अध्याय 48
मम्मी-पापा का पूना
जाना
ओशोबा हाऊस का काम
पूर्ण होने पर कितना गहन एकांत शुरू हो गया। मैं जिस कोने में भी जाता तो एक अलग
ही तरंग मुझे महसूस होती थी। क्या लोगों की भाव तरंग उसके साथ चलती है। फिर मुझे
अचानक घर पर कुछ ऐसा लगा जिसे मैं पहले भी महसूस कर चूका था। घर पर फिर समान
सूटकेस में सजाया जा रहा था। मेरा दिल तो एक दम बैठा गया कुछ देर के लिए। लेकिन
थोड़ी देर में अपने को मैंने सम्हाल लिया।
बाद में पता चला की केवल मम्मी-पापा जी पूना जा रहे है। इस बार मैंने मन से
प्रसन्नता होकर उन्हें विदा करने की ठान ली थी। जो गलती मुझ से पिछली बार हुई थी
मैं उसे दोहरना नहीं चाहता। चाहे मुझसे वह गलती किसी शक्ति ने करवाई हो चाहे उसे
सब ने सही ठहरा दिया हो। परंतु हुआ तो गलत था।
कितने दिन हो गए दोनों को खटते हुए काम की इस मारा-मारी में विश्राम की भी
तो जरूरत होती है। जब पिछले साल भी मैंने उन्हें जाने से रोक दिया था। लेकिन अब
नहीं रोकूंगा। हां एक बात और सालों से चल रहे ओशोबा हाऊस का काम भी तो अब खत्म हो
गया। इसलिए लम्बी छूटी तो मम्मी पापा को चाहिए ये उनका हक है।
मम्मी पापा सुबह जब जा रहे थे। तो मेरे पास आए। मैं थोड़ा उदास था क्योंकि कितना ही कह लूं मम्मी पापा के बिना ये घर एक दम से सब खाली-खाली लगता है। उनके बिना मेरा मन तो नहीं लगेगा, ये सब दर्द मुझे सहना होगा। और पहली जैसी बेवकूफी नहीं करूंगा। पापा जी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, मैंने पूंछ हिलाई, कि आप जाओ मैं यहां ठीक रहूंगा आप यहां की फिक्र मत करना मैं यहां सब का ख्याल रखूंगा।
ये पहला मोका था, की केवल बच्चों के सहारे से पूरा घर छोड़ कर जा रहे थे। दादा जी का कितना सहारा था। चाहे वो कुछ भी नहीं करते थे परंतु सब कुछ करते से दिखते थे।हां ये बात ठीक है
जैसा मैंने सोचा उससे भी अच्छी तरह से सब ने दुकान और घर को बच्चों ने सम्हाला।
दीदी बहुत मेहनत कर रही थी। वह बड़ी होने के साथ सब के साथ तल मेल बिठा रही थी।
दूसरा दुकान पर जो लड़का काम कर रहा था उसका भी काफी सहारा था। कभी-कभी तो वह घर
पर ही सो जाता था। वह घर परिवार की तरह ही रहता था। उनके पिता और पापा जी स्कूल
में साथ-साथ एक कक्षा में पढ़ते थे। उनके पिता की मृत्यु के कारण परिवार काफी बुरी
हालत में था। तब पापा ने उसकी मम्मी को बुला कर कहां की तीन लड़के है कोई काम नहीं
करता एक तो तुम मेरे पास भेज दो। जो काम करने के लिए आया वह बीच वाला भाई था जिसका
नाम शायद नरेंद्र था। उसे बुला कर उसे काम पर रख लिया था। बह बहुत खुश रहता था।
मम्मी और पापा जी को वह भी मम्मी-पापा जी कह कर बुलाता था। इसी से वह मुझे बहुत
अच्छा लगता था। अपने बच्चों से भी ज्यादा मम्मी पापा की दुकान क्या घर पर मदद करता
था।
एक बात का बदलाव
जरूर जीवन में हुआ। इस बार जब मम्मी पापा चले गए तो घर खाली-खाली नहीं लग रहा था।
किसी भी कोने में आप चले जाओ आपको अकेलापन बिलकुल नहीं लगेगा। यहां की शांति भी
बहुत गहराती जा रही थी। और नीचे साल और कोठा तो बहुत ही गहरा और शांत हो गया था।
मैं दिन में वहां भी घंटा-आधा घंटा जरूर बैठता था। एक तो वहां पर दिन में प्रकाश
नहीं आता था। दूसरा बहार की आवाज तो एक दम से खत्म हो जाती है मानो आ अलकूफा में
प्रवेश कर गए हो। उसके ऊपर पिरामिड बनने के बाद मुझे सबसे अच्छी जगह नीचे का कोठा
ही लगता था। अब उपर छत पर जो पेड़ पौधे बोए थे वह भी अपना रूप यौवन दिखाने लगे थे।
शरीफे के पेड़ ने तो तीन-चार फल भी दे दिए थे, साथ में जो अमरूद था उसमें
इस साल केवल फूल ही आए फल नहीं बने। शायद बच्चा होगा। यही हाल आंवले का था। वहां
भी फल नहीं लगे। हां चीकू ने जरूर थोड़े फल दिए, अनार तो एक
दम फूलों से लद गया था। और बाद में फल भी बहुत आए। पापा जी इन फलों को कभी नहीं
तोड़ते थे। ये मेरी समझ के बहार की बात थी। परंतु मैं देखता था कितने ही प्रकार के
पक्षी अब छत पर आकर किलकारीं मारते है। कहीं सुबह-सुबह फाँकता, तोते, छोटी चिड़िया, जो अनार
के दाने कितने चाव से निकालकर खाती थी। कुदरत भी क्या कमाल है। जब अनार का फल पक
गया तो वह उसे खोल देती है। और पशु पक्षियों का स्वागत करती है। ताकि उसकी वंश बेल
आगे बढ़े। वह उन्हें खाने का निमंत्रण देती है। और इस तरह से उसके बीज दूर दराज तक
फैलते रहें। अब खुले फल से पक्षी कितने आराम से खाते रहते वह फल कितने दिन तक चलता
रहता था। पेड़ से लगा रहने के कारण वह खराब भी नहीं होता था। एक दम से ताजा बना
रहता था। पक्षी खते ही कितना थे पाँच-सात दाने।
पापा जी के आने से
तीन दिन पहले मुझे एहसास हो गया था। कि पापा जी आने वाले है। और मैं रोज दरवाजे के
पास आँगन में बैठ कर इंतजार करता था। दीदी जब मुझे बैठे हुए देखती तो कहती यहां
क्यों बैठ है,
फिर शायद समझ गई की पोनी मम्मी-पापा का इंतजार करता है। परंतु पोनी
अभी तो तीन दिन है मम्मी पापा के आने में। सच कहूं तो मुझे बहुत अच्छा लगता था
इंतजार करना भी। जब आपको प्रेम हो तो इंतजार में भी एक माधुर्य है, उसके प्रेम के तार आप से जूड़े है और रह-रह कर उसके प्रेम की तरंग आप तक
बह कर आ रही होते है। और आप उस समय प्रेम की तरंगों से सराबोर हो डूब जाते हो।
जिसने प्रेम के इंतजार का आनंद नहीं लिया वह प्रेम के एक सौंदर्य, एक माधुर्य, एक दर्द की गहराई को नहीं जान पायेगा।
वह कुछ अद्भुत सौंदर्य से वंचित रह गया।
जिस दिन पापा-मम्मी
आये मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। मैं रो रहा था नाच रहा था। और बार-बार
मम्मी-पापा के उपर दोनों पंजों से खड़ा हो रहा था। और जब वह मुझे पकड़ने कि कोशिश
करते तो छूड़ा कर दूर भाग जाता था। देख रहा था परिवार के सभी लोग आज नहीं थे। दादा
जी तो जा चूके थे। शायद हिमांशु भैया दुकान पर थे। और वरूण भैया अपने कमरे में सो
रहे थे। केवल मैं और दीदी ही मम्मी पापा के स्वागतम में खड़े थे। पिछली बार की बात
मुझे याद है कितने दिन हुए लगता था कल ही की बात थी। किस तरह से सब द्वार पर खड़े
होकर मम्मी पापा का स्वागत कर रहे थे। हिमांशु भैया तो कैमरे से फोटो भी खींच रहे
थे।
इस बात से मेरे मन
में एक आकांक्षा उभरी की क्या ये परिवार अब बिखर रहा है। क्या बच्चे बड़े होने के
कारण इस परिवार में समा नहीं पा रहे थे। क्या उनकी सोच का दायरा बड़ा हो गया। क्या
