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गुरुवार, 8 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-12

बारहवां प्रवचनअभी और यहीं है भक्ति

दिनांक १२ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्न-सार :
1—भगवान, भक्ति और भोग में क्या कुछ आंतरिक तारतम्य है?
2—एक मित्र ने...सुझाव दिया है! कि नारद के सूत्र में सुधार होना चाहिए!
3—क्या कारण है कि कामवासना के उठने पर होश में भी उसकी प्रगाढ़ता बनी रहती है?
4—जिसे आप स्वप्न कहते हैं, वह हमें सत्य मालूम देता है और आपका सत्य हमारे लिए स्वप्नवत है। किसकी गंगा उलटी बहती है?
5—सत्रह-अठारह वर्ष की उम्र में मेरे पिताजी धूनीवाले बाबा के सान्निध्य में कुछ अनुभव पाकर विक्षिप्त हो गए, समाज में स्वीकृत न हो सके...! अब जीवन के अंतिम चरण में उनके लिए नये जन्म की क्या कोई संभावना है?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-11

ग्यारहवां प्रवचन—शून्य की झील में प्रेम का कमल है भक्ति

दिनांक ११ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र :
दुःसंगः सर्वथैव त्याज्य
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात्
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति
कस्तरति कस्तरति मायाम? यः संगास्त्यजति यो
महानुभावं सेवते निर्ममो भवति
यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति,
निस्त्रैगुण्यौ भवति, योगक्षेमं त्यजति
यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति
वेदानपि संन्यस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते
स तरति स तरति स लोकांस्तारयति

बुधवार, 7 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-10

दसवां प्रवचन—परम मुक्ति है भक्ति

दिनांक २० जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्नसार :
1—मुझे कभी लगता है कि मैंने आपसे बहुत-बहुत पाया है और कभी यह भी कि मैं आपसे बहुत चूक रहा हूं। ऐसा क्यों?
2—एक भक्त भगवान होना पसंद करे और दूसरा सिर्फ भक्त रहना चाहे, तो दोनों में श्रेष्ठ कौन है?
3—"भक्त्या अनुवृत्या' ऐसा कहा है, तो भक्ति साकार ही होना चाहिए। सूर्य सूर्यलोक में साकार ही है, वैसे ही भगवान भी साकार क्यों नहीं?
4—आशीर्वाद क्या है? गुरु शिष्य के सिर पर क्या प्रेषित करता है? क्या आशिर्वाद लेने की क्षमता होती है?
5—कल के प्रवचन में अचानक कुछ घटा!...प्रणाम स्वीकार करें!
6—क्या भक्ति-सूत्र के रचयिता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-09

नौवां प्रवचन—हृदय का आंदोलन है भक्ति

दिनांक १९ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र :
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्यः
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च
अव्यावृतभजनात्
लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा
महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्
तदेव साध्यतां तदेव साध्याताम्

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-08

आठवां प्रवचन—अनंत के आंगन में नृत्य है भक्ति

दिनांक १८ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार

1—प्रेम भक्ति का जनक है या भक्ति प्रेम की जननी ? प्रेम कली है और भक्ति फूल? अथवा प्रेम आदि है और भक्ति अंत? या दोनों भिन्न हैं?
2—इस कथन में क्या सच्चाई है कि भक्ति है द्वैत और ज्ञान है अद्वैत?
3—संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र क्यों जरूरी हैं?
4—सुरक्षा के लिए मुझे जो नाटक करना पड़ता है, उसे करूं या छोड़ दूं?
5—अगर ज्ञान भक्ति के लिए बाधा है, फिर महातार्किक और महापंडित चैतन्य एकदम से भक्त कैसे हो गए?
6—सैकड़ों बार भ्रम के टूटने पर भी भरोसा नहीं आता। क्या करूं?
7—भक्त कण-कण में भगवान को देखता है। लेकिन जिसे सिर्फ आपका पता है, कण में बसनेवाले भगवान का नहीं, उसके लिए क्या साधना होगी?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-07

