(सदमा - उपन्यास)
धीरे-धीरे तेल और
दवा अपना असर दिखा रही थी। नियम से फल खिलाना, उसे नहलाना-धुलाना घुमाना
आदि, पेंटल अपने दोस्त के लिए जो कर रहा है। वह कोई अपना सगा
भी नहीं करता। बेचारा आया था यहां घूमने के लिए और फंस गया। परंतु उसके चेहरे पर
जरा भी थकान नहीं दिखाई देती थी। सच ही अगर पेंटल नहीं आता तो नानी कैसे सोम
प्रकाश को सम्हालती उसके लिए सब कितना अधिक कठिन हो जाता। परंतु परमात्मा सब की
सुनता है। अब धीरे-धीरे सोम प्रकाश खूद भी सहारा ले कर चलने लग गया था। इससे एक
दूसरे आदमी का बंधन खुल जाता है। इतना हुआ है तो परमात्मा और भी सुनेगा। तब एक दिन
पेंटल ने कहां की नानी में बाजार जाकर आता हूं। बेटा जल्दी आना। वैसे तो सब है घर
पर नाहक परेशान हो रहा है। परंतु आज न जाने क्यों पेंटल के मन में सोनी से मिलने
एक इच्छा प्रबल हो रही थी। जबकि वह उसके बारे में कितना कम जानता था। उसका देखना
बोलना उसे जरा भी नहीं जंचता था। परंतु ये उर्जा अपना काम करती है। और जिसके अंतस
में वासना का धाव हो वहां वह अपना असर जरूर दिखलाती है। परंतु ये मन भी कितना अजीब
है, खेल तो यही खेलता है। आपके न चाहते हुए भी वह अपनी चाहता
अंदर-अंदर उपजता रहता है।
ज्यादा दूर घर नहीं था पास की चढ़ाई चढ़कर कर तो आप 15-20 मिनट में बड़े आराम से जा सकते है। परंतु अगर आपको सड़क से होते हुए जाना पड़े तो एक घंटा तो लग ही जाता। पेंटल ने हाथ में सामान खरीदने का एक थैला भी ले लिया ताकी उसे एक बहाना मिल जाये। श्याम होने में अभी काफी समय था चार ही बजे थे परंतु शीत के दिनों में दिन बहुत छोटे होते है पाँच बजे तक तो सूर्य दूर पहाड़ियों में जाकर विश्राम करने लग जाता है। पेड़ो पर पक्षियों का अपना नाद चल रहा था। हजारों पेड़-पौधे होने पर भी न जाने सो जाने के लिए ये सब पक्षी आपने कल वाले स्थान के लिए क्यों लड़ते है।
शायद ये इनका एक खेल हो। परंतु हो सकता है एक जगह सोने के कारण उसकी उर्जा अगले दिन भी उसे वहीं खिंचती हो। दूर बूगलों की कतार अपने आशियाने की और चली जा रही थी। ये सुबह निकलते है और श्याम फिर विश्राम के लिए अपने चिंहित स्थानों पर ही जाकर विश्राम करते है। चाहे आज वह पक्षी दक्षिण गया हो या दूर पूर्व, परंतु विश्राम करने के लिए एक निर्धारित स्थान होता है।कदमों में पेंटल के
भारी पन था। वह एक और तो सोनी से मिलना चाहता था। परंतु अंदर से उसका मन डर भी रहा
था। देखिये पुरुष का स्वभाव वह किसी और पर शक्ति से या मन से हमला करें तो उसे
अच्छा लगता है। अगर कोई दूसरा या औरत जब उस पर हमला करें चाहे वह हमला प्रेम का ही
क्यों न हो वह भयभीत हो उठेगा। कम लोग उस औरत को प्रेम कर पायेंगे तो पुरूष पर
अटेक करें। परंतु औरत इस हमले में पुरूष की अपेक्षा अधिक ही आनंद लेती है। वह
चाहती है उसे कोई निचोड़े,
भिचे, काटे, नोचे। परंतु
वह एक डरी सहमी सी हिरण बनी रहे। ये स्त्री की एक अदा होती है। जिससे शिकार सोचता
है उसने अपने शिकार को पूरी तरह से दबोच लिया है।
मकान बहुत ही सुंदर
था। सामने लॉन में चार कुर्सियाँ डली हुई थी। आस पास सुंदर तरह फूल पौधे उगा रखे
थे। माली अपना काम खत्म कर जाने की तैयारी कर रहा था। उसने किसी आगंतुक को आते देख
