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सोमवार, 12 मार्च 2018

बिन घन परत फुहार—(सहजोबाई) ओशो



बिन घन परत फुहार—(सहजोबाई)
(दिनांक 01-10-1975 से 10-10-1975 ओशो आश्रम पूना में सहजोबाई पर ओशो जी द्वारा दिये गये अमृत प्रवचनों का संकलन)
ब तक किसी मुक्तनारी पर नहीं बोला। तुम थोड़ा मुक्त पुरुषों को समझ लोतुम थोड़ा मुक्ति का स्वाद चल लोतो शायद मुक्तनारी को समझना भी आसान हो जाए।
जैसे सूरज की किरण तो सफेद हैपर प्रिज्म से गुजर कर सात रंगों में टूट जाता है। हरा रंग लाल रंग नहीं हैऔर न लाल रंग हरा रंग हैयद्यपि दोनों एक ही किरण से टूटकर बने हैंऔर दोनों अंततः मिलकर पुनः एक किरण हो जाएंगे। टूटने के पहले एक थेमिलने के बाद फिर एक हो जाएंगेपर बीच में बड़ा फासला हैऔर फासला बड़ा प्रीतिकर है। बड़ा भेद है बीच मेंऔर भेद मिटना चाहिए। भेद सदा बना रहेक्योंकि उसी भेद में जीवन का रस है। लाल लाल होहरा हरा हो। तभी तोहरे वृक्षों पर लाल फूल जाते हैं। हरे वृक्षों पर हरे फूल बड़ी शोभा न देंगे। लाल वृक्षों पर लाल फूल फूल जैसे न लगेंगे।

परमात्मा में तो स्त्री और पुरुष एक हैं। वहां तो किरण सफेद हो जाती है। लेकिन अस्तित्व में, प्रकट लोग में, अभिव्यक्ति में बड़े भिन्न हैं; और उनकी भिन्नता बड़ी प्रतिकर है। उनके भेद को मिटाना नहीं है, उनके भेद को सजाना है। उनके भेद को नष्ट नहीं करना है, उनके भीतर छिपे अभेद को देखना है। स्त्री और पुरुष एक ही स्वर दिखायी पड़ने लगे--बिना भेद को मिटाये--तो तुम्हारे पास आंख है।
वीणावादक वीणा के तारों को छेड़ता है। बहुत स्वर पैदा होते हैं। उंगलियां वही हैं, तार भी वही हैं, छेड़खानी का थोड़ा सा भेद है; पर बड़े भिन्न स्वर पैदा होते हैं। सौभाग्य है कि भिन्न स्वर पैदा होते हैं, नहीं तो संगीत का कोई उपाय न था। अगर एक ही स्वर होता तो बड़ा बेसुरा हो गया होता, बड़ी ऊब पैदा होती।
ओशो







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