सातवां प्रवचन—योग और भोग का संगीत है भक्ति

दिनांक 17 जनवरी, 1976; रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :
सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा।
फलरूपत्वात्।
ईश्वरस्या६यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च।
तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके।
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये।
स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः।
राजगृह भोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्।
न तेन राजपरितोषः क्षुधाशांतिर्वा।
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-06

छठवां प्रवचन—प्रसादस्वरूपा है भक्ति

दिनांक १६ जनवरी, १९७६; रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार :
1—विराट का अनुभव किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त होता ही है। क्या ऐसा नहीं है?
2—आये थे दर पर तेरे सिर झुकाने के लिए, उठता नहीं है सिर अब वापस जाने के लिए...!
3—प्रवचन सुनते समय प्रेम-विभोर हो आंसू बहने लगते हैं और अचेतन में अहंकार को रस आता है कि अहोभाव के आंसू बहा रहा हूं। क्या इससे अद्वैत का रूखा-सूखा मार्ग अच्छा नहीं?
4—क्या विधिविहित पूजा-प्रार्थना व्यर्थ है?
5—एक हम हैं कि...प्यासे ही जाते हैं!
6—इश्क पर जोर नहीं ये तो आतिश "गालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे। फिर देवर्षि नारद ने प्रेम पर यह शास्त्र क्यों लिखा?

मंगलवार, 6 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-05

पांचवां प्रवचन—कलाओं की कला है भक्ति

दिनांक 15 जनवरी, 1976; श्री रजनीश आश्रम, पूना
 सूत्र :
तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ।।
पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः।।
कथादिष्विति वर्गः।।
आत्मरत्यविरोधेनेति शांडिल्यः।।
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता
तद्धिस्मरणे परमव्याकुलतेति
यथा वज्रगोपिकानाम्।।
तद्धिहीनं जाराणामिव।।
नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम्।।

विराट का अनुभव--मुश्किल! पर अनुभव से भी ज्यादा मुश्किल है अभिव्यक्ति। जान लेना बहुत मुश्किल--जान देना और भी ज्यादा मुश्किल! क्योंकि व्यक्ति मिट सकता है...बूंद खो सकती है सागर में, और अनुभव कर ले सकती है सागर का; लेकिन दूसरी बूंदों को कैसे कहें, जिन्होंने मिटना नहीं जाना, जो अभी अपनी पुरानी सीमाओं में आबद्ध हैं...उनको कैसे कहें!

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-04

चौथा प्रवचन—सहजस्फूर्त अनुशासन है भक्ति

दिनांक १४ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्न-सार
1—जीवन की व्यर्थता का बोध ही क्या जीवन में अर्थवत्ता का प्रारंभ-बिंदु बन जाता है?
इस विराट अस्तित्व में मैं नाकुछ हूं, यह अप्रिय तथ्य स्वीकारने में बहुत भय पकड़ता है। इस भय से कैसे ऊपर उठा जाए?
2—आपसे मिलकर भी यदि हमारा उद्धार न हुआ, तब तो शायद असंभव ही है। कम से कम मुझ निरीह पर तो रहम खाइए।
3—कल के सूत्र में कहा गया कि लौकिक और वैदिक कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं और निरोध भक्ति का स्वभाव है।: और फिर, यह भी कहा गया कि भक्त को शास्त्रोक्त कर्म विधिपूर्वक करते रहना चाहिए। कृपया इस विरोध को स्पष्ट करें।
4—जिसे भक्ति में अनन्यता कहा है, क्या वही दर्शन का अद्वैत नहीं है?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-03

तीसरा प्रवचन--बड़ी संवेदनशील है भक्ति

दिनांक १३ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम पूना
सूत्र
सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।।
निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः।।
तस्मिन्नन्यता तद्धिरोधिषूदासीनता च।।
अन्याश्रयाणां त्यागो५नन्यता।।
लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्धिरोधिषूदासीनता।।
भवतु निश्चयदाढर्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्।।
अन्यथा पातित्याशङ्कया।।
लोको५पि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीधारणावधि।।

जीवन की व्यर्थता जब तक प्रगाढ़ अनुभव न बन जाए तब तक परमात्मा की खोज शुरू नहीं होती। जीवन की व्यर्थता का बोध ही उसकी तरफ पहला कदम है। जब तक ऐसी भ्रांति बनी है कि यहां कुछ खोज लेंगे, पा लेंगे, यहां कुछ मिल जायेगा सपनों की दुनिया में--तब तक परमात्मा भी एक सपना ही है; तब तक तुम उसे खोजने नहीं निकलते; तब तक तुम स्वयं को दांव पर भी नहीं लगाते।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-02


दूसरा प्रवचन-स्वयं को मिटाने की कला है भक्ति

दिनांक १२ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1--"अथातो'--"अब का मोड़-बिंदु हम सामान्य सांसारिक जनों के जीवन में कब आ पाता है?
2--भक्ति की यात्रा और सदगुरू के बीच कैसा संबंध है?
3--साधना भी है और सिद्धि भी। कृपापूर्वक उसके अलग-अलग रूपों को हमें समझाएं।
4--मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैं अधपका फल हूं...?
5--क्या भक्ति-साधना के भी कुछ साधन हैं, या वह सर्वथा स्वतः स्फूर्त और सहज है?

पहला प्रश्न-- "अथातो--' "अब' का मोड़-बिंदु हम सामान्य सांसारिक जनों के जीवन में कब आ पाता है? कृपा कर समझाएं।
पहली बात कि सामान्य कोई भी नहीं है। यदि तुम सामान्य होते तो फिर "अथातो' का बिंदु कभी भी न आ पाता।
सामान्य कोई भी नहीं है, क्योंकि परमात्मा छिपा बैठा है। और परमात्मा से ज्यादा असामान्य क्या होगा?
असाधारण हो तुम। तुमने समझा होगा, कंकड़-पत्थर हो। और कंकड़-पत्थर तुम नहीं हो। कंकड़-पत्थर हैं ही नहीं अस्तित्व में। अस्तित्व केवल हीरों से बना है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-01

भक्तिसूत्र (नारद)—ओशो

पहला प्रवचन— परम प्रेमरूपा है भक्ति
सूत्र
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।। १ ।।
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।। २ ।।
अमृतस्वरूपा च।। ३ ।।
यल्लब्ध्वा पुमान सिद्धो भवति
अमृतो भवति तृप्तो भवति।। ४ ।।
यत्प्राप्य न किग्चिक्षाग्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति।। ५ ।।
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति
आत्मारामो भवति।। ६ ।।

जीवन है ऊर्जा -- ऊर्जा का सागर। समय के किनारे पर अथक, अंतहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं: न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत; बस मध्य है, बीच है। मनुष्य भी उसमें एक छोटी तरंग है; एक छोटा बीज है -- अनंत संभावनाओं का।
तरंग की आकांक्षा स्वाभाविक है कि सागर हो जाए और बीज की आकांक्षा स्वाभाविक है कि वृक्ष हो जाए। बीज जब तक फूलों में खिले न, तब तक तृप्ति संभव नहीं है।

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-10

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
नए सूर्य को नमस्कार-(प्रवचन-दसवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
कहते हैं कि बुद्ध पुरुष जहां वास करते हैं, जहां भ्रमण करते हैं, वे स्थान तीर्थ बन जाते हैं। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि संत स्वयं तीर्थों को पवित्र करते हैं। स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति संतः। यह बात समझ में नहीं आती।
भगवान, समझाने की अनुकंपा करें।

सहजानंद,
पहली बात अगर समझ में आती है तो दूसरी भी जरूर समझ में आएगी। और यदि दूसरी समझ में नहीं आती तो पहली भी समझ में आई नहीं, सिर्फ समझने का भ्रम हुआ है। क्योंकि पहली बात ज्यादा कठिन है, दूसरी बात तो बहुत सरल है।
पहला सूत्र है कि जहां उठते बैठते, जहां बुद्ध चलते-विचरते, वहां तीर्थ बन जाते हैं। तीर्थ का अर्थ.समझो। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति अज्ञात में प्रवेश कर सके। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति मन से छलांग लगा सके--अमन में। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति समय को पीछे छोड़ दे और समयातीत का अनुभव करे। प्रभु का साक्षात्कार जहां हो जाए, वहीं तीर्थ है। और प्रभु का साक्षात्कार तो बुद्धों की सन्निधि में हो सकता है। वे ही सेतु है।

बहुरि ने ऐसा दाेव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-09

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
आओ, बैठो--शून्य की नाव में-(प्रवचन-नौवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपके विचार मेरे विचारों से मिलते हैं। क्या मैं आपके किसी काम आ सकता हूं?

रामदास गुलाटी,
यह तो भूल से ही भूल हो गई। अगर मेरे विचार तुम्हारे विचारों से मिलते हैं तो मुझे पूछना चाहिए कि क्या तुम्हारे किसी काम आ सकता हूं। तुम्हारे पास तो पहले से ही बोध है। तुम्हें तो शिष्यों की तलाश है, गुरु की नहीं। और तुम्हारे पास अगर विचार हैं ही, तो उन्हें क्या मिलाते फिर रहे हो?
लेकिन यही स्थिति बहुत लोगों की है, कहें या न कहें। तुमने बात सीधी-सीधी कह दी है। चंडीगढ़ से हो, पंजाबी हो। तुम्हें बात कहनी न आई। नहीं, लोगों को मतलब यही होता है जो तुम कह रहे हो, लेकिन कहते वे जरा और ढंग से हैं, जरा छिपा कर कहते हैं। तुमने नग्न सत्य कह दिया।
लोगों को सत्य से कोई संबंध नहीं है; उनके विचारों से जो विचार मिलते हों, वे उन्हें सत्य मालूम होते हैं। जैसे कि उनके विचार सत्य हैं, इसमें तो संदेह का कोई सवाल ही नहीं! सत्य तो उन्होंने पाया ही हुआ है! पक्षपात, संस्कार, दूसरों से सुनी हुई बातें, उधार ज्ञान--उसी का तुम अपने विचार कह रहे हो। तुम ही नहीं हो तो तुम्हारे विचार कैसे होंगे? और कभी थोड़ा मनन किया, एक भी विचार तुम्हारा है? खोजोगे, तलाशोगे तो पाओगे सब उधार है, उच्छिष्ट है। कोई गीता का होगा, कोई कुरान का होगा, कोई गुरुग्रंथ साहब का होगा। कोई यहां से कोई वहां से। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा! और इस कुनबे को तुम कहते हो--मेरे विचार!

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-08

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
जिन खोजा तिन पाइयां-(प्रवचन-आठवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
मैं क्या करूं? मेरे लिए क्या आदेश है?
दिनकर,
मैं करने पर जोर नहीं देता हूं। मेरा जोर है होने पर। कृत्य तो बाहरी घटना है--मनुष्य के जीवन की परिधि है, केंद्र नहीं। और परिधि को हम कितना ही सजा लें, आत्मा वैसी की वैसी दरिद्र की दरिद्र ही बनी रहती है। लेकिन सदियों से यह अभिशाप मनुष्य की छाती पर सवार रहा है: यह करने का भूत--क्या करें! नहीं कोई पूछता कि मैं कौन हूं। बिना यह जाने कि मैं कौन हूं, लोग पूछे चले जाते हैं--क्या करूं? फिर तुम जो भी करोगे गलत होगा। भीतर तो अंधेरा है; फिर नाम चाहे तुम दिनकर ही रखो, कुछ भेद न पड़ेगा। आंखें तो अंधी हैं, फिर चाहे तुम चश्मा ही लगा लो, तो भी किसी काम नहीं आएगा।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-07

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
संन्यास यानी ध्यान—(प्रवचन-सातवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
कुछ बनने की आस में उलझता रहा, कुछ न हुआ। सिर्फ यह बोध रह गया कि मैं हूं। न धन आया, न मकान बना, संगीत, न विद्वान बना। न जीना ही मुझको रास आया। वहां आ कर जीवन को एक नयी दिशा अनजाने ही दे दी। अतीत भटकाव में बीत गया, वर्तमान संन्यास में, और भविष्य का निर्णय आप करें, क्या होगा?

दीपक भारती,
जीवन में एक ही उलझाव है, बस एकमात्र उलझाव--और सबके जीवन में निरपवाद रूप से--कुछ बनने की आशा। तुम जो हो हो, अन्यथा नहीं हो सकते हो। अन्यथा होने की चेष्टा में ही चिंता है, विषाद है, संताप है। अन्यथा होने की चेष्टा में ही दुष्ट-चक्र पैदा होता है। फिर तुम अपने हाथ से नयी-नयी भंवरे खड़ी करते हो; डूबते हो, उबरते हो; डूबते हो, उबरते हो। तुम्हारी जिंदगी फिर एक लंबे सपनों का सिलसिला और हर सपने का बिखराव बन जाती है।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-06

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
मैं तो एक चुनौती हूं-(प्रवचन-छठवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
सितारवादक पंडित रविशंकर से जब हालैंड के प्रसिद्ध दैनिक पत्र वोल्क्सक्रान्ट के प्रतिनिधि ने आपके संबंध में पूछा तो उन्होंने जो वक्तव्य दिया वह इस प्रकार है: "इस लोकतांत्रिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति वह काम करने को स्वतंत्र है, जिसे वह उचित मानता है। इसलिए लोग अगर भगवान रजनीश के पास जाना चाहते हैं तो उन्हें स्वयं ही तय करना होगा। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूं, लेकिन वे पाश्चात्य लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय मालूम पड़ते हैं। आपको कुछ त्याग नहीं करना पड़ता है और पाश्चात्य जन जो चाहते हैं वे उसे सर्वाधिक मात्रा में वहां उपलब्ध करते हैं। अगर आपको यह द्वंद्व है तो यह चीज आपके सर्वथा योग्य है। वहां आपको सभी चीजें मिल सकती हैं--सेक्स, गांजा-भांग और आध्यात्मिक मुक्ति, सब एक साथ।'
भगवान, इतने बड़े कलाविद रविशंकर का आपको जाने बिना आप पर यह वक्तव्य देना क्या उचित था? क्या आप इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करेंगे?

आनंद रागेन,

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-05

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवां
पहला प्रश्न: भगवान,
आपने आचार्य तुलसी और मुनि नथमल पर अपने विचार व्यक्त किए। क्या इनकी साधना, आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभव के विषय में भी बताने की अनुकंपा करेंगे? इनके साधना-स्थल बिलकुल सूने पड़े हैं। अभी जैन विश्व भारती लाडनूं देखने का अवसर मिला, सुजानगढ़ शिविर के समय। दो करोड़ की लागत से खड़ी संस्था में इमारतें तो बहुत हैं, लेकिन साधक बहुत ही कम। आचार्य तुलसी एवं मुनि नथमल दोनों वहां हैं, फिर भी कोई भीड़ साधकों की नहीं है। मुनि नथमल आपकी तरह शिविर भी लेने लगे हैं और उनके ध्वनि-मुद्रित प्रवचन भी तैयार होने लगे हैं। मुनि नथमल कहते हैं: "संगीत से ध्यान में गति एक सीमा से आगे नहीं होती है।' आचार्य तुलसी ने अपने शिष्यों को कहा है कि वे आपका साहित्य न पढ़ें। लेकिन जैन साधु एवं साध्वी मेरे यहां ठहरते हैं, आपकी पुस्तकें पढ़ते हैं व टेप सुनते हैं और वे आपसे प्रभावित हैं। फिर इनके आचार्य आपका क्यों विरोध करते हैं? कृपया समझाएं।

