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शनिवार, 17 जनवरी 2026

18-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-18

 (सदमा - उपन्यास)

आखिरकार पेंटल के लिए वह समय आ ही गया, जब ऊटी को छोड़ने कर जा रहा है। आते हुए किसी नये प्रदेश में मन कैसा होता है। कितना अ-चिन्हित अपरिचित सा एक खोया-खोया सहमा सा। कितना अकेला पर घेरे रहता है आपको। और जब आप वहां से जा रहे होते तो मन कैसा अपना पन चारों और फैला लेता है। उसे लग रहा था कि इस स्टेशन पर पहली बार इस तरह से जा रहा है। पेंटल यहां से जा तो है परंतु अंदर एक पूर्णता को भरा कर, परंतु बहार उसे सब खाली-खाली सा लग रहा है। ये मनुष्य की कैसी बैचेनी है। वह कभी पूर्ण नहीं हो पाता। आज अगर उसका दोस्त सही होता तो वह उसके साथ कैसे-कैसे मजाक बनाता। की उसका जीना कठिन हो उठता। कई बार अपनों का लड़ना झगड़ना भी न मिले तो मन को कितना खलता है। यहां आकर उसे जो मिला वह अमूल्य था। उसके दोस्त की बीमारी ने उसके मन को झकझोर दिया था। उसे एक पल तो समझ नहीं आ रहा था की ये सब क्या और कैसे हो गया। संवेदनशील मनुष्य के जीवन एक तलवार की धार की तरह से होता है। उसका जीवन एक नाजुक पुष्प के समान है। उसे जरा सा भी धक्का लगा नहीं की वह कुम्हला जायेगा।

परंतु अब एक उम्मीद थी। उसके ठीक होने की। वह रेल गाड़ी के डिब्बे में अपनी सीट पर वह बैठ गया था। उसे अंदर से किसी का इंतजार नहीं था। वह अकेला ही अपने विचारों में खोया हुआ था। वह नहीं जानता था। की इसी जगह उसके दोस्त के साथ वह सब हादसा हुआ जो उसके जीवन को पूर्णता बदल गया। क्या वह लड़की उसकी बात का विश्वास करेगी। क्या उसे अपने जीवन की वो घटनाएं जो यहां

पर घटती थी उसे कुछ याद होगी। नहीं भी होगी तो वह उसे एक-एक कर के याद दिलायेगा। उसके दोस्त ने अपने जीवन को दाव पर लगा कर उसके ठीक होने में उसकी मदद की। क्या उसका अंतस भूल चूका होगा। नहीं वह चाहे उसे याद हो न हो वह एक आला विज्ञान की तरह से उसके मन की धरोहर बन का उसके संग साथ संग्रहित जरूर ही होंगे।

आसमान में बादल छाये हुए थे। बीच-बीच में कभी-कभी हल्की-हल्की बुंदा बांदी शुरू हो जाती थी। वह जान पूछ कर सोनी के घर से होकर नहीं आया था। नहीं तो शायद वह गाड़ी भेज देती। क्योंकि उसका पति आया हुआ था, वह उसकी आंखों के सामने नहीं जा सकता। क्योंकि पेंटल के मन एक प्रकार चोर था। इसलिए वह पैदल ही चल कर स्टेशन आ गया था। दूरी तो ज्यादा नहीं थी। न ही अधिक उसके पास सामान था। यहीं दूरी अगर शहर में होती तो कितनी दूर लगती। प्रकृति भी कितना अपना पन लिए रहती है। जब आप उसके संग साथ जीते हो तो वह आपको कितनी उर्जा से सराबोर रखती है। शहरी की भीड़ तो मानो आपकी उर्जा को चूस रही होती है। क्या गाड़ी क्या सड़क क्या उंची इमारतें सब मनुष्य का शोषण कर रही होती है।

