लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 23 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।
पहला प्रश्न:
भगवान, पैंगल उपनिषद के
अनुसार चार महावाक्य हैं।
पहला: तत्वमसि, वह तू है; दूसरा: त्वं तदसि, तू
वह है; तीसरा: त्वं ब्रह्मास्मि, तू
ब्रह्म है; और चौथा: अहं ब्रह्मास्मि, मैं
ब्रह्म हूं।
भगवान, इन महावाक्यों के
अर्थ और अर्थभेद बताने की अनुकंपा करें।
चिदानंद, उपनिषद सदगुरु और
शिष्य के बीच शून्य में हुआ संवाद है। आंखों-आंखों में बात हो गई है। हृदय ने हृदय
पर गीत गाया है। न तो गुरु ने कुछ कहा है और न शिष्य ने कुछ सुना है, फिर भी गुरु ने सब कह दिया और शिष्य ने सब सुन लिया है।
गुरु के साथ तीन प्रकार के संबंध हो सकते हैं। विद्यार्थी का; तब गुरु केवल शिक्षक होता है। वहां वाणी आवश्यक है। संवाद जरूरी है।
क्योंकि बात बुद्धि से बुद्धि तक होगी। वह सबसे ऊपरी नाता है। विद्यार्थी जिज्ञासु
है, मुमुक्षु नहीं। जानना चाहता है, होना
नहीं। होने के लिए तो न होने की तैयारी चाहिए। जानने में कुछ कीमत चुकानी नहीं
पड़ती। जानकारी इकट्ठी करके और भी अहंकार को रस आता है। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती है
वैसे-वैसे अहंकार और परिपुष्ट होता है।






