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मंगलवार, 6 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-01

भक्तिसूत्र (नारद)—ओशो

पहला प्रवचन— परम प्रेमरूपा है भक्ति
सूत्र
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।। १ ।।
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।। २ ।।
अमृतस्वरूपा च।। ३ ।।
यल्लब्ध्वा पुमान सिद्धो भवति
अमृतो भवति तृप्तो भवति।। ४ ।।
यत्प्राप्य न किग्चिक्षाग्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति।। ५ ।।
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति
आत्मारामो भवति।। ६ ।।

जीवन है ऊर्जा -- ऊर्जा का सागर। समय के किनारे पर अथक, अंतहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं: न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत; बस मध्य है, बीच है। मनुष्य भी उसमें एक छोटी तरंग है; एक छोटा बीज है -- अनंत संभावनाओं का।
तरंग की आकांक्षा स्वाभाविक है कि सागर हो जाए और बीज की आकांक्षा स्वाभाविक है कि वृक्ष हो जाए। बीज जब तक फूलों में खिले न, तब तक तृप्ति संभव नहीं है।

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-10

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
नए सूर्य को नमस्कार-(प्रवचन-दसवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
कहते हैं कि बुद्ध पुरुष जहां वास करते हैं, जहां भ्रमण करते हैं, वे स्थान तीर्थ बन जाते हैं। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि संत स्वयं तीर्थों को पवित्र करते हैं। स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति संतः। यह बात समझ में नहीं आती।
भगवान, समझाने की अनुकंपा करें।

सहजानंद,
पहली बात अगर समझ में आती है तो दूसरी भी जरूर समझ में आएगी। और यदि दूसरी समझ में नहीं आती तो पहली भी समझ में आई नहीं, सिर्फ समझने का भ्रम हुआ है। क्योंकि पहली बात ज्यादा कठिन है, दूसरी बात तो बहुत सरल है।
पहला सूत्र है कि जहां उठते बैठते, जहां बुद्ध चलते-विचरते, वहां तीर्थ बन जाते हैं। तीर्थ का अर्थ.समझो। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति अज्ञात में प्रवेश कर सके। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति मन से छलांग लगा सके--अमन में। तीर्थ का अर्थ होता है: जहां से व्यक्ति समय को पीछे छोड़ दे और समयातीत का अनुभव करे। प्रभु का साक्षात्कार जहां हो जाए, वहीं तीर्थ है। और प्रभु का साक्षात्कार तो बुद्धों की सन्निधि में हो सकता है। वे ही सेतु है।

बहुरि ने ऐसा दाेव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-09

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
आओ, बैठो--शून्य की नाव में-(प्रवचन-नौवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपके विचार मेरे विचारों से मिलते हैं। क्या मैं आपके किसी काम आ सकता हूं?

रामदास गुलाटी,
यह तो भूल से ही भूल हो गई। अगर मेरे विचार तुम्हारे विचारों से मिलते हैं तो मुझे पूछना चाहिए कि क्या तुम्हारे किसी काम आ सकता हूं। तुम्हारे पास तो पहले से ही बोध है। तुम्हें तो शिष्यों की तलाश है, गुरु की नहीं। और तुम्हारे पास अगर विचार हैं ही, तो उन्हें क्या मिलाते फिर रहे हो?
लेकिन यही स्थिति बहुत लोगों की है, कहें या न कहें। तुमने बात सीधी-सीधी कह दी है। चंडीगढ़ से हो, पंजाबी हो। तुम्हें बात कहनी न आई। नहीं, लोगों को मतलब यही होता है जो तुम कह रहे हो, लेकिन कहते वे जरा और ढंग से हैं, जरा छिपा कर कहते हैं। तुमने नग्न सत्य कह दिया।
लोगों को सत्य से कोई संबंध नहीं है; उनके विचारों से जो विचार मिलते हों, वे उन्हें सत्य मालूम होते हैं। जैसे कि उनके विचार सत्य हैं, इसमें तो संदेह का कोई सवाल ही नहीं! सत्य तो उन्होंने पाया ही हुआ है! पक्षपात, संस्कार, दूसरों से सुनी हुई बातें, उधार ज्ञान--उसी का तुम अपने विचार कह रहे हो। तुम ही नहीं हो तो तुम्हारे विचार कैसे होंगे? और कभी थोड़ा मनन किया, एक भी विचार तुम्हारा है? खोजोगे, तलाशोगे तो पाओगे सब उधार है, उच्छिष्ट है। कोई गीता का होगा, कोई कुरान का होगा, कोई गुरुग्रंथ साहब का होगा। कोई यहां से कोई वहां से। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा! और इस कुनबे को तुम कहते हो--मेरे विचार!