ये मनुष्य का स्वभाव है। हम तो ऐसा नहीं करते पूरा परिवार एक साथ झूंड में रहता है।
अगर ये सब जैसा मैं सोच रहा हूं वैसा हुआ तो मम्मी पापा का जीवन कितना अकेला हो
जायेगा। परंतु पापा जी की तो कोई बात नहीं वह तो कितने ही काम कला को जानते है, परंतु
मम्मी जी के लिए मैं फिक्रमंद हूं। मां की ममता होती है, और
पिता का प्रेम। ममता में मोह होता है, जो हमेशा एक दुख को
अपने में समेटे लिए चलता है। परिवार समाज का एक महत्व पूर्ण अंग है, परंतु क्या जवान होने पर उसके हाथ की ताकत हस्तांतरित हो जाती है। ऐसा तो
हमारे झुंडों में भी होता है जब मुखिया बूढ़ा और कमजारे हो जाता है तो उस मुखिया
के पद को छोड़ना होता है क्योंकि वह अब शिकार की अगवाई नहीं कर सकता। परंतु मनुष्य
जीवन तो बहुत भिन्न है। यहां की धारा-परवाह भी भिन्न है, सोच
भी अलग है, और साथ कितनी सरलता से रहा जा सकता है।
मनुष्य का विकास
अपनी पूर्णता को अपने में समेटे साथ चलता है। आप एक निश्चित पूर्ण प्रेम से फैले
जीवन में जी सकते हो। एक निर्भीक होकर परंतु इस में एक बात अति महत्व पूर्ण है
अहंकार तो आपको छोड़ना ही होगा। तब आपको दिख सकता है की परिवार में आप किस पौड़ी
पर खड़े हो,
अगर इस दौड़ भागम-भागम में आप सबसे ऊपर जाना चाहते हो तो आपका कोई
इलाज नहीं। मैं इस परिवार को इतने दिन से जानता हूं, मैं
इसके जीवन का एक अभिन्न साक्षी हूं। परंतु बचपन में जिस तरह से सब जी रहे थे वह
कितना सुखद था। अब वृक्ष बड़ा हो रहा था उसकी साखा प्रसाखाएं विस्तार ले रही कुछ
लोगों के लिए हो सकता विस्तार के लिए स्थान कम पड़ता हो। परंतु ध्यान प्रेम के इस
मंदिर में तो आपके पास बहुत आयाम है मार्ग है। परंतु समय को रोका तो नहीं जा सकता।
मुझे आज भी यकीन नहीं हो रहा कि कोई मुझे आकर कहे की यह परिवार अब साथ रहने लायक
नहीं रहा। ये कैसे हो सकता है। ये रहस्य तो आने वाले कल के गर्भ में छुपा है। और
उसकी कुछ-कुछ परतें पापा जी ने खोल कर एक दिन मम्मी को बता दी थी। कि आप अपने को
तैयार करो। ये बच्चों के प्रति मोह आपको बाद में दूख देगा। परंतु शायद मम्मी अति
सरल है। उन्होंने पापा की उस बात को कोई महत्व नहीं दिया। परंतु मैं देख रहा था उस
आहट को अपने और-और नजदीक आते हुए। शायद दादा जी तो चले गए, और
मैं भी चला जाऊंगा इसे देख नहीं पाऊंगा। परंतु लक्षण तो जीवन के कुछ भिन्न ही लग
रहे थे। दोनों भाइयों में अब वो प्रेम नहीं रहा जो पहले दिखता था। दोनों का
अपना-अपना मय अपना अहंकार बीच में खड़ा हो रहा था। परंतु दीदी आज भी थोड़ी सरल है,
परंतु उसके लिए भी कठिन तो है ही, महिला का इस
समाज में अकेले चलना। अगर पापा दीदी के संग साथ है तो शायद उसका मार्ग सुगम हो
जायेगा। खेर में तो चाहता हूं कि ये सुंदर बगीचा इसी तरह से फलता-फूलता रहे। इसकी
महक इसी तरह से बनी रहे। और ये उपवन ये पुष्प यूं ही महकते खिलते रहे।
बच्चों की पढ़ाई
में अब कितने ही कम दिन तो रह गए थे। एक दो साल बाद। मुझे नहीं लगता की पापा-मम्मी
जी सारी उम्र इसी तरह से दुकान पर खटते रहेंगे। पापा जी के न जाने कितने ही शोक है, पेंटिंग..
संगीत में बाँसुरी, लिखना....बागवानी करना। वह अपना कितना मन
मार कर जी रहे होंगे। अब उनके जीवन का उतार भी शुरू हो गया था। या उनका मन भी करता
होगा कहीं दूर दराज घूमने जाने का। उन्होंने किस शोक से नई मोटर साइकिल ली थी
परंतु वह तो चलती ही नहीं। इसे चलाने के लिए समय चाहिए जो उनके पास आज भी कम है।
क्या इस बढ़ती उम्र में वो उर्जा अब पापा-मम्मी के पास है की वो ये सब कर सकेंगे।
नहीं तो आपका पूरा जीवन इसी सब में कट गया। इस दुकान से निकलने को छटपटाते तो है
मम्मी पापा। परंतु जिम्मेदार भी कोई चीज है। क्या सभी मनुष्य इसी तरह से जीते है,
कितने जीवन का भाग केवल पैसा कमाने में या अपनी संतान को बड़ा करने
में लग जाता है। शायद ही वो जीवन का भाग है जहां से मनुष्य दुःख निर्मित करना शुरू
कर देता है। पृथ्वी पर और कोई प्राणी अपने बच्चों के लिए इतनी उन्हें अपने पैरों
पर खड़ा करने के लिए साधन सुविधा देने के लिए। अपनी लम्बी जिंदगी को खत्म नहीं
करता। वाह रे मानव तेरा भी जवाब नहीं। तू अपने को महा बुद्धिमान समझता है। इस से
तो की आनंद उत्सव में पूरी प्रकृति जी रही है। बच्चे के पालने मात्र का आनंद लेती
है। फिर उन्हें दूर उड़ा दिया जाता हे।
और सच ऐसा ही हुआ।
भैया अपना केमिस्ट का कोर्स पूरा करके लखनऊ से जब आये तब पापा जी कह दिया की अब हम
तो थक गए है। अब आप दुकान को सम्हालो। हालांकि दुकान आज भी खूब चल रही थी। परंतु
दोनों बच्चों में से किसी ने भी उसमें रस नहीं दिखाया। हिमांशु भैया ने तो साफ कह
दिया की ये काम मैं नहीं कर सकता। मैं तो नौकरी करूंगा। तब वरूण भैया ने कहा पापा
जी मैं दूध का काम नहीं कर सकता। मैं तो दवाइयों की दुकान खोलूंगा। तब पापा ने
कहां कोई बात नहीं दूध का कम जो हमने सालों कि मेहनत से खड़ा किया था। वह आपको
नहीं जंचता तो आप को जो पसंद हो वह काम करो। परंतु अब हम जल्दी से जल्दी इस काम से
मुक्त कर दो। बच्चों ने नहीं सोचा था कि पापा जी इतनी जल्दी काम से मुक्ति
चाहेंगे।
परंतु ये पापा जी
का निर्णय मुझे बहुत अच्छा लगा वरूण को एक दवाई की दुकान पर काम करने के लिए भेज
दिया गया। ताकि वह कुछ अनुभव ले कुछ काम सिख ले समझ ले और अपनी दुकान की तैयारी कर
ले। ठीक एक साल बाद पापा मम्मी ने अपना काम बंद कर दिया। वहां भी ईशाद मियाँ आये
अपनी लकड़ी का काम करने के लिए पुराने सुंदर काउंटर को तोड़ दिया गया अब सब बदल
रहा था। हिमांशु भैया की बी. एफ. पूरी हो गई थी पापा जी कहा था की चाहो तो एम. एफ.
आप दिल्ली से कर लो या फ्रांस चले जाओ। परंतु भैया ने मना कर दिया कि मैं तो नौकरी
के साथ घर पर ही पेंटिंग करूंगा। जैसे आप उचित समझो पापा जी ने कोई विरोध नहीं
किया। पापा जी की ये खासियत थी की अपने जीवन के सपने अपने बच्चों के कंधों पर कभी
नहीं रखे थे। नहीं तो क्या जितना अच्छा पापा जी क्रिकेट खेलते थे, वरूण
भैया बचपन में पापा जी के साथ कितनी क्रिकेट खेलते थे। अपनी स्कूल की टीम में
दोनों भाई बहुत अच्छा खलते थे। जब उनकी ही रुचि नहीं तो पापा जी तो मुक्त हो गए।
शायद ये सोच समझ पापा जी को ध्यान के कारण आई क्योंकि मुझे कुछ अजीब लगा की लोग
बच्चों को कामयाब करने के लिए मारे-मारे फिरते है। परंतु पापा जी ने उन्हें संगीत
कि शिक्षा दी, ये एक अतिरिक्त गुण आपको मिला इसे व्यवसाय
बनाना जरूरी नहीं आप इससे अपने जीवन में रस प्राप्त कर सकते हो। पापा जी भी तो
बांसुरी बजा कर कितने आनंदित होते है। चलो जो भी होता है अच्छा ही होता है। जो हो
रहा है वह ठीक ही होगा परमात्मा तो कभी गलत करता नहीं।
अब मैं जीवन का एक
नया आयाम देख रहा था। पापा मम्मी अब नीचे साल और कोठे में सोने और रहने के लिए आ
गए। सालों तो पापा जी पिरामिड में ही सोते थे, मम्मी जी का किचन के पास एक
छोटे से कमरे में रहती थी। लेकिन दीदी ने कहां कि मैं तो कम ही रहती हूं, आप दोनों नीचे ही आ जाओ। ये अच्छा ही हुआ मेरे लिए ही नहीं मम्मी-पापा के
लिए भी। अब मैं दोनों के बीच में सोता था। सब बच्चों के कमरे बन गए थे। अब हम सुबह
जल्दी उठ कर जंगल में चले जाते थे, अब उस पुराने जंगल में
जाने की मनाही कर दिया गई थी। इधर जो जंगल है जहां में सड़क के पास नाले में गिरा
था। वह भी जंगल सुंदर था। वहां तीन तो तालाब थे। एक भीमावाला, एक धोबीघाट, पीलीझोड़ी जिनमें साल में छ: महीने पानी
भरा रहता था। ये जंगल भी काफी बड़ा था गांव के ही नहीं पास राजेंद्र नगर के भी लोग
यहां घूमने के लिए आते थे। यहां पर कुत्ते भी बहुत थे। जो कुत्ते लगभग मुझे जान गए
थे और सारे के सारे मेरे दोस्त हो गये थे। क्योंकि अब मम्मी-पापा उनके लिए रस और
दूध लेकर जंगल में आते थे। और एक थैली में पक्षियों के लिए बाजरा। वहां पर और भी
बहुत से लोग घूमने के लिए आते थे। सब कुछ न कुछ पशु पक्षियों को खाने को देते थे।
इन्हीं सब करण से
वह पशु-पक्षी जीवित थे। धीरे-धीरे मुझे यहां भी आना अब अच्छा लगने लगा था। एक तो
यहां दौड़ने के लिए बहुत सुंदर रास्ता था। दूसरा यह गांव के एक दम से पास था।
जगह-जगह पानी भरने के लिए गमले, पत्थरों के बीच सीमेंट से कटोरी नुमा,
बना कर उन्हें पानी से भरने के लिए कई लोग आते थे। यह सब देख कर मैं
कितना खुश था की मनुष्य अपने लिए ही नहीं
साथ जीने वाले जीवों के प्रति भी सहानुभूति और दया रखता है।
अपनी जाति के छोटे
बच्चों को जब में देखता तो बड़ा अजीब लगता था। कि मैं भी कभी जरूर इतना ही छोटा
रहा हूंगा। कैसा कुदरत का करिश्मा है। शरीर पर कोई जोड़ नहीं फिर भी कितना फैल कर
विशाल हो जाता है। पापा जी कह रहे थे अगर इन छोटे बच्चों को आप केवल सात दिन भी
दूध पिला दो तो इनके जीने की शक्ति दो गुणा हो जाती है। और ठीक ऐसा ही होते मैं
देखता था। दूध में बहुत ताकत है। उस बेचारी बच्चों की मां को क्या खाने को मिलता
होगा। फिर चार पाँच बच्चों का कैसे वह पेट भर दूध पिला पाती होगी। और मां की ममता
को मैं यहां भी देखता था। जब उसके बच्चे दूध पी रहे होते तो वह दूर खड़ी हो जाती
जब बच्चे पी चूके होते तब वह बचा हुआ ही दूध पीती थी। बहुत कम मां ऐसी होती है जो
अपने बच्चों से पहले दूध पीती थी। सबका अपना-अपना स्वभाव होता है। ये जन्म-जन्म
चलता रहता है हमारे साथ।
अब जीवन का चक्र
कुछ अजीब तरह से चल रहा था। कभी-कभी जब दीदी भी घर पर होती तो हमारे साथ आती थी।
एक दिन शायद अप्रैल या मई माह होगा। हम जंगल हम जब घूमने के लिए गए तो किसी भी
बर्तन में पानी नहीं था। सुबह ही गर्म हवा चलना शुरू हो गई थी। तब दीदी ने पूछा की
पानी क्यों नहीं है। तब बताया की तीन दिन से बोरिंग खराब है। तब दीदी ने कहां की
पापा जी आप-और मम्मी जी यहीं रूको मैं घर से कुछ पानी भर कर लाती हूं। दीदी जी
देखने में पतली लगती है परंतु काम करने में बहुत साहसी है। पापा जी ने कहा की मैं
भी चलता हूं,
तब मेरी और मम्मी की मुसीबत कि ये अकेले कैसे रहेंगे। और मैं तो
पागल था पापा जी के जरूर पीछे जाता। दीदी बीच के छोटे रास्ते से गांव गई और एक
बड़े बैग में पानी की कई बोलने भर लाई इस बीच वहां एक झबरे बालों की कृतियां शायद
प्यास से मर रही थी। मम्मी जी ने अपनी जो पानी की बोतल साथ ले कर गई थी। उससे पास
के बर्तन में डाल दिया। वह सारा पानी पी गई। जब की हमारा शरीर ऐसा है हमें इतने
पानी की जरूरत नहीं होती। शायद बहुत अधिक प्यासी होगी या कई दिन से पानी नहीं मिला
होगा।
दीदी ने दो चक्कर
लगाये। सारे बर्तन पानी से भर दिए। अगले दिन तो पापा जी कुछ बोतलें एक बैग में डाल
कर साथ ले गए। मेरी भी एक मुसीबत थी। की मुझे भी पकड़ना होता था। और रास्ते के
कुत्ते अलग से परेशान करते थे। खेर अगले दिन बोरिंग ठीक हो गया। देखो अगर मनुष्य
यहां पानी नहीं भरता तो ये पशु पक्षी कैसे जीवित रहते। हमारे यहां के मोर बहुत ही
सुंदर रंग अपने में लिए होता है। मोरों की संख्या हमारे इस जंगल बहुत है। वह आपके
आस पास भी यूं ही घूमते रहते थे। पापा-मम्मी तो यहां पर भी ब्रेड लेकर के आते थे।
जो पास एअर फोर्स के तार है अब वहां दीवार बना दी है। पहले तो हम अंदर जाकर खूब
बेर आदि खाते थे। परंतु अब जो अंदर बेचारे गीदड़ है उनके लिए कठिन हो गया। वह बाहर
नहीं आ सकते। उन्हें बहुत दूर से दीवार को पार कर आना होगा। इसलिए एक ऊंचे से
पत्थर पर चढ़ कर ब्रेड को अलग-अलग कर दीवार के पार फेंक देते थे। अगर वह सूख भी
जाये तो खराब तो होती नहीं। और बढ़िया कुरमुरी हो जाती है।
कितना रौनक मेला
लगा रहता है,
कितने लोग रोज मिलते एक दूसरे को राम-राम करते सब अच्छा लगता था। हम
तीनों अब रोज घूमने जाते है। पापा-मम्मी जब ध्यान करते है तो मैं भी उनके साथ ही
ध्यान करता हूं। हम सब अकसर प्रवचन सुनते हुए सोता थे। ये मम्मी पापा की पुरानी
आदत थी इस देखते मेरा पूरा जीवन गुजर गया था। पापा जी जब बांसुरी बजाते है तो उपर
के कमरे में चले जाते है। लेकिन अगर गर्मी अधिक होता तो केवल सुबह ही वहां बैठने
का आनंद था। नहीं तो रात को तीन बजे ही मम्मी पापा छत पर तारों की छांव में बैठ कर
चाय पीते थे। मेरे लिए उस समय दो ब्रेड लाई जाती। एक प्रकार से में तो पापा जी का
हनुमान या फिर भोले भंडारी का नंदी था। एक पल भी उनसे दूर नहीं होता था। लगता था
कितना ही पी लूं पापा जी का संग साथ वही कम था। पापा जी कम्पयूटर पर काम करते रहते
और में उनके पैरों के पास सोता रहता था। अब हम तीनों का पूरा समय केवल अपने लिए
था। जैसा करना है कब करना है कहां जाना है हमारी मर्जी। यही तो मुक्ति का पहला कदम
है बाद में यही मार्ग की पगडंडी बन जायेगा। परंतु एक दिन मम्मी पापा बाईक से अचानक
कहीं चले गए मैं सोच रहा था की कुछ घंटों में आ जायेंगे। परंतु वह तो रात को भी
नहीं आये। मैंने दीदी की और देखा। वह कहने लगी पापा-मम्मी घूमने गए है। तब मेरी
समझ में नहीं आया कि कितनी दूर। परंतु दीदी साथ थी तो कुछ अजीब नहीं लगा अब पापा
मम्मी के दिन है। परंतु पापा जी इस उम्र में इतनी दूर मोटर साइकिल से जा सकते है।
वह थकेंगे नहीं पहले तो केवल दो-तीन घंटे के लिए जाते थे। अब तो कितनी ही दिन हो
गये। परंतु मैं भी कितना पागल था वह सारा दिन मोटर साइकिल थोड़ा चलते होंगे कही
रहते या शायद ध्यान करने के लिए किसी आश्रम में चल गये होंगे।
इस सब से मुझे अधिक
प्रसन्नता थी की पापा जी का शरीर आज भी बलिष्ठ है, स्वास्थ है। अब हम
चारों का जीवन एक अलग ही आयाम में चला गया था। हर समय मन प्रसन्नता से भरा रहता
था। एक गुदगुदाहट सी पूरे रोंए-रेसे में फैली रहती थी। एक मस्ती। हालांकि शरीर
बूढ़ा जरूर हो रहा था ये सब जब में घूमने के लिए जाता तो पता चल रहा था। क्योंकि
अब में उतना नहीं दौड़ पाता था। जल्दी थक जाता था। परंतु शरीर एक नई निर्भारता को
महसूस कर रहा था। जीवन के पंख लग गए थे। बच्चे भी अपने काम में लग गए थे। कितना
बचेंगे एक दिन तो इस संसार के कोल्हू में पीसना ही होगा। परंतु शायद वह तैयार नहीं
थे। इसलिए उनके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थे। वरूण भैया तो कभी-कभी सोते ही रहते थे।
दस-या ग्यारह बजे जाकर दुकान खोलते थे। मम्मी परेशान होती थी। क्योंकि वह तो कितनी
जल्दी उठती थी। परंतु काम-काम में भेद होता है। मम्मी-पापा का काम अति कठिन था। सब
खराब होने वाला सामान होता था। वरूण भैया की दुकान का क्या, तुम
खोलो या मत खोलो कुछ इतनी जल्दी तो खराब नहीं होगा।
फिर पापा जी को
समझाते और मना करते की अब इनका काम है इन्हें करने दो। जब सर पर पड़ेगी तभी ये
उठेंगे। अगर ऐसे इनके साथ चिपटी रहोगी तो दूख मिलेगा। न माधो के लेने न में साधो
के देने में। अब अपना काम तो इनको करना ही होगा। आप नाहक चिंता कर रही है। परंतु
शायद ये बात पापा जी मम्मी को कुछ कम जंचती थी।
परंतु पापा जी लाख
रूपये की बात कह रहे थे। आज नहीं तो ये बात मम्मी जी को भी समझ आ जाये। वज़न सर पर
होगा तभी तो आप जल्दी से घर जाने की करोगे। से संसार है। इसके दो पाट है दाना जब
डल गया तो अब उसकी खेर नहीं चाहे दलिया बने या आटा।
राम-राम।
भू.... भू.....
भू.....
आज इतना ही।

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