जब भी कोई व्यक्ति खुले आसमान में आता है। तब उसको उन दोनों को विभेद समझ में आता है। वह ये सोच ही रहा था की गाड़ी ने अंतिम सीटी दी और चलने के लिए हरा सिगनल हो गया। वह समझ गया था की अब इस सुंदर वह प्रिय स्थान को छोड़ कर जा रहा है। उसका तन तो हल्का परंतु एक दर्द, एक विछोह एक पीड़ा को महसूस कर रहा था। और दूसरी और मन में साथ-साथ एक आनंद एक उत्तुंग खुमारी भी थी। परंतु कहीं पैर बहुत-भारी भारी हो रहे थे। हम कितने विभाजनों में जीते है आज जब वह अपने को देखता है तो समझ में आता है जिसे वह एक पेंटल समझ रहा था। वह तो अनके पेंटल का जोड़ है। और गाड़ी ने रेंगना शुरू कर दिया था। देखते ही देखते सब पीछे छूटता जा रहा था। रह गई तो उन पलो की यादें जो ह्रदय में समाई हुई थी। मन उसका अब शांत हो गया था। वहां जो उथल-पुथल की तरंगें थे। वह बिना किसी बेचैनी की हवा को प्राप्त किए शांत हो रही थी। जब मन शांत होता है। तो आप को कैसा लगता है की जैसे वह है ही नहीं। इसी तरह जब आप जल को देखेंगे तो गहरा जल लवलीन शांति को लिए कैसा देवतुल्य लगता है। बिना लहरों के होता है तो लगता है वह थिर है चल ही नहीं रहा। ये देखना भी कितना आनंद दाई भला-भला सा लगता है। पेंटल सोच रहा था की न जाने फिर इसके बाद कब यहां पर आना हो।

आना तो होगा। एक तो सोनी का प्रेम का चुम्बकित आकर्षण, दूसरा उसके दोस्त की बीमारी। जो इस अवस्था में पहुंच गया है की चाह कर भी उस से बहार खूद नहीं निकल सकता। किसी के साथ सहयोग की उसे जरूरत है। नानी बेचारी कितना कर पायेगी। रेल गाड़ी के चलने के साथ-साथ पेंटल के विचार भी दौड़ रहे थे। वह सोच रहा था की जब मैं उस लड़की से मिलूंगा तो कैसे और कहां से बात शुरू करूंगा। सबसे पहले तो उसके घर के पते से उसे ढूंढना होगा। भगवान भला करें की उन्होंने अपना मकान नहीं बदला हो। अगर वह बदल लिया तो फिर और भी अधिक कठिन हो जायेगा। तब के बारे में सोच कर ही पेंटल डर रहा था। अंदर से उसके एक आवाज आ रह थी नहीं ऐसा नहीं हो सकता भगवान सब ठीक करेगा। इतना तो बुरा हो चूका है बुरे का भी तो अंत आता है। सदा दिन एक से नहीं होते। यही सब सोचते वह न जाने कब लेटे-लेटे गहरी नींद में चला गया।

इसी बीच पेंटल को एक स्वप्न ने घेर लिया। वह स्वप्न देख रहा है कि जैसे वह एक पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ रहा है। जब वह पहाड़ी नीचे से देखता है तो वह उसे बहुत ही छोटी लगती है। उसे महसूस होता है की उसे तो मैं पल भर में भाग कर अभी चढ़ जाऊंगा। और उपर जाकर उसे दूर तक साफ दिखाई देगा की उसे किधर जाना है। वह इस पर चढ़ कर वह देख सकता है कि किधर मेरा घर है और अब मुझे किसी और जाना है। जंगल की इस विरानगी में उसकी जो भटकन थी अब उसका अंत आ गया। है। उसे एक हिम्मत आती है। वह बहुत भटक चूका होता है। परंतु वह चढ़ना शुरू करता है। परंतु जो रास्ता उसे बड़ा आसान लग रहा था। वह बीच-बीच में इतना विकट हो जाता है उसका मन जवाब दे देता है, क्या वह उस पर नहीं चढ़ सकता है। कुछ देर वह इधर उधर देखता है परंतु दूसरा तो कोई मार्ग है ही नहीं या तो वापस उसी स्थान की और चला जाये जहां से वह अभी आया था। या इस बाधा को पार करें। कुछ देर के लिए वह थक हार कर वहीं बैठ जाता है। चलने की थकावट जो उसके तन को थी। इसके साथ-साथ मन को भी थी। वह बैठ कर सामने देखता है दूर पहाड़ी पर सफेद बादलों को झूंड किस तरह अठखेलियां कर रहा था। हवा-बार-बार उसका रूप आकार बदलती है। वह पल भर के लिए उस दृश्य में उलझ जाता है और अपने तन की थकावट को एक दम से भूल जाता है। तभी पास पानी के कल-कल की आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।