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-08

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
जिन खोजा तिन पाइयां-(प्रवचन-आठवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
मैं क्या करूं? मेरे लिए क्या आदेश है?
दिनकर,
मैं करने पर जोर नहीं देता हूं। मेरा जोर है होने पर। कृत्य तो बाहरी घटना है--मनुष्य के जीवन की परिधि है, केंद्र नहीं। और परिधि को हम कितना ही सजा लें, आत्मा वैसी की वैसी दरिद्र की दरिद्र ही बनी रहती है। लेकिन सदियों से यह अभिशाप मनुष्य की छाती पर सवार रहा है: यह करने का भूत--क्या करें! नहीं कोई पूछता कि मैं कौन हूं। बिना यह जाने कि मैं कौन हूं, लोग पूछे चले जाते हैं--क्या करूं? फिर तुम जो भी करोगे गलत होगा। भीतर तो अंधेरा है; फिर नाम चाहे तुम दिनकर ही रखो, कुछ भेद न पड़ेगा। आंखें तो अंधी हैं, फिर चाहे तुम चश्मा ही लगा लो, तो भी किसी काम नहीं आएगा।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-07

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
संन्यास यानी ध्यान—(प्रवचन-सातवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
कुछ बनने की आस में उलझता रहा, कुछ न हुआ। सिर्फ यह बोध रह गया कि मैं हूं। न धन आया, न मकान बना, संगीत, न विद्वान बना। न जीना ही मुझको रास आया। वहां आ कर जीवन को एक नयी दिशा अनजाने ही दे दी। अतीत भटकाव में बीत गया, वर्तमान संन्यास में, और भविष्य का निर्णय आप करें, क्या होगा?

दीपक भारती,
जीवन में एक ही उलझाव है, बस एकमात्र उलझाव--और सबके जीवन में निरपवाद रूप से--कुछ बनने की आशा। तुम जो हो हो, अन्यथा नहीं हो सकते हो। अन्यथा होने की चेष्टा में ही चिंता है, विषाद है, संताप है। अन्यथा होने की चेष्टा में ही दुष्ट-चक्र पैदा होता है। फिर तुम अपने हाथ से नयी-नयी भंवरे खड़ी करते हो; डूबते हो, उबरते हो; डूबते हो, उबरते हो। तुम्हारी जिंदगी फिर एक लंबे सपनों का सिलसिला और हर सपने का बिखराव बन जाती है।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-06

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
मैं तो एक चुनौती हूं-(प्रवचन-छठवां)

पहला प्रश्न: भगवान,
सितारवादक पंडित रविशंकर से जब हालैंड के प्रसिद्ध दैनिक पत्र वोल्क्सक्रान्ट के प्रतिनिधि ने आपके संबंध में पूछा तो उन्होंने जो वक्तव्य दिया वह इस प्रकार है: "इस लोकतांत्रिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति वह काम करने को स्वतंत्र है, जिसे वह उचित मानता है। इसलिए लोग अगर भगवान रजनीश के पास जाना चाहते हैं तो उन्हें स्वयं ही तय करना होगा। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूं, लेकिन वे पाश्चात्य लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय मालूम पड़ते हैं। आपको कुछ त्याग नहीं करना पड़ता है और पाश्चात्य जन जो चाहते हैं वे उसे सर्वाधिक मात्रा में वहां उपलब्ध करते हैं। अगर आपको यह द्वंद्व है तो यह चीज आपके सर्वथा योग्य है। वहां आपको सभी चीजें मिल सकती हैं--सेक्स, गांजा-भांग और आध्यात्मिक मुक्ति, सब एक साथ।'
भगवान, इतने बड़े कलाविद रविशंकर का आपको जाने बिना आप पर यह वक्तव्य देना क्या उचित था? क्या आप इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करेंगे?

