उर्जा को महसूस कर रहा था। उसे तो लगता था की मैं कौन हूं मुझे इस बात का पता भी नहीं फिर मैं दूसरो के बारे में कैसे जान सकता हूं। तब सोनी का जिक्र करते हुए कहां की ये वहीं सोनी तो नहीं लगती जिसे मैं जानता था। नेहा जी आपने तो पहले वाली सोनी को नहीं देखा होगा। तब नेहा ने कहां की देखा भी होगा तो मुझे कोई खास याद नहीं। परंतु मैं तो जब से आई हूं इसी सोनी को जानती हूं। वह जान पूछ कर सोम प्रकाश के अंतस में दबी उन अंधेरी कंदराओं में उसे ले जाना चाहती थी। तब सोम प्रकाश ने कहां की पता नहीं हो सकता मैं ही गलत हूं, वह और हो परंतु नानी तो धोखा नहीं खा सकती। और बाकी के सब लोग तो धोखा नहीं खा सकते। उसके पति। खेर सच मुझे वह अब अच्छी लग रही थी। पहले तो मैं उससे बहुत डरता था, उस देखते ही मेरे पसीने छूट जाते थे, मेरे हाथ पैर कांपने लग जाते थे। न जाने क्यों एक अनजाना सा भय क्यों लगता था। परंतु आज मुझे तुम्हारी वजह से कम भय लगा मुझे तुम पर बहुत भरोसा है। ये बात नेहा लता को बहुत अच्छी लगी की अब मैं सोम प्रकाश का विश्वास जीत रही हूं। जिससे ये आपने अंतस के भय के बादलों को मेरे लिए कम से कम हटा सकेगा। अब मैं इसके लिए कोई अंजान नहीं रह जाऊंगी।

नेहा लता ने कहां नहीं आप डरते नहीं थे आप का स्वभाव ही कुछ शर्मीला सा है। आप महिला हो या पुरूष उनमें अधिक घुलते मिलने नहीं हो। इसलिए आपने देखा की आपके दोस्त भी कम ही होंगे। कितने दोस्त है अब आप के। कुछ दिमाग पर जोर डाल कर सोम प्रकाश ने कहा की कोई भी नहीं मुझे सब से डर लगता है। परंतु हां एक है मेरा दोस्त पेंटल आप उन्हें जानती है। वहीं मेरे ह्रदय के नजदीक है। तब नेहा ने कहां हां मैं जानती हूं। वह आपका प्यारा दोस्त समझदार भी बहुत है। तब नेहा लता ने कहां की अब वो आ क्यों नहीं रहा। तब सोम प्रकाश ने कहां की पता नहीं बहुत दिन पहले गया था अब आ ही नहीं रहा। तब नेहा ने कहा की मैं उसे बुलाऊं आपके लिए। इस बात को सून कर सोम प्रकाश कुछ उलझन में पड़ गया।

ये सब बाते आज वह पहली बार कर रहे थे। कितने दिन से नेहा लता सोम प्रकाश के पास है परंतु वह उसका विश्वास आज तक नहीं जीत पाई थी। अब उसे एक उम्मीद की किरण नजर आई। देखों हम भी कैसे है की ठंड में बैठे रहे और हमें पता ही नहीं चला। और हां में सोम प्रकाश ने गर्दन हिलाई। तब नेहा लता ने पूछा की तुम्हें अगर भूख लगी है तो कुछ खाने को बनाऊं। इस बात को सून कर सोम प्रकाश ने मना कर दिया नहीं आज वहां बहुत ज्यादा खा गया। और हां नानी कब आयेगी। वह सोनी के साथ क्यों गई है। सोनी तो पहले नानी से बात भी नहीं करती थी।

तब नेहा लता कुछ हंसी की ऐसा ही काम है शायद सुबह तक आ जायेगी। और दोनों इस खुशी को अपने अंदर समेटे हुए गर्म बिस्तरों में लेट कर गहरी नींद में डूब गए। खुले आसमान पर तारे अभी भी चमक रहे थे। दूर कभी कहीं से रह-रह कर किसी सियार की दर्द भरी आवाज आ जाती थी। और उसके तुरंत बाद में कोई कर्कश ध्वनि पूरे वातावरण को थिर कर जाती थी। परंतु इस सब के कारण भी झींगुर की ताल अविरल चलती ही रहती थी। पूरी रात का वातावरण मानो गीत गान गा रहा है। वह अपने पूर्णता से समस्त पर एक छायी एक मदहोशी का वातावरण तैयार कर रहा था। जिस को सुनते हुए दोनो प्राणी गहरी नींद में चले गए थे। हरि प्रसाद तो अपनी चमक नींद में कब से सो हरा था। वह जागरण के साथ नींद का भी आनंद ले रहा था। आज रात की हवाओं में एक विश्वास था दोनों के एकांत में की वह और-और अधिक गहरा रहा था। परंतु निंद्रा रानी है की मानो मधुर सपनों की लोरी से सब को सुला देना चाह रही है। ताकि खुद अंधकार भी एकांत का आनंद ले सके।

 

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