कर नमस्ते की। और कहां की आप बैठे में मालिक साहिबा को अभी संदेश पहुंचा कर के आता
हूं। और वह अंदर चला गया। और साथ में पानी का एक जग और गिलास साथ में लाया था। और
एक गिलास पानी भर कर पेंटल जी को दिया की मालिक साहिबा आ रही है। और करीब
दस-पंद्रह मिनट तो लग गए सोनी को अंदर से बहार आने के लिए कई बार पेंटल का मन हुआ
की नाहक ही आया। क्या जरूरत थी। अब निकल भागता हूं। परंतु ये शोभा दायक नहीं था।
असल में उसे आना ही नहीं चाहिए था। परंतु जब मन में वासना का धुआं होता है तो वह
सोच समझ को अंधेरे में रख लेता है। वह खुद औरतों के पीछे भागा है। आज एक औरत उसे
निमंत्रण दे रही है। तब वह अपने को इस लालच से रोक नहीं पाया। फिर सोनी सुंदर थी
जवान थी। एक अनुभवी थी। खेली खाई थी। वेश्याओं के पास का तो उसे अनुभव था परंतु जब
स्त्री खुद निमंत्रण दे ये उसके जीवन में पहली बार हो रहा था। हंसती खिलखिलाती
सोनी अपनी अदाओं पर और मचलती। दूर से ही देख कर प्रसन्न नजर आ रही थी। यह उसकी एक
विजय थी।
वह जानती थी जिस
अदा से उसने पेंटल को देखा है वह यहां आये बिना रह ही नहीं सकता। वह अपने रूप और
गुण पर कुछ अधिक ही विश्वास करती थी। और करें भी क्यों ने भगवान का दिया उसके पास
वो सब जो एक स्त्री में पुरूष ढूंढता है। सहीं कहूं तो उससे भी दो कदम अधिक था।
हाथ मिला कर वह पास ही कुर्सी पर बैठ गई। अरे पेंटल जी आप आये मन बहुत याद कर रहा
था। तीन चार दिन हो गए। श्याम होते ही मन न जाने क्यों उदास हो उठता है।
पेंटल—बस इधर से
कुछ सामान लेने के लिए जा रहा था। सोचा आप से भी मिल लूं, नहीं
तो आप नाराज हो उठेगी। की मैंने तो बुलाया और आप आये नहीं।
सोनी—अरे आप भी
कमाल करते है। नाराज होने की बात तो है। परंतु आप से नाराज होने का मन नहीं करता।
एक तो दोस्त मिला है इतने दिन में। और उसे भी नाराज कर दिया जाये। कितनी बुरी बात
है। आपका दोस्त आता था सोम प्रकाश जिस से दो बाते हो जाती थी। परंतु वह बहुत ही
शर्मीला और डरपोक है। पता नहीं लोग अपनी जवानी को किस तरह से रोक कर बरबाद कर देते
है। मेरी समझ के बहार की बात है। आप तो उस तरह के नहीं दिखते पेंटल जी।
पेंटल—मोज मस्ती
करने वाला आदमी था परंतु सोनी के इस खुले निमंत्रण को सुन कर उसके भी पेरो के नीचे
की जमीन खिसक रही थी। अंदर-ही अंदर सोच रहा था बच्चु कहां फंस गया। बच्चा देखना अब
आया है ऊंट पहाड़ के नीचे,
अब यहां से बच कर निकलना कितना कठिन है। इतनी खतरनाक स्त्री उसने
इससे पहले कभी नहीं देखी थी। असल में सोनी वासना में विक्रीत हो गई थी। उसका मन एक
ऐसा अंधा कुआं बन गया था। जिसमें अंधेरे के साथ-साथ पेंदी भी नहीं थी। उसे भरना
भगवान के हाथ में भी नहीं था। लोग सोचते है वासना को जितना भोग करेंगे उतनी जल्दी
तृप्त होगी, ये उनकी महान भूल है। अधिक भोजन करने से तृप्ति
नहीं मिलती, मिलती है तो उसमें पूर्णता से डूब कर ही। ये
हमारे योगी तांत्रिक लोग जानते थे। एक सहवास भी पूर्ण जीवन के लिए तृप्ति दे सकता
है। बहुत पहले के जमाने में स्त्री को देखो एक दो रातें ही पति के संग गुजारी और
अचानक कोई हादसा हो उठे तो वह जीवन भर के लिए तृप्ति दे जाती थी।
पेंटल ने बात बदलते
हुए कहां की साहब नहीं है क्या अंदर। अरे वो तो तीन दिन से शहर गए है। आपके मास्टर