आनंद रागेन,

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-05

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवां
पहला प्रश्न: भगवान,
आपने आचार्य तुलसी और मुनि नथमल पर अपने विचार व्यक्त किए। क्या इनकी साधना, आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभव के विषय में भी बताने की अनुकंपा करेंगे? इनके साधना-स्थल बिलकुल सूने पड़े हैं। अभी जैन विश्व भारती लाडनूं देखने का अवसर मिला, सुजानगढ़ शिविर के समय। दो करोड़ की लागत से खड़ी संस्था में इमारतें तो बहुत हैं, लेकिन साधक बहुत ही कम। आचार्य तुलसी एवं मुनि नथमल दोनों वहां हैं, फिर भी कोई भीड़ साधकों की नहीं है। मुनि नथमल आपकी तरह शिविर भी लेने लगे हैं और उनके ध्वनि-मुद्रित प्रवचन भी तैयार होने लगे हैं। मुनि नथमल कहते हैं: "संगीत से ध्यान में गति एक सीमा से आगे नहीं होती है।' आचार्य तुलसी ने अपने शिष्यों को कहा है कि वे आपका साहित्य न पढ़ें। लेकिन जैन साधु एवं साध्वी मेरे यहां ठहरते हैं, आपकी पुस्तकें पढ़ते हैं व टेप सुनते हैं और वे आपसे प्रभावित हैं। फिर इनके आचार्य आपका क्यों विरोध करते हैं? कृपया समझाएं।

स्वामी धर्मतीर्थ,

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-04

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर)–ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
स्वस्थ हो जाना उपनिषद है-(प्रवचन-चौथा)
पहला प्रश्न: भगवान,
तैत्तरीयोपनिषद में एक कथा है कि गुरु ने शिष्य से नाराज हो कर उसे अपने द्वारा सिखाई गई विद्या त्याग देने को कहा। तो एवमस्तु कह कर शिष्य ने विद्या का वमन कर दिया, जिसे देवताओं ने तीतर का रूप धारण कर एकत्र कर लिया। वही तैत्तरीयोपनिषद कहलाया।
भगवान, इस उच्छिष्ट ज्ञान के संबंध में समझाने की कृपा करें।
जिनस्वरूप
इस संबंध में बहुत-सी बातें विचारणीय हैं। पहली तो बात यह है कि गुरु नाराज नहीं होता। दिखाए भला, अभिनय भला करे, नाराज नहीं होता। जो अपने से राजी हो गया, अब किसी और से नाराज नहीं हो सकता है। वह असंभावना है। इसलिए गुरु नाराज हुआ हो तो गुरु नहीं था।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-03

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
सारे धर्म मेरे हैं-(प्रवचन-तीसरा)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने उस दिन हमारे पूज्य आचार्य श्री तुलसीदास को भोंदूमल कहा तथा मुनि श्री नथमल को थोथूमल कहा तथा अन्य साधुओं को गधा कहा। जब आप हमारे पूज्य मुनियों और साधुओं को ऐसी गालियां देते हैं तो आपका विरोध क्यों न हो? भगवान महावीर ने तो साधुओं, मुनियों, सिद्धों आचार्यों और उपाध्यायों को नमस्कार कहा है, जिसका आपने महावीर-वाणी के एक प्रवचन में समर्थन भी किया है। फिर यह विरोधाभास क्यों?

