भक्तिसूत्र (नारद)—ओशो
पहला प्रवचन— परम प्रेमरूपा है भक्ति
सूत्र
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।। १ ।।
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।। २ ।।
अमृतस्वरूपा च।। ३ ।।
यल्लब्ध्वा पुमान सिद्धो भवति
अमृतो भवति तृप्तो भवति।। ४ ।।
यत्प्राप्य न किग्चिक्षाग्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति।। ५ ।।
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति
आत्मारामो भवति।। ६ ।।
जीवन है ऊर्जा -- ऊर्जा का सागर। समय के किनारे पर अथक, अंतहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं: न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत; बस मध्य है, बीच
है। मनुष्य भी उसमें एक छोटी तरंग है; एक छोटा बीज है --
अनंत संभावनाओं का।
तरंग की आकांक्षा स्वाभाविक है कि सागर हो जाए और बीज की आकांक्षा
स्वाभाविक है कि वृक्ष हो जाए। बीज जब तक फूलों में खिले न, तब तक तृप्ति संभव नहीं है।