जी के बदले में कोई नया मास्टर रखना होगा। उस दिन जब मैं आई तो मुझ से पूछ रहे थे
की सोम प्रकाश कितनी दिन में ठीक हो जायेगा। अब भला मैं क्या कहती कहां की शरीर से
तो वह शायद एक महीने में ठीक हो जाये परंतु मन से तो कब होगा कहां नहीं जा सकता
है। इसलिए स्कूल की जिम्मेवारी तो थी ही बच्चों के भविष्य का सवाल था। सो वह न
चाहते हुए भी किसी नये टीचर का इंतजाम करने के लिए चले गए। आज कल अच्छे टीचर मिलते
भी कहां है। ये सोम प्रकाश तो घर जैसा ही आदमी था। तब आप क्या लेंगे। हवा में ठंडक
हो रही है। धूप तो कब की चली गई क्यों ने अंदर ड्राइंग रूप में बैठा जाये। न चाहते
हुए भी पेंटल को अंदर जाना पड़ा तब क्या लेंगे आज आप पहली बार हमारे घर आये हो।
व्हिस्की या स्कॉच। तब पेंटल बगलें झांकने लगा। कितनी खुली हुई है ये औरत। इस के
अंदर स्त्री तत्व जैसा तो कुछ दिखता ही नहीं। भला एक अंजान आदमी से इतना खुलना
परंतु अब तो क्या किया जा सकता है। तब पेंटल ने कहां की नहीं फिर किसी दिन। नानी
वहां पर मेरा इंतजार कर रही होगी।
तब सोनी ने कहां वह
दिन कभी नहीं आता। आज आये हो तो आपको एक पैग तो लेना ही होगा। नौकर को बोल कर कुछ
नमकीन और दो गिलास सोनी ने मंगवाये। और व्हिस्की की एक बोतल लेकर आई। उसे पेंटल के
हाथ में देते हुए कहां कि ये चलेगी। तब पेंटल ने उसे पकड़ते हुए कहां। मैडम हम
कहां ये सब खरीद सकते है। हम तो घोड़ा छाप वाली रम ही पीते है। इतनी हमारी आमदनी
कहां है। परंतु तुम्हारा दोस्त तो नहीं पीता। या पीता है हमारे कहने से भी उसने
कभी हमारा साथ नहीं दिया। ये बात सून कर आज पेंटल को पता चला की बेचारा सोम प्रकाश
इस औरत से कैसे बचता होगा।
एक पेग पीने पर तो
पेंटल को सुरूर चढ़ गया। काफी दिन से उसने ली भी नहीं थी। इसलिए एक पेग में ही उसे
नशा सा होने लगा। शायद अंग्रेजी होने के कारण भी। फिर वह जानता भी नहीं था की
व्हिस्की किस तरह का नशा चढ़ाती है। अपनी रम तो मस्त होती है। सीधा भेजे में चढ़
कर बोलती है। लेकिन सामने सोनी को देख रहा था उसे तो कुछ भी नहीं हुआ। दूसरे पेग
के बाद तो पेंटल की हालत थोड़ी अधिक ही खराब हो गई थी। या तो वह उसका पैक कुछ अधिक
ही तेज बना रही थी सोनी। या वह इस शराब की आदि थी।
दो पेग के बाद
पेंटल ने और लेने से मना कर दिया की मुझे अब घर भी जाना है। और मैं नहीं ले सकता।
परंतु सोनी ने कहां की ये भी तो तुम्हारा ही घर है। अब रात को मैं भी अकेली ही
हूं। मुझे आपका साथ मिल जायेगा। फिर पता नहीं कल क्या हो और क्या न हो। आज अगर हम
मिल रहे है तो इसमें परमात्मा की कुछ मर्जी ही तो है। देखो आप अचानक आये हो हमारा
कोई प्रोग्राम नहीं था। फिर भी कुदरत हमें एकांत दे रही है। इस का कुछ तो तात्पर्य
होना चाहिए। अब पेंटल तो बेचारा एक तरफ से तो वह सब चाहता था। कितने दिन हो गए थे
उसे किसी स्त्री के पास गए भी। यहां सोम प्रकाश के साथ रूखा सूखा रहते मन पर एक
बोझ भी जमा हो गया था। आप बीमार के साथ रह कर आधे बीमार तो हो ही जाते है। इसलिए
बीमार आदमी के साथ रहना सब के बस की बात नहीं है। आज अचानक जब घर आँगन में
मूसलाधार वर्षा हो रही थी तो क्यों न नहा लिया जाये।
तीन पैक के बाद दोनों
को सुरूर क्या पूरी चढ़ गई थी। सोनी ने पेंटल का हाथ पकड़ कर कहां की आपने हमारा