हीरालाल जैन,
महावीर ने निश्चय ही अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को, साधुओं को नमस्कार कहा है। लेकिन भोंदूमल या थोथूमल, इनमें से कोई भी नहीं--न अरिहंत हैं, न सिद्ध हैं, न आचार्य हैं, न उपाध्याय हैं, न साधु हैं।
फिर भोंदूमल को भोंदूमल कहने में गाली कहां है? गुलाब को गुलाब कहने में गाली नहीं, तो गधे को गधे कहने में गाली कैसे हो जाएगी? जो जैसा है उसको जैसा ही कहना उचित है, उससे अन्यथा कहना असत्य है।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-02

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –ओशो

 दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।

विज्ञान और धर्म का समन्वय-(प्रवचन-दूसरा)
पहला प्रश्न: भगवान,
आप गांधीवादी विचारधारा के विरोधी और आधुनिक प्रविधि और यंत्र के समर्थक मालूम पड़ते हैं। लेकिन आपको मालूम है कि प्रविधि और यंत्र के कारण पश्चिम का जीवन कितना अशांत और तनावग्रस्त एवं क्षुब्ध हो चला है। वह सामूहिक विक्षिप्तता के कगार पर खड़ा है। तब क्यों आप उसका अंध-समर्थन करते हैं?
चिमनभाई देसाई,

मैं विचारधाराओं मात्र का विरोधी हूं, गांधीवादी विचारधारा का ही नहीं। विचार के पार जाना है, तो किस वाद को मान कर तुम उलझे हो, इससे भेद नहीं पड़ता। किस झाड़ी के कांटों में उलझे हो, इससे मुझे बहुत प्रयोजन नहीं है। कांटों से मुक्त होना है। और मस्त विचार से ज्यादा नहीं है; उलझा सकते हैं, सुलझा नहीं  सकते। चूंकि मैं विचारधाराओं मात्र का विरोधी हूं, इसलिए स्वभावतः गांधीवादी विचार की झाड़ी भी उसमें एक झाड़ी है। और चूंकि नयी है, इसलिए बहुत लोगों को उलझा लेती है। विशेषकर भारतीय मन के लिए उसमें बड़ा आकर्षण है। वह आकर्षण रुग्ण है। उस आकर्षण के आंतरिक और अचेतन कारण बहुत हैरान करने वाले हैं। पहला तो कारण यह है कि गांधीवादी विचारधारा दरिद्र को गौरीशंकर पर बिठा देती है।

बहुरि ने ऐसा दांव—(प्रश्नोतर) –प्रवचन-01

बहुरि ने ऐसा दावं—(प्रश्नोतर) –ओशो

दिनांक 01-08-1980 से 10-08-1980 तक
आशो आश्रम पूना।
जीवित गुरु--जीवंत धर्म—(प्रवचन-पहला)

पहला प्रश्न: भगवान,
जीवित सदगुरु के पास इतना खतरनाक क्यों है? सब कुछ दांव पर लगा कर आपके बुद्ध-ऊर्जा क्षेत्र में डूबने के लिए इतने कम लोग क्यों आ पाते हैं? जबकि पलटू की तरह आपका आह्वान पूरे विश्व में गूंज उठा है--
बहुरि न ऐसा दाव, नहीं फिर मानुष होना,
क्या ताकै तू ठाढ़, हाथ से जाता सोना।
भगवान, अनुकंपा करें, बोध दें।
योग चिन्मय,
जीवन ही खतरनाक है। मृत्यु सुविधापूर्ण हैं। मृत्यु ज्यादा और आरामदायक कुछ भी नहीं। इसलिए लोग मृत्यु को वरण करते हैं, जीवन का निषेध।। लोग ऐसे जीते हैं, जिसमें कम से कम जीना पड़े, न्यूनतम--क्योंकि जितने कम जीएंगे उतना कम खतरा है; जितने ज्यादा जीएंगे उतना ज्यादा खतरा है। जितनी त्वरा होगी जीवन में उतनी ही आग होगी, उतनी ही तलवार में धार। जीवन को गहनता से जीना, समग्रता से जीना--पहाड़ों की ऊंचाइयों पर चलना है। ऊंचाइयों से कोई गिर सकता है। जो गिरने से डरते हैं, वे समतल भूमि पर सरकते हैं; चलते भी नहीं घिसटते हैं। उड़ने की तो बात दूर।
और सदगुरु के पास होना तो सूर्य की ओर उड़ान है।

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--218

मनन और निदिध्‍यासन(प्रवचनबीसवां)

अध्‍याय—18
सूत्र--

            कच्चिदेतव्छ्रुतं पार्थ त्‍वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिमानसंमोह: मनष्टस्ते धनंजय।। 72।।

अर्जन उवाच:
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्‍धा त्‍वत्ससादान्मयाव्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्‍ये वचनं तव।। 73।।

इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, है पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा स्नान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?
इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पाल करूंगा।

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

संत तोता पुरी--की समाधी--पुरी

परम हंस तौता पुरी-(समाधि)

कभी-कभी इत्फाक भी चमत्कार से लगता है। हम (मैं ओर अदवीता) पूरी जगन्नाथ की यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि दो दिन पहले एक हीरा मन तोता न जाने कहां से आ गया ओर वह आने के बाद ऐसा व्यवहार करने लगा कि जैसे सालो से हमे जानता है। मैरे हाथ से खाये पेड पोधो पर किलकारी भरे मैं कम्पूटर पर कर करू तो अंदर आकर मेरे पास बैठ जाये।
कितना आनंद और उत्सव में सराबोर था, इस टेहनी से उस टहनी पर कुदता फांदता कितना मन को मोह रहा था। मैं पेड पोधो को पानी डालते उसे खुब नहलाया वह कैसे फंख खोल कर नहा रहा था। जैसे उसे वो सब चाहिए। तब हम पूरी की और चले गये वहां पहुचने पर बेटी बोधी उनमनी में कहा की वह तोता तो अपको चारो ओर ढूंढ रहा है ओर बहुत शौर मचा रहा है मैंने उसे सेब आदि खाने के दिये परंतु वह कुछ ढूढता सा प्रतित हो रहा है और मेरे नीचे चले जाने के बाद बहुत शौर मचा रहा है काम करने वाली भी कह रही थी की मेरे पास आ कुछ कहना चाहता था। ओर उसका भी दिल भर आया। कि शायद मम्मी-पापा को ढूंढ रहा है। ओर सच वह श्याम होते न होते उड गया। बेटी ने फोन किया की पापा वह तोता तो उड गया....शयद आपको ढूंढता रहा...ओर आप उपर नहीं आये तो चला गया।

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

एक एक कदम--(प्रवचन-07)

एक एक कदम (विविध)-ओशो

संतति नियमन-प्रवचन-सातवां

मेरे प्रिय आत्मन्,
संतति-नियमन या परिवार नियोजन पर मैं कुछ कहूं, उसके पहले दोत्तीन बातें मैं आपसे कहना चाहूंगा।
पहली बात तो यह कहना चाहूंगा कि आदमी एक ऐसा जानवर है जो इतिहास से कुछ भी सीखता नहीं। इतिहास लिखता है, इतिहास बनाता है, लेकिन इतिहास से कुछ सीखता नहीं है। और यह इसलिए सबसे पहले कहना चाहता हूं कि इतिहास की सारी खोजों ने जो सबसे बड़ी बात प्रमाणित की है, वह यह कि इस पृथ्वी पर बहुत-से प्राणियों की जातियां अपने को बढ़ा कर पूरी तरह नष्ट हो गईं। इस जमीन पर बहुत शक्तिशाली पशुओं का निवास था, लेकिन वे अपने को बढ़ा कर नष्ट हो गए।

एक एक कदम--(प्रवचन-06)

