(सदमा - उपन्यास)
कल जब नानी और
पेंटल बाते कर रहे थे तो उन बातों से कितने ही मार्ग उन्हें खुलते दिखाई दिये। कल
तक तो न जाने क्यों सब द्वारा बंद लग रहे थे। कहीं किसी कोने कातर से एक रोशनी का
किरण तक नजर नहीं आ रहा थी। आदमी जब थक जाता है। तो उसका तन ही नहीं थकता उसका मन
भी थकता है। नानी तन से तो कमजोर थी। परंतु मन भी उम्र पा कर कमजोर हो जाता है।
ज्यादा उम्र ज्यादा तनाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती। परंतु पेंटल का तन भी जवान था
और मन भी। और वह शहर का रहने वाला पढ़ा लिख था। सो आज रात नानी को बहुत अच्छा लगा
मानो दूर कहीं उसकी आस का सूर्य उगने वाला है अभी भले ही वहां तमस का पहरा हो, परंतु
एक आस की लालिमा के धब्बे भी फैलने शुरू हो गए थे। धीरे-धीरे ये लालिमा एक दिन चटक
रोशन जरूर बन जायेंगे।
एक आस, एक उम्मीद उन दोनों को दिखाई थी। समय भी किस तेजी से गुजरता है पता ही चल रहा था। दूख में समय लम्बा तो हो जाता है परंतु एक समस्वरता में वह कितना छोटा हो जाता है। जब तक उसमें जाकर कोई न जिए या बिना उस पर से गुजरे उसे कभी पहचान नहीं सकता है। वही-वहीं काम रोज करते-करते कब बीस दिन गुजर गए पता ही नहीं चला।
और एक दिन टाइम आ गया की आज सोम प्रकाश का प्लास्टर कटवाना है। एक उम्मीद की किरण की अब वह अपने कदमों से कम से कम चल तो पड़ेगा। चल तो वह अब भी लेता था। परंतु पैर एक दम सीधा रहता था प्लास्टर की वजह से उसे पूरी तरह से मोड़ नहीं सकता था। फिर नहलाया-धुलाया भी तो नहीं जा सकता था। ये तो भला हो ये ऊटी पहाड़ी क्षेत्र है अगर यहीं मुम्बई होता तो आदमी का बुरा हाल हो जाता है। अगर आप वहां मुम्बई में दो दिन नहीं नहाये तो, आपके पूरे शरीर पर एक धूएं और धूल की पर्त जमा हो जाती है।सोम प्रकाश को ले
कर कितने उतार चढ़ाव पेंटल के मन में उठ रह थे। सो पेंटल तैयार हो कर बहार निकलने
से पहले नानी को कह रहा था आप भी साथ चलना। मैं गाड़ी लेकर आता हूं। वह जैसे ही
बहार की और निकला एक कार उसे अपनी और आती हुई दिखाई दी। उसके पीछे धूल का गुबार
चला आ रहा था। रास्ता कच्चा होने के कारण। कार पेंटल के पास आकर रूकी जैसे की
उसमें बैठा हुआ व्यक्ति उसे जानता है। शीशा नीचे करके किसी महीन मधुर आवाज में
महिला ने पेंटल को कहां की मैं आप लोगों के पास ही आ रहा थी। और वह पेंटल जी को
जगह बना कर पेंटल को अपने पास बैठने का नौता देने लगी। पेंटल कुछ तो झेंपे परंतु
इतने आग्रह और प्यार से वह उसे बुला रही थी। तो उसे मना भी नहीं कर सके। पेंटल ने
सोचा वह तो उसे जानता तक नहीं था। हो सकता है सोम प्रकाश की दोस्त हो।
पेंटल गाड़ी के
अंदर आकर बैठ गया। तब वह महिला बोली की कैसे है आप। सोम प्रकाश को देखने तो मैं उस
दिन आई थी बीच में मोका ही नहीं मिला। तब डा. साहब से पता चला की आज सोम प्रकाश का