सोने का कमरा तो देखा ही नहीं। चलो अपना कमरा दिखलाती हूं। और वह झूमती-झमती उसे
अपने कमरे में ले गई। कमरे में मध्यम प्रकाश जल रहा था। पेंटल उनके पलंग पर जाकर
बैठ गया। तब सोनी ने कहां की जूते उतार कर आराम से बैठो। यहां किसी का कोई डर नहीं
है। साहब से मैंने श्याम को ही बात की थी। वह तो अभी दो तीन दिन बाद आने के लिए
बोल रहे थे। और वह पेंटल के पास आकर बैठ गई। सच पेंटल जब मैंने आपको पहली बार देखा
था तो लगा की ये आदमी आपने मैच का है। और आपसे मिलने की तमन्ना के सपने देखने शुरू
कर दिये थे। पेंटल अपने जूते जुराब उतार कर पलंग के पास आया की सोनी ने उसे पकड़
कर अपने उपर लिटा लिया और अपने थिरकते होंठों को उसके होंठों पर रख दिया।
जो अब तक एक अंजान
सी दूरी थी वह नशे के बहाव में कब खत्म हो गई। दोनों उस में बह जाना चाहते थे। दोनों
ही प्यासे थे। और आज सच ही सालों बाद सोनी ने एक नये उतुंग का रख चखा। पेंटल खेला
खाया अनुभवी आदमी था। वह एक-एक नजाकत को जानता था। आज सोनी का चेहरा प्रेम के रंग
में लाल तो था ही परंतु उसमें एक शर्म की लालिमा भी छा रही थी। प्रेम प्रसंग के
बाद जब पेंटल के लिए वह पानी का गिलास लेकर आई तो वह नीची गर्दन कर के खड़ी हो गई।
पेंटल ने पकड़ कर उसे अपनी गोद में बिठा लिया। और जिस बात की न तो सोनी ने कभी
कल्पना की थी और न ही पेंटल ने सोचा था। सोनी एक छूई-मुई का फूल बन गई थी। उसने
अपने दोनों हाथों को चेहरे पर रख लिया। अपनी आंखों में बहते प्रेम के उस झरने को
वह पी जाना चाहती थी। पेंटल को भी पहली बार औरत क्या होती है। जो अपने भाव से अपने
प्रेम की आग में जल कर तुम्हें तृप्त कर रही होती है। ये उसने देखा और पहली बार
जाना उसे अनुभव भी किया। पैसे देकर एक शरीर को खरीदा जा सकता है। मन और अंदर की
संवेदना को नहीं। अंदर की एक प्यास एक चाहता आज दोनों को उस गहराई में ले गई जिस
के लिए दोनों सालों से तरस रहे थे। उसके बाद दोनों नीचे आ गये। नौकर को आवाज दी की
खाना लगाओ दोनों ने जी भर कर खाना खाया।
खाने का स्वाद भी
आज सोनी के लिए अलग ही था। अकेली वह खाती थी। पति तो नाम के लिए ही बस पति था। वह
तो उसके सुलगने से पहले ही बूझ जाता था। वह सुलगती रह जाती थी। तब उसे पश्चाताप
होता था की नाहक उसने पैसे से शादी की। क्योंकि उसका पति तो रात सात बजे ही गोली
खा कर सो जाता था। वह कितना पढ़ती। एक-एक पल उसके लिए गुजारना कठिन होता जा रहा
था। और आज पेंटल के साथ उसे जो सूख मिला है। उसे ही शास्त्रों में सम-भोग कहां गया
है। जहां दो-दो न हो कर एक हो जाये और एक ही समान भोग के आनंद में डूब जाये। हम
साथ खाना खा सकते है। परंतु हमारा भोग का स्वाद भिन्न ही होगा। माना की खाना एक
स्थान परंतु समान स्वाद नहीं होता। किसी भी और कार्य में समान सूख नहीं होता केवल
सम-भोग एक वही क्रिया है,
जिसमें दो व्यक्ति एक समान आनंद ले सकते है। दोनों एक ही स्थान पर
पल भर के लिए वास कर सकते है। उस गहरे में डूब कर। ‘’सहवास’’ शब्दों की भी अपनी
यात्रा होती है, हजारों लाखों साल के अनुभव के बाद ये
निर्मित होते है। कितना मधुर शब्द है। जहां दो तन दो मन मिट जाये और बचे तुम्हारा
होना, तुम्हारा वास।
तब खाना खा कर काफी