दूर जो चीढ़ पलाश के वृक्ष थे उनके पत्तों से होकर जब हवा गुजरती थी तो कैसा जलप्रपात का भ्रम दे रही थी। जल और वायु में कैसे समानता होती है, ये आप जब तक उसे महसूस नहीं करोगे उस विभेद को नहीं जान पाओगे। दूर पहाड़ी की चोटी पर बादल आपस में कैसे विलय हो रहे थे। एक दूसरे में उसके इस विलय होने के कारण कैसे भिन्न-भिन्न आकार निर्मित हो रहे थे। कभी कोई नाचती गुड़िया या डंडा लिये खेत में जाता किसान। या भेड़ बकरियों का चरता झूंड। ये हमारे और आपके चित का विभेद होता है। चित की छाया बादलों में आच्छादित कर देते है। उसे उस समय पूरी प्रकृति कैसे नाचती सी प्रति हो रही थी। प्रकृति अपने हर रूप में कैसे खिली-खिली सी लगती है। चाहे तेज आंधी हो, चिलचिलाती धूप हो, बर्फ के कणों में। वह एक सुमधुर सौंदर्य समेटे चलती है। दूर जैसे कोई उसे पुकार रहा है एक ध्वनि जो उनसे होकर गुजर रही थी। मानो वह उनके अपने की गीत है।

तभी एक शुभ्र स्‍वेत देवी आकर उसके सामने खड़ी हो जाती है। और अपना हाथ उसकी और बढ़ा देती है। की उठो अब बैठने का समय नहीं है बस चार कदम और सामने ही तो मंजिल तुम्हारा इंतजार कर रही है। और वह अपना हाथ आगे बढ़ता है परंतु उसका हाथ पकड़ने वाला वहां कोई नहीं नहीं है। पल में उसकी आंखें खुल जाती है। तब वह अचरज से देखता है। कि उसे विश्वास नहीं हो रहा की सच वह सपना देख रहा हूं। सपने तो उसने हजारों बार देखे है। परंतु ये तो उससे भिन्न है। ये एक दम सत्य लग रहा था। क्या कारण हो सकता है। सच में अगर हम होश से जाने तो प्रत्येक स्वप्न तीसरी आँख से देखा जाता है। तभी तो वह इतना सत्य लगता है। यानी आपकी ये आंखें तो बंद होती है। और आप इन बंद आंखों के बाद भी कुछ देखते हो। तब ये बात तो आपको माननी ही होगी की कुछ दूसरा छोर भी है इस नदी। ये जो स्थूल को देखने वाली आंखें हमें इस शरीर के साथ मिली है इसके अलाव उस का वो छोर भी होना चाहिए जो शुक्ष्म को देख सके।

इसमें मानने और न मानने का प्रश्न नहीं है। ये एक चिर स्थाई सत्य है जो प्रत्येक आदमी रोज अनुभव करता है। परंतु हम कहां उसके प्रति सजग होते है। अपनी ही नींद में जीये चले जाते है। जितने होश से काम चल जाता उससे एक कदम आगे जरा भी सरकने की कोशिश नहीं करते। क्यों? यहीं क्यों तो मनुष्य के अंदर एक नए आयाम को जानने के उत्सुकता रहती है। परंतु इसके लिए साहास और संकल्प की अति आवश्यकता है। इसलिए आपने देखा धर्म के मार्ग पर आपको चारों और दूखी कायर डरपोक भगोड़े लोग ही दिखाई देंगे। परंतु सदा ऐसा नहीं था। इसके लिए तो एक वीरता चाहिए। चलने से तो मंजिल नहीं मिलती उस डगर के कष्ट कंटक मार्ग को भेदना ही सही मायने में सन्यास है। जो अति सरल और सहज होना चाहिए। जब आपके अंतस से ही वह उसे पुकार रहा हो। परंतु हम घर से दूख दरिद्र हो का जब उस मार्ग पर चलेंगे तब वहाँ भी तो हम वहीं है। क्या बदल जाता है हमारा कुछ भी नहीं।

अचानक पेंटल की आँख खुल जाती है। वह समझ नहीं पाता कुछ देर के लिए की वह कहां पर है। परंतु वह अपने हाथ को देख रहा था वह अब भी किसी के इंतजार में फैला हुआ था। कभी वह अपने हाथ को देखता है कभी अपने आप को। कितनी देर में तो उसे समझ आया कि यह एक स्वप्न था। तब उसे एक बड़े जोर का झटका लगता है। और वह तत्काल अपना हाथ नीचे कर लेता है। कुछ देर के लिए तो वह विस्मय विमुग्ध हो जाता है कि मैं कहां पर हूं। वह अपने को सम्हालते हुए तब वह अपना हाथ नीचे कर लेता है। और जानने कि कोशिश करता है कि वह कहां है। कितनी देर में उसे होश आता है कि वह अभी रेल गाड़ी में है। और वह एक स्वप्न देख रहा था। बाहर अंधेरे को चिरती हुए रेल गाड़ी अपने गन्तव्य की और दौड़ी चली जा रही थी। आस पास के सभी यात्री सोए हुए थे। एक मध्यम सा प्रकाश रेल गाड़ी में फैला हुआ था। बहार चाँद अपने यौवन पर चमक रहा था। पेड़-पहाड़ों के बीच में से उसकी रोशनी रेल गाड़ी में प्रवेश कर रही थी।

वह सोच रहा था कि इस स्वप्न का क्या अर्थ हो सकता है। क्योंकि जब उसने घड़ी में देखा तो सुबह के पांच बजे थे। हमारे स्वप्न भी पूरी रात अनंत तलों से आते रहते है। अब हम उन सब सपनों को याद भी नहीं कर सकते। केवल जागने से कुछ पहले का ही स्वप्न का कुछ हिस्सा हमें याद रहता है। एक तरफ जानकार कहते है सुबह का सपना हमारे चेतन तल के सबसे नजदीक होने के कारण वह सत्य होता है। परंतु यह सब कहीं हुई बाते है। क्या सच है और क्या गलत ये ठीक-ठीक कहा या उसकी व्याख्या नहीं कि जा सकती है। परंतु वह सोच रहा था। कितना स्पष्ट था वह स्वप्न अब भी उसे विश्वास नहीं हो रहा था। और क्या संदेश देना चाहता था। कौन थी वो देवी रूप जो हाथ पकड़ कर उसे उठा रही थी। की सामने ही तो मंजिल है। क्या वे सोनी की और इशारा कर रहा था। या उस लड़की के विषय में। इतनी देर में किसी स्टेशन के आने की सूचना होती है। बाहर प्लेट फार्म की हल्की सी रोशनी चारों और फैल गई थी। कितना विरोधाभास है। जैसे मनुष्य का निर्मित प्रकाश अपना प्रभुत्व पसारता है। प्रकृति अपना हाथ समेट लेती है। जो चाँद अभी तक एक आभा को अपने में समेटे चमक रहा था। वह मध्यम हो जाता है।

स्टेशन पर गाड़ी धीरे-धीरे रूक रही थी वह खड़ा हुआ और अपनी चप्पल पहन कर दरवाजे की और चल दिया। पहले वह बाथरूम गया। इतनी देर में गाड़ी रूक गई। और उसने बाहर निकल कर देखा। ‘’मेट्टुपालयम’’ का स्टेशन अभी आया था। गाड़ी अपने सही समय पर चल रही थी। वह नजरें घूमा कर देख रहा था की कहां पर ताजा और बढ़ियां चाय मिल सकती है। देखा सामने स्टॉल पर चाय का पतीला चाय से भरा है। स्टेशन पर कोई खास भीड़ नहीं थी। पेंटल ने दो चाय ली सुबह पहली चाय वह थोड़ी अधिक ही लेता है। और रेलगाड़ी में बैठे रहने के कारण उसके पेट में गड़बड़ चलती है इसलिए उसे चूर्ण भी साथ ले कर चलना होता है। समय या पानी बदलने के कारण कई दिन तक उसका पेट अपसेट सा रहता है। एक पानी की बोतल। पैसे दे कर उसने दोनों चाय को एक बड़े गिलास में डलवाने के लिए कहां। उसके उसने एक रूपये और अतिरिक्त मांगा पेंटल ने उसे दे दिया। और चाय ले कर अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। और चाय का आनंद लेने लगा। सब मुसाफिर सो रहे थे बस एक आध ही चाय के लिए उठा था। परंतु रेलवे स्टेशन छोटा होने पर भी एक दम से साफ सुथरा था। अभी तो उसका सफर बहुत लम्बा था। कल सुबह वह कहीं दादर स्टेशन पहुंच सकेगा। सफर उबा देने वाला था।

और गाड़ी कुछ ही देर में चल दी। वह चाय पी कर कप को कूड़ेदान में डाल कर फिर लेट गया। और सोचते-सोचते हुए फिर नींद आ गई।

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