प्लास्टर कटवाना है। सो नानी तो उसे ले जा नहीं सकती थी। मैं चल कर उसका प्लास्टर कटवा
लाती हूं। और उसने अपना हाथ पेंटल की और बढ़ा दिया की मेरा नाम सोनी है। सोम
प्रकाश हमारे ही स्कूल में टीचर है। और उसने पेंटल का हाथ बहुत प्यार से दबा दिया।
जब की पेंटल तो इस मार्ग का खिलाड़ी था। परंतु इस तरह के व्यवहार से प्रत्येक
पुरूष परेशान हो जाता है। जब उस पर हमला किया जाये। तब वह बगेले झांकने लग जाता
है। पुरूष भी हमला करना जानता है जब उस पर हमला होता है तो भी घबरा जाता है। वह
महिला लगातार बोल रही थी,
इससे पहले आपको मैंने ऊटी में देखा नहीं। यहां कहां पर आप रहते हो।
पेंटल—ने डरे सहमे
अपने को सुकेड़ कर कहां की मुम्बई में रहा हूं।
सोनी—अरे वाह क्या
बात है। आप तो बहुत मस्त शहर में रहते है। हमारा कितना मन करता है मुम्बई में कोई
हमारा दोस्त हो और कुछ हसीन रातें उसके साथ गुजारे। यहां पर क्या रखा है चारों और
मरघट सी शांति और पत्थर पेड़ अब आदमी बात करें भी तो किस से करें। यहां तो दीवारें
भी नहीं है जिससे आदमी बात कर सके। या सर टकराये।
पेंटल—जरूर-जरूर आप
से मिल कर बहुत प्रसन्नता हुई। हम आपको जरूर ही मुम्बई में घुमायेंगे। परंतु हमारे
पास कोई बँगला नहीं है। एक छोटे से कमरे में रहते है। परंतु आप कहां और हम कहां
दोस्ती कम से कम अपने समान के या फिर सोच विचार का तो कम से कम होना ही चाहिए। अभी
तो मुझे पता भी नहीं है कि आपके विचार सोच कैसे है।
गाड़ी सोम प्रकाश
के घर के पास पहुंच गई थी। नानी दरवाजे पर ही खड़ी गाड़ी को आते हुए देख रही थी।
गाड़ी तो उसे जानी पहचानी सी लग रही थी। लगता था ये वही गाड़ी है जो कुछ दिन पहले
आई थी। जब पेंटल उसमें से उतरा तो लगा नहीं ये मेरा बहम है। परंतु दूसरी खिड़की से
एक महिला निकली तो वह समझ गई की ये तो वही छिनाल है यह कहां से पीछे पड़ गई। तब
नानी को इस तरह से खड़ा हुआ देख कर पेंटल ने कहां की ये सोम प्रकाश के स्कूल मालिक
की बीबी है। सोम प्रकाश को लेने के लिए आई है।
नानी ने बात को
टालते हुए कहां-- फिर आप नाहक परेशान होगी। हम दोनों सोम प्रकाश को आराम से
अस्पताल ले ही जाते है। और उस का प्लास्टर कटवा कर ले आते है।
तब सोनी ने कहां की
नानी आप नाहक क्यों परेशान होती है हम दोनों के होते हुए। आप अब आराम करो हम दोनों
और साथ में ड्राइवर भी तो है सोम प्रकाश को ले जाते है। तब तक आप घर का काम काज कर
लो। देखो कितने दिन से घर का सारा सामान इधर उधर बिखरा हुआ है।
नानी भी तो यही
चाहती थी। उसके मन की मुराद तो पूरी हो गई थी। पेंटल के होते उसे सोम प्रकाश की
जरा भी फिक्र नहीं थी। सोम प्रकाश अपनी कुर्सी पर बैठा था। उसके चेहरे पर कोई भाव
न आ रहा था न ही जा रहा था वह मात्र था। इसे अगर होना कहे तो उसे कहां जा सकता था
की वह वहां पर था। वह सपाट एक शिला की तरह केवल एक वस्तु की तरह से ये सब दिख रहा
था। उसकी आंखों से उसके शरीर से, उसके देखने मात्र से समझ में आ रहा था
की वह केवल देख भर रहा है। चिंहित नहीं कर पा रहा। यहीं एक पतली सी लकीर है। जो
बीच में से टूट जाती है, तब हम न इस पार के रहते है और न उस
पार के। बहुत पहले आदमी सब मानसिक बीमारी को मात्र पागल पन ही समझता था। मन के सभी
रोगों को एक प्रकार का ही रोग समझता था। परंतु आयुर्वेद ही उसकी गहरी तंत्रिका के
जाल को जानता था। सोम प्रकाश कोई पागल नहीं था। केवल एक सदमे से उसके मन पर ऐसा
प्रभाव पड़ा था की उसकी संवेदना का तंत्र निष्कृत हो कर जम गये थे या अवरोधक हो गए
थे। आदमी के अंदर अगर कुछ कीमती है तो उसकी भावुकता, उसकी
संवेदना। वहीं से सब प्रेम स्नेह के स्त्रोत निकलते है। तब संवेदना का झरना ही सूख
जाता है। तो तब वह शुष्क रेगिस्तान जैसा सब सूखा बीहड़ सा हो जाता है। कहीं कोई रस
का श्रोत नहीं रहता। अब वह रस कैसे जगाया जाये। कैसे नये प्रेम के अंकुर उत्पन्न
किए जाये। यही है सारा खेल जिसे आयुर्वेद बहुत गहरे में जानता है।
खेर सोनी ने जैसे
ही सोम प्रकाश को देखा तो वह समझ गई की अब यह बीमारी बहुत लम्बी चलने वाली है। इस
बीमारी का तो आज के विज्ञान के पास कोई इलाज भी नहीं है। लेकिन उसके अंदर से जो
वासना की लहरे उठ रही थी वह तो शांत ही नहीं हो रही थी। आंखों पे धूप का चश्मा
लगाये सोनी ने सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर खड़ा होने के लिए कहां। परंतु उस तक कहां
सोनी की आवाज जा रही थी। वह तो निरीह नजरों से देखता रहा। तब पेंटल ने सोम प्रकाश
को सहारा देकर उठाया और कार की और चल दिया। सोनी नानी की और बढ़ी और आज्ञा चाही की
हम इनका प्लास्टर कटवा कर लाते है।
तब नानी ने कहां की
ठीक है बेटा तुम्हारा भला हो।
कार का दरवाजा
ड्राइवर ने खोला और सोम प्रकाश को बैठा दिया। दूसरी साइड की खिड़की खोल कर सोनी
सोम प्रकाश के पास बैठ गई। इधर की और पेंटल भी बैठ गया। गाड़ी अपने गंतव्य की और
चल दी। परंतु सोनी है की बार-बार सोम प्रकाश के जांघों पर हाथ फेर रही थी। परंतु
इस बात से सोम प्रकाश पर कोई असर नहीं हो रहा था। यह बात जब पेंटल ने देखी तो उसे
बड़ा ही अजीब लगा की ये किस तरह की वासना है। वासना या सेक्स तो हमारे अंदर भी
उठता है परंतु ऐसे तो नहीं। क्या सोम प्रकाश की अवस्था है की वह सेक्स को समझ सके।
परंतु क्या ये औरत देख नहीं पा रह की वह क्या कर रही है। या उसके बस के बाहर की
बात है। सेक्स शरीर की जरूरत है। अगर वह मन पर आ जाता है तो विक्रीत हो उठता है।
मन के तो पेंदी होती ही नहीं है। तब आप उसको कैसे भर सकते है।
ठीक इसी तरह से आज
अधिक सुख सुविधा के कारण मनुष्य मानसिक रूप से सेक्स से विक्रीत हो गया है। जैसे
आपने देखा कोई पशु सेक्स के लिए इतना पागल नहीं होता। जितना की मनुष्य है, उसका
सोचना खाना पहनना चलना मानो केवल सेक्स पर ही निर्भर हो गया है। क्योंकि ये सेक्स
शरीर की जरूरत न रह कर मन की जरूरत बन गया। इसलिए चाहे आप भोजन को ले ली जिए। भोजन
शरीर की जरूरत है अगर वह मन की जरूरत हो जाता है तो आप को कभी तृप्ति नहीं मिलती।
सोनी के चेहरे पर विकार पैदा हो रहे थे। वह बार-बार सोम प्रकाश की जांघों पर हाथ
फेर रही थी। यह सब जब पेंटल ने देखा तो उसने एक बार सोनी की और देखा। वह झेंप गई।
और अपनी नजरों को इधर उधर कर के उसे छुपाने की कोशिश करने लगी।
भला ये किस तरह की
औरत है। जब शरीर की भूख थी तो पैसे वाले से शादी की जैसे पैसे से ये सब खरीद लेगी।
परंतु पैसे वाला पति मिलने पर भी शरीर भूख तो समाप्त नहीं हुई वह और भभक उठी। अब
उस का क्या इलाज किया जा सकता है। एक समय तो वह समझती थी पैसा आने से वह सब खरीदा
जा सकता है। परंतु ये मनुष्य की सब से बड़ी भूल है। पैसा एक जरूरत की वस्तु है।
परंतु जिन के लिए पैसा ही सर्व सब हो उठता है उन का क्या इलाज किया जा सकता है।
ऊटी कोई खास बड़ा शहर नहीं था। आधे घंटे में ही गाड़ी अस्पताल के सामने जाकर खड़ी
हो गई। तब एक बार पेंटल न सोचा की क्यों न स्ट्रेचर ले आया जाये जिससे सोम प्रकाश
को भी अधिक कष्ट नहीं होगा। इसलिए वह सोनी को यह कह कर में अंदर से स्ट्रेचर लेकर
आता हूं।
उसने हां में गर्दन
हिला दी। ज्यादा भीड़ नहीं थी। अस्पताल में अधिक समय नहीं लगा केवल आधे घंटे का ही
समय लगा। सोम प्रकाश का प्लास्टर काट दिया गया। और कुछ दवाइयां मालिश के लिए एक
तेल भी लिख दिया और कहा की रोजाना आधा घंटा धूप में बैठा कर तेल मालिश करने से अधिक
जल्दी आराम होगा। और सहारे से धीरे-धीरे चलाने के लिए कहां गया। हड्डी में
फ्रैक्चर नहीं था केवल एक बाल की दरार आई थी। और नशों में खिंचाव आ गया था। इसलिए
पैर में सूजन बढ़ गई थी। अब सूजन न के बराबर थी। जिससे जो थोड़ा बहुत मांस फट गया
था उसके भरने में अधिक समय नहीं लगेगा। और यह एक महीने में चलने फिरने लग जायेगा।
अंदर से पेंटल को
इस बात की खुशी थी। परंतु जब सोम प्रकाश का चेहरा देखता तो वह उसे अपना दोस्त ही
नहीं लगता था। पिछली बार जब आया था तो कैसे दूर नदी के एकांत में हम चले जाते थे
कितना रमणीय स्थान ऊटी है। जिसने एक बार नहीं देखा सच वह सौंदर्य के एक आभा मंडल
से वंचित रह गया समझो। सोम प्रकाश धीर-धीर चल कर गाड़ी के पास आ गया। एक तरफ से
ड्राइवर ने सहारा दे रखा था दूसरा हाथ पेंटल ने अपने कंधे पर रखा था। जिससे की सोम
प्रकाश के पैरों पर अधिक भार न पड़े। खिड़की खोल कर उसे बिठा दिया गया। पास ही
पेंटल बैठ गया और उसने ड्राइवर से कहां की बाजार की तरफ से होते चलना कुछ फल फ्रूट
ले लेंगे तो ठीक रहेगा। फिर कई दिन घर से नहीं निकलना होगा। तभी सोनी ने कहां नहीं
आप कहो तो हर दो दिन बाद ड्राइवर को भेज दूं। तब पेंटल ने कहां इस की कोई खास
जरूरत ही नहीं है। आज लेने के बाद एक हाँफता तो आराम से चल जायेगा। फिर ये खाता भी
कितना है खाना भी बहुत कम खा रहा है। देखा आपने इसका वज़न कितना कम हो गया है।
बड़ी मिन्नत कर के घंटों लगे रहने से कहीं आधा खाना खाता है। नहीं तो मुख में रखे
केवल देखता ही रहता है। तब सोनी ने बड़े प्रेम से पेंटल की और देखते हुए कहां
की--लेकिन आप और नानी तो अपना ख्याल रखो। आप का स्वस्थ ठीक होगा तो आपके दोस्त का
ख्याल रखना आसान होगा।
गाड़ी बाजार की तरफ
से होती हुई चली। संतरे,
सेब और कुछ केले ले लिए गये। पेंटल पैसे देने लगा तो सोनी ने मना कर
दिया की नहीं आप तो हमारे मेहमान है। ये तो मेरा हक पड़ता है। घर की तरफ जाते हुए
सोनी ने कहा की गाड़ी घर की और ले लो। जब पेंटल ने कहां नहीं आपको तो नहीं परंतु
सोम प्रकाश को अधिक तकलीफ होगी वह कहां उठ कर इतना चल सकेगा। अभी तो ताजा-ताजा
प्लास्टर कटा है। तब आप मेरी बात मानो मैंने घर तो आपने देख लिए फिर किसी दिन जरूर
आयेंगे। दूर से ही अपने घर को दिखाते हुए सोनी कहने लगी की देखना आप एक बार जरूर
आना। आप से बात कर मन को बहुत ही अच्छा लगा आप जैसे लोग यहां नहीं मिलते आप से तो
एक बार में मिलने से मन को बहु प्रसन्न हुई। तब पेंटल ने शायद बात को टालने के
लिहाज से कहा की जरूर आप से दोस्ती कर मुझे गर्व होगा।
और गाड़ी सीधी फिर
सोम प्रकाश के घर की और चल दी। नानी धूप में बैठी इंतजार कर रही। गाड़ी से उतर कर
पेंटल और ड्राइवर के सहारे से चलते देख कर नानी को अच्छा लगा। आज पैर में प्लास्टर
का वो बोझ नहीं था। इसलिए चाल में भी बहुत फर्क था। सोम प्रकाश को एक कुर्सी पर बिठा
दिया गया और नानी कहने लगी बेटा सोनी तुम चाय पीओ तो बना कर लाती हूं। वैसे खाना
भी बना हुआ है कहो तो आपके लिए परोसूँ। आज आप ने आकर बहुत अच्छा किया नहीं तो
पेंटल और हम दोनों परेशान हो जाते। तब सोनी ने कहां नहीं नानी वो घर पर मेरा
इंतजार कर रहे होगे। मेरे बिना खाना नहीं खाते। नानी वो मुझे बहुत प्यार करते है।
पलकों पर बिठा कर रखते है। नानी जानती थी। उसका त्रिया चरित्र का एक रूप था। की
अंदर से वह क्या है और बाहर से वह क्या दिखा रही है। परंतु नानी ने हंस कर कहां की
बहुत भाग्य लेकर पैदा हुई। राज कर रही हो लाखों में किसी एक को ये सब नसीब होता
है।
इतना कह कर सोनी चल
दी और पेंटल को फिर से हाथ मिलाया और कहां की आप तो जरूर किसी दिन आना अकेली में
बहुत बोर हो जाती हूं। किसी अपने से बात कर अच्छा लगता है। यहां पर तो कोई अपना
नहीं जिस से बात की जा सकती। एक बेचारा सोम प्रकाश था जो कभी-कभी स्कूल के बाद
मिलने आ जाता था। अब वो भी बीमार हो गया है। अच्छा मैं आपका इंतजार करूंगी। पेंटल
सोच रहा था कि सोम प्रकाश इस के पास जाता होगा। बात चीत करने के लिए बात की हजम
नहीं हो रही थी परंतु उसने हां में गर्दन हिला दी।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें