बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो
दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
आओ, बैठो--शून्य की नाव
में-(प्रवचन-नौवां)
पहला प्रश्न: भगवान,
आपके विचार मेरे विचारों से मिलते हैं। क्या मैं
आपके किसी काम आ सकता हूं?
रामदास गुलाटी,
यह तो भूल से ही भूल हो गई। अगर मेरे विचार तुम्हारे विचारों से मिलते
हैं तो मुझे पूछना चाहिए कि क्या तुम्हारे किसी काम आ सकता हूं। तुम्हारे पास तो
पहले से ही बोध है। तुम्हें तो शिष्यों की तलाश है, गुरु की नहीं। और
तुम्हारे पास अगर विचार हैं ही, तो उन्हें क्या मिलाते फिर
रहे हो?
लेकिन यही स्थिति बहुत लोगों की है, कहें या न कहें।
तुमने बात सीधी-सीधी कह दी है। चंडीगढ़ से हो, पंजाबी हो।
तुम्हें बात कहनी न आई। नहीं, लोगों को मतलब यही होता है जो
तुम कह रहे हो, लेकिन कहते वे जरा और ढंग से हैं, जरा छिपा कर कहते हैं। तुमने नग्न सत्य कह दिया।
लोगों को सत्य से कोई संबंध नहीं है; उनके विचारों से जो
विचार मिलते हों, वे उन्हें सत्य मालूम होते हैं। जैसे कि
उनके विचार सत्य हैं, इसमें तो संदेह का कोई सवाल ही नहीं!
सत्य तो उन्होंने पाया ही हुआ है! पक्षपात, संस्कार, दूसरों से सुनी हुई बातें, उधार ज्ञान--उसी का तुम
अपने विचार कह रहे हो। तुम ही नहीं हो तो तुम्हारे विचार कैसे होंगे? और कभी थोड़ा मनन किया, एक भी विचार तुम्हारा है?
खोजोगे, तलाशोगे तो पाओगे सब उधार है, उच्छिष्ट है। कोई गीता का होगा, कोई कुरान का होगा,
कोई गुरुग्रंथ साहब का होगा। कोई यहां से कोई वहां से। कहीं का ईंट
कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा! और इस कुनबे को तुम
कहते हो--मेरे विचार!