स्वामी धर्मतीर्थ,

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-04

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर)–ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
स्वस्थ हो जाना उपनिषद है-(प्रवचन-चौथा)
पहला प्रश्न: भगवान,
तैत्तरीयोपनिषद में एक कथा है कि गुरु ने शिष्य से नाराज हो कर उसे अपने द्वारा सिखाई गई विद्या त्याग देने को कहा। तो एवमस्तु कह कर शिष्य ने विद्या का वमन कर दिया, जिसे देवताओं ने तीतर का रूप धारण कर एकत्र कर लिया। वही तैत्तरीयोपनिषद कहलाया।
भगवान, इस उच्छिष्ट ज्ञान के संबंध में समझाने की कृपा करें।
जिनस्वरूप
इस संबंध में बहुत-सी बातें विचारणीय हैं। पहली तो बात यह है कि गुरु नाराज नहीं होता। दिखाए भला, अभिनय भला करे, नाराज नहीं होता। जो अपने से राजी हो गया, अब किसी और से नाराज नहीं हो सकता है। वह असंभावना है। इसलिए गुरु नाराज हुआ हो तो गुरु नहीं था।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-03

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
सारे धर्म मेरे हैं-(प्रवचन-तीसरा)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने उस दिन हमारे पूज्य आचार्य श्री तुलसीदास को भोंदूमल कहा तथा मुनि श्री नथमल को थोथूमल कहा तथा अन्य साधुओं को गधा कहा। जब आप हमारे पूज्य मुनियों और साधुओं को ऐसी गालियां देते हैं तो आपका विरोध क्यों न हो? भगवान महावीर ने तो साधुओं, मुनियों, सिद्धों आचार्यों और उपाध्यायों को नमस्कार कहा है, जिसका आपने महावीर-वाणी के एक प्रवचन में समर्थन भी किया है। फिर यह विरोधाभास क्यों?

हीरालाल जैन,
महावीर ने निश्चय ही अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को, साधुओं को नमस्कार कहा है। लेकिन भोंदूमल या थोथूमल, इनमें से कोई भी नहीं--न अरिहंत हैं, न सिद्ध हैं, न आचार्य हैं, न उपाध्याय हैं, न साधु हैं।
फिर भोंदूमल को भोंदूमल कहने में गाली कहां है? गुलाब को गुलाब कहने में गाली नहीं, तो गधे को गधे कहने में गाली कैसे हो जाएगी? जो जैसा है उसको जैसा ही कहना उचित है, उससे अन्यथा कहना असत्य है।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-02

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

 दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।

विज्ञान और धर्म का समन्वय-(प्रवचन-दूसरा)
पहला प्रश्न: भगवान,
आप गांधीवादी विचारधारा के विरोधी और आधुनिक प्रविधि और यंत्र के समर्थक मालूम पड़ते हैं। लेकिन आपको मालूम है कि प्रविधि और यंत्र के कारण पश्चिम का जीवन कितना अशांत और तनावग्रस्त एवं क्षुब्ध हो चला है। वह सामूहिक विक्षिप्तता के कगार पर खड़ा है। तब क्यों आप उसका अंध-समर्थन करते हैं?
चिमनभाई देसाई,

मैं विचारधाराओं मात्र का विरोधी हूं, गांधीवादी विचारधारा का ही नहीं। विचार के पार जाना है, तो किस वाद को मान कर तुम उलझे हो, इससे भेद नहीं पड़ता। किस झाड़ी के कांटों में उलझे हो, इससे मुझे बहुत प्रयोजन नहीं है। कांटों से मुक्त होना है। और मस्त विचार से ज्यादा नहीं है; उलझा सकते हैं, सुलझा नहीं  सकते। चूंकि मैं विचारधाराओं मात्र का विरोधी हूं, इसलिए स्वभावतः गांधीवादी विचार की झाड़ी भी उसमें एक झाड़ी है। और चूंकि नयी है, इसलिए बहुत लोगों को उलझा लेती है। विशेषकर भारतीय मन के लिए उसमें बड़ा आकर्षण है। वह आकर्षण रुग्ण है। उस आकर्षण के आंतरिक और अचेतन कारण बहुत हैरान करने वाले हैं। पहला तो कारण यह है कि गांधीवादी विचारधारा दरिद्र को गौरीशंकर पर बिठा देती है।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-01

बहुरि ने ऐसा दावं—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
जीवित गुरु--जीवंत धर्म—(प्रवचन-पहला)

पहला प्रश्न: भगवान,
जीवित सदगुरु के पास इतना खतरनाक क्यों है? सब कुछ दांव पर लगा कर आपके बुद्ध-ऊर्जा क्षेत्र में डूबने के लिए इतने कम लोग क्यों आ पाते हैं? जबकि पलटू की तरह आपका आह्वान पूरे विश्व में गूंज उठा है--
बहुरि न ऐसा दाव, नहीं फिर मानुष होना,
क्या ताकै तू ठाढ़, हाथ से जाता सोना।
भगवान, अनुकंपा करें, बोध दें।
योग चिन्मय,
जीवन ही खतरनाक है। मृत्यु सुविधापूर्ण हैं। मृत्यु ज्यादा और आरामदायक कुछ भी नहीं। इसलिए लोग मृत्यु को वरण करते हैं, जीवन का निषेध।। लोग ऐसे जीते हैं, जिसमें कम से कम जीना पड़े, न्यूनतम--क्योंकि जितने कम जीएंगे उतना कम खतरा है; जितने ज्यादा जीएंगे उतना ज्यादा खतरा है। जितनी त्वरा होगी जीवन में उतनी ही आग होगी, उतनी ही तलवार में धार। जीवन को गहनता से जीना, समग्रता से जीना--पहाड़ों की ऊंचाइयों पर चलना है। ऊंचाइयों से कोई गिर सकता है। जो गिरने से डरते हैं, वे समतल भूमि पर सरकते हैं; चलते भी नहीं घिसटते हैं। उड़ने की तो बात दूर।
और सदगुरु के पास होना तो सूर्य की ओर उड़ान है।

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--218

मनन और निदिध्‍यासन(प्रवचनबीसवां)

अध्‍याय—18
सूत्र--

            कच्चिदेतव्छ्रुतं पार्थ त्‍वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिमानसंमोह: मनष्टस्ते धनंजय।। 72।।

अर्जन उवाच:
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्‍धा त्‍वत्ससादान्मयाव्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्‍ये वचनं तव।। 73।।

इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, है पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा स्नान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?
इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पाल करूंगा।

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

संत तोता पुरी--की समाधी--पुरी

परम हंस तौता पुरी-(समाधि)

कभी-कभी इत्फाक भी चमत्कार से लगता है। हम (मैं ओर अदवीता) पूरी जगन्नाथ की यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि दो दिन पहले एक हीरा मन तोता न जाने कहां से आ गया ओर वह आने के बाद ऐसा व्यवहार करने लगा कि जैसे सालो से हमे जानता है। मैरे हाथ से खाये पेड पोधो पर किलकारी भरे मैं कम्पूटर पर कर करू तो अंदर आकर मेरे पास बैठ जाये।
कितना आनंद और उत्सव में सराबोर था, इस टेहनी से उस टहनी पर कुदता फांदता कितना मन को मोह रहा था। मैं पेड पोधो को पानी डालते उसे खुब नहलाया वह कैसे फंख खोल कर नहा रहा था। जैसे उसे वो सब चाहिए। तब हम पूरी की और चले गये वहां पहुचने पर बेटी बोधी उनमनी में कहा की वह तोता तो अपको चारो ओर ढूंढ रहा है ओर बहुत शौर मचा रहा है मैंने उसे सेब आदि खाने के दिये परंतु वह कुछ ढूढता सा प्रतित हो रहा है और मेरे नीचे चले जाने के बाद बहुत शौर मचा रहा है काम करने वाली भी कह रही थी की मेरे पास आ कुछ कहना चाहता था। ओर उसका भी दिल भर आया। कि शायद मम्मी-पापा को ढूंढ रहा है। ओर सच वह श्याम होते न होते उड गया। बेटी ने फोन किया की पापा वह तोता तो उड गया....शयद आपको ढूंढता रहा...ओर आप उपर नहीं आये तो चला गया।