एक एक कदम (विविध)-ओशो
समाज परिवर्तन के चौराहे पर-प्रवचन-छठवां  

मेरे प्रिय आत्मन् ,
समाज परिवर्तन के चौराहे पर--इस संबंध में थोड़ी-सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। आज सबसे पहले यह आपसे कहना चाहूंगा कि समाज बाद में बदलता है, पहले मनुष्य का मन बदल जाता है। और हमारा दुर्भाग्य है कि समाज तो परिवर्तन के करीब पहुंच रहा है, लेकिन हमारा मन बदलने को बिलकुल भी राजी नहीं है। समाज के बदलने का सूत्र ही यही है कि पहले मन बदल जाए, क्योंकि समाज को बदलेगा कौन?
चेतना बदलती है पहले, व्यवस्था बदलती है बाद में। लेकिन हमारी चेतना बदलने को बिलकुल भी तैयार नहीं है। और बड़ा आश्चर्य तो तब होता है कि वे लोग, जो समाज को बदलने के लिए उत्सुक हैं, वे भी चेतना को बदलने के लिए उत्सुक नहीं हैं। शायद उन्हें पता ही नहीं है कि चेतना के बिना बदले समाज कैसे बदलेगा! और अगर चेतना के बिना बदले समाज बदल भी गया तो वह बदलाहट वैसी ही होगी, जैसा आदमी न बदले और सिर्फ वस्त्र बदल जाएं, कपड़े बदल जाएं। वह बदलाहट बहुत ऊपरी होगी और हमारे भीतर प्राणों की धारा पुरानी ही बनी रहेगी।

एक एक कदम--(प्रवचन-05)

एक एक कदम (विविध)-ओशो

विचार क्रांति की आवश्यकता-प्रवचन-पांचवां
मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक आदमी परदेस गया, एक ऐसे देश में जहां की वह भाषा नहीं समझता है और न उसकी भाषा ही दूसरे लोग समझते हैं। उस देश की राजधानी में एक बहुत बड़े महल के सामने खड़े होकर उसने किसी से पूछा, यह भवन किसका है? उस आदमी ने कहा, कैवत्सन। उस आदमी का मतलब था: मैं आपकी भाषा नहीं समझा। लेकिन उस परदेसी ने समझा कि किसी 'कैवत्सन' नाम के आदमी का यह मकान है। उसके मन में बड़ीर् ईष्या पकड़ी उस आदमी के प्रति जिसका नाम कैवत्सन था। इतना बड़ा भवन था, इतना बहुमूल्य भवन था, हजारों नौकर-चाकर आते-जाते थे, सारे भवन पर संगमरमर था! उसके मन में बड़ीर् ईष्या हुई कैवत्सन के प्रति। और कैवत्सन कोई था ही नहीं! उस आदमी ने सिर्फ इतना कहा था कि मैं समझा नहीं कि आप क्या पूछते हैं।

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

एक एक कदम--(प्रवचन-04 )

एक एक कदम (विविध)-ओशो

संगठन और धर्म—प्रवचन-चौथा

सुबह मैंने आपकी बातें सुनीं। उस संबंध में पहली बात तो यह जान लेनी जरूरी है कि धर्म का कोई भी संगठन नहीं होता है; न हो सकता है। और धर्म के कोई भी संगठन बनाने का परिणाम धर्म को नष्ट करना ही होगा। धर्म नितांत वैयक्तिक बात है, एक-एक व्यक्ति के जीवन में घटित होती है; संगठन और भीड़ से उसका कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि और तरह के संगठन नहीं हो सकते हैं। सामाजिक संगठन हो सकते हैं, शैक्षणिक संगठन हो सकते हैं, नैतिक-सांस्कृतिक संगठन हो सकते हैं, राजनैतिक संगठन हो सकते हैं। सिर्फ धार्मिक संगठन नहीं हो सकता है।
यह बात ध्यान में रख लेनी जरूरी है कि अगर मेरे आस-पास इकट्ठे हुए मित्र कोई संगठन करना चाहते हैं, तो वह संगठन धार्मिक नहीं होगा। और उस संगठन में सम्मिलित हो जाने से कोई मनुष्य धार्मिक नहीं हो जाएगा। जैसे एक आदमी हिंदू होने से धार्मिक हो जाता है,

एक एक कदम--(प्रवचन-03)

एक एक कदम (विविध)-ओशो

क्या भारत धार्मिक है?—प्रवचन—तीसरा
एक बहुत पुराने नगर में उतना ही पुराना एक चर्च था। वह चर्च इतना पुराना था कि उस चर्च में भीतर जाने में भी प्रार्थना करने वाले भयभीत होते थे। उसके किसी भी क्षण गिर पड़ने की संभावना थी। आकाश में बादल गरजते थे, तो चर्च के अस्थिपंजर कंप जाते थे। हवाएं चलती थीं, तो लगता था, चर्च अब गिरा, अब गिरा!
ऐसे चर्च में कौन प्रवेश करता, कौन प्रार्थना करता? धीरे-धीरे उपासक आने बंद हो गए। चर्च के संरक्षकों ने कभी दीवार का पलस्तर बदला, कभी खिड़की बदली, कभी द्वार रंगे। लेकिन न द्वार रंगने से, न पलस्तर बदलने से, न कभी यहां ठीक कर देने से, वहां ठीक कर देने से वह चर्च इस योग्य हुआ कि उसे जीवित माना जा सके। वह मुर्दा ही बना रहा। लेकिन जब सारे उपासक आने बंद हो गए, तब चर्च के संरक्षकों को भी सोचना पड़ा, क्या करें?

एक एक कदम--(प्रवचन-02)

एक एक कदम (विविध)-ओशो

जिज्ञासा साहस और अभीप्सा-प्रवचन-दूसरा  

अभी-अभी आपकी तरफ आने को घर से निकला। सूर्यमुखी के फूलों को सूर्य की ओर मुंह किए हुए देखा और स्मरण आया कि मनुष्य के जीवन का दुख यही है, मनुष्य की सारी पीड़ा, सारा संताप यही है कि वह अपना सूर्य की ओर मुंह नहीं कर पाता है। हम सारे लोग जीवन भर सत्य की ओर पीठ किए हुए खड़े रहते हैं। सूर्य की ओर जो भी पीठ करके खड़ा होगा उसकी खुद की छाया उसका अंधकार बन जाती है। जिसकी पीठ सूर्य की ओर होगी उसकी खुद की छाया उसके सामने पड़ेगी और उसका मार्ग अंधकारपूर्ण हो जाएगा। और जो सूर्य की ओर मुंह कर लेता है उसकी छाया उसके लिए विलीन हो जाती है तथा उसकी आंखें और उसका रास्ता आलोकित हो जाता है।

एक एक कदम--(प्रवचन-01)

एक एक कदम-ओशो

(विविध)
प्रवचन-पहला

कोई दो सौ वर्ष पहले, जापान में दो राज्यों में युद्ध छिड़ गया था। छोटा जो राज्य था, भयभीत था; हार जाना उसका निश्चित था। उसके पास सैनिकों की संख्या कम थी। थोड़ी कम नहीं थी, बहुत कम थी। दुश्मन के पास दस सैनिक थे, तो उसके पास एक सैनिक था। उस राज्य के सेनापतियों ने युद्ध पर जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तो सीधी मूढ़ता होगी; हम अपने आदमियों को व्यर्थ ही कटवाने ले जाएं। हार तो निश्चित है। और जब सेनापतियों ने इनकार कर दिया युद्ध पर जाने से...उन्होंने कहा कि यह हार निश्चित है, तो हम अपना मुंह पराजय की कालिख से पोतने जाने को तैयार नहीं; और अपने सैनिकों को भी व्यर्थ कटवाने के लिए हमारी मर्जी नहीं। मरने की बजाय हार जाना उचित है। मर कर भी हारना है, जीत की तो कोई संभावना मानी नहीं जा सकती।