पीते हुए सोनी कहने लगी अब आप घर जाओगे। तब पेंटल न हंस कर कहां की रात में अकेले
जाने में मुझे बहुत डर लगता है। और दोनों हंस दिये। आज की हंसी सोनी की हंसी एक
निर्दोषता थी। उसकी आवाज में एक तृप्ति थी। पूरी रात दोनों साथ-साथ सोये प्रेम पास
में बंधे हुए। शायद सुबह के नौ बज गये थे सोनी तो आज काफी देर पहले ही उठ कर नहा
धो कर तैयार हो गई थी। पेंटल को उठते देर लगी। उठ कर उसने हाथ मुख धोया और चाय
पीने के लिए टेबल पर आकर बैठ गया। जब उसने एक बार घड़ी की और देखा तब याद आया कि
अरे, इतनी देर हो गई थी आपने मुझे उठाया क्यों नहीं। अब घर जाकर मुझे पता
चलेगा। नानी को मैं क्या जवाब दूंगा की रात भर कहा था। सोनी ने हंसते हुए कहा की
कह देना की सोनी के साथ सो रहा था। और वह कहकहे लगा कर हंस दी। उसकी हंसी में आज
एक कोमलता थी एक मधुरता एक अल्हड़ पन था। जो एक औरत का सौंदर्य होता है, उसका गहना होता है। वह जानती थी पेंटल की शामत आने वाली है। चाय नाश्ता
करने के बाद सोनी ने पेंटल को आनंद भाव से विदा किया। सच आज न वो कल वाली और न ही
श्याम वाली वो सोनी नहीं थी। वह तो एक ही रात परिपूरित हो उठी अंतस के प्रेम से
लबालब भरे सागर में। वह शांत झील डूब गई। प्रेम पथ पर अब उसका चलने का मन नहीं था
वह वही ठहर जाना चाहती थी। एक प्रेम से भरी गगरी बन गई थी। जिसमें प्रेम और शीतलता
के रस भी भरा हो। वह जो कल तक एक प्यासी नदी थी। एक सूखा रेतीला पाट थी। एक रस हीन
सूखा वृक्ष थी। आज पल्लवित हो उठी थी, आपने ही प्रेम पाश में
डूब कर।
आज तुम्हारे संग जो
मिला है वह बहुत कीमती था। उस की कभी मैं कल्पना नहीं कर सकती थी। इतना सूख भी इस
प्रेम में मिल सकता है। तुम तो जादूगर हो। मुझे पागल कर दिया। अब तुम्हारे जाने के
बाद कैसे मेरी श्याम कटेंगी। तुम सूख के साथ-साथ एक दर्द भी दिये जा रहे हो। और
दोनों कुछ पल के लिए एक दूसरे में खो गए। सोनी की आंखों में विदाई के नहीं प्रेम
के आंसू थे। परमात्मा ने आज मेरी मुराद पूरी कर दी। सच ही और उसने पेंटल के पेर
पकड़ लिए। पेंटल ने इस विषय के बारे में ऐसा कभी सोचा नहीं था। परंतु एक क्षण का
प्रेम भी मनुष्य को क्या से क्या बना देता है। दोनों के मन में एक दूसरे के लिए
धन्यवाद था। और विदाई का दर्द भी था। वह जानते थे की शायद हम फिर मिले या न मिले
परंतु रात के मिलने की पूर्ण तृप्ति उन्हें एक आनंद एक तृप्ति दे गया था। सोनी को
आज की रात से अपने अंतस में एक स्त्री होने की महान घटना का उद्गम होता सा महसूस
हो रहा था।
दूर जब तक पेंटल
झाडियों में ओझल नहीं हो गया सोनी उसे खड़ी हो कर निहारती रही। और हाथ हिलाकर
टा-टा करती रही। आज उसके अंदर एक पूर्णता की खुशी थी। जिसके विषय में वह नहीं जतला
नहीं सकती थी। क्योंकि उस विषय में वह जानती तक नहीं थी। वह अंदर से अपने रोए-रेशे
में मधुरता का एहसास कर रही थी। एक मीठा-मीठा सा अनछुआ सा दर्द उसके पौर-पौर से उठ
रहा था। एक सुस्ती सी उस पर छा रही थी। मन कर रहा था किसी से बात न करूँ और वह
नौकर को बोल कर अपने कमरे में चली गई की मैं कुछ आराम करने के लिए जा रही हूं मुझे
परेशान मत करना। मैं गहरी नींद में सो जाना चाहती हूं। और वह सुख सपनों में जाकर
डूब गई।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें